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स्तोत्र रत्नम – सरल् व्याख्या – तनियन्

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

alavandhar

तनियन्
स्वादयन्निह सर्वेषां त्रययंतार्थं सुदुर्ग्रुहम ।
स्तोत्रयामास योगींद्र: तं वंदे यामुनाव्हयं ॥

मैं उन श्री आळवन्दार् स्वामीजी के चरणों में नमन करता हूँ, जो योगियों में उत्तम है, जिन्होने वेदान्त के अत्यन्त कठिन सिद्धांतों को जन सामान्य के समझने योग्य स्तोत्र प्रारूप में प्रस्तुत किया है।

नमो नमो यामुनाय यामुनाय नमो नमः ।
नमो नमो यामुनाय यामुनाय नमो नमः ।।

मैं श्री आळवन्दार् स्वामीजी के चरणों में बारंबार नमन करता हूँ। मैं उनके चरणों में नमस्कार करने से रुक नहीं सकता।

अगले भाग में हम अवतरिका देखेंगे .

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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स्तोत्र रत्नम – सरल् व्याख्या

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

vishnu-lakshmi
alavandhar-nathamunigal
आळवन्दार् और् नातमुनिगळ् – काट्टु मन्नार् कोयिल्

श्री आळवन्दार्, जो विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त और श्रीवैष्णव संप्रदाय के महान विचारक और परम आदरणीय श्रीनाथमुनी स्वामीजी के पौत्र है, ने अति आवश्यक सिद्धान्त अर्थात प्राप्य और प्रापकम को दिव्य द्वयमहा मंत्र के विस्तृत व्याख्यान द्वारा अपने स्तोत्र रत्न में दर्शाया है। हमारे पूर्वचार्यों से प्राप्त संस्कृत ग्रन्थों में यह सबसे पुराना ग्रंथ है जो आज हमारे पास उपलब्ध है।

श्री महापूर्ण स्वामीजी, (श्री पेरिय नम्बि )श्री रामानुज स्वामीजी को श्रीआळवन्दार् के शिष्य के रूप में प्रवर्त करने की इच्छा से श्री काँचीपुरम को जाते है। श्री रामानुज स्वामीजी श्री कांचिपूर्ण स्वामीजी के मार्गदर्शन में श्री देवप् पेरुमाळ् के कैंकर्य स्वरूप एक शालकूप से तीर्थ (जल) लाकर सेवा कर रहे थे। श्री महापूर्ण स्वामीजी स्तोत्र रत्न से कुछ श्लोकों का पाठ करते है जो श्री रामानुज स्वामीजी को बहुत प्रभावित करता है और उन्हें संप्रदाय में लेकर आता है। श्री रामानुज स्वामीजी का इस प्रबंध के प्रति अत्यंत लगाव था और इसी प्रबंध के बहुत से श्लोकों का उपयोग उन्होने अपने श्रीवैकुंठ गद्य में भी किया है।

पेरियवाच्चान पिल्लै ने इस दिव्य प्रबंध के लिए विस्तृत व्याख्यान की रचना की है। पेरियवाच्चान पिल्लै ने अपने व्याख्यान में इस स्तोत्र के विशेष अर्थों को वाक्चातुर्यपूर्वक समझाया है। उनके व्याख्यान के आधार पर हम यहाँ श्लोकों के सरल अर्थों को देखेंगे।

  •  तनीयन
  •  श्लोक 1 से 10
  •  श्लोक 11 से 20
  •  श्लोक 21 से 30
  •  श्लोक 31 से 40
  •  श्लोक 41 से 50
  •  श्लोक 51 से 60
  •  श्लोक 61 से 65

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 21 से 30

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 11 से 20

पाशूर २१: श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीमत् यामुनाचार्य स्वामीजी के उभयपादों को उपाय मानकर प्राप्त कर, मेरा रक्षण कर दिया। अत: अब मैं उन नीच जनों की स्तुति नहीं करूंगा।  

निदियैप् पोळियुम् मुगिल् एन्ऱु नीसर् तम् वासल् पऱ्ऱि

तुदि कऱ्ऱु उलगिल् तुवळ्गिन्ऱिलॅ इनि तूय् नेऱि सेर्

एदिगट्कु इऱैवन् यमुनैत् तुऱैवन् इणै अडियाम्

गदि पेऱ्ऱुडैय इरामानुसन् एन्नैक् कात्तनने

श्रीमद्यामुनाचार्य स्वामीजी जिनके दिव्य चरण एक दूसरे के सहायक हैं वें सभी यतियों के अधिनायक है। मैं अब से इस भूमितल पर रहनेवाले नीच जनों की, ‘यह निधि  वरसनेवाला कालमेघ हैं’ इत्यादि मिथ्यास्तुति करता उनके द्वार पर बैठकर दुःख नहीं पाऊंगा; क्योंकि परिशुद्ध आचारवाले सन्यासियों के स्वामी श्रीमद्यामुनाचार्य स्वामीजी के उभयपादों को प्राप्त कर उससे सारे संसार के ही स्वामी बननेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी ने मेरा रक्षण कर दिया।

पाशूर २२: जब देवता, भगवान का उल्लंघन कर, बाणासुर का पक्ष लेते हैं तब भगवान उनके उल्लंघन को सहते हैं जब वे भगवान की महिमा को जानते हैं और्वें भगवान कि प्रशंसा करने  (क्षमा मांगने ) लगते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी  जो भगवान की प्रशंसा करते हैं , वह धन हैं जो मुझे मेरे बुरे समय में मदद करेगा।

कार्त्तिगैयानुम् करि मुगत्तानुम् कनलुम् मुक्कण्

मूर्त्तियुम् मोडियुम् वेप्पुम् मुदुगिट्टु मूवुलगुम्

पूत्तवने एन्ऱु पोऱ्ऱिड वाणन् पिळै पोऱुत्त

तीर्त्तनै एत्तुम् इरामानुसन् एन्दन् सेम वैप्पे

(बाणासुरयुद्ध-प्रसंग में) कार्तिकेय, गजमुख, अग्निदेव, त्रिलोचन शिव, दुर्गा देवी और ज्वरदेवता, इन सब के पराजित और पलायमान होने के बाद, जब बाणासुर ने (अथवा शिव ने) यों स्तुति की कि, “हे अपने नाभीकमल से तीनों लोकों की सृष्ठि करनेवाले! (मेरी रक्षा करो)”, तब उसके अपराध की क्षमा करनेवाले परमपावन श्रीकृष्ण भगवान की स्तुति करनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी मेरा आपद्धन हैं।

 पाशूर २३: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं ,  “अगर मैं जो पूर्ण रूप से दोषवाला हूँ , श्रीरामानुज स्वामीजी की प्रशंसा करता हूँ जिनकी प्रशंसा बिना दोषवाले करते हैं,  तो उनके दिव्य गुणों का क्या होगा?” 

वैप्पाय वान् पोरुळ् एन्ऱु नल् अन्बर् मनत्तगत्ते

एप्पोदुम् वैक्कुम् इरामानुसनै इरु निलत्तिल्

ओप्पार् इलाद उऱु विनैयेन् वन्ज नेन्जिल् वैत्तु

मुप्पोदुम् वाज़्ह्त्तुवन् एन्नाम् इदु अवन् मोय् पुगळ्क्के

 विलक्षण भक्तिवाले महात्मा लोग अपने आपद्रक्षक निधि मानते हुए, जिनका नित्य-ध्यान करते हैं, ऐसे श्रीरामानुजस्वामीजी को इस विशाल प्रपंच में ,असदृश महापापी मैं, अपने कपटपूर्ण मन में रख कर स्तुति कर रहा हूँ। अब मुझे यह डर लगता है कि इससे उन आचार्यसार्वभौम के यश की हानि पहुंचेगी।  इस प्रबंध की इतनी गाथाओं में श्री रामानुज स्वामीजी की अप्रतिम स्तुति करने के बाद, अब अमुदनार् का ध्यान अपनी ओर फिरा और उनके मन में ऐसा एक विलक्षण भय उत्पन्न हुआ कि परमभक्तिसम्पन्न महापुरुषों के स्तुत्य आचार्य-सार्वभौम की स्तुति को यदि महापापी मैं करूँ, तो इससे अवश्य ही उनकी महिमा घट जायेगी। समझना चाहिए कि नैच्यानुसन्धान करने का यह भी एक प्रकार है।

 पाशूर २४: जब यह पूछताछ हुआ  कि  कैसे वें एक निचले स्थिति से आज के वर्तमान स्थिति में आये,  तो श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने पहिले स्थिति के विषय में चर्चा करते हैं और कैसे वें आज के वर्तमान स्थिति में आते हैं।

मोय्त्त वेम् ती विनैयाल् पल् उडल् तोऱुम् मूत्तु अदनाल्

एय्त्तु ओळिन्दॅ मुन नाळ्गळ् एल्लाम् इन्ऱु कण्डु उयर्न्दॅ

पोय्त् तवम् पोऱ्ऱुम् पुलैच् चमयन्गळ् निलत्तु अवियक्

कैत्त मेइग्यानत्तु इरामानुसन् एन्नुम् कार् तन्नैये

जैसे मधुमक्खी अपने छत्ते के पास झुण्ड बनाकर घूमती हैं वैसे हीं पुरातन काल से बुरे कर्म आत्मा के आगे पीचे घूमती हैं जिसके कारण मैं अनेक प्रकार के जन्म अनेक बार लिया हूँ। वेद यह बताता हैं कि, संसार के सुख से कैसे दूर रहे, कैसे दूसरों को कष्ट न देना और कैसे अपने आचार्य की  सेवा करना। निचले तत्त्वज्ञान, वेदों में कहे अनुसार कार्य नहीं करते हैं, परंतु स्वयं अनुसार अनुचित तरीके से कार्य करते हैं । श्रीरामानुज स्वामीजी, ऐसे निचले तत्त्वज्ञान और उनके तरीकों कों पूर्णत: नष्ट कर दिये। ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी जो अत्यधिक उदार शख्स हैं स्वयं को ऐसे दिखाते कि वो मेरे लिए हीं हैं जिसके कारण मैं आज मेरे इस वर्तमान प्रसिद्ध स्थिति में पहुंचा हूँ।

पाशूर २५:. श्रीरामानुज स्वामीजी ने जो उनके ऊपर कृपा किये वह स्मरण कर श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य मुखारविंद को देखकर उन्हें पूछते “इस संसार में कौन आपकी कृपा को जान सकता हैं?”

कार् एय् करुणै इरामानुस इक्कडल् इडत्तिल्

आरे अऱिबवर् निन् अरुळिन् तन्मै अल्ललुक्कु

नेरेउऱैविडम् नान् वन्दु नी एन्नै उय्त्तपिन् उन्

सीरेउयिर्क्कुयिराय् अडियेऱ्कु इन्ऱु तित्तिक्कुमे

हे मेघ के सदृश कृपामूर्ते श्रीरामानुज स्वामीन्! मैं तो समस्त सांसारिक क्लेशों का नित्यनिवास स्थान हूँ । ऐसे मुझको आपने अपनी निर्हेतुक कृपा से स्वीकार कर लिया। अतः अब आपके कल्याणगुण ही मेरी आत्मा के धारक होकर मुझे अत्यंत प्रिय लग रहे हैं। समुद्रपरिवृत इस भूतल पर कौन आप की कृपा का प्रभाव जान सकता? (कोई भी नहीं।) जैसे मेघ, श्रेष्ठ-नीच विभाग का ख्याल किये बिना सर्वत्र बरस कर सबका ताप मिटाता है, ठीक उसी प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी भी किसीकी योग्यता या अयोग्यता का ख्याल न करते हुए सबके ऊपर अपनी सीमातीत दया बरसाते हुए उनके तापत्रय मिटा देते हैं। ऐसी आपकी विशेष कृपा का वैभव कौन समझ सकता है?

पाशूर २६:. श्रीवैष्णव वह है जिनके पास श्रीरामानुज स्वामीजीके श्रीचरण कमलों में पूर्णत: अन्तर्भूत होने का एक महान वैभव हैं। श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि श्रीवैष्णवों के पहले की  स्थिति के ऐसे गुण में मुझे दास बना रहा हैं।

तिक्कुऱ्ऱ कीर्त्ति इरामानुसनै एन् सेय् विनैयाम्

मेय्क्कुऱ्ऱम् नीक्कि विळन्गिय मेगत्तै मेवुम् नल्लोर्

एक्कुऱ्ऱवाळर् एदु पिऱप्पु एदु इयल्वु आग निन्ऱोर्

अक्कुऱ्ऱम् अप्पिऱप्पु अव्वियल्वे नम्मै आट्कोळ्ळुमे

मेरे असंख्य पापों को दूर कर उससे संतोष पानेवाले, परमोदार और दिगंतविश्रांत यशवाले श्री रामानुज स्वामीजी की शरण में रहनेवाले जन, उससे पहले जैसे अपराधवाले रहे, जैसे कुल में उत्पन्न हुए थे और जैसे आचरण करते रहे, उनके वे ही अपराध, वे ही कुल और वे ही आचरण हमारे लिए पूज्य हैं। श्री भगवद्रामानुज स्वामीजी के भक्तों में उनके पूर्वकृत पुण्यपाप, दुराचार, उच्चनीच कुल इत्यादियों का ख्याल नहीं किया जा सकता।

 पाशूर २७:. अभी जब वें श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्यों की ओर प्रिय हो रहे थे, श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं को श्रीरंगामृत स्वामीजी के हृदय के ओर अनुरूप किया। श्रीरंगामृत स्वामीजी उद्विगन हो गये कि यह श्रीरामानुज स्वामीजी कीओर दोष लायेगा।  

कोळ्ळक् कुऱैवु अऱ्ऱु इलन्गि कोज़्हुन्दु विट्टु ओन्गिय उन्

वळ्ळल् तनत्तिनाल् वल्विनैयेन् मनम् नी पुगुन्दाय्

वेळ्ळैच् चुड्डर् विडुम् उन् पेरु मेन्मैक्कु इळुक्कु इदु एन्ऱु

तळ्ळुऱ्ऱु इरन्गुम् इरामानुसा एन् तनि नेन्जमे

हे उड़यवर! (जिनके वश में दोनों लीला और नित्य विभूति हैं) प्रतिक्षण बढते रहनेवाले अपने सौशिल्यगुण की वजह से ही (अपनी महिमा का ख्याल नहीं करते हुए) आपने मुझ घोरपापी के मन में प्रवेश किया। यह सोचता हुआ कि (वसिष्ठ के चंडालगृहप्रवेश की भांति) आपका यह कृत्य, परम परिशुद्ध व जाज्वल्यमान आपके प्रभाव में शायद कलंक डालता होगा, मेरा यह विचित्र मन चिंतित हो रहा है।

पाशूर २८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी के विषय की भाषा यह इच्छा देखकर खुश हो जाते हैं।   

नेन्जिल् कऱै कोण्ड कन्जनैक् काय्न्द निमलन् नन्गळ्

पन्जित् तिरुवडिप् पिन्नै तन् कादलन् पादम् नण्णा

वन्जर्क्कु अरिय इरामानुसन् पुगज़्ह् अन्ऱि एन् वाय्

कोन्जिप् परवगिल्लादु एन्न वाळ्वु इन्ऱु कूडियदे

कल्मषचित्त कंस का संहार करनेवाले, अखिल हेयप्रत्यनीक (माने समस्थविद दोषों के विरोधी) और सुकुमार पादवाली हमारी नीलादेवी के वल्लभ भगवान के पादारविन्दों का आश्रय नहीं लेते हुए, आत्मापहार नामक चोरी करनेवाले को सर्वथा दुर्लभ श्रीरामानुज स्वामीजी की दिव्यकीर्ति के सिवा दूसरे किसीका यशोगान करना मेरा जी नहीं चाहता। ओह ! आज मुझे कैसा सुंदर भाग्य मिला है ?

 पाशूर २९: श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह भाग्य हाल में मिल ही चुका था। अतः यहां पर इतना भाग्य माँगा जा रहा है कि, श्रीरामानुज भक्त मंडली के दर्शन मुझे नित्य ही मिलते रहें। 

कूट्टुम् विदि एन्ऱु कूडुन्गोलो तेन् कुरुगैप्पिरान्

पाट्टेन्नुम् वेदप् पसुम् तमिळ् तन्नै तन् पत्ति एन्नुम्

वीट्टिन् कण् वैत्त इरामानुसन् पुगळ् मेय् उणर्न्दोर्

ईट्टन्गळ् तन्नै एन् नाट्टन्गळ् कण्डु इन्बम् एय्दिडवे

श्रीशठकोपसूरी की श्रीसूक्ति के रूप में प्रसिद्ध द्राविडवेदरूप सहस्रगीति का अपने भक्त रूप प्रसाद में स्थापित करनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी के कल्याणगुणों का ठीक ध्यान करनेवालों की गोष्ठी के दर्शन कर मेरी आँखे कब आनंदित होंगी। न जाने ऐसा भाग्य (उनकी कृपा) मुझे कब मिलेगी। 

पाशूर ३०:  जब यह पूछा गया कि क्या आपने श्रीरामानुज स्वामीजी से संसार से मोक्ष प्राप्ति को मांगा तब श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि अब श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझे अपना दास मान लिया हैं, अब मुझे मोक्ष मिले या नरक कोई विषय नहीं रहता हैं।  

 इन्बम् तरु पेरु वीडु वन्दु एय्दिल् एन् एण्णिऱन्द

तुन्बम् तरु निरयम् पल सूळिल् एन् तोल् उलगैल्

मन् पल् उयिर्गट्कु इऱैयवन् मायन् एन मोळिन्द

अन्बन् अनगन् इरामानुसन् एन्नै आण्डनने

सर्वेशवर अपने स्वरूप, रूप और गुण में अद्भुत हैं| वें कई समय से अनगिनत आत्माओं के स्वामी हैं।अपने श्रीभाष्यादिग्रंथों द्वारा इस अर्थका उपदेश देनेवाले कि, “भगवान अनादि से इस प्रपंच में रहनेवाले सभी चेतनों के शेषी हैं,” परमकारुणिक व दोषशून्य श्री रामानुज स्वामीजी ने मुझे अपना दास बना दिया। फिर परमानंद-दायक मोक्ष ही मिले, अथवा अपरिमित दुःख देनेवाला नरक ही क्यों न मिले, मुझे इस बात की चिंता ही कौनसी है? दोनों ही मेरे लिए समान हैं  |

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 11 से 20

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 1 से 10

पाशूर ११: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी (जो श्रीयोगीवाहन

स्वामीजी के दिव्य चरणों को अपने सरपर पहनते थे) की  शरण लिए हैं वें उनके महानता की 

विषय पर अधिक नहीं कह सकते हैं।

सीरिय नान्मऱैच् चेम्पोरुळ् सेन्दमिळाल् अळित्त

पार् इयलुम् पुगळ्प् पाण् पेरुमाळ् चरणाम् पडुमत्

तार् इयल् सेन्नि इरामानुसन् तन्नैच् चार्न्दवर् तम्

कारिय वण्मै एन्नाल् सोल्लोणादु इक्कडल् इडत्ते

चारों वेदों के श्रेष्ठ अर्थों का सुंदर द्राविड़ी गाथाओं से विवरण करनेवाले और सारे भूमंडल पर

फैले हुए यशवाले श्रीयोगीवाहन स्वामीजी के चरणारविन्दों से अलंकृत मस्तकवाले श्रीरामानुज

स्वामीजी के आश्रय में रहनेवाले महात्माओं के विलक्षण अनुष्ठान का वर्णन, सागरपरिवृत इस

भूमंडल में मुझसे नहीं किया जा सकता। अर्थात् श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्तों का आचरण इतना

श्रेष्ठ रहता है कि इस विशाल भूतलपर ऐसा दूसरा कोई नहीं मिल सकता और उसका पूरा वर्णन

भी कोई नहीं कर सकता |

पाशूर १२: श्रीरंगामृत स्वामीजी यह प्रश्न करते हैं कि जो श्रीरामानुज स्वामीजी (जो श्रीभक्तिसार

स्वामीजी के चरण कमलों में निवास करते थे) कि पूजा करते हैं क्या वें उनके प्रति स्नेह कर

सकते हैं।

इडम् कोण्ड कीर्त्ति मळिसैक्कु इऱैवन् इणै अडिप्पोदु

अडन्गुम् इदयत्तु इरामानुसन् अम् पोऱ्पादम् एन्ऱुम्

कडम् कोण्डु इरैन्जुम् तिरु मुनिवर्क्कु अन्ऱि कादल् सेय्यात्

तिडम् कोण्ड ग्यानियर्क्के अडियेन् अन्बु सेय्वदुवे 

सारे भूमंडल पर व्याप्त यशवाले श्री भक्तिसार आळ्वार् के उभय पादारविन्दों का, अपने मन में

सुदृढ़ ध्यान करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के मनोहर श्रीपादों को ही जो लोग अपने स्वरूपानुसुप

भाग्य मानकर उनका आश्रय लेते हैं, ऐसे उनको छोड़कर दूसरे में भक्ति न करनेवाले दृढ

अध्यवसाययुक्त ज्ञानियों का ही मैं भक्त रहूंगा।

पाशूर १३: हमारा एक मात्र लक्ष्य श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमल हीं हैं जिनकी

श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों को छोड़ और कुछ भी अभिलाषा नहीं हैं।

सेय्युम् पसुम् तुळबत् तोळिल् मालैयुम् सेन्दमिळिल्

पेय्युम् मऱैत् तमिळ् मालैयुम् पेराद सीर् अरन्गत्तु

ऐयन् कळऱ्कु अणियुम् परन् ताळ् अन्ऱि आदरिया

मेय्यन् इरामानुसन् चरणे गदि वेऱु एनक्के

अपने से विरचित हरी तुलसी की अतिविलक्षण मालाओं तथा द्राविड़वेद कहलानेवाले (तिरुमालै व

तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि नामक दो दिव्यप्रबंधरूपी) गाथामाला को नित्यसिद्ध कल्याणगुणवाले

श्रीरंगनाथ भगवान के पादारविन्दों में अर्पण करनेवाले भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी के चरणारविन्द के

सिवा दूसरी वस्तु का आदर न करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के पादारविन्द ही मेरी श्रेष्ठ गति

हैं। श्री भक्तांघ्रिरेणु नामक दिव्यसूरी ने श्रीरंगदिव्यधाम में नित्यनिवास करते हुए श्रीरंगनाथ

भगवन के पादारविन्दों में दो मालाओं को अर्पण किया; एक थी ताजी तुलसी व पुष्पों से बनी हुई

रमणीय माला; दूसरी दो विलक्षण द्राविड़ी गाथाओं से विरचित दिव्यप्रबंधमाला।

पाशूर १४: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि वों अन्य माध्यम से श्रेष्ठ लाभ प्राप्त करने स्वभाव से मुक्त हो गये क्योंकि वें श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीकुलशेखर आळ्वार् के प्रबन्धों कि स्तुति करनेवालों से अलग नहीं कर पाये।

कदिक्कुप् पदऱि वेम् कानमुम् कल्लुम् कडलुम् एल्लाम्

कोदिक्कत् तवम् सेय्युम् कोळ्गै अऱ्ऱेन् कोल्लि कावलन् सोल्

पदिक्कुम् कलैक् कवि पाडुम् पेरियवर् पादन्गळे

तुदिक्कुम् परमन् इरामानुसन् एन्नैच् चोर्विलने

श्री कुलशेखर आळ्वार्  से अनुगृहीत, शास्त्रवचनों से भरित (पेरुमाल् तिरुमोळि नामक) दिव्यप्रबंध

का गान करने मे निरत महात्माओं के पादों की ही स्तुति करनेवाले भगवान श्रीरामानुज

स्वामीजी मुझको कभी न छोड़ेंगे। अतः मैं सद्गति पाने की तीव्र इच्छा से अत्युष्ण वनों, पर्वतों

और् सागरों में खडा होकर तीक्ष्ण तपस्या करने की इच्छा नहीं करूंगा।

पाशूर १५: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं वें ऐसे जनों का सहवास नहीं करेंगे जो श्रीरामानुज

स्वामीजी के गुणों का अनुभव नहीं करते हैं,| जिन्होंने अपना मन श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के

चरणारविंद में लगाया हैं। वें कहते हैं अब उनके लिए कोई दीनता नही हैं।

सोराद कादल् पेरुम् सुळिप्पाल् तोल्लै मालै ओन्ऱुम्

पारादु अवनैप् पल्लाण्डु एन्ऱु काप्पिडुम् पान्मैयन् ताळ्

पेराद उळ्ळत्तु इरामानुसन् तन् पिऱन्गिय सीर्

सारा मनिसरैच् चेरेन् एनक्कु एन्न ताज़्ह्वु इनिये

क्षण क्षण बढ़नेवाले प्रेम-प्रवाह के परवश होने के कारण, भगवान के शाश्वत (समस्त दोष

विरोधित्व) स्वरूप का किंचित् भी ख्याल न करते हुए, उनका मंगळाशासन करने में निरत श्री

भट्टनाथ सूरी के श्रीपादों का ही निरन्तर ध्यान करनेवाले भगवान श्री रामानुज स्वामीजी के

दिव्यगुणों का जो अनुभव करना नहीं चाहते, ऐसे जनों का मैं सहवास नहीं करूंगा। यह है मेरा

दृढ़ अध्यवसाय। फिर मेरी कौन सी न्यूनता होगी?

पाशूर १६: श्रीरंगामृत स्वामीजी दयापूर्वक इस लोक के लिए जो लाभ श्रीरामानुज स्वामीजी ने

किया उसे लिखते हैं जो श्रीगोदाम्बाजी के दया के पात्र हैं और जो उन्को प्रिय हैं।

ताळ्वु ओन्ऱु इल्ला मऱै ताळ्न्दु तल मुळुदुम् कलिये

आळ्गिन्ऱ नाळ् वन्दु अळित्तवन् काण्मिन् अरन्गर् मौलि

सूळ्गिन्ऱ मालैयैच् चूडिक् कोडुत्तवळ् तोल् अरुळाल्

वाळ्गिन्ऱ वळ्ळल् इरामानुसन् एन्नुम् मा मुनिये

श्रीरंगनाथ भगवान के दिव्य सिरपर धारण करने योग्य पुष्प माला को, पहले अपने सिर पर

धारण कर सुगंधित बना देनेवाली श्रीगोदादेवी की निर्हेतुक कृपा से वृद्धि पानेवाले, परमोदार

भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी ने, किसी प्रकार की न्यूनता से विरहित वेद जब क्षीण होने लगे

और कलि का अंधकार ही भूतल पर सर्वत्र खूब फैल गया, ऐसी अवस्था में यहां अवतार लेकर(

उन वेदों का उद्धार पूर्वक) लोकों का रक्षण किया।

पाशूर १७: जो हमारे भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों के शरण हो जाते हैं जो

श्रीपरकाल स्वामीजी को समर्पित हैं, घबराने पर भी कभी कोई बाधा में नहीं फसेंगें ।

मुनियार् तुयरन्गळ् मुन्दिलुम् इन्बन्गळ् मोय्त्तिडिनुम्

कनियार् मनम् कण्णमन्गै निन्रानै कलै परवुम्

तनि आनैयैत् तण् तमिळ् सेय्द नीलन् तनक्कु उलगिल्

इनियानै एन्गळ् इरामानुसनै वन्दु एय्दिनरे

सकल शास्त्र प्रतिपाद्य और विलक्षण मत्तगज के सदृक्ष, तिरुक्कण्णमङ्गै इत्यादि दिव्यदेशों में

विराजमान भगवान को लक्ष्यकर, संसार तापहर व परमभोग्य द्राविड दिव्यप्रबंध रचनेवाले श्री

(नीलन् नामक) परकाल स्वामीजी के भक्त हमारे नायक श्रीरामानुज स्वामीजी के आश्रय में

रहनेवाले महात्मालोग तापत्रयों से पीड़ित होते हुए भी दुःखी न होंगे और सुखसाधन मिलने पर

भी आनंद से मस्त न होंगे।

पाशूर १८: श्रीमधुरकवि स्वामीजी के दिव्य हृदय में श्रीशठकोप स्वामीजी वास करते हैं। श्रीरंगामृत

स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी बड़ी दयापूर्वक श्रीमधुरकवि स्वामीजी के गुणों को

समझाते हैं ताकि उनके संग में सभी जीवात्मा (चेतन) का उद्दार हो सके।

एय्दऱ्कु अरिय मऱैगळै आयिरम् इन्तमिळाल्

सेय्दऱ्कु उलगिल् वरुम् सडगोपनैच् चिन्दै उळ्ळे

पेय्दऱ्कु इसैयुम् पेरियवर् सीरै उयिर्गळ् एल्लाम्

उय्दऱ्कु उदवुम् इरामानुसन् एम् उऱुतुणैये

श्रीनम्माळ्वार् का अवतार बड़ी कृपा से वेदों का अर्थ कहने हेतु, जो समझने के लिये बहुत

कठिन हैं, हजार पाशूरों (सहस्रगीति के द्वारा) के माध्यम से ,ताकि बच्चे और महिलाओं को भी

सीखने हेतु हुआ। उन्हें शठकोपन भी कहते थे और वों जो वेदों का गलत अर्थ बतलाते थे उनके

दुश्मन थे। श्रीशठकोप स्वामीजी का अपने हृदय में ध्यान करनेवाले महात्मा मधुरकवि स्वामीजी

के (आचार्यनिष्ठा इत्यादि) शुभगुणों का प्रवचन करके समस्त संसारियों का उद्धार करनेवाले श्री

रामानुज स्वामीजी हमारे योग्य आश्रयदाता हैं।

पाशूर १९: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते कि श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने कहा कि श्रीशठकोप

स्वामीजी हीं मेरे लिये सब कुछ हैं, मेरे लिए परमभोग्य हैं।

उऱु पेरुम् सेल्वमुम् तन्दैयुम् तायुम् उयर् गुरुवुम्

वेऱि तरु पूमगळ् नादनुम् माऱन् विळन्गिय सीर्

नेऱि तरुम् सेन्दमिळ् आरणमे एन्ऱु इन् नीळ् निलत्तोर्

अऱिदर निन्ऱ इरामानुसन् एनक्कु आरमुदे

“अतिश्रेष्ठ महान धन, माता, पिता, सदाचार्य, और सुगंधि कमल पुष्प में अवतीर्ण श्री महालक्ष्मीजी

के साथ भगवान, ये सभी मेरे लिए श्रीशठकोप स्वामीजी से अनुगृहीत, भगवद्गुणों का प्रकाशक

श्रेष्ठद्राविड वेद ही है” सारे भूमंडल निवासियों को ऐसे अपना सुदृढ़ अध्यवसाय बतानेवाले

श्रीरामानुज स्वामीजी मेरे लिए परमभोग्य होते हैं।

पाशूर २०: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते कि श्रीरामानुज स्वामीजी, जो श्रीमन् नाथमुनि स्वामीजी का

ध्यान करते हैं, मेरे परम धन हैं।

आरप्पोळिल् तैन्कुरुहै प्पिरान्, अमुद त्तिरुवाय्

ईरत् तमिळिन् इसै उणर्न्दोर्गट्कु इनियवर् तम्

सीरैप् पयिन्ऱु उय्युम् सीलम् कोळ् नादमुनियै नेन्जाल्

वारिप् परुगुम् इरामानुसन् एन्दन् मानिदिये

चंदन वृक्षों के उपवनों से परिवृत सुंदर कुरुकापुरी में अवतीर्ण महोपकारक श्री शठकोप स्वामीजी

के अतिभोग्य मुखारविंद से भावावेशपूर्ण एवं अतिमधुर द्राविड़ श्री सूक्ति (तिरुवाय्मोळि) अवतीर्ण

हुआ| नाथमुनिगल में संगीत के साथ इस तिरुवाय्मोळि  को जानने वालों को ( गहरी भक्ति के साथ) समृद्ध बनाने का गुण था |  ऐसे श्रीमन् नाथमुनिका बड़ी इच्छा से  निरंतर ध्यान करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी मेरे अक्षय निधि हैं।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 1 से 10

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

तनियन्

पाशूर १: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय को आमंत्रित करते हैं “हम सब श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का स्मरण करें ताकि हम उनके दिव्य पादारविन्दों में कुशलतापूर्वक रह सके।”

पू मन्नु मादु पोरुन्दिय मार्बन् पुगळ् मलिन्द

पा मन्नु माऱन् अडि पणिन्दु उय्न्दवन् पल् कलैयोर्

ताम् मन्न वन्द इरामानुसन् चरणारविन्दम्

नाम् मन्नि वाळ नेञ्जे सोल्लुवोम् अवन्  नामङ्गळे

हे मन! श्रीमहालक्ष्मीजी जो कमल पुष्प पर निवास करती है, भगवान के दिव्य वक्षस्थल का अनुभव कर, कमल पुष्प का त्याग कर , उस दिव्य वक्षस्थल पर निवास करने लगी। श्रीशठकोप स्वामीजी ,भगवान के दिव्य गुणों से पूर्ण तिरुवाय्मोळि में लीन हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य पादारविन्दों में समर्पण कर स्वयंको उद्धार किये। अनेक शास्त्रोंको सीखनेके बावज़ूत्, बहुत से विद्वान, जो श्रीरामानुज स्वामीजी के पहले थे, उनके अंतरिय अर्थों को समझ न सके। श्रीरामानुज स्वामीजी को उन अंतरिय अर्थों का पता था और उसे अच्छी तरह स्थापित किया। हम सब (श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय से कहते हैं) श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों को अपना लक्ष्य बनाकर श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का संकीर्तन करते रहे ताकि हम एक उद्देश से जीवन व्यतीत कर सके।

पाशूर २: पिछले पाशुर में श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय को श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का संकीर्तन करने के पश्चात कहते हैं सब कैंकर्य भूलकर उनका हृदय श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों का आनन्द ले रहा है । यह देख श्रीरंगामृत स्वामीजी आश्चर्य हो जाते हैं।

कळ् आर् पोळिल् तेन्नरङ्गन् कमलप् पदङ्गळ् नेञ्जिल्

कोळ्ळा मनिसरै नीन्गि कुऱैयल् पिरान् अडिक्कीळ्

विळ्ळादअन्बन् इरामानुसन् मिक्क सीलम् अल्लाल्

उळ्ळादु एन् नेंजु ओन्ऱु अरियेन् एनक्कुऱ्ऱ पेरियिल्वे

मधुस्यंदि उध्यानवनों से परिवृत श्रीरंगम दिव्यधाम में विराजमान भगवान के पादारविंदों का ध्यान न करनेवाले मानवों को छोड़कर, (तिरुमंगै आळ्वार )श्रीपरकाल स्वामीजी (जिन्होने तिरुक्कूरैयलूर में अवतार लिया और जिन्हें दिव्य प्रबन्ध रचने का लाभ मिला) के पादों में अविच्छिन्न भक्ति करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के शीलगुण के सिवा, मेरा मन, दूसरी किसी वस्तु का स्मरण नहीं करता; मैं अपने इस श्रेष्ठ स्वभाव का कोई कारण भी नही जान सकता।

पाशूर ३: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय को कहते है “मैं आपके नत मस्तक होता हूँ कि, जो संसार में लगे हुए हैं  उन जनों से मेरा सम्बन्ध तोड़कर जो श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों कि सेवा करते हैं उनमें संलिप्त होने के लिये  मुझपर इतना कृपा  किये ।

पेर् इयल नेञ्जे! अडि पणिन्देन् उन्नै पेय्प्पिरविप्

पूरियरोड़ु  उळ्ळ​ सुऱ्ऱम् पुलर्त्ति  पोरुवु अरुम् सीर्

आरियन् सेम्मै इरामानुस मुनिक्कु अन्बु सेय्युम्

सीऱिय पेरु उडैयार् अडिक्कीळ् एन्नैच् चेर्त्तदऱ्के

हे हृदय जिसका बहुत उत्तम गुण हैं! मुझे बहुत लाभ देने के लिये मैं आपके नतमस्तक होता हूँ – क्योंकि आसुरी जन्मवाले नीचों के साथ लगा हुआ मेरा सम्बन्ध तोड़ डालकर, अद्वितीय कल्याणगुणवाले, श्रेष्ठ अनुष्ठानवाले एवं निष्कपट स्वभावले श्रीरामानुज स्वामीजी के विषय में की जानेवाली भक्ति को ही परमपुरुषार्थ माननेवाले आर्य जनों के पादारविंदो के नीचे मुझको लगा दिया।   

पाशूर ४:  वह कहते हैं श्रीरामानुज स्वामीजी की निर्हेतुक कृपा से उनका अपने पहले का नैच्यानुसंधान कि स्थिति पर पहूंचने की संभावना नहीं हैं और उनमें कोई दोष भी नहीं है।  

एन्नैप् पुवियिल् ओरु पोरुळाक्कि मरुळ् सुरन्द

मुन्नैप् पळविनै वेर् अऱुत्तु  ऊळि मुदल्वनैये

पन्नप् पणित्त इरामानुसन् परम् पादमुम् एन्

सेन्नित् तरिक्क वैत्तान् एनक्कु एदुम् सिदैवु इल्लैये

एम्पेरुमानार ने सभी को उस  परमात्मा का एहसास और जो सभी तत्वों ( चेतनों  औरअचेतनों) का कारण है, उसपर  ध्यान करने के लिए प्रेरित किये  उन्होंने यह श्रीभाष्य (उनके द्वारा रचित एक ग्रन्थ) द्वारा प्राप्त किया। श्रीरामानुज स्वामीजी जो सभी से श्रेष्ठ हैं मुझे जो अचेतन जैसा था को चेतन बनाया। श्रीरामानुज स्वामीजी ने अपने पादों को भी मेरे सिरपर स्थापित किया। ऐसे महा प्रसाद के पात्र बननेवाले मुझको अब किसी प्रकार की हानि न होगी।

पाशूर ५: श्रीरंगामृत स्वामीजी जिन्होंने यह प्रबन्धम श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का संकीर्तन करते हुए प्रारम्भ किया और अब यही कर रहे हैं। यह कहते हुए कि कुदृष्टिवाले (जो गलत तरीके से वेदों की व्याख्या करते हैं) इनकी निंदा कर सकते हैं , वह हिचकिचाते हैं और तत्पश्चात  स्वयं को आश्वासन देकर जिस कार्य को उन्हें करना हैं उसमे निरत हो जाते हैं।

एनक्कु उऱ्ऱ सेल्वम् इरामानुसन् एन्ऱु इसैयगिल्ला

मनक् कुऱ्ऱ मान्दर् पळिक्किल् पुगळ् अवन् मन्निय सीर्

तनक्कु उऱ्ऱ अन्बर् अवन् तिरुनामन्गळ् साऱ्ऱुम् एन् पा

इनक् कुऱ्ऱम् काणगिल्लार् पत्ति एय्न्द इयल्वु इदु एन्ऱे

कुदृष्टिवाले यदि मेरे इस ग्रन्थ की निंदा करेंगे तो यह निंदा ही वास्तव में इसकी प्रशंसा होगी और श्रीरामानुज स्वामीजी हीं हमारे स्वरूप का धन है, मेरे इस प्रयास को उपहास बनायेंगे। परंतु जो महात्मा लोग श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य शुभगुणों के अनुरूप, उन पर प्रेम करते हैं, वें उन आचार्य के श्रीनामों से विभूषित इन मेरी गाथाओं में विध्यमान दोषों पर भी नजर नहीं डालेंगे। 

पाशूर ६: पिछले पाशूर में श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि यह उनका श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति भक्ति का प्रचार हैं। अब वें स्वयं को दोष देकर कहते हैं कि उनका श्रीरामानुज स्वामीजी के महानता के साथ समान भक्ति नहीं हैं।

इयलुम् पोरुळुम् इसैयत् तोडुत्तु ईन् कविगळ् अन्बाल्

मयल् कोण्डु वाळ्त्तुम् इरामानुसनै मदि इन्मैयाल्

पयिलुम् कविगळिल् पत्ति इल्लाद एन् पावि नेन्जाल्

मुयल्गिन्ऱनन् अवन् तन् पेरुम् कीर्त्ति मोळिन्दिडवे

अतिविलक्षण सामार्थ्यवाले कविलोग, प्रेमके मारे पागल बनकर, परस्पर अनुरूप शब्द व अर्थ मिलाकर जिन काव्यों से श्रीरामानुज स्वामीजी की स्तुति करते हैं, उन काव्यों में सर्वथा भक्तिशून्य और बुद्धिशून्य मैं अपने पापिष्ठ मन से उन आचार्य सार्वभौम के असीम यश की स्तुति करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

पाशूर ७: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपनी दीनता को देखकर पीछे हठते हैं, श्रीकूरेश स्वामीजी (श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रमुख शिष्यों में से एक) के दिव्य चरण कमलों को स्मरण करते हैं और यह तय करते हैं कि यह कठिन कार्य नहीं हैं और उसे प्रारम्भ करते हैं।

मोळियैक् कडक्कुम् पेरुम् पुगळान् वन्ज मुक्कुऱुम्बाम्

कुळियैक् कडक्कुम् नम् कूरत्ताळ्वान् चरण् कूडिय पिन्

पळियैक् कडत्तुम् इरामानुसन् पुगळ् पाडि अल्ला

वळियैक् कडत्तल् एनक्कु इनि यादुम् वरुत्तम् अन्ऱे

वाचामगोचर, महायशवाले एवं कुलमद-धनमद-विध्यामद नामक तीन प्रकार के मदरूपी गड्ढों का पार करनेवाले, हमारे नाथ श्रीकूरेश स्वामीजी के श्रीपादों का आश्रय लेने के बाद, सर्वपापनिवार्तक श्री रामानुज स्वामीजी के दिव्य यशोगान करके, स्वरूपविरुद्ध दुष्ट मार्गों से बचना अब मेरे लिए बिलकुल कठिन नहीं हैं।

पाशूर ८: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीसरोयोगी (पोय्गै आळ्वार्) स्वामीजी द्वारा बड़ी कृपा से रचित प्रबन्धम को ध्यानमग्न होकर संकीर्तन करते थे, वें उनके भगवान हैं।

वरुत्तुम् पुऱ इरुळ् माऱ्ऱ एम् पोय्गैप्पिरान् मऱैयिन्

कुरुत्तिन् पोरुळैयुम् सेन्दमिळ् तन्नियुम् कूट्टि ओन्ऱत्

तिरित्तु अन्ऱु एरित्त तिरुविळक्कैत् तन् तिरु उळ्ळत्ते

इरुत्त्म् परमन् इरामानुसन् एम् इऱैयवने

नानाप्रकार के दु:ख देनेवाले सांसारिक क्षुद्र पदार्थ विषयक अज्ञानरूपी अंधकार मिटाने के लिए हमारे प्रपन्न कुल (वह कुल जो पूर्ण रूप से भगवान के शरण हो गये हैं) के नाथ श्रीसरोयोगी (पोय्गै आळ्वार्)  स्वामीजी ने पूर्वकाल में, वेदांतों के निगूढ़ अर्थों तथा द्राविड  भाषा को मिलाकर, बत्ती बनाकर (मुदल तिरुवंदादि नामक प्रबन्धम) जो दीप जलाया, इसका अपने हृदय से ठीक धारण करनेवाले भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी हमारे नाथ हैं। 

पाशूर ९: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं जो श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुणों का संकीर्तन करते हैं, जो श्रीभूतयोगी स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों को अपने दिव्य मन में स्मरण करते हैं, वें इस संसार में वेदों की रक्षा कर उसे स्थापित करेंगें ।  

इऱैवनैक् काणुम् इदयत्तु इरुळ् केड ज्ञानं  एन्नुम्

निऱैविळक्कु एट्रिय भूदत् तिरुवडि ताळ्गळ् नेन्जत्तु

उऱैय वैत्तु आळुम् इरामानुसन् पुगळ् ओदुम् नल्लोर्

मऱैयिनैक् कात्तु इन्द मण्णगत्ते मन्नवैप्पवरे

सर्वस्वामी भगवान का साक्षात्कार पाने के उपकरण हृदय के अंधकार मिटाने के लिए (‘इरण्डाम् तिरुवंदादि’ नामक प्रबन्ध) पूर्ण दीप जलानेवाले श्री भूतयोगी स्वामीजी के श्रीपादों को अपने मन में सुदृढ़ प्रतिष्ठापित करके, उन्हींका अनुभव करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्यगुणों का ही नित्य अनुसंधान करनेवाले विलक्षण महात्मालोग वेदों की रक्षा भाह्योऔर कुदृष्टिवालो से कर उनको शाश्वत प्रतिष्ठापित भी करनेवाले हैं। 

पाशूर १०: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं जो श्रीमहामहिम श्रीमहद्योगी स्वामीजी के भक्त श्रीरामानुज स्वामीजी के परमभक्तों के पादभक्त हैं वास्तव में हीं नित्यश्रीमान है।

मन्निय पेरिरुळ् माण्डपिन् कोवलुळ् मामलराळ्

तन्नोडुम् आयनैक् कण्डमै काट्टुम् तमिळ्त् तलैवन्

पोन् अडि पोऱ्ऱुम् इरामानुसर्कु अन्बु पूण्डवर् ताळ्

सेन्नियिल् सूडुम् तिरुवुडैयार् एन्ऱुम् सीरियरे

पहले दो आळ्वारों ने दीप जलाकर (अपने प्रबन्ध से) विशाल और अविचलनिय अज्ञान को दूर किया। मिटाने अशक्त महान अंधकार के निवृत्त हो जानेपर तिरुक्कोंवलूर नामक दिव्यदेश के अधिपति ‘आयनार’ नामक भगवान को महालक्ष्मी के साथ दर्शनकर, उस दर्शन प्रकार का वर्णन करनेवाले द्राविड भाषा के सार्वभौम श्रीमहाद्योगी स्वामीजी के सुंदर श्रीपादों की स्तुति करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के बारे में भक्ति करनेवालों के श्रीपादों को अपने सिरपर धारण करनेवाले भाग्यवान नित्यश्री-विभूषित हैं।

अगले अनुच्छेद में इस प्रबन्धम के अगले भाग पर चर्चा करेंगे।

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रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – तनियन

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रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

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मुन्नै विनैयगल  मूंगिल्  कुडियमुदन्
पोन्नम् कळर्क्कमलप्  पोदिरण्डुम्
एन्नुडैय सेन्निक्कणियागच् चेर्तिनेन् तेन्पुलत्तार्क्कु
एन्नुक् कडवुडैयेन् यान्

दास कहते हैं, मैंने श्रीरंगामृत स्वामीजी (जिन्होंने मूंगिल कुड़ी  {श्रेष्ठ कुल} वंश में जन्म लिया) के स्वर्ण जैसे दिव्य और  वांछनीय चरण कमलों को अपने मस्तक पर सजावटी आभूषण जैसे रखा ताकि समय समय पर जितने भी पाप मैंने इकट्ठा किये हैं वह लुप्त हो जायेँ। यह करने के पश्चात यमराज और उनके अनुयायी से किसी भी तरह मेरा सम्बन्ध न रहेगा। 

नयन्तरु पेरिन्बम् एल्लाम् पळुतु एन्रु नण्णिनर् पाल्

सयम् तरु  कीर्ति इरामानुस मुनि ताळिणै मेल्
उयर्न्द​ गुणत्तुत् तिरुवरंगत्तु अमुदु ओन्गुम् अन्बाल्
इयम्बुम् कलित्तुरैयन्दादि योद विशै नेञ्जमे 

श्रीरामानुज स्वामीजी वह हैं जो अपना आशिर्वादसे , जो यह समझने के पश्चात कि, इस संसार का सुख तुच्छ है, उनके शरण में आता है, उन्हें संसार पर विजय प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करतें हैं । हे हृदय! इस प्रबन्धम को गाने को स्वीकारों जो बड़ी कृपा और उबरते प्रेम से श्रीरंगामृत स्वामीजी जिनमें बड़े गुण हैं, द्वारा श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरणों पर प्रेम से रचा गया है। यह प्रबंध तमिल के “कलित्तुरै अंधादि” (तमिल पध्य जिसका पिछले पाशूर का अंतिम शब्द अगले पाशूर का प्रथम शब्द होता है।) शैली में है।   

सोल्लिन् तोहै कोण्डु उनदु अडिप्पोदुक्कुत् तोन्डु सेय्युम्
नल्लन्बर् एत्तुम् उन् नामम् एल्लाम् एन्तन् नाविनुळ्ळे

अल्लुम्  पहलुम् अमरुम्पडि नल्गु अऱुसमयम् 

वेल्लुम्  परम इरामानुस !  इदु एन् विण्णप्पमे

आपके भक्त वह है जो यह निश्चित करते हैं कि वें कुछ विशेष पाशुरों का हीं उच्चारण करेंगे और आपके श्रीचरणों में वाचीका कैंकर्य (प्राध्यापक की भाषा से सेवा) कर और उससे लाभ लेंगे। आप अपनी कृपा मुझ (पर बरसाते रहना ताकि सभी दिव्य नाम जो वें आपकी ओर बड़े प्रेम से ,दिन और रात में भेद देखे बिना सुनाते हैं वह मेरे जिव्हा पर नित्य वास करें। ६ भिन्न भिन्न दर्शनशास्त्र का अभ्यास रखनेवाले, जिसमे, वें जो वेदों में विश्वास नहीं करते थे और वें जो वेदों के विषय में गलत स्पष्टीकरण देते थे, ऐसे दोनों पर विजय प्राप्त करनेवाले आप श्रीरामानुज हैं। यही मेरी आपसे प्रार्थना हैं।   
अगले लेख में इस प्रबन्धम के अगले भाग पर चर्चा करेंगे।

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तिरुप्पावै – सरल व्याख्या – पाशुर २१-३०

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।।श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः।।

तिरुप्पावै

<< पाशुर १६ – २०

इस पाशुर से देवी यह अनुभव करवा रही है कि , भगवान् कृष्ण के प्रेम में मग्नता के, आनंद का अनुभव प्राप्त करने, नप्पिन्नै  पिराट्टी भी देवी के व्रतनुष्ठान में सम्मिलित हो जाती है ।

इक्कीसवाँ पाशुर :

इस पाशुर में देवी नन्द गोप के यहाँ, गोप कुल में भगवान् कृष्ण के जन्म का उत्सव मना रही है ।

वेदों के माध्यम से उनकी सर्वोच्चता और उनकी गुणवत्ता को महसूस कर रही है ।

एऱ्ऱ कलन्गळ् एदिर् पोन्गि मीदळिप्प
  माऱ्ऱादे पाल् सोरियुम् वळ्ळल् पेरुम् पसुक्कळ्
आऱ्ऱप् पडैत्तान् मगने अऱिवुऱाय्
  ऊऱ्ऱम् उडैयाय् पेरियाय् उलगिनिल्
तोऱ्ऱमाय् निन्ऱ सुडरे तुयिल् एळाय्
  माऱ्ऱार् उनक्कु वलि तोलैन्दु उन् वासल् कण्
आऱ्ऱादु वन्दु उन् अडि पणियुमा पोले
  पोऱ्ऱि याम् वन्दोम् पुगळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

उदार प्रवर्ति वाली, सदा लगातार दूध देने में सक्षम, जिससे दुग्ध के भंडारण के लिये रखे , सभी बर्तन दूध से भर भर कर बह जाता है, ऐसी गायें के अपार समूह के धनि, नन्द गोप के सूत अपनी गहरी दिव्य निद्रा से जागो ।

हे ! सर्वोच्च प्रामाणिक वेदों में वर्णित अपार शक्तियों के धनि । 

हे! ,वह जो महान है !  

हे , वह जो वैभवशाली है,

हे! वह जो इस दुनिया में सबके सामने खड़े है ।  

उठो ,  हम सब आपका गुणानुवाद करते, आपके द्वार पहुँच गये हैं  ।

वैसे ही जैसे आपके शत्रु परास्त होने के बाद, और कोई सहारा न देख , आपके दिव्य चरणों की शरण में आ जाते है ।

बावीसवाँ पाशुर:

इस पाशुर में आण्डाळ्  भगवान् से कहती है की, मझे और मेरी सखियों को आपके सिवाय और कोई सहारा नहीं है ।

हम आपके सामने विभीषण की तरह ही आयी हैं, जो शरणागत होकर रामजी के पास आया था ।

वह यह भी कहती है की, वह सब सारी इच्छायें का त्याग कर सिर्फ तुमको (कृष्ण) को पाने की ही इच्छा  रखते हैं ।

अन्गण् मा ग्यालत्तु अरसर् अभिमान
  बन्घमाय् वन्दु निन् पळ्ळिक् कट्टिल् कीळे
सन्गम् इरुप्पार् पोल् वन्दु तलैप्पेय्दोम्
  किण्किणि वाय्च् चेय्द तामरैप् पूप् पोले
सेम् कण् सिऱुच् चिऱिदे एम् मेल् विळियावो
  तिन्गळुम् आदित्तियनुम् एळुन्दाऱ् पोल्
अम् कण् इरण्डुम् कोण्डु एन्गळ् मेल् नोक्कुदियेल्
  एन्गळ् मेल् साबम् इळिन्दु एलोर् एम्बावाय्

हम सुन्दर और विशाल वसुधा के भूभाग पर शासन करने वाले राजाओं की तरह अपना अभिमान त्याग कर आपके छत्र के निचे एकत्र हुये है ।

क्या आप हम पर कृपा कटाक्ष नहीं डालोगे ?  आपके मुख कमल की चमक. झिलमिलाते आभूषणों की तरह है, अर्ध- खिले कमल के फूल के समान  हैं |

हे ! कमलनयन अपने सूर्य और चंद्र जैसे नेत्रों से हमें देखभर लोगे, तो हमारे सारे दुःख दूर हो जायेंगे ।

तेवीसवाँ पाशुर:`

इस पाशुर में भगवान् कृष्ण, देवी आण्डाळ्  के इतने दिनों के व्रत को देख, उन्हें इतने दिनों तक इंतज़ार करवाने के बाद पूछ रहे है, क्या इच्छायें है?

आण्डाळ कहती है आप अपनी शैया से उठिये, राजदरबार में, राजसी शान से सिंहासन पर विराजमान हो सभी दरबारियों के सम्मुख मेरी इच्छा पूछिये ।

मारि मलै मुळैन्जिल् मन्निक् किडन्दु उऱन्गुम्
  सीरिय सिन्गम् अऱिवुऱ्ऱुत् ती विळित्तु
वेरि मयिर् पोन्ग एप्पाडुम् पेर्न्दु उदऱि
  मूरि निमिर्न्दु मुळन्गिप् पुऱप्पट्टु
प्Oदरुमा पोले नी पूवैप् पूवण्णा
  उन् कोयिल् निन्ऱु इन्गने पोन्दु अरुळिक् कोप्पु उडैय
सीरिय सिन्गासनत्तु इरुन्दु याम् वन्द
  कारियम् आराय्न्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

वह, जिनका रंगरूप नील लोहित रंग सा है, वह, जो वर्षा काल में अपनी गुफा में सो रहे सिंह की मानिंद,  जागने पर, अपनी पैनी आँखों से चहुँ  ओर देखते हुये, अपने शरीर को ऐसे फैलाता है की, उसकी सुगन्धित अयाल चहुँ  ओर फ़ैल जाती है , जो 

दहाड़ते हुये, अपनी शाही चाल से बहार आता है, आप उसी तरह अपनी निद्रा त्याग, बाहर  आपके महल के इस स्थान तक आइये , अपने प्रतिष्ठित सिंहासन पर बिराज, हम पर कृपा बरसाते हुये हमें हमारे यहाँ आने का उद्देश्य पूछिये ।

चौबीसवाँ पाशुर:

पेरिया आळ्वार की पालित पुत्री है, इस परिवार का ध्येय ही सदा भगवान का मंगलाशासन रहा है ।

भगवान को सिंह सी चाल से चलते हुये अपने सिंहासन पीठ पर विराजमान देख, देवी और उनकी सखियों ने भगवान का  मंगलाशासन किया ।

यहाँ देवी, सीता पिराट्टी, दंडकारण्य के ऋषि मुनि, पेरिया आळ्वार की तरह आत्मग्लानि  भी महसूस करती है कि  , भगवान् के इतने सुकोमल पाँव है, हमारे कारण उन्हें चलकर आना पड़ा ।

अन्ऱु इव्वुलगम् अळन्दाय् अडि पोऱ्ऱि
  सेन्ऱु अन्गुत् तेन्निलन्गै सेऱ्ऱाय् तिऱल् पोऱ्ऱि
पोन्ऱच् चगडम् उदैत्ताय् पुगळ् पोऱ्ऱि
  कन्ऱु कुणिला एऱिन्दाय् कळल् पोऱ्ऱि
कुन्ऱु कुडैया एडुत्ताय् गुणम् पोऱ्ऱि
  वेन्ऱु पगै केडुक्कुम् निन् कैयिल् वेल् पोऱ्ऱि
एन्ऱु एन्ऱु उन् सेवगमे एत्तिप् पऱै कोळ्वान्
  इन्ऱु याम् वन्दोम् इरन्गु एलोर् एम्बावाय्

इस पाशुर के द्रविड़ शब्द पोऱ्ऱि (पोररी) का अर्थ “चिरायु हो” होता है, जो मंगलाशासन में कहते है ।

हे! बहुत पहले देवों के लिये अपने चरणों से तीनों लोकों  को नापने वाले, आप चिरायु हो ।

हे! रावण की स्वर्ण लंका में जाकर उसे नष्ट करने वाले, आपका बल सदा बना रहे ।

हे! शकटासुर को लात मारकर मारने वाले .आपका यश सदा बना रहे । 

हे!  धेनुकासुर को उठाकर जंगली बासों में फेंक उसे और जंगल में रहने वाले राक्षस का संहार करने वाले , आपके  चरण सदा  चिरायु  हो । 

हे ! गिरी गोवेर्धन को छत्र की तरह धारण करने वाले, आपमें  शुभ गुण सदा विराजमान रहे ।

हे !  उस चक्रराज का भी मंगल हो, जो आपके हाथ में शोभित है, जो आपके दुश्मनो का नाश करता है ।

देवी  ने कहा हम यहाँ आपके वीरत्व सौम्यत्व करुणा का गुणानुवाद और मंगलाशासन करने आयी हैं , हम पर कृपा करते हुये, आपके कैंकर्य में रत रहने की शक्ति हमें प्रदान करिये ।

पच्चीसवां पाशुर:

इस पाशुर में भगवान् पूछते हैं  क्या उन्हें व्रत के लिये कोई वस्तु चाहिये?  वह कहती है आपके मंगलाशासन करने से उनके सारे दुःख कष्ट दूर हो गये, बस सिर्फ कैंकर्य की इच्छा बाकि है ।

ओरुत्ति मगनाय्प् पिऱन्दु ओर् इरविल्
  ओरुत्ति मगनाय् ओळित्तु वळरत्
तरिक्किलानागित् तान् तीन्गु निनैन्द
  करुत्तैप् पिळैप्पित्तुक् कन्जन् वयिऱ्ऱिल्
नेरुप्पेन्न निन्ऱ नेडुमाले उन्नै
  अरुत्तित्तु वन्दोम् पऱै तरुदि आगिल्
तिरुत्तक्क सेल्वमुम् सेवगमुम् याम् पाडि
  वरुत्तमुम् तीर्न्दु मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

घनघोर अँधेरी रात में देवकी के यहाँ अवतार लेकर, यशोदा के पुत्र बन पलते रहे, पर कंस यह बर्दाश्त न कर ,अपनी दुर्बुद्धि लगाकर आपको मारने के कई यत्न किये । आप उसकी पेट की अग्नि बन, उसके विचार और उसको ही नष्ट कर दिये । हम यहाँ आपके पास अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करने आयी हैं  ।

आप हमारी  प्रार्थना सुन उसे पूर्ण करोगे तब हम आपके लिये, ऐसा मंगलाशासन करेंगी कि , पिराट्टी भी उसे पसंद करेंगी, हम भी आपसे बिछडाव के दुःख से दूर हो जायेंगी ।

छब्बीसवाँ पाशुर :

पहले पाशुर में भगवान् के पूछने पर कुछ नहीं होना कहती है, पर इस पाशुर में देवी उन सभी वस्तुओं की मांग करती है, जो उन्हें उनके व्रत में चाहिये थी ।

जैसे भगवान की सेवा में रत पाञ्चजन्य जैसा शंख, जिससे मंगलाशासन का नाद कर सके ।

एक दीपक जिससे भगवान का मुख निहार सके ।

एक ध्वजा जो भगवान की उपस्तिथिति निश्चित करता है ।

एक छत्र जिससे भगवान को धुप, हवा पानी में, इसकी ओट में रह सके ।

हमारे पूर्वाचार्यों ने इन पाशुरों का अनुभव करते कहते है की, देवी ने कृष्णानुभव करने इन सब चीजों की मांग रखी थी ।

माले मणिवण्णा मार्गळि नीर् आडुवान्
  मेलैयार् सेय्वनगळ् वेण्डुवन केट्टियेल्
ग्यालत्तै एल्लाम् नडुन्ग मुरल्वन
  पाल् अन्न वण्णत्तु उन् पान्चसन्नियमे
पोल्वन सन्गन्गळ् पोय्प्पाडु उडैयनवे
  सालप् पेरुम् पऱैये पल्लाण्डु इसैप्पारे
कोल विळक्के कोडिये विदानमे
  आलिन् इलैयाय् अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

हे ! भक्तों के प्रति स्नेह रखने वाले ।

हे ! नील रत्न के समान रंगवाले ।

हे ! प्रलयकाल में वटपत्र पर वटपत्रशायि बन शयन करने वाले ।

अगर आप पूछ रहे है, हमें मार्गशीर्ष माह में व्रत के लिये क्या क्या चाहिये , तो हमें पूर्वजो ने जैसे किये वैसे ही हम करना चाहती है ।

हमें वैसे ही दूधिया श्वेत पाञ्चजन्य जैसे, नाद करनेवाले शंख चाहिये, जिसके नाद से संसार कम्पित हो जाये ।  हमें ऐसे बजाने वाले यन्त्र चाहिये जो बड़े और विशाल हो ।

हमें ऐसे परिकर चाहिये जो तिरुप्पल्लाण्डु गाये ।

हमें दीपक, ध्वजा और छत्र चाहिये ।

सत्ताइसवें और अट्ठाईसवें पाशुर में देवी यह प्रमाणित करती है की, स्वयं एम्पेरुमान (भगवान) ही एक मात्र उपेय और उपाय है । भगवद कैंकर्य कर उन्हें प्राप्त करना ही एक मात्र लक्ष्य है ।

सत्ताईसवाँ पाशुर :

आण्डाळ्  इस पाशुर में  एम्पेरुमान (भगवान) के, अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही प्रकार के जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने के विशिष्ट गुण बतलाती है ।

कहती है की परम पुरुषार्थ सायुज्य मोक्ष (बिना बिछुड़े सदा भगवान की नित्य सनिद्धि में, उनके कैंकर्य में रहना) की प्राप्ति है ।

कूडारै वेल्लुम् सीर्क् गोविन्दा उन्दन्नैप्
  पाडिप् पऱै कोण्डु याम् पेऱु सम्मानम्
नाडु पुगळुम् परिसिनाल् नन्ऱाग
  सूडगमे तोळ् वळैये तोडे सेविप्पूवे
पाडगमे एन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्
  आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नेय् पेउदु मुळन्गै वळिवार
  कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्

हे गोविन्द ! न मानने वालों के भी मन को जीत  लेने का आपका यह गुण, आपके ऐसे गुणों के गुणानुवाद से हमें सम्मान मिलता है ।

आपके कैंकर्य से हमें भांति भांति के आभूषण धारण को मिलते है, जैसे कंगन, बाजूबन्द, कुण्डल, कान में ऊपर की तरफ पहना जाने वाला आभूषण , पायल और भी अन्य, जो नप्पिन्नै  पिराट्टी और आप हमें प्रसादित करते है ।

हम सब आप द्वारा प्रसादित वस्त्र धारण कर, हम सभी घी से तर अक्कारवड़ीसल (एक मीठा अन्न जो चांवल, दूध, गुड़ और घी के मिश्रण से बनता है) पायेंगे, जिसे पाते समय घी, हथेलियों से निकल कोहनियों से बहा रहा होता है ।

अट्ठाईसवाँ पाशुर:

इस पाशुर में देवी आण्डाळ् अकारणकरुणावरुणालय का जीवात्मा से सम्बन्ध समझा रही है ।

देवी का अन्य उपाय से परे होकर, भगवान् की वृन्दावन की गायों की तरह बिना किसी द्वेष के, सब के उत्त्थान के गुण बतला रही है ।

कऱवैगळ् पिन् सेन्ऱु कानम् सेर्न्दु उण्बोम्
  अऱिवु ओन्ऱुम् इल्लाद आय्क्कुलत्तु उन्दन्नैप्
पिऱवि पेऱुन्दनैप् पुण्णियम् याम् उडैयोम्
  कुऱै ओन्ऱुम् इल्लाद गोविन्दा उन् तन्नोडु
उऱव्Eल् नमक्कु इन्गु ओळिक्क ओळियादु
  अऱियाद पिळ्ळगळोम् अन्बिनाल् उन्दन्नैच्
चिऱु पेर् अळैत्तनवुम् सीऱि अरुळादे
  इऱैवा नी ताराय् पऱै एलोर् एम्बावाय्

हे सर्व मंगलकारी गोविन्द ! हम गायों के पीछे पीछे वन में जायेंगे,वहाँ उन्हें चराकर, संग संग भोजन पायेंगे ।

हे! भगवान, इस ज्ञान  हीन् गो-कुल में आपका जन्म हमारा सौभाग्य है ।

हमारा आपसे जो रिश्ता है, उसे न तो तुम तोड़ सकते है और न हम।

हमसे नाराज़ मत होना क्योंकि, हमने अपने स्नेह के वश आपको तुच्छ नामों से पुकारा है।

जो हम चाहते हैं हमें प्रसादित कर, हमें अनुग्रहित करें।  

उन्तीसवाँ पाशुर:

इस पाशुर में देवी यह कहती है की कैंकर्य वह अपनी ख़ुशी के लिये नहीं बल्कि एम्पेरुमान की ख़ुशी के लिये करना चाहती है।

बतलाती है, कृष्णानुभव की तीव्र इच्छा के चलते ही, बहाने से  इस व्रत को धारण किया है।

सिऱ्ऱम् सिऱु काले वन्दु उन्नैच् चेवित्तु उन्
  पोऱ्ऱामरै अडिये पोऱ्ऱुम् पोरुळ् केळाय्
पेऱ्ऱम् मेय्त्तु उण्णुम् कुलत्तिल् पिऱन्दु नी
  कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु
इऱ्ऱैप् पऱै कोळ्वान् अन्ऱु काण् गोविन्दा
  एऱ्ऱैक्कुम् एळेळ् पिऱविक्कुम् उन्दन्नोडु
उऱ्ऱोमे आवोम् उनक्के नाम् आट् सेय्वोम्
  मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु एलोर् एम्बावाय्

हे गोविन्द ! आप सुनिये, हम सब प्रातः ही, यहाँ आकर आपके वांछनीय स्वर्ण कमल जैसे दिव्य चरणों को नमन कर मंगलाशासन करती हैं । 

गो-कुल में जन्म लेने वाले हे गोविन्द, हमारी गायों को चराकर प्रसाद पाते हो आपको हमारी सेवायें प्राप्त करनी चाहिये।

हम यहाँ वाद्य यंत्र, और ढोल लेने नहीं आयी हैं । 

चाहे कोई भी  जन्म रहा हो, आपका हमारा अनादिकाल से सम्बन्ध है।

हम सिर्फ आपका ही कैंकर्य चाहती  हैं ।

आप यह कदापि न सोंचे, यह सब कुछ हमारी ख़ुशी के लिये कर रही  हैं । 

आप हम पर ऐसी कृपा करें, यह  कैंकर्य केवल आपको प्रसन्न करने के लिये ही है।

तीसवाँ पाशुर:

भगवान के इच्छापूर्ति का वचन देने के बाद, देवी गोदा गोकुल की गोपिका का भाव छोड़  स्वयं के लिये यह पाशुर गाती है।

यहाँ देवी आण्डाळ्  कहती है कि जो कोई भी इन पाशुरों का गायन, भाव या अ-भाव में भी करेगा वह, गोदा की तरह भगवान का कैंकर्य प्राप्त करेगा, बिलकुल उसी तरह जैसे गोप बालिकाएं वृन्दावन में कृष्ण के साथ रहती थी।

देवी आण्डाळ् ने श्रीविल्लिपुत्तूर को ही गोकुल/वृन्दावन मान गोपिका भाव से रह रही थी।

पराशर भट्टर (कुरेश स्वामीजी, भगवत रामानुज स्वामीजी के प्रमुख शिष्य के पुत्र)  ने कहा जैसे गाय भूसा भरे अपने मृत बछड़े को देख कर भी दूध दे देती है, वैसे ही यह तीस पाशुर भगवान् को अति प्रिय है इस कारण इन्हे गाने वाले को वही फल प्राप्त होगा जो फल भगवान के प्रिय जनों   को मिलता है। 

देवी आण्डाळ् प्रबंध को समुद्र मंथन की एक घटना का जिक्र करते हुये संपन्न करती है।

ग्वाल बालिकाओं ने भगवान को प्राप्त करना चाहा, भगवत प्राप्ति के लिये पिराट्टी का पुरुषकार अनिवार्य है। भगवान ने समुद्र मंथन, माता महालक्ष्मीजी को समुद्र से बाहर लाकर उन्हें वरने के लिये किये थे।

इस तरह इस घटना को कहते हुये देवी आण्डाळ् अपना प्रबंध सम्पूर्ण करती है।

देवी आण्डाळ् आचार्याभिमान को जतलाते स्वयं को भट्टरपिरान् की पुत्री कह बतलाती है।

वन्गक् कडल् कडैन्द मादवनै केसवनै
  तिन्गळ् तिरु मुगत्तुच् चेळियार् सेन्ऱिऱैन्जि
अन्गप् पऱै कोण्ड आऱ्ऱै अणि पुदुवैप्
  पैन्गमलत् तण् तेरियल् भट्टर्पिरान् कोदै सोन्न
सन्गत् तमिळ्मालै मुप्पदुम् तप्पामे 
  इन्गु इप्परिसु उरैप्पार् ईरिरण्डु माल् वरैत् तोळ्
सेन्गण् तिरुमुगत्तुच् चेल्वत् तिरुमालाल्
  एन्गुम् तिरुवरुळ् पेऱ्ऱु इन्बुऱुवर् एम्बावाय्

सागर मंथन करवाने वाले भगवान् केशवन (एम्पेरुमान) जो इस ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्ति है।

चंद्रमुखी सी ग्वालबालायें, विशिष्ट आभूषण धारण कर उन भगवान की पूजा कर , उसका फल  गोकुल में पाती है।

देवी आण्डाळ्,  पेरियाळ्वार की पुत्री, जिनके पास कमल पुष्पों की माला है। श्रीविल्लिपुत्तूर में अवतरित हो, कृपा करते हुये भगवान कृष्ण का अनुभव प्राप्त करती गोपबालिकाओं की कथा कही है।

इन पाशुरों को संगोष्ठियों में, इस तरह गायन से उन भगवान् जिनके विशाल पर्वतों की तरह दिव्य कंधे हैं, लालिमा लिये दिव्य नेत्रों वाला एक दिव्य चेहरा है (आँखों की लालिमा भक्तों के प्रति स्नेह को दर्शाती हैं)  ऐसे लोग हर जगह आनंदित रहेंगे।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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तिरुप्पावै – सरल व्याख्या – पाशुर १६ से २०

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।।श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः।।

तिरुप्पावै

<< पाशुर ६ – १५

इस सोलहवे पाशुर  में देवी आन्डाळ् नित्यसुरियों के लौकिक प्रतिनिधियों, जैसे क्षेत्रपाल द्वारपाल, आदिशेष आदि… को जगा रही है।

सोलहवाँ पाशुर:

इस सोलहवे पाशुर में देवी नन्दगोप के महल और नन्दगोप के कमरे के द्वारपाल को जगा रही है।

नायगनाय् निन्ऱ नन्दगोपनुडैय
  कोयिल् काप्पाने कोडित्तोन्ऱुम् तोरण
वायिल् काप्पाने मणिक्कदवम् ताळ् तिऱवाय्
  आयर् सिऱुमियरोमुक्कु अऱै पऱै
मायन् मणिवण्णन् नेन्नले वाय् नेर्न्दान्
  तूयोमाय् वन्दोम् तुयिल् एळप् पाडुवान्
वायाल् मुन्नमुन्नम् माऱ्ऱादे अम्मा नी
  नेय निलैक्कदवम् नीक्कु एलोर् एम्बावाय्

हे ! हमारे नायक नन्दगोप के  दिव्य महल की रक्षा करने वाले द्वारपालकों।

हे ! हमारे ध्वज लगे मेहराबों की रक्षा करने वालों, तुम्हे रत्नजड़ित द्वार की कुण्डी खोल देनी चाहिये।

कृष्ण जिनकी दिव्य अद्भुत गतिविधियां है, जिनका रंग नीलमणि जैसा है, उन्होंने कल हमें वचन दिया था की वह नाद करने वाले ढोल हमें देंगे।

हम सभी शुद्ध पवित्र मन से उन्हें जगाने आयी हैं ।

हे मेरे स्वामी! आप जिन्हे कृष्ण से मोह, प्रेम है आपको द्वार खोल देने चाहिये।

सत्रहवाँ पाशुर:

सत्रहवें पाशुर में देवी आण्डाळ्  नन्दगोपन्, माँ यशोदा और बलरामजी को जगा रही है।

अम्बरमे तण्णीरे सोऱे अऱन्जेय्युम्
  एम्पेरुमान् नन्दगोपाला एळुन्दिराय्
कोम्बनार्क्केल्लाम् कोळुन्दे कुलविळक्के
  एम्पेरुमाट्टि यसोदाय् अऱिवुऱाय्
अम्बरम् ऊडु अऱुत्तु ओन्गि उलगु अळन्द
  उम्बर् कोमाने उऱन्गादु एळुन्दिराय्
सेम्बोन् कळल् अडिच् चेल्वा बलदेवा
  उम्बियुम् नीयुम् उऱन्गु एलोर् एम्बावाय्`

ओह ! वस्त्र अन्न जल दान करने वाले, हे नाथ नन्दगोप उठो, हे ! छरहरे बदन वाली ग्वालकुल की नायिका, हे! ग्वालकुल की दीपस्तम्भ, ओ ! यशोदा पिराट्टी अवगत हो जाइये! हे !आकाशीय गृह तारों के राजा! जिन्होंने  आकाश को चीरते  हुए सारे संसार को मापते हुए  ऊपर उठे ,आपको अब नींद से  जागना चाहिए | हे लाली लिये स्वर्णिम पायल धारण करने वाले बलराम ! आप दोनों भाइयों को अब उठ जाना चाहिये।

अट्ठारवें , उनीसवें और बीसवें पाशुर में देवी गोदाम्बाजी को यह आभास होता है की, भगवान कृष्ण को जगाने में कहीं कोई कमी रह गयी, उन्हें लगता है की भगवान् कृष्ण को जगाने में उन्हें देवी नप्पिन्नै पिराट्टी का पुरुषकार  लेना चाहिये।

इसलिये इन तीन पाशुरों में देवी आण्डाळ् , नप्पिन्नै पिराट्टी की महानता का उल्लेख करती है।

जैसे नप्पिन्नै पिराट्टी की भगवान् कृष्ण के साथ अंतरंगता, उनके दिव्य चिर यौवन की बात कहती है, कैसे भगवान् के साथ रह आनंद लेती है और उनके गुण जिससे वह भगवान की इतनी प्रिय हो गयी, का बखान करती है।

भगवान को चेतन जीवों पर कृपा करने के लिये बाध्य करने के गुण की भी प्रशंसा करती है।

हमारे पूर्वाचार्य कहते है की पिराट्टी को भूल, सिर्फ भगवान् को प्राप्त करने की इच्छा, शूर्पणखा की इच्छा की तरह है, जो सीताजी को छोड़ उनके सम्मुख ही रामजी को पाने की इच्छा रखती थी।

भगवान् को छोड़, पिराट्टी को पाने की ही इच्छा रखे तो उसकी इच्छा रावण की इच्छा की तरह है, जो भगवान रामजी को छोड़ सीताजी की ही कामना करता था।

अट्ठारवाँ पाशुर :

अट्ठारवें पाशुर में , देवी के बहुत जगाने पर भी भगवान निद्रा से नहीं उठे, देवी सोंचती है उसे नप्पिन्नै पिराट्टी की अनुशंसा (पुरुषकार) लेकर सतत प्रयास करते रहना चाहिये ।

 यह पाशुर भगवद रामानुज स्वामीजी को अति प्रिय था।

उन्दु मद कळिऱ्ऱन् ओडाद तोळ् वलियन्
  नन्द गोपालन् मरुमगळे नप्पिन्नाय्
गन्दम् कमळुम् कुळली कडै तिऱवाय्
  वन्दु एन्गुम् कोळि अळैत्तन काण् मादविप्
पन्दल् मेल् पल्गाल् कुयिल् इनन्गळ् कूविन काण्
  पन्दार् विरलि उन् मैत्तुनन् पेर् पाड
सेन्दामरैक् कैयाल् सीर् आर् वळै ओलिप्प
  वन्दु तिऱवाय् मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय् !

ओ ! हाथी से बलवान, चौड़े कांधो वाले,  जो युद्ध में कभी पीछे नहीं हटते, ऐसे नन्दगोप की पुत्रवधु।

ओ ! नप्पिन्नै  पिराट्टी, ओ ! सुगन्धित केशों वाली, द्वार खोलो, देखो चहुँ और चिड़ियाँ चहक रही है, कोयल लताओं से घिरे मचान से कुक रही है।

अपने उँगलियों से  पुष्प गेंद से खेलने वाली, अपने लाली लिये कमल के समान, दिव्य सुन्दर हाथों में पहनी चूड़ियों को खनकाते प्रसन्नता से द्वार खोलो । 

उनीसवाँ पाशुर :

इस पाशुर में देवी ,कृष्णजी और नप्पिन्नै  पिराट्टी को बारी बारी से जगाने का प्रयत्न कर रही है ।

कुत्तु विळक्कु एरियक् कोट्टुक्काल् कट्टिल् मेल्
  मेत्तेन्ऱ पन्जसयनत्तिन् मेल् एऱि
कोत्तु अलर् पून्गुळल् नप्पिन्नै कोन्गैमेल्
  वैत्तुक् किडन्द मलर् मार्बा वाय् तिऱवाय्
मैत्तडम् कण्णिनाय् नी उन् मणाळनै
  एत्तनै पोदुम् तुयिल् एळ ओट्टाय् काण्
एत्तनैयेलुम् पिरिवु आऱ्ऱगिल्लायाल्
  तत्तुवम् अन्ऱु तगवु एलोर् एम्बावाय्

ओ ! चिराग से प्रकाशमान अपने कमरे में , हाथी दन्त से बने सुसज्जित पलंग पर,नप्पिन्नै पिराट्टि के संग, जिसके केशपाश सलीके से सुन्दर फूलों से सजे हुये है, के विकसित वक्षस्थल पर सोने वाले ।

हे नाथ ! अपने दिव्य मुख से कुछ तो हम को कहो ।

ओह ! अपनी आँखों को काजल से सजाने वाली, क्या तुम अपने पति को एक पल के लिये भी उठने नहीं दे रही ? क्या तुम उनसे एक पल भी दूर नहीं रह सकती, हमारे नज़दीक आने से उन्हें रोकना आपके स्वभाव और स्वरुप के अनुकूल नहीं लगता है ।

बीसवाँ पाशुर :

इस पाशुर में देवी आन्डाळ् नप्पिन्नै पिराट्टि और भगवान् कृष्ण दोनों को जगा रही है ।

नप्पिन्नै पिराट्टि से कहती है कि , तुम्हे हम सबको कृष्ण से मिलाना चाहिये, हमें उनके मिलन के आनंद का अनुभव लेने में सहायक होना चाहिये ।

मुप्पत्तु मूवर् अमरर्क्कु मुन् सेन्ऱु
  कप्पम् तविर्क्कुम् कलिये तुयिल् एळाय्
सेप्पम् उडैयाय् तिऱल् उडैयाय् सेऱ्ऱार्क्कु
  वेप्पम् कोडुक्कुम् विमला तुयिल् एळाय्
सेप्पन्न मेन् मुलै सेव्वाय्च् चिऱु मरुन्गुल्
  नप्पिन्नै नन्गाय् तिरुवे तुयिल् एळाय्
उक्कमुम् तट्टु ओळियुम् तन्दु उन् मणाळनै
  इप्पोदे एम्मै नीराट्टु एलोर् एम्बावाय्

३३ कोटि देवताओं के कष्ट निवारण का सामर्थ्य रखने वाले हे कृष्ण , उठों !भक्तों की रक्षा करने वाले , शत्रुओं का संहार करने वाले उठो! मुख पर लालिमा लिये, स्वर्ण कान्ति लिये विकसित उरोजों वाली, पतली कमर वाली हे नप्पिन्नै पिराट्टी ! आप तो माता महालक्ष्मी सी लग रही हो, उठिये. आप हमें हमारे व्रत अनुष्ठान के लिये, ताड़पत्र से बने पंखे, दर्पण और आपके स्वामी  कण्णन् आदि प्रदान कर , हमें स्नान करवाइये ।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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तिरुप्पावै – सरल व्यख्या – पाशुर ६ – १५

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तिरुप्पावै

<< पाशुर १ से ५

अब पाशुर छः – से पन्द्रह तक, आण्डाळ् नाच्चियार् उन १० ग्वालिनों को जगाती है, जो गोकुल की सारी ५००००० ग्वालिनों का प्रतिनिधित्व करती हुयी बतलाया है।

इन पाशुरों को कुछ इस व्यवस्थित ढंग व  ऐसे भावों से युक्त किया है कि, ऐसे प्रतीत होता है, देवी उन दस भागवतों को जगा रही है, जो वेद में विशेषज्ञ हैं।

छठवां पाशुर:

इस पाशुर में देवी आण्डाळ् कृष्णानुभव में रत नव गोपिका को जगाती है। यह गोपिका स्व-कृष्णानुभव से संतुष्ट है। यह भगवद अनुभव में निष्ठा का प्रथम पड़ाव है। ऐसे ही कोई अन्य भागवतों (भक्तो) के संग भगवद अनुभव करना चाहे तो वह चरमपर्व निष्ठा होती है।

पुळ्ळुम् सिलम्बिन काण् पुळ् अरैयन् कोयिल्
  वेळ्ळै विळिसन्गिन् पेररवम् केट्टिलैयो
पिळ्ळाय् एळुन्दिराय् पेय् मुलै नन्जु उण्डु
  कळ्ळच् चगडम् कलक्कु अळियक् काल् ओच्चि
वेळ्ळत्तु अरविल् तुयिल् अमर्न्द वित्तिनै
  उळ्ळ्ळत्तुक् कोण्डु मुनिवर्गळुम् योगिगळुम्
मेळ्ळ एळुन्दु अरि एन्ऱ पेर् अरवम्
  उळ्ळम् पुगुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्

इस पाशुर में आण्डाळ् सखी से कह रही है, क्या तुझे पक्षियों की चहचहाहट सुनाई नहीं दे रही है? पक्षीराज गरुड़ के नाथ ,भगवान् (कण्णन्)  के मदिर से आ रही सफ़ेद शंखों के शंखनाद की ध्वनि नहीं सुनायी दे रही है?

हे छोटी सखी (नयी सखी) उठ, भगवान कृष्ण ने माँ बनकर आयी राक्षसी पूतना के स्तनों से लगे विष के साथ साथ उसके प्राण भी पी लिये।

अपने चरण उठाकर धोके से आये दैत्य शकटासुर को भी खंडित कर दिये, वही क्षीरसागर में शेष शैया पर शयन कर रहे है।

वह इस जगत के कारक है।

मुनि जो सदा इनके ध्यान में रहते है, योगी लोग जो प्रातः इनकी सेवा कर इनके ध्यान में रहते है।

वह अपने मन में बसे भगवान को कोई तकलीफ दिये बगैर, प्रातः उठकर हरी हरी नाम का उच्चारण कर रहे, उनके यह शब्द हमारे मन में उतर, हमें सुख प्रदान कर रहे है ।

सातवां पाशुर :

इस पाशुर में आण्डाळ् दूसरी ग्वाल सखी को उठा रही  है।

यह सखी कृष्णानुभव में प्रवीण है, पर आण्डाळ् और उसकी सखियों की आवाज़ सुनने घर के अंदर बैठी है।

कीसु कीसु एन्ऱु एन्गुम् आनैच्चात्तन् कलन्दु
  पेसिन पेच्चरवम् केट्टिलैयो पेय्प्पेण्णे
कासुम् पिरप्पुम् कलकलप्पक् कै पेर्त्तु
  वास नऱुम् कुळल् आय्च्चियर् मत्तिनाल्
ओसै पडुत्त तयिर् अरवम् केट्टिलैयो
  नायगप् पेण्पिळ्ळाय् नारायणन् मूर्ति 
केसवनैप् पाडवुम् नी केट्टे किडत्तियो
  तेसम् उडैयाय् तिऱ एलोर् एम्बावाय्

हे अबोध सखी (कृष्ण भक्ति से सरोवर होते हुये भी उसका भान न करने वाली), क्या तुझे पक्षियों की  चहचहाहट “किसु किसु”  चारों ओर  सुनायी नहीं दे रही?

क्या तुम ग्वालिनों द्वारा दही मंथने की आवाज़ नहीं सुन रही? ग्वालिनों जिनके सुन्दर केशों से भीनी भीनी महक आ रही है, जिनके दही मंथते समय हिल रहे, उनके स्वर्ण और चाँदी के आभूषणों के बजने की मधुर आवाज आ रही है|

हे! ग्वालिनों की नायिका, हम नारायण के अवतार कृष्ण के गीत गा रहे है, क्या तुम ऐसे ही सोये रहेगी?

उठ दरवाजा खोल।

आठवाँ पाशुर :

इस पाशुर में देवी ऐसी सखी को जगा रही है, जिसे कण्णन् (भगवान कृष्ण) बहुत पसंद करते है, और सखी, इसी बात से बहुत गुमान में रहती है।

कीळ् वानम् वेळ्ळेन्ऱु एरुमै सिऱु वीडु
  मेय्वान् परन्दन काण् मिक्कुळ्ळ पिळ्ळैगळुम्
पोवान् पोगिन्ऱारैप् पोगामल् कात्तु उन्नैक्
कूवुवान् वन्दु निन्ऱोम् कोदुकलम् उडैय
पावाय् एळुन्दिराय् पाडिप् पऱै कोण्डु
  मावाय् पिळन्दानै मल्लरै माट्टिय
देवादि देवनैच् चेन्ऱु नाम् सेवित्ताल्
  आवा एन्ऱु आराइन्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

हे! कृष्ण की प्यारी सखी, पूर्व दिशा में आकाश में अँधेरा हल्का हो रहा है, बैल जिन्हे थोड़े समय के लिये बाहर चरने के लिये छोड़ें है, वे  इधर उधर घूम रहे हैं । 

स्नान करने के लिये जाती सखियों को रोक कर, हम तेरे द्वार , तुझे साथ ले जाने के लिये,आये हैं , जिससे सभी पर कृपा हो। 

उठ ! हम केसी का मुख फाड़ने वाले, कंस के धनुरोत्सव में मल्लों को मारने वाले, और  जो नित्यसूरियों  के नायक है, उसकी उपासना करेंगे तो ,वह हमारी गल्तियों का ध्यान न कर, हम पर कृपा करेंगे।

नवां  पाशुर:

इस पाशुर में देवि आन्डाल्,  ऐसी ग्वाल सखी को जगाती है, जो यह विश्वास रखती है की, एम्पेरुमान को पाने के लिये एम्पेरुमान ही उपाय है।

वह एम्पेरुमान के साथ सुहावने अनुभव का आनंद लेती है।

यह सखी का विश्वास सीता पिराट्टी जैसा है, जिन्होंने  ने हनुमानजी से कहा था, कि मुझे स्वयं राम ही आकर ले जायेंगे।

तूमणि माडत्तुच् चुऱ्ऱुम् विळक्केरिय
  दूपम् कमळत् तुयिल् अणै मेल् कण् वळरुम्
मामान् मगळे मणिक्कदवम् ताळ् तिऱवाय्
   मामीर् अवळै एळुप्पीरो? उन् मगळ्दान्
ऊमैयो अन्ऱिच् चेविडो अनन्दलो?
  एमप् पेरुन्दुयिल् मन्दिरप्पट्टाळो?
मामायन् मादवन् वैगुन्दन् एन्ऱु एन्ऱु
  नामम् पलवुम् नविन्ऱु एलोर् एम्बावाय्

हे मामा की बेटी, जो इस रत्नों से सुसज्जित, दिव्य दीपकों से जगमगाते, मंद भीनी सुगंध से महकते महल में  आराम से सो रही हो, उठो, इन बड़े रत्नों से सज़े  दरवाजो की कुण्डी खोलो।

हे मामी! अपनी पुत्री को जगाओ ! क्या तुम्हरी पुत्री गूंगी बहरी है, या वह थक गयी है, क्या वह किसी के संरक्षण में है, या देर से सोने के लिये कोई वचन से बंधी है ?

हमने भगवान् नारायण के कई नाम को उच्चारा है , जैसे  मामायन्  (जिनके कृत्य आश्चर्यजनक होते है) , माधवन् (महालक्ष्मी के भर्ता),  वैकुण्ठन् ( श्री वैकुण्ठनाथ)  और कई,. पर वह अब तक उठी नहीं! ।

दसवां पाशुर:

इस पाशुर में देवि आन्डाल् एक ऐसी ग्वाल सखी को जगा रही है, जो कान्हा को प्रिय है, इस सखी को दृढ़ विश्वास है की, भगवान को प्राप्त करने का साधन भगवान् स्वयं ही है ।

इसलिये वह उसीमे दृढ़ता से लगी हुयी है, और उसकी इसी लगन के कारण कान्हा उसे चाहते है ।

नोऱ्ऱुच् चुवर्क्कम् पुगुगिन्ऱ अम्मनाय्
  माऱ्ऱमुम् तारारो वासल् तिऱवादार्
नाऱ्ऱत् तुळाय् मुडि नारायणन् नम्माल्
  पोऱ्ऱप् पऱै तरुम् पुण्णियनाल् पण्डु ओरु नाळ्
कूऱ्ऱत्तिन् वाय् वीळ्न्द कुम्बकरुणनुम्
 तोऱ्ऱुम् उनक्के पेरुम् तुयिल् तान् तन्दानो?
आऱ्ऱ अनन्दल् उडैयाय् अरुम् कलमे
  तेऱ्ऱमाय् वन्दु तिऱ एलोर् एम्बावाय्

हे सखी!  तुमने तो स्वर्ग की अनुभूति प्राप्त करने के लिये तपस्या भी की है ।

द्वार खुला नहीं है, पर फिर भी जो अंदर है वह आवाज़ तो दे सकते है ।

क्या  पहले के समय में   कुम्भकरण ,जो भगवान् के हाथो यमपुरी पहुँच गया ,जिस भगवान् नारायण का हम सदा गुणगान करते है,जो सदा साथ रहकर हमें कैंकर्य प्रदान करते है , वह  तुमसे हारकर अपनी निंदिया तुम्हे दे दी?

हे आराम से निद्रा लेने वाली अनमोलरत्न ,उठो निद्रा त्याग कर किवाड़ खोलो।

ग्यारवां पाशुर:

इस पाशुर में देवि आन्डाल् ऐसी ग्वाल सखी को उठा रही है जिसे, कान्हा की तरह  सारा वृन्दावन चाहता है।

इस पाशुर में वर्णाश्रम धर्म का पालन बतलाया है।

कऱ्ऱुक् कऱवैक् कणन्गळ् पल कऱन्दु
  सेऱ्ऱार् तिऱल् अलियच् चेन्ऱु सेरुच् चेय्युम्
कुऱ्ऱम् ओन्ऱु इल्लाद कोवलर् तम् पोऱ्कोडिये
  पुऱ्ऱरवु अल्गुल् पुनमयिले पोदराय्
सुऱ्ऱत्तुत् तोळिमार् एल्लारुम् वन्दु निन्
  मुऱ्ऱम् पुगुन्दु मुगिल् वण्णन् पेर् पाड
सिऱ्ऱादे पेसादे सेल्वप् पेण्डाट्टि नी
  एऱ्ऱुक्कु उऱन्गुम् पोरुळ् एलोर् एम्बावाय्

हे! स्वर्णलता सी सखी, तुम जनम लेने वाली कुल के  ग्वालें   गायें दुहते हैं , शत्रुओं के गढ़ में जाकर उनका नाश करते हैं| तुम जिसकी कमर बिल में रह रहे सर्प के फन की तरह है और  अपने निवास में मोर की तरह है,अब तो बाहर  आओ|

हम सब तुम्हारी सखियाँ, जो तुम्हारी  रिश्तेदारों की तरह है , सभी तुम्हारे आँगन में खड़े, मन मोहन मेघश्याम वर्ण वाले भगवान् कृष्ण के दिव्य नामों का गुणगान कर  रहें हैं । तुम क्यों अब तक  बिना  हिले डुले, बिना कुछ बोले निद्रा ले रही हो?

द्वादश पाशुर :

इस पाशुर में आण्डाल एक ऐसी सखी को जगा रही है, जिसका भाई कण्णन् (भगवान् कृष्ण) का ख़ास सखा है, जो वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करता।

जब पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा से भगवान का कैंकर्य करते है, तब वर्णाश्रम धर्म के पालन का महत्व नहीं रहता।

पर जब कैंकर्य समाप्त कर लौकिक कार्य में लग जाता है, तब वर्णाश्रम धर्म का पालन महत्वपूर्ण हो जाता है।

कनैत्तु इळन्गऱ्ऱु एरुमै कन्ऱुक्कु इरन्गि
  निनैत्तु मुलै वळिये निन्ऱु पाल् सोर
ननैत्तु इल्लम् सेऱाक्कुम् नऱ्चेल्वन् तन्गाय्
  पनित्तलै वीळ निन् वासल् कडै पऱ्ऱि
सिनत्तिनाल् तेन् इलन्गैक् कोमानैच् चेऱ्ऱ
  मनत्तुक्कु इनियानैप् पाडवुम् नी वाय् तिऱवाय्
इनित्तान् एळुन्दिराय् ईदु एन्न पेर् उऱक्कम्
  अनैत्तु इल्लत्तारुम् अऱिन्दु एलोर् एम्बावाय्

भैंसे जिनके छोटे छोटे बछड़े है, अपने बछड़ों के लिये, उनके बारे में सोंचते हुये अपने थनो में दूध अधिक मात्रा में छोड़ रही है, उनके थनो से बहते दूध से सारा घर आँगन में कीचड़ सा हो गया।

हे ! ऐसे घर में रहने वाली, भगवान् कृष्ण के कैंकर्य धन से धनि ग्वाल की बहन, हम तेरे घर के प्रवेश द्वार पर खड़ी है, ओस की बुँदे हमारे सर पर गिर रही है।

हम भगवान राम,  जिन्होंने  सुन्दर लंका के अधिपति रावण पर क्रोध कर उसे मार दिया, जिनका नाम आनन्ददायक है,उनका  गुण गा रहे हैं ।

हे! सखी ! कुछ बोल नहीं रही हो, कितनी लम्बी निद्रा है तुम्हारी, अब तो उठो,  तिरुवाय्प्पाडि  (गोकुल} के सभी वासी तुम्हारी निद्रा के बारे में जान गये है।

तेरहवां पाशुर:

इस पाशुर में आण्डाल उस सखी को जगा रही है, जो स्वयं एकांत में अपने नेत्रों की सुंदरता का बखान करती है।

नेत्र ज्ञान के परिचायक है, इसलिये ऐसे भी कह सकते है की यह सखी एम्पेरुमान (भगवान्) के बारे पूर्ण ज्ञान रखती है।

भगवान् कृष्ण को अरविन्दलोचनन् (कमल सी अँखियों   वाले) नाम से भी सम्बोधित करते है।

सखी स्वयं की अँखियों  की तुलना भगवान कृष्ण के नेत्र से करती हुयी, विश्वास करती है कि  स्वयं कृष्ण उसे ढूंढते हुए यहाँ आयेंगे।        

पुळ्ळिन् वाय् कीण्डानैप् पोल्ला अरक्कनै
  किळ्ळिक् कळैन्दानैक् कीर्त्तिमै पाडिप्पोय्
पिळ्ळैगळ् एल्लारुम् पावैक्कळम् पुक्कार्
  वेळ्ळि एळुन्दु वियाळम् उऱन्गिऱ्ऱु
पुळ्ळुम् सिलम्बिन काण् पोदरिक्कण्णिनाय्
  कुळ्ळक् कुळिरक् कुडैन्दु नीरडादे
पळ्ळिक् किडत्तियो? पावाय् नी नन्नाळाल्
  कळ्ळम् तविर्न्दु कलन्दु एलोर् एम्बावाय्

व्रत धारिणी सभी सखियाँ, व्रत के लिये निश्चित स्थान पर पहुँच गयी है।

सभी सखियाँ सारस के स्वरुप में आये बकासुर का वध करने वाले भगवान कृष्ण और सभी को कष्ट देने वाले रावण का नाश करने वाले भगवान् श्रीरामजी का गुणानुवाद कर रही है।

आकाश मंडल में शुक्र ग्रह उदित हुये है, और बृहस्पति अस्त हो गये है। पंछी सब विभिन्न दिशाओं में दाना चुगने निकल गये।

हे! बिल्ली और हरिणी जैसे आँखों वाली, प्राकृतिक स्त्रीत्व की धनी!  क्या आज के इस शुभ  दिवस पर भी, हमारे साथ शीतल जल में स्नान न कर, हमारे साथ भगवद गुणानुवाद न कर, अकेली  अपनी शैया पर भ्रम में भगवान् सुख भोगती रहोगी ?

चौदहवाँ पाशुर

इस पाशुर में देवी उस सखी को जगा रही है, जिसने सभी सखियों को इस व्रत अनुष्ठान के लिये जगाने की जिम्मेदारी ली थी, पर स्वयं अभी अपने घर में निद्रा ले रही है।

उन्गळ् पुळैक्कडैत् तोट्टत्तु वावियुळ्
  सेन्गळुनीर् वाय् नेगिळ्न्दु आम्बल् वाय् कूम्बिन काण्
सेन्गल् पोडिक्कूऱै वेण् पल् तवत्तवर्
  तन्गळ् तिरुक्कोयिल् सन्गिडुवान् पोदन्दार्
एन्गळै मुन्नम् एळुप्पुवान् वाय् पेसुम्
  नन्गाय् एळुन्दिराय् नाणादाय् नावुडैयाय्
सन्गोडु चक्करम् एन्दुम् तडक्कैयन्
  पन्गयक् कण्णानैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

ओह ! वह जो सभी प्रकार से पूर्ण है, वह जिसने प्रातः सभी को निद्रा से जगाने की जिम्मेदारी ली है,वह जो निसंकोच है, वह जो सुन्दर बातें बतियाती है।

अपने घर के पिछवाड़े के तालाब में प्रातः की सुचना देते नीलकमल मुरझा गये है, लाल कमल दल खिल रहे है, सन्यासी काषाय वस्त्र धारण किये, जिनके मुख की धवल दन्त पंक्ति दृष्टिगोचर हो रही है, मंदिर की तरफ प्रस्थान कर रहे है, मंदिर के किवाड़ खुलने के प्रतिक में शंखनाद कर रहे है।

उठो ! कमलनयन सा नेत्रों में मंद लालिमा लिये, अपने दोनों दिव्य हस्तों में दिव्य शंख  चक्र धारण किये भगवान् के गुणानुवाद करो ।

पन्द्रहवाँ पाशुर

इस पाशुर में देवी आण्डाल ऐसी सखी को जगा रही है, जो आण्डाल और उनकी सखियों को आते हुये निहारने के लिये उत्सुक है।

एल्ले इळम् किळिये इन्नम् उऱन्गुदियो
  चिल्लेन्ऱु अळियेन्मिन् नन्गैमीर् पोदर्गिन्ऱेन्
वल्लै उन् कट्टुरैगळ् पण्डे उन् वाय् अऱिदुम्
  वल्लीर्गळ् नीन्गळे नानेदान् आयिडुग
ओल्लै नी पोदाय् उनक्कु एन्न वेऱु उडैयै
  एल्लारुम् पोन्दारो पोन्दार् पोन्दु एण्णिक्कोळ्
वल् आनै कोन्ऱानै माऱ्ऱारै माऱ्ऱु अळिक्क
  वल्लानै मायनैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

(इस पाशुर का अर्थ, देवी अपनी सखियों के संग जगाने आयी एक सखी के द्वार पर खड़ी,  बाहर खड़ी सखियों और भीतर की सखी के मध्य वार्तालाप के अनुरूप दिया है।)

 बाहर खड़ी सखी : हे ! युवा तोते जैसी नवयौवना, मधुर वार्तालाप वाली, हम सब तेरे द्वार पर खड़ी हैं, और तुम निद्रा ले रही हो ?

अन्दर की सखी : हे! भगवद प्रेम में परिपूर्ण सखियों, इतने क्रोध में न बोलो, मैं  अभी आ रही हूँ ।

 बाहर  खड़ी सखी : तुम वार्ता में बहुत चतुर हो, हम सब हम आपके अशिष्ट शब्दों के साथ-साथ आपके मुंह को भी  बहुत पहले से जानते हैं।

अन्दर की सखी: तुम सब भी बहुत होशियार हो,  मैं जो  भी करती  हूं वह गलत होने दो, अब मुझे क्या करना है कहो ?

 बाहर खड़ी सखी:  जल्दी उठो , क्या तुम्हे नहीं उठने में कुछ विशेष लाभ है.?

अन्दर की सखी: क्या वो सब आ गए हैं, जिन्हें आना चाहिए था या  कोई और आना बाकी  है ?

बाहर खड़ी सखी: सभी आ गये है , तुम  बाहर  आकर गिन सकती हो।

अन्दर की सखी: बाहर आकर क्या करूँ ?

बाहर  खड़ी सखी: कुवलयापीड़ हाथी को मारनेवाले, अपने शत्रुओं का बल हरने वाले, अद्भुत गतिविधियां करने वाले भगवान् कृष्ण के गुणानुवाद करेंगे।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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तिरुप्पावै – सरल व्यख्या – पाशुर १ से ५

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श्रीः  श्रीमते शठकोपाय  नमः   श्रीमते रामानुजाय  नमः   श्रीमत् वरवरमुनये नमः

तिरुप्पावै

<< तनियन्

पहला पाशुर:

एम्पेरुमान और ग्वालिनों के गुणानुगान का समय :

एम्पेरुमान उपाय और उपेय दोनों ही है, आण्डाळ् ने निश्चय कर लिया कि कृष्णानुभव के लिये, वह मार्गळि नोन्बु (( जो तमिल माह मार्गळि में रखे जाने वाली धार्मिक व्रतानुष्ठान)  (उत्तर भारतीय माह मार्गशीर्ष ) रखेगी।

      मार्गळित् तिङ्गळ् मदि निऱैन्द नन्नाळाल्
       नीराडप् पोदुवीर् पोदुमिनो नेरिळैयीर्
      सीर् मल्गुम् आय्प्पाडिच् चेल्वच् चिऱुमीर्गाळ्
       कूर्वेल् कोडुम् तोळिलन् नन्दगोपन् कुमरन्
      एर् आर्न्द कण्णि यसोदै  इळम् सिन्गम्
      कार् मेनिच् चेन्गण् कदिर् मदियम् पोल् मुगत्तान्
     नारायणने नमक्के पऱै तरुवान्
     पारोर् पुगळप् पडिन्दु एलोर् एम्बावाय्

ओ ! तिरुवाय्प्पाडि (श्री गोकुल) की युवा लड़कियों तुम्हारे पास तो कृष्ण कैंकर्य की संपत्ति है।

ओ ! सुन्दर बड़े आभूषण धारण करने वाली, आज शुभ दिवस है, देखो आज मार्गळि माह की पूर्णिमा है।

श्री कृष्ण (कण्णन्) नन्दगोप के आज्ञाकारी पुत्र है।

नन्दगोप के पास एक भाला है, जिससे वह कन्नन को हानि पहुँचाने वाले को ख़त्म कर देते है।

कन्नन यशोदाप्पिराट्टि के शेर के शावक की तरह है जिनके नेत्र अति सुन्दर है।

कन्नन का वर्ण घने काले बादलों सा है उनकी आँखें थोड़ी लालिमा लिये है, उनका मुख सूर्य चंद्र की भांति है।

वह स्वयं नारायण एम्पेरुमान है, वह हमें अपना कैंकर्य प्रदान कर सेवा का अवसर देंगे।

दूसरा पाशुर:

इस पाशुर में देवी अपनी सखियों को कृष्णानुभव के लिये क्या करना चाहिये क्या नहीं करना चाहिये का  नियम पालन बतला रही है।

देवी यहाँ यह कहती है की एम्पेरुमान (भगवान) की शरणागत हुयी हम सबको हमारे पूर्वाचार्यों के उपदेश ही मार्गदर्शक है।

वैयत्तु वाळ्वीर्गाळ् नामुम् नम् पावैक्कुच्
  चेय्युम् किरिसैगळ् केळीरो पार्कडलुळ्
पैयत् तुयिन्ऱ परमन् अडिपाडि
  नेय्युण्णोम् पालुण्णोम् नाट्काले नीराडि
मै इट्टु एळुदोम् मलर् इट्टु नाम् मुडियोम्
  सेय्यादन सेय्योम् तीक्कुऱळै चेन्ऱु ओदोम्
ऐयमुम् पिच्चैयुम् आन्दनैयुम् कैकाट्टि
  उय्युमाऱेण्णि उगन्दु एलोर् एम्बावाय्

हे सखियों ! हमें इस संसार में रहकर जीने के लिये जीवन मिला है। हम अपने उद्धार के लिये, भगवत प्राप्ति के लिये किये जाने वाले व्रत में हमें क्या करना चाहिये, क्या न करना चाहिये इसे समझते है।

हम सब तिरुप्पाऱ्कडल्  (क्षीर सागर) में शेष शैया पर शयन कर रहे, भगवान के दिव्य श्रीचरणों में प्रार्थना करेंगी।

हम घृत (घी) और दूध का सेवन नहीं करेंगी।

हम सुबह जल्दी उठकर स्नान करेंगी। 

हम अपनी आंखों में काजल नहीं लगायेंगी और न ही हम अपने बालों में फूल लगायेंगी।

हम ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगी जो हमारे बड़ों ने निषिद्ध किया है।

हम किसी की चुगली नहीं करेंगी, हम अपनी सक्षमतानुसार जरूरतमंद को दान करेंगी। 

आण्डाळ् प्रार्थना करती है की, कृष्णानुभव की अनुमति देने वाले सभी बृन्दावन वासियों को लाभ मिले, यहाँ इसका अर्थ सभी को लाभ मिले ऐसा लिया है।

ओन्गि उलगु अळन्द उत्तमन् पेर् पाडि
  नान्गळ् नम् पावैक्कुच् चाऱ्ऱि नीराडिनाल्
तीन्गिन्ऱि नाडु एल्लाम् तिन्गळ् मुम्मारि पेय्दु
  ओन्गु पेरुम् सेन्नेल् ऊडु कयल् उगळ
पून्गुवलैप् पोदिल् पोऱि वण्डु कण् पडुप्प
  तेन्गादे पुक्कु इरुन्दु सीर्त्त मुलै पऱ्ऱि
वान्गक् कुडम् निऱैक्कुम् वळ्ळल् पेरुम् पसुक्कळ्
  नीन्गाद सेल्वम् निऱैन्दु एलोर् एम्बावाय्

हम व्रतधारिणी है इसलिये स्नान कर, हम सब उन भगवान् जो विशाल त्रिविक्रम स्वरुप धारण कर सारे ब्रह्माण्ड को नाप लिये,उनके दिव्य नामो का गुणानुवाद करेंगे।

ऐसा करने से बिना कोई हानि पहुंचाये सारे देश में, माह में तीन बार वर्षा होगी, जिससे धान के खेत लहलहा उठेंगे, उन खेतों में, मछीलियाँ कूदती दिखेंगी, चित्तीदार भृंग नीलकमल पर मंडराएंगे , लोग बेहिचक अपनी गायें के पास जाकर उन्हें दुहेंगे, वह इतना दूध देंगे की, दूध पात्रों से बाहर  बहेगा, देश अमिट ऐश्वयों से भरपूर होगा।

ब्राह्मण , राजा और सतियों के लिये, आण्डाळ् पर्जन्यदेव को माह में तीन बार बरसने की आज्ञा देती है, जिससे बृन्दावन निवासी सम्पन्नता से रहते हुए, कृष्णानुभव करते रहे।

आळि मळैक् कण्णा ओन्ऱु नी कै करवेल्
  आळियुळ् पुक्कु मुगन्दु कोडु आर्त्तु एऱि
ऊळि मुदल्वन् उरुवम् पोल् मेय् कऱुत्तु
   पाळियम् तोळुडैप् पऱ्पनाभन् कैयिल्
आळि पोल् मिन्नि वलम्पुरि पोल् निन्ऱु अदिर्न्दु
  ताळादे सार्न्गम् उदैत्त सरमळैपोल्
वाळ उलगिनिल् पेय्दिडाय् नान्गळुम्
  मार्गळि नीर् आड मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

ओ वरुण देव, आप में समुद्र सी गहराइयाँ है, आप समुद्र से पानी लेकर भारी गर्जना करते हुये,  भगवान, जो समय के स्वामी है, जिनकी नाभि,  कमल के समान है, उनके वर्ण की तरह नीलमेघ वाले बन, अपने में कुछ न छिपाते हुये, भगवान के एक दिव्य हाथ में धारण किये हुये, चक्र की भव्यता से, उनके दूसरे हाथ में धारण किये शंख की तरह, तेजीसे गूंजते हुये, उनके सार्ङ्ग  धनुष से होती बाणों की वर्षा की तरह बरसो।

जिससे इस संसार के लोग कृष्णानुभव करते प्रसन्नता से रहे, और हम व्रत धारिणी भी इस मार्गळि माह में स्नान करें।

इस पाशुर में आण्डाळ् कहती है की नित्य भगवान के नाम स्मरण से हमारे कर्मानुसार किये हुये पाप और पुण्य कर्म धूमिल हो जाते है।

पाप कर्म अग्नि में जलती हुयी रुई की तरह जल कर भस्म हो जाते है, भविष्य में अनजाने में किये दुष्कर्म, कमल के पत्तों पर पानी की तरह,  बिना किसी निशान के मिट जाते है।

विशेष बात यह है की भगवान आप के सारे गत कर्म मिटा देते है, और भविष्य में भी अनजाने में हुये गलत कर्मो को मिटा देते है, पर साथ ही जानकारी रख कर किये हुये दुष्कर्मों के दुष्फल भी देते है।

मायनै मन्नु वड मदुरै मैन्दनैत्
  तूय पेरुनीर् यमुनैत् तुऱैवनै
आयर् कुलत्तिनिल् तोन्ऱुम् अणिविळक्कै
  तायैक् कुडल् विळक्कम् सेय्द दामोदरनै
तूयोमाय् वन्दु नाम् तूमलर्त् तूवित् तोळुदु
  वायिनाल् पाडि मनत्तिनाल् सिन्दिक्क
पोय पिळैयुम् पुगु तरुवान् निन्ऱनवुम्
  तीयिनिल् तूसागुम् सेप्पु एलोर् एम्बावाय्

उत्तर में मथुरा के देदीप्यमान राजा है दामोदर, उनकी अद्भुत लीलायें है, वह गहरी बहती हुयी यमुना किनारे खेलते है,  ग्वालकुल में अवतीर्ण माँ यशोदा को धन्य करने वाले कुलदीपक है।

हम पवित्रता से उन्ही का ध्यान धरते हुये, मुख से उन्ही के नामो का उच्चारण करते हुये, पुष्पों से उनकी आराधना सेवा करेंगे, (याने हम मन बुद्धि कर्म से उनकी आराधना करेंगे) ।

भविष्य में हमसे अनजाने में हुये दुष्कर्मों को भगवान मिटा देते है, ऐसे ही जैसे अग्नि रुई को भस्म कर देती है, इसलिये सदा उन्ही के नामों का गुणगान करते रहो।   

ऐसे आण्डाळ् ने इन पांच पासुरों में भगवान के विभिन्न व्यूहों को सम्बोधित करते हुये प्रार्थना की।

भगवान का पर स्वरुप (श्रीवैकुंठम में भगवान श्रीमन्नारायण) ।

व्यूह स्वरुप (क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान) ।

विभव स्वरुप (भगवान त्रिविक्रम) ।

अंतर्यामी स्वरुप (वरुणदेव में वसित भगवान श्रीमन्नारायण) ।

और अर्चा स्वरुप (मथुरा  में विराजित भगवान)।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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