Category Archives: hindi

तिरुवाय्मोळि नूट्रन्दादि (नूत्तन्दादि) – तनियन्

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

तनियन् 1
अल्लुम् पगलुम् अनुबविप्पार् तन्गळुक्कुच्
चोल्लुम् पोरुळुम् तोगुत्तुरैत्तान् – नल्ल
मणवाळ मामुनिवन् माऱन् मऱैक्कुत्
तणवा नूऱ्ऱन्दादि तान्

जो लोग मीठे शब्दों और उनके अर्थों का आनंद लेने की इच्छा, हमेशा रात और दिन , रखते हैं, उनके लिए मणवळ मामुनिगळ् ने दयापूर्वक, तिरुवैमोझी का अर्थ , तमिळ् वेदं को, संक्षेप में , इस प्रबंध में 100 पाशुरामों के रूप में, दिया ।


तनियन् 2
मन्नु पुगळ् सेर् मणवाळ मामुनिवन्
तन् अरुळाल् उट्पोरुळ्गळ् तन्नुडने सोन्न
तिरुवाय्मोळि नूऱ्ऱन्दादियाम् तेनै
ओरुवादरुन्दु नेन्जे उऱ्ऱु

ओ मन ! तिरुवाय्मोळि नूत्तन्दादि नामक शहद को प्राप्त करें, जो कि अनंत काल के गौरवशाली मणवाळ मामुनिगळ् द्वारा दया से
बोला गया था, उनकी दया से, गहरे अर्थों को प्रकट करने के लिए [तिरुवाय्मोळि], और इसे लगातार पीते रहें |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुज दासन

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/10/thiruvaimozhi-nurrandhadhi-thaniyans-simple/

संग्रहीत : http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

तिरुवाय्मोळि नूट्रन्दाधि (नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः

श्रीमन्नारायण ने नम्माळ्वार को उनके प्रति उत्तम ज्ञान और भक्ति का आशीर्वाद दिया। नम्माळ्वार की अपरिहार्य प्रवाह से
तिरुविरुत्तम, तिरुवासिरियम, पेरिय तिरुवन्दादी और तिरुवाय्मोळि नामक चार अद्भुत प्रबंध बन गए। इनमें से
तिरुवाय्मोळि को सामवेद का सार माना जाता है। तिरुवाय्मोळि में उन सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतों को शामिल किया गया है
जिन्हें एक मुमुक्षु (मुक्ति साधक), अर्थात् अर्थ पंचकम द्वारा जाना जाता है। तिरुवाय्मोळि के लिए नम्पिळ्ळै के ईडु
व्याख्यान में तिरुवाय्मोळि के अर्थों को विस्तार से बताया गया है।

तिरुवाय्मोळि नूत्तन्दादि एक अद्भुत प्रबंध है जिसकी रचना अळगिय मणवाळ मामुनिगळ् (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने
की है। यह एक अद्भुत रचना है जो कई प्रतिबंधों से बनी है जैसे:

  • कविता अंदाधि प्रकार की होनी चाहिए जिससे उसका पठन /सीखना सरल हो
  • इस प्रबंध के प्रत्येक पाशुरम में तिरुवाय्मोळि के प्रत्येक दशक जैसा अर्थ ईडु व्याख्यान में बताया गया है |
  • प्रत्येक पाशुरम में नम्माळ्वार का दिव्य नाम और महिमा होनी चाहिए |

यह प्रबंध सबसे आनंददायक है और हम इस प्रबंध के लिए पिळ्ळै लोकम् जीयर् द्वारा दिए गए विस्तृत व्याख्यान की मदद से पाशुरमों के
सरल अर्थों का आनंद लेंगे।

  • तनियन
  • पाशुरम 1 to 10
  • पाशुरम 11 to 20
  • पाशुरम 21 to 30
  • पाशुरम 31 to 40
  • पाशुरम 41 to 50
  • पाशुरम 51 to 60
  • पाशुरम 61 to 70
  • पाशुरम 71 to 80
  • पाशुरम 81 to 90
  • पाशुरम 91 to 100

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुज दासन

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/09/thiruvaimozhi-nurrandhadhi-simple/

संग्रहीत : http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

तिरुवाय्मोळि – सरल व्याख्या – १.२ – वीडुमिन

Published by:

श्री: श्रीमते शटकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

कोयिल तिरुवाय्मोळि

<< १.१

sriman narayanan-nanmazhwar

भगवान के परत्व का परिपूर्ण अनुभव करने के बाद, इस दशक में आळ्वार, ऐसे भगवान को प्राप्त करने के उपाय का इन दस पासुरमों में समझा रहे हैं।

इस बात के महत्व को समझते हुये, आळ्वार अपने दिव्य अनुभवों को, सभी के साथ साझा करने का विचार कर इस जगत के संसारियों की तरफ देख रहे है।

सभी जन साँसारिकता के मोहमाया में डूबे हुये है। अत्यंत कृपालु होने के कारण आळ्वार उनकी सहायता करने की इच्छा से, उन्हे साँसारिक मोहबंधनों को छोड भगवान के प्रति भक्ति बढ़ाने का उपदेश दे रहे है।  

पहला पासुरम: इस पासुरम में नम्माळ्वार सभी को सांसारिक और अन्य मोहबंधनों का त्याग कर, स्वयं को भगवान के प्रति समर्पण करने की आज्ञा दे रहे हैं।  

वीडुमिन् मुऱ्ऱवुम् वीडु सेय्दु उम्मुयिर्
वीडु उडैयान् इडै वीडु सेय्म्मिने

एम्पेरुमान की आराधना में बाधा बन रहे, निज स्वार्थ पुरक उपायों, विचारों को त्याग करना।

इसके पश्चात, उन स्वामी के, जो मोक्ष के नियंता हैं, उनके श्रीचरणकमलों में स्वयं को समर्पित करना।  

दूसरा पासुरम : परित्याग को सरल बनाने के लिये, उन वस्तुओं के क्षणीक गुणों को समझा रहे हैं।  

मिन्निन् निलैयिल मन्नुयिर् आक्कैगळ्
एन्नुम् इडत्तु इऱै उन्नुमिन् नीरे

आळ्वार कह रहे है, जीवात्मा अनादि काल से अनेक शरीर प्राप्त करता हैं, जिसे वह चाहने भी लगता है, पर ये शरीर क्षण में प्रत्यक्ष और क्षण में अप्रत्यक्ष हो जाता हैं | शरीर के इस अनित्य स्वभाव को समझ कर, तुम सर्वेश्वर परमात्मा का ध्यान करो।  

तीसरा पासुरम : नम्माळ्वार अत्यंत कृपा से परित्याग को समझाते हैं।  

नीर् नुमदु एन्ऱु इवै वेर् मुदल् माय्त्तु इऱै
सेर्मिन् उयिर्क्कु अदन् नेर् निऱै इल्ले

अहंकार ममकार का त्याग कर आचार्य के श्रीचरणकमलों में आश्रय लें। जीवात्मा के लीये इससे ज्यादा उचित और संतोष प्रदायक और कुछ नही हैं।  

चौथा पासुरम: इस प्रकार, मोहबंधनों से मुक्त जीवात्मा से पूजीत एम्पेरुमान के गुणों का, आळ्वार वर्णन कर रहे हैं।  

इल्लदुम् उळ्ळदुम् अल्लदु अवन् उरु
एल्लैयिल् अन्नलम् पुल्गु पऱ्ऱु अऱ्ऱे

भगवान स्थिर चित् व अस्थिर अचित् दोनों से भिन्न हैं. तथा, मोहबंधनों से विमुक्त हो कर, भक्ति भाव के साथ आनंदप्रदायक भगवान का आश्रय लें।

पाँचवा पासुरम: इस पासुरम में नम्माळ्वार समझाते हैं कि एम्पेरुमान को प्राप्त करना ही उचीत लक्ष्य होना हैं।  

अऱ्ऱदु पऱ्ऱु एनिल् उऱ्ऱदु वीडु उयिर्
सेऱ्ऱदु मन्नुऱिल् अऱ्ऱु इऱै पऱ्ऱे

भगवत विषय को छोड अन्य विषयों का मोहबंधनों को परित्याग करने के बाद, आत्मा कैवल्य मोक्ष (संसारं से विमुक्त खुद के आनंद में मग्न रहना) का अधीकारी हो जाता हैं। कैवल्य मोक्ष की इच्छा रहित, अन्य बंधनों से विमुक्त, एम्पेरुमान के साथ निश्चल दृढ़ संबंध बनाये रखने के लिये उनके प्रति शरणागति करें।  

छठवाँ पासुरम : सभी के प्रति एम्पेरुमान के सम भाव का नम्माळ्वार विवरण कर रहे हैं।  

पऱ्ऱु इलन् ईसनुम् मुऱ्ऱवुम् निन्ऱनन्
पऱ्ऱु इलै आय् अवन् मुऱ्ऱिल् अडन्गे

सर्वेश्वर होते हुये भी, वे अपनी दिव्य महिषियों के प्रति मोह छोड़, उनसे जुड़े हुये नित्यसूरियो से भी मोह छोड़, अभी नये आये हम लोगों के संग अटल रहते हैं | हमें अपना पालक पोषक मानते है | हमें देख उन्हे आनन्द होता है | आप भी साँसारिक बंधनों से, मोह से विमुक्त हो, सर्वेश्वरको अपना धारक, पोषक और स्वयं को उन्ही का भोग्य समझ उनमें ही मगन हो जाओ।  

सातवाँ पासुरम: नम्माळ्वार कहते हैं की भगवान के वैैभव (उभय विभूति) से घबराये बगैर, हमें हमारे, भगवान और उभय विभूति के सम्बंंध ध्यान रखते हुये यह समझना चाहीये की हम भी उन्ही की सम्पत्तियों में से एक हैं।  

अडन्गु एळिल् सम्बत्तु अडन्गक् कण्डु ईसन्
अडन्गु एळिल् अह्देन्ऱु अडन्गुग उळ्ळे

भगवान् के अति सुंदर दिव्य वैभव का, इस ज्ञान के संग ध्यान करें कि सर्वस्व उन्हीके अधीन हैं, और इस संबंध ज्ञान के संग उनकी संपत्ति का अंश बने।  भगवान और स्वयं के बीच के सम्बंध का ज्ञान होने पर, हम उनकी दिव्य संपत्ति के अंश बन सकतें हैं।  

आठवाँपासुरम: नम्माळ्वार भगवान की पूजा करने, और सेवा करने की विधी बतला रहे हैं।  

उळ्ळम् उरै सेयल् उळ्ळ इम् मून्ऱैयुम्
उळ्ळिक् केडुत्तु इऱै उळ्ळिल् ओडुन्गे

जन्म से ही हमें प्राप्त बुुद्धी वाक्और तन के प्रयोजन को समझ कर साँसारिक सुख के मोहबंधनों से विमुक्त होकर, हमारें लिए उचित यही है कि, स्वामि के प्रति सम्पूर्ण तरह से शरणागत बनें।  

नौवां पासुरम: नम्माळ्वार बतला रहे हैं कि भगवान की आराधना से भव बाधायें मिट जाती हैं।

ओडुन्ग अवन् कण् ओडुन्गलुम् एल्लाम्
विडुम् पिन्नुम् आक्कै विडुम् पोळुदु एण्णे

सर्वस्व भगवान को समर्पण करने से अविद्या मिट जाती है, और आत्म ज्ञान असीम हो जाता हैं।  इसके पश्चात भगवान की शरणागति कर इस जीवन के अंत में ही उनके कैंकर्य की प्रार्थना कर सकतें हैं।  

दसवाँ पासुरम : नम्माळ्वार भगवान के गुण स्वभाव बतला रहे है, भगवान को प्राप्त करना ही परम ध्येय होना चाहीये।

एण् पेरुक्कु अन्नलत्तु ओण् पोरुळ् ईऱिल
वण् पुगळ् नारणन् तिण् कळल् सेरे

इस संसार की अनन्त कोटि जीवात्माओं के र्सवस्व स्वामी नारायण ही है।
अनन्त गुणों से सम्पन्न आनन्द प्रदायक भगवान नारायण के श्रीचरणकमलों में शरणागती करें।

ग्यारहवाँ पासुरम : इस दशक की फलश्रुति करते हुये नम्माळ्वार कहते हैं कि इस तिरुवाय्मोळि के हज़ार पासुरमो में वीशेष इन दस पासुरमो के अद्भुत ज्ञान को समझना ही फल हैं।  

सेर्त् तडत् तेन् कुरुकूर्च् चटकोपन् सोल्
सीर्त् तोडै आयिरत्तु ओर्त्त इप् पत्ते

अति सुन्दर उपवन और तालाबों से घिरे सुन्दर आळ्वारतिरुनगरी के सेत नम्माळ्वार, कृपा कर , १००० पासुरम के भावपुर्ण अर्थो को  सुन्दर छंद  रुप  में प्रसादित कीये है। 

अडियेन प्रीती रामानुज दासी 

आधार: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/thiruvaimozhi-1-2-tamil-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

स्तोत्र रत्नम – श्लोक 21 से 30- सरल व्याख्या

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

<< 11 -20

श्लोक 21

श्री आळवन्दार् स्वामीजी, भगवान, जो कि हमारे शरण हैं, उनकी महानता का ध्यान करते हैं। जैसा की समझाया गया है – पहले लक्ष्य की प्रकृति की व्याख्या करने के बाद, यहां उस लक्ष्य का प्राप्त करने वाले व्यक्ति की प्रकृति को समझाया गया है। एक अन्य व्याख्या – पहले भगवान, जो हमारे शरण है, उनकी व्याख्या करने के बाद, यहां उन्होंने शरणागति (समर्पण की प्रक्रिया) की प्रकृति पर प्रकाश डाला, जिसे बाद में समझाया जाएगा।

नमो नमो वाङ्गमनसातिभूमये
नमो नमो वाङ्गमनसैकभूमये |

नमो नमो’नन्तमहाविभूतये
नमो नमो’नन्तदयैकसिंधवे ||

मेरा नमस्कार! नमस्कार!, हे भगवान आपको,जो वाणी और मन की पहुंच से परे हैं (उन लोगों के लिए जो आपको अपने प्रयासों से जानने की कोशिश करते हैं); मैं आपको नमस्कार करता हूं जो वाणी और मन की पहुंच के भीतर हैं (उनके लिए जो आपकी कृपा से आपको जानते हैं,); मेरा नमस्कार आपको, जिनके पास अपार धन है; आपको मेरा नमस्कार, जो दया के सागर हैं।

श्लोक 22

श्रीआळवन्दार् स्वामीजी अपनी योग्यता की घोषणा करते हुए, प्रपत्ति (समर्पण) में संलग्न होते हैं जो पहले [पिछले पासुर में] आया था। इस श्लोक में उस साधन के अभ्यास के विषय में समझाया गया है जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए उपयुक्त है।

न धर्मनिष्ठोस्मि न चात्मवेदि
न भक्तिमांस्त्वच्चरणारविंदे |

अकिञ्चनो’नन्यगतिश्शरण्य!
तवत्पादमूलं शरणं प्रपध्ये ||

हे भगवान, आपके ही श्रीचरण आत्मसमर्पण करने के लिए उपयुक्त है! मैं कर्म योग पर दृढ़ नहीं हूं; मुझे स्वयं के बारे में ज्ञान नहीं है; आपके श्रीचरणकमलों में मेरी भक्ति नहीं है; मैं जिसके पास और कोई साधन नहीं है, और कोई अन्य शरण नहीं है, मैं दृढ़ता से आपके दिव्य श्रीचरणकमलों को साधन के रूप में स्वीकार करता हूं।

श्लोक 23

जब भगवान कहते हैं, “चिंता मत करो कि तुम्हारे पास मेरे लिए कुछ भी अनुकूल नहीं है; जब तक तुम में निषिद्ध आचरण नहीं हैं जो तुम्हारे द्वारा अर्जित योग्यताओं को नष्ट कर देंगे, मैं तुम में सद्गुण उत्पन्न करूंगा और लक्ष्य भी प्रदान करूंगा”, इस पर श्रीआळवन्दार् स्वामीजी कहते हैं, “मैं सभी प्रतिकूल गुणों से पूर्ण हूं”।

न निन्दितं कर्म तदस्ति लोके
सहस्रशो यन्न मया व्यधायि |

सो’हम विपाकावसरे मुकुन्द!
क्रन्दामि सम्प्रत्यगतिस्तवाग्रे ||

हे प्रभु, आप मुक्ति प्रदायक हैं! वे निषिद्ध कर्म, जो शास्त्र में भी वर्णित नहीं हैं [दुनिया को संचालित करने वाले शास्त्र] वह मेरे द्वारा हजारों बार किए गए, अभी, जब [ऐसे कर्म] परिणाम में परिणत होते हैं, तो मैं कोई अन्य शरण न होने के कारण आप महामहिम के समक्ष रहा रुदन कर रहा हूँ।

श्लोक 24

श्रीआळवन्दार् स्वामीजी भगवान को पुकारते हुए कहते है, “आपकी कृपा ही मेरे लिए एकमात्र आश्रय है”; श्रीआळवन्दार् स्वामीजी कहते हैं, “जिस प्रकार आपको प्राप्त करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है, उसी प्रकार आपकी कृपा के लिए भी मैं एक उपयुक्त पात्र हूँ”।

निमज्जतो’नन्तभवार्णवान्त:
चिराय मे कूलमिवासी लब्ध: |

त्वया’पि लब्धं भगवन्निधानीम्
अनुत्तमं पात्रमिदं दयाया: ||

हे प्रभु, जो (स्थान, समय और तत्वों से) सीमित नहीं है! अनंत समय से इस संसार सागर में डूबे हुये मेरे लिए आप किनारे के समान आए है। हे भगवान! अब, आप ही की कृपा से, मैं भी आपकी कृपा का एक उपयुक्त पात्र हुआ हूँ।

श्लोक 25

भगवान पूछते हैं, “जब आपने अपनी सभी प्रकार से मेरा शरण ग्रहण किया है, तो आपका स्वभाव श्रीरामायण के सुंदर-कांड 39.30 में जैसा कहा गया है उस प्रकार का होना चाहिए… “तत्तस्य सदॄषं भवेत् “(श्रीराम स्वयं लंका को नष्ट कर और मेरी रक्षा करें, यह उनकी प्रकृति के अनुरूप है- इसलिए मैं उसके आने का इंतज़ार करूँगी); इस प्रकार से इस स्थिति में आप मुझसे अभी मदद करने के लिए क्यों आग्रह कर रहे हो?” श्रीआळवन्दार् स्वामीजी उत्तर देते हैं, “मैं आपसे अपने दुखों को दूर करने के लिए प्रार्थना नहीं कह रहा हूँ; परंतु जब आपके शरणागत दास इस संसार में पीड़ित होते हैं, तो श्रीमान यह आपकी महिमा के लिए एक कलंक है; इसलिए, मैं आपसे इसे दूर करने का अनुरोध करता हूं।”

अभूतपूर्वं मम भावि किं वा
सर्वं सहे मे सहजं हि दु:खम् |

किंतु त्वदग्रे शरणागतानां
पराभवो नाथ! न ते’नुरुप: ||

हे भगवान! मुझे ऐसा कौन सा नवीन दुःख होने वाला है जो पहले नहीं हुआ? मैं इन सब दुखों को सह रहा हूँ; दुख मेरे साथ जन्में हैं; परन्तु आपके शरणागतों को होने वाला दुख, आप महामहिम के समक्ष अपमान स्वरूप है, आपके अनुरूप नहीं है।

श्लोक 26

श्रीआळवन्दार् स्वामीजी कहते हैं, “यहां तक ​​​​कि जब आप अपनी महानता पर प्रतिकूल प्रभाव की परवाह किए बिना मुझे छोड़ भी देते हैं, तब भी मैं आपको नहीं छोड़ूंगा” और इस प्रकार भगवान पर अपने महाविश्वास (अटूट विश्वास) को प्रकट करते है जो उनके अगतित्व (और कोई गति/ शरण न होना) का परिणाम है।

निरासकस्यापि न तावदुत्सहे
महेश! हातुं तव पादपङ्कजम् |

रुषा निरस्तो’पी शिशु: स्तनन्धय:
न जातु मातुश्चरणौ जिहासति ||

हे सर्वेश्वर (सबके स्वामी) ! यद्यपि (आप) मुझे दूर धकेल दे, तब भी मैं आपके दिव्य चरण कमलों से प्रथक होने की हिम्मत नहीं करूंगा; [ठीक वैसे ही] जैसे एक दूधमुहाँ शिशु, जिसे (माँ द्वारा) गुस्से से दूर धकेल दिया भी जाए है, परंतु वह [बच्चा] कभी भी माँ के चरणों को नहीं छोड़ेगा।

श्लोक 27

श्रीआळवन्दार् स्वामीजी कहते हैं, “क्या यह केवल मेरी अनन्य गतित्व (और कोई गति/ शरण न होना) है जो मुझे आपको कभी छोड़ने नही देती है? मेरा मन जो आपके आनंदमय स्वभाव में डूबा हुआ है, वह और कुछ नहीं खोजेगा।

तवामृतस्यन्दिनी पादपङ्कजे
निवेशितात्मा गतमन्यदिच्छति |

स्थिते’रविन्दे मकरन्दनिर्भरे
मधुव्रतो नेक्षुरकं हि वीक्षते ||

क्या मेरा मन, जो (आपकी कृपा से) आपके दिव्य चरणकमलों पर स्थित है, ऐसे दिव्य चरण जिन से अनंत अमृत धारा बहती है, वह मन और किसी वस्तु की चाहना करेगा? जब शहद से भरा लाल कमल का फूल उपस्थित हो, तब क्या मधुमक्खी घास के फूल को देखेगी?

श्लोक 28

श्रीआळवन्दार् स्वामीजी पूछते हैं, “क्या एक अंजलि (हथेलियाँ जोड़कर प्रार्थना करने की मुद्रा) आपके लिए मुझ पर कृपा करने के लिए पर्याप्त नहीं है?”।

त्वदङ्घ्रिमुद्दिश्य कदा’पि केनचित्
यथा तथा वा’पि सकृत्कृतो’ञ्जलि: |

तदैव मुष्णात्यशुभान्यशेषत:
शुभानि पुष्णाति न जातु हीयते ||

यदि किसी के द्वारा अंजलि मुद्रा (हथेलियों को जोड़कर प्रणाम करने की मुद्रा [शारीरिक समर्पण का संकेत]) किसी भी समय किसी भी रूप में की जाती है, तो उससे उसके सभी पाप तुरंत बिना किसी निशान के समाप्त हो जाते है; सभी शुभ पक्षों का पोषण होता है; और ऐसी शुभता कभी कम नहीं होती।

श्लोक 29

यह श्लोक मानसिक प्रपत्ति (मानसिक समर्पण) को प्रकाशित करता है। वैकल्पिक रूप से – यह भी कहा जा सकता है कि परभक्ति, जो समर्पण का परिणाम है, उसकी श्लोक 28 ” त्वधंघ्रिमुद्धिश्य……..” और श्लोक 29 “उदीर्ण….” में व्याख्या की गई है।

उदीर्णसंसारदवाशुशुक्षणिं
क्षणेन निर्वाप्य परां च निर्वृतिम् |

प्रयच्छति त्वच्चरणारुणाम्बुज –
द्वयानुरागामृतसिन्धुशीकर: ||

आपके दो लाल रंग के दिव्य चरणकमालों के प्रेम सागर की एक बूंद भी इस संसार समान जंगल की भयंकर जलती हुई आग को पल भर में बुझा देती है और श्रेष्ठ आनंद भी देती है।

 श्लोक 30 

 जैसा कि श्रीआळवन्दार् स्वामीजी ने “सिद्धोपाय” (स्थापित साधन, अर्थात, भगवान) को स्वीकार कर लिया है, जो बिना किसी देरी के परिणाम देता है, परंतु परिणाम की प्राप्ति की प्रतीक्षा करने में असमर्थ, त्वरा (आग्रह) से उत्तेजित होकर, श्रीआळवन्दार् स्वामीजी तिरुवाइमोळि 6.9.9 में कहते हैं “कूविक् कोळ्ळुम् कालम् इन्नम् कुऱुगादो” (क्या आप तक पहुँचने का दिन जल्द नहीं आएगा?)

इसे इस प्रकार से भी समझाया गया है – पराभक्ति, जो प्रपत्ति (समर्पण) का परिणाम है, उसके कारण श्रीआळवन्दार् स्वामीजी पूछ रहे हैं कि वह [भगवान के दिव्य चरण] को कब देखेंगे, जैसा कि तिरुवाइमोळि 3.6.10 में कहा गया है “कनैकळल् काण्बदेन्ऱुकोल् कण्गळ्” (मेरी आँखें कब भगवान के दिव्य चरण देखेंगी?) और तिरुवाइमोळि 9.4.1 ″काणक् करुदुम् एन् कण्णे” (मेरी आंख देखना चाहती है)।

विलासविक्रांतपरावरालयं
नमस्यदार्तिक्षपणे कृतक्षणम् |

धनं मदीयं तव पादपङ्कजं
कदा नु साक्षात्करवाणि चक्षुषा ||

मैं कब आपका दिव्य चरणकमल अपनी आंखों से देखूंगा, जो मेरा धन है और जो आकाशीय/ श्रेष्ठ देवताओं और मनुष्यों के लोकों पर अपना समय व्यतीत करते है, ऐसे लोक जिन्हें आपने  खेल में माप लिया था और – उन लोगों के दुखों को दूर करने के विषय में जिन्होने उन चरण कमलों की पूजा की?

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/10/sthothra-rathnam-slokams-21-to-30-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

अमलनादिपिरान् – सरल व्याख्या

Published by:

।।श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः।।

मुदलायीरम्

श्री मणवाळ मामुनिगळ् स्वामीजी ने अपनी उपदेश रत्नमालै के दसवें पाशुर में अमलनादिपिरान् की महत्ता को बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत वर्णित किया है।

कार्त्तिगैयिल् रोहिणि नाळ् काण्मिनिन्ऱु कासियिनीर्
वाय्त्त पुगळ्प् पाणर् वन्दु उदिप्पाल् – आत्तियर्गळ्
अन्बुडने तान् अमलन् आदिपिरान् कऱ्ऱदऱ् पिन्
नन्गुडने कोण्डाडुम् नाळ्।

अरे दुनिया के लोगों! देखो, आज दक्षिणात्य माह, कार्तिक का रोहिणी नक्षत्र है। कार्तिक माह के रोहिणी नक्षत्र का यह दिवस महान आळ्वार संत तिरुप्पाणाळ्वार् का अवतरण दिवस है।

वेदों को मानने वाले और श्रद्धा और सम्मान करने वालों , तिरुप्पाणाळ्वार् द्वारा रचित अमलनादिपिरान् को पढ़ा तो जाना की आळ्वार संत ने सिर्फ १० प्रबंध पाशुरों में, वेदों का सार बहुत ही सुन्दर भाव से समझा दिया है। सदापश्यन्ति (सदा एम्पेरुमान को देखते रहना), बतला दिया इनके तिरुनक्षत्र को सभी उत्साह से मानते हैं।

तिरुप्पाणाळ्वार् द्वारा श्रीवैष्णवों पर अनुग्रह कर इन दस पाशुरों की रचनाकर इनमे , श्रीरंगम दिव्य धाम में शेष शैया पर लेटे हुये भगवान श्रीरंगनाथजी के दिव्य स्वरुप का वर्णन कर कह रहे है, उनके अपने आनंद के लिये बस यही एक मात्र साधन है।

श्री रंगेश के अर्चक पुरोहित (भगवान रंगनाथजी के प्रधान अर्चक) लोकसारंगमुनि द्वारा आळ्वार संत का अपचार हो गया था, जिससे पेरिय पेरुमाळ् ने अर्चक को आळ्वार संत को सम्मुख लाने का आदेश दिये। 

अर्चक तुरन्त तिरुप्पाणाळ्वार्के पास पहुँच, उन्हें अपने साथ मंदिर चलने का आग्रह किये,  पर आळ्वार संत ने दिव्य वैकुण्ठ श्रीरंगम में चरण रखने के योग्य नहीं हूँ, कह, चलने से मना कर दिये, तब लोकसारंगमुनि उन्हें अपने काँधे पर बैठाकर भगवान् पेरिय पेरुमाळ् के सम्मुख ले गये। इस कारण आळ्वार संत को मुनिवाहन योगी के नाम से बुलाने लगे,  सम्प्रदाय में ऐसी किवंदती है की, लोकसारंगमुनि के मंदिर में चरण रखते ही आळ्वार संत प्रबंध पाशुरों की रचना शुरू कर दिये, और जब भगवान् के सम्मुख पंहुचे तब दसवें पाशुर की रचना कर पेरिय पेरुमाळ् को सुनाये और उनके श्रीचरणों को प्राप्त कर, परमपद कि प्राप्ति कर लिये।

हमारे पूर्वाचार्य इन प्रबंधों का अनुभव दो प्रकार के सम्बन्ध से करते है,  

१. जैसे आळ्वार संत को पेरिय पेरुमाळ् ने अपने चरणों से दर्शन देते हुये किरीट तक क्रमशः दर्शन दिये।  

२. दूसरा पेरिय पेरुमाळ् द्वारा प्रसादित अनुग्रह का वर्णन,  इन प्रबंध पाशुरों को इन दोनों तरह के अनुभव को ध्यान में रख आनंद लेना चाहिये।

प्रस्तुत सरल भावार्थ पूर्वाचार्यों के उद्घृत व्याख्यानों पर आधारित है।

तनियन्

आपाद चूडम् अनुभूय हरीम् सयानम्
मद्ये कवेर दुहितुर् मुदितान्तरात्मा
अदृश्टृताम् नयनयोर् विशयान्तराणाम्
यो निश्चिकाय मनवै मुनिवाहनम् तम्।

मैं उन तिरुप्पाणाऴ्वार को प्रणाम करता हूँ, जिन्हें लोकसारंगमुनिवर ने अपने कंधों पर बिठाकर, दो कावेरी नदियों के बीचोबीच लेटे हुए पेरिय पेरुमाळ के सम्मुख उपस्थित किया; जिन्होंने पेरिय पेरुमाळ के श्रीचरणों से किरीट तक के दिव्य दर्शन का आनंदित अनुभव लिया; जिन्हें इस दर्शन के बाद संसार में और कुछ देखने की इच्छा ही नहीं थी।

काट्टवे कण्ड पाद कमलम् नल्लाडै उन्दि
तेट्टरुम् उदर बन्दम् तिरुमार्बु कण्डम् सेव्वाय्
वाट्टमिल् कण्गळ् मेनि मुनियेऱित् तनि पुगुन्दु
पाट्टिनाल् कण्डु वाळुम् पाणर् ताळ् परविनोमे।

हम उन तिरुपाणाळ्वार का मंगल गाते हैं, जिन्होंने लोकसारंगमुनि द्वारा ले आने के बाद अकेले ही पेरिय पेरुमाळ के गर्भगृह में प्रवेश किया और पेरिय पेरुमाळ का दर्शन कुछ इस प्रकार किया: उनके दिव्य श्रीचरणों से आरंभ कर, दिव्य वस्त्र का दर्शन कर, दिव्य नाभि कमल, सुन्दर दिव्य उदर, दिव्य वक्षस्थल, दिव्य कण्ठ, लालिमा लिए हुए सुन्दर श्रीमुख और दिव्य चक्षु जो नवखिले कमल की भाँति हैं।

आळ्वार संत ने अपने जीवन का लक्ष्य केवल पेरिय पेरुमाळ के गुणानुवाद ही रखा।

**********

प्रथम पाशुर:

आळ्वार संत पेरिय पेरुमाळ् के द्वारा उन्हें प्रसादित दिव्य श्रीचरणों के दर्शन का अनुभव करते है।

उन्हें अपने श्रीचरणों का सेवक और उनके भक्तों का भी सेवक बनाने के पेरिय पेरुमाळ् के इस कल्याण मंगल गुण का अनुभव कर रहे है।

अमलन् आदिपिरान् अडियार्क्कु एन्नै आट्पडुत्त
विमलन् विण्णवर् कोन् विरैयार् पोळिल् वेन्गडवन्
निमलन् निन्मलन् नीदि वानवन् नीळ् मदिळ् अरन्गत्तु अम्मान् तिरुक्
कमल पादम् वन्दु एन् कण्णिन् उळ्ळन ओक्किन्रदे।

हे! स्वामी (भगवन) आप तिरुवरंगम के ऊँचे परकोटों के मध्य लेटे हुये हों।

 हे! कल्याणगुण संपन्न मुझसे कोई आशा रखे बगैर आपने मुझे अपना ही नहीं अपने भक्तों का भी सेवक बनाने की कृपा की है।

हे! नित्यसुरियों (श्रीवैकुण्ठ में नित्य निवास करनेवाले) के स्वामी, आप सुवासित पुष्पों के उद्यान से घिरे, तिरुवेंगडम में निवास कर रहे हो।

आप अपने कारुण्य गुणों के कारण, अपने भक्तों द्वारा हुए अपचारों को ध्यान न देकर अपने सौलभ्य गुण के कारण बड़ी सुलभता से उन्हें उपलब्ध हो।

वहीं आपके परमपद में आपके सेवकों द्वारा नियमों का उल्लंघन कभी नहीं होता।

आपके दिव्य श्रीचरणों की छवि मेरे नेत्रों में बस गयी है।

दूसरा पाशुर:

आळ्वार संत पेरिय पेरुमाळ् के तिरुपीताम्बरम् के दर्शन का आनंद अनुभव कर रहे है।

जैसे समुद्र की लहरें नाव को आगे धकेलती है, ऐसे ही आळ्वार को पेरिय पेरुमाळ् ने अपने क्रमशः एक एक अंग के दर्शन दे रहे है।

आळ्वार को जब पूछा गया क्या भगवान ने कभी अकारण किसी पर कृपा की।

तब आळ्वार संत भगवान त्रिविक्रम का वर्णन कर आनन्द का अनुभव है।

उवन्द उळ्ळत्तनाय् उलगम् अळन्दु अण्डम् उऱ
निवन्द नीळ् मुडियन् अन्ऱु नेर्न्द निसासररैक्
कवर्न्द वेन्गणैक् कागुत्तन् कडियार् पोळिल् अरन्गत्तु अम्मान् अरैच्
चिवन्द आडैयिन् मेल् सेन्ऱदाम् एन सिन्दनैये।

अपने त्रिविक्रम अवतार में,  एम्पेरुमान ने जब तीनों लोको को नाप लिया तब उनका किरीट इस ब्रह्माण्ड के ऊपरी छोर को छू गया।

अपने क्रूर बाणों से शत्रु राक्षसों दैत्यों का नाश करने वाले श्रीराम, सुगन्धित उद्यानों से घिरे श्रीरंगम में पेरिय पेरुमाळ् के रूप में विराजमान हैं।

मेरा ध्यान भगवान की कमर को सुशोभित करते उस कटी वस्त्र पर केन्द्रित है।

तीसरा पाशुर:

एम्पेरुमान आळ्वार संत भगवान की दिव्य सुन्दर नाभि के दर्शन कर आनन्द का अनुभव करते है, आळ्वार संत कहते है, ब्रह्माजी के प्राकट्य के बाद वह और भी सुन्दर दृष्टव्य हो गयी।

पिछले पाशुर में आळ्वार संत त्रिविक्रम भगवान का वर्णन किये है,  एम्पेरुमान तिरुवॅगडमुडैयन् का वर्णन कर रहे है।

आळ्वार संत कहते है, पेरिय पेरुमाळ्और तिरुवॅगडमुडैयान्, एम्पेरुमान के ही दो स्वरुप है।

मन्दि पाय् वड वेन्गड मामलै वानवर्गळ्
सन्दि सेय्य निन्ऱान् अरन्गत्तु अरविन् अणैयान्
अन्दि पोल् निऱत्ताडैयुम् अदन् मेल् अयनैप् पडैत्तदोर् एळिल्
उन्दि मेलदन्ऱो अडियेन् उळ्ळत्तु इन्नुयिरे।

एम्पेरुमान तिरुवेन्गडम् के पर्वत्त पर तमिल देश के उत्तरी भाग में खड़े है, जहाँ मर्कट (बन्दर) उछल कूद करते रहते है, जहाँ नित्य सूरी भगवान श्रीनिवास की सेवा आराधना करने आते है।

श्रीरंगम में पेरिय पेरुमाळ् तिरुवनन्दाळ्वान् (शेषजी) की कोमल शैया पर लेटे हुये है।

मेरा मन भगवान पेरिय पेरुमाळ् के कटिभाग (कमर),  जो उषा काल में आकाश में फैली हलकी लालिमा लिए हुये है,  की सुंदरता पर मुग्ध हो गया।

जिसके ऊपर भगवान का नाभिकमल ब्रह्माजी के अवतरण के बाद और भी सुन्दर लग रहा है।

चतुर्थ पाशुर:

आळ्वार संत, एम्पेरुमान के दिव्य पेट के दर्शन का आनन्द ले रहे हैं, जो दिव्य नाभि के संग ही जुड़ा हुआ है।

जबकि दिव्य नाभि ने केवल ब्रह्मा को जन्म दिया है,  दिव्य पेट यह जतलाता है, “क्या मैंने पूरी दुनिया को अपने अंदर नहीं रखा है!”

क्या एम्पेरुमान किसी को स्वीकार करने से पहले,  उसके अहंकार और अधिकार भावना को दूर नहीं करेंगे?

आळ्वार संत कहते है की, जैसे एम्पेरुमान ने लंका के चारों ओर की सुरक्षात्मक दीवारों को ध्वस्त कर दिया,  वैसे ही वह अपने शत्रुओं, अहंकार और अधिकार भावना को भी मिटा देते है।

चदुर मामदिळ् सूळ् इलन्गैक्कु इऱैवन् तलै पत्तु
उदिर ओट्टि ओर् वेम् कणै उय्त्तवन् ओद वण्णन्
मदुर मावण्डु पाड मामयिल् आडु अरन्गत्तम्मान् तिरु वयिऱ्ऱु
उदर बन्दम् एन् उळ्ळत्तुळ् निन्ऱु उलागिन्ऱदे।

पेरिय पेरुमाळ्, श्रीरंगम में भगवान के रूप में शेष शैया पर लेटे हुये है, जहाँ भृंग अपने मधुर स्वर में गुनगुना रहे है और महान मोर नृत्य कर रहे हैं।

ऐसे पेरिय पेरुमाळ् ने, लंका , जो चार अलग-अलग प्रकार की सुरक्षात्मक परतों से घिरी हुयी है, के राजा रावण को युद्ध के मैदान से दूर भगा दिया था, समुद्र से रंग वाले एम्पेरुमान ने, बाद में एक क्रूर बाण से रावण के दस सिर काट दिये।

उन दिव्य पेरिय पेरुमाळ् के दिव्य पेट को सुशोभित करने वाला दिव्य आभूषण उदरबन्ध,  मेरे हृदय में दृढ़ता से स्थापित हो गया है और आँखों के सामने घूम रहा है।

पञ्चम पाशुर:

इस पाशुर में आळ्वार संत पेरिय पेरुमाळ् के दिव्य वक्षस्थल के दर्शन कर आनन्द का अनुभव ले रहे है।

एम्पेरुमान के दिव्य वक्षस्थल पर श्रीवत्स और कौस्तुभ चिन्हित है, यह उनकी पहचान है,

जो चित् और् अचित् तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इस पाशुर में आळ्वार  ने कहा है,  पेरिय पेरुमाळ् का वक्ष स्थल, उनका उदर (पेट) जिसमें जलप्रलय के समय सारा ब्रह्माण्ड उसके अंदर होता है, से भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि  यह पेरिय पिराट्टी का निवास स्थान है, जो पेरुमाळ् की पहचान है।

आळ्वार उस दिव्य वक्षस्थल के दर्शन का आनन्द ले रहे है, यह उन्हें इसकी सुंदरता देखने के लिए आमंत्रित कर रहे है।

अहंकार और अधिकारिता नष्ट हो जाने के बाद भी, क्या पाप और पुण्य (क्रमशः दोष और गुण) जीव का पीछा छोड़ देते है?

`आळ्वार संत कहते हैं कि एम्पेरुमान उनसे भी छुटकारा दिला देते है।

बारम् आय पळविनै पऱ्ऱु अऱुत्तु एन्नैत्तन्
वारमाक्कि वैत्तान् वैत्तदन्ऱि एन्नुळ् पुगुन्दान्
कोर मा तवम् सेय्दनन् कोल् अऱियेन् अरन्गत्तु अम्मान् तिरु
आर मार्वु अदु अन्ऱो अडियेनै आट्कोण्डदे।

पेरिय पेरुमाळ्  ने  मेरे  उन  कर्मों  से  जो  एक  बोझ की तरह थे, जो अनादि काल से मेरा पीछा कर रहे थे से, छुटकारा दिलवा दिया और उन्होंने मुझे अपने प्रति स्नेही बना दिया, इतने पर ही नहीं रुके वो मेरे मन में उतर गये।

मुझे नहीं पता कि इस भाग्य को पाने के लिए मैंने अपने पिछले जन्मों में कितनी बड़ी तपस्या की होगी। पेरिय पेरुमाळ् जो श्रीरंगम के स्वामी है,  जिनके दिव्य वक्षस्थल पर तिरु (श्री महालक्ष्मी) है, उनके दिव्य प्रेम की सांकलों ने मुझ दास को उनके सेवक बना लिया। 

छठवां पाशुर:

इस पाशुर में आळ्वार संत पेरिय पेरुमाळ् की ग्रीवा (गर्दन) के दर्शन अनुभव का आनंद ले रहे है।

आळ्वार संत अनुभव कर रहे है की , ग्रीवा कुछ इस तरह कह रही है, जबकि पिराट्टी, श्रीवत्स और कौस्तुभ उनके वक्षस्थल पर विराजित है, पर आपदा के समय में ही हूँ जो इस संसार को निगल कर उसकी रक्षा करता हूँ, यह सुन आळ्वार संत आनंदित हो उठते है।

क्या इस तरह एम्पेरुमान किसी को अपने कर्मो से छुटकारा दिलवाये है?

तब आळ्वार संत याद दिलवाते है,  रूद्र को ब्रह्माजी के श्राप से, और साथ में चंद्र को भी, जब उनकी छटा घट रही थी श्राप से मुक्त किया थे।

तुण्ड वेण् पिऱैयन् तुयर् तीर्त्तवन् अन्जिऱैय
वण्डु वाळ् पोळिल् सूळ् अरन्ग नगर् मेय अप्पन्
अण्डरण्ड बगिरण्डत्तु ओरु मानिलम् एळुमाल् वरै मुऱ्ऱुम्
उण्ड कण्डम् कण्डीर् अडियेनै उय्यक्कोण्डदे।

एम्पेरुमान ने रूद्र के सन्ताप को मिटाया,  संग में चंद्र जो उनके शीश पर अर्धचन्द्राकार रूप में विराजमान है, के  भी सन्ताप को मिटाया।

वह सुन्दर पंखो वाले भृंग से भरे उद्यानों से घिरे, श्रीरंगम के वासी “पेरिय पेरुमाळ्” ही है।

आळ्वार संत कहते हैं कि, उन पेरिय पेरुमाळ् की दिव्य गर्दन, जिसने इस  ब्रह्मांड, ब्रह्मांडों, ब्रह्मांडों के बाहरी आवरणों को, अद्वितीय पृथ्वी और अन्य सभी स्थानों में रहने वालों को निगल लिया, ने उनका उत्थान किया है।

सातवां पाशुर:

इस पाशुर में आळ्वार संत, एम्पेरुमान के दिव्य मुख और ओष्ठ के दर्शन पाकर उनके दिव्य अनुभव का आनंद ले रहे है।

यह अनुभव कर रहे है की, मुख कह रहा है, निश्चय ही ग्रीवा (गर्दन) ने संसार को निगला है, पर वह उसी समय संभव हुआ जब में लेता हूँ, और कहता हूँ,  “मा  शुचः” (डरो मत) यह सुन, आळ्वार आनंद ले रहे है।

रुद्र और अन्य देव, देवता हैं, इसलिए एम्पेरुमान ने उनकी रक्षा की।

लेकिन क्या? वह आपकी रक्षा करेंगे?

आळ्वार संत जवाब देते हुये कहते हैं कि, एम्पेरुमान उसकी रक्षा करेंगे, जो केवल एम्पेरुमान की इच्छा रखता है, अन्य लाभों की इच्छा रख अन्य देवताओं की इच्छा रखने वालों से अधिक रक्षा करेंगे।

कैयिन् आर् सुरि सन्गु अनल् आळियर् नीळ् वरै पोल्
मेय्यनार् तुळब विरैयार् कमळ् नीळ् मुडि एम्
अय्यनार् अणि अरन्गनार् अरविन् अणैमिसै मेय मायनार्
सेय्य वाय् अय्यो एन्नैच् चिन्दै कवर्न्ददुवे।

पेरिय पेरुमाळ् के पास दिव्य शंख है जो मुड़ा हुआ है,  दिव्य चक्र है जो अग्नि का उत्सर्जन करता है, दिव्य रूप है, वह एक विशाल पर्वत की तरह है और उनके शीश पर एक लंबा दिव्य मुकुट है, जो दिव्य तुलसी की मानिंद  सुगंधित है।

वह मेरे स्वामी (भगवान) हैं, जो सुंदर श्रीरंगम में तिरुवन्दाळ्वान् (आदिशेशन्) के कोमल नरम शैया पर लेटे हुये हैं,  उनकी अद्भुत लीलाएं है।

ऐसे एम्पेरुमान की हलकी लालिमा लिये मुखाकृति ने मुझे आकर्षित किया।

आठवाँ पाशुर:

इस पाशुर में आळ्वार संत एम्पेरुमान के दिव्य सुन्दर चक्षुओं (आँखों) के दर्शन का अनुभव और आनंद ले रहे है।

मुख चाहे जो कहे,  आँखे ही है जो वात्सल्य झलकाती है  और भगवानके दर्शन करवाती है।

इस लिए आळ्वार संत भगवान की आँखों के दर्शन का सुख अनुभव कर रहे है।

चतुर्थ और पंचम पाशुर में आळ्वार संत ने कहा, अहम्, अधिकार भावना और पिछले  कर्म मिटा दिये जायेंगे, पर यह मिटा दिये जाने के बाद भी अविद्या (अज्ञान) रह जाने से, क्या अहम्, अधिकार भावना वापस नहीं आयेंगे?

आळ्वार संत कहते है, जैसे एम्पेरुमान ने दैत्य हिरण्य कश्यप (तमोगुणी (अज्ञान और आलस्य) प्रवर्त्ती का प्रतिक)} का नाश किया, ऐसे ही एम्पेरुमान हमारे तमोगुणों का नाश करेंगे।

परियन् आगि वन्द अवुणन् उडल् कीण्ड अमरर्क्कु
अरिय आदिप् पिरान् अरन्गत्तु अमलन् मुगत्तुक्
करियवागिप् पुडै परन्दु मिळिर्न्दु सेव्वरियोडि नीण्ड अप्
पेरिय आय कण्गळ् एन्नैप् पेदैमै सेय्दनवे।

एम्पेरुमान ने विशालकाय राक्षस हिरण्य कश्यप को चीर दिया।

वह ब्रह्मा जैसे दिव्य देवताओं के लिए भी सुलभ नहीं है।

वह सभी के कारक है, वह सभी पर कृपा करते है, और श्रीरंगम में विश्राम करते है।

ऐसे एम्पेरुमान के दिव्य मुख पर शोभित सुन्दर कानों तक फैले बड़े विशाल दिव्य काले नेत्र, जिनमे लाल रंग की रेखाएं हैं, ने मुझे भ्रमित कर दिया।

नवम पाशुर:

आल मामरत्तिन् इलै मेल् ओरु पालगनाय्
ज्ञालम् एळुम् उण्डान् अरन्गत्तु अरविन् अणैयान्
कोल मा मणि आरमुम् मुत्तुत् ताममुम् मुडिवु इल्लदु ओर् एळिल्
नील मेनि ऐयो निऱै कोण्डदु एन् नेन्जिनैये।

इस पाशुर में आळ्वार संत भगवान् की दिव्य छवि के दर्शन कर उसका दिव्य आनन्द का अनुभव कर रहे है।

आळ्वार संत भगवान के अघटित को घटित करने के गुण का आनंद ले रहे है।

जब यह प्रश्न पूछा गया,  वेदांत (वेदों का सार, जिसे उपनिषद् भी कहते है) के ज्ञान से तमोगुण का भी नाश होता है, पर आळ्वार संत चतुर्थ वर्ण से थे जिन्हे वेद पढ़ने का भी अधिकार नहीं है।

तब आळ्वार संत ने कहा, एम्पेरुमान अपने अद्भुत गुण को दर्शाते है, प्रलय काल में सारे ब्रह्माण्ड को निगलकर, एक वटपत्र पर लेटे हुये है,   वह मेरे भी सभी तमोगुण का नाश करेंगे।

सभी लोकों को निगलकर, एक वटपत्रपर लेटे करनेवाले, श्रीरंगम में तिरुवन्दाळ्वान् (आदिशेशन्) की नरम शैया पर लेटे हुये है। 

उन पेरिय पेरुमाळ् की अद्वितीय कला दिव्य स्वरुप जो रत्न जड़ित स्वर्णाभरणों से सुसज्जित है, बरबस ही मेरे मन को आकर्षित कर रहा है, काश मैं भी, इसके लिये कुछ कर सकता।

दसवां पाशुर:

अंत में आळ्वार संत ने पेरिय पेरुमाळ् में भगवान कृष्ण के दर्शन किये, तब आळ्वार संत ने मुझे और कुछ देखना नहीं कह, भगवान के श्रीचरणों को प्राप्त कर वैकुण्ठधाम  चले गये।

कोण्डल् वण्णनैक् कोवलनाय् वेण्णेय्
उण्ड वायन् एन् उळ्ळम् कवर्न्दानै
अण्डर् कोन् अणि अरंगन् एन् अमुदिनैक्
कण्ड कण्गळ् मऱ्ऱोन्ऱिनैक् काणावे।

वह जो मेघों के रंग और गुणों से संपन्न है, वह जो गो-कुल में जन्म लिया है, जिनकी सुन्दर दिव्य मुखाकृति है, जो मक्खन चुराकर खाता है, जो नित्यसुरियों का नेता है, जिसने मेरे मन को आकर्षित किया है , वह श्रीरंगम में लेटा हुआ है।

मेरी अतृप्त आँखों ने, उन एम्पेरुमान को देखा है, अब और आगे कुछ भी नहीं देखना है।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/amalanadhipiran-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

तिरुवाय्मोळि – सरल व्याख्या – १.१ – उयर्वर

Published by:

श्री: श्रीमते शटकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत वरवरमुनये नम:

कोयिल तिरुवाय्मोळि

<< तनियन

bhagavan-nammazhwar

सर्वेश्वर जो श्रिय:पति हैं सबसें सर्वश्रेष्ठ हैं, सारें कल्याण गुणों के निवास स्थान हैं, दिव्य रूप के हैं, श्रीवैकुण्ट और संसारम दोनों के नेता हैं, वेदों से प्रकाशित हैं, सर्वव्यापी हैं, सर्व नियन्ता हैं, सारें चेतनों औरअचित वस्तुओँ के अंतर्यामी हैं और उन्पर शासन करतें हैं। आलवार एम्पेरुमान के बारे में इन पहलुओं की व्याख्या करते हैं और इस दशक में उन्हें दिव्य ज्ञान और भक्ति प्रदान करने के बारे में सोचकर आनंदित हो जाते हैं।  

हमारें पूर्वाचार्यों

द्वारा समझाया गया है: यह पदिगम तिरुवाय्मोळी की सारांश है।  इस्की पहली ३ पासुरम इस पदिगम की सारांश हैं, और पहला पासुरम पहले तीन पासुरमो का सारांश हैं। पहले पासुरम का सारांश उसकी पहली पंक्ति है।  

 पहला पासुरम: इसमें असंख्येय कल्याण गुणों कि अस्तित्व, निर्हेतुक कृपा, नित्यसूरियों पर एकादिपत्यता, नित्य दिव्य मंगळ रूपों की धारणा इत्यादि एम्पेरुमान की सर्वेश्वर होनें की विषय को प्रकट करने वालि गुणों पर हैं. ऐसा कहने के बाद, नम्माळ्वार अपने हृदय को ऐसे एम्पेरुमान की हमेशा सेवा करने का निर्देश देते हैं।

उयर्वर उयर्नलं उड़ैयवन यवन अवन

मयर्वर मदिनलं अरुळिनन यवन अवन 

अयर्वरुम अमररगळ अदिपति यवन अवन 

तुयरऱू सुडरडि तोळुदेळु एन मनने 

ओह मेरे मन! एम्पेरुमान के चरण कमलों में हाथ जोड़कर प्रणाम करें और उत्थान करें। जो शास्त्रों में श्रेष्ट मानें जाने वाले अन्य विषयों को अस्तित्वहीन करनेवाले श्रेष्ठता के निवास मानें जातें हैं वें एम्पेरुमान हैं। मेरे अज्ञान को संपूर्ण रूप में अपने निर्हेतुक कृपा से मिटाकर सच्ची ज्ञान और भक्ति देनें वालें वें ही हैं।  नित्यसूरिया जिन्की विस्मरण जैसे दोष न हो उनके सर्व स्वामी वें ही हैं।

 दूसरा पासुरम: नम्माळ्वार भगवान (जो यहाँ “यवन” शब्द से प्रकटित हैं ) को अन्य सारे तत्वों से विशिष्ट बतातें हैं।

मननग मलम अर मलर मिसै एळुदरुम 

मननुणर्वु अळविलन  पोरीयुणर्वू  अवैयिलन 

इननुणर मुळुनलं एदिर निगळ कळिविनुम 

इननीलन एनन उयिर मिगु नरै इलने 

काम, क्रोध जैसे दोषों से रहित परिपक्व, आत्मा के स्वरूप को समझने वाले, मन से भी भगवान असीमित हैं।  अचित तत्त्वों को समझने वाले इन्द्रियों से वें असीमित हैं।  अत: वे चित और अचित से अलग हैं।  वें ही सम्पूर्ण ज्ञान तथा सम्पूर्ण आनंद मानें जातें हैं और इन्के समान श्रेष्ट कोई भी भूत , वर्तमान एवं भविष्य काल में नही हैं।  वे ही मेरे आधार हैं। इस दशक में सारें पासुरमो के अंत में “अवन तुयररु सुडरडि तोळुदेळु” को जोड़नी चाहिए

तीसरा पासुरम। नम्माळ्वार एम्पेरुमान के सँसार के सात संबंध की वर्णन करतें हुए यह निर्माण करतें हैं कि भगवान किसी भी वस्तु या काल से सीमित नहीं हैं।  

इलनदु उडैयनिदु एन निनैवु अरियवन 

निलनिडै विसुंबिडै उरुविनन अरुविनन 

पुलनोडु पुलनलन ओळीविलन परन्द 

अन नलनुडै ओरुवणै नणुगिनम नामे 

“दूर होने के कारण भगवान इसमें नहीं हैं” और “निकट होने के कारण भगवान इस वस्तु में हैं”, के जैसे सीमित वादों से भगवान समझें नहीं जा सकतें।  वें साँसारिक और अन्य अन्य मण्डलों में , सारें चित (जो कारणों को अदृश्य हैं) और अचित (जो कारणों को दृश्य हैं) के स्वामी हैं. अत: चित और अचित उन्के लक्षण और वें सर्व व्यापी हैं। ऐसे कल्याण गुणों से संपन्न विशिष्ट भगवान के प्रति शरणागति अनुष्ठान करना हमारा भाग्य हैं।

चौथा पासुरम: नम्माळ्वार यह स्पष्ट करतें हैं कि,सारे वस्तुओँ के सवरूप ( मूल गुण) को भगवान के नियंत्रण में होने को सामानाधिकरण्यम के द्वारा समझाया गया है।

ध्यान: सामानाधिकरण्यम का अर्थ है एक सेअधिक गुणों में समन्वय होना. इसका और एक अर्थ : एक वस्तु को समझाने वालें दो या अधिक शब्द।

 नाम अवन इवन उवन अवळ् इवळ् उवळ् एवळ्

ताम अवर इवर उवर अदु इदु उदु एदु

वीम अवै इवै उवै अवै नलं तींगु अवै

आम अवै आय अवै आय नींर अवरे

भगवान ही (जो अन्तर्यामी हैं ) सारे तत्व (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग , चित, अचित, अनित्य) बने गए हैं जिन्हें अलग-अलग शब्दों से उनकी निकटता को इंगित करने के लिए पहचाना जाता है। जो कि अच्छे हैं या बुरे और जो अतीत में मौजूद थे, अब मौजूद हैं या भविष्य में अस्तित्व में आएंगे। सारे शब्द भगवान को ही संकेत करते हैं, और अन्य सारे शब्द भी उन्हीं को संकेत करतें हैं। अर्थात सारे वस्तु सारे समय पर भगवान के संपूर्ण अधिकार में हैं। 

पाँचवा पासुरम: रक्षा के रूप में एम्पेरुमान का सबको सहारा देना वैयाधिकरण्यं से समझाया गया है।  

ध्यान दे: वैयाधिकरण्यं अर्थात, दो या और अवस्थाओं का भिन्न अध:स्तर होना। इसका और एक अर्थ है दो या और शब्दों जो भिन्न तत्वों को समझाते हैं।  

अवरवर तमदमदु अरिवरि वगै वगै 

अवरवर इरैयवर एनवडि अड़ैवरगळ 

अवरवर इरैयवर कुरैविलर इरैयवर 

अवरवर विदि वळि अड़ैय निँरनरे 

भिन्न-भिन्न अधिकारि (योग्य व्यक्ति) अपने ज्ञान और इच्छा के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओँ से शरण लेते हैं। उन्हीं देवताओँ का उन शरणागतों की  इच्छाओँ की पूर्ती करना उचित होगा। लेकिन भगवान ही हैं  जो सबके स्वामी हैं, जो उन देवताओं में अंतर्यामी के रूप में रहते हैं, और निश्चित करतें हैं कि कर्मानुसार इन व्यक्तियों कि इच्छाएं सफल हो।  

छटवा पासुरम : नम्माळ्वार समझाते हैं कि कर्म /अकर्म सारे सामानाधिकरण्यम द्वारा भगवान् के नियंत्रण में है।  

नींरनर इरुंदनर किडंदनर तिरिंदनर 

निंड्रिलर इरुंदिलर किडंदिलर तिरिंदिलर 

एँरुमोरियलविनर एन निनैवरियवर 

एँरुमोरियलवोडु नींर एम् तिडरे 

एम्पेरुमान सारे तत्वों के कर्म (जैसे खड़ा होना, बैठना, लेट जाना, पैदल चलना) और अकर्म (खड़ा न होना, नहीं बैठना, लेटे न रहना , पैदल न चलना) के नियंता हैं।  ऐसे एम्पेरुमान अचिंत्य और सारे अन्य तत्वों से विशिष्ट हैं।  ये  हमारे भगवान हैं जो शास्त्रों से स्थापित किये गए हैं और शास्त्र ही सबसे विश्वसनीय साक्ष्य हैं।  

सातवाँ पासुरम :  प्रकृति और भगवान के बीच शरीर और आत्मा के रिश्ते के रूप में यह सामानाधिकरण्यम समझाया गया है।  

तिडविसुंबु एरि वळि नीर निलम इवै मिसै 

पडरपोरुळ मुळुवदुमाय अवै अवै तोरुम 

उडनमिसै उयिर एनक् करंदेंगुम परंदुळन 

सुडर्मिगु सुरुदियुळ इवै उंड सुरने 

भगवान परमात्मा हैं जो प्रकृति मंडल (सृष्टिकर्ता) बन जातें हैं ; पहले अग्नि, जल, आकाश , वायु, पृथ्वी को आधार के रूप में सृष्टि कर, उन्मे व्याप्त हो जाते हैं। भगवान सर्वत्र व्याप्त होते हैं जैसे आत्मा शरीर में व्याप्त होती हैं। वें सर्वत्र के भीतर और बाहर उपस्थित हैं। वें उज्जवल वेदों के लक्ष्य हैं। ये एम्पेरुमान प्रळय काल में सर्वत्र की भोग करतें हैं, और “सुरा” (भगवान) कहलातें हैं।  

आठवाँ पासुरम: नम्माळ्वार कहतें हैं कि ब्रह्मा और रुद्र जो व्यष्टि सृष्टि (भिन्न रूपों के सृष्टि ) और व्यष्टि संहारम (भिन्न रूपों के संहारम) के लिए ज़िम्मेदार हैं, भगवान के नियंत्रण में हैं।  

सुरर अरिवरू निलै विण मुदल मुळुवदुम 

वरन मुदलाय अवै मुळुदुंड परपरन 

पुरम ओरु मूंरेरित्तु अमरर्क्कुं अरिवु इयंदु 

अरन अयन एन उलगु अळित्तु अमैत्तु उळने 

भगवान मूल प्रकृति जैसो के कारण हैं (यह ब्रह्मा रद्रादियों के ज्ञान के पार है), और सारे प्रकृति मंडल की सँहार करते हैं ; देवताओं के स्वामी हैं, रूद्र के रूप में तीन पुरियों के सँहार किये (त्रिपुर संहारम), सर्वत्र के सँहार करतें हैं, पुन: सर्वत्र कि सृष्टी किए, देवताओँ को ज्ञान दिये। ब्रह्म रुद्रादियों के अंतर्यामी होते हुए भगवान ये सब करतें हैं।  

नौवीं पासुरम: नम्माळ्वार माद्यमिक बौद्ध तत्ववादियों (शून्यवादी) की खंडन किए।  ये वेद बाह्यो (वेदों को अस्वीकार करने वालें) में से प्रथम हैं।

उळन एनिल उळन अवन उरुवम इव्वुरुवुगळ 

उळन अलन एनिल अवन अरुवम इव्वरुवुगळ 

उळन एन इलन एन इवै गुणं उड़ैमैयिल 

उळन इरु तगैमैयोडु ओळिविलन परंदे 

भगवान ही अस्तित्व (आळ्वार के वैदिक सिद्धाँत)और अनस्तित्व (अवैदिक सिद्धांत)  के आधार हैं – इसलिए उन्के प्रसंग करते समय, उन्की अस्तित्व को मानना उचित हैं। कभी अनस्तित्व न होते हुए वे सर्वत्र व्यापी हैं। और इस प्राकृतिक मंडल में  उन्के आकार और निराकार आविर्भाव के संग हैं।  

दसवाँ पासुरम : इस पासुरम में  नम्माळ्वार भगवान के सर्व-व्यापकता को समझातें हैं।  

परंद तण परवै उळ नीर तोरुम परंदुळन 

परंद अंडम इदु एन निल विसुंबु ओळिवु अर

करंद सिल इडम तोरुम तिगळ पोरुळ् तोरुं 

करंदु एंगुम परंदुळन इवै उंड करने 

परमात्मा इस अखंड ब्रह्मांड में जितने सुख से हैं , उसी तरह शीतल सागर के हर बूँद में सूक्ष्म रूप में भी हैं।  हर छोटे से छोटे स्थान में हैं, और इन जगहों में उपस्थित स्व उज्जवल जीवात्माओ (इन जीवात्माओं के ज्ञान के पार )में भी हैं। सर्वव्यापी होने के कारण, सँहार के समय सर्वत्र भोग करके भी स्थिर रहें।  

ग्यारहवीं पासुरम : आळ्वार कहतें हैं कि, भगवान के परत्व को संक्षेपण करने वाले इन दस पासुरमो को सीखने/कहने/समझने का फल मोक्ष है।  

कर विसुंबु एरि वळि नीर निलम इवै मिसै 

वरनविल तिरलवलि अळि पोरै आइ निन्र 

परन अड़ि मेल कुरुकूर्च चटकोपन सोल 

निरैनिरै आयिरत्तु इवै पत्तुम वीडे 

ये १० पासुरम (अत्यंत कृपा संग गाये गए , और जो सम्पूर्ण कल्याण करने वाले हैं ) नम्माळ्वार (जो आळ्वारतिरुनगरी में जन्में) एम्पेरुमान के दिव्य चरण कमलों में समर्पित किए गए हैं। जो पञ्चभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, और भूमि) और उन्के गुणों (नाद , ताकत , गर्मी, शीतलता, और सहनशीलता) के निवास हैं; जिन्के ये सभी लक्षण हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/thiruvaimozhi-1-1-tamil-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

स्तोत्र रत्नम – श्लोक 11 – 20 – सरल व्याख्या

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

<< 1 – 10

श्लोक 11 –

इस पासूर में परत्व लक्षण (सर्वोच्चता की पहचान) की व्याख्या की गई है।

स्वाभाविकानवधिकातिषयेशितृत्वम
नारायण त्वयि न मृष्यति वैदिक: क: |

ब्रह्मा शिवश्शतमख परम: स्वराडिति
एते’पि यस्य महिमार्णवविप्रुशस्थे ||

हे नारायण! ब्रह्मा, शिव, इंद्र और मुक्तात्मा, जो कर्म से बंधे नहीं हैं और उन सभी दूसरे देवताओं से बड़े हैं – ये सभी व्यक्ति आपकी महानता के सागर में एक बूंद के समान हैं; कौन सा वैदिक (वेद का अभ्यास करने वाला) आपके ऐश्वर्य (नियंत्रण करने की क्षमता) को वहन नहीं करेगा जो स्वाभाविक है और जिसमें असीम महानता है?

श्लोक 12 –

इस पासूर में, भगवान की पहचान के बारे में संदेह उत्पन्न करने वाले (सामान्य और विशिष्ट) नामों के अपेक्षा, श्रीआळवन्दार स्वामीजी दयापूर्वक उन नामों की व्याख्या कर रहे हैं जो व्यक्तिगत रूप से पूर्ण हैं और स्पष्ट रूप से भगवान की सर्वोच्चता की पहचान कराने में सक्षम हैं।

कश्श्री : श्रिय: परमसत्वसमाश्रय: क:
क: पुंडरिकनयन: पुरुषोत्तम: क: |

कस्यायुतायुतशतैककलांशकांशै विश्वं
विचित्रचिदचित्प्रविभागवृत्तम ||

श्रीजी (श्री महालक्ष्मी) का धन कौन है? शुद्ध सत्वता किसके पास है? कमल नयन कौन हैं? पुरुषोत्तम के नाम से किन्हें जाना जाता है? किसके संकल्प/ व्रत का एक छोटा सा अंश (कई करोड़ आकार के हजारवें हिस्से का) इस संसार जिसमें चेतन और अचेतन की विविध श्रेणियां हैं, को संभालता और बनाए रखता है?

श्लोक 13 –

श्रीआळवन्दार स्वामीजी इतिहास और पुराणों की घटनाओं के माध्यम से ब्रह्मा, रुद्र, आदि के क्षेत्रज्ञत्व (जीवात्मा होने) और भगवान के परत्व (सर्वोच्चता) होने की व्याख्या करते हैं।

वेदापहार गुरुपातक दैत्यपीडादि
आपात विमोचनमहिष्टफलप्रदानै: |

कोन्य: प्रजापशुपती परिपाति कस्य:
पादोदकेन स शिवस्स्वशिरोधृतेन ||

(भगवान के अलावा) और किसने, ब्रह्मा जो प्रजापति हैं और शिव जो पशुपति हैं, उनके अनेकों संकटों को दूर करके उनकी रक्षा की है, जैसे वेदों की चोरी [ब्रह्मा द्वारा वेदों को खोना], अपने पिता के सिर को तोड़ने के कारण प्राप्त पाप [रुद्र द्वारा ब्रह्मा का सिर तोड़ना] और असुरों द्वारा दिया गया दुःख [इंद्र और अन्य देवताओं के लिए] आदि? किसके श्रीपाद तीर्थ (गंगाजी का पवित्र जल, जो भगवान के चरण कमल से निकली है) को अपने शीश पर धारण करने से शिव शुद्ध हो गए थे?

श्लोक 14 –

श्री आळवन्दार स्वामीजी यहाँ (इन पांच पासूरों की श्रृंखला के निष्कर्ष स्वरूप) भगवान की सर्वोच्चता की व्याख्या करते है, जो ऐसे न्याय-संगत तर्क और बुद्धि विवेक पर आधारित है, जो प्रमाणों (अर्थात शास्त्र, प्रामाणिक शास्त्र) के अनुकूल हैं।

कस्योदरे हरविरिञ्चमुख: प्रपंच:
को रक्षतीममजनिष्ट च कस्य नाभे: |

क्रान्त्वा निगीर्य पुनरद्गिरति त्वदन्य:
क: केन वैष परवानिति शक्यशङ्क: ||

किसके उदर में शिव, ब्रह्मा आदि और संसार वशीभूत थे? इस दुनिया की रक्षा कौन कर रहा है? किसकी नाभिकमल से (यह संसार) उत्पन्न हुआ? आपके अलावा और किस ने इस दुनिया को नाप कर, निगल कर, फिर से उगल दिया? क्या इस संसार की प्रभुता पर तनिक भी संदेह हो सकता है?

श्लोक 15 –

इस श्लोक में जो बताया गया है, जबकि वह स्पष्ट रूप से प्रामाणिक ग्रंथों के माध्यम से भी स्थापित किया गया है, जैसा कि श्री भगवत गीता 16.20 में कहा गया है “आसुरीं योनिमापन्ना” (असुर के रूप में जन्म लेना), यह सोचते हुए कि “हाय! ये आसुरी लोग आपको जानने का सुअवसर खो रहे हैं!” श्रीआळवन्दार स्वामीजी को ऐसे लोगों कि क्षति का दुख होता है। वैकल्पिक व्याख्या – इन विशिष्ट भगवान को आसुरी लोगों द्वारा नहीं देखा जाना चाहिए जैसा कि तिरुवाइमोळि 1.3.4 में कहा गया है “यारुमोर निलैमैयन् एन अरिवरीय एम्पेरुमान”, अर्थात भगवान ऐसे है कि उन्हें [ईर्ष्यालु] लोग नहीं समझ सकते क्योन्की उनके “ऐसे गुण है”)।

त्वां शीलरूपचरितै: परमप्रकृष्ट:
सत्वेन सात्विकतया प्रबलैश शास्त्रै: |

प्रख्यातदैवपरमार्थविदां  मतैश्च
नैवासुरप्रकृतय: प्रभवन्ति बोध्दुम् ||

[शोक!] आसुरी लोग, आपको जानने में असमर्थ हैं (अर्थात भगवान को, जो सर्वश्रेष्ठ है), जिनके विषय में हम इस प्रकार से जानते है-

• आपका शील गुण (सरलता का गुण), रूप (जिसे वेद द्वारा महिमामंडित किया जाता है) और (दिव्य) गतिविधियाँ,

• आपका निवास/ संपत्ति जो शुद्ध सत्व से परिपूर्ण है,

• शास्त्र जो अपनी अच्छाई की प्रकृति के कारण दृढ़ हैं और

• उन लोगों की सम्मति के माध्यम से जो आपके विषय में सच्चाई जानते हैं।

श्लोक 16 

श्रीआळवन्दार स्वामीजी महान आत्माओं द्वारा भगवान तक पहुँचने के बारे में विचार करते हैं जो कि भगवान की सादगी के कारण ही संभव है और इसे [उनके द्वारा भगवान को जानने/प्राप्त करने] वह (श्रीआळवन्दार स्वामीजी) अपना लाभ मानते हैं।

उल्लङ्घित  त्रिविध सीमसमातिशायी
संभावनं तव परिब्रढिमस्वभावं |

मायाबलेन भवता’पी निगुह्यमानं
पश्यन्ती केचिदनिशं  त्वदनन्यभावा: ||

वे (कुछ) महान आत्माएं, जो विशेष रूप से सिर्फ आपके विषय में ही विचार करते हुए आपके प्रभुत्व को देखते हैं, जो तीन प्रकार की सीमाओं (काल (समय), देश (स्थान) और वस्तु (इकाई)) से परे है और “क्या कोई आपके बराबर या उच्चतर है?” इस प्रकार के संदेह से भी परे है। वह भी तब जब आपके ऐसे स्वामित्व/ आधिपत्य को आपने अपनी अद्भुत क्षमता से छुपाया हुआ है।

श्लोक 17 –

यहाँ श्रीआळवन्दार स्वामीजी विभिन्न प्रकार की संस्थाओं की व्याख्या करते हैं, जो भगवान द्वारा नियंत्रित होती हैं और जो उनके सर्वेश्वरत्व (सभी पर प्रभुत्व) को सिद्ध करता है, जिसे पहले समझाया गया है।

यदण्डं अण्डान्तर गोचरं च यत्
दशोत्तराण्यावरणानि यानि च |

गुणाः प्रधानं पुरुशः परं पदं
परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः||

(1) ब्रह्माण्ड [ब्रह्मा के नियंत्रण में 14 परतों वाला अंडाकार आकार का ब्रह्मांड], (2) जो कुछ भी अंड के अंदर है, (3) वे [सात] आवरण (बाढ़ा) [जो अंड को आच्छादित करते हैं] जिनमें से प्रत्येक अपने पिछले के 10 गुना है और उन सभी की तुलना में आकार में बड़ा, (4) गुण जैसे सत्व (अच्छाई), रजस (राग) और तमस (अज्ञान), (5) मूल प्रकृति (प्राथमिक पदार्थ), (6) जीवात्माओं का संग्रह (चेतन संस्थाएं), (7) श्रीवैकुंठम (आध्यात्मिक क्षेत्र), (8) नित्यसूरियों का समूह जो मुक्तात्माओं से श्रेष्ठ हैं (जो ब्रह्मा और अन्य से शुरू होने वाले देवताओं से श्रेष्ठ हैं), और (9) दिव्य शुभ रूप हैं, ये सभी आपके शरीर/रूप है।

श्लोक 18 –

श्रीआळवन्दार स्वामीजी ने पहले “शरण्य” (शरण – भगवान) की महानता के बारे में बात की थी और इस श्लोक में, हममें जो झिझक है कि “मैं ऐसे उभय विभूति नाथ (दोनों दुनिया के स्वामी) तक कैसे पहुँच सकता हूं?”, उसको समाप्त करने के लिए भगवान के ऐसे बारह गुणों की व्याख्या करते है जो भक्तों को भगवान में लगाती हैं। वैकल्पिक रूप से – पहले भगवान के सर्वेश्वरत्वम (सर्वोच्चता) की व्याख्या की गई है और अब वे भगवान के उन गुणों के बारे में बोलते हैं जिनके बारे में बात करना उपयुक्त है।

वशी वदान्यो गुणवान् रुजुश्शुचिर्
मृदुर्दयालुर् मधुरस्थिरस् सम: |

कृती कृतज्ञस्त्वमसी स्वभावत:
समस्तकल्याणगुणामृतोदधि: ||

आप स्वाभाविक रूप से शुभ गुणों के अमृत सागर हैं जैसे (1) नियंत्रित होना (अपने भक्तों द्वारा), (2) उदार होना (अपने आप को अपने भक्तों के सामने प्रस्तुत करना), (3) सौशील्य (स्वभाव में उत्कृष्टता), (4) स्वयं को बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए प्रस्तुत करना, (5) ईमानदार होना (मन, वचन और कर्म में), (6) पवित्रता (निर्हेतुक अपनी दया प्रदान करना), (7) अपने भक्तों से वियोग को सहन करने में असमर्थ होना, (8) दयालु होना (अपने भक्तों का दुःख सहन नहीं कर सकना), (9) मधुर होना, रक्षा में दृढ़ होना (अपने भक्त की), (10) एक समान होना (उन सभी के लिए जो आपके प्रति समर्पण करते हैं), (11) कर्मों में संलग्न होना (अपने भक्तों के लिए, उन्हें अपना समझकर) और (12) अपने भक्तों के प्रति उनके छोटे से छोटे कृत्य के लिए भी आभारी होना।

श्लोक 19 –

श्रीआळवन्दार स्वामीजी कहते हैं कि जिस प्रकार भगवान के शुभ गुण असंख्य हैं, उसी प्रकार प्रत्येक गुण भी अपने आप में असीम है।

उपर्युपर्युब्जभुवो’पी पूरुषान्
प्रकलप्य ते ये शतमित्यनुक्रमात् |

गिरस् त्वदेकैकगुणावधीप्सया
सदा स्थिता नोद्यमतो’तिशेरते ||

अधिक से अधिक ब्रह्मा के लिए “ते ये शतं” (ऐसे सौ) का बार-बार पाठ करके, वेद वाक्य (पवित्र ध्वनियाँ / भजन) हमेशा नए ब्रह्मा की कल्पना करने पर केंद्रित होते हैं, जो आपके प्रत्येक गुण की सीमा को देखने की इच्छा रखते हैं, और जो अभी तक प्रारंभिक चरण से आगे नहीं बढ़े सके हैं।

श्लोक 20 –

श्रीआळवन्दार स्वामीजी अब उन भक्तों की महानता की व्याख्या करते हैं जो पहले बताए गए भगवान के गुणों के भोक्ता हैं। वैकल्पिक व्याख्या – यदि उन भक्तों के लिए इतनी महानता है जिन्होंने भगवान से इतनी महानता प्राप्त की है जैसा कि ब्रह्म सूत्र 1.1.20 में कहा गया है “अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ” (श्रुति ब्रह्म के साथ जीवात्मा की आनंदमय एकता की व्याख्या करती है, जो आनंदमय है), यह स्पष्ट है कि भगवान की महानता को मापा नहीं जा सकता।

त्वदाश्रितानां जगदुद्भवस्थिति
प्रणाशसंसारविमोचनादया: |

भवन्ति लीला विदयश्च वैदिका:
त्वदीय गंभीर मनोनुसारिण: ||

आपके भक्तों के लिए (जैसे ब्रह्मा आदि) संसार की रचना करना, रक्षा करना, संहार करना, संसार (भौतिक क्षेत्र) को पार करने में सहायता करना आदि, सभी आपके लिए क्रीड़ा के समान हैं; वेद के नियम भी आपके भक्तों के गहन दिव्य हृदयों का पालन करते हैं।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/10/sthothra-rathnam-slokams-11-to-20-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

स्तोत्र रत्नम – श्लोक 1 – 10 – सरल व्याख्या

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

<<तनियन्

श्लोक 1

इस प्रथम श्लोक में श्री आळवन्दार् स्वामीजी, श्रीनाथमुनी स्वामीजी के ज्ञान और वैराग्य रूपी यथार्थ संपत्ति का वंदन करते है।  

नमो’चिंत्याद्भुधाक्लिष्ट ज्ञान वैराग्यराश्ये |
नाथाय मुनये’गाधभगवद् भक्तिसिंधवे ||

मैं श्रीनाथमुनि स्वामीजी को नमस्कार करता हूं, जो बुद्धि से परे अद्भुत ज्ञान और वैराग्य का संग्रह हैं, वह ज्ञान आर वैराग्य उन्हें (भगवान की कृपा से) सरलता से प्राप्त है, वह जो भगवान का ध्यान करते हैं और भगवान के प्रति असीम भक्ति के सागर हैं।

श्लोक 2 –

तस्मै नमो मधुजिधंग्री सरोज तत्व:
ज्ञानानुराग महिमातीशयांतसीम्ने |

नाथाय नाथमुनये’त्र परत्र चापि
नित्यं यदीय  चरणौ शरणं मदीयम् ||

इस श्लोक में, भगवान के अवतारों से संबंधित श्रीनाथमुनि स्वामीजी के ज्ञान आदि की परम महानता का वर्णन किया गया है। वैकल्पिक रूप से, यह समझातें हैं कि “उनका ज्ञान आदि (जो पिछले श्लोक में समझाया गया है) उसमें सीमित रहने के बजाय, मुझ (आळवन्दार्) तक बह रहा है”।

श्रीमान् श्रीनाथमुनि स्वामीजी को मेरा नमस्कार, जिनके दिव्य चरण हमेशा इस दुनिया में और दूसरी दुनिया में भी मेरी शरण हैं, जो सच्चे ज्ञान और मधु नामक राक्षस का वध करने वाले, श्रीभगवान के दिव्य चरणकमलों में भक्ति के शिखर हैं, और जो [मेरे] नाथ/ स्वामी है।

श्लोक 3 – 

जैसे प्यासे की प्यास अधिक से अधिक पानी पीने से नहीं बुझती, वैसे ही श्रीआळवन्दार् कह रहे है कि “मैं उनका दास हूं, बारंबार”।

भूयो  नमो’परिमिथाच्युत भक्ति तत्त्व
नामृताबद्धि परिवाह शुभैर्वचोभि: |

लोके’वतीर्ण परमार्थ समग्र भक्ति-
योगाया नाथमुनये यमिनाम् वराय ||

श्रीनाथमुनि स्वामीजी को फिर से मेरा नमस्कार, जिन्होने सच्चे ज्ञान और भगवान के प्रति असीमित भक्ति के सागर से बहते हुए शुभ शब्दों के रूप में इस संसार में अवतार लिया है, जिनका अवतार हमारे लिए परम कृपा/उपकार है, जो पूर्ण है, जिनमें भक्ति योग है और जो योगियों में सबसे श्रेष्ठ है।

श्लोक 4

इस श्लोक में, श्रीआळवन्दार्, श्री पराशर भगवान को श्रीविष्णु पुराण के रूप में उनके योगदान के कारण प्रणाम करते हैं।

तत्वेन यश्चिदचिदीश्वर तत्स्वभाव:
भोगापवर्ग तधुपायगतीरुधार: |

संदर्शयन् निरमिमीत पुराणरत्नम
तस्मै नमो मुनिवराय पराशराय
||

उन उदार श्रीपराशर ऋषि को मेरा नमस्कार, जो ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ हैं, जिन्होंने दयापूर्वक श्रीविष्णु पुराण, जो पुराणों में मणि (सर्वोत्तम) समान है, हमें प्रदान किया , जो स्पष्ट रूप से तीन तत्वों, अर्थात्, चित, अचित और ईश्वर (तत्व त्रय) की व्याख्या करता है, जैसे वे हैं ,उन तत्वो के गुण, सुख (इस भौतिक क्षेत्र के), मोक्ष (मुक्ति), इस भौतिक जगत में सुख के साधन और इस क्षेत्र से मुक्ति, और जो लक्ष्य जीवात्माओं द्वारा प्राप्त किया गया है।

श्लोक 5

श्रीआळवन्दार्, श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य चरणों में प्रणाम करते है और शरणागति करते है।

माता पिता  युवतयस्तनया  विभूति:
सर्वं यदेव नियमेन मदन्वयानाम् |

आध्यस्य न: कुलपतेर्वकुलाभिरामं 
श्रीमत् तदंघ्रियुगलम् प्रणमामि मुर्धना ||

श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य चरण हमेशा [मेरे और] मेरे वंशजों के लिए माता, पिता, स्त्री [पति/पत्नी], बच्चे, महान-धन और बाकी वह सब कुछ हैं, जो यहां वर्णित नहीं है। मैं ऐसे आळ्वार के दिव्य चरणों में शीष झुकाकर नमन करता हूं, जो हमारे [वैष्णव] वंश के अग्रणी और मुखिया हैं, जो मजीझा के फूलों से सुशोभित हैं और जिनके पास श्रीवैष्णवश्री (कैंकर्य का धन) है।

श्लोक 6 – 

जैसा कि तिरुवाइयमौळी 7.9.7 में कहा गया है “वैगुन्तनागप् पुगळ” (आळ्वार  भगवान की कृपा से  उनकी स्तुति श्रीवैकुण्ठ के स्वामी के रूप में करते है)। क्योंकि भागवतों द्वारा की गयी स्तुति भगवान को प्रिय है, और भगवान का गुणगान करना आचार्यों को भी प्रिय है, तो भगवान की प्रशंसा करने के आशय से, संक्षेप में उपाय (साधन) और उपेय (लक्ष्य) की व्याख्या करते हुए, भगवान की स्तुति करने लगते हैं।

यन्मूर्ध्नि मे श्रुतिशिरस्सु च भाति यस्मिन्
अस्मन् मनोरथपथस् सकलस्समेति ।

स्तोश्यामि नः कुलधनम् कुलदैवतम् तत्
पादारविन्दम् अरविन्दविलोचनस्य ॥

मैं ,श्रीपुण्डरीकाक्ष  के दिव्य चरणकमलों की स्तुति करने जा रहा हूँ, जो हमारे कुल के धन हैं और हमारे कुल के (भरोसेमंद) आराध्य हैं, जिनके दिव्य चरणों में हमारा सारा प्रेम पहुँचता है, जिनके दिव्य चरण मेरे शीष पर है और वेदांत में भी है।

श्लोक 7

श्री भगवत गीता 1.47 में कहा गया है कि “विसृज्य सशरं चापं ” (बाणों के साथ धनुष को गिरा दिया) अर्थात अर्जुन ने युद्ध के लिए निकलने के बाद युद्ध का त्याग कर दिया, उसी प्रकार श्रीआळवन्दार् भी प्रयास से पीछे हट गए।

तत्वेन यस्य महिमार्णवशीकराणुः
शक्यो न मातुमपि शर्वपितामहाद्यैः ।

कर्तुम् तदीयमहिमस्तुतिमुद्यताय
मह्यम् नमो’स्तु कवये निरपत्रपाय ॥

भगवान की महानता के सागर की एक बूंद में व्याप्त एक छोटे से परमाणु को भी सही मायने में मापना शिव, ब्रह्मा आदि के लिए भी असंभव है। मैं, निर्लज्जतापूर्ण कवि होने का दावा करते हुए जो ऐसे भगवान की महानता का गुणगान करने [गाने] के लिए निकला हूँ, इसके लिए मुझे [इस हँसने योग्य प्रयास के लिए] स्वयं का अभिवादन करना चाहिए।

श्लोक 8

जैसे भगवान ने युद्ध से पीछे हट गये अर्जुन को प्रेरित किया, जिस पर अर्जुन ने श्रीभगवत गीता 18.73 में कहा “करिष्ये वचनं तव ” (जैसा आपने कहा था, मैं लड़ूंगा), उसी प्रकार यहाँ, भगवान श्रीआळवन्दार् को प्रेरित करते है और कहते है कि “मुख केवल भगवान की स्तुति करने के लिए उपस्थित है; जैसा कि श्रीविष्णु सहस्रनाम में कहा गया है ‘स्तव्य: स्तवप्रिय:’ (भगवान प्रशंसनीय है और उन्हें प्रशंसा पसंद है), प्रशंसा के लिए मुझे प्रिय है”। यह सुनकर, श्रीआळवन्दार् आश्वस्त हो जाते हैं [भगवान की स्तुति करने के लिए]।

यद्वा श्रमावधि यथामथि वाप्यशक्तः
स्तौम्येवमेव खलु ते’पि सदा स्तुवन्तः ।

वेदाश्चतुर्मुख मुखाश्च महार्णवान्तः
को मज्जतोरणुकुलाचलयोर्विशेषः ॥

या, मैं जो असमर्थ हूं, भगवान की  प्रशंसा तब तक करूंगा जब तक मैं  थक न जाऊँ अथवा जितना मैं जानता हूं; इस प्रकार सदा स्तुति करने वाले वेद, और चतुर्मुख ब्रह्मा आदि, जो स्तुति कर रहे हैं; तब एक (छोटे) परमाणु और एक (बड़े) पर्वत में क्या अंतर है, जो एक विशाल महासागर के अंदर डूबा हुआ है?

श्लोक 9

अब, श्रीआळवन्दार् कहते हैं कि वे ब्रह्मा आदि की तुलना में भगवान की स्तुति के लिए अधिक योग्य हैं।

किञ्चैष शक्त्यतिशयोन न ते’नुकम्प्यः
स्तोतापि तु स्तुति कृतेन परिश्रमेण ।

तत्र श्रमस्तु सुलभो मम मन्दबुद्देः
इत्युद्यमो’यमुचितो मम चाप्जनेत्र ॥

इसके अलावा, मैं आपकी प्रशंसा करने की अपनी क्षमताओं के कारण आप के द्वारा कृपा करने के योग्य नहीं हूं; परन्तु मैं इस विधि आपकी कृपा के योग्य हूँ क्योंकि आपकी स्तुति करते हुए मैं थक गया हूँ; थकान अर्थात अत्यंत कम बुद्धि होने के कारण मैं आसानी से थक जाऊँगा; इस प्रकार, यह प्रयास [आपकी स्तुति करने का] केवल मेरे लिए [ब्रह्मा वगैरह की तुलना में] उपयुक्त है।

श्लोक 10

भगवान के गुणगान से पीछे हटने और पुनः उनके गुणगान करने के लिए आश्वस्त होने के बाद, श्रीआळवन्दार् भगवान के परत्वम (सर्वोच्चता) की व्याख्या करते है, और बाद के पांच श्लोकों में शरणागति को दर्शाते है। इस पहले श्लोक (पांचों में से) में, श्रीआळवन्दार् दयापूर्वक “कारण वाक्य” (शास्त्र के वे अंश, जो भगवान ही आधारभूत है, इस बात की चर्चा करते हैं) के माध्यम से भगवान की सर्वोच्चता की व्याख्या करते हैं।

नावेक्षसे यदि ततो भुवनान्यमूनि
नालं प्रभो ! भवितुमेव कुतः प्रव्रुत्तिः

एवं निसर्ग सुह्रुदि त्वयि सर्वजन्तोः
स्वामिन् न चित्रम् इदं  आश्रित वत्सलत्वम् ॥

हे भगवान! यदि (आप) ने सम्पूर्ण जलप्रलय के बाद अपनी दया दृष्टि नहीं की होती, तो ये संसार नहीं बनते; यह स्पष्ट है कि कोई भी कार्य नहीं हुआ होता [यदि दुनिया को शुरू करने के लिए नहीं बनाया गया होता]। हे प्रभो! इस प्रकार, जब आप सभी प्राणियों के स्वाभाविक मित्र हैं, तो अपने भक्तों के प्रति मातृ स्नेह प्रकट करने के इस गुण को देखना असामान्य नहीं है।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/10/sthothra-rathnam-slokams-1-10-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 101 से 108

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 91 से 100 

http://divyaprabandham.koyil.org/wp-content/uploads/2015/07/emperumAnAr_ThirumEniyil_pUrvacharyargaL-Large.jpg

पाशुर १०१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं श्रीरामानुज स्वामीजी की मिठास उनके पवित्रता से भी उच्च हैं। 

मयक्कुम् इरु विनै वल्लियिल् पूण्डु मदि मयन्गित्
तुयक्कुम् पिऱवियिल् तोन्ऱिय एन्नै तुयर् अगऱ्ऱि
उयक्कोण्डु नल्गुम् इरामानुस एन्ऱदु उन्नै उन्नि
नयक्कुम् अवर्क्कु इदु इळुक्कु एन्बर् नल्लवर् एन्ऱु नैन्दे

अब मैं आपकी यह स्तुति कर रहा हूं कि “अज्ञानप्रद पुण्यपाप नामक दो प्रकारके कर्म रूपी बेडीमें फंसाकर, (उससे) विवेक को नाशकर भ्रम पैदा करनेवाले संसार में जन्म लेनेवाले मेरे दुःख दूरकर, कृपया मेरा उद्धार करनेवाले हे श्रीरामानुज स्वामिन्।” परंतु सत्पुरुष कहते हैं कि यों स्तुति करना, प्रेमपूर्वक आपका ही नित्यध्यान करनेवाले द्रुतहृदयों के लिए अनुचित है। श्रीरामानुज स्वामीजी के पावनत्व व भोग्यत्व नामक दो धर्म होते हैं। पावनत्व माने भक्तों के पाप मिटाकर उनको पवित्र बनाना, और भोग्यत्व माने नित्य अनुभव करने योग्य मधुर रहना। रसिक लोगों का यह मंतव्य है कि इन दोनों में पावनात्व की अपेक्षा भोग्यत्व का अनुसंधान करना ही श्रेष्ठ है। क्योंकि पावनत्व का अनुसंधान करने वाला कुछ स्वार्थका ख्याल करता है, अर्थात् अपने पाप मिटाने की इच्छा करता है; भोग्यत्व के अनुसंधान में यह स्वार्थभावना नहीं रहती। अतः हाल में अमुदनार कह रहे हैं कि मैंने श्रीस्वामीजी के पावनत्व का ही जो बहुत अनुसंधान किया यह कुछ अनुचित- सा लगेगा। इसका यह तात्पर्य नहीं कि पावनत्व का अनुसंधान सर्वथा अनुचित है। क्योंकि श्रीस्वामीजी के सभी गुणों का चिन्तन करना आवश्यक है ही। और गुरुजी ने जो हमारे पापों को समूल मिटा दिया, उसका अनुसंधान नहीं करने पर हम कृतघ्न भी बनेंगे। अतः एक दृष्टि से यह काम करना पड़ता है और दूसरी दृष्टि से इस पर जोर डालना कुछ अनुचित सा प्रतीत होता है।

पाशुर १०२: श्रीरंगामृत स्वामीजी स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी से उनके उदार गुण का कारण पूछते हैं ताकि वें इस संसार में उनके ओर बढ़ सके।

नैयुम् मनम् उन् गुणन्गळै उन्नि एन् ना इरुन्दु एम्
ऐयन् इरामानुसन् एन्ऱु अळैक्कुम् अरु विनैयेन्
कैयुम् तोळुम् कण् करुदिडुम् काणक् कडल् पुडै सूळ्
वैयम् इदनिल् उन् वण्मै एन् पाल् एन् वळर्न्ददुवे

(हे गुरुजी!) मेरा मन आपके गुणों का ही ध्यान करता हुआ पिघल जा रहा है; मेरी वाणी सुदृढ़ अध्यवसाय के साथ यों पुकार रही है कि, “हे हमारे नाथ श्री रामानुज स्वामिन् !” मुझ महापापी के हाथ भी (आपके लिए) अंजलि कर रहे हैं; आँख(आपके) दर्शन पाना चाहती हैं । समुद्र-परिवृत इस विशाल पृथ्वीतल पर मुझ पर ही आपकी दया जो इस प्रकार फैल रही है, इसका कारण क्या होगा ?

पाशुर १०३: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि उनकी इंद्रीया श्रीरामानुज स्वामीजी की ओर शामिल हो गई क्योंकि वें बड़ी कृपा से अपने कर्मों से मुक्त हो गये और उन्होंने उन्हें बहुर अमूल्य ज्ञान प्रदान किया।

वळर्न्द वेम् कोबम् मडन्गल् ओन्ऱाय् अन्ऱु वाळ् अवुणन्
किळर्न्द पोन् आगम् किळित्तवन् कीर्त्तिप् पयिर् एळुन्दु
विळैन्दिडुम् सिन्दै इरामानुसन् एन्दन् मेय् विनै नोय्
कळैन्दु नल् ज्ञानम् अळित्तनन् कैयिल् कनि एन्नवे

पूर्वकाल में कठोर कोपवाले एक नरसिंगरूप को धारण कर, खङ्गधारी (हिरण्य) असुर का मत्त व दृढ़ वक्ष चीर डालने वाले भगवान का दिव्य यशरूपी सत्य जिसमें खूब उत्पन्न होता है, ऐसे (सुक्षेत्र) मनवाले श्रीरामानुज स्वामीजीने, मेरे शरीर में व्याप्त समस्त पाप मिटा कर, मुझ करतलामलक की तरह अतिस्पष्ट ज्ञान को भी प्रदान किया। श्रीरामानुज स्वामीजी के मनरूपी अच्छे क्षेत्र में भगवान के दिव्ययशरूपी सस्य खूब उपजते हैं; कहनेका यह तात्पर्य है कि श्री स्वामीजी के मन में सदा भगवान के दिव्य यश के सिवा दूसरी किसी वस्तु की चिंता नहीं रहती। ऐसे उन्होने अमुदनार के समस्त पाप मिटाकर उन्हें अतिविशद ज्ञान को प्रदान किया।

पाशुर १०४:  श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा हीं एक काल्पनिक प्रश्न का उत्तर देते हुए “अगर आप भगवान को देखेंगे तो क्या करेंगे?” श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि अगर भगवान स्वयं के विषय में भी प्रगट होते हैं तो भी वें कहते हैं कि वें श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुणों को छोड़ और कुछ नहीं मांगेंगे जो उनके दिव्य स्वरूप में दीप्तिमान हैं।

कैयिल् कनि अन्न कण्णनैक् काट्टित् तरिलुम् उन्दन्
मेय्यिल् पिऱन्गिय सीर् अन्ऱि वेण्डिलन् यान् निरयत्
तोय्यिल् किडक्किलुम् सोदि विण् सेरिलुम् इव्वरुळ् नी
सेय्यिल् तरिप्पन् इरामानुस एन् सेळुम् कोण्डले

(औदार्य के विषय में) विलक्षण मेघ के समान विराजमान हे श्रीरामानुज स्वामिन्! यदि आप मुझे साक्षात् भगवान के ही हस्तामलक की भांति अतिविशद दर्शन करा दें, तो भी मैं (उनकी परवाह न करता हुआ) आपके दिव्यमंगलविग्रह के (सौन्दर्यादि) शुभगुणों के सिवा दूसरी किसी वस्तू पर अपनी नजर नहीं डालूंगा; मैं बेशक संसाररूपी इस नरक में ही पड़ा रहूंगा; अथवा ज्योतिर्मय परमधाम पहुँचूंगा, इसकी चिंता नहीं। परंतु आप यही कृपा करें (कि मैं उक्त प्रकार आपके श्रीविग्रह के ही दर्शन करता रहूं); यह कृपा पाकर ही मैं (संसार में ही अथवा मोक्षमें हो) शांति पा सकूंगा।

पाशुर १०५: जबकी सभी जन कहते हैं संसार को छोड़ना हैं और परमपद को प्राप्त करना हैं और उस परमपद को पाने की इच्छा के लिए दोनों को समान समझना चाहिए। आपका इच्छुक स्थान कौनसा हैं? वें इस पाशुर के जरिए बताते हैं।

सेळुम् तिरैप् पाऱ्कडल् कण् तुयिल् मायन् तिरुवडिक्कीळ्
विळुन्दिरुप्पार् नेन्जिल् मेवु नल् ज्ञानि नल् वेदियर्गळ्
तोळुम् तिरुप् पादन् इरामानुसनैत् तोळुम् पेरियोर्
एळुन्दु इरैत्तु आडुम् इडम् अडियेनुक्कु इरुप्पिडमे

सुंदर लहरों से समावृत क्षीरसागर में शयन करनेवाले अत्याश्चर्यचेष्टित भगवान के श्री पादों के आश्रय में रहनेवाले महात्माओं के हृदय में नित्यनिवास करनेवाले, श्रेष्ठ ज्ञानियों तथा परमवैदिकों से प्रणम्य श्रीपादवाले श्री रामानुज स्वामीजी के भक्त महात्मा लोग जिस स्थल में, आनंद के मारे उठकर नाचते, कूदते और कोलाहल मचाते हुए निवास करते हैं, वही स्थान मेरा भी निवासस्थान होगा। कितने ही महात्मा लोग क्षीराब्धिनाथ भगवान के भक्त होते हुए भी, उनकी उपेक्षा कर, श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीपादों का निरंतर ध्यान करते हैं, और उस आनंद से मस्त होकर नाचते कूदते और कोलाहल मचाते रहते हैं। ऐसे महात्मा श्रीरामानुज-भक्त लोग जहा विराजते हैं, मैं भी वहीं निवास करना चाहता हूं।

पाशुर १०६: श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगामृत स्वामीजी का उनके प्रति स्नेह को देखकर बड़ी कृपा से श्रीरंगामृत स्वामीजी के मन की इच्छा करते हैं। यह देखकर श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्नता से और शुक्र से यह पाशुर का पाठ करते हैं। 

इरुप्पिडम् वैगुन्दम् वेन्गडम् मालिरुन्जोलै एन्नुम्
पोरुप्पिडम् मायनक्कु एन्बर् नल्लोर् अवै तम्मोडुम् वन्दु
इरुप्पिडम् मायन् इरामानुसन् मनत्तु इन्ऱु अवन् वन्दु
इरुप्पिडम् एन्दन् इदयत्तुळ्ळे तनक्कु इन्बुऱवे

साधु पुरुष कहते हैं कि अत्याश्चर्य दिव्य चेष्टितवाले भगवान जिनके अद्भुत गतिविधियों के वासस्थान, श्रीवैकुंठ धाम, श्रीवेंकटाचल और श्रीवनगिरी (तिरुमालिरुन्जोलै) नामक पर्वत हैं; ऐसे भगवान उक्त समस्त स्थानों के साथ पधारकर श्रीरामानुज स्वामीजी के हृदय में निवास करते हैं; एवं वे गुरुजी हाल में यहां पधार कर मेरे हृदय में सानंद विराज रहे हैं।

पाशुर १०७:  श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य मुखारविंद को देखकर जिन्होंने श्रीरंगामृत स्वामीजी के प्रति स्नेह प्रगट किया हैं, श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कुछ हैं जो वें उन्हें प्रदान करना चाहते हैं और अपनी इच्छा को प्रगट करते हैं।

इन्बुऱ्ऱ सीलत्तु इरामानुस एन्ऱुम् एव्विडत्तुम्
एन्बुऱ्ऱ नोय् उडल् तोऱुम् पिऱन्दु इऱन्दु एण् अरिय
तुन्बुऱ्ऱु वीयिनुम् सोल्लुवदु ओन्ऱु उण्डु उन् तोण्डर्गट्के
अन्बुऱ्ऱु इरुक्कुम्बडि एन्नै आक्कि अन्गु आट्पडुत्ते

हे आनंदपूर्ण व सौशील्यगुणविभूषित श्रीरामानुज स्वामिन्। आपसे मेरी यह एक विनती है कि, हड्डी में घुसकर दुःख देने वाले रोगों के आस्पद अनेक शरीरों में जन्म लेना, फिर मरना, इस प्रकार अनंत दुःख पाते रहने पर भी, मुझे सर्वदेशों व सर्वकालों में आप अपने भक्तों का ही भक्त बनाकर उन्हीकी सेवा में लगा दीजिए, यही मेरी प्रार्थना है। (मैं जन्म व्याधि जरा मरण रूप अनंत दुःखपूर्ण इस संसार से डरता हुआ, इससे मुक्ति नहीं माँगूंगा। यह कैसा भी हो, इसकी चिंता नहीं; किंतु मैं आपके भक्तों का ही भक्त और नित्यसेवक हो जाऊं, यह एक ही मेरी प्रार्थना है।)

पाशुर १०८:  इस प्रबन्ध के प्रारम्भ में श्रीरंगामृत स्वामीजी ने “रामानुजन् चरणारविन्दम् नाम्मन्निवाळ नेञ्जे” के लाभ की प्रार्थना किए हैं (हमें श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों में उपयुक्त होकर रहना चाहिए), श्रीमहालक्ष्मीजी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी इच्छा पूर्ण करने की पुरूषकार करे। अंतिम पाशुर में भी वें श्रीमहालक्ष्मीजी को पाने को पूछते हैं जो हमें कैंकर्य रूपी धन प्रदान करेंगे।

म् कयल् पाय् वयल् तेन्नरन्गन् अणि आगम् मन्नुम्
पन्गय मामलर्प् पावयैप् पोऱ्ऱुदुम् पत्ति एल्लाम्
तन्गियदु एन्नत् तळैत्तु नेन्जे नम् तलै मिसैये
पोन्गिय कीर्त्ति इरामानुसन् अडिप् पू मन्नवे

हे मन! मानों सारी भक्ति हमारें यहां ही स्थिर प्रतिष्ठित हुई होगी, ऐसा विलक्षण भाग्य पाने के लिए, और विशाल यशवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणारविन्दों को अपने शिरोभूषण के रूप में नित्य धारण करने के लिए, सुंदर मिनभरित खेतों से परिवृत श्रीरंगक्षेत्र में विराजमान भगवान के अतिमनोहर श्रीवक्ष में नित्यनिवास करनेवाली, श्रेष्ठ कमल पुष्प में अवतीर्ण, प्रतिमासदृश सुंदरी श्री महालक्ष्मीजी की हम स्तुति करेंगे। इस प्रार्थना के साथ यह दिव्यप्रबन्ध समाप्त किया गया। इसके आदि तथा अंत में श्री महालक्ष्मीजी का नामस्मरण मंगलार्थ किया गया है। इसमें कविनामांकन और फलश्रुति नहीं हैं। इसका गान स्वयंपुरुषार्थ है; अतः इसके लिए दूसरा फल ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। और अत्यंत विनयपूर्ण होने से अमुदनार ने इसमें अपना नाम नहीं बताया।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-101-108-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 91 से 100

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 81 से 90 

पाशुर ९१: हालांकि संसारी जन भागीदारी नहीं थे श्रीरंगामृत स्वामीजी यह स्मरण कराते हैं कि कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें इस संसार से ऊपर उठाया और उनकी प्रशंसा किये।

मरुळ् सुरन्दु आगम वादियर् कूऱुम् अवप् पोरुळाम्
इरुळ् सुरन्दु एय्त्त उलगु इरुळ् नीन्गत् तन् ईण्डिय सीर्
अरुळ् सुरन्दु एल्ला उयिर्गट्कुम् नादन् अरन्गन् एन्नुम्
पोरुळ् सुरन्दान् एम् इरामानुसन् मिक्क पुण्णियने

विवेकशून्य शुष्कतर्कानुसारी शैवागमियों से प्रतिपादित शिवपारम्यरूप अपार्थ से मोहित अज्ञानसमावृत, अज्ञान मिटानेवाले, इस भूमंडल में अवतार लेकर, इस परमार्थ को प्रकाशित करते हुए कि, “भगवान श्रीरंगनाथ ही सकल जगत के स्वामी हैं”, परमदयालु श्री रामानुजस्वामीजी परमधार्मिक हैं।

पाशुर ९२:  जब यह अहसास हुआ कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें बिना कोई कारण से स्वीकार कर लिया हैं और उनके आंतरीक और बाह्य इंद्रीयों पर कृपा किये हैं, वें प्रसन्न होकर श्रीरामानुज स्वामीजी से पूछते हैं कि इसका क्या कारण हैं।

पुण्णियनोन्बु पुरिन्दुम् इलेन् अडि पोऱ्ऱि सेय्युम्
नुण् अरुम् केळ्वि नुवन्ऱुम् इलेन् सेम्मै नूल् पुलवर्क्कु
एण् अरुम् कीर्त्ति इरामानुस इन्ऱु नी पुगुन्दु एन्
कण्णुळ्ळुम् नेन्जुळ्ळुम् निन्ऱ इक्कारणम् कट्टुरैये

हे सकलशास्त्रवेत्ता कवियों के भी नापने की अशक्य दिव्य कीर्तिवाले श्रीरामानुज स्वामिन्! मैंने किसी पवित्र व्रतका अनुष्ठान नहीं किया; और आपके पादारविन्दों की स्तुति करने में अपेक्षित सूक्ष्म व श्रेष्ठ अर्थ सुने भी नहीं। तो भी आप मेरे नेत्र व हॄदय में प्रवेश कर जो विराजमान हैं, इसका कारण बता दीजिए। और क्या? आपकी निर्हेतुक कृपा ही इसका कारण हैं।

 पाशुर ९३:  हालांकि श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें कुछ नहीं कहते हैं परन्तु श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह स्पष्ट हो जाता हैं कि जैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने बिना किसी के कहे कुदृष्टि तत्त्वों का नाश किये हैं वैसे ही श्रीरंगामृत स्वामीजी के कहे बिना उनके कर्म अनुसार किया और कहे कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने कृपा कर यह किया हैं।

कट्टप् पोरुळै मऱैप्पोरुळ् एन्ऱु कयवर् सोल्लुम्
पेट्टैक् केडुक्कुम् पिरान् अल्लने एन् पेरु विनैयैक्
किट्टिक् किळन्गोडु तन् अरुळ् एन्नुम् ओळ् वाळ् उरुवि
वेट्टिक् कळैन्द इरामानुसन् एन्नुम् मेय्त् तवने

मेरे पास पधारकर अपनी कृपारूपी सुंदर खड्ग को मियान से निकाल कर, उससे मेरे घोर पापों को जड़ से उखाड़ देनेवाले महातपस्वी श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदों के अपार्थ करनेवाले कुदृष्टियों के दुर्वाद दूर किये।

पाशुर ९४:  श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं हालांकि श्रीरामानुज स्वामीजी बड़ी कृपा से शरणागति से श्रीवैकुण्ठ तक उन सभी को लाभ देंगे, जो उनके शरण हुए हैं, परन्तु श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुणों को छोड़ और किसी का भी अनुभव नहीं करना चाहते हैं।

तवम् तरुम् सेल्वुम् तगवुम् तरुम् सरियाप् पिऱविप्
पवम् तरुम् तीविनै पाऱ्ऱीत् तरुम् परन्दामम् एन्नुम्
तिवम् तरुम् तीदिल् इरामानुसन् तन्नैच् चार्न्दवर्गट्कु
उवन्दु अरुन्देन् अवन् सीर् अन्ऱि यान् ओन्ऱुम् उळ् मगिळ्न्दे

किसी प्रकार के दोष से विरहित श्रीरामानुज स्वामीजी अपने आश्रितों को शरणागति नामक तपस्या देते हैं; भक्तिसंपद देते हैं; अपनी कृपा भी देते हैं; मिटाने के अशक्य जन्म परम्परा के हेतु भूत उनके पाप मिटा देते हैं; और परमधाम नामक दिव्यस्थान (श्रीवैकुंठ) भी देते हैं। अतः मैं उनके कल्याणगुणों के सिवा दूसरी किसी वस्तु का सप्रेम अनुभव नहीं करूंगा।

पाशुर ९५: श्रीरामानुज स्वामीजी के ज्ञान, शक्ति, आदि बारें सोचते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी बड़ी करुणा से कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी इस संसार से नहीं हैं बल्कि नित्यसूरी है जिनका इस संसार से कोई सम्बन्ध नहीं हैं, परन्तु इस संसार में अवतार लिया हैं।

उळ् निन्ऱु उयिर्गळुक्कु उऱ्ऱनवे सेय्दु अवर्क्कु उयवे
पण्णुम् परनुम् परिविलनाम्बडि पल् उयिर्क्कुम्
विण्णिन् तलै निन्ऱु वीडु अळिप्पान् एम् इरामानुसन्
मण्णिन् तलत्तु उदित्तु उय्मऱै नालुम् वळर्त्तनने

समस्त आत्माओं को मोक्षप्रदान करने के लिए श्रीवैकुंठ से भूतल पर अवतार लेकर श्री रामानुज स्वामीजी ने इस प्रकार सबके उज्जीवनहेतु चारों वेदों का पोषण किया, जिसे देख कर कहना पड़ता है कि समस्त आत्माओं के अंतर्यामी रह कर, सदा उनके उद्धार के ही प्रयत्न करनेवाले भगवान की कृपा भी (श्री स्वामीजी की कृपा की अपेक्षा) कम है।

पाशुर ९६: श्रीरामानुज स्वामीजी ने कृपा कर वेदान्त के अनुसार दो राह दिखाये हैं एक भक्ति और दूसरी प्रपत्ती। इन दोनों में क्या प्रपत्ती हीं सरल हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी के स्नेह में शरण ली हैं। 

वळरुम् पिणि कोण्ड वल्विनैयाल् मिक्क नल्विनैयिल्
किळरुम् तुणिवु किडैत्तऱियादु मुडैत्तलै ऊन्
तळरुम् अळवुम् तरित्तुम् विळुन्दुम् तनि तिरिवेऱ्कु
उळर् एम् इऱैवर् इरामानुसन् तन्नै उऱ्ऱवरे

अत्यधिक दुःख देनेवाले पापों के निमित्त, शरणागति नामक श्रेष्ठधर्म के आवश्यक दृढविश्वास से विरहित होकर, फलतया दुर्गंध युक्त शरीर छूटने तक नानाविध क्षुद्र सुखदुख भोगते हुए इसी में असहाय पडे रहनेवाले मेरे लिए श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्त ही स्वामी होते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी से उपदिष्ट भक्ति या प्रपत्ति में मेरा कोई संबंध नहीं; मैं संसार में ही पडा रहा हूँ ; तथापि मैं उनके पादभक्तों का कृपापात्र हूँ और इसीसे मेरा उद्धार होगा।

पाशुर ९७: क्या कारण हैं कि न केवल श्रीरामानुज स्वामीजी परन्तु उनके शिष्य के भी हम इच्छुक हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं यह केवल श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा के कारण हुआ हैं।

 तन्नै उऱ्ऱु आट्चेय्युम् तन्मैयिनोर् मन्नु तामरैत्ताळ्
तन्नै उऱ्ऱु आट्चेय्य एन्नै उऱ्ऱान् इन्ऱु तन् तगवाल्
तन्नै उऱ्ऱार् अन्ऱित् तन्मै उऱ्ऱार् इल्लै एन्ऱु अरिन्दु
तन्नै उऱ्ऱारै इरामानुसन् गुणम् साऱ्ऱिडुमे

“मेरे भक्त तो मिलते हैं, परंतु उन भक्तों के गुणकीर्तन करने के स्वभाववाले मिलते नहीं”; यों विचार करते हुए श्रीरामानुज स्वामीजी ने आज अपनी विशेष कृपा से मुझे, अपना (श्री स्वामीजी का) आश्रय लेकर सेवा करने के स्वभाववाले (अर्थात् अपने भक्तों के) सुंदर उभय पादारविन्दों का सेवक बना दिया। जैसे भगवद्भक्ति की अपेक्षा भगवद्भक्तभक्ति (अथवा आचार्यभक्ति) श्रेष्ठ मानी जाती है, ठीक इसी प्रकार उस आचार्यभक्ति से भी बढ़कर आचार्यभक्तभक्ति श्रेष्ठ है। अब श्रीरामानुज स्वामीजी ने सोचा कि, “सभी लोग मेरे भक्त बनना चाहते हैं; कोई मेरे भक्तों का भक्त बनता नहीं। इस अमुदानार को यह भाग्य दूं ।” अतः उन्होंने परमकृपा से मुझे (अमुदानार को) अपने भक्त श्री कूरेशस्वामीजी का भक्त बना दिया ।

पाशुर ९८: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने दिव्य मन में यह कल्पना करते हैं कि भगवान उन्हें उनके कर्मानुसार स्वर्ग या नरक में भेजेंगे और श्रीरामानुज स्वामीजी से पूछते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें यह आश्वासन देते हैं कि भगवान ऐसे नहीं करेंगे जो उनके शरण हुए हैं और उन्हें कहते हैं कि इस बात से परेशान मत होईए। 

इडुमे इनिय सुवर्क्कत्तिल् इन्नम् नरगिलिट्टुच्
चुडुमेअवऱ्ऱैत् तोडर् तरु तोल्लै सुज़्हल् पिऱप्पिल्
नडुमे इनि नम् इरामानुसन् नम्मै नम् वसत्ते
विडुमे सरणम् एन्ऱाल् मनमे नैयल् मेवुदऱ्के

हमारे यह अनुसंधान करने के बाद, कि “श्रीरामानुज स्वामीजी ही हमारे लिए गति हैं”, क्या वे हमें (अत्यल्प व नश्वर) सुखदायक स्वर्ग भेजेंगे ? अथवा नरक भेज कर दुःख भुगावेंगे ? अथवा उन स्वर्गनरकों के संबंधित अनादि जन्मचक्र में फ़सावेंगे ? अथवा अपने रास्ते पर छोड़कर उपेक्षा कर देंगे? कुछ नहीं। अतः हे मन। तुम अपने स्वरूपानुरूप पुरुषार्थ पाने के विषय में चिंता मत करो ।श्री रामानुज स्वामीजी की शरण में जाने मात्र से वे हमें स्वर्ग नरक व संसार रूप दुर्गति पाने से रोककर स्वरूपानुरूप सद्गति पहुंचा देंगे। अतः इस विषय में हमें चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहती।

 पाशुर ९९: क्योंकि हम इस संसार में रहते हैं जहाँ बाह्य और कुदृष्टि जन की संख्या अधिक हैं, क्या यहाँ हमें भूलने कि संभावना अधिक नहीं हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं ,श्रीरामानुज स्वामीजी के अवतार लेने के पश्चात इन जनों ने अपना आजीविका खो दिया। 

तऱ्कच् चमणरुम् साक्कियप् पेय्गळुम् ताळ् सडैयोन्
सोल् कऱ्ऱ सोम्बरुम् सूनिय वादरुम् नान्मऱैयुम्
निऱ्कक् कुऱुम्बु सेय् नीसरुम् माण्डनर् नीळ् निलत्ते
पोऱ्कऱ्पगम् एम् इरामानुस मुनि पोन्द पिन्ने

समणास जो बड़ी चालाकी से अपने तत्त्वों को बहस द्वारा आचारण किया, बौद्ध अपने तत्त्वों को चकमा देने के समान पकड़ते थे, शैव में तामस गुण है जिन्होंने शैवागमन सीखे, माध्यामिक जन सून्य सिद्धान्त का पालन करते थे, कुदृष्टि जन जो ऊपर कहे अनुसार नहीं रहते थे, वेदों का पालन करते थे परंतु उसका गलत अर्थ बताते थे ,यह सब , कल्पवृक्ष के समान उदार और हमे यह जन दिखाये ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी जब इस संसार मे अवतार लिए, नष्ट हो गए। (इस विशाल पृथ्वीतल पर श्रेष्ठ कल्पवृक्ष के सदृश परमोदार श्री रामानुज स्वामीजी का अवतार होने के बाद, शुष्कतर्क करने वाले क्षपणक, मूर्ख शाक्य, शैवागम के अभ्यासी राजस शैव, शून्यवादी और वेदों का अपार्थ करनेवाले, ये सभी नष्ट हो गये।)

 पाशुर १००: यह देखकर की उनके दिव्य मन श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों मे निरत हैं, श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी से कहते हैं कि उन्हें कुछ और दिखाकर भूलना नहीं। 

पोन्ददु एन् नेन्जु एन्नुम् पोन्वण्डु उनदु अडिप् पोदिल् ओण् सीर्
आम् तेळि तेन् उण्डु अमर्न्दिड वेण्डिल् निन् पाल् अदुवे
ईन्दिड वेण्डुम् इरामानुस इदु अन्ऱि ओन्ऱुम्
मान्द किल्लादु इनि मऱ्ऱु ओन्ऱु काट्टि मयक्किडले

हे रामानुज स्वामिन! मेरे मनोरूपी सुन्दर भ्रमर ने, आपके पादारविन्दों में मनोहर दिव्यगुणरूपी मधु पाता हुआ वहीं नित्यवास करने के उद्देश्य से उन्हें प्राप्त किया; अतः आप भी उसे उन गुणों को ही प्रदान कीजीएगा; वह दूसरे किसी पदार्थ को नहीं पाएगा; इस कारण से आप दूसरी किसी (सांसारिक)  वस्तु बताकर उसे भ्रम में मत डालें।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-91-100-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org