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आर्ति प्रबंधं – ५३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५२

 

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि अपने अंतिम दिशा को वर्णन करते समय, पेरिय पेरुमाळ के गरुड़ में सवार उन्के (मामुनि को दर्शन देनें) यहाँ आने की बात भी बताया। इससे यह प्रश्न उठता है कि अपने अंतिम दिशा पर पेरिय पेरुमाळ के पधारने तक मामुनि क्या करेँगे ? मामुनि कहतें हैं कि, “उस अंतिम महान क्षण आने केलिए, सारे दुखों और पीड़ाओं की मूल कारण , इस शरीर को गिरना हैं। अत: हे रामानुज ! आप मुझे वह दीजिये जो उचित और आवश्यक है: दर्द और दुःख भरे इस सँसार से मुक्ति दिलाइये।  

 

पासुरम ५३

इदत्ताले तेन्नरंगर सेयगिरदु एन्ड्ररिन्दे

इरुंदालुम तर्काल वेदनैयिन कनत्ताल

पदैत्तु आवो एन्नुम इंद पाव उडंबुडने

पल नोवुं अनुबवित्तु इप्पवत्तु इरुक्कपोमो?

मदत्ताले वलविनैयिन वळी उळन्ड्रु तिरिंद

वलविनैयेन तन्नै उनक्कु आळाक्कि कोंड

इद तायुम तंदैयुमाम ऐतिरासा! एन्नै

इनि कडुग इप्पवत्तिनिन्ड्रुम एडुत्तरुळे

 

शब्दार्थ

इदत्ताले  – “हित” के कारण ( हमेशा अच्छाई केलिए सोचना और करना )

तेन्नरंगर- पेरिय पेरुमाळ (श्री रंगनाथ)

सेयगिरदुएन्ड्ररिन्दे इरुंदालुम – मेरे कर्मों के फल बुगतने दे रहें हैं , पर मुझे पता हैं कि यह भी मेरे हित में हैं।  

तर्काल वेदनैयिन कनत्ताल – उस समय के पीड़ाओं से मैं

पदैत्तु –  दर्द में तड़पा

आवो एन्नुम – दर्द और संकट में ले जाने वाली “हा” तथा “ओह” जैसे आवाज़ों को किया

इरुक्कपोमो?-  क्या मैं जी पाऊँगा ?

इप्पवत्तु –  इस तुच्छ सँसार में ?

इंद पाव उडंबुडने – इस शरीर के संग जो खुद पाप हैं

पल नोवुं अनुबवित्तु – और बहुत सारें दुःख एवं संकट झेलकर ?

मदत्ताले – इस शरीर के संबंध से

वलविनैयिन वळीउळन्ड्रु तिरिंद – मेरे कर्मों से निर्धारित मार्ग में भटकता गया और उसी यात्रा में था

वलविनैयेन तन्नै  – मैं जो सबसे क्रूर पापी हूँ

आळाक्कि कोंड – आप (एम्पेरुमानार) के कृपा से आपका सेवक बना

उनक्कु – आप जो इन जीवात्माओं के आधार हैं

इद तायुम – हित करने वाली माता के रूप में किया , और मेरे

तंदैयुमाम – पिता

ऐतिरासा! – हे एम्पेरुमानारे

इनि – इसके बाद

कडुग – शीग्र

एडुत्तरुळे – सुधारों और मुक्ति दो

एन्नै – मुझे

इप्पवत्तिनिन्ड्रुम – इस सँसार से

 

सरल अनुवाद

मामुनि मुक्ति केलिए श्री रामानुज से प्रार्थना ज़ारी रख्ते हैं। उनको यह ज्ञान होता हैं कि उन्की कर्मों को शीग्र मिटाने के लिए ही दयाळु पेरिय पेरुमाळ उन्को इतने पीड़ा दिए। यह जानते हुए भी कर्मों के फलों के तीव्रता असहनीय है। शरीर के संबंध से ही निरंतर बने इस काँटो से भरे मार्ग से मुक्ति कि प्रार्थना, मामुनि पिता और माता समान श्री रामानुज से करतें हैं।  

 

स्पष्टीकरण

इस विषय में अपना ज्ञान और परिपक्वता को प्रकट करतें हुए मामुनि कहतें हैं , “अरपेरुंतुयरे सेयदिडिनुम (ज्ञान सारम २१) तथा इस्के तुल्य अन्य पासुरमों से समझ में आता हैं कि उन्के “हित” गुण (जिस्से दूसरों के अच्छाई सोचना और उन्के बलाई केलिए कार्य करना) और उन्के आशीर्वाद के कारण ही मैं इतना दुःख और संकट झेल रहा हूँ। अर्थात, कर्म  मिटाने केलिए पीड़ाओं झेलना ही रास्ता है। यह समझते हुए भी पीड़ा अन्यभाव करते समय, अत्यंत दुःख पहुँचता है और इतना असहनीय है की मैं “हा”, “ ओह” चिल्लाता हूँ। जो शरीर इन पीड़ाओं का मूल कारण है मैं उस्से ही ये बेबसी का आवाज़ निकालता हूँ। इसी स्थिति मैं अनादि काल से हूँ , मेरा ऐसे रहना उचित है क्या ? मैं पाप के सिवाय और कुछ नहीं कर रहा हूँ।  इसी विषय को तिरुमंगैयाळवार भी कहतें हैं: “पावमे सेयदु पावि आनेन” (पेरिय तिरुमोळि १.९.९). शरीर के खींच में मग्न मैं उन दिशाओं में जाता हूँ और पाप करता जाता हूँ। लगातार किये जाने वाले इन पापों से मेरे दुःख और पीड़ा भी अधिक होतीं जा रहीं हैं। किंतु हे एम्पेरुमानार! मेरे माता और पिता होने के कारण और आपके “हितं” गुण के कारण आप ने मुझे स्वीकार कर आशीर्वाद भी किया हैं। अत: आपसे विनम्र प्रार्थना हैं कि मेरी निरंतर पीड़ाओं को मिटाकर इस सँसार के बंधनों से विमुक्त करें।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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आर्ति प्रबंधं – ५२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५१

 

उपक्षेप

मामुनि कहतें हैं कि, श्री रामानुज के असीमित कृपा के कारण उन्हें (मामुनि को) अपने व्यर्थ हुए काल कि अफ़सोस करने का मौका मिला।  आगे इस पासुरम में वें ,श्री रामानुज के कृपा की फल के रूप में ,पेरिय पेरुमाळ अपने तरफ पधारने कि अवसर को मनातें हैं। “श्रीमान समारूदपदंगराज:” वचनानुसार पेरिय पेरुमाळ के अपने ओर पधारने कि अवसर कि विवरण देतें हैं।  

पासुरम ५२

कनक गिरि मेल करिय मुगिल पोल

विनतै सिरुवन मेरकोंडु

तनुविडुम पोदु एरार अरंगर एतिरासरक्काग एनपाल

वारा मुन्निर्पर मगिळंदु  

शब्दार्थ

करिय मुगिल पोल –  बादलों के जैसे , जो मँडराते हैं

कनक गिरि मेल –  “मेरु” नामक सुनहरे पर्वत के ऊपर

अरंगर – पेरिय पेरुमाळ

सिरुवन – “वैनतेयन” तथा “पेरिय तिरुवडि” नामों से प्रसिद्द जो हैं उन्के ऊपर आने वाले , जो पुत्र हैं

विनतै  – विनता के

मेरकोंडु –  विनतै सिरुवन वाहन होने के कारण पेरिय पेरुमाळ उनमें सवार होकर आएँगे

तनुविडुम पोदु – जब मेरा शरीर गिरेगा

अरंगर – पेरिय पेरुमाळ जो हैं

आर – भरपूर

येर – सौँदर्य तथा गुणों से

एनपाल वारा – आएँगे मेरे जगह

एतिरासरक्काग  – यतिराज केलिए

(जैसे एक माँ आती हैं)

मुन्निर्पर – वें मेरे सामने खड़े होँगे

मगिळंदु – अत्यधिक ख़ुशी के सात

(पेरिय पेरुमाळ पधारेंगे, अपना दिव्य चेहरा दिखाएँगे, मुस्कुरायेंगे और मुझे भोग्य रूप से अनुभव करेंगे, यह निश्चित है )

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मामुनि अपने अंतिम स्थिति में पेरिय पेरुमाळ के पधारने कि सुन्दर दृश्य की विवरण देकर, ख़ुशी मनातें हैं।  वे कहतें हैं कि पेरुमाळ, “विनतै सिरुवन”, “पेरिय तिरुवडि” एवं नामों से प्रसिद्द अपने वाहन में पधारेँगे। मेरे पास आकर वें मुस्कराहट से अलंकृत अपने सुँदर दिव्य मुख दिखाएँगे। और यह सब वें एम्पेरुमानार केलिए करेँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “काँचनस्प गिरेस् श्रुंघे सगटित्तो यधोयधा” और “मंजुयर पोनमलै मेल एळुंद मामुगिल पोनड्रुलर (पेरिय तिरुमोळि ९.२.८) वाख्यो के जैसे सुनहरे पर्वत “मेरु” के ऊपर काले बरसात के मेघ मँडराते हैं। उसी प्रकार मेरे इस पृथ्वी के बंधनों से विमुक्त होने के समय पर, “पेरुम पव्वम मँडियुन्ड वयिट्र करुमुगिल” (तिरुनेडुंताँडगम २४) में चित्रित किये गए उस रूप में पेरिय पेरुमाळ गरुड़ में सवार पधारेंगे। विनता के पुत्र होने के कारण गरुड़ “पेरिय तिरुवडि” तथा “विनतै सिरुवन” भी कहलातें हैं। मेरे इस शरीर से निकलने के समय, पेरिय पेरुमाळ  एक माता के समान प्रेम के संग आएँगे।। सौंदर्य से भरपूर भगवान्, संतोष ,अपने दिव्य मुख में मुस्कराहट के संग, मेरे यहाँ, श्री रामानुज केलिए आएँगे। यह निश्चित हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४८

उपक्षेप

पिछले पासुरम में, “ऐतिरासन अडि नँणादवरै एँणादु” कहकर वें साँसारिक व्यवहारों में ही ढूबे लोगों के प्रति अपने विरक्ति  प्रकट करतें हैं। किंतु उन्कि हृदय नरम  होने कि कारण उन्से धर्ति वासियों की पीड़ा कि सहन न होती हैं। अपने अत्यंत कृपा के कारण वे उन्को एम्पेरुमानार के चरण कमलों को मोक्ष के मार्ग के रूप में दिखा कर इस मार्ग के विधियों को भी प्रकट करतें हैं।    

 

पासुरम ४९

नंदा नरगत्तु अळुंदामै वेँडिडिल नानिलत्तीर

एन तादैयान एतिरासनै नण्णुम एंरुम अवन

अंदादि तन्नै अनुसंदियुम अवन तोंडरुडन

सिंदाकुलम केड चेरंदिरुम मुत्ति पिन सित्तिकुमे

 

शब्दार्थ:

नानिलत्तीर – हे! इस सँसार के चार प्रकार के वासियों !

वेँडिडिल – अगर चाहें तो

अळुंदामै –  न डूबे

नरगत्तु – साँसारिक सागर नामक यह नरक

नंदा – जो बुगतकर पूरा न हो

(तो मेरी उपदेश सुन)

नण्णुम – जाओ और शरण लो

एन – मेरे

तादैयान – पिता

ऐतिरासनै – एम्पेरुमानार के संग

अनुसंदियुम – जप और ध्यान कर

एँरुम – हमेशा

अवन अंदादि तन्नै – प्रपन्न गायत्रि माने जाने वाली  इरामानुस नूट्रन्दादि ,जो मोक्ष के ओर ले जाने वालि एम्पेरुमानार  के दिव्य नाम से गूँजती हैं।

चेरंदिरुम –  (के) सेवा में रहो

अवन तोंडरुडन  – उन्के भक्त (के प्रति ) जो हैं सर्व श्रेष्ट श्री वैष्णव

सिंदाकुलम – सँसार के अन्य विषयों के संबंध से आने वाले पीड़ाएँ

केड  – नाश होँगे (जिस्के बाद)

मुत्ति – मोक्ष

पिन सित्तिकुमे  – सही वक्त पर प्राप्त होगा

 

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, साँसारिक विषयों से पीड़ित जनों के प्रति तरस खाकर मामुनि मुक्ति का एक सुलभ राह दिखातें हैं।  नरक माने गए इस सँसार के बंधनों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अपने पिता एम्पेरुमानार के दिव्य चरण कमलों को पकड़ने का उपदेश देतें हैं। एम्पेरुमानार के दिव्य नाम को हर पंक्ति में उच्चारण करने वाले “इरामानुस नूट्रन्दादि” को जप और ध्यान करने का सलाह देतें हैं। एम्पेरुमानार के भक्तों के प्रति सेवा करने को भी कहतें हैं। ऐसे करने से श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागति करने के पहले अनुभव किये गए पीड़ाओं से निवारण मिलेगा। और सही समय पर निश्चित मुक्ति प्राप्त होगा।    

 

स्पष्टीकरण

इस सँसार के प्रति अपने विचार प्रकट करतें हुए मामुनि कहतें हैं कि, “हमारें ग्रंतों में  यह सँसार नरक के रूप में चित्रित किया गया हैं। इस विषय में आळ्वारों के पासुरम : (पेरिय तिरुमोळि ११. ८. ९)” नंदा नारगत्तळुंदा वगै”, (पेरिय तिरुमोळि ७. ९. ५) “नरगत्तिडै नणुंगा वगै” और (तिरुवाय्मोळि ८.१.९) “मट्रै नरगम” . सँसार नामक इस नरक के पीड़ाओं और संकटों का कोई भी अंत नहीं होता है। हे! चार प्रकार के धर्ती वासियों!  इस नरक में मग्न न होकर, उस्के कठोरता से विमुक्त होकर बचने के लिए एक उपाय हैं। कृपया मेरे पिता श्री रामानुज के पास जायें और शरणागति करें। प्रपन्न गायत्रि (वह जिसकों प्रपन्न जन हर दिन दोहराना चाहिए) माने वालि “इरामानुस नूट्रन्दादि” में मुक्ति की राह दिखानें वालि एम्पेरुमानार की दिव्य नाम इस ग्रंथ के हर पंक्ति में उपस्थित हैं।  इस दिव्य नामों पर ध्यान करें। इरामानुस नूट्रन्दादि के १०७वे पासुरम के “उन तोंडर्गळुक्के” के अनुसार श्री रामानुज के भक्तों के दिव्य चरण कमलों में सेवा करें। उस क्षण तक के सारें पीड़ाओं से मुक्ति मिलेगी और सही समय पर सँसार से मुक्ति भी मिलेगी।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ४६

उपक्षेप

“ऐतिरासर्काळानोम याम” कहते हुए, संतुष्ट होकर, मामुनि “रामानुज” दिव्य नाम कि महान्ता  को प्रकट करने का इच्छा करतें हैं। मामुनि का मानना है कि पूर्व पासुरम में “ माकान्त नारणनार” और “नारायणन तिरुमाल” से कहें  गए “नारायणा” दिव्य नाम से “रामानुज” दिव्य नाम और भी उत्तम और महत्वपूर्ण हैं।

पासुरम ४७

इरामानुसाय नमवेनृ इरवुम पगलुम सिंदित्तिरा

मानुसरगळ इरुप्पिडम तन्निल इरैपोळुदुमिरा

मानुसर अवरक्कु एल्ला अडिमैयुम सेय्यवेणणि

इरा मानुसर तम्मै मानुसराग एन्कोल एणणुवदे

 

शब्दार्थ

मानुसरगळ – ( हैं) कुछ लोग

इरा  – जो नहीं करतें हैं

इरवुम पगलुम  – दिन और रात

सिंदित्तिरा – (के ओर )द्यान

इरामानुसाय  – श्री रामानुज

नमवेनृ – जो कहे “इरामानुसाय नम:”  ( इस्का अनुवाद है, “ मैं खुद मेरे लिए नहीं हूँ , मैं श्री रामानुज के लिए हूँ )

मानुसर अवरक्कु – ऐसे कुछ लोग ( कूरत्ताळ्वान के जैसे )

इरा – जो नहीं जीतें हैं

इरैपोळुदुम – एक क्षण मात्र भी

इरुप्पिडम तन्निल – आगे बताये गए लोगों के स्थल ( जो दिन रात “इरामानुसाय  नम:” नहीं कहतें हैं)

मानुसर तम्मै  – लोग

इरा – जो नहीं

सेय्यवेणणि  – करतें हैं

एल्ला अडिमैयुम  – सारें कैंकर्यं (कूरत्ताळ्वान के जैसे लोगों के प्रति)

मानुसराग एन्कोल एणणुवदे  – इनको मनुष्य कैसे माने जाए ? यह पशु के समान हैं।  

 

सरल अनुवाद

मामुनि कहतें हैं कि सँसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं।  हम उनको गण १, गण २ , गण ३ के नाम से बुलाएँगे। गण १ के लोग कभी “इरामानुसाय नम:” नहीं कहतें है।  गण २ के लोग ऐसे गुण के हैं कि वें गण १ के संग कभी नहीं रह पाएँगे। इसकी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कूरत्ताळ्वान हैं। आखरी हैं गण ३ के लोग जो न गण २ लोगों कि श्रेयस तथा महान्ता समझते हैं , न ही उनके प्रति नित्य  कैंकर्य में इच्छा रखते हैं। मामुनि को शंका हैं कि गैन ३ के जैसे लोगों को मनुष्य कैसे माना जाए, जब वें पशुओँ के समान हैं।

 

स्पष्टीकरण

मामुनि श्री रामानुज के दिव्य नाम की श्रेयस प्रकट करते हुए कहतें हैं कि , “सारे जनों को निरंतर “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान करना आवश्यक हैं” . तिरुमंगैयाळ्वार के (पेरिय तिरुमोळि १.१.१५) “नळ्ळिरुळ अळवुम पगलुम नान अळैप्पन” के अनुसार यह स्मरण  दिन रात होनी चाहिए। किन्तु अनेक जन हैं जो यह नहीं करतें हैं। हर एक को यह महसूस करना चाहिए कि “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों के संग कभी नहीं रहना हैं। पशुओँ के समान इन जनों के संगत या स्नेह भाव नहीं रखनी चाहिए। कूरत्ताळ्वान कि तरह शास्त्र के अनुसार जीने वालों को कभी भी इन जैसे लोगों के संग नहीं रहना चाहिए। “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों इस दूर रहने वाले गण के लोगों कि महान्ता को समझ कर उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।  ऐसे उत्तम जनों के प्रति निरंतर कैंकर्य करने को तरसना चाहिए। इस भाव को ही तिरुवरंगत्तमुदनार “एत्तोळुंबुम सोल्लाल मनत्ताल करुमत्तिनाल सेयवन सोरविनड्रिये” (इरामानुस नूट्रन्दादि ८० ) में प्रकट करतें हैं। “मानिडवरल्लर एन्रे एन मनत्ते वैत्तेन” के अनुसार, इन उत्तम जनों के प्रति कैंकर्य न करने वाले पशु समान हैं। अंत में मामुनि कहतें हैं कि, “इरामानुसाय नम: दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों के संग न रहने वालों के प्रति जो नित्य कैंकर्य न करें , वें मनुष्य कैसे मानें जा सकतें हैं ?”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४५

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि ,आचार्य के महत्त्व कि श्रेय जो गाते हुए उन्हीं के कृपा को अपनी उन्नति की कारण बतातें हैं।  इसी विषय कि इस पासुरम में और विवरण देतें हैं।

पासुरम ४६

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै तीविनैयोंदम्मै

गुरुवागि वंदु उय्यक्कोंडु – पोरुविल

मदि तान अळित्तरूळुम वाळवंरो नेंजे

एतिरासरक्कु आळानोम याम

 

शब्दार्थ:

नेंजे – हे मेरे ह्रदय !

याम – हम

आळानोम  – सेवक बने

एतिरासरक्कु –  एम्पेरुमानार के

(इसका कारण है )

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै – तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै (मामुनि के आचार्य )

गुरुवागि  – आचार्य के रूप में अवतार किये

वंदु –   और हमारे जगह को पधारें

तीविनैयोंदम्मै – हम, जो क्रूर पापों के घने बादल हैं

उय्यक्कोंडु  –  उन्के कृपा से स्वीकृत किये गए और उन्नति के योग्य माने गए

अळित्तरूळुम  – हमें आशीर्वाद किये , (यह देकर )

मदि तान  – तिरुमंत्र की ज्ञान

पोरुविल – जो अद्वितीय ( शास्त्र की भी किसी और से तुलना की जा सकती हैं, पर इसकी नहीं )

वाळवंरो – (हे मेरे ह्रदय!) यह इसी आचार्य के कृपा से ही हैं न ? ( इन्हीं के कारण हम एम्पेरुमानार के सेवक बने)

 

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि अपने आचार्य के श्रेय की वर्णन करतें हैं।  वें कहतें कि आचार्य के कृपा से पाए गए तिरुमंत्र से ही वें श्रीमन नारायण के सेवक के सेवक बन सकें।  

 

सपष्टीकरण

यहाँ पहले तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै की श्रेयस कि प्रशंसा की गयी हैं। श्रीमन नारायण के सारे भक्त जो श्री वैष्णव और इस साँसारिक लोक के दिव्य जीव याने  भूसुरर कहलातें हैं, इन सारें लोगों से तिरुवाय्मोळि दिव्य प्रबंध और अमृत मानी जातीं हैं। नम्माळ्वार खुद कहतें हैं, “तोंडरक्कमुदु उण्ण चोल मालैगळ सोन्नेन” (तिरुवाय्मोळि ९.४.९). तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै एक ऐसे आचार्य हैं जो तिरुवाय्मोळि को स्वास में लेकर उसी में जीतें थे। उसमें से तरह तरह के मकरंद कि आनंद उठाते हैं, जैसे शब्दों कि सजावट कि मकरंद , अर्थों की मकरंद और उन पासुरमो के मनोभाव कि मकरंद। वे केवल तिरुवाय्मोळि को धर्म मानकर जियें और अन्य शास्त्रों को घास समान मानें। वें नम्माळ्वार के चरण कमलों में शरणागति कर, उन्के प्रति सारें कैंकर्य किये।  तिरुवाय्मोळि के संबंध के कारण वें तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै कहलायें गए। मामुनि अपने ह्रदय को कहतें हैं , “हे मेरे प्रिय ह्रदय! हमें देखो। “अोप्पिल्ला तीविनैयेनै उय्यक्कोंडु (तिरुवाय्मोळि ७.९.४)” के वचनानुसार हम क्रूर पापों के प्रतिनिधि हैं। और तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै आचार्य के रूप में अवतार किये और हमें विमुक्त किये।” इसी को वें अपने उपदेश रत्न मालै में, “तेनार कमल तिरुमामगळ कोळूनन ताने गुरुवागि (उपदेश रत्न मालै ६१) कहतें हैं। आगे मामुनि कहतें हैं , “ वें (तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै) हमारें जगह पधारें और तिरुमंत्र से जनित यह दिव्य ज्ञान दिए। यह अन्य शास्त्रोँ से जनित ज्ञान से अलग हैं। हे मेरे ह्रदय!  उनके इस कृपा के कारण ही हमें एम्पेरुमानार के प्रति कैंकर्यं करने का भाग्य मिला। तिरुमंत्र में यहि उत्तम अर्थ प्रकट किया गया हैं कि, भगवान श्रीमन नारायण के सेवकों के सेवक रहना सर्व श्रेष्ट स्थिति हैं। और इस अर्थ को महसूस करने के कारण ही हम एम्पेरुमानार के नित्य सेवक बनते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४४

उपक्षेप

पिछले पासुरम में, मामुनि सर्वव्यापी श्रीमन नारायण की  “माकांत नारणनार वैगुम वगै” से श्रेय गाए। वें उस पासुरम के “मोहान्तक” से चित्रित किये गए सबसे नीच जीव खुद को मान्ते हैं। यहीं इस पासुरम का सारांश हैं जहाँ वें खुद को,, श्रीमन नारायण को न पहचान पाने के कारण ,केवल अंधकार और अकेलापन महसूस करने वाले लोगों में सबसे नीचे स्थान में रख़ते हैं।  मामुनि का मानना हैं कि उन्हें श्रीमन नारायण की सर्वव्यापित्व की और उनके संग उपस्थित निरंतर संबंध की ज्ञान नहीं हैं। इसी अज्ञान के कारण वें मोहान्तको में से एक बन गये। किन्तु इन विषयों के पश्चात भी मामुनि अपने ह्रदय को याद दिलातें हैं कि आचार्य संबंध के कारण ही उन्नति पाए। यही इस पासुरम का सारांश है।  

पासुरम ४५

नारायणन तिरुमाल नारम नाम एन्नुम मुरै

आरायिल नेंजे अनादि अंरो सीरारुम

आचार्यनाले अंरो नाम उयंददु एन्ड्रु

कूसामल एप्पोलुदुम कूरु

शब्दार्थ

 

नेंजे – हे मेरे ह्रदय

नारायणन तिरुमाल –  जैसे “ तिरुमाले नानुम उनक्कु पळवडियेन” से चित्रित किया गया है, श्रीय:पति श्रीमन नारायणन ही सामूहिक शब्द “नारम” से पहचाने जाने वाले सारे आत्माओं के अधिकारी और स्वामी हैं।  

नारम नाम – हम आत्मायें सब नित्य हैं

आरायिल – अगर यह साबित करना है

एन्नुम मुरै –  (श्रीमन नारायण और जीवात्मा के बीच) वह नित्य संबंध

अनादि अंरो – यह कोई नया संबंध है क्या ? नहीं।  क्या यह सत्य नहीं कि यह नित्य हैं ? ( हाँ यह सत्य है)

(हे मेरे ह्रदय!!!)

सीरारुम – जो हमें यह संबंध दिखाकर उसे दृढ़ बनाके और खुद ज्ञान जैसे कल्याण गुणों से भरे व्यक्ति

आचार्यनाले अंरो – आचार्यन हैं, है न ?

नाम उयंददु एन्ड्रु – हमारी मुक्ति कि कारण वें ही हैं

(हे मेरे ह्रदय)

कूरु – कृपया इस बात को दोहराते रहो

एप्पोलुदुम – सदा

कूसामल – बिना कोई लज्जा के

 

सरल अनुवाद

मामुनि, इस पासुरम में ,श्रीमन नारायण और जीवात्मा के संबंध को दृढ़ करने वाले आचार्यन के महत्त्व प्रस्तुत करतें हैं। और वें कहतें हैं कि इस दृढ़ संबंध के पहले वें अचित वस्तु समान थे।  अत: वे अपने ह्रदय को यह बात प्रकट करने को प्रेरणा देते है कि, उन्कि उन्नति केवल आचार्य कृपा के कारण ही हुयी है।

सपष्टीकरण :

मामुनि कहतें हैं, “हे! मेरे प्रिय ह्रदय! पेरियाळ्वार नें कहाँ था, “तिरुमाले नानुम उनक्कु पळवडियेन (तिरुप्पल्लाण्डु ११)”. वें श्री कि दिव्य पति, श्रीय:पति श्रीमन नारायण हैं।  हम (जीवात्मायें) “नारम” कहलातें हैं। श्रीमन नारायण और जीवात्मा के बीच का संबंध नित्य और निरंतर है। अगर सोचा जाए , तो हम समझेंगें कि यह कोई आधुनिक संबंध नहीं हैं न हैं यह कोई अचानक सृष्टि , क्योंकी यह अनादि और नित्य हैं।  किंतु हमें (मामुनि और उन्के ह्रदय को) यह एहसास न हुआ और इस विषय से अज्ञानी रहें। और अचित वस्तु के समान इस संबंध को समझने कि योग्यता न थी। लेकिन हमारें आचार्य के समझाने पर यह स्थिति बदला और इस संबंध की और उस्की महत्त्व की ज्ञान हुई। आचार्य ज्ञान और अन्य कल्याण गुणों से भरपूर हैं। आचार्यन ही हमारी उन्नति के कारण हैं। (तिरुवाय्मोळि ३.५.१०) के “पेरुमैयुम नाणुम तविर्न्दु पिदट्रूमिन” के प्रकार कृपया इस्को हर जगह प्रकट करें जिस्से सारे लोग यह जान सकें। यह विषय को प्रमेय सारम १० , “इरैयुम उयिरुम” पासुरम में वर्णन किया गया हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४३

उपक्षेप
पिछले पासुरम में मामुनि ने कहा, “इंद उलगिल पोरुंदामै एदुमिल्लै अंद उलगिल पोग आसयिल्लै” . इस्का अर्थ है कि मामुनि को इस साँसारिक लोक में रहने कि दिलचस्पी में कोई कमी नहीं और परमपद पहुँचने में ख़ास दिलचस्पी नहीं हैं। यह प्रस्ताव करने के पश्चात वे सँसार के लोगों को और उन्के क्रियाओं पर ध्यान देते हैं। इन लोगों कि निरंतर पाप इकट्ठा करने का कारण समझतें हैं। यही इस पासुरम का विषय है।

पासुरम ४४
माकान्त नारणनार वैगुम वगै अरिंदोर्क्कु
एकान्तं इल्लै इरुळ इल्लै
मोकांतर इव्विडम येकांतम इरुळ एन्ड्रु भयं अट्र इरुंदु
सेयवारगळ ताम पावत्तिरम

शब्दार्थ :
नारणनार – सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान श्रीमन नारायणन
मकांत – जो श्री महालक्ष्मि के पति हैं
वैगुम वगै – जिस तरह से वें इस प्रपंच के हर चित और अचित जीवों के बाहर और अंदर व्यापित हैं (नारायण दिव्य नाम से यह अर्थ जुडा है )
अरिंदोर्क्कु – जिन्को इसकी ज्ञान है
एकान्तं इल्लै – उन्हें अकेलापन नहीं हैं
इरुळ इल्लै – नहीं ही है अंधकार
मोकांतर – “मोहांत तमसासवृत्त:” वचनानुसार साँसारिक विषयों से अँधा हुए लोगों को कुछ नज़र नहीं आता है और वे सोचते है कि
इव्विडम येकांतम इरुळ एन्ड्रु – यहाँ किसी के न होने के कारण, यह एक सूना जगह है
भयं अट्र इरुंदु – निर्भय रहेंगे और
सेयवारगळ ताम – और अपने अज्ञान के कारण , करते रहेंगें
पावत्तिरम – अधिक से अधिक पाप

सरल अनुवाद
इस पासुरम में मामुनि दो तरह के लोगों में अंतर कि विवरण देतें हैं। पहले गण के लोग सर्वत्र, प्रकाशमान श्रीमन नारायण को देखतें हैं। अत: इस तरह के व्यक्तियों का ऐसा समय ही नहीं होता है जब वे श्रीमन नारायण के सान्निध्य को महसूस नहीं करतें हैं। और परमात्मा के प्रकाशमय होने के कारण उन्को अंधकार भी दिखाई नहीं देतीं है। इसके विरुद्ध कई ऐसे जन हैं, जिन्को यह दृश्य नहीं हैं और जिन्हें लगता है कि वे अंधकार में अकेले हैं। इससे वे अनेक पाप करतें हैं जो ही उन्की अपकर्ष कि कारण बन जाति हैं।

स्पष्टीकरण
नम्माळ्वार तिरुवाय्मोळि १. १०.८ पासुरम में “सेल्व नारणन” दिव्य नाम का उपयोग किये। वें पेरिय पिराट्टि श्री महालक्ष्मि के दिव्य पति हैं। वे हर चित और अचित जीव के अंदर और बाहर व्यापित हैं। “नारायणन” दिव्य नाम का यहीं सारार्थ हैं। श्रीमन नारायण के सर्वव्यापी होने के इस कल्याण गुण कि ज्ञान कुछ व्यक्तियों को हैं। “नारायण परंज्योति:” (नारायण सूक्तं ४ ), “पगल कंडेन नारणनै कंडेन” (इरँडाम तिरुवन्दादि ८१), “अवन एन्नुळ तान अर वीट्रिरुंदान” (तिरुवाय्मोळि ८.७.३) जैसे पंक्तियों के अनुसार, इन व्यक्तियों को प्रकाशमान श्रीमन नारायण सर्वत्र दृश्य हैं। वें कभी अकेलापन और अंधकार महसूस नहीं करतें हैं। वे अपने जैसे मित्रों के समूह में ही रहते हैं। हमेशा अच्छे संगत में रहने के कारण वे निर्भय भी रहते हैं। “हृति नारायणं पश्यनाप्य कच्छत्रहस्ता यस्वतारधौछापि गोविन्दं तम उपास्महे” (विष्णु पुराणम) के अनुसार यह लोग कभी भी कहीं भी अंधकार नहीं देखतें हैं।
आगे प्रस्ताव किये गए व्यक्तियों के विपर्यय में “मोहान्तक” माने जाने लोग हैं। “मोहांत तमसा वृत्त:” के अनुसार इन लोगों के कथित अंधकार के कारण, इनमें आगे आने वाले विषयों को देखने कि सामर्थ्य नहीं हैं। इसको यतिराज विंशति के १२वे श्लोक में “अंतर बहिस सकल वस्तुषु संतमीसम अंद: पुरःस्थितमीवहमवीक्षमाण:” से विविरित किया गया है। अर्थात, श्रीमन नारायण, अनादि काल से निरंतर प्रकाशमान होते हुए, हर एक चित और अचित जीव के बाहर और अंदर एक समान व्यापित हैं। जो परमात्मा को अपने आन्तरिक आँखों से नहीं देखते, उनका अनुभव विपरीत होता है। उन्को किसी भी जगह में उपस्थित विषयों और लोगों को छोड़ केवल अंधकार ही दिखतीं है। इससे निर्भय होकर, वें “तस्यान्ति केत्वं व्रजिनं करोषि” के अनुसार अनेक पाप करतें हैं। मामुनि को एहसास होता हैं कि श्रीमन नारायण को न देखने वालोँ कि यही स्थिति है।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४१

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि कहतें हैं : “इरंगाय एतिरासा” . इससे ये माना जा सकता है कि मामुनि अपनि निराशा प्रकट कर रहें हैं।  परमपद पहुँचने कि इच्छा करने वाले को दो विषयाँ आवश्यक हैं १) वहाँ जाने कि इच्छा २) (इस भूमि पर) यहाँ रहने से द्वेष। इसी का सारांश है (श्री वचनभूषणम ४५८) “प्राप्य भूमियिल प्रावण्यमुम त्याज्य भूमियिल जिहासयुम” सूत्र। मामुनि को निराशा  हैं कि यह दोनों उनमें नहीं है। अत्यंत उदास होकर मामुनि सोच में पड़ते हैं कि इन दोनों गुण न होते हुए श्री रामानुज उन्को (मामुनि को) परमपद प्राप्ति कैसे दिलाएँगे।

पासुरम ४३

इन्द उलगिल पोरूंदामै  ऐदुमिल्लै

अंद उलगिल पोग आसैयिल्लै

इंद नमक्कु एप्पडियो  तान तरुवार एँदै  एतिरासर

ओप्पिल तिरुनाडु उगंदु

 

शब्दार्थ

ऐदुमिल्लै  – (मुझे) एक अणु  भी नहीं है

पोरूंदामै – दिलचस्पी कि अनुपस्तिथि  जो मुझे निकाल सकती है

इन्द उलगिल – इस क्रूर लोक (से) जिसको फेंकना है

आसैयिल्लै  – (और मुझे ) कोई दिलचस्पि नहीं

पोग – जाने में

अंद उलगिल – परमपद को , जो परम लक्ष्य है

इंद नमक्कु – ऐसे व्यक्ति (मैं ) के प्रति, जिसके पास यह दो आवश्यक गुण नहीं हैं।  

एप्पडियो तान  – किस उपाय से 

एँदै – मेरे पिताश्री

एतिरासर – एम्पेरुमानार (को)

तरुवार  – देंगे

उगंदु – संतोष से

तिरुनाडु – परमपदम

ओप्पिल – जो अद्वितीय है

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मामुनि कहतें हैं कि, परमपदम पहुँचने कि आवश्यक दो गुण उन्के पास नहीं हैं। वें कहतें हैं कि उनमें इस साँसारिक लोक के प्रति एक अणुमात्र द्वेष नहीं है और न ही परमपदम पहुँचने के लिए विशेश दिलचस्पी। वे सोचतें हैं कि ऐसे स्तिथि में उन्के पिता श्री रामानुज कैसे ख़ुशी से परमपदम कि प्राप्ति देँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “(तिरुवाय्मोळि ४.९.७)”कोडुवुलगम काट्टेल” के अनुसार कठोर और हटाने लायक इस सँसार में मेरी दिलचस्पी की कोई कमी नहीं हैं।  उसी समय (पेरिय तिरुमोळि ६.३.८)”वान उलगम तेळिंदे एन्ड्रैदुवदु” के अनुसार पहुँचने केलिए तरसने लायक जगह जो परमपदम हैं, वहाँ पहुँचने केलिए दिलचस्पी भी नहीं हैं। ऐसे स्तिथि में इस अद्वितीय परमपदम तक मेरे पिताश्री एम्पेरुमानार आनन्द से कैसे ले जाएँगे?

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४१

उपक्षेप

श्री रामानुज सोचने लगे, “हमारी  कितनि सौभाग्य है जो मामुनि जैसे “आकिंचन्यम” (उपहार के रूप में देने केलिए कुछ न हो) और “अनन्यगतित्वं” (कोई भी किस्म कि आश्रय न होना ) में अटल व्यक्ति को हम पाये। अति प्रसन्नता के सात मामुनि को आशीर्वाद के रूप में दिए जाने वाले वस्तुओँ कि सूची बनातें हैं।  मधुर और प्यारे गुणों से भरें मामुनि को श्री रामानुज आशीर्वाद कर रहें थे। उस समय, मामुनि “उंणिलाविय” (तिरुवाय्मोळी ७.१) पदिगम (दशक- दस पासूरम की समूह) कि अर्थ कि विवरण करके अपने “अनन्यगतित्वं” को और प्रकट किये। इस पदिगम में इन्द्रियों की विनाशकार शक्ति की अत्यंत विवरण की गयी है। मामुनि से यह सुनने के पश्चात श्री रामानुज उस स्तिथि पर पहुँच गए जहाँ उनको लगा कि मामुनि कि तुरंत रक्षा किये बिना वें जी नहीं सकतें।  

पासुरम ४२

आईंपुलंगळ मेलिटु अड़रूमपोलुदु अडियेन

उन पदंगळ तम्मै निनैत्तु ओलमिट्टाल

पिन्बु अवैताम एन्नै अड़रामल इरंगाय ऐतिरासा

उन्नै अल्लाल एनक्कु उंडो ?

शब्दार्थ

आईंपुलंगळ – (मेरे) पाँच इन्द्रियाँ

मेलिटु – मेरे ऊपर इतना दबाव डाल रहें है कि

अड़रूमपोलुदु – हर एक , मेरे ऊपर आक्रमण करके अपने भूख बुझाने को आदेश देता है

अडियेन – (उस समय) मैं , जो आपका निरंतर सेवक हूँ , मेरे स्वामि श्री रामानुज

निनैत्तु – के ऊपर ध्यान करूँगा ( जैसे गजेंद्र ने एम्पेरुमान के बारे में सोचा।  मगरमच्छ ने हाथी को पैर पकड़ कर नदी में खींचा , हाथी खुद को किनारे के ओर खींचा। ये १००० देव सालों तक चला ( एक मनुष्य साल , एक देव दिन के समान है ) इतने लम्बे समय के पश्चात , मगरमच्छ की शक्ति बड़ा और हाथी किनारे पर पकड़ खोने लगा।  हाथी को पानी से धरती पर शक्ति अधिक होने पर भी, इस जंग में ऊँचा हाथ होने के कारण मगरमच्छ हाथी को और पानी में खींचता गया। केवल हाथी की सूंड ही पानी के बाहर था। इस समय पर ही हाथी गजेंद्र को एहसास हुआ कि विरोधियों का विनाश करके जनरक्षन करने वाले श्रीमन नारायण ही उसकी रक्षा कर सकेंगें। गजेंद्र ने  “नारायणावो” करके सहाय कि पुकार किया और श्रीमन नारायण को तुरंत रक्षा करने कि प्रार्थना किया। इसी प्रकार मामुनि भी अपनी बेबसी की एहसास होते हुए, एकमात्र सहारा ,श्री रामानुज को पुकारतेँ हैं। )

उन – आपके

पदंगळ तम्मै  – चरण कमलों को

ओलमिट्टाल – (आपके चरण कमलों पर ध्यान करते हुए) अगर मैं आपको पुकारूँ, “रामानुजा”

एतिरासा – हे ! यतियों के नेता

पिन्बु – इसके पश्चात (आपके चरण कमलों पर ध्यान करते हुये आपके दिव्य नाम को पुकारने के पश्चात )

इरंगाय – कृपया आशीर्वाद करें

एन्नै – मुझें

अवैतम – कि, वे इन्द्रियाँ जो अधिक्तर हानिकारक हैं

अड़रामल – मेरे ऊपर न आक्रमण करें

उंडो ? – है कोई अन्य रक्षक? (आप ही एकमात्र सहारा हैं )

एनक्कु – मेरे लिए

उन्नै अल्लाल ? – आपसे अन्य कोई ?

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि कहतें हैं कि श्री रामानुज ही उन्के एकमात्र सहारा और रक्षक हैं।  अनेकों कठिनाईयों से पीड़ित सारे जनों के वे ही रक्षक हैं। अपने बेबसी कि एहसास होने पर श्रीमन नारायण को ही अपने रक्षक मानने वाले हाथी गजेंद्र से अपनी तुलना कर, मामुनि अपनी “अनन्यगतित्वं” कि स्थापना करतें हैं। इसी प्रकार मामुनि, श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों पर ध्यान करते हुए उनके दिव्य नाम को पुकारे , जो “आत्म-रक्षा” कि पुकार है।   

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं कि उन्के पाँचों इन्द्रियाँ उन्पर आक्रमण करके सारें दिशाओँ के ओर खींचते हैं। (पेरिय तिरुमोळि ७.७.९) “कोवै आइवर एन मेय कुड़ियेरि” पासुरम के अनुसार, हर एक इन्द्रिय मुझे सेवक बनाकर अपनी इच्छा पूर्ति केलिए उपयोग करती है।  हे मेरे स्वामि श्रीरामनुज! उस समय मैं,आपका नित्यदास, सहारे के लिए आपका दिव्य नाम पुकारा। यह, मगरमच्छ के पकड़ में फसे, पानी में खीचें गए बेसहारे हाथी, गजेन्द्राळवान के श्रीमन नारायण के दिव्य नाम के चिल्लाहट के जैसे है। पानी मगरमच्छ कि स्थान होने कि कारण, वहाँ मगरमच्छ कि शक्ति बढ़ती है।  यह “ग्राहम आकर्षते जले” वचन से स्पष्ट है। पानी में खींचे जाने पर, गजेंद्र ने ,(विष्णु धर्मं) “मनसा चिन्तयन हरिम” वचनानुसार श्रीमन नारायण पर ध्यान किया। हाथी ने “नारायणावो” पुकारा और मैंने सभी को सारे हानियों से रक्षा करने वाले आपको पुकारा।

मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आत्मा केलिए अत्यंत हानिकारक, मेरे पाँच इन्द्रियों के निमंत्रण से मुझे रक्षा करें।  हे साधुओँ के नेता ! आपसे अन्य कोई मेरी रक्षा कर सकता है क्या ? अत: आपको ही मेरि रक्षा करना है। “उन पदंगळ तम्मै निनैत्तु ओलमिट्ठाल” वचन का अर्थ ऐसे समझना चाहिए: श्री रामानुज को चरण कमलों को एकमात्र सहारा मानकर, उन पर ध्यान करते हुए , मामुनि श्री रामानुज के दिव्य तिरुनामम को जोर से पुकारे।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४०

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आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३९

पासुरम ४०

अवत्ते पोळुदाई अडियेन कळित्तु

इप्पवत्ते इरुक्कुम अदु पणबो ?

तिवत्ते यान सेरुम वगै अरुळाय सीरार ऐतिरासा

पोरुम इनि इव्वुडंबै पोक्कु

शब्दार्थ

अडियेन  – मैं, श्री रामानुज के नित्य दास

अवत्ते  कळित्तु  –  ऐसे ही व्यर्थ  किए

पोळुदाई  – वे सुनहरे पल जो श्री रामानुज के चरण कमलों में कैंकर्य करके बिताए जा सकते थे

पणबो? – (हे श्री रामानुज!) क्या आपके गुणों और कीर्ति के लायक होगा?

इरुक्कुम अदु  –  अगर मैं रहूँ

इप्पवत्ते – यह सँसार (जो आपके प्रति कैंकर्य केलिए) शत्रु हैं

सीरार ऐतिरासा  – हे यतिराजा ! शुभ गुणों से भरें

पोक्कु – नाश कीजिये

इनि इव्वुडंबै  – यह शरीर और

अरुळाय  – कृपया आशीर्वाद करें

यान – मुझें

सेरुम वगै – पहुँचे की मार्ग के संग

तिवत्ते  – परमपदं

पोरुम  – “सँसार” नामक इस कारागार में रहना काफि है

सरल अनुवाद

अपने स्वामि श्री रामानुज के कैंकर्य में न लगाए हुए व्यर्थ किये गए समय के लिए मामुनि अपना शोक प्रकट करतें हैं।  उन्हें ऐसा लगता है कि वे इस शरीर में इस साँसारिक लोक में लम्बे समय से हैं और श्री रामानुज से प्रार्थना करतें हैं कि वे इस शरीर को काटकर फैंक क्यों नहीं देते? मामुनि के मानना हैं कि इससे वे परमपद पहुँच पाएँगे, जिसके केलिए वे सदा तरस्ते हैं, और वहाँ श्री रामानुज के प्रति नित्य कैंकर्य कर पायेँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि प्रस्ताव करतें करतें हैं, “ हे श्री रामानुज! आपकी सेवा लिए ही मेरा जन्म हुआ है।  किन्तु जो सुनहरे पल आपके प्रति कैंकर्य में बीते जा सकते थे, वे मैंने व्यर्थ किये।  मैं अभी भी इस सँसार में डूबा हुआ हूँ।  परन्तु इस सँसार में मेरा नित्य वास आपके कृपा के विरुद्ध है। अत: आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे परमपद की मार्ग दिखा कर आशीर्वाद करें, जहाँ आपके प्रति कैंकर्य कि मौकाये, अनेकों हैं। “परंदामम एन्नुम तिवं” से वर्णित इस जगह पहुँचने केलिए मैं अत्यंत बेचैन हूँ।  हे रामानुज, यतियों के नेता, शुभ गुणों से भरपूर आपसे प्रार्थना हैं कि आप इस सँसार में मेरा रहना रोखे।  अज्ञान का मूल तथा आपके प्रति नित्य  कैंकर्य का हानि जो यह शरीर, इस आत्मा के संग इस लोक में जीवित है, इसको नाश करने केलिए आपसे प्रार्थना है। आपके प्रति नित्य कैंकर्य ही सर्व श्रेष्ट लक्ष्य है और आपसे विनती है की आप मुझे वह आशीर्वाद करें।” इस पासुरम को इस प्रकार भी देखा जा सकता है : “अडियेन इप्पवत्ते इरुक्कुम अदु पणबो ?” इसका अर्थ यह होगा की मामुनि श्री रामानुज से पूछ रहे है की, क्या मेरा इस सँसार में रहना स्वाभाविक  है ?

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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