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आर्ति प्रबंधं – २५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २४

 

उपक्षेप

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि एक काल्पनिक प्रश्न उठाते हैं। उनका मानना हैं कि यह शायद श्री रामानुज के मन में होगा और इसका अब मणवाळ मामुनि, इस पासुरम में उत्तर देतें हैं। , श्री रामानुज, मणवाळ मामुनि से (काल्पनिक) प्रश्न करतें हैं , “ हे मणवाळ मामुनि! आपने अपने पापों के हिसाब न लेते हुए, कैंकर्य की प्रार्थना की हैं, इस विषय में, अब मैं क्या करूँ?कृपया उत्तर दीजिये।” मणवाळ मामुनि प्रस्ताव करते हैं , “हे! श्री रामानुज! आश्रय उपहार किये दिन से आज तक , आप मेरे पापो को सहते रहें। मेरे पास योग्यता न होने पर भी, आप  परमपद की आश्वासन दिए।  अब, और विलंब के बिना कृपया तुरंत मोक्ष उपहार कीजिये।”

पासुरम २५

एन्रु निरेतुगमाग एन्नै अभिमानित्तु
यानुम अदरिंदु उनक्केयायिरुक्कुम वगै सैदाई
अन्रू मुदल इन्रळवुम अनवरतम पिळैये
अडुतडुत्तु चेयवदु अनुतविप्पदु इनिच्चेय्येन
एन्रु उन्नै वंदु इरप्पदाम एन कोदूमैं कणडुम
इगळादे इरवुपगल अडिमै कोणडु पोंदाय
इन्रु तिरुनाडुम एनक्कु अरुळ एण्णुगिनराय
इनि कडूग चैदरुळवेणडुम एतिरासा !

शब्दार्थ

एतिरासा – हे ! एतिरासा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता !
एन्रु –  जिस दिन से
निरेतुगमाग – (जब आप ) बिना कारण के
एन्नै – मेरे प्रति यह सोच कर
अभिमानित्तु – कि “मैं (मणवाळ मामुनि) आपका हूँ”
यानुम  – मैं भी
अदरिंदु – समझकर
उनक्के – (और सेवा की ) केवल आपके प्रति
आयिरुक्कुम – (और मुझे बनाया ) केवल आपकी वस्तु
सैदाई – आपने यह किया, हैं न ?
वगै – (आपके प्रति) ऐसे (भाव होने केलिए )
अन्रू मुदल – उस दिन से
इन्रळवुम – अब तक
अनवरतम – (मैं) सदा
अडुतडुत्तु – लगातार
चेयवदु
कर रहा हूँ
पिळैये – केवल पाप
अनुतविप्पदु – और उन पापो केलिए  तुरंत  पछताता हूँ
इनि – आगे
चेय्येन एन्रु – (ये पाप) नहीं करनी चाहिए
उन्नै वंदु इरप्पदाम – और आपसे सहारा की प्रार्थना करता हूँ
एन कोडूमै कणडुम – आप, मेरे क्रूर पाप देखने पर भी
इगळादे – कभी अस्वीकार या द्वेष न करते हैं
अडिमै कोंडु पोंदाय – (बल्कि) आप के चरण कमलों के प्रति मेरे कैंकर्य स्वीकार करते हैं
इरवुपगल – दिन और रात
इन्रु – (और ) आज
एण्णुगिन्राय – आप विचार कर रहें हैं
अरुळ – आशीर्वाद करने
एनक्कु – मुझे
तिरुनाडुम – परमपद के सात
इनि कडुग – अतः, शीघ्र
चेयदु अरुळवेणडूम – यह उपहार करें

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से शीघ्र ही परमपद प्राप्ति उपहार करने की प्रार्थना करते हैं। वें कहते हैं कि “मणवाळ मामुनि मेरे हैं”, समझ कर जिस दिन श्री रामानुज आश्रय दिए, तब से , आज तक वे लगातार अनेक पाप करते रहें।  ये पाप करने के पश्चात तुरंत पछताने पर भी वें पाप करने से रूखे नहीं। लंबे समय से यही हो रहा है, किन्तु श्री रामानुज न ही उन पापो पर विचार किये न ही मणवाळ मामुनि के प्रति द्वेष बढ़ाये। मामुनि कहते हैं कि, बल्कि श्री रामानुज उन्को निश्चित रूप में अपने चरण कमलों के प्रति अविछिन्न कैंकर्य उपहार करते रहें। और आज परमपद उपहार करने पर भी विचार कर रहें हैं। मामुनि प्रश्न करतें हैं कि ऐसी स्थिति में विलंब क्यों ? और तुरंत आशीर्वाद करने केलिए प्रार्थना करते हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे ! यतियों के नेता ! “यह आत्मा मेरा हैं”, ऐसे विचार से आपने इस आत्मा पर कृपा किया हैं।  आपकी कृपा निर्हेतुक, बिना हेतु या कारण की हैं। इसकी मुझे जानकारी हैं और आपके कृपा या आशीर्वाद के कारण मैं केवल आपके उपयोग का वस्तु बना।  उस दिन से अब तक मैंने लगातार अविछिन्न रूप में पाप ही किये हैं।  उस्केलिये तुरंत पछतावे से आपसे ही सहारा की प्रार्थना करता हूँ।  मेरे इन पापो के कारण आपने मुझे अस्वीकार या मेरे प्रति द्वेष नहीं दिखाए।  बल्कि आपके चरण कमलों के प्रति अविछिन्न कैंकर्य की उपहार किये।  और इस से बढ़ कर, मुझे परमपद उपहार करने का भी सोचे, जिसकी मेरी योग्यता ही नहीं हैं।  यह निश्चय करने के पश्चात विलंब क्यों ? आप से ,शीघ्र ही आशीर्वाद करने की प्रार्थना करता हूँ।”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २३

paramapadham

उपक्षेप

साँसारिक संबंध के हटने से, अत्यंत सौभाग्य स्तिथि जो हैं ,परम श्रेयसी आचार्यो के मध्य पहुँचने तक के घटनाओँ की विवरण इस पासुरम में मणवाळ मामुनि प्रस्तुत करते हैं।   

पासुरम

इंद उडल विटटु इरविमंडलत्तूडु येगी
इव्वणडम कळित्तु इडैयिल आवरणमेळ पोय
अन्दमिल पाळ कडन्दु अळगार  विरसैतनिल कुळित्तु अंगु
अमानवनाल ओळि कोण्ड सोदियुम पेट्रु अमरर
वंदु एदिरकोणडु अलंकरित्तु वाळ्त्ति वळिनडत्त
वैकुंतम पुक्कु मणिमण्डपत्तु चेन्रु
नम तिरुमालडियारगळ कुळाङ्गळुडन
नाळ एनक्कु कुरुगुम वगै नल्गु एन एतिरासा

शब्दार्थ

एन एतिरासा – हे! एतिरासा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता !
नल्गु – कृपया आशीर्वाद करें
एनक्कु – मुझे
कुरुगुम वगै – कि आज से उस भाग्यवान दिन की अंतर शीघ्र कम हो
कूडुम नाळ – वही सौभाग्य दिन हैं जब मैं मिलूँगा,
नम तिरुमालडियारगळ – हमारे स्वामियां (जो स्वयं श्री:पति श्रीमन नारायण के दास हैं ) जो हैं नित्यसुरियाँ
कुळाङ्गळुडन – और उन्के गण में एक हों
इंद उडल – दोषों से भरे इस अनित्य शरीर
विटटु – के छूटने पर
इरविमंडलत्तूडु येगी – सूर्य मंडल को पार कर
कळित्तु – पार करता हैं
इव्वणडम – यह सँसार
इडैयिल – जो बीच में है
आवरणमेळ पोय – (इसके पश्चात ) सात सागरों को पार करता है
पाळ कडन्दु – “मूल प्रकृति” को पार कर
अन्दमिल – जिस्को असीमित कहा जाता है
अळगार – अंत में जो अति सुन्दर हैं, वहाँ पहुँचता है
विरसैतनिल – “व्रजा” नामक नदि
कुळित्तु – पुण्य स्नान करता है
अंगु – वहाँ
अमानवनाल – “अमानवन” के स्पर्श से उठता है
ओळि कोण्ड सोदियुम पेट्रु – और इससे परिणामित, तेजोमय दिव्य शरीर प्राप्त होता है
अमरर वंदु एदिरकोणडु – इसके पश्चात नित्यसुरियाँ आकर स्वागत करतें हैं
अलंकरित्तु – श्रृंगार करते हैं
वाळ्ति – गुणगान करतें हैं
वळिनडत्त – और मुझें (नए शरीर में ) लेकर जाते हैं
वैकुंतम पुक्कु – श्रीवैकुंटम के पथ में
मणिमण्डपत्तु चेन्रु – और “तिरुमामणि मंडप” नामक वेदी पहुँचता है

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, अब के और नित्यसुरियों के संग रहने के, बीच के समय के अंतर को शीघ्र कम करने की प्रार्थना करते हैं। शरीर के घिरने के पश्चात, आने वाली यात्रा की विवरण कि यहाँ प्रस्ताव करते हैं। जीवात्मा, सूर्य मंडल, अण्ड, सात सागर जैसे अनेक जगहों को पार कर, अंत में , “व्रजा” नामक नदी को पहुँचती है।  उस नदी में पुण्य स्नान करने के पश्चात, अमानवन के स्पर्श से उठकर, नयी तेजोमय शरीर पाती हैं। नित्यसूरिया आकर, स्वागत कर, श्रृंगार कर, उसे तिरुमामणि मण्डप तक ले जातें हैं जहाँ श्री:पति श्रीमन नारायण विराजमान हैं।  मणवाळ मामुनि की प्रार्थना हैं कि वे अब और नित्यसुरियों के नित्य निवास तक पहुँचने के समय के अंतर को शीघ्र कम करें।  

स्पष्टीकरण 

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे! मेरे स्वामी ! यतियों (सन्यासियों ) के नेता ! (तिरुवाय्मोळि १०. ७. ३ ) “इम्मायवाक्कै” के अनुसार मेरा अनित्य शरीर दोषों से भरा है। इसमें इच्छा नहीं रखनी चाहिए और (तिरुवाय्मोळि १०. ७. ९) के “मंग ओटटु” के प्रकार नाश होनी चाहिए। इसके पश्चात जीवात्मा , (पेरिय तिरुमडल १६) के “मण्णुम कडुम कदिरोन मण्डलत्तिन नन्नडुवुळ” के प्रकार सूर्य मंडल से लेकर अनेकों लोकों को पार करता है। इसके बाद, “आदिवाहिकस” नामक लोगों के लोक को पर करता है। और (तिरुवाय्मोळि ४. ९. ८ ) के वचन “इमयोर्वाळ तनि मुटटै कोटटै” के अनुसार, एक करोड़ योजनों की देवों के लोक पार  करता है। इसके पश्चात, (तिरुवाय्मोळि १०. १०. १०) के “मुडिविल पेरुम पाळ” वचन से चित्रित असीमित मूल प्रकृति को सात समुंदरों को पार कर पहुँचता है। इस्के पश्चात अति सुंदर “व्रजा” नदी को जीवात्मा पहुँचता है।  यहाँ पुण्य  स्नान करने के बाद, “अमानवन” नामक व्यक्ति व्रजा नदी से बाहर आने केलिए अपने हात देते  हैं।

इस स्पर्श के पश्चात, “ओळी कोण्ड सोदियुमाइ(तिरुवाय्मोळि २. ३. १०) के अनुसार जीवात्मा को एक नई तेजोमय शरीर प्राप्त होता है। यह “पंचोपनिषद मय” कहलाता है।  अर्थात पञ्च दिव्य भूतों से बनाया हुआ। अब, “मुडियुडै वानवर मुरै मुरै एदिर्कोळ्ळ” (तिरुवाय्मोळि १०. ९. ८) के प्रकार (नवीन शरीर वाले) जीवात्मा को नित्यसुरियां आकर स्वागत करते हैं और उसकी श्रृंगार कर, गुणगान कर, “श्री वैकुंठ” नामक दिव्य स्थल लेकर जाते हैं।  “तिरुमामणि मंडप” नामक प्रसिद्द वेदी तक ले जाते हैं , जहाँ अनेक भक्त उपस्थित हैं। श्री रामानुज से मणवाळ मामुनि प्रश्न करते हैं , “ कहते हैं कि , “अडियारगळ कुळाङ्गळुडन कूडुवदु येनृकोलो (तिरुवाय्मोळि २. ३. १०) और “मतदेवतै: परिजनैस्तव संकिशूय:”, ऐसे भक्तों के समूह में रहने की अवसर कब आएगी ? वें श्री:पति श्रीमन नारायण के दास हैं और उन्के प्रति कैंकर्य को सहारा मानते हैं।  हे ! एतिरासा! कृपया आशीर्वाद करें कि आज और उल्लेखित विषयों के संभव दिन के अंतर के समय शीघ्र कम हो। 

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २२

उपक्षेप

पिछले दो पासुरों में, मणवाळ मामुनि, अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै और परमाचार्य एम्बेरुमानार के आशीर्वाद के विवरण किये। मणवाळ मामुनि के अभिप्राय हैं कि इन्के आशीर्वाद के बल पर वे निश्चित परमपद प्राप्त करेंगें और भगवान की अनुभव करेंगें।  शीघ्र “दिव्यस्थान मण्डप” में निवासित “दिव्य सिंहासन” पर विराजित भगवान की अनुभव  पाने केलिए मणवाळ मामुनि अपनी इच्छा प्रकट करते हैं।  

पासुरम

अडियारगळ कुळाङ्गळ अळगोलक्कम इरुक्क
अनंतमयमान मामणि मण्डपत्तु
पड़ियादूमिल पडुक्कयाय इरुक्कुम अनन्तन
पणमामणिगळ तम्मिन ओळी मंडलत्तिल इडैयिल
वडिवारुम मामलराळ वलवरुगु मट्रै
मण्मगळुम आय्मगळुम इडवरुगुम इरुक्क
नडुवाग वीट्रीरुक्कुम नारणनै कडुग
नान अनुभविक्कुम वगै नल्गु एन एतिरासा

शब्दार्थ 

एन एतिरासा – हे! यतिराजा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता!
कडुग – निश्चित ही आप शीघ्र
नल्गु – आशीर्वाद करें
नान – मैं
अनुभविक्कुम वगै – भोग  करें
नारणनै – श्रीवैकुंठनाथ
नडुवाग वीट्रीरुक्कुम – मध्य में विराजित, बिजली के बीच कमल की तरह, वर्षा की मेघ जैसे साँवले रंग के, दिव्य महिषियों के मध्य विराजित जो जग की राज करतें हैं।
वडिवारुम मामलराळ – प्रस्तावित दिव्य महिषियाँ हैं, दायें भाग में “ वडिवाय निन वलमारबिनिल वाळ्गिन्र मंगै” में प्रकटित  (तिरुपल्लाण्डु २)  अद्वितीय सौंदर्य और कोमल गुण संपन्न  पेरिय पिराट्टियार,
वलवरुगु – दायें भाग में
मट्रै मण्मगळुम आय्मगळुम – और भूमि पिराट्टि और नीळा देवी जो हैं
इडवरुगुम इरुक्क – बायें भाग में
अडियारगळ कुळाङ्गळ – इन्के संग, नित्यसुरियाँ (अनंत, गरुड़ विश्वक्सेन इत्यादि ) और मुक्तात्मायें (परांकुश और परकाल के जैसे ), यह मोतियों और रत्नों की सुन्दर संग्रहण की तरह दिखता हैं
अळगोलक्कम इरुक्क – सुंदर पंक्ति में
आनन्दमयमान मामणि मंडपत्तु – अत्यंत आनंदमय वेदी में , जो “तिरुमामणि मंडपम” जाना जाता हैं
पणमामणिगळ तम्मिन ओळी मंडलत्तिल इडैयिल – के सिरों से उत्पन्न प्रकाश के मध्य
पडियादुमिल – तुलना से पार
पडुक्कैयाय इरुक्कुम – अनंतन, जो दिव्य शय्या (श्रीमन नारायण के ) के रूप में सेवा करते हैं
अनंतन – “अनन्ताळ्वान” नाम से जाने जाते हैं

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, कोई विलंब के बिना शीघ्र श्रीवैकुंठनाथ की भोग करने के हेतु, आशीर्वाद करने को प्रार्थना करते हैं। मणवाळ मामुनि श्री वैकुंठनाथ की विवरण करते हैं कि वे अपने दिव्य महिषियाँ :पेरिय पिराट्टि, भूमि देवी तथा नीळा देवी के मध्य, अनन्त , गरुड़  विश्वक्सेन जैसे नित्यसुरियाँ एवं आळ्वारों और आचार्यो जैसे मुक्तात्माओं के श्रेयसी पंक्ति के मध्य, तिरुमामणि मण्डप में  विराजमान हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता! “अडियारगळ कुळाङ्गळ (तिरुवाय्मोळि २. ३. १० ) और “मामणि मण्टपत्तु अंतमिल पेरिन्बत्तडियार(तिरुवाय्मोळि १०. ९. ११ )” के जैसे सुंदर पंक्ति में हैं।  नित्यसूरियों में अनंत,गरुड़ ,विश्वक्सेन इत्यादि एवं मुक्तों में परांकुश, परकाल तथा यतिवरादि हैं। यें मोतियों और रत्नों के सुंदर संग्रहण की तरह दिखतीं हैं।  यह पंक्ति, “आनंदमयाय मंडप रत्नाय नमः” के अनुसार तेजोमय , अत्यंत आनंद से प्रकाशित “तिरुमामणि मंडप” के आगे हैं। अत्यंत कोमल तथा शीतल  “अनंतन” नामक सर्प  शैय्या, जो भगवान के नित्य कैंकर्य केलिए प्रसिद्द हैं, इस मंडप में हैं।  “आयिरम पैन्तलै अनंतन” (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४. ३. १० ), “सिरप्पुडैय पणनगळ मिसैचेळुमणिगळ विट्टेरिक्कुम (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४. ९. ७ ) तथा “दैवछुडर नडुवुळ (पेरिय तिरूमडल १) जैसे वचनों में अनंतन की वर्णन की गयी हैं। “वडिवाय निन वलमारबिनिल वाळ्गिन्र मंगै (तिरुप्पल्लाण्डु २ )” और “वडिक्कोल वाळ नेडुनकण (इरणडाम तिरुवन्दादि ८२ )” में जैसे वर्णन किया गया है, पेरिय पिराट्टि अपने सौंदर्य और कोमल गुण के  स्वरूप से पहचानी जातीं हैं। वें श्रीमन नारायण के दायें पक्ष में दर्शित हैं।  श्रीमन नारायण के बायें पक्ष में पेरिय पिराट्टि के छाया भूमि पिराट्टि एवं नीळा देवी हैं।  एक कमल तथा तीन बिजलियों के मध्य साँवले वर्षा के मेघ के समान दृश्य हैं, इन तीनों पिराट्टियों के मध्य, श्रीमन नारायण।  ये श्रीवैकुंठनाथ हैं जो (तिरुवाय्मोळि १०. ९. १ ) में “वाळपुगळ नारणन” से वर्णित हैं, जो वहाँ “वीट्रीरुंदु येळुलगम तनिक्कोल सेल्ल” (तिरुवाय्मोळि ४.५. १ ) के अनुसार लोकपरिपालन करने केलिए विराजित हैं। “ हे ! मेरे स्वामी एतिरासा ! कृपया मुझे आशीर्वाद कीजिये, जिससे मैं तुरंत इस श्रीवैकुंठनाथ को भोग कर सकूँ”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २१

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि “एन्न भयं नमक्के”, कहते हैं , अर्थात उन्को अब कोई भय नहीं हैं। अब कहते हैं कि अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के निर्हेतुक आशीर्वाद के कारण श्री रामानुज उन पर गर्व करेंगें। यह इस सँसार के सागर को पार कर श्रीमन नारायण के चरण कमलों तक अवश्य पहुँचायेगा।

पासुरम २२

तीदट्र ज्ञानम् तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै सीररुळै
येदत्तै माट्रूम एतिरासर तन अभिमानमेन्नुम
पोदत्तै एट्री पवमाम पुणरिदनै कडन्दु
कोदट्र माधवन  पादक्करैयै कुरुगुवने

शब्दार्थ

तीदट्र – दोष हीन
ज्ञान – जीवात्मा के स्वरूप की सम्पूर्ण ज्ञान
तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै – तिरुवाय्मोळि के संबंध से ये “तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै” जाने जाते हैं।  श्रीमन नारायण के कवि नम्माळ्वार के दिव्य रचना हैं
सीररुळै – वे मुझे (निर्हेतुक) कृपा से आशीर्वाद करते हैं
येदत्तै माट्रूम – जिस्से मोह तथा इच्छा जैसे दोष नष्ट हों
एतिरासर तम – उन्की  (तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै की )  आशीर्वाद, श्री रामानुज के कृपा पात्र बने रहने की सहाय करेगी
पोदत्तै येट्री – “विष्णु पोत” यानी विष्णु की जलयान के जैसे अटल जहाज़ (जलयान ) जो ही
पवमाम पुणरिदनै कडन्दु – सँसार के सागर को पार करने केलिए सहाय करता हैं
कुरुगुवने – निश्चित प्राप्त होता है
कोदट्र माधवन पादक्करयै – श्रिय:पति श्रीमन नारायण के चरण कमल। यह चरण कमल, “विण्णोर पिरानार मासिल मलरडिकीळ”, “तुयररु सुडरडि” चित्रित किया गया हैं , अर्थात “दोषों से विरुद्ध एवं सदा रोशणमय

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि कहते हैं कि श्रीमन नारायण के चरण कमल प्राप्त होना निश्चित है क्योंकि “विष्णु पोत” की तरह एक जलयान की सहायता से वें साँसारिक बंधनों से विमुक्त होने वाले हैं। यह निश्चित हैं क्योंकि श्री रामानुज उस जहाज़ में चढ़ाएंगे। और श्री रामानुज के यह सहायता मणवाळ मामुनि के आचार्य निष्कलंक तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के आशीर्वाद से ही साध्य है।

स्पष्टीकरण  

विवरणकार अब तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के श्रेय प्रस्ताव करते हैं।  “तत ज्ञानं अज्ञानमतोन्यधुक्तम” और “विद्यान्यासिलपनैपुणम” वचनों के अनुसार , श्रीमन नारायण से असम्बंधित या विरुद्ध किसी प्रकार के कार्यो से आने वाली दोषों से विमुक्त हैं। “तामरैयाळ केळ्वनये नोक्कुम उणर्वु” (मुदल तिरुवन्दादि ६७ ) की तरह श्री महालक्ष्मि के पति श्रीमन नारायण के प्रति ही सदा उन्की ध्यान हैं, अन्य विषयों में किंचित भी नहीं। श्रीमन नारायण के प्रति उन्की भक्ति ऐसी हैं कि श्रीमन नारायण के भक्तों को अपने स्वामी समझते हैं।  श्रीमन नारायण से संबंधित ग्रंथों के अलावा अन्य विषयों पर वें ध्यान नहीं देते हैं। विशेष रूप में तिरुवाय्मोळि के गेहरी दिव्य अर्थों में मग्न होने के कारण “तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै” जाने जाते हैं।  तिरुवाय्मोळि के प्रति उन्के प्रेम के कारण, तिरुवाय्मोळि उन्की पहचान बन गयी।  ऐसे श्रेयसी आचार्य के शिष्य हैं श्री मणवाळ मामुनि। मणवाळ मामुनि कहते हैं कि , उन्के आचार्य के आशीर्वाद से श्री रामानुज के छाये में अवश्य आएँगे, जो प्रेम भाव प्रकट करेंगें। श्री रामानुज “कामादिदोषहरं” (यतिराज विम्शति १ ) विवरित किये जाते हैं।  “विष्णु पोतं” का अर्थ है , “इदंहि वैष्णवं पोतं सम्यकास्ते भवार्णवे” याने, “बिना कोई संकट ,श्रीमन नारायण के दिव्य चरण कमलों तक पहुँचाने वाला”. मणवाळ मामुनि कहते हैं कि श्री रामानुज के संबंध, सँसार के सागर (साँसारिक बंधन ) से विमुक्त करने वाला श्री वैष्णव जलयान हैं। (जितन्ते स्तोत्र ४ ) के “संसार सागरं घोरं अनंत क्लेस भाजनं”, वचनानुसार, यह सँसार सागर हमारे ग्रंथों में भयानक सागर के रूप में चित्रित किया गया है। मणवाळ मामुनि कहते हैं कि यह जलयान उन्को श्रीमन नारायण के चरण कमलों तक ले जाएगा।  भगवान के चरण कमलों के विषय में बताया गया है , “विण्णोर्पिरानार मलरडिकीळ (तिरुविरुत्तम ५४ ) याने नित्यसूरियों से पूजनीय और “तुयररु सुडरडि (तिरुवाय्मोळि १.१. १ ) याने अज्ञान और पीड़ा से निवारण करने वालें। “हेय प्रत्यनीकं”, के अनुसार वें संपूर्ण रूप से दोषों से विमुक्त हैं। ये दिव्य चरण कमल अत्यंत तेजस्वी हैं और भक्त की ,किसी के या किसी विषय के आवश्यकता के बिना रक्षण करतें हैं। श्रीमन नारायण के  ऐसे निष्कलंक चरण कमल ही मेरे लक्ष्य हैं।  वे कहते हैं लक्ष्य प्राप्ति निश्चित हैं।  “कोदट्र” का अर्थ है निष्कलंक और यह चरण कमलों केलिए सही है। पूर्ण वचन है “कोदट्र माधवन” अर्थात  “निष्कलंक या दोषहीन माधवन” . यहाँ उल्लेखित दोष, श्रीमन नारायण के “पिराट्टि”, श्री महालक्ष्मि के संग न होने पर।  इसी  विषय की तिरुवडि (हनुमान) प्रस्ताव करते हैं, “रामस्यलोकत्रय नायकस्य श्रीपादकूलं मनसाजकाम” में और नम्माळ्वार, बताते हैं , “माने नोक्कि मडवाळै मार्बिल कोणडाइ माधवा” जो “उन तेने मलरूम तिरुपादम विनयेन सेरमारु अरुळाइ (तिरुवाय्मोळि १.५.५ )” में पूर्ण होता है।  अतः, “तिरुविललाद कोदु अट्रवन” अर्थात पिराट्टि महालक्ष्मि के संग के बिना श्रीमन नारायण के दर्शन में ही यह उल्लेखित दोष आएगा।  अतः पिराट्टि के संग श्रीमन नारायण ही लक्ष्य हैं क्योंकि वे ही निष्कलंक हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २१

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर १०

ramanujar-srisailesa-mamunigal

उपक्षेप

यह पासुरम मणवाळ मामुनि और उनके मन के बीच की संभाषण है। उनकी मन का प्रश्न है “हे मणवाळ मामुनि ! पिछले पासुरम में आप परमपद के मार्ग की और श्रीमन नारायण से जीवात्मा की मिलन का भी विवरण दिए। अत्यंत ज्ञानियों केलिए भी यह अपूर्व अवसर है। किन्तु आप के बातों से लगता हैं कि आप ने यह अनुभव किया है।  आप अचानक इतने विश्वासपूर्ण और साहसी कैसे बन गए ?”  इसकी उत्तर देते हुए मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से कहते हैं , “हे मेरे प्रिय ह्रदय! निर्भय रहो ! मेरी ज्ञान मेरे आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के निर्हेतुक कृपा से हैं।  उस्से मैं इस निश्चय पर आया हूँ कि आचार्य के कृपा ही मुक्ति दायित्व हैं। मेरी इस स्तिथि देख एम्पेरुमानार अपने कार्य खुद करेंगें।  अतः मैं निर्भय और वैसे ही तुम भी रहना।

पासुरम

तिरुमलै आळ्वार तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै सीररुळै
तरुम मदि कोण्डवर तम्मै उत्तारकराग एण्णि
इरु मनमे ! अवरकाई एतिरासर एमै कडुग
परमपदम तनिल येटरुवार एन्न बयम नमक्के

शब्दार्थ

तिरुमलै आळ्वार – जिनका नाम है “श्रीशैलेशर”
तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै – तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के अलावा कोई नहीं
सीररूळै – अपने निर्हेतुक कृपा से
तरुम – मुझे आशीर्वाद किये
मदि – उन्की दिव्य ज्ञान
मनमे – हे मेरी प्यारी ह्रदय
कोणडु –  उस ज्ञान को उपाय बना कर
इरु – रहिये
एण्णि – इस दृढ़ विश्वास के सात कि
अवर तम्मै – तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै, महान जिन्हों ने इतना मदद किये
उत्तारकराग – साँसारिक बंधनों से विमुक्त करने वाले हैं
एतिरासर – एम्पेरुमानार
अवरकाई – मेरे आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के लिए
येट्रूवार – भेजेँगे
एमै – मैं, जो “स्वाचार्य अभिमानमे उत्तारकम” (शिष्यों के प्रति आचार्य की अभिमान ही शिष्यों की एकमात्र रक्षण है )
कडुग – शीघ्र ही
परमपदम तनिल – परमपदम तक
एन्न बयम नमक्के ! – हे मेरे ह्रदय ! अतः क्यों डरे ! कोई भय नहीं है (सीने में हाथ रख कर निश्चिन्त सो सकते हैं )

सरल अनुवाद

मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से निर्भय रहने को कहते हैं, क्योंकि एम्पेरुमानार उनकी रक्षा करेंगें।  मणवाळ मामुनि के आचार्य तिरुवाइम्ळिप्पिळ्ळै के, मामुनि के प्रति जो प्रेम और कारुण्य हैं, वही इसका कारण हैं। मणवाळ मामुनि को ज्ञान हैं कि आचार्य के आशीर्वाद और कृपा से ही एम्पेरुमानार शीघ्र राहत दिलाएँगे।

स्पष्टीकरण 

तिरुमलै आळ्वार ही तिरुनाम था।  तिरुवाय्मोळि में अत्यंत प्रभाव और ज्ञान के कारण वें तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै नाम से पहचानें गए।  वही उन्की पहचान बन गयी।  मणवाळ मामुनि के कहना हैं की ऐसे महान आचार्य अपने निर्हेतुक कृपा से आशीर्वाद किये और सर्वश्रेष्ठ विषय की ज्ञान भी दिए।  इस ज्ञान के प्रापक हैं मणवाळ मामुनि।  इस ज्ञान को उपाय बना कर, अपने ह्रदय से कहते हैं , “हे ह्रदय ! स्मरण रखो के महान तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै ने हमें यह ज्ञान उपहार किया हैं।  इसका प्रयोग यह हैं कि हमें एहसास होना हैं कि इस साँसारिक बंधन से वे ही हमें विमुक्त करेंगें।  इस पर दृढ़ विश्वास रखो।  इस दृढ़ विश्वास को देख श्री रामानुज हमारी स्तिथि की प्रोत्साहन करेंगें।  इसके पश्चात हमारे आचार्य पर विचार करेंगें और उन्के हेतु (तिरुवाय्मोळि ७.६. १० ) के “येट्रारुम वैकुन्दम” वचनानुसार, हमें शीघ्र परमपग भेजेँगे।  (इरामानुस नूट्रन्दादि ९८) के “मनमे नैयल मेवुदर्क्के” के  अनुसार मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से कहते हैं , “तुम निर्भय रहो” श्री रामानुज परमपद तक पहुँचायेंगे, इसलिए सीने में हाथ रख निश्चिन्त सो सकते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर १९

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनिगळ श्री रामानुज से पूँछते हैं कि क्या ज्ञानी अपने पुत्रों के पथभ्रष्ट होना सह पायेंगें।  (इरामानुस नूट्रन्दादि ४४ ) “नल्लार परवुम इरामानुसन” अनुसार श्री रामानुज , जो नेक लोगों के मान्यवर हैं, मणवाळ मामुनि के शोक गीत सुनें । वें मामुनि के दयनीय स्तिथि पर विचार किये और सह नहीं पाए । वें सोचते हैं कि ,मणवाळ मामुनि को ज्ञानियों की लक्ष्य जो  परमपद है , वहाँ पहुँचना है और नित्यसुरियों के संग रहना हैं। वे मानते हैं कि वहाँ पहुँचकें मामुनि को नित्यसुरियों के प्रति नित्य  कैंकर्य कि पुरस्कार मिलनी चाहिए। श्री रामानुज के इस इच्छा समझ कर, मामुनि अपने पिता श्री रामानुज की वात्सल्य पर अत्यंत संतुष्ट होते हैं और उनको लगता हैं कि उन्को परमपद प्राप्त ही हो गयी।(मुमुक्षुपडि ,द्वय प्रकरणं १ ) के “पेरू तप्पादु एन्रु तुणिन्दु इरुकैयुम”  वचनानुसार आत्म विश्वास के सात, सँसार पार कर परमपद पधारने वाले जीवात्मा की सफ़र की विवरण करते हैं।

पासुरम

पोम वळियै तरुम एन्नुम इन्बम एल्लाम
पुसित्तु वळिपोय अमुद विरसै आट्रिल
नाम मूळगी मलमट्रू तेळिविसुम्बै
नण्णि नलम तिगळ्मेनि तन्नै पेट्रू
ताम अमरर वंदु एदिर कोणडु अलंकरित्तु
सर्करिप्प मामणि मणडपत्तु चेन्रु
मामलराळ कोन मडियिल वैत्तु उगक्कुम
वाळ्वु नमक्कु एतिरासन अरुळुम वाळ्वे

शब्दार्थ 

वाळ्वु – सौभाग्य
अरुळुम वाळवे – के आशीर्वाद
एतिरासन – एम्पेरुमानार
नमक्कु –  हमारे लिए (जैसे नीचे सूचित हैं )
पोम वळियै – (जब आत्मा शरीर से निकलता है ), परमपद के नित्यानंद तक पहुँचाने वाला “अर्चिरादि” मार्ग पर रवाना होता है
तरुम – जीवात्मा को यह पथ प्राप्त है
एन्नुम – और इसके कारण
पुसित्तु – भोग करता है
इनबम एल्लाम – सारे खुशियाँ
वळिपोय – अर्चिरादि मार्ग में जाते समय
नाम मूळगी – (बाद में ), आत्मा को मिलता है दिव्य स्पर्श
अमुद विरसै आट्रिल – “विरजा” नदी में
मलमट्रू – प्राकृतिक मलो  से मुक्त होता है
नण्णि – (इसके पश्चात )पहुँचता है
तेळिविसुम्बै – निष्कलंक और दोषरहित परमपद को
नलम तिगळ मेनी तन्नै पेट्रू – जीवात्मा की स्वरूप प्रकाशित करने वाली, अप्राकृतिक, शुध्द शरीर पाकर
ताम अमरर – नित्यसूरीया
वंदु – आकर
एदिर कोणडु – स्वागत करते है
अलंकरित्तु – श्रृंगार कर
सर्करिप्प – नवीन अप्राकृत शरीर में उपस्तिथ जीवात्मा की सत्कार कर
मामणि मणडपत्तु चेन्रु – “तिरुमामणि मंड़प” नामक मंडप जाकर देखता है
मामलराळ कोन – पेरिय पिराट्टि के दिव्य पुरुष, श्रियपति नामक श्रीमन नारायण
मडियिल वैत्तु उगक्कुम – श्रीमन नारायण अपने गोदी में बिठाके, हमें स्पर्श करके सूंघ  कर, उस अनुभव में संतुष्ट होते हैं ( यह भाग्य केवल श्री रामानुज के कृपा के कारण ही है )

सरल अनुवाद

एम्पेरुमानार की कृपा, जिस्से ही , जीवात्मा  साँसारिक बंधनों से विमुक्त, परमपद पहुँचते हैं,  इस पासुरम में उसकी गुणगान किया गया है। इस भूमि से प्रारम्भ परमपद तक जाने वाली इस अदबुद रास्ते की मामुनि संतोषी से विवरण करते हैं।  नित्यसूरीया इस जीवात्मा के कैसे सत्कार करते हैं और श्रीमन नारायण कैसे स्वागत कर संतुष्ट होते हैं, इसकी भी मामुनि विवरण देते हैं।

स्पष्टीकरण

नम्माळ्वार के “पोम वळियै तरुम नंगळ” (तिरुवाइमोळि ३.९.३ ) के अनुसार, शरीर से विमुक्त आत्मा परमपद पहुँचाने वाले “अर्चिरादि मार्ग” में अनुप्रस्थ करता है। परमपद जाते समय ,उस मार्ग के सर्व सुखों की भोग करता है। इस अप्राकृतिक और सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य के समान ही मार्ग भी होनी चाहिए।  अतः इस मार्ग पधारने वाले आत्मा पूज्नीय हैं। “कळवन कोल पिराट्टि” (तिरुमंगै आळ्वार के नायिका भाव की नाम हैं परकाल नायकि, विशेष रूप में पेरिय तिरुमोळि ३.७ में ) के जैसे भगवान के नेतृत्व में जीवात्मा इस मार्ग में जाता है।  “विरजामाम अमृतकाराम माम प्राप्यमहानदीम” वचन से चित्रित प्रसिद्द “विरजा” नदी में आत्मा को एक दिव्य डुबकि मिलता है। इस्से अनादि काल के पाप और कलंक से आत्मा शुद्ध होता है।  इसके पश्चात उसको एक दिव्य अप्राकृतिक शरीर मिलता है।  अपने स्वामी श्रीमन नारायण के दास होने के सत्य स्वरूप से यह प्रकाशमान है।  अब इसे नित्यसूरीया मिल कर, सुस्वागत कर, सत्कार कर, श्रृंगार करते हैं,  गुणगान करते हैं।  वें इसे “तिरुमामणि मण्डप” नामक मण्डप ले जाते हैं। यहाँ  श्रीवैकुंठनात नामक श्रीयःपति से मिलता है। वें इस विमुक्त व्यक्ति को स्वीकार कर , आलिँगन कर, (शिशु से पिता जैसे ) उठा कर सिर  सूँगते हैं और अत्यंत खुश होते हैं।  परमपद प्राप्ति में इच्छा रखने वाले हम जैसों को मिलने वाली यह उत्तम सौभाग्य, हमारे प्रति श्री रामानुज की अत्यंत कारुण्य की उधाहरण हैं जिस्से वें हमें यह उत्तम संपत्ति उपहार करते हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
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आर्ति प्रबंधं – १९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर १७

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, इस साँसारिक लोक के नित्य अंधकार और अज्ञान में फॅसे , खुद केलिए रोशनी दिखाने की प्रार्थना करते हैं। इस पासुरम में वे बताते हैं कि वे अपने शरीर के वश में हैं और उसी की मानते हैं।   मणवाळ मामुनि कहते हैं कि उनके यह व्यवहार से उनके पिता से रामानुज ही बदनाम होंगे।  

पासुरम

अल्लुम पगलुम यान आक्कै वळि उळन्रु
सेल्लुमदु उन तेसुक्कु तीन्गु अन्रो ?
नल्लारगळ तान तनयर नीसरक्कु आटचेय्य सगिप्परो
एन्दै एतिरासा इसै

शब्दार्थ

एन्दै एतिरासा – हे मेरे पिता यतिराजा ! सन्यासियों के नेता
इसै – सिर्फ आपको ही यह करना हैं
यान – मैं
अल्लुम पगलुम – रात और दिन
आक्कै वळि उळन्रु – शरीर के प्रभाव में हूँ, उसका सेवक हूँ
सेल्लुमदु – इस रास्ते में जैसे में जा रहा हूँ
तीन्गु अन्रो ? – क्या आपको बदनाम नहीं करता ?
उन तेसुक्कु – और आपके श्रेयस को भी?
नल्लारगळ – महान आत्मा जो ब्रह्म विचार में प्रतम पद पर हैं
तन तनयर – (जब बात आती है )उनके पुत्र की
नीसरक्कु आटचेय्य सगिप्परो – क्या वें (अपने पुत्र के) नीच जनों केलिए नीच काम सह पाएंगे ?

सरल अनुवाद

श्री रामानुज से मणवाळ मामुनि आपमें जीवन बिताने का तरीखा बता रहे हैं।  वे कहते हैं कि वें अपने शरीर के वश में हैं और जैसे वह घसीटता हैं उसी दिशा में जातें हैं।  वे श्री रामानुज से कहते हैं , “हे मेरे पिता ! मेरी व्यवहार नीच है।  अगर आप इसको नहीं रोखेंगे तो क्या यह आपकी अपमान नहीं हैं, क्योंकि आप मेरे पिता हैं और आपका पुत्र निर्धारित पथ के विरुद्ध जा रहा है ? ब्रह्म विचार में लयित महान आत्माओँ के पुत्रों के पथभ्रष्ट होने पर, क्या वें उसको सहते हैं ? क्या वें शीघ्र उन पुत्रों के ध्यान सही रास्ते में लाकर पुनरुज्जीवित नहीं करते  ?

स्पष्टीकरण

.पासुरम के पूर्व भाग में मणवाळ मामुनि अपने जीवन बिताने का तरीखा बताते हैं।  आदर्शतः मणवाळ मामुनि को (इरामानुस नूट्रन्दादि तनियन ) “उन नाममेल्लाम एन्रन नाविनुळ्ळे अल्लुम पगलुम अमरुम पडि नल्ग” वचनानुसार श्री रामानुज के नाम जपकर अपनी जीवन बितानी चाहिए थी। वे कहते हैं रात और दिन श्री रामानुज के दिव्य नाम जपने केलिए उनके पास सुनेहरा समय था।  किन्तु वे कहते हैं कि वे (तिरुवाय्मोळि ३. २. १) के “अन्नाळ नी तन्द आक्कै वळि उळल्वेन” वचनानुसार बिताएं। इस वचन का अर्थ यह है कि, श्रीमन नारायण से दिया गया शरीर पुण्य कार्यो केलिए है पर व्यक्ति उस शरीर के वश हो जाते हैं।  शास्त्रों के अनुसार श्रीमन नारायण के प्रति किये जाने वाले कर्मों केलिए शरीर दिया गया है।  साँसारिक विषयों में मग्न होने केलिए नहीं।  ऐसे करने से शरीर देने वाले श्रीमन नारायण के श्रेय को ही आपत्ति आएगी। पेरियाळवार के पासुरम (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ५. ३. ३ ), “उनक्कुप पणि सेयदिरुक्कुम तवम उडयेन इनिप्पोइ ओरुवन तनक्कुप पणिन्दु कड़ैतलै निर्क निन सायै अळिवु कणडाइ” का यही अर्थ है। पेरियाळ्वार का ही प्रश्न मणवाळ मामुनि भी पूछते हैं, अंतर यही है कि पेरियाळ्वार श्रीमन नारायण से और मणवाळ मामुनि ,श्री रामानुज से पूछते हैं  कि उनके पिता होने के कारण क्या यह उन्के श्रेय कम न करेगा ?यहाँ मामुनि एक दृष्टांत देते हैं।  श्रीमन नारायण को उपाय और अपेय मानकर उन्हीं विचारों में मग्न कुछ ज्ञानि हैं। अगर उन्के पुत्र नीच लोगों के प्रति कार्यो में व्यस्त हैं और पथभ्रष्ठ हो गए, क्या वें ज्ञानी पिता यह सहन कर पायेंगे ? कभी नहीं।” मामुनि श्री रामानुज से प्रार्थना करतें हैं , “हे मेरे पिता ! सन्यासियों के नेता ! आप ही ने इस दृष्टांत की विचार किया हैं।  अतः आप से प्रार्थना हैं , कि मुझे आपके प्रति कैंकर्य दे और इस जीवात्मा की रक्षा करें।  यह केवल आप से ही साध्य हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
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आर्ति प्रबंधं – १७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर १८

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, उन्के चरण कमल प्राप्त होने  की समय की विवरण प्रार्थना किये।  अब मामुनि के अभिप्राय है कि ,इस प्रश्न से  श्री रामानुज के मन में एक सोच पैदा हुआ हैं। वह है , “ हे मणवाळ मामुनि! आपके मनुष्य शरीर के इस धरती पर घिरते समय, आप, “मरणमानाल” (तिरुवाय्मोळि ९. १०. ५ ) वचन के अनुसार, मोक्ष प्राप्त कर, श्रीमान नारायण के नित्य निवास परमपद पहुँचेंगे।” मणवाळ मामुनि इस विलम्ब कि कारण पूछते हैं।  शरीर के धरती पर घिरने (मृत्य ) तक क्यों प्रतीक्षा करें ? यह शीघ्र क्यों नहीं किया जा सकता ? इस पासुरम का सारांश यही है।

पासुरम १७

पोल्लानगु अनैत्तुम पोदिन्दु कोणडु नन्मैयिल ओन्रु
इल्ला एनक्कुम एतिरासा – नल्लारगळ
नण्णुम तिरुनाटै नान तरुवेन एन्रा नी
तण्णेन्रु इरुक्किरदु एन्दान ?

शब्दार्थ

अनैत्तुम – सारे साध्य ( व्यक्ति हूँ ,जिसके पास  )
पोल्लानगु – बुरे कर्म
पोदिन्दु कोणडु – गहरी तरह उकेरे हुए हैं
ओन्रु इल्ला – एक बिन्दुमात्र (मेरे पास नहीं हैं )
नन्मैयिल – मुझको   सुकर्म
एतिरासा – हे ! एम्पेरुमानारे !
एनक्कुम – मेरे जैसे व्यक्ति को भी
नान तरुवेन एन्रा नी – आप ने कहा था की आप मुझे आशीर्वाद करेंगें
तिरुनाटै – परमपद जो
नण्णुम – जगह जो पहुँचने लायक हैं
नल्लारगळ – नेक व्यक्तियों से
तण्णेन्रु इरुक्किरदु एन्दान ? – मुझे आशीर्वाद करने मे धेरी क्यों ? ( गहरा अर्थ यह है कि  , श्री रामानुज के आशीर्वाद के संग शीघ्र परमपद पधारने के आर्ति के अलावा  मणवाळ मामुनि की न ही अन्य कोई गति है ,न कोई संपत्ति है । )

सरल अनुवाद

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जिसमें, एक बिन्दुमात्र भी अच्छे गुण नहीं हैं , बुरे कर्मों से भरपूर हूँ।  पर मेरे जैसे नीच व्यक्ति को भी श्री रामानुज परमपद प्राप्ति की आश्वासन दिए हैं। हे रामानुज ! आपने परमपद प्राप्ति का विश्वास दिलाया, पर उस में देर क्यों लगा रहें हैं ?”

स्पष्टीकरण

पासुरम के पूर्व भाग में खुद की विवरण करते हैं श्री मणवाळ मामुनिगळ।  वे बताते हैं कि (तिरुवाय्मोळि ३. ३. ४ ) “नीसनेन निरै ओन्रुमिलेन” और “अकृतसूकृत:” में जैसा चित्रित हैं वैसे ही, वे आत्मा के प्रेरणाप्रद और विमुक्ति के एकदम विरुद्ध गुणों से भरपूर हैं।  और उनमें आत्मा को शोधन करने वाले कुछ भी अच्छे गुण नहीं हैं। वे पूर्वजों से निन्दित कार्यो में व्यस्त हैं। “प्राप्यम अर्चिपधासत्भिस तत विष्णोर परमम्पदम” वचन कहता हैं कि, परमपद, अच्छे कर्मों से भर, नेक गुणों से भरपूर जनों से  चाहे जाने वाला जगह हैं। मणवाळ मामुनि कहतें हैं , “हे एम्पेरुमानारे ! आपने मुझे आश्वासन दिया था कि मेरे जैसे नीच व्यक्ति को भी आप परमपद दिलायेँगे।  हमारे सम्बंध कि एहसास के साथ ही आपने यह बताया।  अतः इस उपहार में देरी मुझे समझ नहीं आ रही हैं।  क्या आपको लगा कि अन्य किसी से मैं रक्षा की प्रार्थना करूंगा ? क्या आप ने सोचा कि मैं अपने प्रयत्न से श्रीमन नारायण द्वारा लगाए  परमपद प्राप्ति के विधियों को कर पाऊँगा ? हे एम्पेरुमानारे ! आपसे अन्य न मेरे कोई गति हैं न उपाय। मेरी न कोई संपत्ति हैं और न ही आपके चरण कमलों से अन्य कोई गति हैं। अतः मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे शीघ्र ही मोक्ष दिलायें।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 4

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 5 – भाग 3

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आईये अब हम उन अष्ट गुणों और अन्य कल्याण गुणों के विषय में जानने का प्रयास करेंगे है, जिनका वर्णन भगवद श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान की शरणागति करने के पूर्व करते है।

सत्यकाम !सत्यसंकल्प ! परब्रह्मभूत ! पुरुषोत्तम ! महाविभूते ! श्रीमन् ! नारायण ! श्रीवैकुंठनाथ ! अपारकारुण्य सौशील्य वात्सल्य औदार्य ऐश्वर्य सौंदर्य महोदधे ! अनालोचित विशेष अशेषलोक शरण्य ! प्रणतार्तिहर ! आश्रित वात्सल्यैक जलधे ! अनवरत विधित निखिल भूत जात याथात्म्य ! अशेष चराचरभूत निखिल नियमन निरत ! अशेष चिदाचिदवस्तु शेषीभूत ! निखिल जगधाधार !अखिल जगत् स्वामिन् ! अस्मत् स्वामिन् ! सत्यकाम ! सत्यसंकल्प ! श्रीमन् ! नारायण ! अशरण्यशरण्य ! अनन्य शरण: त्वत् पादारविंद युगलं शरणं अहं प्रपद्ये II

आठ में से प्रथम चार गुण जिनका वर्णन आगे किया जायेगा, वे सभी जगत् की रचना करने की भगवान की योग्यता को दर्शाते है। अगले चार गुण शरणागति के मार्ग अर्थात् यह कि एक मात्र भगवान ही हमें मोक्ष  (श्रीवैकुंठ) प्रदान कर सकते है, इसे दर्शाते है। इसके अतिरिक्त सत्यकाम, सत्यसंकल्प और परब्रह्मभूत (जो अष्ट गुणों में से कुछ गुण है), वे चूर्णिका के लीला विभूति भाग (लौकिक जगत् / जिस संसार में हम रहते है) से संबंधित है। पुरुषोत्तम और नारायण उनके गुणों से संबंधित है। महाविभूते और श्रीवैकुंठनाथ  उनकी नित्य विभूति (श्रीवैकुंठ) से संबंधित है। श्रीमन्  दिव्य महिषियों (पट्टरानियाँ) से संबंधित चूर्णिका से संबध्द है। हमने इन आठ शब्दों का अर्थ पूर्व में भी देखा है।

सत्यकामकाम शब्द के बहुत से अर्थ है। इसका आशय उस से है, जो कुछ अभिलाषा करता है; इसका आशय अभिलाषा की वस्तु से भी है। इसके अतिरिक्त, काम अर्थात आकांक्षा भी है। पहले, श्रीरामानुज स्वामीजी ने काम  शब्द का प्रयोग नित्य विभूति (श्रीवैकुंठ) के संदर्भ में किया था। परंतु यहाँ वे इसका उपयोग भगवान के संदर्भ में करते है, जो प्रकृति, पुरुष और काल के स्वामी है और अपनी अभिलाषा की पूर्ति हेतु इनके साथ क्रीड़ा करते है (जैसा की हमने पूर्व कतिपय अनुच्छेदों में देखा), अर्थात् पूर्व में वह अभिलाषा के विषय में बताता है और यहाँ उसका संदर्भ स्वयं अभिलाषा से है। सत्य अर्थात् उनका नित्य स्वरुप। सृष्टि की वस्तुयें, आत्माएं, उसके आनंद-उपभोग की वस्तुयें, उपकरण जिनसे वह आनंद प्राप्त किया जाता है, समय – जो निर्धारित करता है कि वह आनंद का भोग कब और कैसे करेंगे – यह सब भगवान के लिए क्रीड़ा है। हम सोच सकते है कि जो वस्तु हमें इस संसार से बांधती है (लौकिक संसार), जो हमारे लिए मोक्ष प्राप्त करना दुष्कर बना देती है और जो भगवान को आवरित करके रखती है, वह वस्तु भगवान के आनंद के लिए कैसे है। परंतु यदि भगवान् इन सबकी रचना नहीं करते तब हम कल्पों (युगों) तक अचित्त पदार्थ के साथ उनके दिव्य विग्रह से सदा के लिए लिपटे रहते, उनके निवास, श्रीवैकुंठ तक पहुँचने की कोई आशा किये बिना। क्यूंकि वे संसारों को निर्मित करते रहते है, इसलिए ही वशिष्ट, शुक, वामदेव, आदि संत श्रीवैकुंठ पहुँचने में समर्थ हुए। हम भी यह आशा कर सकते है कि एक दिन इस लौकिक देह को त्यागकर और उनकी कृपा प्राप्त कर श्रीवैकुंठ पहुँच कर उनके श्रीचरणों में कैंकर्य प्राप्त करे। एक कृषक, अनेकों बार विभिन्न कारणों से हानि होने के पश्चाद भी अपनी भूमि पर कृषि करना नहीं छोड़ता। वह उसे इस आशा से करता रहता है कि किसी फसल से तो उसे लाभ प्राप्त होगा, उसी प्रकार जैसे पहले भी कभी हुआ था। भगवान द्वारा सृष्टि रचना/ पालन/ संहार का पुनरावृत्ति कार्य भी उसी समान है।

सत्यसंकल्प – अपने आश्रितों की अभिलाषा पूर्ति के लिए उनके आनंद हेतु अपने संकल्प मात्र से ही विषय की रचना करने की योग्यता। यहाँ सत्य  शब्द अपने आश्रितों को कभी निराश न करने की उनकी योग्यता को दर्शाता है। इस कार्य को करने के लिए उनके मार्ग में कोई बाधाएं नहीं है। जब ब्रह्मा (भगवान् की पहली रचना) ने सनक, सनतकुमार आदि की रचना की और उनसे सृष्टि रचना में सहायता मांगी, तब उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया। इसप्रकार ब्रह्मा की रचना व्यर्थ हो गयी। उसीप्रकार जब ब्रह्मा से लुप्त हुए सभी वेद असुरों को प्राप्त हुए, ब्रह्मा ने भगवान के चरणों में गिरकर वेदों की रक्षा और पुनः प्राप्ति के लिए प्रार्थना की। परंतु भगवान की रचना कभी व्यर्थ नहीं होती।

आईए अब हम 8 गुणों के विषय में देखते है।

सत्यकाम – इस शब्द से आशय, भगवान् का सभी नित्य वस्तुओं के स्वामित्व से है, वे वस्तुयें जो उस सृष्टि रचना में सहायक है या उसके पूरक है, जहाँ जीवात्मा भगवान् को प्राप्त करने के पूर्व विभिन्न रूप में जन्म लेती है।

सत्यसंकल्प – अपने संकल्प में दृढ़ रहना, जो कभी व्यर्थ नहीं होता। जब भगवान निश्चय करते है कि इस जीवात्मा को श्रीवैकुंठ प्रदान करना है, तब उनकी इच्छा पूर्ति में कोई बाधक नहीं हो सकता। जीवात्मा की इसमें एक भूमिका है, वह यह कि जीवात्मा को श्रीवैकुंठ प्राप्ति की त्वरित उत्कंठा होना चाहिए।

परब्रह्मभूत – भगवान् की विशालता कल्पना से परे है। वे कितने विशाल है? सम्पूर्ण ब्रह्मांड, अपनी समस्त आकाशगंगाओं सहित भगवान् के दिव्य विग्रह को सूचित करता है (उन्हें ब्रह्म  भी कहा जाता है; ब्रह्म  शब्द को ब्रह्मा  शब्द के साथ भ्रम नहीं करना चाहिए। ब्रह्मा, भगवान् के निर्देशानुसार सृष्टि की रचना करते है, परंतु ब्रह्म स्वयं भगवान् का संबोधन है)। वे इसप्रकार अत्यंत विशाल है। प्रलय के समय में, सभी चित और अचित को अपनी शरण लेते है। सृष्टि के समय वे यह संकल्प लेते है कि “मुझे बहुसंख्यक रूप प्राप्त हो” और इस प्रकार वे स्वयं विभिन्न विषय रूपों में विभाजित हो जाते है, जैसा की हम पहले देख चुके है (प्रकृति, पुरुष, काल, आदि)। यह सभी वस्तुयें उनके दिव्य विग्रह का अंश है। इससे हमें एक कल्पना प्राप्त होती है कि वे कितने विशाल है।

पुरुषोत्तम – पुरुषानाम उत्तम: अर्थात् पुरुषों (चित) में उत्तम। तीन प्रकार के पुरुष होते है – पुरुष:, उत्पुरुष:, उत्तर पुरुष:, और फिर भगवान जो उत्तम पुरुष: है। पुरुष: अर्थात बद्धात्मा, जो इस संसार में बंधे हुए है (लौकिक संसार)। उत्पुरुष: अर्थात मुक्तात्मा, जो इस संसार सागर से छूटकर श्रीवैकुंठ पहुंचे है। उत्तर पुरुष: अर्थात नित्यात्मा, वह जो संसार में कभी जन्मे नहीं और सदा ही श्रीवैकुंठ में निवास करते है (आदिशेषजी, विष्वक्सेनजी, गरुड़जी, आदि)। उत्तम पुरुष: अथवा पुरुषोत्तम, भगवान है, सभी पुरुषों में श्रेष्ठ। यद्यपि वे सभी तीन प्रकार के चित्त जीवों में निवास करते है (बद्ध, मुक्त, और नित्य जीवात्मा) और तीन प्रकार की अचित अवस्थाओं में भी (शुद्ध सत्व, मिश्र सत्व अर्थात सत्व, रज और तम का मिश्रण और काल तत्व अर्थात समय), इनकी अशुद्धता उन्हें प्रभावित नहीं करती। वे अपने आश्रितों की सभी अशुद्धताओं को दूर करते है। इसके अतिरिक्त वे हम सभी में व्याप्त है, वे हम सभी को संभालते है और वे सभी के स्वामी है। वे हमें वह सभी प्रदान करते है जिसकी हम चाहना करते है। वे ही पुरुषोत्तम है।

महाविभूते – सभी विभूतियों (संसारों) के स्वामी। हम पहले ही उनकी विभूतियों के विषय में चर्चा कर चुके है। तब फिर से उन्हें दोहराने का क्या उद्देश्य? पहले हमने देखा विभूतियों में क्या क्या सम्मिलित है। अब वे इस बात पर बल देते है कि भगवान अपनी सभी संपदा प्रदान करेंगे (हम यह गुण पहले औदार्य  में देख चुके है)। जब एक आश्रित उनकी चाहना करता है तब भगवान् उसे सब कुछ प्रदान करते है, यहाँ तक की स्वयं को भी प्रदान करते है। वे आश्रित के साथ, श्रीवैकुंठ में, सदा विराजमान रहते है, उसे कैंकर्य अनुभव प्रदान करते है (भगवान के कैंकर्य का उत्तम अनुभव)।

श्रीमन् – भगवान् और श्रीजी दोनों का ही कैंकर्य किया जाता है। जीवात्मा के श्रीवैकुंठ पहुँचने पर और मुक्तामा होने पर, वह भगवान और श्रीजी दोनों का ही कैंकर्य का आनंद प्राप्त करता है।

नारायण – असंख्य कल्याण गुणों के धारक, दोष रहित और इन गुणों को अपने आश्रितों को प्रदान करने वाले जिससे आश्रितों को आनंद और कैंकर्य की प्राप्ति हो। इसलिए, कैंकर्य सदा दिव्य दंपत्ति (भगवान् और श्रीजी) के लिए किया जाता है।

श्रीवैकुंठनाथ – श्रीवैकुंठ के स्वामी, जो कैंकर्य के लिए उपयुक्त स्थान।

उपरोक्त 8 गुणों में से, प्रथम 4 गुण (सत्यकाम, सत्यसंकल्प, परब्रह्मभूत, पुरुषोत्तम) भगवान् के सृष्टि रचना की योग्यता का गुणगान करते है और अगले 4 (महाविभूते, श्रीमन, नारायण, श्रीवैकुंठनाथ) यह महत्त्व बताते है कि भगवान् ही वह परमात्मा है, जिन्हें प्राप्त करना और कैंकर्य के द्वारा प्रसन्न करना ही जीवात्मा का धर्म है। इसप्रकार वे ही रचयिता और आनंद के विषय भी है । अब श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान की शरणागति के पहले उनके अन्य 24 गुणों का उल्लेख करते है। अन्य 24 गुणों के वर्णन की क्या आवश्यकता है, जब वे पहले ही इतने सारे गुणों का वर्णन कर चुके है? इसका उत्तर है कि हम उनकी ही शरणागति करते है, जो महान गुणों के धारक है। जिनके शरणागत होना है यदि वे गुण रहित है, तब हम कैसे शरणागति कर सकते है? इसलिए शरणागति से पहले ही उनके सभी गुणों की चर्चा करना प्रथागत है। यहाँ तक कि द्वय महामंत्र  में (रहस्य त्रय का एक भाग, जो हमारे आचार्यजन पीढ़ियों से हमें सिखाते है), हम कहते है कि हम श्रीमन्नारायण भगवान् की शरणागति करते है, जहाँनारायण  से आशय है वे जिनमें सभी महान गुण विद्यमान है। इसलिए भगवान के गुणों का बारम्बार गुणगान करना असंगत नहीं है।

अगले गुणों में (अपार कारुण्य, सौशील्य, वात्सल्य, औदार्य, ऐश्वर्य सौन्दर्य महोदधे), “अपार ” (महान / असीमित) शब्द का उपयोग सभी 6 गुणों के साथ किया गया है।

अपार कारुण्यकारुण्य अर्थात कृपालु – जो दूसरों की पीढ़ा को सहन न कर सके। यही अपार कारुण्य कहलाता है, जब भगवान् रावण जैसे राक्षस पर भी कृपा करते है (श्रीलंका में राक्षसों का राजा, जिसने सीताजी का हरण कर प्रभु श्रीराम और सीताजी को अलग किया)– यह दृष्टान्त श्री रामायण में वर्णित है कि जब विभीषण सिन्धु पार कर श्रीराम की शरणागति करने आते है, तब श्रीराम के मित्र वानरराज सुग्रीव कहते कि श्रीराम को विभीषण की मित्रता स्वीकार नहीं करनी चाहिए क्यूंकि विभीषण भी एक राक्षस है और रावण का भाई है। श्री राम उन्हें यह कहकर विश्वास दिलाते है कि यदि स्वयं रावण भी उनकी शरणागति करता, तब वे उसे भी स्वीकार करते। यहाँ पेरियावाच्चान पिल्लै, श्री आचार्य जिन्होंने गद्यत्रय के लिए व्याख्यान की रचना की, उल्लेख करते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी यहाँ ऐसा भाव प्रकट करते है कि भगवान् ने उन पर ऐसी कृपा वृष्टि की जिससे उन जैसे निम्न मनुष्य भी गद्यत्रय जैसे रत्न की रचना करने में योग्य हुए (यद्यपि यह पूर्णतः असत्य है, परंतु फिर भी हमारे गुरु आचार्यजन, बिना अपवाद के, स्वयं को निम्न जानते-मानते है, यह एक गुण है जिसे नैच्यानुसंधान कहा जाता है अर्थात् स्वयं को सबसे निम्न जानना-मानना, यद्यपि यह सत्य नहीं है)।

सौशील्य – ऐसी उदारता प्रकट करना जिसमें एक श्रेष्ठ व्यक्ति अपने से निम्न की मित्रता स्वीकार करता है। रामावतार में भगवान ने गुह, सुग्रीव और विभीषण से मित्रता की। यह “अपार सौशील्य “ कहलाता है जब भगवान् मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वराहावतार में मत्स्य, कूर्म, वराह क्रमशः आदि से मित्रवत होते है, स्वयं को उन के समान प्रकट करने के लिए।

वात्सल्य – भगवान् का वह गुण जिसमें वे अपने आश्रितों के दोषों को भी उनके सद्गुण जान कर उनसे प्रीति करते है। अपार वात्सल्य  से यहाँ संदर्भ है उस गुण से जिसके कारण भगवान् अपने शत्रुओं से भी वात्सल्य  से व्यवहार करते है। उदहारण के लिए, भगवान ने युद्ध में रावण का संहार किया जिससे वह और अपराध न कर सके ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक माता शीघ्रता से अपने बलाक के हाथ से छड़ी छुडा लेती है ताकि बालक स्वयं को चोट न लगा ले।

औदार्यभगवान अपने स्वरुप अनुसार ही अपने आश्रितों (जो उनके शरणागत है) को उनके सभी इच्छित प्रदान करते है। अपार औदार्य अर्थात् इतना सब इच्छित प्रदान करने के पश्चाद भी यह ग्लानी करना की वे अपने आश्रितों को कुछ भी प्रदान नहीं कर पाए। कृष्णावतार में भी उन्होंने यह गुण प्रकट किया और ग्लानिभाव से कहते है कि धृतराष्ट्र की सभा में वस्त्र हीन होने पर शरणागति करने वाली द्रौपदी के लिए कुछ न कर सके। भगवान् ने उनके पतियों (पांच पांडवों) का पक्ष लेकर उन्हें उनका राज्य लौटाया। परंतु फिर भी वे ग्लानी भाव से कहते है उसके रुदन के उपरान्त भी वे उसकी सहायता नहीं कर सके।

ऐश्वर्य – ऐसी संपत्ति जिससे वे अपने आश्रितों को उनके इच्छित प्रदान करते है। अपार ऐश्वर्य अर्थात् अपने आश्रितों को इतना अधिक प्रदान करना जिससे वे आश्रितजन अन्य की भी सहायता कर पायें।

सौंदर्यम् – सुंदरता। अपार सौन्दर्यं अर्थात् ऐसी सुंदरता की शत्रु भी मोहित हो जाये (जैसे रामावतार में सुर्पनखा, रावन की बहन)। जब श्रीराम विभिन्न ऋषियों से भेंट करने के लिए वन वन विचरण करते है (14 वर्ष के वनवास में) तब ऋषिजन उनके रूप पर मोहित हो जाते थे। ऐसा उनका सौंदर्य था। वे अपने रूप से सभी देखनेवालों के मन और विचारों को चुरा लेते थे।

महोदधे – महान सिन्धु। भगवान में ऐसे गुण है जो सबसे बड़े सिन्धु से भी अधिक बड़े है।

हिंदी अनुवाद- अडियेन भगवती रामानुजदासी

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आर्ति प्रबंधं – १८

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

श्री रामानुज ने आश्वासन दिया था कि मणवाळ मामुनि के परमपद प्राप्ति के इच्छा वे पूर्ती करेंगें।  किन्तु (तिरुवाय्मोळि ९.९.६ ) के “अवन अरुळ पेरुम अळवाविनिल्लादु” के जैसे मामुनि उचित काल तक प्रतीक्षा करने केलिए तैयार नहीं हैं। तिरुवाय्मोळि ५.३ में चित्रित नम्माळ्वार के पीड़ा के समान मणवाळ मामुनि अनुभव कर रहें हैं। वे बताते हैं कि साँसारिक बंधन से उत्पन्न अज्ञान के  नित्य-अंधकार में वे फॅसे हैं और इस अंधकार को नाश करने वालें सूर्य श्री रामानुज से प्रार्थना करते हैं कि यह सूर्य उन पर कब प्रकाशित होगा ?   

पासुरम १८

एन्रु विडिवदु एनक्कु एन्दै एतिरासा !
ओन्रुम अरिगिन्रिलेन उरैयाइ
कुन्रामल इप्पडिए इंद उइरुक्कु एन्रुम इरुळे विळैक्कुम
इप्पवमाम नीणड इरवु

शब्दार्थ

एन्दै – हे मेरे प्रिय पिता !
एतिरासा – यतिराजा ( सन्यासियों के नेता )
इंद उयिर्क्कु – यह आत्मा मगन है
इप्पवमाम – यह साँसारिक लोक में
इरुळे विळैक्कुम – अज्ञान और अंधकार का कारण है
इप्पडिए – आत्मा इस स्थिति में हैं
एन्रुम – हमेशा
कुनरामल – ज्योति के संकेत के  बिन
नीणड इरवु – बिना प्रभात के लंबी रात के समान
उरैयाइ – हे रामानुज ! कृपया बताइये
एन्रु – कब
विडिवदु एनक्कु – मेरे लिए प्रभात होगा ?
ओन्रुम अरिगिन्रिलेन – इस विषय के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीँ हैं

सरल अनुवाद

इस पासुरम में श्री रामानुज से मणवाळ मामुनि कहते हैं कि, कब सुरंग के अंत में प्रकाश दिखेगा, इसका इनके पास कोई जानकारी नहीं हैं। आत्मा अँधेरे से घेरा गया हैं।  साँसारिक लोक की दुष्ट स्वरूप के अंधकार से पीड़ित अज्ञानी आत्मा को विमुक्त करने वाला कोई भी रोशनी नहीं दिख रहा हैं। अपने मायूसी को प्रकट कर मणवाळ मामुनि अपने पिता श्री रामानुज से प्रार्थना करते हैं कि कब उनका प्रभात होगा।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनिगळ कहतें  हैं, “हे मेरे प्रिय पिता श्री रामानुज ! सन्यासियों के नेता ! मेरी आत्मा उन्नति की कोई चिन्ह नहीं दिखा रही हैं।  लगता है की वह नित्य अंधकार से घेरि गयी है।  अज्ञान स्वरूपी इस प्रकाश हीन लोक की संगठन ही इस अंधकार का कारण है।इस दुष्ट लोक की संबंध ही मेरी आत्मा की अनादि काल की पीड़ा का कारण है। सँसार का लंभा रात्री  (स्तोत्र रत्न ४९ श्लोक) में “अविवेक गनांथ धिङ्ग्मुखे” से विवरित किया गया है। “सँसार “ नामक इस घने रात्री मैं खो गया हूँ और समीप काल में कोई रोशनी नहीं दिख रही है।  सही दिशा कि मुझे ज्ञान नहीं है और (स्तोत्र रत्न ४९ ) “पद स्कलितम” वचनानुसार मैं बटक रहा हूँ।  आपकी प्रभा प्राप्त होने की सौभाग्य मुझे कब मिलेगी ? मैं इतना अज्ञानी हूँ कि यह कब और कैसे मुझे प्राप्त  होगो, यह मुझे पता नहीं है।  हे श्री रामानुज आप, (यतिराज सप्तति २८ ) के “निखिल कुमति माया सरवरी बालसूर्य:” के अनुसार सर्वज्ञ हैं।  आप सूर्य हैं , और इसीलिए घेरे हुए अंधकार से (श्रीविष्णु पुराण ) के “सुप्रभाततया रजनी” के जैसे मुझे  छुटकारा दिला सकते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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