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कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु – सरल व्याख्या

। । श्रीः  श्रीमते शठःकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमत् वरवरमुनये नमः । ।

मुदलयिरं

nammazhwar-madhurakavi

नम्माळ्वार् और् मधुरकवि आळ्वार्

श्री मणवाळ मामुनिगळ् अपनी उपदेश रत्न मालै के २६ वे पाशुर में “कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु” का महत्त्व बतला रहे है ।

वाय्त्त तिरुमन्दिरत्तिन् मद्दिममाम् पदम्पोल्

सीर्त्त मदुरकवि सेय् कलैयै – आर्त्त पुगळ्।

आरियर्गळ् तान्गळ् अरुळिच् चेयल् नडुवे

सेर्वित्तार् ताऱ्परियम् तेर्न्दु । ।

हमारे श्रीसम्प्रदाय का तिरुमंत्र (अष्टाक्षर) मंत्र, अपने आप में सम्पूर्णता लिये हुये है।

चाहे वह शब्द हो या अथवा अर्थ, जैसे  तिरुमंत्र (अष्टाक्षर) का मध्य नाम ” नमः” महत्व रखता है, ऐसे ही मधुरकवि आळ्वार द्वारा रचित “कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु” महत्वपूर्ण अद्भुत दिव्य प्रबंधों में अपना महत्व रखता है।

आळ्वार संत द्वारा रचित इन पाशुरों के अर्थ को जानकर हमारे श्रद्धेय पूर्वाचर्यों ने इन पाशुरों को दिव्य प्रबंध पाठ में स्लंगित कर दिया, जिससे दिव्य प्रबंध पारायण में इनका भी अनुसंघान हो सके। अपने श्री सम्प्रदाय में आळ्वार संत, अपना सारा जीवन भगवद सेवा, समर्पण और भगवद गुणगान में ही व्यतीत किया है। एक और यह मधुरकवि आळ्वार, इनके लिये इनके आचार्य ही सब कुछ थे।

यह संत अपने आचार्य (गुरु) नम्माळ्वार की सेवा में, शिष्यत्व में आने के बाद, कभी किसी और का ध्यान नहीं किया, इनके लिये सिर्फ नम्माळ्वार ही भगवान थे और उनका ही गुणानुवाद करते थे। मधुरकवि आळ्वार की जीवनी उनकी रचना, हमारे सम्प्रदाय ही नहीं वैदिक सनातन के एक सिद्धांत की गुरु (आचार्य) ही भगवान का स्वरुप है, को सिद्ध करते है। आळ्वार संत की यह रचना संत की नम्माळ्वार के प्रति अनूठी अद्वितीय श्रद्धा बतलाती है।

[यहाँ तक की मधुरकवि आळ्वार, आदिनात पेरुमाळ के मंदिर में स्थित तिंत्रिणी के पेड़ के पास, अपने आचार्य के पास नित्य जाते, पर कभी आदिनात पेरुमाळ के दर्शन नहीं किये।]

आळ्वार संत की रचना “कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु” की यह सरल व्याख्या पूर्वाचार्यों की व्यख्या पर आधारित है।

तनियन

अविदित विश्यान्तरः सठारेर् उपनिशताम् उपगानमात्रभोगः।

अपि च गुणवसात् तदेक सेशि मदुरकविर् ह्रुदये ममाविरस्तु।।

हम मधुरकवि आळ्वार को, अपने ह्रदय में ध्यान करते है, वह आळ्वार संत जिन्होंने नम्माळ्वार के सिवा किसी और को जाना ही नहीं, वह संत जिन्होंने नम्माळ्वार के प्रबंध पाशुर के गान के आलावा और कुछ नहीं गया, यह प्रबंध पाठ उन्हें परमानन्द प्रदान करते थे, वह संत जो अपने आचार्य के गुणानुभव में मग्न रहते थे।

वेऱोन्ऱुम् नान् अऱियेन् वेदम् तमिळ् सेय्द

माऱन् शठःकोपन् वण् कुरुगूर् एऱु एन्गळ्।

वाळ्वाम् एन्ऱेत्तुम् मदुरकवियार् एम्मै

आळ्वार् अवरे अरण्।।

मधुर कवी आळ्वार ने कहा है ” में नम्माळ्वार से ज्यादा कुछ नहीं जानता- नम्माळ्वार ने ही द्रविड़ लोगों पर अपनी करुणा  बरसाते हुये वेदों के अर्थ को मधुर द्रविड़ भाषा में प्रबंध रूप में दिया है”,  नम्माळ्वार इस सुन्दर कुरुगूर के नायक है, हम सब पर शासन कर, हम सबका उद्धार कर सकते है, प्रपन्न शरणागत जीवों को आश्रय प्रदान करने वाले है।

प्रथम पाशुर:

प्रथम पाशुर में मधुरकवि आळ्वार, नम्माळ्वार के गुणागान में भगवान् कृष्ण के अनुभव का परमानन्द ले रहे है, क्योकि नम्माळ्वार को भगवान कृष्ण बहुत प्रिय थे ।

कण्णि नुण् चिऱुत्ताम्बिनाल् कट्टुण्णप्

पण्णिय पेरु मायन् एन् अप्पनिल्

नण्णित् तेन् कुरुगूर् नम्बि एन्ऱक्काल्

अण्णिक्कुम् अमुदूऱुम् एन् नावुक्के

भगवन कृष्ण जो मेरे स्वामी है, ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च सत्ता, सर्व जगत नियंत्रक होकर भी मातृ प्रेम में,  माँ यशोदा के हाथों पतली सी रस्सी से बंध गये।मेरी जिव्हा को ऐसे करुणानिधान भगवान के नाम से भी ज्यादा मधुर और अमृतमय नाम, दक्षिण में स्थित तिरुक्कुरुगुर के नायक नम्माळ्वार का नाम रटना ज्यादा अच्छा लगता है ।

द्वितीय पाशुर:

द्वितीय पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कह रहे है की, अकेले नम्माळ्वार के पाशुर इतने मधुर है की निरंतर इनका जाप ही मेरे लिए पुष्टिकारक है।

नाविनाल् नविऱ्ऱु इन्बम् एय्दिनेन्

मेविनेन् अवन् पोन्नडि मेय्म्मैये

देवु मऱ्ऱु अऱियेन् कुरुगूर् नम्बि

पाविन् इन्निसै पाडित् तिरिवने

मेरी जिव्हा से आळ्वार के पाशुर गाकर मैं स्वयं को बहुत ही परम सुखी अनुभव कर रहा हूँ। मैं ने स्वयं को आळ्वार के चरणों में समर्पित कर दिया है I मैं, मंगल गुणों से परिपूर्ण आळ्वार के आलावा किसी और भगवान को नहीं जानता, मैं तिरुक्कुरुगुर नायक आळ्वार के पाशुर का संगीत बद्ध गायन हर जगह जाकर करूँगा।

तृतीय पाशुर:

तीसरे पाशुर में मधुरकवि आळ्वार बहुत ही खुशी से कह रहे है, कैसे भगवान उन्हें नम्माळ्वार का सेवक जानकर उन्हें नम्मलवार स्वरुप में दर्शन दिये।

तिरि तन्दागिलुम् देवपिरान् उडै

करिय कोलत् तिरु उरुक् काण्बन् नान्

पेरिय वण् कुरुगूर् नगर् नम्बिक्कु आळ्

उरियनाय् अडियेन् पेऱ्ऱ नन्मैये

में आळ्वार का सेवक था, भटक गया था, तब आळ्वार द्वारा बतलाये गये , नित्यसुरियों के अधिपति भगवान् नारायण जो सांवले रंग के है मुझे दर्शन दिये, देखो मेरा भाग्य, सदाशय तिरुक्कुरुगुर में अवतरित नम्माळ्वार के सेवक होने से भगवान के दर्शन हुये।

चतुर्थ पाशुर:

इस चतुर्थ पाशुर में मधुरकवि आळ्वार, संत नम्माळ्वार की अपार बरसती करुण वर्षा को देखते हुये, कह रहे है की उन्हें हर उस बात की चाह रखना चाहिये जो नम्माळ्वार को पसंद थी।

यह भी बतला रहे है कैसे संत आळ्वार ने उन जैसे दीन को अपनाया।

नन्मैयाल् मिक्क नान्मऱैयाळर्गळ्

पुन्मै आगक् करुदुवर् आदलिल्

अन्नैयाय् अत्तनाय् एन्नै आण्डिडुम्

तन्मैयान् सडगोपन् एन् नम्बिये

वह जो विशिष्ट गतविधियों में सलंगन रहनेवाले, प्रकांड विद्वान चारों वेदों के ज्ञाता, जो मुझ जैसे दीनता के प्रतिक को छोड़ दिये थे, पर संत नम्मळ्वार, मेरे माता पिता बन मुझे आश्रय दिया, बस वही एक मेरे भगवान् है।

पञ्चम पाशुर:

इस पंचम पाशुर में मधुरकवि आळ्वार, पिछले पाशुर में वर्णित अपनी दीनता से कैसे नम्माळ्वार अपनी अकारण करुणा बरसाते इनमें बदलाव लाकर भक्त बनाकर अपनाया, इसके लिए वह आळ्वार संत को धन्यवाद दे रहे है।

नम्बिनॅ पिऱर् नन्पोरुळ् तन्नैयुम्

नम्बिनॅ मडवारैयुम् मुन्नेलाम्

सेम् पोन् माडत् तुक्कुरुगूर् नम्बिक्कु

अन्बनाय् अडियॅ सदिर्त्तॅ इन्ऱे

मधुरकवि आळ्वार कह रहे है, में भी पहले दूसरों की तरह धन और भोगों का लालची था, स्वर्ण महलों से सज्जित तिरुक्कुरुगूर् के नायक की सेवा पाकर, उनकी शरण में आने से में भी श्रेष्ठ हो गया, उनका सेवक हो गया।

षष्ठम पाशुर:

इस पाशुर में मधुरकवि आळ्वार पूछने पर की, आप में इतनी श्रेष्ठता कैसे आ गयी , कह रहे है संत नम्माळ्वार की अनुकम्पा और अनुग्रह से आ गयी , अब इस श्रेष्ठता से निचे गिरना असंभव है।

इन्ऱु तोट्टुम् एळुमैयुम् एम्पिरान्

निन्ऱु तन् इन्ऱु पुगळ् एत्त अरुळिनान्

कुन्ऱ माडत् तिरुक्कुरुगूर् नम्बि

एन्ऱुम् एन्नै इगळ्वु इलन् काण्मिने

तिरुक्कुरुगूर् के नायक संत नम्माळ्वार जो मेरे स्वामी है, उन्होंने मुझ पर कृपा अनुग्रह कर इस काबिल बनाया, इस लिए में उन्ही के गुणगान करता हूँ ,आप देखिये वह कभी मुझे मझधार नहीं छोड़ेंगे।

सप्तम पाशुर:

इस सप्तम पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कह रहे है की, संत नम्माळ्वार की दया के पात्र बनकर, वह उन सबको, जो किसी न किसी रूप से पीड़ित है, उन सभी को जो अब तक संत के सम्मुख नहीं आये, जिनपर संत की कृपा नहीं हुयी, उन सबको  नम्माळ्वार की महानता बतलाकर उन सबको भी, हर तरह से समृद्ध हो सके ऐसा करूँगा।

कण्डु कोण्डु एन्नैक् कारिमाऱप् पिरान्

पण्डै वविनै पाऱ्ऱि अरुळिनान्

एण् तिसैयुम् अऱिय इयम्बुगेन्

ओण् तमिळ् सडगोपन् अरुळैये

नम्माळ्वार्, जो  कारिमाऱन्, नाम से भी जाने जाते है , जो पोऱ्कारि के पुत्र है अपना अनुग्रह बरसाते हुये अपने संरक्षण में लेकर, अपनी सेवा में लेकर मेरे जन्म जन्मांतर के पापों को मिटा दिया। आळ्वार संत की इस करुण महानता का और इनके द्वारा रचित दिव्य तमिल पाशुरों का अष्ट दिशाओं में, मै सभी को बतलाऊंगा।

अष्टम पाशुर:

इस अष्टम पाशुर में, मधुरकवि आळ्वार कह रहे है की, संत नम्माळ्वार की करुणा स्वयं भगवान की करुणा से भी ज्यादा है, कह रहे है की आळ्वार संत द्वारा रचित तिरुवाय्मौली स्वयं भगवान द्वारा कही गयी श्रीमद्भगवद गीता से ज्यादा कारुणिक है।

अरुळ् कोण्डाडुम् अडियवर् इन्बुऱ

अरुळिनान् अवरुमारैयिन् पोरुळ्

अरुळ् कोण्डु आयिरम् इन् तमिळ् पाडिनान्

अरुळ् कण्डीर् इव् वुलगिनिल् मिक्कदे

भागवतों और भगवद गुणानु रागियों के प्रसन्न चित्तार्थ, नम्माळ्वार ने  वेदों के तत्व सार को  (तिरुवाय्मौली) सहस्त्रगीति में समझाया है, नम्माळ्वार की यह कृति भागवतों पर भगवान कि करुणा से भी ज्यादा ही है।

नवम पाशुर:

इस पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कहते  है की, नम्माळ्वार ने इनकी दीनता को अनदेखा कर, वेदों के सार का ज्ञान इन्हे दिया, और बतलाया की मानव को सदा भगवान का सेवक बन कर रहना चाहिये, इसके लिये में सदा सदा के लिये आळ्वार संत का ऋणी हूँ।

मिक्क वेदियर् वेदत्तिम् उट्पोरुळ्

निऱ्कप् पाडि एन् नेन्जुळ् निऱुत्तिनान्

तक्क सीर्च् चटकोपन् नम्बिक्कु आट्

पुक्क कादल् अडिमैप् पयन् अन्ऱे

नम्माळ्वार् ने मुझे वेदों का सार बतलाया है, जिनका  सिर्फ महानतम विद्वानों के द्वारा ही पठन होता है, आळ्वार संत की यह कृपा मेरे मन में सदा के लिये घर कर गयी, इससे मुझे यह नम्माळ्वार का विशिष्ट सेवक होने का आभास हो रहा है।

दशम पाशुर:

इस दशम पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कहते है की नम्माळ्वार ने उन पर इतनी विशिष्ट कृपा की है, जिसका ऋण वह जीवन भर नहीं उतार सकते ।

इस कारण नम्माळ्वार के चरणों में अति प्रगाढ़ प्रेम उत्पन्न हो गया।

पयन् अन्ऱु आगिलुम् पान्गु अल्लर् आगिलुम्

सेयल् नन्ऱागत् तिरुत्तिप् पणि कोळ्वान्

कुयिल् निन्ऱु आर् पोयिल् सूळ् कुरुगूर् नम्बि

मुयल्गिन्ऱेन् उन् तन् मोय् कळऱ्कु अन्बैये

ओह, नम्माळ्वार आप उस तिरुक्कुरुगूर् में विराजते है, जो चहुँ और से वनो से घेरा हुवा है, उन वनों में कोयल की कुक गुंजायमान हो रही है, आप इस जग के लोगों को अकारण निस्वार्थ भाव में उचित ज्ञान देकर, निर्देश देकर  भगवान की सेवा में लगा रहे हो, ऐसे निस्वार्थ संत के प्रति मेरा मोह बढ़ रहा है।

एकादश पाशुर:

इस एकादश पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कह रहे है, जो कोई भी इन प्रबंध पाशुरों को कंठस्थ कर नित्य पठन करले, निश्चय ही वह श्रीवैकुण्ठ को प्राप्त करेगा, क्योंकि श्रीवैकुण्ठ नम्माळ्वार (विष्क्सेनजी के अवतार) के सञ्चालन में है। इसका लक्षित सार यह है की, आळ्वार तिरुनगरि में भगवान आदिनाथार पेरुमाल है और नम्माळ्वार इस तिरुकुरुगुर के नायक है, जबकि श्रीवैकुण्ठ का संरक्षण संचालन तो सिर्फ नम्माळ्वार के हाथ में है।

अन्बन् तन्नै अडैन्दवर्गट्कु एल्लाम्

अन्बन् तेन् कुरुगूर् नगर् नम्बिक्कु

अन्बनाय् मदुरकवि सोन्न सोल्

नम्बुवार् पदि वैकुन्दम् काण्मिने

अपने भक्तो भागवतों के प्रति पेरुमाळ को अत्यधिक स्नेह होता है, नम्माळ्वार को भी पेरुमाळ के भक्तों से प्रेम होता है, पर में मधुरकवि, सिर्फ नम्माळ्वार से प्रेम करता हूँ।

मेरे द्वारा रचित यह प्रबंध पाशुरों का जो भी पठन करेगा वह श्रीवैकुण्ठ में वास करेगा।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/04/kanninun-chiruth-thambu-simple/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

तिरुप्पल्लाण्डु – सरल व्याख्या

।।श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः।।

मुदलायिरम्

pallandu

श्री मणवाळ मामुनिगळ् ने अपनी उपदेश रत्नमालै के १९ वे पाशुर में तिरुप्पल्लाण्डु की महत्ता बहुत ही सुन्दर ढंग से समझायी है।

पशुराम    १९ .

कोदिलवाम् आळ्वार्गळ् कूऱु कलैक्केल्लाम्

आदि तिरुप्पल्लाण्डु आनदुवुम् – वेदत्तुक्कु।

ओम् एन्नुम्म् अदुपोल् उळ्ळदुक्केळ्ळाम् सुरुक्काय्त्

तान् मन्गलम् आनदाल्।।

श्री मणवाळ मामुनिगळ्, यहाँ दृढ़ मत प्रस्तुत कर रहे है की, वेद गायन के पहले , जिस तरह वेदों का सार प्रणव है , ठीक उसी तरह दिव्य प्रबंधं का सर तिरुपल्लाण्डु माना जाता है। इसी लिये तिरुपल्लाण्डु का अनुसंधान दिव्य प्रबंधं के प्ररंभ में किया जाता है।

पाण्ड्य राजा वल्लभदेव के दरबार में शास्त्रार्थ में भगवान श्रीमन्नारायण की सर्वोच्चता, प्रभुत्व स्थापित करने के बाद, राजा ने पेरिय आळ्वार के सम्मान में उन्हें ,गज पर आरूढ़ करवाकर नगर भ्रमण करवाये। अपने भक्त आळ्वार संत का यह सम्मान देखने स्वयं भगवान देवियों के साथ गरुडारुढ़ हो आ गये। आळ्वार संत भगवान को श्रीवैकुण्ठ को छोड़, इस चराचर जगत में आया देख, भगवान श्रीमन्नारायण के कुशल मंगल के लिये चिंतित हो गये, अपनी उसी अवस्था में प्रभु श्रीमन्नारायण को इस चराचर जगत में कोई तकलीफ न हो इसके लिये मंगलाशासन में,  गुणानुवाद में, यह प्रबंध गा उठे, इन्ही प्रबंधों के समूह, तिरुपल्लाण्डु कहलाये।इस तरह पेरिया आळ्वार ने स्वयं भी नारायण का गुणानुवाद करते हुये, इस भौतिक संसार वासियों से भी भगवद गुणानुवाद करवया।

इस तिरुपल्लाण्डु की सरल व्याख्या स्वामी पेरियावाचन पिल्लै द्वारा की गयी व्यख्या पर आधारित है। 

तनियन् 

गुरुमुखमनधीत्य प्राहवेदानशेशान्

नरपतिपरीकृलप्तम् शुल्कमादातु कामः।  

श्वसुरममरवन्द्यम् रन्गनाथस्यसाक्शात्

द्विजकुल तिलकम् तम् विष्णुचित्तम् नमामि ।।

पेरियाळ्वार, जिन्हें विष्णुचित्त स्वामीजी के नाम से भी जाना जाता है, ये आळ्वार संत किसी आचार्य के पास शिक्षा प्राप्त करने नहीं गए थे, इन्हें तो स्वयं तिरुमाल (भगवान) ने ही वेदांत ज्ञान और भक्ति समर्पण प्रदान किया था।

एक बार पांड्या राजा वल्लभदेव ने अपने दरबार में विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ की प्रतियोगिता रखी और जीतने वाले को पुरस्कार में स्वर्ण की मोहरें देने की घोषणा भी की। पेरियाळ्वार जो श्रीविल्लिपुत्तूर में भगवान वटपत्रशायि के पुष्प सेवा में अपना कैंङ्कर्य देते थे, इस प्रतियोगिता की बात सुन अपने मन में यह आशय किए की, अगर यह पुरस्कार इन्हें प्राप्त हो जाए तो वे भगवान वटपत्रशायि के मंदिर में सुधार का कार्य करवाएँगे। भक्त का आशय देख रात्रि स्वप्न में भगवान ने उन्हें आदेश दे दिया, पेरियाळ्वार भगवत आज्ञा पाकर, शास्त्रार्थ के लिए पांड्या राजा वल्लभदेव के दरबार में पहुँचे। विद्वानों की इस सभा में, वेदों के उद्घोष से भगवान श्रीमन्नारायण का परत्व स्थापित कर इस प्रतियोगिता को जीतकर, पुरस्कार स्वरुप स्वर्ण मोहरें प्राप्त किए। यही नहीं, आळ्वार संत ने अपनी पालित पुत्री देवी आण्डाळ का विवाह भी श्रीरंगम में भगवान रंगनाथजी के साथ संपन्न करवाया, जिससे नित्यसूरी ने इन्हें श्रद्धा से “श्री रंगनाथ श्वशुर” कहकर बुलाया। पेरियाळ्वार वेदाध्ययन करने वाले ब्राह्मण कुल में सर्वोच्च हैं।

“मिन्नार् तडमदिळ् सूळ् विल्लिपुत्तूर् एन्ऱु ओरुकाल्

सोन्नर् कळऱ्कमलम् सूडिनोम् – मुन्नाळ्

किळयऱुत्तान् एन्ऱुरैत्तोम् कीळ्मैयिनिल् सेरुम्

वळियऱुत्तोम् नेन्जमे वन्दु।।“

हे मन! चलो हम उन महानुभावों की चरणवंदना करते हैं, जो श्रीविल्लिपुत्तूर का गुणगान करते हैं, वह श्रीविल्लिपुत्तूर जिसकी बड़ी बड़ी दीवारें रौशनी सी चमकती हैं, वह श्रीविल्लिपुत्तूर जो हमारे माथे की मुकुट मणि है, जो पेरियाळ्वार की बातें करके हमें उनका यह स्मरण कराती है, उनका वह कार्य- पांड्य राजा के दरबार में जाकर शास्त्रार्थ में विजय होना, और जिनके हाथों में पुरस्कार का स्वर्ण मुद्राओं की थैली स्वयं आकर गिर गई।

“पाण्डियन् कोण्डाडप् पट्टर्पिरान् वन्दान् एन्ऱु

ईण्डिय सन्गम् एडुत्तूद – वेण्डिय

वेदन्गळ् ओदि विरैन्दु किळियऱुत्तान्

पादन्गळ् यामुडैय पऱ्ऱु।।“

पांड्या राजा वल्लभदेव भी पेरिय आळ्वार की बहुत प्रंशंसा करते हैं, सारे दरबारी, दरबार में शंखनाद कर कहते हैं, भट्टरपिरान ने भरे दरबार में वेदों के प्रमाण देते हुए भगवान श्रीमन्नारायण के परत्व को स्थापित किया है, ऐसे भट्टरपिरान के चरण ही हमारा आश्रय स्थान है।

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प्रथम पाशुर:

पहले पाशुर में,  पेरिया आळ्वार जैसे ही अपनी शोभा यात्रा में एम्पेरुमान को उभय देवियों के साथ अपने सुन्दर रूप संपन्न मंगल विग्रह के गरुडारुढ़ दर्शन करते है, उन्हें इस मृत्युलोक में आया देख, आळ्वार संत भगवान के सुन्दर सुकोमल चरणों की हलकी लालिमा भरे चरण देखते ही, उनके मन में आशंका आति है की कहीं भगवान को इस संसार की दृष्टी न लग जाये , वह भगवान के विजय गीत गाने शुरू कर देते है, जैसे एम्पेरुमान चिरंजीवी रहे।   

पल्लाण्डु पल्लाण्डु पल्लायिरत्ताण्डु

पल कोडि नूऱायिरम्

मल्लाण्ड तिन् तोळ् मणिवण्णा उन्

सेवडि सेव्वि तिरुक्काप्पु ।।

हे भगवान! मजबूत दिव्य कंधे हैं आपके, आप विशाल भुजा धारी हो, मल्लों का संहार करने वाले हो, आप बादलों के वर्ण वाले हो, आपके सुकोमल चरण, नवजात शिशु के चरणों की भाँति हलकी लालिमा लिए हुए हैं, यह सदा सुरक्षित रहे। यहाँ इस पाशुर में आळ्वार संत युगों युगों तक भगवान के चिरंजीवी होने का मंगलाशासन करते हैं।

द्वितीय पाशुर:

दूसरे पाशुर में आळ्वार संत एम्पेरुमान (भगवान) की परमपद (नित्यविभूति) और चराचर संसार (लीला विभूति)  में सर्वोच्च स्थान का वर्णन कर रहे है।

अडियोमोडुम् निन्नोडुम् पिरिविन्ऱि आयिरम् पल्लाण्डु

वडिवाय् निन् वलमार्बिनिल् वाल्गिन्ऱ मन्गैयुम् पल्लाण्डु

वडिवार् सोदि वलत्तुऱैयुम् सुडरालियुम् पल्लाण्डु

पडै पोर् पुक्कु मुलन्गुम् अप्पान्चसन्नियमुम् पल्लाण्डे।।

आपका और अकिंचन का सेवक और मालिक का रिश्ता सदा ऐसे ही बना रहे। पेरिय पिराट्टी (माता महालक्ष्मी) अतुलनीय रूपलावण्य से परिपूर्ण, सारे आभूषणों से शृंगारित आपके दाहिने वक्षस्थल पर सदा विराजित रहे। आपके दाहिने हाथ में सुदर्शन चक्रराज सदा सुशोभित रहे। आपके बायें हाथ में पाञ्चजन्य शंख, जिसकी ध्वनि से रणक्षेत्र में आपके शत्रुओं में कंप कंपी मच, उनका नाश हो जाता है, सदा शोभायमान रहे। यहाँ आळ्वार संत भागवतों के सम्बोधन से संसार को इंगित कर रहे हैं, और माता लक्ष्मीजी, शंख चक्र के सम्बोधन से परमपद को इंगित कर रहे हैं।

तीसरा पाशुर:

अपने तीसरे पाशुर से पाशुर से तीन पाशुरों तक पेरिया आळ्वार उन भागवतों का आह्वान कर रहे , जो इस चराचर जगत में भगवद अनुभव कर प्रसन्न रहना चाहते है, उन भागवतों को आह्वान कर रहे है जो कैवल्य गुणानुभव करना कहते है , उन भागवतों को आवाज़ दे रहे है जो श्री भगवन का कैंकर्य करने की इच्छा रखते है। इन सब्भी भागवतों को अपने साथ इस भगवद गुणगान में साथ रहने के लिये आमंत्रित कर रहे है।

वाळापट्टु निन्ऱीर् उळ्ळीरेल् वन्दु मण्णूम् मणमुम् कोण्मिन्

कूळाट्पट्टु निन्ऱीर्गळै एन्गळ् कुळुविनिल् पुगुदलुट्टोम्

एळाट्कालुम् पळिप्पु इलोम् नान्गळ् इराक्कदर् वाळ् इलन्गै

पाळाळ् आगप् पडै पोरुदानुक्कु पल्लाण्डु कूरुदुमे

आळ्वार संत यहाँ कह रहे हैं, अगर तुम भगवद सेवा रूपी अमूल्य निधि पाना चाहते हो, तो जल्दी आओ, भगवद उत्सव हेतु मिट्टी खोद के भूमि तैयार करो, यहाँ कोई भी सेवा करने हेतु तत्पर रहो, हम यहाँ सिर्फ प्रसाद पाने वाले भागवतों को नहीं बुला रहे, कई पीढ़ियों से हम बिना कोई त्रुटि के, सिवाय भगवद सेवा के, और कोई इच्छा नहीं रखी। हम यहाँ उन भगवान का गुणानुवाद कर रहे हैं, जो अपना धनुष लेकर लंका में रह रहे राक्षसों से युद्ध किए, तुम भी हमारे साथ सम्मिलित हो जाओ।

चतुर्थ पाशुर:

चतुर्थ पाशुर इसमें आळ्वार संत यहाँ भगवद कैंकर्य में रत महानुभावों के कैंकर्य से संतुष्टि नहीं पाकर, उन भागवतों को आमंत्रित कर रहे है, जो स्वयं आत्मानुभव करना चाहते है, आळ्वार संत इच्छा रखते है की भगवद कैंकर्य निधि की इच्छा रखने वाले, और स्वयं आत्मानुभव करने वाले भी भगवद गुणानुवाद में सम्मिलित होने चाहिये, आळ्वार संत कहते है की जो इस संसार में धन पाने में अनुरक्त है, वह कोई समय  कभी भी भगवद सेवा में अनुरक्त हो सकते है, पर कैवल्य मोक्ष को प्राप्त कैवलयार्थी जो सिर्फ आत्मानुभव में ही रहते है, आळ्वार संत उन्हें पहले बुला रहे है।

एडु निलत्तिल् इडुवदन् मुन्नम् वन्दु एन्गळ् कुळाम् पुगुन्दु

कूडुम् मनम् उडैयीर्गळ् वरम्बोळि वन्दु ओल्लैक् कूडुमिनो

नाडु नगरमुम् नन्गु अऱिय नमो नारायणाय एन्ऱु

पाडुम् मनम् उडैप् पत्तरुळ्ळीर् वन्दु पल्लाण्डु कूऱुमिने

आळ्वार संत इस पाशुर में, आत्मानुभव करने वाले भागवतों से कह रहे हैं, आप सब की भगवद गुणानुवाद में रुचि हो तो, भौतिक शरीर छूटने से पहले हमारे साथ मिलकर भगवद गुणानुवाद करो, अगर आपको दिव्य मंत्र के जपने के प्रति निष्ठा हो तो, अष्टाक्षर मंत्र जो श्रीमन्नारायण की महिमामंडन करता है, जिसके जपने से गाँव के साधारण मनुष्य या शहर में वासित विद्वान भी एम्पेरुमान की दिव्यता को पहचानते हैं, आओ हमारे साथ भगवान श्रीमन्नारायण का गुणानुवाद करो।

पंचम पाशुर:

इस पंचम पाशुर में, आळ्वार संत उन भागवतों को आह्वान कर रहे है, जो इस चराचर जगत की भव्यता में अनुरक्त है।

अण्डक्कुलत्तुक्कु अदिपदियागि असुरर् इराक्कदरै

इण्डैक्कुलत्तै एडुत्तुक् कळैन्द इरुडीकेसन् तनक्कु

तोण्डक्कुलत्तिल् उळ्ळीर् वन्दु अडि तोळुदु आयिर नामम् सोल्लिप्

पण्डैक्कुलत्तैत् तविर्न्दु पल्लाण्डु पल्लायिरत्ताण्डु एन्मिने

आळ्वार संत यहाँ कहते हैं की हम उस समूह में हैं जिसमें भगवान ऋषिकेश, जो दैत्य कुलों के नियंत्रक हैं, जो दैत्यों के समूल संहारक हैं, ऐसे भगवान के दासत्व भाव से परिपूर्ण है। आप भी हमारे समूह में सम्मिलित हो जाइए, भगवान श्रीमन्नारायण के श्रीचरणों की शरणागति कर उनके सहस्त्र नामों को उच्चार कर मोक्ष को प्राप्त कर जन्म मरण के चक्र – जिसमें जीव इस चराचर जगत में आकर पुनः भगवान से अन्यान्य भौतिक साधनों को माँग, उसी में अनुरक्त होकर भगवान को ही भूल जाता है – उससे मुक्त हो जाइए, और प्राप्त साधनों के लिए भगवद गुणानुवाद कीजिए।

षष्टम पाशुर 

इस पाशुर में आळ्वार संत तीनो प्रकार के भागवत समूह का आह्वान कर रहे है , इस तरह सभी भागवत समूह आकर आळ्वार संत के साथ भगवद गुणानुवाद में सम्मिलित होते है। इसमें वाळाट्पट्टु  (तृतीय पाशुर)  में आह्वानित भागवत जो भगवान का कैंकर्य करने के इच्छुक है, वह अपने कार्य करने की रुपरेखा और उसे संपन्न करने की अपनी प्रवीणता बतला रहे है जिसे आळ्वार संत स्वीकार कर लेते है।    .

एन्दै तन्दै तन्दै तन्दै तम् मूत्तप्पन् एळ्पडिगाल् तोडन्गि

वन्दु वळि वळि आट्चेय्गिन्ऱोम् तिरुवोणत्तिरुविळविल्

अन्दियम् पोदिल् अरियुरुवागि अरियै अळित्तवनै

पन्दनै तीरप् पल्लाण्डु पल्लायिरत्ताण्डु एन्ऱु पाडुदुमे

पिछले सात पीढ़ियों से, मैं और मेरे पिताजी, उनके पिताजी, उनके पिताजी, उनके पिताजी, वेदों में वर्णन किए अनुसार उन सुन्दर भगवान नृसिंह (जिनका सिर सिंह का है और बाकि धड़ मानव सा है) जिन्होंने, अपने भक्त की रक्षा के लिए ऐसा स्वरुप धर, दैत्य हिरण्य का संहार किया था। भगवान को इस दैत्य के संहार में जो भी थकान हुई है, उसे दूर करने हम भगवन के गुणानुवाद कर रहे हैं।

सप्तम पाशुर 

इस सप्तम पाशुर में आळ्वार संत उन कैवलयार्थी भागवतों को अपने संग स्वीकार कर रहे है, जो एडु निलत्तिल् (चतुर्थ पाशुर) में आळ्वार संत के साथ जुड़े थे। आह्वानित भागवत, अपने कार्य करने की रुपरेखा और उसे संपन्न करने की अपनी प्रवीणता बतला रहे है जिसे आळ्वार संत स्वीकार कर लेते है।

तीयिल् पोलिगिन्ऱ सेन्जुडर् आळि तिगळ् तिरुच्चक्करत्तिन्

कोयिल् पोऱियाले ओऱ्ऱुण्डु निन्ऱु कुडि कुडि आट् सेय्गिन्ऱोम्

मायप् पोरुपडै वाणनै आयिरम् तोळुम् पोळि कुरुदि

पायच् चुळऱ्ऱिय आळि वल्लानुक्कुप् पल्लाण्डु कूऱुदुमे

अपने बाहु मूल पर लाली लिये हुए वैभवपूर्ण चक्रांकन को देख, जो अग्नि से भी ज्यादा प्रकाशमान लग रहा है, उसका गौरव महसूस कर हम सभी आपका कैंकर्य करने के लिए यहाँ आए हैं। हमारे साथ हमारी अगली पीढ़ियाँ भी आपके कैंङ्कर्य में सम्मिलित रहेंगी। हम उन सुदर्शन चक्र धारी भगवान का गुणानुवाद कर रहे हैं जिन्होंने बाणासुर के सहस्त्र बाहु को काट दिए थे, जिससे उसके बाहुओं से रक्त की बाढ़ सी आ गई थी।

अष्टम पाशुर 

आळ्वार संत इस पाशुर में ऐश्वर्यार्थी (धन की कामना करने वाले) भागवतों को जो अण्डक्कुलत्तुक्कु (पांचवे पाशुर) में आळ्वार संत के साथ भगवद गुणानुवाद के लिये संग आये थे को स्वीकार कर रहे है। 

नेय्यिडै नल्ल्लदोर् सोऱुम् नियतमुम् अत्ताणिच् चेवगमुम्

कै अडैक्कायुम् कळुत्तुक्कुप् पूणोडु कादुक्कुक् कुण्डलमुम्

मेय्यिड नल्लदोर् सान्दमुम् तन्दु एन्नै वेळ्ळुयिर् आक्कवल्ल

पैयुडै नागप् पगैक्कोडियानुक्कुप् पल्लाण्डु कूऱुवने 

(इस पाशुर में ऐश्वर्यार्थी कह रहे हैं) हम उन एम्पेरुमान का गुणानुवाद करते है, जो हमें शुद्ध स्वादिष्ट, घी से तर प्रसाद पवाते हैं (आराधना में निवेदित किया हुआ नैवैद्य), जिनकी एकांत सेवा में निवेदित किए ताम्बूल (पान, सुपारी और पोदीना), गले के लिए कंठ हार, कर्ण में धारण करने कुण्डल, स्वास्थ्य के लिए उपकारी चन्दन का लेप, अडियेन को सद्बुद्धि प्रदान करने वाले वह भगवान जिनकी ध्वजा पर सर्पों के शत्रु गरुड़जी विराजमान हैं।

नवम पाशुर 

इस नवम पाशुर में आळ्वार संत ने वाळाट्पट्टु (तीसरे पाशुर) में जिन भागवतों को आमंत्रित किये थे, और जो छठवे पाशुर एन्दै तन्दै. में आळ्वार संत ने जिन्हे स्वीकार किया, यह सभी भागवत मिलकर एम्पेरुमान का गुणानुवाद कर रहे है।

उडुत्तुक् कळैन्द निन् पीदग आडै उडुत्तुक् कलत्तदुण्डु

तोडुत्त तुळाय् मलर् सूडिक्कळैन्दन सूडुम् इत्तोण्डगळोम्

विडुत्त तिसैक् करुमम् तिरुत्तित् तिरुवोणत् तिरुविळविल्

पडुत्त पैन्नागणैप् पळ्ळि कोण्डानुक्कुप् पल्लाण्डु कूऱुदुमे

यहाँ आळ्वार संत सभी भागवतों के साथ मिलकर कह रहे हैं, हे भगवान! हम आपके सेवक हैं, हम आपके धारण किए हुए कटिवस्त्र धारणकर, आपके निर्माल्य की तुलसीमाला धारणकर, आपको ही निवेदित नैवैद्य का उच्छिष्ट प्रसाद पाएँगे, हम अपने फन फैलाये शेषजी की शैया पर शयन कर रहे भगवान श्रीमन्नारायण, आपके हर कार्य को चहुँ दिशाओं में शेषजी पूर्ण कर देते हैं, ऐसे एम्पेरुमान के गुणानुवाद आपके मंगल तिरु नक्षत्र तिरुवोणम (श्रावण) नक्षत्र पर करेंगे।

दशम पाशुर

इस पाशुर में आळ्वार संत उन कैवलयार्थी आत्मानुभव करने वाले भागवत, जिनको आळ्वार संत ने  एडु निलत्तिल् (चतुर्थ पाशुर) में आमंत्रित किये थे, और जो तीयिल् पोलिगिन्ऱ पासुरम्. (सप्तम पाशुर) में स्वीकारे गये, के संग भगवान के गुणानुवाद कर रहे है।

एन्नाळ् एम्पेरुमान् उन् तनक्कु अडियोम् एन्ऱु एळुत्तुप्पट्ट

अन्नाळे अडियोन्गळ् अडिक्कुडिल् वीडु पेऱ्ऱु उय्न्ददु काण्

सेन्नाळ् तोऱ्ऱीत् तिरु मदुरैयुळ् सिलै कुनित्तु ऐन्दलैय

पैन्नागत् तलैप् पाय्न्दवने उन्नैप् पल्लाण्डु कूऱुदुमे

हे भगवान, हमने जबसे आपके कैंङ्कर्य में, आपकी सेवा में स्वयं को समर्पित किया है, तब से हमारा वंश आत्मानुभव के सुख से ऊँचा उठ गया है, हे कृष्ण! आपका शुभ मंगल दिवस में आविर्भाव हुआ है, जिन्होंने मथुरा में कंस के खेल उत्सव में धनुष को तोड़ दिया था ,जो कालिया दाह में कूद कर कालिया नाग के फनों पर नृत्य किए थे, हम सब मिलकर आपके ही गुणगान के गीत गाएँगे।

एकादश पाशुर

इस एकादश पाशुर में आळ्वार संत ऐश्वर्यार्थी भागवतों, जिनको संत ने अण्डक्कुलत्तुक्कु (पांचवे पाशुर) में आमंत्रित किये थे और जो “नेय्यिडै” अष्टम पाशुर में संग होते है। 

अल्वळक्कु ओन्ऱुम् इल्ला अणि कोट्टियर् कोन् अबिमानतुन्गन्

सेल्वनैप्पोल तिरुमाले नानुम् उनक्कुप् पळवडियेन्

नल्वगैयाल् नमो नारायणा एन्ऱु नामम् पल परवि

पल् वगैयालुम् पवित्तिरने उन्नैप् पल्लाण्डु कूऱुवने

हे लक्ष्मीरमण, आप तिरुकोष्टियुर में विराजित सेल्वनम्बि की तरह हैं, तिरुकोष्टियुर वासियों के नेता हैं, संसार में एक रत्न की तरह हैं; जो आपके दास्य स्वरुप में सम्मानीय है, यह दास भी, युगों युगों से आप ही का सेवक है, हे भगवान! आप अपने मूल स्वभाव गुण रूप से सबको सुख, संपत्ति, ऐश्वर्य प्रदान करते हैं, यह दास भी आपके अष्टाक्षर मंत्र से आपका ध्यान करेगा और सहस्त्रनाम संकीर्तन करेगा।

द्वादश पाशुर 

तिरु पल्लाण्डु के इस अंतिम पाशुर में, आळ्वार संत बतला रहे है की जो भी भागवत इस प्रबंध से भगवान् को,  समर्पित भाव से, भगवान का मुखोल्लास कर गुणगान करेंगे, निश्चित ही एम्पेरुमान की प्रीती पाकर, काल चक्र के अंत तक सेवा का सौभाग्य प्राप्त करेंगे, इसके साथ ही आळ्वार संत ने इस प्रबंध को पूर्ण किये है। 

पल्लाण्डु एन्ऱु पवित्तिर्नैप् परमेट्टियैच् चार्न्गम् एन्नुम्

विल् आण्डान् तन्नै विल्लिपुत्तूर् विट्टुचित्तन् विरुम्बिय सोल्

नल् आण्डेन्ऱु नविन्ऱु उरैप्पार् नमो नारायणाय एन्ऱु

पल्लाण्डुम् परमात्मनैच् चूळ्न्दिरुन्दु एत्तुवर् पल्लाण्डे

यह द्वादश प्रबंध यह कह रहा है, यह प्रबंध विष्णुचित्त (पेरिय आळ्वार), जिनका प्राकट्य श्रीविल्लिपुत्तूर में हुआ, जो भगवान श्रीमन्नारायण के धनुष के अंश हैं, जो सदा परमपद (श्रीवैकुण्ठ) में विराजते हैं, जिनकी सदा यह अभिलाषा रहती है की एम्पेरुमान का सदा मंगल हो, भागवतों को सदा अनुकूल समय जान कर, अष्टाक्षर मंत्र का ध्यान करते हुए, सदा भगवान श्रीमन्नारायण की परिक्रमा करते हुए, उनका मंगल, पल्लाण्डु (भगवान जब तक पृथ्वी पर रहे तब तक सदा अनुकूल रहे, सुखी रहे ) गाना चाहिए।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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शरणागति गद्य – चूर्णिका 8-9

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 7

चूर्णिका 8 और 9 लघु है, इसीलिए हम इन्हें साथ में देखेंगे। प्रथम चूर्णिका 8:

अवतारिका (भूमिका)

चूर्णिका 7 श्रवण करने पर भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी से पूछते है, “क्या में मात्र आपके लिए ही पिता, माता, संबंधी आदि हूँ?”, जिसके प्रति उत्तर में इस चूर्णिका में श्री रामानुज स्वामीजी कहते है “आप इस ब्रह्मांड के सभी रचनाओं के लिए ये सभी रूप में है” । अब, इस चूर्णिका को देखते है:

पितासी लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान I
न त्वत्समोस्त्यभ्यधिक: कुतोन्य
लोकत्रयेप्यप्रतिमप्रभाव II

विस्तारपूर्वक अर्थ

पितासी लोकस्य चराचरस्य – पिता – पिता; असि – है अथवा किया जा रहा है; लोक – संसार; अस्य – यह; चर – वह जो चल सकता है; अचर – वह जो स्थिर है। आपने सभी सत्व जैसे पशु, पौधे, मनुष्य आदि की रचना की है जो चर है अथवा स्थिर रूप में है और इसलिए आप ब्रह्मांड के सभी रचनाओं के पिता है।

त्वमस्य पूज्यस्य – त्वं – आप; अस्य – यह; पूज्य – सम्मानित। आप सभी रचनाओं के लिए पूजनीय है। ये सभी सब प्रकार से आप पर आश्रित है और आप पर निर्भर है।

गुरुर गरीयान – गुरु – शिक्षक (आचार्य); गरीयान – सबसे उच्च, अत्यंत दुर्लभ से प्राप्त। पिछली पंक्ति में पूज्य शब्द का संबंध भगवान से था जिन्हें सभी रचनाओं के पिता कहा गया है; यहाँ (इस पंक्ति में), गरीयान  से अर्थ है उनके ज्ञान प्रदान करने के गुण से है और इसलिए यह पूजनीयता और सम्मान शब्दों की सीमा को परिभाषित करते है।

न त्वत्समोस्त्यभ्यधिक: कुतोन्य –  – नहीं; त्वं – आप; सम – समान; अस्ति – यह; अभ्यधिक – असाधारण अथवा श्रेष्ठ; कुत – कहाँ; अन्य – दूसरे।

ऐसा अन्य कोई नहीं है जो आपके समान है। तो ऐसा कोई कैसे हो सकता है जो आपसे श्रेष्ठ हो? आप सभी से उच्च और श्रेष्ठ है, ऐसा श्रीरामानुज स्वामीजी कहते है।

लोकत्रयेप्य अप्रतिम प्रभाव – लोकत्रयेप्य – तीन भिन्न प्रकार के जीवों में से – बद्धात्मा (हमारी तरह संसारी, जो इस भौतिक संसार में रहते है), मुक्तात्मा (वह जिन्होने संसार से मुक्त होकर श्रीवैकुंठ में स्थान प्राप्त किया) और नित्यात्मा (वे जो कभी भी भौतिक संसार से जुड़े नहीं है और जो सदा से ही नित्य विभूति, श्रीवैकुंठ में निवास करते है); अप्रतिम – अद्वितीय अथवा अतुल्य; प्रभाव – असर।

आपका इस संसार की तीन विभिन्न आत्माओं पर अतुल्य प्रभाव है। आप अत्यंत ही महान है!

आइए अब चूर्णिका 9 की और अग्रसर होते है:

अवतारिका (भूमिका)

श्रीरामानुज स्वामीजी शरणागति करने पर भी क्षमा याचना कर रहे है। परंतु उन्होने ऐसा क्या अपराध किया जिसके लिए वे क्षमा याचना कर रहे है? उन्हें प्रतीत होता है कि वे एक समय से शास्त्रों द्वारा निषेध बहुत से कार्यो में लिप्त थे, जिस प्रकार एक विवाहित स्त्री अपने पति को छोडकर अन्य किसी के साथ लंबे समय के लिए बाहर जाती है और फिर पति के समक्ष लौटकर उनसे शरण और सुरक्षा मांगती है, और पति से यहाँ तक कहती है कि इस घोर अपराध के होते हुए भी उसकी रक्षा करना पति का दायित्व है। किसी स्त्री के द्वारा किया ऐसा कार्य अपराध कि चरम श्रेणी में आता है; श्रीरामानुज स्वामीजी कहते है कि अनेकों जन्मों के पश्चात, अन्य देवताओं कि शरण में जाकर और शास्त्रों द्वारा अस्वीकार कार्यों में लिप्त होकर वे अब भगवान के श्रीचरणों में आए है। परंतु प्रथम स्थान में समर्पण क्यूँ? क्यूंकी किसी भी समय अभी या अन्य में शरणागति संभव नहीं है, जिस प्रकार काकासुर ने श्री रामायण के समय में कि थी, वैसे ही भगवान के श्रीचरणों में समर्पण करना होता है। इस प्रकार, समर्पण से ही अपनी सभी पिछली भूलों का अनुभव होता है और उसकी क्षमा याचना होती है।

तस्मात प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम I
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्यु:
प्रिय: प्रियायार्हसी देव सोढुम II

विस्तारपूर्वक अर्थ

तस्मात – इसप्रकार’; यहा भगवान को जीवात्मा के सभी निकट संबंधियों के समान बताया गया है (माता, पिता, संबंधी, गुरु जैसा कि चूर्णिका 7 और 8 में देखा)। एक पति अथवा पत्नी कुछ पापों को क्षमा कर देते है। एक पिता कुछ अपराधों को क्षमा करते है, उसी प्रकार एक माता अथवा भ्राता या ऐसा कोई संबंधी। क्यूंकी भगवान में ये सभी संबंध निहित है, श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान से अभी तक हुए सभी अपराधों कि क्षमा याचना करते है।

प्रणम्य – श्रद्धापूर्वक मन से प्रणाम करना

प्रणिधाय कायम – तन से प्रणाम करना;

क्यूंकी उन्होने तन और मन दोनों से श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया है, यह वचन से भी प्रणाम करने के समान ही है, इसप्रकार उन्होने शास्त्रों में उल्लेख किए गए तीनों कारण से प्रणाम प्रस्तुत किया (मानो वाक कायम – मन, वचन और काया)।

प्रसादये – प्रस्तुत करना; यहाँ किसी प्रस्तुत करना है और किसे?

ईशमीद्यम त्वाम – ईशन –नाथ या वह जो सबके स्वामी हो; ईदयन – वह जो श्रेष्ठ/ उत्तम पूजनीय हो; त्वाम – आप. यहाँ श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान से निवेदन करते है कि भगवान स्वयं को श्री रामानुज स्वामीजी को प्रदान करे। जब भगवान स्वयं को अपने आश्रित (जिसने समर्पण किया हो) को प्रस्तुत करने का निर्णय करेंगे तब उन्हें प्रश्न कौन करेगा? श्रीरामानुज स्वामीजी कहते है कि उन्होने अनेकों अपराध किए है; भगवान को पूजने और उनके किर्तिगान करने के बजाये वे उनकी उपेक्षा और द्वेष करते रहे। भगवान ही श्रीरामानुज स्वामीजी के इन सभी अपराधों को क्षमा कर स्वयं को श्रीरामानुज स्वामीजी को प्रदान करेंगे।

अहम – मैं (श्रीरामानुज स्वामीजी), जो, आपको पूजने और आपकी प्रशंसा करने के बजाये, इन सभी दिन आपसे विमुख था और विभिन्न अपराधों मेँ लिप्त था। भगवान सोचते है कि इतने अपराधों और मुझसे विमुख होने पर भी श्रीरामानुज स्वामीजी को क्यूँ क्षमा करना चाहिए? श्रीरामानुज स्वामीजी इसके लिए नीचे उल्लेखित तर्क देते है।

पीतेव पुत्रस्य– पिता– पिता; एव – केवल; पुत्र – पुत्र;  अस्य – यह। उसीप्रकार जिस प्रकार एक पिता अपने पुत्र के अपराधों को क्षमा करते है,

सखेव सख्यु: – सखा – मित्र। जिसप्रकार एक सखा अपने सखा की गलतियों को क्षमा करता है,

प्रिय: प्रियाया: – प्रिय – प्रियजन। जिसप्रकार एक स्त्री अथवा पुरुष अपने प्रियतम को क्षमा करते है,

सोड़ुम – आप मुझसे सब प्रकार से संबन्धित है और इसलिए आप इस दास को क्षमा करेंगे

देव अरहसी – देव – आप; arhasi – योग्य। श्री रामानुज स्वामीजी कहते है कि भगवान उनके सब प्रकार के संबंधी है, और वे ही मुझे क्षमा करने के लिए सभी प्रकार से उपयुक्त है।

इसी के साथ, श्रीरामानुज स्वामीजी पुराणों और शास्त्रों से उल्लेख को पूर्ण करते है। अगले वे बताएँगे कि उनके द्वारा क्या अपराध बने है। यह सब हम 10वी चूर्णिका मेँ देखेंगे।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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शरणागति गद्य – चूर्णिका 7

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शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 6 – भाग 6

अवतारिका (भूमिका)

जैसा की पिछले चूर्णिका में बताया गया है, श्री पेरियवाच्चान पिल्लै प्रश्न करते है कि क्या हमारे द्वारा त्याग किया सभी कुछ हमारे लिए हानि नहीं है। वे प्रतिउत्तर में कहते है कि यह हानि नहीं है क्यूंकि भगवान स्वयं ही हमारे लिए सब कुछ है।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च गुरुस्त्वमेव
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देव

विस्तारपूर्वक अर्थ

त्वमेव माता च पिता त्वमेव – त्वम – आप; एव -मात्र,  – और। एक पिता जो की बालक के जन्म के पश्चाद उसके कल्याण के विषय में कार्य प्रारम्भ करता है, उस पिता से भिन्न उसकी माता उस बालक की रक्षा और प्रेम उसके गर्भधारण से ही प्रारम्भ कर देती है। इसलिए प्रधानता माता की है। भगवान भी पिता है, पिता भी बालक की रचना में समान भागीदार है। हमारे संप्रदाय में सम्पूर्ण रचना भगवान द्वारा की गयी है, श्रीअम्माजी के द्वारा नहीं और इसलिए भगवान ही हमारी माता और पिता दोनों है।

त्वमेव बन्धुश्च – आप ही हमारे संबंधी हो। संबंधियों का साथ व्यक्ति को जीवन में अनुचित पथ पर जाने से रोकता है, उसका नियंत्रण करता है और सत्य पथ की और उसका मार्गदर्शन करता है। भगवान भी अंतरात्मा (आत्मा में विद्यमान) है। इसलिए वे भी जीव का मार्गदर्शन करते है और संबंधियों के समान पथप्रदर्शन है।

गुरुस्त्वमेव – आप ही आचार्य (गुरु) है। गुरु शब्द में “गु” अर्थात अंधकार और “रु” का अर्थ है नकारने वाला। अर्थात गुरु वे है जो अंधकार को नकारते है– अन्य शब्दों में वे प्रकाशित करते है। भगवान इस संसार में विद्यमान अज्ञान के अंधकार को हटाते है और मोक्ष प्रदान करते है इसलिए वे गुरु है। हमारे संप्रदाय में, वे ही प्रथम आचार्य हैजैसा की हमारी गुरूपरंपरा में उल्लेख किया गया है। वे हमें सभी प्रकार के साधन और सहायता प्रदान करते है जो हम में उन तक पहुँचने की रुचि उत्पन्न करती है – उन्होने वेद प्रदान किए (ज्ञान का स्त्रोत, जो चार भागों में विभाजित है- ऋग, यजुर, साम और अथर्व), शास्त्र, पुराण (पौराणिक विलेख जैसे विष्णु पुराण, गरुड पुराण आदि), इतिहास  (श्रीरामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य) प्रदान किए, आलवारों और आचार्यों की रचना की यह बताने के लिए वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास, आदि में भगवान ने क्या कहा और किया है, हमें अपने दिव्य स्वरूप के दर्शन प्रदान किए (रूप जो अर्चा मूर्ति में दिव्यादेशों में देखा जा सकता है) –  भगवान ने ये सभी किया जिससे हम सांसारिक भोगो के दूर होकर भगवान तक पहुँचने की प्रेरणा प्राप्त करे। जैसा की पहले देखा गया है, वे हम में उन तक पहुँचने की चाह उत्पन्न नहीं करते अपितु एक बार हम वह चाहना स्वयं दिखावे तो वे उसे विकसित करते है और आगे बढाते है। वे वास्तव में एक महान शिक्षक है, गुरु

त्वमेव विद्या – आप ही हमारे लिए प्रचारित ज्ञान हैं। वे “ज्ञान” कैसे हो सकते है? वे वेदों के प्रदाता है जो वेद ज्ञान प्रदान करते है। क्यूंकी वेदों और वेदान्तों (उपनिषद, वेदों का अंतिम भाग) के विभिन्न भाग उनके नियंत्रण में है और वे ही इन वेदों द्वारा व्याख्यायित और प्रस्तावित तत्व है, इसलिए वे ही ज्ञान है।

द्रविणं त्वमेव – आप ही धन संपत्ति है। यहाँ संपत्ति से आशय मात्र धन से नहीं है अपितु वह सब वस्तु है जिनका हम आनंद लेते है– उदाहरण के लिए, माला, चन्दन का लेप, भोजन सामाग्री, संपत्ति आदि। और न केवल प्रत्यक्ष वस्तुएं अपितु अप्रत्यक्ष वस्तुएं भी संपत्ति है जैसे परभक्ति, परज्ञान, आदि (जो हमने चूर्णिका 5 में देखी है)। श्रीभगवान के उत्कृष्ट चरणकमल ही उन तक पहुँचने का मार्ग है और वे भी संपत्ति है।

त्वमेव सर्वं – जो भी अनकहा रह गया है वो सभी आप ही है।

मम देव देव –सब साधन त्याग कर आपके शरण हुआ हूँ, आप ही मेरे स्वामी हो मेरे नाथ हो। आप ही श्रीवैकुंठ में नित्यसुरियों और मुक्तात्माओं के स्वामी हो और आप मेरी भी नाथ हो।

आइए अब चूर्णिका 8 की और बढ़ते है।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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आर्ति प्रबंधं – ६०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५९

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उपक्षेप

आर्ति प्रबंधं के इस अंतिम पासुरम में मामुनिगळ विचार करतें हैं, “ हमें अपने लक्ष्य के विषय में और क्यों तृष्णा हैं? पेरिय पेरुमाळ से श्री रामानुज को सौंपें गए सर्वत्र, श्री रामानुज के चरण कमलों में उपस्थित उन्के सारे बच्चों के भी हैं।” यहीं अत्यंत ख़ुशी प्रकट करतीं हैं इस अति अद्भुध ग्रंथ की अंतिम पासुरम।  

 

मणवाळ मामुनिगळ तिरुवडिगळे शरणम!

पासुरम ६०

इंद अरंगत्तु इनिदु इरु नीयेन्ड्रु अरंगर

एंदै एतिरासर्क्कींद वरं सिंदै सैय्यिल

नम्मदंरो  नेंजमे नट्रादै सोमपुदल्वर

तम्मदंरो तायमुरै तान

 

शब्दार्थ

अरंगर  – पेरिय पेरुमाळ

इंद अरंगत्तु  – कोयिल (श्रीरंगम) में

इनिदु इरु नीयेन्ड्रु  – “श्रीरंगे सुखमास्व” (श्रीरंगम में सुखी रहो )कहें

एंदै एतिरासर्क्कु – मेरे पिता एम्पेरुमानार (से)

नेंजमे  – हे मेरे हृदय

सिंदै सैय्यिल  – अगर हम इस पर विचार करें तो

इंद वरं – पेरिय पेरुमाळ से एम्पेरुमानार को सौंपे गए वरदान

नम्मदंरो  – क्या यह सच नहीं हैं कि यह वर हमारा भी है ?

नट्रादै – एम्पेरुमानार हमारें पिता

तायमुरै तान – क्योंकि हमारें माता-पिता के

सोमपुदल्वर तम्मदंरो  – संपत्ति खुद बच्चों को जाता हैं

(मामुनि अपने हृदय को कहतें हैं, “ अत: हे मेरे प्रिय हृदय। अब हमारे लिए करने केलिए कुछ नहीं हैं, हमारा भोज अब भोज न रहा , क्योंकि श्री रामानुज कृपा से वर देकर, संकटों को मिटा चुके हैं।”)  

 

समाप्ति टिप्पणि

पेरिय पेरुमाल श्री रामानुज को नित्य विभूति (परमपद) और लीला विभूति (परमपद से अन्य सर्वत्र) अपनी सारी संपत्ति सौंपे। इसीलिए धाटी पञ्चकं के ५वे श्लोक से श्री रामानुज, “श्री विष्णु लोक मणि मण्डप मार्ग दायी” कहलातें हैं। एम्पेरुमानार सारें प्रपन्नों के नेता हैं और इन्हीं के प्रति “जीयर” तथा “यतींद्र प्रवणर” दिव्य नामों से पहचाने जाने वाले मणवाळ मामुनिगळ ने प्रपत्ति किया। मामुनि को सर्व श्रेष्ट और अंतिम लक्ष्य परमपदं प्राप्त हुआ और वहाँ भगवान और भागवतों के प्रति नित्य कैंकर्य भी मिला। इसका अर्थ यह है कि यहीं फल हर किसी को मिलेगा जो  एम्पेरुमानार के सद्भाव के पात्र हैं। अर्थात श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों में शरणागति करने पर हर किसी को उनका प्रेम तथा आश्रय प्राप्त होगा जो उन्हें नित्यानंद का निवास परमपदं तक पहुँचायेगा।

 

सरल अनुवाद

इस अंतिम पासुरं में श्री रामानुज के संबंध के कारण, प्रार्थना किये गए सारें वरों के प्राप्ति निश्चित होने के कारण मामुनि आनंद में हैं। यह संभव हैं  क्योंकि, जैसे गद्य त्रयं के पँक्तियो से प्रकट होता हैं : पेरिय पेरुमाळ ने अपनी सारे संपत्ति एम्पेरुमानार को सौंप दिए। एम्पेरुमानार के वत्स होने के कारण मामुनि को ख़ुशी है कि पेरिय पेरुमाळ से एम्पेरुमानार को सौंपे गए वे सारे विषय( शेष जीवन के समय में यहाँ कैंकर्य से लेकर परमपदं में नित्य कैंकर्य तक) वें (मामुनि) भी अनुभव कर सकतें हैं।

 

स्पष्टीकरण

मामुनि अपने हृदय को कहतें हैं, “हे मेरे प्रिय हृदय, “शरणागति गद्य” के शब्दों को स्मरण करतें हुए, हमारे पिता एम्पेरुमानार को पेरिय पेरुमाळ नें जो बताया उस विषय पर ध्यान करो। पहले पेरुमाळ कहें, “द्वयं अर्थानुसन्धानेन सहसदैवं वक्ता यावच्चरीर पादं अत्रैव श्रीरँगे सुखमास्व” .  इस्के पश्चात “शरीर पाद समयेतु” से शुरु और “नित्यकिंकरो भविष्यसि माते भूतत्र समशय: इति मयैव ह्युक्तम अतस्तवं तव तत्वतो मत्ज्ञान दरशनप्राप्तिशु निसशंसय: सुखमास्व” तक पेरुमाळ कहतें हैं। पेरिय पेरुमाळ हमारे पिता एम्पेरुमानार को शेष जीवन केलिए आवश्यक विषय(कैंकर्य ) तथा परमपदं में कैंकर्य भी सौंपे। विचार करने से एहसास होता हैं कि एम्पेरुमानार के बच्चें होने के कारण हमें भी यह सब प्राप्त होगा।  अत: प्रिय हृदय, खुद के रक्षा हेतु हमें कुछ भी नहीं करना है। अत: एम्पेरुमानार के कृपा के कारण हमें सर्व प्राप्त होगा। पेरिय पेरुमाळ परमपद जो नित्य विभूति है और अन्य सारा सृष्टि जो लीला विभूति है दोनों को एम्पेरुमानार को सौंपे। इसीलिए एम्पेरुमानार, धाटी पञ्चकं के ५वे श्लोक “श्री विष्णु लोक मणि मण्डप मार्ग दायी” से प्रशंसा किये जातें हैं। एम्पेरुमानार प्रपन्नों के नेता हैं और उन्के प्रति “जीयर” तथा “यतींद्र प्रवणर”नाम से पहचाने जाने वाले मणवाळ मामुनिगळ शरणागति किये। उन्हें परमपद पहुँच कर भगवान तथा भागवतों को नित्य कैंकर्य करने का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य प्राप्त हुआ।  अर्थात यहीं फल एम्पेरुमानार से सम्बंधित और उन्के सद्भाव के पात्र सारे जनों को यह प्राप्त होगा. और इससे हम समझ सकतें हैं कि एम्पेरुमानार के दिव्य चरण कमलों में शरणागति करने वाले सारे लोगो को स्वामि रामानुज के प्रेम और आश्रय प्राप्त होगा और इस दिव्य शुरुवात के संग ही वें सब निश्चित रूप में नित्यानंद की निवास परमपद को हमेशा केलिए प्राप्त करेँगे।

अनेकों बार एतिरासा! एतिरासा! पुकार कर मामुनिगळ यह संदेश देतें हैं कि एम्पेरुमानार यतियों के नेता हैं। उन्के सारे शिष्य स्वामि यतिराज के दिव्य नामों को लगातार  जप कर उन्को प्रशँसा करतें हैं। स्वामि के शिष्य होने के कारण, मामुनि “यद्यसुधसत्व:” के अनुसार यतिराज के दिव्य नामों को जपना अपना हक़ समझतें हैं। इसलिए मामुनिगळ हमें भी जपने को कहतें हैं:“एतिरासा! एतिरासा !    

जीयर तिरुवडिगळे शरणं

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ५७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५६

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उपक्षेप

मामुनिगळ इस पासुरम में श्री रामानुज के एक काल्पनिक  प्रश्न कि उत्तर प्रस्तुत करतें हैं। श्री रामानुज के प्रश्न:” हे मामुनि! हम आपके विनम्र प्रार्थनाओं को सुनें। आप किस आधार पर , किसके सिफ़ारिश पर मुझें ये प्रार्थना कर रहें हैं ?” मामुनि उत्तर में कहतें हैं, “मेरे आचार्य तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै के दिव्य शरण कमलों में शरणागति करने के बाद खुद को एक उचित वस्तु ही समझा। मेरे पास वही एकमात्र योग्यता और रत्न हैं। “यतीश्वर श्रुणु श्रीमन कृपया परया तव” के प्रकार कृपया मेरे इन नीच शब्दों को सुनें।    

 

पासुरम ५७

देसिगरगळ पोठ्रुम तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै

वासमलर ताळ अड़ैंद वत्तुवेन्नुम

नेसत्ताल एन पिळैगळ काणा एतिरासरे

अडियेन पुनपगरवै केळुम पोरुत्तु

 

शब्दार्थ:

वासमलर ताळ अड़ैंद वत्तुवेन्नुम – मैं एक वस्तु हूँ जिसने शरणागति किया , सुंगंधित और कोमल दिव्य चरण कमलों में

देसिगरगळ पोट्रुम तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै – तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के।  उन्हें हमारें पूर्वज, “सेंतमिळ वेद तिरुमलैयाळवार वाळि” से प्रशंसा करतें हैं।  वें नम्माळ्वार के प्रति गहरे और अटल सेवा भाव के संग थे और अपने जीवन आळ्वार के पासुरमो के सहारे ही बिताते थे।  

नेसत्ताल  – इस संबंध के कारण

एतिरासरे  – एम्पेरुमानारे

केळुम – कृपया सुनिए

अडियेन – मेरे

पुनपगरवै  – नीच शब्द

एन पिळैगळ काणा – मेरे दोषों को देखे बिना

पोरुत्तु – गुस्से के बिना

 

सरल अनुवाद

मामुनि श्री रामानुज को (मामुनि के आचार्य)तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के संग उपस्थित अपने संबंध को देखने केलिए विनति करतें हैं।वे गुस्से के बिना अपने दोषों को उपेक्षा कर अपनी नीच शब्दों को सुन्ने केलिए श्री रामानुज से विनती करतें हैं।    

 

स्पष्टीकरण

श्री रामानुज मामुनिगळ से कहतें हैं, “ सेंतमिळ वेद तिरुमलैयाळवार वाळि” से प्रशंसाा  किये जाने वाले तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के सुगंधित कोमल दिव्य चरण कमलों में शरणागति अनुसंधान किये वस्तु हूँ मैं। तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने नम्माळ्वार और उन्के ग्रंथों के प्रति गहरे और अटल सेवा भाव प्रकट किया था।  वे नम्माळ्वार के अमृत समान पासुरमो के स्मरण में ही अपना जीवन बिताएं।

हे एम्पेरुमानार! आपसे यह विनती हैं की मेरे आचार्य तिरुवाईमोळिपिळ्ळै के संबंध के कारण आप मेरे दोषों को उपेक्षा करें और बिना क्रोध के मेरे नीच शब्दों को सुनें।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ५३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५२

 

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि अपने अंतिम दिशा को वर्णन करते समय, पेरिय पेरुमाळ के गरुड़ में सवार उन्के (मामुनि को दर्शन देनें) यहाँ आने की बात भी बताया। इससे यह प्रश्न उठता है कि अपने अंतिम दिशा पर पेरिय पेरुमाळ के पधारने तक मामुनि क्या करेँगे ? मामुनि कहतें हैं कि, “उस अंतिम महान क्षण आने केलिए, सारे दुखों और पीड़ाओं की मूल कारण , इस शरीर को गिरना हैं। अत: हे रामानुज ! आप मुझे वह दीजिये जो उचित और आवश्यक है: दर्द और दुःख भरे इस सँसार से मुक्ति दिलाइये।  

 

पासुरम ५३

इदत्ताले तेन्नरंगर सेयगिरदु एन्ड्ररिन्दे

इरुंदालुम तर्काल वेदनैयिन कनत्ताल

पदैत्तु आवो एन्नुम इंद पाव उडंबुडने

पल नोवुं अनुबवित्तु इप्पवत्तु इरुक्कपोमो?

मदत्ताले वलविनैयिन वळी उळन्ड्रु तिरिंद

वलविनैयेन तन्नै उनक्कु आळाक्कि कोंड

इद तायुम तंदैयुमाम ऐतिरासा! एन्नै

इनि कडुग इप्पवत्तिनिन्ड्रुम एडुत्तरुळे

 

शब्दार्थ

इदत्ताले  – “हित” के कारण ( हमेशा अच्छाई केलिए सोचना और करना )

तेन्नरंगर- पेरिय पेरुमाळ (श्री रंगनाथ)

सेयगिरदुएन्ड्ररिन्दे इरुंदालुम – मेरे कर्मों के फल बुगतने दे रहें हैं , पर मुझे पता हैं कि यह भी मेरे हित में हैं।  

तर्काल वेदनैयिन कनत्ताल – उस समय के पीड़ाओं से मैं

पदैत्तु –  दर्द में तड़पा

आवो एन्नुम – दर्द और संकट में ले जाने वाली “हा” तथा “ओह” जैसे आवाज़ों को किया

इरुक्कपोमो?-  क्या मैं जी पाऊँगा ?

इप्पवत्तु –  इस तुच्छ सँसार में ?

इंद पाव उडंबुडने – इस शरीर के संग जो खुद पाप हैं

पल नोवुं अनुबवित्तु – और बहुत सारें दुःख एवं संकट झेलकर ?

मदत्ताले – इस शरीर के संबंध से

वलविनैयिन वळीउळन्ड्रु तिरिंद – मेरे कर्मों से निर्धारित मार्ग में भटकता गया और उसी यात्रा में था

वलविनैयेन तन्नै  – मैं जो सबसे क्रूर पापी हूँ

आळाक्कि कोंड – आप (एम्पेरुमानार) के कृपा से आपका सेवक बना

उनक्कु – आप जो इन जीवात्माओं के आधार हैं

इद तायुम – हित करने वाली माता के रूप में किया , और मेरे

तंदैयुमाम – पिता

ऐतिरासा! – हे एम्पेरुमानारे

इनि – इसके बाद

कडुग – शीग्र

एडुत्तरुळे – सुधारों और मुक्ति दो

एन्नै – मुझे

इप्पवत्तिनिन्ड्रुम – इस सँसार से

 

सरल अनुवाद

मामुनि मुक्ति केलिए श्री रामानुज से प्रार्थना ज़ारी रख्ते हैं। उनको यह ज्ञान होता हैं कि उन्की कर्मों को शीग्र मिटाने के लिए ही दयाळु पेरिय पेरुमाळ उन्को इतने पीड़ा दिए। यह जानते हुए भी कर्मों के फलों के तीव्रता असहनीय है। शरीर के संबंध से ही निरंतर बने इस काँटो से भरे मार्ग से मुक्ति कि प्रार्थना, मामुनि पिता और माता समान श्री रामानुज से करतें हैं।  

 

स्पष्टीकरण

इस विषय में अपना ज्ञान और परिपक्वता को प्रकट करतें हुए मामुनि कहतें हैं , “अरपेरुंतुयरे सेयदिडिनुम (ज्ञान सारम २१) तथा इस्के तुल्य अन्य पासुरमों से समझ में आता हैं कि उन्के “हित” गुण (जिस्से दूसरों के अच्छाई सोचना और उन्के बलाई केलिए कार्य करना) और उन्के आशीर्वाद के कारण ही मैं इतना दुःख और संकट झेल रहा हूँ। अर्थात, कर्म  मिटाने केलिए पीड़ाओं झेलना ही रास्ता है। यह समझते हुए भी पीड़ा अन्यभाव करते समय, अत्यंत दुःख पहुँचता है और इतना असहनीय है की मैं “हा”, “ ओह” चिल्लाता हूँ। जो शरीर इन पीड़ाओं का मूल कारण है मैं उस्से ही ये बेबसी का आवाज़ निकालता हूँ। इसी स्थिति मैं अनादि काल से हूँ , मेरा ऐसे रहना उचित है क्या ? मैं पाप के सिवाय और कुछ नहीं कर रहा हूँ।  इसी विषय को तिरुमंगैयाळवार भी कहतें हैं: “पावमे सेयदु पावि आनेन” (पेरिय तिरुमोळि १.९.९). शरीर के खींच में मग्न मैं उन दिशाओं में जाता हूँ और पाप करता जाता हूँ। लगातार किये जाने वाले इन पापों से मेरे दुःख और पीड़ा भी अधिक होतीं जा रहीं हैं। किंतु हे एम्पेरुमानार! मेरे माता और पिता होने के कारण और आपके “हितं” गुण के कारण आप ने मुझे स्वीकार कर आशीर्वाद भी किया हैं। अत: आपसे विनम्र प्रार्थना हैं कि मेरी निरंतर पीड़ाओं को मिटाकर इस सँसार के बंधनों से विमुक्त करें।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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आर्ति प्रबंधं – ५२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५१

 

उपक्षेप

मामुनि कहतें हैं कि, श्री रामानुज के असीमित कृपा के कारण उन्हें (मामुनि को) अपने व्यर्थ हुए काल कि अफ़सोस करने का मौका मिला।  आगे इस पासुरम में वें ,श्री रामानुज के कृपा की फल के रूप में ,पेरिय पेरुमाळ अपने तरफ पधारने कि अवसर को मनातें हैं। “श्रीमान समारूदपदंगराज:” वचनानुसार पेरिय पेरुमाळ के अपने ओर पधारने कि अवसर कि विवरण देतें हैं।  

पासुरम ५२

कनक गिरि मेल करिय मुगिल पोल

विनतै सिरुवन मेरकोंडु

तनुविडुम पोदु एरार अरंगर एतिरासरक्काग एनपाल

वारा मुन्निर्पर मगिळंदु  

शब्दार्थ

करिय मुगिल पोल –  बादलों के जैसे , जो मँडराते हैं

कनक गिरि मेल –  “मेरु” नामक सुनहरे पर्वत के ऊपर

अरंगर – पेरिय पेरुमाळ

सिरुवन – “वैनतेयन” तथा “पेरिय तिरुवडि” नामों से प्रसिद्द जो हैं उन्के ऊपर आने वाले , जो पुत्र हैं

विनतै  – विनता के

मेरकोंडु –  विनतै सिरुवन वाहन होने के कारण पेरिय पेरुमाळ उनमें सवार होकर आएँगे

तनुविडुम पोदु – जब मेरा शरीर गिरेगा

अरंगर – पेरिय पेरुमाळ जो हैं

आर – भरपूर

येर – सौँदर्य तथा गुणों से

एनपाल वारा – आएँगे मेरे जगह

एतिरासरक्काग  – यतिराज केलिए

(जैसे एक माँ आती हैं)

मुन्निर्पर – वें मेरे सामने खड़े होँगे

मगिळंदु – अत्यधिक ख़ुशी के सात

(पेरिय पेरुमाळ पधारेंगे, अपना दिव्य चेहरा दिखाएँगे, मुस्कुरायेंगे और मुझे भोग्य रूप से अनुभव करेंगे, यह निश्चित है )

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मामुनि अपने अंतिम स्थिति में पेरिय पेरुमाळ के पधारने कि सुन्दर दृश्य की विवरण देकर, ख़ुशी मनातें हैं।  वे कहतें हैं कि पेरुमाळ, “विनतै सिरुवन”, “पेरिय तिरुवडि” एवं नामों से प्रसिद्द अपने वाहन में पधारेँगे। मेरे पास आकर वें मुस्कराहट से अलंकृत अपने सुँदर दिव्य मुख दिखाएँगे। और यह सब वें एम्पेरुमानार केलिए करेँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “काँचनस्प गिरेस् श्रुंघे सगटित्तो यधोयधा” और “मंजुयर पोनमलै मेल एळुंद मामुगिल पोनड्रुलर (पेरिय तिरुमोळि ९.२.८) वाख्यो के जैसे सुनहरे पर्वत “मेरु” के ऊपर काले बरसात के मेघ मँडराते हैं। उसी प्रकार मेरे इस पृथ्वी के बंधनों से विमुक्त होने के समय पर, “पेरुम पव्वम मँडियुन्ड वयिट्र करुमुगिल” (तिरुनेडुंताँडगम २४) में चित्रित किये गए उस रूप में पेरिय पेरुमाळ गरुड़ में सवार पधारेंगे। विनता के पुत्र होने के कारण गरुड़ “पेरिय तिरुवडि” तथा “विनतै सिरुवन” भी कहलातें हैं। मेरे इस शरीर से निकलने के समय, पेरिय पेरुमाळ  एक माता के समान प्रेम के संग आएँगे।। सौंदर्य से भरपूर भगवान्, संतोष ,अपने दिव्य मुख में मुस्कराहट के संग, मेरे यहाँ, श्री रामानुज केलिए आएँगे। यह निश्चित हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४८

उपक्षेप

पिछले पासुरम में, “ऐतिरासन अडि नँणादवरै एँणादु” कहकर वें साँसारिक व्यवहारों में ही ढूबे लोगों के प्रति अपने विरक्ति  प्रकट करतें हैं। किंतु उन्कि हृदय नरम  होने कि कारण उन्से धर्ति वासियों की पीड़ा कि सहन न होती हैं। अपने अत्यंत कृपा के कारण वे उन्को एम्पेरुमानार के चरण कमलों को मोक्ष के मार्ग के रूप में दिखा कर इस मार्ग के विधियों को भी प्रकट करतें हैं।    

 

पासुरम ४९

नंदा नरगत्तु अळुंदामै वेँडिडिल नानिलत्तीर

एन तादैयान एतिरासनै नण्णुम एंरुम अवन

अंदादि तन्नै अनुसंदियुम अवन तोंडरुडन

सिंदाकुलम केड चेरंदिरुम मुत्ति पिन सित्तिकुमे

 

शब्दार्थ:

नानिलत्तीर – हे! इस सँसार के चार प्रकार के वासियों !

वेँडिडिल – अगर चाहें तो

अळुंदामै –  न डूबे

नरगत्तु – साँसारिक सागर नामक यह नरक

नंदा – जो बुगतकर पूरा न हो

(तो मेरी उपदेश सुन)

नण्णुम – जाओ और शरण लो

एन – मेरे

तादैयान – पिता

ऐतिरासनै – एम्पेरुमानार के संग

अनुसंदियुम – जप और ध्यान कर

एँरुम – हमेशा

अवन अंदादि तन्नै – प्रपन्न गायत्रि माने जाने वाली  इरामानुस नूट्रन्दादि ,जो मोक्ष के ओर ले जाने वालि एम्पेरुमानार  के दिव्य नाम से गूँजती हैं।

चेरंदिरुम –  (के) सेवा में रहो

अवन तोंडरुडन  – उन्के भक्त (के प्रति ) जो हैं सर्व श्रेष्ट श्री वैष्णव

सिंदाकुलम – सँसार के अन्य विषयों के संबंध से आने वाले पीड़ाएँ

केड  – नाश होँगे (जिस्के बाद)

मुत्ति – मोक्ष

पिन सित्तिकुमे  – सही वक्त पर प्राप्त होगा

 

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, साँसारिक विषयों से पीड़ित जनों के प्रति तरस खाकर मामुनि मुक्ति का एक सुलभ राह दिखातें हैं।  नरक माने गए इस सँसार के बंधनों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अपने पिता एम्पेरुमानार के दिव्य चरण कमलों को पकड़ने का उपदेश देतें हैं। एम्पेरुमानार के दिव्य नाम को हर पंक्ति में उच्चारण करने वाले “इरामानुस नूट्रन्दादि” को जप और ध्यान करने का सलाह देतें हैं। एम्पेरुमानार के भक्तों के प्रति सेवा करने को भी कहतें हैं। ऐसे करने से श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागति करने के पहले अनुभव किये गए पीड़ाओं से निवारण मिलेगा। और सही समय पर निश्चित मुक्ति प्राप्त होगा।    

 

स्पष्टीकरण

इस सँसार के प्रति अपने विचार प्रकट करतें हुए मामुनि कहतें हैं कि, “हमारें ग्रंतों में  यह सँसार नरक के रूप में चित्रित किया गया हैं। इस विषय में आळ्वारों के पासुरम : (पेरिय तिरुमोळि ११. ८. ९)” नंदा नारगत्तळुंदा वगै”, (पेरिय तिरुमोळि ७. ९. ५) “नरगत्तिडै नणुंगा वगै” और (तिरुवाय्मोळि ८.१.९) “मट्रै नरगम” . सँसार नामक इस नरक के पीड़ाओं और संकटों का कोई भी अंत नहीं होता है। हे! चार प्रकार के धर्ती वासियों!  इस नरक में मग्न न होकर, उस्के कठोरता से विमुक्त होकर बचने के लिए एक उपाय हैं। कृपया मेरे पिता श्री रामानुज के पास जायें और शरणागति करें। प्रपन्न गायत्रि (वह जिसकों प्रपन्न जन हर दिन दोहराना चाहिए) माने वालि “इरामानुस नूट्रन्दादि” में मुक्ति की राह दिखानें वालि एम्पेरुमानार की दिव्य नाम इस ग्रंथ के हर पंक्ति में उपस्थित हैं।  इस दिव्य नामों पर ध्यान करें। इरामानुस नूट्रन्दादि के १०७वे पासुरम के “उन तोंडर्गळुक्के” के अनुसार श्री रामानुज के भक्तों के दिव्य चरण कमलों में सेवा करें। उस क्षण तक के सारें पीड़ाओं से मुक्ति मिलेगी और सही समय पर सँसार से मुक्ति भी मिलेगी।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ४६

उपक्षेप

“ऐतिरासर्काळानोम याम” कहते हुए, संतुष्ट होकर, मामुनि “रामानुज” दिव्य नाम कि महान्ता  को प्रकट करने का इच्छा करतें हैं। मामुनि का मानना है कि पूर्व पासुरम में “ माकान्त नारणनार” और “नारायणन तिरुमाल” से कहें  गए “नारायणा” दिव्य नाम से “रामानुज” दिव्य नाम और भी उत्तम और महत्वपूर्ण हैं।

पासुरम ४७

इरामानुसाय नमवेनृ इरवुम पगलुम सिंदित्तिरा

मानुसरगळ इरुप्पिडम तन्निल इरैपोळुदुमिरा

मानुसर अवरक्कु एल्ला अडिमैयुम सेय्यवेणणि

इरा मानुसर तम्मै मानुसराग एन्कोल एणणुवदे

 

शब्दार्थ

मानुसरगळ – ( हैं) कुछ लोग

इरा  – जो नहीं करतें हैं

इरवुम पगलुम  – दिन और रात

सिंदित्तिरा – (के ओर )द्यान

इरामानुसाय  – श्री रामानुज

नमवेनृ – जो कहे “इरामानुसाय नम:”  ( इस्का अनुवाद है, “ मैं खुद मेरे लिए नहीं हूँ , मैं श्री रामानुज के लिए हूँ )

मानुसर अवरक्कु – ऐसे कुछ लोग ( कूरत्ताळ्वान के जैसे )

इरा – जो नहीं जीतें हैं

इरैपोळुदुम – एक क्षण मात्र भी

इरुप्पिडम तन्निल – आगे बताये गए लोगों के स्थल ( जो दिन रात “इरामानुसाय  नम:” नहीं कहतें हैं)

मानुसर तम्मै  – लोग

इरा – जो नहीं

सेय्यवेणणि  – करतें हैं

एल्ला अडिमैयुम  – सारें कैंकर्यं (कूरत्ताळ्वान के जैसे लोगों के प्रति)

मानुसराग एन्कोल एणणुवदे  – इनको मनुष्य कैसे माने जाए ? यह पशु के समान हैं।  

 

सरल अनुवाद

मामुनि कहतें हैं कि सँसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं।  हम उनको गण १, गण २ , गण ३ के नाम से बुलाएँगे। गण १ के लोग कभी “इरामानुसाय नम:” नहीं कहतें है।  गण २ के लोग ऐसे गुण के हैं कि वें गण १ के संग कभी नहीं रह पाएँगे। इसकी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कूरत्ताळ्वान हैं। आखरी हैं गण ३ के लोग जो न गण २ लोगों कि श्रेयस तथा महान्ता समझते हैं , न ही उनके प्रति नित्य  कैंकर्य में इच्छा रखते हैं। मामुनि को शंका हैं कि गैन ३ के जैसे लोगों को मनुष्य कैसे माना जाए, जब वें पशुओँ के समान हैं।

 

स्पष्टीकरण

मामुनि श्री रामानुज के दिव्य नाम की श्रेयस प्रकट करते हुए कहतें हैं कि , “सारे जनों को निरंतर “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान करना आवश्यक हैं” . तिरुमंगैयाळ्वार के (पेरिय तिरुमोळि १.१.१५) “नळ्ळिरुळ अळवुम पगलुम नान अळैप्पन” के अनुसार यह स्मरण  दिन रात होनी चाहिए। किन्तु अनेक जन हैं जो यह नहीं करतें हैं। हर एक को यह महसूस करना चाहिए कि “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों के संग कभी नहीं रहना हैं। पशुओँ के समान इन जनों के संगत या स्नेह भाव नहीं रखनी चाहिए। कूरत्ताळ्वान कि तरह शास्त्र के अनुसार जीने वालों को कभी भी इन जैसे लोगों के संग नहीं रहना चाहिए। “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों इस दूर रहने वाले गण के लोगों कि महान्ता को समझ कर उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।  ऐसे उत्तम जनों के प्रति निरंतर कैंकर्य करने को तरसना चाहिए। इस भाव को ही तिरुवरंगत्तमुदनार “एत्तोळुंबुम सोल्लाल मनत्ताल करुमत्तिनाल सेयवन सोरविनड्रिये” (इरामानुस नूट्रन्दादि ८० ) में प्रकट करतें हैं। “मानिडवरल्लर एन्रे एन मनत्ते वैत्तेन” के अनुसार, इन उत्तम जनों के प्रति कैंकर्य न करने वाले पशु समान हैं। अंत में मामुनि कहतें हैं कि, “इरामानुसाय नम: दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों के संग न रहने वालों के प्रति जो नित्य कैंकर्य न करें , वें मनुष्य कैसे मानें जा सकतें हैं ?”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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