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आर्ति प्रबंधं – ४०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३९

पासुरम ४०

अवत्ते पोळुदाई अडियेन कळित्तु

इप्पवत्ते इरुक्कुम अदु पणबो ?

तिवत्ते यान सेरुम वगै अरुळाय सीरार ऐतिरासा

पोरुम इनि इव्वुडंबै पोक्कु

शब्दार्थ

अडियेन  – मैं, श्री रामानुज के नित्य दास

अवत्ते  कळित्तु  –  ऐसे ही व्यर्थ  किए

पोळुदाई  – वे सुनहरे पल जो श्री रामानुज के चरण कमलों में कैंकर्य करके बिताए जा सकते थे

पणबो? – (हे श्री रामानुज!) क्या आपके गुणों और कीर्ति के लायक होगा?

इरुक्कुम अदु  –  अगर मैं रहूँ

इप्पवत्ते – यह सँसार (जो आपके प्रति कैंकर्य केलिए) शत्रु हैं

सीरार ऐतिरासा  – हे यतिराजा ! शुभ गुणों से भरें

पोक्कु – नाश कीजिये

इनि इव्वुडंबै  – यह शरीर और

अरुळाय  – कृपया आशीर्वाद करें

यान – मुझें

सेरुम वगै – पहुँचे की मार्ग के संग

तिवत्ते  – परमपदं

पोरुम  – “सँसार” नामक इस कारागार में रहना काफि है

सरल अनुवाद

अपने स्वामि श्री रामानुज के कैंकर्य में न लगाए हुए व्यर्थ किये गए समय के लिए मामुनि अपना शोक प्रकट करतें हैं।  उन्हें ऐसा लगता है कि वे इस शरीर में इस साँसारिक लोक में लम्बे समय से हैं और श्री रामानुज से प्रार्थना करतें हैं कि वे इस शरीर को काटकर फैंक क्यों नहीं देते? मामुनि के मानना हैं कि इससे वे परमपद पहुँच पाएँगे, जिसके केलिए वे सदा तरस्ते हैं, और वहाँ श्री रामानुज के प्रति नित्य कैंकर्य कर पायेँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि प्रस्ताव करतें करतें हैं, “ हे श्री रामानुज! आपकी सेवा लिए ही मेरा जन्म हुआ है।  किन्तु जो सुनहरे पल आपके प्रति कैंकर्य में बीते जा सकते थे, वे मैंने व्यर्थ किये।  मैं अभी भी इस सँसार में डूबा हुआ हूँ।  परन्तु इस सँसार में मेरा नित्य वास आपके कृपा के विरुद्ध है। अत: आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे परमपद की मार्ग दिखा कर आशीर्वाद करें, जहाँ आपके प्रति कैंकर्य कि मौकाये, अनेकों हैं। “परंदामम एन्नुम तिवं” से वर्णित इस जगह पहुँचने केलिए मैं अत्यंत बेचैन हूँ।  हे रामानुज, यतियों के नेता, शुभ गुणों से भरपूर आपसे प्रार्थना हैं कि आप इस सँसार में मेरा रहना रोखे।  अज्ञान का मूल तथा आपके प्रति नित्य  कैंकर्य का हानि जो यह शरीर, इस आत्मा के संग इस लोक में जीवित है, इसको नाश करने केलिए आपसे प्रार्थना है। आपके प्रति नित्य कैंकर्य ही सर्व श्रेष्ट लक्ष्य है और आपसे विनती है की आप मुझे वह आशीर्वाद करें।” इस पासुरम को इस प्रकार भी देखा जा सकता है : “अडियेन इप्पवत्ते इरुक्कुम अदु पणबो ?” इसका अर्थ यह होगा की मामुनि श्री रामानुज से पूछ रहे है की, क्या मेरा इस सँसार में रहना स्वाभाविक  है ?

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ३९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३८

उपक्षेप

यह पासुरम कुछ लोगों के प्रश्न कि मामुनि के उत्तर के रूप में है। लोग मामुनि से प्रश्न करतें हैं, “ हे मामुनि! पिछले पासुरम में आपने कहाँ कि, आपका मन श्री रामानुज के चरण कमलों से अन्य सारे विषयों के पीचे जाता है (“उन ताळ ओलिन्दवट्रये उगक्कुम”) . किंचित भी अच्छाईयों के बिना, नीच साँसारिक विषयों से प्रभावित आपको श्री रामानुज स्वीकार कैसे किये ? बंधनों के प्रभाव से दुर्गुणों से भरे आपको श्री रामानुज अनुमोदित कैसे किये  ? उत्तर देते हुए मामुनि कहतें हैं, “उन्के चरण कमलों को एकमात्र आश्रय मानकर शरणागति, श्री रामानुज मेरे संचित अशुभ गुणों को शुभ मानकर अनुमोदित  किये और संतोष से  भोग्य वस्तु के रूप में स्वीकार किये। आगे इसको एक उदाहरण के सात समझाते हैं।  

पासुरम ३९

वेम्बु करियाग विरुंबिनार कैत्तेनृ

ताम पुगडादे पुसिक्कुम तम्मैपोल

तीमबन इवन एनृ निनैत्तु एन्नै इगळार एतिरासर

अनृ अरिन्दू अंगीकरिक्कैयाल

शब्दार्थ

विरुंबिनार ताम  – जिन्मे रस है

वेम्बु  –  नीम(और नीम के पत्ते)

करियाग  –  अपने सब्ज़ी में

पुगडादे –  फेंकते नहीं है

कैत्तेनृ  – कड़वा समझ कर

पुसिक्कुम  – अत्यंत रस से खाते हैं

तम्मैपोल  – यह उन लोगों की गुण हैं

(इसी प्रकार)

एतिरासर  – एम्पेरुमानार

इगळार – मुझें नहीं फेंकेंगे

निनैत्तु  – यह सोच कर कि

एन्नै  – मैं   (मामुनि)

तीमबन इवन एनृ  –  पापी है

अनृ  – उस दिन  जब मैं  उन्से शरणागति किया

अरिन्दू  – यह जान्ते हुए भी कि मैं पापि हूँ

अंगीकरिक्कैयाल  –  मेरे पापों को अपने भोग्य वस्तु मानकर मुझे अनुमोदित किये

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि श्री रामानुज के वात्सल्य के गुणगान करते हुए कहतें हैं कि वे मामुनि के पापों को भी भोग्य वस्तु समझ अपनायें।  इस्को समझाने केलिए मामुनि नीम कि उदाहरण देतें हैं जिस्को कुछ लोग अत्यंत रस से ख़ाते हैं।  

स्पष्टीकरण

तिरुमळीसै आळ्वार के नान्मुगन तिरुवन्दादि ९४वे पासुरम के “वेम्बुं करियागुमेनृ” के अनुसार, ऐसे भी लोग हैं जो नीम तथा नीम के पत्तों को सब्ज़ी के रूप में खातें हैं।  इस पासुरम के सहायता से मामुनि इस विषय कि विवरण देतें हैं। कहतें हैं कि, “ कुछ लोग हैं जो मीठाइ पसंद नहीं करतें हैं। ये जानते हुए, अपने पसंद के कारण, अत्यंत आनंद और  रुचि के सात, नीम के जैसे कड़वी वस्तु अपने भोजन में , खातें हैं। इसी प्रकार मेरे शरणागति करते वक्त, श्री रामानुज को मेरे सारें पापों कि जानकारी होते हुए भी, वे मुझे इंकार करने कि बजाय, उन्हीं पापों को भोग्य वस्तु समझ मुझे स्वीकार किये।”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ३८

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३७

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि “इन्रळवुम इल्लाद अधिकारं” वचन का प्रयोग किए। पासुरम में वे इस वचन कि विश्लेषण , तर्क और कारण विवरण के संग करतें हैं।  

पासुरम ३८

अंजिल अरियादार  अयबदिलुम ताम अरियार

एन्सोल एनक्को ऐतिरासा! – नेंजम

उन ताल ओळींदवट्रये उगक्क इनृम

अनुतापम अट्रू इरुक्कैयाल

शब्दार्थ

ऐतिरासा! – एम्पेरुमानारे

नेंजम – ह्रदय जो नीच विषयों में मग्न है

उगक्क  – तरसता है

ओळींदवट्रये  – उन विषयों केलिए जो हैं सीमा पार

उन – आप्के, जो हैं हमारे नित्य स्वामि तथा लक्ष्य और

ताळ – आप्के चरण कमलों के, जो असीमित आनंद कि मूल हैं

इनृम – अब भी

इरुक्कैयाल  – मै हूँ

अट्रू – बिना कोई

अनुतापम  –  नीच विषयों के मोह में घिरने कि पश्चात्ताप के बिना

एन्सोल  – प्रसिद्द कहावत जो कहता है कि

अरियादार – जो अन्जान हैं

अंजिल – पाँच साल के अम्र में , जब मनुष्यों में अक्ल वृद्धि होती है

अयबदिलुम – पछास साल के उम्र में भी

ताम अरियार – नहीं समझेँगे

एनक्को – यह कहावत मेरे लिए ही जन्मा क्या ?

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि एक प्रसिद्द कहावत कि उद्धरण देतें हैं जो है, “ जो व्यक्ति  पाँच साल के उम्र में न सीख पाता है, वह पचास साल के उम्र में भी न सीख पायेगा। आगे कहतें हैं कि उन्का मन नीच साँसारिक विषयों में मग्न है और इस बात की पश्चात्ताप भी न करता।  सँसार के अंधकार और अज्ञान से रक्षा माँग कर वे श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागति करतें हैं।   

स्पष्टीकरण

मामुनि कहते हैं, हे यतियों के नेता ! मेरा मन (तिरुवाय्मोळि २.७.८) के “तीमणम” वचनानुसार, नीच साँसारिक साँसारिक विषयों में मग्न है और (तिरुविरुत्तम ९५) के “यादानुम पट्री नीँगुम” वचनानुसार, सदा इन्मे उलझीं है। आपके चरण कमलों पर ही धारणा बढ़ाने के बजाय यह मन अन्य नीच सुखों के ही पीछे है।  इन अल्प सुखों को ही लक्ष्य समझ इन्हीं के पीछे जाती है और इस व्यवहार की पश्चात्ताप तक नहीं करती है। “तस्मात् बाल्ये विवेकात्मा” वचनानुसार यह माना जाता है कि ,पाँच साल के अम्र में ,मनुष्य को सही गलत की पहचान आ जाता है। अगर उस उम्र में यह ज्ञान न हुआ तब पचास में भी न आएगा। सालों से प्रसिद्द यह कहावत शायद मेरे लिए ही जन्मा होगा। अच्छाई ज्ञान न होते हुए मैं प्रार्थना करता हूँ कि सर्वज्ञ, मेरे स्वामी, आप ही मुझे मार्ग दिखाएं। “नेंजमुम तानोलिन्दवट्रये उगक्कुम” . इस्का ऐसे भी अर्थ निकाला जा सकता है कि मामुनि के कहना है के, “अगर एक व्यक्ति पाँच में न सीखा तो पचास में भी न सीखेगा। अफ़सोस! मुझे आज भी साँसारिक सुखों के पीछा करने की पश्चात्ताप नहीं है और इसी कारण आपके चरण कमलों (जो सर्वोत्तम लक्ष्य हैं) के बजाय मन अन्य वस्तुओँ केलिए तरसता है।”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ३७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३६

उपक्षेप

वरवरमुनि कल्पना कर रहें हैं कि श्री रामानुज स्वामी उन्हे कुछ बता रहे हैं । यह पासुर, श्री रामानुज स्वामी की यह सोच, का उत्तर स्वरूप है । श्री रामानुज स्वामी कहतें हैं , “हे ! वरवरमुनि ! आप इन्द्रियों के बुरे असर से डरे हुए हैं । चिंता न करें । इन्द्रियों  और पापों के प्रभाव से मैं आपकी रक्षा करूंगा । किन्तु इस सांसारिक लोक में आपको रखने का कारण यह हैं – “ आर्ति अधिकार पूर्तिकेन्नूमदु मुख्यं ”, वचन के अनुसार आर्ति (स्वारस्य) और अधिकार (मुक्त होकर परमपद पधारने कि योग्यता) पाने पर मैं निश्चित आपको परमपद पहुँचाऊँगा । तब तक आपको यहाँ रहना हैं । उत्तर में वरवरमुनि कहते हैं, “ हे ! श्री रामानुज स्वामी ! अब तक मेरी कोई भी योग्यता नहीं रहीं हैं । भविष्य में क्या योग्यता आएगी ? आप स्वयं इन योग्यताओं को मुझमें क्यों उत्पन्न नहीं करतें ? परमपद तक पहुँचने में आने वाले विरोधियों का नाश कर, आप ही मुझे योग्य क्यों नहीं बनातें ?

पासुर ३७

इन्रळवुम् इल्लाद अधिकारम् मेलुम् एनक्कू

एनृ उळदाम् सोल्लाय् एतिरासा

कुन्रा विनैत्तोडरै वेट्टिविट्टु मेलै वैकुंतत्तु

एन्नै कडुग येट्राददु येन् ?  

शब्दार्थ

सोल्लाय  – (हे एम्पेरुमानार) कृपया यह बतायें

इन्रळवुम् – अब तक

इल्लाद अधिकारम् – (परमपद जाने कि मेरे पास) योग्यता नहीं है

मेलुम् – (इस स्तिथि में) अब से

एनक्कु  – मेरे  लिए

एनृ उळदाम् – कब होगा ? होगा क्या? (इतने जन्मों से न होने के कारण) मुझे कब परमपद पहुँचने की योग्यता मिलेगी क्या?

ऐतिरासा – हे एम्पेरुमानार !

येन् ?-  क्यों आप

कडुग एन्नै येट्राददु – शीग्र मुझे ले न जाते

मेलै  – सर्वश्रेष्ठ

वैकुंतत्तु – परमपद तक

वेट्टिविटु – काटकर निकालें  

कुन्रा  –  न घटने वाले

विनैत्तोडरै – पापों के बंधन को

सरल अनुवाद

इस पासुर में वरवरमुनि, (इन) अघटित पापों का संग्रह को नाश न करने का कारण, श्री रामानुज स्वामी से पूँछते हैं । परमपद तक शीग्रता से न ले जाने का भी कारण पूँछते हैं। वरवरमुनि का मानना हैं कि, अगर योग्यता ही कारण है तो उन्हें परमपद पहुँचने कि योग्यता कभी भी नहीं थीं और नहीं मिलने वाली हैं । वरवरमुनि श्री रामानुज स्वामी से प्रश्न करतें हैं कि भविष्य में यह योग्यता कैसे प्राप्त किया जा सकता हैं ?

स्पष्टीकरण

वरवरमुनि कहतें हैं, इनृ तिरुनाडुमेनक्करुळाय् वचनानुसार, अब तक अनुपस्थित (परमपद पधारने कि) योग्यता भविष्य में कैसे आएगा ? हे रामानुज ! तोलमावलविनै तोडर्  के अनुसार मेरे पापों के बंधन घटते नहीं और परमपद प्राप्ति के पथ में विघ्न हैं । इन पापों को नाश कर, मेलै वैकुंतत्तिरुत्तुम (तिरुवाय्मोळी ८.६.११) से वर्णित परमपद जिसमें मुझे अत्यंत स्वारस्य (आर्ति) है, वहाँ क्यों नहीं ले जातें? अज्ञान से पीड़ित इस लोक से आप मुझे तुरंत क्यों नहीं ले जाते ? इस विषय में दुर्बल हूँ और आप ही नियंता हैं? फिर भी आप यह कार्य क्यों नहीं करतें ?

अडियेन् प्रीती रामानुज दासी

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शरणागति गद्य – चूर्णिका 6

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 5 – भाग 5

अवतारिका (भूमिका)

पेरियवाच्चानपिल्लै यहाँ पिछली पांच चूर्णिकाओं का संक्षिप्त बताते है।

जब कोई जीव भगवान् के समक्ष आश्रित होने के लिए पहुंचता है, उसमें भगवान के लिए अतीव त्वरित चाहना और यह पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि भगवान जीवको वह प्रदान करेंगे जिसकी प्रार्थना जीव ने की है । इन गुणों को प्राप्त करने हेतु श्रीरामानुज स्वामीजी द्वितीय चूर्णिका में श्रीअम्माजी से प्रार्थना करते है और फलस्वरूप श्रीअम्माजी उन्हें तृतीय और चतुर्थ चूर्णिका में वह गुण प्रदान करती है । फिर वे निश्चय करते है कि मात्र भगवान् श्रीमन्नारायण ही मोक्ष प्रदान करने में समर्थ है क्यूंकि इस कार्य के लिए अपेक्षित सभी गुण सिर्फ उनमें ही विद्यमान है । वे भगवान् के सभी दिव्य कल्याण गुणों का गुणगान करते है और उभय विभूतियों (नित्य और लीला विभूति) में स्थित भगवान् की सभी संपत्तियों को सूचीबद्धकरते है । यह निश्चित होने पर कि भगवान् ही एकमात्र मोक्ष के प्रदाता है और उस मार्ग का आशीष प्रदान करने वाले है, वे श्रीअम्माजी जो पुरुष्कारभूतै है, उनके साथ श्रीभगवान् के चरणों में शरणागति करते है । यह सब हमने पंचम चूर्णिका में देखा । अब हम छठवी चूर्णिका को देखेंगे ।

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श्रीरामानुज स्वामीजी यहाँ थोडा यह विचार कर संकोच करते है कि भविष्य में प्राणी यह विचार करेंगे कि वे शरणागति करने वाले प्रथम प्राणी है । लोग यह सोचेंगे कि शरणागति के विषय में शास्त्र क्या कहते है और श्रीरामानुज स्वामीजी के पहले के आचार्यजन ने शरणागति की या नहीं यह जानना आवश्यक नहीं है । इसलिए वे पुराणों (अनंत काल से निर्मित) और पूर्वाचार्यों द्वारा प्रतिपादित शरणागति का उल्लेख करते है । पुराणों के दो श्लोकों से छठवी चूर्णिका का निर्माण हुआ है ।

शरणागति के द्वारा, जीव सब कुछ त्याग कर (उनके प्रति जो सब के आश्रय है इस संसार में) मात्र भगवान् के चरणार्विन्दों का आश्रय प्राप्त करता है । भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण चरम श्लोक (१८.६६वा श्रुति) में कहते है कि सभी धर्मों को त्यागकर मात्र मेरे शरणागत होकर रहो । पूर्वोक्त पांच चूर्णिकाओं में, श्रीरामानुज स्वामीजी ने इसका उल्लेख नहीं किया कि उन्होंने क्या त्याग किया । तब क्या बिना यह उल्लेख किये कि उन्होंने क्या त्याग किया, उनकी शरणागति व्यर्थ नहीं है? नहीं, वह व्यर्थ नहीं है । द्वय महामंत्र में भी, केवल यह उल्लेख है कि हमें किसका आश्रय/ सहारा प्राप्त करना है (भगवान् के चरण कमलों का) और यह उल्लेख नहीं है कि किसको त्याग करना है । हमारे पूर्वाचार्यों ने भी इसकी महत्ता नहीं दर्शायी जब भी कोई शरणागति करने आता । वे इसी से प्रसन्न थे कि अन्ततः प्राणी शरणागति स्वीकार कर भगवान् के आश्रित हुआ । भगवान् जीवों में यह देखते है कि वह संसार से घबराया हुआ है और भगवान् से मिलने की अतीव चाहना करने वाला है । भगवान् जीवात्मा में चाहना उत्पन्न नहीं करते परंतु उस चाहना को बढाने में सहायता अवश्य करते है ।

यह सब ध्यान में रखकर श्रीरामानुज स्वामीजी अब यहाँ यह समझाते है कि शरणागति के समय में किन किन का त्याग किया जाना चाहिए । यहाँ यह नहीं समझना चाहिए कि वे पुनः शरणागति करते है, शरणागति तो वे पहले ही कर चुके है । यह मात्र उस तथ्य पर ज़ोर देने के लिए है कि हमारे पूर्वाचार्यों ने भी यही बताया है और हमें यह समझाने के लिए कि हमसे ऐसा सुनकर भगवान् अत्यंत प्रसन्न होंगे ।

आईए अब चूर्णिका को देखते है

पितरं मातरं धारान् पुत्रान् बंधून् सखीन् गुरून् रत्नानिधनधान्यानिक्षेत्रानिचगृहाणिच
सर्वधर्मांश्चसंत्यज्यसर्वकामांश्चसाक्षरान् लोकविक्रान्तचरणौ शरणं तेऽव्रजं विभो ।।

विस्तारपूर्वक अर्थ –

प्रथम पंक्ति में वे उन तत्वों का उल्लेख करते है जो सभी चित (जो चेतन है) और द्वितीय में वे सभी जो अचित (जिनमें चेतन नहीं है) । हमारे संप्रदाय में, हम भगवान को ही उपाय मानते है (उन तक पहुंचाने वाला मार्ग) । कोई भी अन्य मार्ग जैसे कर्म योग (शास्त्रों द्वारा बताये गये कर्म अथवा धार्मिक कर्मों द्वारा निष्पादन) अथवा ज्ञान योग (भगवान के समबन्ध में ज्ञान से निष्पादन) अथवा भक्ति योग (भगवान के प्रति भक्ति से निष्पादन) इन सभी को उपयान्तर (भगवान के अतिरिक्त कोई और मार्ग) माना जाता है । इस चूर्णिका के प्रथम दो पंक्तियों में श्री रामानुज स्वामीजी द्वारा उल्लिखित सभी सत्त्व वे है जो उपयान्तर में सहायक है । यह सभी सत्व प्रयोजनान्तर है (भगवान जो सच्चे प्रयोजन है, उनको छोड़कर अन्य को आनंद जानना)।इसलिए प्रथम दो पक्तियों में दर्शाये गये सभी सत्वउपायांतर  औरप्रयोजनांतरदोनों है।इसलिए श्रीरामानुजस्वामीजी कहते है कि वे उन सभी का आश्रय त्याग करते है जो शरणागति के द्वारा भगवान तक पहुँचने मेंहमारे स्वरुप के विरोधी है।

पितृम् मातरम् – पिताजी और माताजी।यह थोडा विचित्रप्रतीत हो सकता है कि श्रीरामानुज स्वामीजी बताते है कि पिताजी और माताजी वे प्रथम व्यक्ति है जिन्हें त्यागना चाहिए यद्यपि शास्त्र कहते है “मातृदेवो भव:” और “पितृदेवो भव:” (माताजी और पिताजी भगवान के समान है)।पिताजी और माताजी भगवान के समान है, इसे भक्ति योगी{वह जो भक्ति मार्ग द्वारा मोक्ष की चाहना करता है} के लिए उपासन अंग (भक्ति को बल देने वाला) के रूप में प्रदर्शित किया गया हैयद्यपि जो शरणागति मार्ग द्वारा भगवान के समर्पित है, उनके हेतु माता पिता उपाय स्वरुप(भगवान को प्राप्त करने का मार्ग) है।हमें माताजी और पिताजी का त्याग केवल उपासन अंग के रूप में ही करना चाहिए न कि तब जब वे शरणागति द्वारा भगवान तक पहुँचाने में सहायक हो।

धारान – पत्नी।कोई अपनी पत्नी का त्याग कैसे कर सकता है जिसके साथ विवाह के समय अग्नि के सामने सात फेरे लिए? पत्नी को सहधर्मचारिणी (वह जो धर्म के मार्ग में सदा साथ रहती)भी कहा जाता है।यदि कोई मोक्ष प्राप्ति के साधन हेतु धर्म करता है,तब ऐसे धर्म का त्याग करना चाहिए।यदि पत्नी ऐसे धर्म (जिसे मोक्ष के साधनभूत किया जाता है) में सहायक हो, तब उसका भी त्याग करना चाहिए।परंतु यदि वह धर्म करने में कैंकर्य स्वरुप (भगवानकी सेवा भाव से) सहायक होती है, तब उसका त्याग नहीं करना चाहिए, यहाँ इसका यही सूक्ष्म अर्थ है।

पुत्र – बेटा।शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्र की उत्पत्ति होने पर, पिता पुतु नामक नरक में जाने से बच जाते है।यदि कोई व्यक्ति भक्ति द्वारा मोक्ष प्राप्त करने चेष्ठा करता है, तब उसे पुत्र उत्पन्न करना आवश्यक है अन्यथा उसे नरक की प्राप्ति होगी।ऐसे पुत्र को उपासन अंग कहा जाता है, जो भक्ति योग में सहायक है।यद्यपि यहाँ संदर्भ शरणागतिद्वारा भगवान तक पहुँचने का है, तब ऐसे पुत्र की कोई आवश्यकता नहीं है और उसे त्याग दिया जाना चाहिए।

बंधु – संबंधी।मोक्ष प्राप्त के लिए संबंधी सदैव भक्ति योग को लागूकरते है और इसलिएउपासनांगम कहलाते है ।पहले की ही तरह, जब कोई भगवान को शरणागति मार्ग द्वारा प्राप्त करने का प्रयास करता है तो संबंधियों की आवश्यकता नहीं है और वे त्यागने योग्य है।कुछ स्थानों पर संबंधी बहुत समृद्ध होते है, वित्तीय अथवा सामाजिक तौर पे।किसी को उन समृद्ध जनों के सम्बन्धी होने का गर्व प्रलोभितकर सकता है, इस प्रकार वे प्रयोजनांतर के जाल में फंस जाते है (भगवान के अतिरिक्त कोई और आनंद का स्त्रोत)।यहाँ भी, वे त्यागने योग्य ही है।

सखी – मित्र/ दोस्त।मित्र भी किसी व्यक्ति को भक्ति योग के मार्ग में प्रेरितकरते है और इसलिए त्यज्य है ।और अधिक में मित्र से अत्यंत निकट रहने वाले व्यक्ति उन्हें अपना हितैषी मानते है और इस प्रकार मित्र भी प्रायोजनंतर है और त्यागने योग्य है।

गुरु – आचार्यअथवा शिक्षक। श्री रामानुजस्वामीजी के पांच गुरु थे और उनका सभी से अत्यंत प्रेम था।फिर वे कैसे किसी से अपने गुरु को त्यागने का अनुग्रहकर सकते है? जब एक गुरु मोक्ष हेतु भक्ति का मार्ग दिखता है, तब वह त्यागने योग्य है जैसा की हम पहले देख चुके है।गुरु को सांसारिक लाभ के लिए यज्ञ आदी करने में सहायता नहीं करनी चाहिए।ऐसे गुरु का त्याग करना चाहिए।

रत्नानी धन धान्यानि क्षेत्राणि च – रत्न, संपत्ति, अन्न भोजन, भूमि, आदि।ये सभी यज्ञ करने में सहायता करते है।और ये सभी सांसारिक भोगो के आनंद के लिये उपयुक्त है।इसलिए उन्हें उपायांतर और प्रायोजनांतर जानकर उनका त्याग करना चाहिए।

गृहानि च – घर।यह भी उपरोक्त वर्णित वस्तुओं के समान ही है।और यह उन सभी उपरोक्त वर्णित वस्तुओं के समबन्ध में सुरक्षा का असत्य भान भी देता है औरइसलिए उपायांतर के समान है।क्यूंकि यह सांसारिक सुख प्रदान करने वाला भी है इसलिए इसे त्यागना चाहिए।

सर्वधर्माम्श्च – शास्त्र में दर्शाये गए सभी धार्मिक मार्ग।यहाँ संदर्भ अन्य उपायों से है जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग।यहाँ शब्द सर्व का अर्थ है धर्म के अंगों से जैसे संध्यावंदन (देवता और संध्या को की गयी दिन की तीन प्रार्थना), तर्पण (वर्ष में कसी विशेष माह अथवा विशेष दिन पितरो के लिए किये गए संस्कार) आदि।

सर्व कामाम्श्च – सभी कामनाएं।संतान, सम्पाती आदि की कामना से लेकर स्वर्ग ऐश्वर्य और ब्रहम ऐश्वर्य पर्यंत (ब्रह्म का पद, जो सृष्टि रचना के देवता है)।या सब्भी कामनाएं त्यागने योग्य है।

साक्षर – क्षर का अर्थ है वह जिसका क्षय होता है। अक्षर अर्थात वह जिसका क्षय नहीं होता, यहाँ संदर्भ आत्मा से है और साक्षर अर्थात अपनी ही आत्मा का आनंद लेना, जिसे हमारे संप्रदाय में कैवल्य मोक्ष कहा जाता है (मोक्ष प्राप्त कर भगवान के दिव्य गुणों का अनुभव न करके आत्म की निम्न गुणों का अनुभव करना)।

संत्यज्य – लज्जा से इस भाव का त्याग करना कि हममें भगवान के पावन चरणों के सिवा ऐसी नीच वस्तुओं की अभिलाषा उत्पन्न हुई ।इस शब्द संत्यज्यको चित और अचित दोनों के लिए समान रूप से देखना चाहिए।

लोकविक्रांत चरणौ – भगवान के पावन द्वय चरण जिन्होंने वामन का अवतार लेकर, त्रिविक्रम (जिन्होंने तीन पग में तीन लोकों को नापा) रूप धारण कर सभी संसारों को अपने चरणार्विन्दों से नापा था।उन्होंने अपने पावन चरणों को उनके शीष पर स्थपित किया जिनकी भगवान के प्रति कोई विशेष प्रीतिभी नही थी और वे भी जो उनके विरोधी थे।उनका इस धरा पर वामन अवतार धारण कर आना इस बात का प्रतीक है कि वे ही संसार के स्वामी है, उनका स्वयं इस धरती पर अवतार लेना उनके सौशील्य को दर्शाता है, उनका हमारे शीष पर चरण रखना उनके वात्सल्य (आश्रितों के दोषों को भी उनके गुण जानना) को दर्शाता है, उनका स्वयं हमारे सामने आकर हम पर कृपा करना उनके सौलभ्य को दर्शाता है।यह सभी गुण केवल भगवान के ही है ।श्रीरामानुज स्वामीजी यहाँ उन भगवान की चर्चा करते है।

शरणं – अर्थात भगवान के पवन चरणारविन्दों को ही उपाय (मोक्ष का मार्ग) जानना

ते – आप।इसका उल्लेख स्वामी (नाथ) से है जिनके पाससभीलोकोंका स्वामित्व है। पिराट्टी (श्री महालक्ष्मीजी)जो भगवान से कभी पृथक नहीं होती उनका भी उल्लेख यहाँ किया गया है, उनके पुरुष्कारभूतै रूप का विचार करते हुए।

अव्रजम –आश्रय लेना।यहाँ इसका उल्लेख भगवान के पवन चरणों का आश्रय लेने से है ।

विभो – अर्थात भगवान का सर्वव्यापी रूप, जिसमें ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, आदि के सभी आवश्यक गुण है।

इसप्रकार श्री रामानुजस्वामीजी ने इस चूर्णिका में अत्यंत सुस्पष्टता से यह बताया है कि किसका त्याग करना चाहिए और किसका आश्रय ग्रहण करना चाहिए।

अब हम चूर्णिका 7 की और बढ़ते है ।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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आर्ति प्रबंधं ३६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३५

 उपक्षेप

पिछले पासुरम में, मामुनि कहते हैं कि, “मरुळाले पुलन पोग वांजै सेय्युं एनदन”, जिस्से वें श्री रामानुज से, क्रूर पापों से प्रभावित इन्द्रियों के निमंत्रण से अपने बुद्धि को बहलाने केलिए  विनति करतें हैं। परंतु इसके पश्चात भी पापों का असर रहती  हैं। मामुनि कहतें हैं कि, उन्कि मन इन सारे नीच साँसारिक रुचियों के पीछे जाती है।  इतने संकट पहुँचाने वाले इन पापों की कारण पर मामुनि विचार करतें हैं और अंत में कहतें हैं कि इस प्रश्न का उत्तर वें नहीं जानते।  

पासुरम ३६

वासनयिल उट्रामो माळाद वलविनैयो

येदेंररियेन ऐतिरासा! तीदागुम

आईंपुलनिल अडियेन मनंतन्नै

वनबुडने तानदरुम वंदु

शब्दार्थ

ऐतिरासा – हे एम्पेरुमानारे

तीदागुम – वह जो आत्मा केलिए हानिकारक है

आईंपुलनिल – जो “पाँच इन्द्रियाँ” कहलातीं हैं और प्रभाव करति रहतीं हैं

अडियेन – मेरे

मनंतन्नै – मन के

आसै – (साँसारिक खुशियों) की इच्छा

वनबुडने – (ये इन्द्रियाँ) सशक्त रूप से

तान वंदु – अपने इच्छा से, बिना कोई दबाव के

अदारुम – मुझमे निरंतर  निवास करने कि तय किये

(इन विषयों में रुचि की, मामुनि श्री रामानुज से कारण पूछते हैं)

उट्रामो – क्या यह बंधन आधारित है

वासनयिल – पूर्व समय के असंख्येय पापों पर ?

वलविनैयो – क्या मेरे प्रसिद्द कर्म संबंधित पाप है

माळाद – जो हैं किसी सहायता के पार ( किसी प्रकार के तप से भी जो निकाल नहीं जा सकता )

येदेंरु – वह क्या है ?

अरियेन – मुझे पता नहीं ( अर्थात मामुनि, श्री रामानुज को इसका कारण पता कर, इसकी नाश करना चाहते हैं)

सरल अनुवाद

मामुनि श्री रामानुज से पूछते हैं कि, यह जानते भी कि यह सब  शास्त्रों से हानिकारक माने जाते  हैं ,उन्की मन और बुद्धि , पापों के प्रभाव से साँसारिक रुचियों के पीछे क्यों जातें हैं । इन इन्द्रियों और पापों के लगातार कष्ट कि कारण न जानते हुए, वे श्री रामानुज से कारण ढूंढ़ने कि और उनको नाश कर अपनाने कि  विनति करते हैं।  

स्पष्टीकरण

कुछ विषय आत्मा केलिए हानिकारक माने जातें हैं। “आईंकरुवी कंडविंबं” (तिरुवाय्मोळी ४.९. १०) वचनानुसार , पाँच इन्द्रियों के प्रभाव में आत्मा साँसारिक सुखों के पीछे जाता है। आत्मा इन रुचियों केलिए तरसता है।  शास्त्रों में यहीं सब हानिकारक कहे गए हैं।  “हरंदिप्रसपम मन” वचनानुसार ये इन्द्रियाँ मुझे हर दिशा में खींचतीं हैं।  मैं आप्के चरण कमलों को एकमात्र राह समझ कर शरणागति करता हूँ। मामुनि इस्के कारण का अनुमान करते हैं। क्या  कूरत्ताळ्वान के “धुर्वासनात्रदि मतस सूखमिन्दिरयोत्तम हातुम नमे मदिरलं वरदादिराज:” वचनानुसार अनादि काल के पापों के छाल में फसना ही कारण हैं ? या नम्माळ्वार के “मदियिलेन वलविनये माळादो” (तिरुवाय्मोळि १.४. ३) वचनानुसार क्या मेरे कर्म इतने शक्तिशाली हैं कि न तप से मिटा सके न फल अनुभव कि कष्ट को झेल कर छुटकारा पायें? कारण कि मुझे जानकारी नही हैं। हे रामानुज, आपसे विनति हैं कि आप इस पर विचार करें और कारण को नाश करें।  पिछले और इस पासुरम में “ आईंपुलनिल” इन्द्रियों से पाने वाली साँसारिक सुख हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं ३५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३४

 

उपक्षेप

मामुनि श्री रामानुज से कहतें हैं , “स्वामी! बाधाओं को निकाल कर मेरी रक्षा करने में ही आपकी चिंता हैं।  आपके अत्यंत कृपा के कारण, आपके प्रति कैंकर्य करने  कि अवसर दिलाने की इच्छा रखते हैं।  किन्तु साँसारिक रुचियाँ ऐसे कैंकर्य के प्रति मेरी दिलचस्पी को घटाने की कोशिश करतें हैं।  यह मेरे कर्मों की ही फल हैं। आपसे प्रार्थना हैं कि  इन्को नाश कर आपके प्रति नित्य दास्य भाव को  बढ़ाये रखें।   

पासुरम ३५

अरुळाले अडियेनै अबिमानित्तरुळी  

अनवरदम अडिमै कोळ निनैत्तु नीयिरुक्क

मरुळाले पुलन पोग वानजै सेय्युं एन्रान

वलविनैयै माट्री उन्पाल मनम वैक्क पन्नाय

तेरुळारुम कूरत्ताळवानुम अवर सेल्व

तिरुमगनार तामुम अरुळीचेयद तीमै

तिरळान अत्तनैयुम सीरवुळ एन्नै

तिरुत्ति उय्यक्कोलुम वगै तीरुम ऐतिरासा

शब्दार्थ

अनवरदम – (हे श्री रामानुज) हमेशा

निनैत्तु नीयिरुक्क – आप इस सोच में हैं

अरुळाले – आपके अत्यंत कृपा के कारण  

अडियेनै अबिमानित्तरुळी – कि मै परमपद के लायक हूँ और इस सँसार का नहीं

अडिमैं कोल्ल – और आप मुझें अपने प्रति नित्य कैंकर्य के लिए उपयोग करने का सोच रहें हैं।  

पुलन – (मेरे) इन्द्रियाँ

एन्रन – मेरे (जिनके कारण )

वल – शक्तिशाली

विनैयै – कर्म

वांजै सेय्युं – तरसते हैं  

पोग – और साँसारिक विषयों के पीछे जायें  

मरुळाले – और अज्ञान देते हैं जो आपके शुद्ध विचार को छिपाते हैं।  

पण्णाइ – (आपसे विनति करता हूँ) मुझे आशीर्वाद कीजिये

माट्री – ध्यान उस्से हटाएँ

मनम वैक्क – और मन को बहलाएँ

उन्पाल – अपने ओर

तेरुळारुम – जो ज्ञान से भरें हैं और जिन्का नाम हैं

कूरत्ताळवानुम – श्री कूरेश और

अवर सेल्व तिरुमगनार तामुम – कूरत्ताळवान के पुत्र होने की सौभाग्य मिलने वाले पेरिय भट्टर

अरुळीचेयद – अपने को नीच समज

तीमै तिरळान – पापों के समूह के सूची दिए

अत्तनयुम – (अत्यंत विनम्रता से ऐसे बतातें हैं ) वें सारें

सेरवुल्ल – (एक को भी न छोड़ कर) उपस्थित हैं

एन्नै – मुझ में

ऐतिरासा – यतिराजा

तेरुम – कृपया सोचें

वगै – कोई मार्ग

तिरुत्ति – मुझे सुधार कर

उय्यकोल्लुम – विमुक्त करने केलिए

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि कहते हैं कि, श्री कूरेश और उन्के श्रेयस्वी पुत्र अपने ग्रंथों में, विनम्रता से जितने असंखित पापों कि प्रस्ताव किये हैं , वें  सबी उनमें (मामुनि में ) उपस्थित हैं।  यह पाप मामुनि को घेरे हैं जिसके कारण उन्हें, श्री रामानुज के, मामुनि को मुक्ति दिलाकर कैंकर्य दिलाने कि शुद्ध विचार समझने से रोखते हैं। क्रूर पापों से प्रभावित अपने इन्द्रियों से नियंत्रित बुद्धि को सही रास्ते में निर्माण करने को, श्री रामानुज से मामुनि  विनति करतें हैं।  

स्पष्टीकरण

मामुनि प्रस्ताव करतें हैं , “हे श्री रामानुज! श्री कूरेश और उन्के पुत्र होने की महान मौका पाने वाले पेरिय भट्टर के ज्ञान को प्रशंसा करने वाली वचन है , कूरनाथभट्टाक्य देसिकवरोक्त समस्तनैच्यं अद्यास्ति असंकुचितामेव (यतिराज विंशति १५) .  श्री कूरेश के पुत्र होने के सौभाग्य के कारण, भट्टर “श्रीरंगराज कमलापदलालि तत्त्वं” कहलातें हैं।  अत्यंत विनम्रता के कारण, श्री कूरेशर और भट्टर अपने पापों के सूची देतें हैं जिन्मे “पुत्वाचनोच अधिक्रामांग्यां (वरदराज स्तवं)” जैसे वचन भी हैं। यह सारे पाप मुझ में अधिकतर रूप में उपस्थित हैं। मामुनि आगे कहतें हैं, “हे रामानुज! “सेयल ननराग तिरुत्ति पणिकोळवान (कणणिनुन सिरु ताम्बु १०) वचनानुसार आप हमेशा जनों को सुधार कर मुक्ति दिलाने कि विचार में ही हैं। मेरे प्रति अत्यंत कृपा के कारण आप मुझे परमपद के लायक समझतें हैं और इस सँसार से विमुक्त करने की विचार में हैं।  इससे बढ़कर अपने प्रति नित्य कैंकर्य देने कि मार्ग सोचते हैं। परंतु मेरे इन्द्रियाँ और क्रूर पाप, मेरे बुद्धि से आपके शुद्ध विचारों को छिपाती हैं। यतिराज विंशति १६ के “शब्दादि भोग रूचिरनवहमेधदेह” वचनानुसार, मेरे क्रूर पापों से प्रभावित मेरे इन्द्रियाँ, आपसे दूर और साँसारिक रुचियों के निकट ले जातीं हैं। आपसे विनति करता हूँ कि तिरुवाय्मोळि(१.५.१०) के “तनपाल मनमवैक्क तिरुत्ति” के अनुसार आप मेरे विचारों को सुधार अपने और खींच लें। हे मेरे निरंतर स्वामि, मैं विनती करता हूँ कि, आपके ही सोच में रहने वाली मन दें।  कृपया इस पर विचार कीजिये।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं ३४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३३

उपक्षेप

मणवाळ मामुनि के कल्पना में श्री रामानुज के एक प्रश्न, इस पासुरम का मुखबंध के रूप में है।  इस काल्पनिक प्रश्न का उत्तर ही यह पासुरम है।  वह प्रश्न है, “ ऐसा मान लें कि मेरी अत्यंत कृपा हैं , परन्तु आपके विरोधियाँ/ संकट (पूर्व कर्मा के रूप में ) इतने हैं कि कितने भी  बड़े कृपालुओं की दया को सुखा सकती हैं।  तो इस बात के प्रति मैं क्या कर सकता हूँ? उत्तर में मामुनि कहतें हैं , “सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मासुच:” (तुम्हारे सारें पापों से तुझे मैं छुटकारा दिलाऊँगा, शोक न करो) कहने वाले (कृष्ण के रूप में) स्वयं श्रीरंगम के पेरिय पेरुमाळ ही थे।  और वे भी आपके सुझाव तथा आज्ञा मान्ने वाले हैं।  अत: मेरे स्वामि ! श्री रामानुज ! आपके दिव्य चरण कमलों से अन्य कोई भी आश्रय न मान्ने वाले मुझे कृपया मुक्ति दिलाएं।  आपसे विनति हैं कि कर्मों के फल से मेरी रक्षा करें और बंधनों से मुक्ति करें।  

पासुरम ३४

मुन्नैविनै पिन्नैविनै आरत्तम एन्नुम

मूनृ वगयान विनैतोगै अनैत्तुम याने

एन्नै अड़ैंदोर तमक्कु कळीप्पन एन्नुम अरँगर

ऐतिरासा नीयिठ्ठ वळकन्रो ? सोल्लाय

उन्नै अल्लदु अरियाद यान इंद उडंबोडु

उळनृ विनैपयन पुसिक्क वेणडुवदु ओनृ उणडो

एन्नुडैय इरुविनैयै इरैपोळूदिल माट्री

येरारुम वैगुणडत्तु एट्री विडाय नीये

शब्दार्थ

अरँगर – पेरिय पेरुमाळ

एन्नुम – जिन्होंने यह कहा कि

अड़ैंदोर तमक्कु – “उन्के प्रति जो पहुँचते हैं

एन्नै – मुझें  , जो वात्सल्य जैसे शुभ गुणों से चित्रित हूँ

याने – मैं , जो सर्व शक्तिमान , सर्वज्ञ  और सर्वव्यापी हूँ

कळीप्पन  – नाश करूंगा

अनैत्तुम – सारे

विनैतोगै – कर्मों का संग्रह

मूंरू वगैयान – तीन तरह के हैं

एन्नुम – के जैसे

मन्नैविनै – पूर्वागं ( पूर्व संग्रहित पाप)

पिन्नैविनै – उत्तरागम (भविष्य के पाप)

आरत्तम – प्रारब्धम ( अनुभव किये जाने वाले कर्मों का पूरा भाग संचित कर्म हैं और उसमें से एक भाग है प्रारब्ध)

एतिरासा – हे ! यतियों के नेता !

नीयिठ्ठ वळक्कँरो? – ऐसे सर्वेश्वर अरंगर (पेरिय पेरुमाळ) भी आपके आज्ञा मानते हैं

सोल्लाय – कृपया मुझें बताएं कि यह सच्चाई है

यान – मैं

अरियाद – नहीं जानता

उन्नै अल्लदु – आपके सिवाय (रक्षक के रूप में)

विनैपयन पुसिक्क वेणडुवदु ओनृ उणडो? – मेरे कर्मों के फलों को अनुभव करना हैं क्या ?

इंद उडंबोडु – इस शरीर के अंदर

उळनृ – और क्या यह  यात्रा सदा करना हैं ?

नीये – आपको ही यह करना है (कर सकते हैं)

इरैपोळूदिल – आँख के पलक में

माट्री – निशाने के बिना नाश करें

एन्नुडय – मेरे

इरुविनैयै – घोर कर्म

येट्री विडाई – (ऐसे करने से) कृपया मुझे चढ़ाये

ऐरारुम – सुँदर

वैगुंडत्तु – परमपद

सरल अनुवाद

मामुनि, श्री रामानुज से कहतें हैं कि जन्मों से संग्रहित पापों को नाश कर, केवल वें ही  मोक्ष दिला सकतें हैं। सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान पेरिय पेरुमाळ भी जिन्की आज्ञा मानते हैं, उन श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों से अन्य कोई सहारा न होने कि सच्चाई को फिर से मामुनि  दोहराते हैं।  

स्पष्टीकरण

पेरिय पेरुमाळ के वचन को यहाँ मामुनि फिर दोहराते हैं।  भगवान कि वचन हैं कि , “कर्म , “पूर्वागं”, “उत्तरागम”, और “प्रारब्धं” जैसे तीन प्रकार के हैं।  पूर्वागमुत्तारागारंच समारब्धमकमतथ  यहीं बताता हैं। अन्य मार्गों को उपाय मान्ने कि सोच को छोड़कर, केवल मुझे ही एकमात्र आश्रय मानकर मेरे पास आने वालों की कर्मों को, मैं जो सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्व नियंता, वात्सल्यादि कल्याण गुणों से भरपूर हूँ,  सम्पूर्ण तरह से नाश करता हूँ।”आगे श्री रामानुज से मामुनि कहतें हैं, “हे ऐतिरासा ! यतियों के नेता ! क्या “वस्यस्सता भवतिते ” से प्रकट नहीं किया गया है की सर्व स्वामी पेरिय पेरुमाळ भी आपके आज्ञा मान्ने वाले हैं? स्वयं पेरिय पेरुमाळ को अपने प्रेम से बाँधने वालें आप, इस सच्चाई को प्रकट क्यों नहीं करतें ? मैं आप के अलावा अन्य कोई आश्रय नहीं जानता। मैं अपने इस शरीर में हूँ और एक शरीर से दूसरे तक लंबे समय से सफर कर रहा हूँ।  इस शरीर के संबंध से उत्पन्न होनें वाले कर्मों के फलों को और कितने समय तक मैं यह सफर कायम रख कर अनुभव करूँगा ? परंतु आँखे पलकने के समय में, अनादि कालों से संग्रहित इन शक्तिशाली कर्मों को , “कड़ीवार तीय विनैगळ नोडियारूम अळवाईकण (तिरुवाईमोळी १.६.१०)” के अनुसार केवल आप ही नाश कर सकते हैं।  यह कार्य कर केवल आप ही मुझे सुंदर परमपद तक छडा सकतें हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं ३३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३२

पासुरम ३३

इन्नम एत्तनै कालम इंद उडम्बुडन यान इरुप्पन  

इन्नपोळूदु उडम्बु  विडुम इन्नपडि अदुतान  

इन्नविडत्ते  अदुवुम एन्नुम इवैयेल्लाम

ऐतिरासा नी अरिदी यान इवै ओन्ररियेन

एन्नै इनि इव्वुडैमबै विडुवित्तु उन अरुळै

ऐरारुम वैकुंठत्तेट्र निनैवु उणडेल

पिन्नै विरैयामल मरन्दु इरुक्कीरदेन ? पेसाय

पेदैमै तीरन्दु एन्नै अडिमै कोंड पेरुमाने

 

शब्दार्थ

इन्नम – अब से

यान इरुप्पन  – मैं रहूँगा, बिना संबंध के

इंद उडम्बुडन – इस नीच शरीर में

ऐतिरासा ! – एम्पेरुमानारे !!!

नी अरिदि – आपको ज्ञान हैं

एत्तनै कालम – कितनी समय तक इन्नपोळूदु उडम्बु  विडुम – कि यह शरीर किस समय पर घिरने वाला है

इन्नपडि अदुतान – किस प्रकार

इन्नविडत्ते  अदुवुम – किस जगह

एन्नुम इवैयेल्लाम – ( यह सारी बातों कि  ) आपको निश्चित ज्ञान है

यान – अज्ञानी मुझको

इवै ओन्ररियेन – इनमें से एक अणु की भी ज्ञान नहीं है

पेदैमै तीरन्दु – अत: मेरी अज्ञान को हटाइये !!!

अडिमै कोंड पेरुमाने !!! – जिनका सम्पूर्ण आधिपत्य है

एन्नै – मुझ पर, (जन्म पर दिए गए) इस साँसारिक बंधन से असंबंधित जो हूँ  

इनि उन अरुळै – अब से ऐसे आशीर्वाद दीजिए कि

इव्वुडैमबै विडुवित्तु – शरीर को हटाकर (छुटकारा दिलाकर )

वैकुंठत्तेट्र – परमपद के ओर बढ़ाए

ऐरारुम – जो सुंदरता से भरपूर जगह है

निनैवु उणडेल – (एमपेरुमानारे) अगर आपकी ऐसी इच्छा हो

पिन्नै – फिर

पेसाय – कृपया मुझे बताएं

मरन्दु इरुक्कीरदेन? – आप क्या विचार कर रहें हैं और यह देरी किसलिए?  

विरैयामल  – और यह शीग्र क्यों नहीं करतें हैं ?

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से अपने जीवात्मा की मुक्ति प्राप्त कर परमपद पधारने में देरी की कारण पूछते हैं।  मामुनि यह शारीर छोड़ने केलिए तैयार हैं और एम्पेरुमानार अत्यंत कृपाळु हैं।  फिर भी यह कार्य की असफ़लता पर मामुनि आश्चर्य करते हैं।  यहीं इस पासुरम में प्रश्न के रूप में प्रकट हुआ हैं।  

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहतें  हैं , “एम्पेरुमानारे! मेरे स्वामी ! इसके पहले आपके संबंध की ज्ञान इसके पहले मुझे नहीं था। यह सूनापन मिटाकर आप मुझे खुद का सच्चा स्वरूप समझायें। “ (तिरुवाय्मोळि ४.९. ६) के विनैयेन उनक्कडिमैयरककोंडाई के अनुसार मुझे यह एहसास दिलाये कि मैं दास  हूँ।  दास का जीवन जीकर, उस्का महत्वपूर्ण समझकर, आपके प्रति मेरे दासत्व की ज्ञान दिए।  आप ही मेरे स्वामी हैं।  आपसे एक प्रश्न  हैं। और कितने समय तक इस नीच शरीर में मेरी आत्मा को रखने का विचार हैं  ?  जब इस शरीर से सच्चा बंधन कुछ न रहा, और कितने समय मुझे इसके अंदर रहना हैं ? यह शरीर कब, कहाँ , किस प्रकार घिरेगा इन सारे बातों का आपको ज्ञान है और मुझे नहीं है।  

आगे मामुनि  प्रस्ताव करतें हैं, “मेरे  स्वामि! मेरा जीवात्मा बिना इच्छा या संबंध कि इस शरीर के अंदर है।  अगर आपको इस आत्मा को शरीर से मुक्ति दिलाकर परमपद प्राप्ति दिलाना हैं, तो देरी किस बात की ? (तिरुवाय्मोळि १०.६. ३) के, “विण्णुलगम तरुवानाय विरैगिंरान” के अनुसार, यह कार्य आप शीग्र क्यों नहीं करतें? कृपया देरी की कारण बताएं। आपकी कृपा असीमित हैं और मेरे पास साँसारिक संबंध नहीं है , तो आपको क्या रोख रहीं हैं ? “मरंदु इरुक्कीरदेन? पेसाय” को “अमरन्दु इरुक्किरदेन पेसाय” भी कहतें हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं ३२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३१

उपक्षेप

पिछले पासुरम के “अऱमिगु नरपेरुमबूदूर अवदरित्तान वाळिये” का अर्थ यह हैं कि श्री रामानुज “श्रीपेरुमबूदूर” नामक क्षेत्र में अवतार किये। उससे, इस पासुरम में मणवाळ मामुनि उस श्रेष्ट दिवस को मनाते हैं, जो हैं हम संसारियों के प्रति श्री रामानुज के इस लोक में जन्म लेने का दिन।  

पासुराम ३२

संकरभारकर यादवभाट्ट प्रभाकरर तनगळ मदम

सायवुरवादियर मायकुवरेंरु सदुमरै वाळंदिडुनाळ

वेंकली इंगिनी वीरू नमकिलै एनरु मिगत्तळर नाळ

मेदिनिनन्जुमैयारुमेनतुयर विटटु विळंगिय नाळ

मँगैयर आळी  परांकुश मुन्नवर वाळवु मुळैत्तिडु नाळ

मंनिय तेन्नरंगापुरी मामलै मट्रूमुवन्दीडु नाळ  

सेंकयलवाविगळ सूळवयलनालुम सिरन्द पेरुमबूदूर  

सीमान इळैयाळवार वंदरुळीय नाळ तिरुवादिरै नाळे

शब्दार्थ

शंकरा- शंकरा के सिद्धांत

भारकर- भास्करा के सिद्धांत

यादव – यादवप्रकाश के सिद्धांत

भाट्ट – भाट्टो के सिद्धान्ते

प्रभाकरर तनगळ मदम – प्रभाकर के सिद्धांत , यह सारे सिद्धांतें

सायवुर  – नाश हुए (श्री रामानुज के अवतार के पश्चात)

वाळंदिडुनाळ सदुमरै – चारों वेदों की समृद्धि ( अर्थात वेदों के सही अर्थ प्रचार होने का दिन) तभी होगा जब

वादियर – शंकरा के जैसे लोग वाद करके

मायकुवरेन्रू – निश्चित पराजय होंगे

नाळ – वह दिन (जब श्री रामानुज के अवतार किये) तब है  

वेंकली – (जब)क्रूर कलि

इँगु वीरू नमकिलै एनरु – इस सोच में की यह लोक इसके पश्चात (सहायता केलिए अन्य दुष्ट शक्ति न होने के कारण) उस्के वास स्थल /आधिपत्य में न रहा

मिगत्तळर – खाँप कर क्षय होगी

नाळ – उस खास दिवस (श्री रामानुज के अवतार के दिन )

मेदिनी – पृथ्वी भी

विळँगिया – प्रकाशित हुयी

नन्जुमै आरुम येन तुयर विटटू – (जब उस्को एहसास हुआ) कि उस्की भार  कम होने वाली हैं

नाळ – वो श्रेष्ट दिवस (जब श्री रामानुज जन्म हुए) में ही

वाळवु – श्रेयस

मुन्नवर – हमारे सारें पूर्वजों की, जैसे

मँगैयर आळी – तिरुमँगै आळ्वार और

परांकुश – नम्माळ्वार

मुळैत्तिडु – खिलकर वृद्धि होगी

नाळ – वह महत्वपूर्ण दिन (श्री रामानुज के अवतार दिवस )

मननिय – पेरिय पेरुमाळ (श्री रंगनाथ) के नित्य वास स्थल

तेन्नरंगापुरी – जो रमणीय है और श्री रंगम कहलाता है

मामलै – और जो दिव्य  क्षेत्र “पेरिय तिरुमलै” (तिरुवेंगटम)  जाना जाता है

मट्रूम – और अन्य दिव्य क्षेत्र

उवन्दिडु – संतुष्ट होंगीं

नाळे – वही दिन है

वनदरूळीयनाळ – जब श्री रामानुज अवतरित हुए

सीमानिळैयाळवार – श्रीमान स्वरूप “इळैयाळवार” नामक

पेरुमबूदूर – श्रीपेरुमबूदूर में

सूळ – जो घेरा है

वाविगळ – झील और तालाबों से जो भरे हैं

सेंकयल – लाल मच्छलीयों से

वयल – और धान के खेतों से

नालुम – श्रीपेरुमबूदूर नामक यह जगह हमेशा दिखता है

सिरन्द – एक महान नगर जैसे

तिरुवादिरै – (श्रीपेरुमबूदूर में श्री रामानुज के अवतार होने की नक्षत्र) था तिरुवादिरै। यही सबसे सर्वश्रेष्ठ दिवस हो सकता हैं।  “श्रीमान आविर्भूत भूमौ रामानुज दिवाकर:” वचन की ज्ञान अपनाना हमारा कर्तव्य हैं।  

सरल अनुवाद  

मणवाळ मामुनि श्री रामानुज के इस लोक में अवतार करने की  नक्षत्र तिरुवादिरै को मनातें हैं। जब वें  इस लोक में अवतार किये, अनेक शुभ कार्य हुए। वेदों की गलत अर्थ निकालने वाली सिद्धांतों का नाश हुआ। श्री  रामानुज के जन्म के पश्चात ,  बेसहारा होने के डर में कलि खाँपने लगा।  यह पृथ्वी , उसमें उपस्थित दिव्य क्षेत्रें , जन ,सारे अपने अपने बोज श्री रामानुज के अवतार से हल्का होने के आशा में अत्यंत संतुष्ट थे। ऐसे दिव्य श्री रामानुज लाल मछलियों से भरे सुंदर तालाबों से घेरे, महान नगरी के सौंदर्य से भरपूर श्री पेरुमबूदूर में अवतार किये।  धन्य हो वह अति उत्तम दिवस।   

स्पष्टीकरण

“कुदृष्टि” नामक कुछ लोग हैं।  नाम से ही पता चलता है कि, उन्की दृष्टी साधारण नही है। वेदों के सम्पूर्ण गहरे अर्थों की समझ या दृष्टी न होने के कारण उनकी  व्याख्या ओछा है और वेदों के गलत अर्थ निकालते है। वे १)श्रीमन नारायण (विशेषणम) और २) उन्के गुण (विशेष्यम) दोनों को निषेध करते हैं।  शंकर, भास्कर जैसे लोग कुदृष्टियाँ थे। इसके कारण  वैदिक धर्म बेसाहरे  स्तिथि में थी। परन्त्तु श्री रामानुज के अवतार के पश्चात, इन कुदृष्टियों और उन्के वादों और सिद्धांन्तों के नाश अथवा खुद के स्वास्त्य के ज्ञान में वेद संतुष्ट हुए।     

श्री रामानुज के अवतार के बाद, कठोर कलि को यह भय हुआ कि वह अब धर्ती पर सुखी नहीं रह पायेगा। इस डर में कलि खाप्ने लगा।  “तवं तारणि पेट्रदु (इरामानुस नूट्रन्दादि ६५)” में यही चित्रित है, कि कलि से प्रभावित कुदृष्टियाँ डर में दौडे और पृथ्वी शांति की साँस ली और प्रकाश हुई।  

दिव्य देश वे है जो आळवारों से गाये (पासूरम के रूप में ) गए हैं।  इन्मे में अधिकतर क्षेत्र तिरुमंगै आळवार से गाये गए हैं।  अत: श्री रामानुज के अवतार से आळवारों की कीर्ति फ़िर से विशेष रूप में फैलने लगीं। स्वामी रामानुज के जन्म से सारे दिव्य देश फिर से  खुश हुए। पेरिय पेरुमाळ के निवास स्थल श्रीरंगम और (तिरुविरुत्तम ५०)  “अरुवीसेय्य निर्कुंम मामले” के अनुसार  तिरुवेंघटम भी खुश हुए। श्री रामानुज, लाल मछलियों से भरे तालाबों से घेरे श्रीपेरुमबूदूर नामक  सुंदर नगरि में तिरुवादिरै नक्षत्र में अवतार किए।  उन्के जन्म में दिया हुआ “इळैयाळवार” नाम ही उनके अवतार रहस्य और माहात्म्य को वर्णित करतीं हैं।  

अत्यंत आश्चर्य में चौंके मणवाळ मामुनि कहतें हैं , “यहीं हैं वह दिन! और कैसे आश्चर्यमय दिन हैं यह! इस्के समान और दूसरा कोई दिन हो सकता हैं ?” यहाँ “श्रीमान रामानुज दिवाकर:” वचन की हमें स्मरण होनी चाहिए। श्रीरंगम और तिरुवेंघटम, अन्य दिव्य क्षेत्रो के प्रतिनिधि होने के कारण, “तेनरंगापुरी मामलै मट्रूमुवन्दीडु नाळ” वचन को, इन क्षेत्रों के निवासियों और अन्य क्षेत्रो के भी निवासियों की भी, श्री रामानुज के अवतार से उत्पन्न हुई अत्यंत संतोष की प्रसंग समझ सकते हैं।  इरामानुस नूट्रन्दादि तनियन के , “ उन नाममेल्लाम एनरन नाविनुळे अल्लुमपगलुं अमरुमपड़ि नल्गु” से देखा जा सकता है कि मणवाळ मामुनि, एम्पेरुमानार, इरामानुस, ऐतिरासा जैसे इस पासुरम में “इळैयाळवार” तिरुनाम का उपयोग करतें हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/12/arththi-prabandham-32/

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