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तिरुप्पावै – सरल व्यख्या – पाशुर ६ – १५

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।।श्रीः श्रीमते शठःकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः।।

तिरुप्पावै

<< पाशुर १ से ५

अब पाशुर छः – से पन्द्रह तक, आण्डाळ् नाच्चियार् उन १० ग्वालिनों को जगाती है, जो गोकुल की सारी ५००००० ग्वालिनों का प्रतिनिधित्व करती हुयी बतलाया है।

इन पाशुरों को कुछ इस व्यवस्थित ढंग व  ऐसे भावों से युक्त किया है कि, ऐसे प्रतीत होता है, देवी उन दस भागवतों को जगा रही है, जो वेद में विशेषज्ञ हैं।

छठवां पाशुर:

इस पाशुर में देवी आण्डाळ् कृष्णानुभव में रत नव गोपिका को जगाती है। यह गोपिका स्व-कृष्णानुभव से संतुष्ट है। यह भगवद अनुभव में निष्ठा का प्रथम पड़ाव है। ऐसे ही कोई अन्य भागवतों (भक्तो) के संग भगवद अनुभव करना चाहे तो वह चरमपर्व निष्ठा होती है।

पुळ्ळुम् सिलम्बिन काण् पुळ् अरैयन् कोयिल्
  वेळ्ळै विळिसन्गिन् पेररवम् केट्टिलैयो
पिळ्ळाय् एळुन्दिराय् पेय् मुलै नन्जु उण्डु
  कळ्ळच् चगडम् कलक्कु अळियक् काल् ओच्चि
वेळ्ळत्तु अरविल् तुयिल् अमर्न्द वित्तिनै
  उळ्ळ्ळत्तुक् कोण्डु मुनिवर्गळुम् योगिगळुम्
मेळ्ळ एळुन्दु अरि एन्ऱ पेर् अरवम्
  उळ्ळम् पुगुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्

इस पाशुर में आण्डाळ् सखी से कह रही है, क्या तुझे पक्षियों की चहचहाहट सुनाई नहीं दे रही है? पक्षीराज गरुड़ के नाथ ,भगवान् (कण्णन्)  के मदिर से आ रही सफ़ेद शंखों के शंखनाद की ध्वनि नहीं सुनायी दे रही है?

हे छोटी सखी (नयी सखी) उठ, भगवान कृष्ण ने माँ बनकर आयी राक्षसी पूतना के स्तनों से लगे विष के साथ साथ उसके प्राण भी पी लिये।

अपने चरण उठाकर धोके से आये दैत्य शकटासुर को भी खंडित कर दिये, वही क्षीरसागर में शेष शैया पर शयन कर रहे है।

वह इस जगत के कारक है।

मुनि जो सदा इनके ध्यान में रहते है, योगी लोग जो प्रातः इनकी सेवा कर इनके ध्यान में रहते है।

वह अपने मन में बसे भगवान को कोई तकलीफ दिये बगैर, प्रातः उठकर हरी हरी नाम का उच्चारण कर रहे, उनके यह शब्द हमारे मन में उतर, हमें सुख प्रदान कर रहे है ।

सातवां पाशुर :

इस पाशुर में आण्डाळ् दूसरी ग्वाल सखी को उठा रही  है।

यह सखी कृष्णानुभव में प्रवीण है, पर आण्डाळ् और उसकी सखियों की आवाज़ सुनने घर के अंदर बैठी है।

कीसु कीसु एन्ऱु एन्गुम् आनैच्चात्तन् कलन्दु
  पेसिन पेच्चरवम् केट्टिलैयो पेय्प्पेण्णे
कासुम् पिरप्पुम् कलकलप्पक् कै पेर्त्तु
  वास नऱुम् कुळल् आय्च्चियर् मत्तिनाल्
ओसै पडुत्त तयिर् अरवम् केट्टिलैयो
  नायगप् पेण्पिळ्ळाय् नारायणन् मूर्ति 
केसवनैप् पाडवुम् नी केट्टे किडत्तियो
  तेसम् उडैयाय् तिऱ एलोर् एम्बावाय्

हे अबोध सखी (कृष्ण भक्ति से सरोवर होते हुये भी उसका भान न करने वाली), क्या तुझे पक्षियों की  चहचहाहट “किसु किसु”  चारों ओर  सुनायी नहीं दे रही?

क्या तुम ग्वालिनों द्वारा दही मंथने की आवाज़ नहीं सुन रही? ग्वालिनों जिनके सुन्दर केशों से भीनी भीनी महक आ रही है, जिनके दही मंथते समय हिल रहे, उनके स्वर्ण और चाँदी के आभूषणों के बजने की मधुर आवाज आ रही है|

हे! ग्वालिनों की नायिका, हम नारायण के अवतार कृष्ण के गीत गा रहे है, क्या तुम ऐसे ही सोये रहेगी?

उठ दरवाजा खोल।

आठवाँ पाशुर :

इस पाशुर में देवी ऐसी सखी को जगा रही है, जिसे कण्णन् (भगवान कृष्ण) बहुत पसंद करते है, और सखी, इसी बात से बहुत गुमान में रहती है।

कीळ् वानम् वेळ्ळेन्ऱु एरुमै सिऱु वीडु
  मेय्वान् परन्दन काण् मिक्कुळ्ळ पिळ्ळैगळुम्
पोवान् पोगिन्ऱारैप् पोगामल् कात्तु उन्नैक्
कूवुवान् वन्दु निन्ऱोम् कोदुकलम् उडैय
पावाय् एळुन्दिराय् पाडिप् पऱै कोण्डु
  मावाय् पिळन्दानै मल्लरै माट्टिय
देवादि देवनैच् चेन्ऱु नाम् सेवित्ताल्
  आवा एन्ऱु आराइन्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

हे! कृष्ण की प्यारी सखी, पूर्व दिशा में आकाश में अँधेरा हल्का हो रहा है, बैल जिन्हे थोड़े समय के लिये बाहर चरने के लिये छोड़ें है, वे  इधर उधर घूम रहे हैं । 

स्नान करने के लिये जाती सखियों को रोक कर, हम तेरे द्वार , तुझे साथ ले जाने के लिये,आये हैं , जिससे सभी पर कृपा हो। 

उठ ! हम केसी का मुख फाड़ने वाले, कंस के धनुरोत्सव में मल्लों को मारने वाले, और  जो नित्यसूरियों  के नायक है, उसकी उपासना करेंगे तो ,वह हमारी गल्तियों का ध्यान न कर, हम पर कृपा करेंगे।

नवां  पाशुर:

इस पाशुर में देवि आन्डाल्,  ऐसी ग्वाल सखी को जगाती है, जो यह विश्वास रखती है की, एम्पेरुमान को पाने के लिये एम्पेरुमान ही उपाय है।

वह एम्पेरुमान के साथ सुहावने अनुभव का आनंद लेती है।

यह सखी का विश्वास सीता पिराट्टी जैसा है, जिन्होंने  ने हनुमानजी से कहा था, कि मुझे स्वयं राम ही आकर ले जायेंगे।

तूमणि माडत्तुच् चुऱ्ऱुम् विळक्केरिय
  दूपम् कमळत् तुयिल् अणै मेल् कण् वळरुम्
मामान् मगळे मणिक्कदवम् ताळ् तिऱवाय्
   मामीर् अवळै एळुप्पीरो? उन् मगळ्दान्
ऊमैयो अन्ऱिच् चेविडो अनन्दलो?
  एमप् पेरुन्दुयिल् मन्दिरप्पट्टाळो?
मामायन् मादवन् वैगुन्दन् एन्ऱु एन्ऱु
  नामम् पलवुम् नविन्ऱु एलोर् एम्बावाय्

हे मामा की बेटी, जो इस रत्नों से सुसज्जित, दिव्य दीपकों से जगमगाते, मंद भीनी सुगंध से महकते महल में  आराम से सो रही हो, उठो, इन बड़े रत्नों से सज़े  दरवाजो की कुण्डी खोलो।

हे मामी! अपनी पुत्री को जगाओ ! क्या तुम्हरी पुत्री गूंगी बहरी है, या वह थक गयी है, क्या वह किसी के संरक्षण में है, या देर से सोने के लिये कोई वचन से बंधी है ?

हमने भगवान् नारायण के कई नाम को उच्चारा है , जैसे  मामायन्  (जिनके कृत्य आश्चर्यजनक होते है) , माधवन् (महालक्ष्मी के भर्ता),  वैकुण्ठन् ( श्री वैकुण्ठनाथ)  और कई,. पर वह अब तक उठी नहीं! ।

दसवां पाशुर:

इस पाशुर में देवि आन्डाल् एक ऐसी ग्वाल सखी को जगा रही है, जो कान्हा को प्रिय है, इस सखी को दृढ़ विश्वास है की, भगवान को प्राप्त करने का साधन भगवान् स्वयं ही है ।

इसलिये वह उसीमे दृढ़ता से लगी हुयी है, और उसकी इसी लगन के कारण कान्हा उसे चाहते है ।

नोऱ्ऱुच् चुवर्क्कम् पुगुगिन्ऱ अम्मनाय्
  माऱ्ऱमुम् तारारो वासल् तिऱवादार्
नाऱ्ऱत् तुळाय् मुडि नारायणन् नम्माल्
  पोऱ्ऱप् पऱै तरुम् पुण्णियनाल् पण्डु ओरु नाळ्
कूऱ्ऱत्तिन् वाय् वीळ्न्द कुम्बकरुणनुम्
 तोऱ्ऱुम् उनक्के पेरुम् तुयिल् तान् तन्दानो?
आऱ्ऱ अनन्दल् उडैयाय् अरुम् कलमे
  तेऱ्ऱमाय् वन्दु तिऱ एलोर् एम्बावाय्

हे सखी!  तुमने तो स्वर्ग की अनुभूति प्राप्त करने के लिये तपस्या भी की है ।

द्वार खुला नहीं है, पर फिर भी जो अंदर है वह आवाज़ तो दे सकते है ।

क्या  पहले के समय में   कुम्भकरण ,जो भगवान् के हाथो यमपुरी पहुँच गया ,जिस भगवान् नारायण का हम सदा गुणगान करते है,जो सदा साथ रहकर हमें कैंकर्य प्रदान करते है , वह  तुमसे हारकर अपनी निंदिया तुम्हे दे दी?

हे आराम से निद्रा लेने वाली अनमोलरत्न ,उठो निद्रा त्याग कर किवाड़ खोलो।

ग्यारवां पाशुर:

इस पाशुर में देवि आन्डाल् ऐसी ग्वाल सखी को उठा रही है जिसे, कान्हा की तरह  सारा वृन्दावन चाहता है।

इस पाशुर में वर्णाश्रम धर्म का पालन बतलाया है।

कऱ्ऱुक् कऱवैक् कणन्गळ् पल कऱन्दु
  सेऱ्ऱार् तिऱल् अलियच् चेन्ऱु सेरुच् चेय्युम्
कुऱ्ऱम् ओन्ऱु इल्लाद कोवलर् तम् पोऱ्कोडिये
  पुऱ्ऱरवु अल्गुल् पुनमयिले पोदराय्
सुऱ्ऱत्तुत् तोळिमार् एल्लारुम् वन्दु निन्
  मुऱ्ऱम् पुगुन्दु मुगिल् वण्णन् पेर् पाड
सिऱ्ऱादे पेसादे सेल्वप् पेण्डाट्टि नी
  एऱ्ऱुक्कु उऱन्गुम् पोरुळ् एलोर् एम्बावाय्

हे! स्वर्णलता सी सखी, तुम जनम लेने वाली कुल के  ग्वालें   गायें दुहते हैं , शत्रुओं के गढ़ में जाकर उनका नाश करते हैं| तुम जिसकी कमर बिल में रह रहे सर्प के फन की तरह है और  अपने निवास में मोर की तरह है,अब तो बाहर  आओ|

हम सब तुम्हारी सखियाँ, जो तुम्हारी  रिश्तेदारों की तरह है , सभी तुम्हारे आँगन में खड़े, मन मोहन मेघश्याम वर्ण वाले भगवान् कृष्ण के दिव्य नामों का गुणगान कर  रहें हैं । तुम क्यों अब तक  बिना  हिले डुले, बिना कुछ बोले निद्रा ले रही हो?

द्वादश पाशुर :

इस पाशुर में आण्डाल एक ऐसी सखी को जगा रही है, जिसका भाई कण्णन् (भगवान् कृष्ण) का ख़ास सखा है, जो वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करता।

जब पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा से भगवान का कैंकर्य करते है, तब वर्णाश्रम धर्म के पालन का महत्व नहीं रहता।

पर जब कैंकर्य समाप्त कर लौकिक कार्य में लग जाता है, तब वर्णाश्रम धर्म का पालन महत्वपूर्ण हो जाता है।

कनैत्तु इळन्गऱ्ऱु एरुमै कन्ऱुक्कु इरन्गि
  निनैत्तु मुलै वळिये निन्ऱु पाल् सोर
ननैत्तु इल्लम् सेऱाक्कुम् नऱ्चेल्वन् तन्गाय्
  पनित्तलै वीळ निन् वासल् कडै पऱ्ऱि
सिनत्तिनाल् तेन् इलन्गैक् कोमानैच् चेऱ्ऱ
  मनत्तुक्कु इनियानैप् पाडवुम् नी वाय् तिऱवाय्
इनित्तान् एळुन्दिराय् ईदु एन्न पेर् उऱक्कम्
  अनैत्तु इल्लत्तारुम् अऱिन्दु एलोर् एम्बावाय्

भैंसे जिनके छोटे छोटे बछड़े है, अपने बछड़ों के लिये, उनके बारे में सोंचते हुये अपने थनो में दूध अधिक मात्रा में छोड़ रही है, उनके थनो से बहते दूध से सारा घर आँगन में कीचड़ सा हो गया।

हे ! ऐसे घर में रहने वाली, भगवान् कृष्ण के कैंकर्य धन से धनि ग्वाल की बहन, हम तेरे घर के प्रवेश द्वार पर खड़ी है, ओस की बुँदे हमारे सर पर गिर रही है।

हम भगवान राम,  जिन्होंने  सुन्दर लंका के अधिपति रावण पर क्रोध कर उसे मार दिया, जिनका नाम आनन्ददायक है,उनका  गुण गा रहे हैं ।

हे! सखी ! कुछ बोल नहीं रही हो, कितनी लम्बी निद्रा है तुम्हारी, अब तो उठो,  तिरुवाय्प्पाडि  (गोकुल} के सभी वासी तुम्हारी निद्रा के बारे में जान गये है।

तेरहवां पाशुर:

इस पाशुर में आण्डाल उस सखी को जगा रही है, जो स्वयं एकांत में अपने नेत्रों की सुंदरता का बखान करती है।

नेत्र ज्ञान के परिचायक है, इसलिये ऐसे भी कह सकते है की यह सखी एम्पेरुमान (भगवान्) के बारे पूर्ण ज्ञान रखती है।

भगवान् कृष्ण को अरविन्दलोचनन् (कमल सी अँखियों   वाले) नाम से भी सम्बोधित करते है।

सखी स्वयं की अँखियों  की तुलना भगवान कृष्ण के नेत्र से करती हुयी, विश्वास करती है कि  स्वयं कृष्ण उसे ढूंढते हुए यहाँ आयेंगे।        

पुळ्ळिन् वाय् कीण्डानैप् पोल्ला अरक्कनै
  किळ्ळिक् कळैन्दानैक् कीर्त्तिमै पाडिप्पोय्
पिळ्ळैगळ् एल्लारुम् पावैक्कळम् पुक्कार्
  वेळ्ळि एळुन्दु वियाळम् उऱन्गिऱ्ऱु
पुळ्ळुम् सिलम्बिन काण् पोदरिक्कण्णिनाय्
  कुळ्ळक् कुळिरक् कुडैन्दु नीरडादे
पळ्ळिक् किडत्तियो? पावाय् नी नन्नाळाल्
  कळ्ळम् तविर्न्दु कलन्दु एलोर् एम्बावाय्

व्रत धारिणी सभी सखियाँ, व्रत के लिये निश्चित स्थान पर पहुँच गयी है।

सभी सखियाँ सारस के स्वरुप में आये बकासुर का वध करने वाले भगवान कृष्ण और सभी को कष्ट देने वाले रावण का नाश करने वाले भगवान् श्रीरामजी का गुणानुवाद कर रही है।

आकाश मंडल में शुक्र ग्रह उदित हुये है, और बृहस्पति अस्त हो गये है। पंछी सब विभिन्न दिशाओं में दाना चुगने निकल गये।

हे! बिल्ली और हरिणी जैसे आँखों वाली, प्राकृतिक स्त्रीत्व की धनी!  क्या आज के इस शुभ  दिवस पर भी, हमारे साथ शीतल जल में स्नान न कर, हमारे साथ भगवद गुणानुवाद न कर, अकेली  अपनी शैया पर भ्रम में भगवान् सुख भोगती रहोगी ?

चौदहवाँ पाशुर

इस पाशुर में देवी उस सखी को जगा रही है, जिसने सभी सखियों को इस व्रत अनुष्ठान के लिये जगाने की जिम्मेदारी ली थी, पर स्वयं अभी अपने घर में निद्रा ले रही है।

उन्गळ् पुळैक्कडैत् तोट्टत्तु वावियुळ्
  सेन्गळुनीर् वाय् नेगिळ्न्दु आम्बल् वाय् कूम्बिन काण्
सेन्गल् पोडिक्कूऱै वेण् पल् तवत्तवर्
  तन्गळ् तिरुक्कोयिल् सन्गिडुवान् पोदन्दार्
एन्गळै मुन्नम् एळुप्पुवान् वाय् पेसुम्
  नन्गाय् एळुन्दिराय् नाणादाय् नावुडैयाय्
सन्गोडु चक्करम् एन्दुम् तडक्कैयन्
  पन्गयक् कण्णानैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

ओह ! वह जो सभी प्रकार से पूर्ण है, वह जिसने प्रातः सभी को निद्रा से जगाने की जिम्मेदारी ली है,वह जो निसंकोच है, वह जो सुन्दर बातें बतियाती है।

अपने घर के पिछवाड़े के तालाब में प्रातः की सुचना देते नीलकमल मुरझा गये है, लाल कमल दल खिल रहे है, सन्यासी काषाय वस्त्र धारण किये, जिनके मुख की धवल दन्त पंक्ति दृष्टिगोचर हो रही है, मंदिर की तरफ प्रस्थान कर रहे है, मंदिर के किवाड़ खुलने के प्रतिक में शंखनाद कर रहे है।

उठो ! कमलनयन सा नेत्रों में मंद लालिमा लिये, अपने दोनों दिव्य हस्तों में दिव्य शंख  चक्र धारण किये भगवान् के गुणानुवाद करो ।

पन्द्रहवाँ पाशुर

इस पाशुर में देवी आण्डाल ऐसी सखी को जगा रही है, जो आण्डाल और उनकी सखियों को आते हुये निहारने के लिये उत्सुक है।

एल्ले इळम् किळिये इन्नम् उऱन्गुदियो
  चिल्लेन्ऱु अळियेन्मिन् नन्गैमीर् पोदर्गिन्ऱेन्
वल्लै उन् कट्टुरैगळ् पण्डे उन् वाय् अऱिदुम्
  वल्लीर्गळ् नीन्गळे नानेदान् आयिडुग
ओल्लै नी पोदाय् उनक्कु एन्न वेऱु उडैयै
  एल्लारुम् पोन्दारो पोन्दार् पोन्दु एण्णिक्कोळ्
वल् आनै कोन्ऱानै माऱ्ऱारै माऱ्ऱु अळिक्क
  वल्लानै मायनैप् पाडु एलोर् एम्बावाय्

(इस पाशुर का अर्थ, देवी अपनी सखियों के संग जगाने आयी एक सखी के द्वार पर खड़ी,  बाहर खड़ी सखियों और भीतर की सखी के मध्य वार्तालाप के अनुरूप दिया है।)

 बाहर खड़ी सखी : हे ! युवा तोते जैसी नवयौवना, मधुर वार्तालाप वाली, हम सब तेरे द्वार पर खड़ी हैं, और तुम निद्रा ले रही हो ?

अन्दर की सखी : हे! भगवद प्रेम में परिपूर्ण सखियों, इतने क्रोध में न बोलो, मैं  अभी आ रही हूँ ।

 बाहर  खड़ी सखी : तुम वार्ता में बहुत चतुर हो, हम सब हम आपके अशिष्ट शब्दों के साथ-साथ आपके मुंह को भी  बहुत पहले से जानते हैं।

अन्दर की सखी: तुम सब भी बहुत होशियार हो,  मैं जो  भी करती  हूं वह गलत होने दो, अब मुझे क्या करना है कहो ?

 बाहर खड़ी सखी:  जल्दी उठो , क्या तुम्हे नहीं उठने में कुछ विशेष लाभ है.?

अन्दर की सखी: क्या वो सब आ गए हैं, जिन्हें आना चाहिए था या  कोई और आना बाकी  है ?

बाहर खड़ी सखी: सभी आ गये है , तुम  बाहर  आकर गिन सकती हो।

अन्दर की सखी: बाहर आकर क्या करूँ ?

बाहर  खड़ी सखी: कुवलयापीड़ हाथी को मारनेवाले, अपने शत्रुओं का बल हरने वाले, अद्भुत गतिविधियां करने वाले भगवान् कृष्ण के गुणानुवाद करेंगे।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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तिरुप्पावै – सरल व्यख्या – पाशुर १ से ५

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श्रीः  श्रीमते शठःकोपाय  नमः   श्रीमते रामानुजाय  नमः   श्रीमत् वरवरमुनये नमः

तिरुप्पावै

<< तनियन्

पहला पाशुर:

एम्पेरुमान और ग्वालिनों के गुणानुगान का समय :

एम्पेरुमान उपाय और उपेय दोनों ही है, आण्डाळ् ने निश्चय कर लिया कि कृष्णानुभव के लिये, वह मार्गळि नोन्बु (( जो तमिल माह मार्गळि में रखे जाने वाली धार्मिक व्रतानुष्ठान)  (उत्तर भारतीय माह मार्गशीर्ष ) रखेगी।

      मार्गळित् तिङ्गळ् मदि निऱैन्द नन्नाळाल्
       नीराडप् पोदुवीर् पोदुमिनो नेरिळैयीर्
      सीर् मल्गुम् आय्प्पाडिच् चेल्वच् चिऱुमीर्गाळ्
       कूर्वेल् कोडुम् तोळिलन् नन्दगोपन् कुमरन्
      एर् आर्न्द कण्णि यसोदै  इळम् सिन्गम्
      कार् मेनिच् चेन्गण् कदिर् मदियम् पोल् मुगत्तान्
     नारायणने नमक्के पऱै तरुवान्
     पारोर् पुगळप् पडिन्दु एलोर् एम्बावाय्

ओ ! तिरुवाय्प्पाडि (श्री गोकुल) की युवा लड़कियों तुम्हारे पास तो कृष्ण कैंकर्य की संपत्ति है।

ओ ! सुन्दर बड़े आभूषण धारण करने वाली, आज शुभ दिवस है, देखो आज मार्गळि माह की पूर्णिमा है।

श्री कृष्ण (कण्णन्) नन्दगोप के आज्ञाकारी पुत्र है।

नन्दगोप के पास एक भाला है, जिससे वह कन्नन को हानि पहुँचाने वाले को ख़त्म कर देते है।

कन्नन यशोदाप्पिराट्टि के शेर के शावक की तरह है जिनके नेत्र अति सुन्दर है।

कन्नन का वर्ण घने काले बादलों सा है उनकी आँखें थोड़ी लालिमा लिये है, उनका मुख सूर्य चंद्र की भांति है।

वह स्वयं नारायण एम्पेरुमान है, वह हमें अपना कैंकर्य प्रदान कर सेवा का अवसर देंगे।

दूसरा पाशुर:

इस पाशुर में देवी अपनी सखियों को कृष्णानुभव के लिये क्या करना चाहिये क्या नहीं करना चाहिये का  नियम पालन बतला रही है।

देवी यहाँ यह कहती है की एम्पेरुमान (भगवान) की शरणागत हुयी हम सबको हमारे पूर्वाचार्यों के उपदेश ही मार्गदर्शक है।

वैयत्तु वाळ्वीर्गाळ् नामुम् नम् पावैक्कुच्
  चेय्युम् किरिसैगळ् केळीरो पार्कडलुळ्
पैयत् तुयिन्ऱ परमन् अडिपाडि
  नेय्युण्णोम् पालुण्णोम् नाट्काले नीराडि
मै इट्टु एळुदोम् मलर् इट्टु नाम् मुडियोम्
  सेय्यादन सेय्योम् तीक्कुऱळै चेन्ऱु ओदोम्
ऐयमुम् पिच्चैयुम् आन्दनैयुम् कैकाट्टि
  उय्युमाऱेण्णि उगन्दु एलोर् एम्बावाय्

हे सखियों ! हमें इस संसार में रहकर जीने के लिये जीवन मिला है। हम अपने उद्धार के लिये, भगवत प्राप्ति के लिये किये जाने वाले व्रत में हमें क्या करना चाहिये, क्या न करना चाहिये इसे समझते है।

हम सब तिरुप्पाऱ्कडल्  (क्षीर सागर) में शेष शैया पर शयन कर रहे, भगवान के दिव्य श्रीचरणों में प्रार्थना करेंगी।

हम घृत (घी) और दूध का सेवन नहीं करेंगी।

हम सुबह जल्दी उठकर स्नान करेंगी। 

हम अपनी आंखों में काजल नहीं लगायेंगी और न ही हम अपने बालों में फूल लगायेंगी।

हम ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगी जो हमारे बड़ों ने निषिद्ध किया है।

हम किसी की चुगली नहीं करेंगी, हम अपनी सक्षमतानुसार जरूरतमंद को दान करेंगी। 

आण्डाळ् प्रार्थना करती है की, कृष्णानुभव की अनुमति देने वाले सभी बृन्दावन वासियों को लाभ मिले, यहाँ इसका अर्थ सभी को लाभ मिले ऐसा लिया है।

ओन्गि उलगु अळन्द उत्तमन् पेर् पाडि
  नान्गळ् नम् पावैक्कुच् चाऱ्ऱि नीराडिनाल्
तीन्गिन्ऱि नाडु एल्लाम् तिन्गळ् मुम्मारि पेय्दु
  ओन्गु पेरुम् सेन्नेल् ऊडु कयल् उगळ
पून्गुवलैप् पोदिल् पोऱि वण्डु कण् पडुप्प
  तेन्गादे पुक्कु इरुन्दु सीर्त्त मुलै पऱ्ऱि
वान्गक् कुडम् निऱैक्कुम् वळ्ळल् पेरुम् पसुक्कळ्
  नीन्गाद सेल्वम् निऱैन्दु एलोर् एम्बावाय्

हम व्रतधारिणी है इसलिये स्नान कर, हम सब उन भगवान् जो विशाल त्रिविक्रम स्वरुप धारण कर सारे ब्रह्माण्ड को नाप लिये,उनके दिव्य नामो का गुणानुवाद करेंगे।

ऐसा करने से बिना कोई हानि पहुंचाये सारे देश में, माह में तीन बार वर्षा होगी, जिससे धान के खेत लहलहा उठेंगे, उन खेतों में, मछीलियाँ कूदती दिखेंगी, चित्तीदार भृंग नीलकमल पर मंडराएंगे , लोग बेहिचक अपनी गायें के पास जाकर उन्हें दुहेंगे, वह इतना दूध देंगे की, दूध पात्रों से बाहर  बहेगा, देश अमिट ऐश्वयों से भरपूर होगा।

ब्राह्मण , राजा और सतियों के लिये, आण्डाळ् पर्जन्यदेव को माह में तीन बार बरसने की आज्ञा देती है, जिससे बृन्दावन निवासी सम्पन्नता से रहते हुए, कृष्णानुभव करते रहे।

आळि मळैक् कण्णा ओन्ऱु नी कै करवेल्
  आळियुळ् पुक्कु मुगन्दु कोडु आर्त्तु एऱि
ऊळि मुदल्वन् उरुवम् पोल् मेय् कऱुत्तु
   पाळियम् तोळुडैप् पऱ्पनाभन् कैयिल्
आळि पोल् मिन्नि वलम्पुरि पोल् निन्ऱु अदिर्न्दु
  ताळादे सार्न्गम् उदैत्त सरमळैपोल्
वाळ उलगिनिल् पेय्दिडाय् नान्गळुम्
  मार्गळि नीर् आड मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

ओ वरुण देव, आप में समुद्र सी गहराइयाँ है, आप समुद्र से पानी लेकर भारी गर्जना करते हुये,  भगवान, जो समय के स्वामी है, जिनकी नाभि,  कमल के समान है, उनके वर्ण की तरह नीलमेघ वाले बन, अपने में कुछ न छिपाते हुये, भगवान के एक दिव्य हाथ में धारण किये हुये, चक्र की भव्यता से, उनके दूसरे हाथ में धारण किये शंख की तरह, तेजीसे गूंजते हुये, उनके सार्ङ्ग  धनुष से होती बाणों की वर्षा की तरह बरसो।

जिससे इस संसार के लोग कृष्णानुभव करते प्रसन्नता से रहे, और हम व्रत धारिणी भी इस मार्गळि माह में स्नान करें।

इस पाशुर में आण्डाळ् कहती है की नित्य भगवान के नाम स्मरण से हमारे कर्मानुसार किये हुये पाप और पुण्य कर्म धूमिल हो जाते है।

पाप कर्म अग्नि में जलती हुयी रुई की तरह जल कर भस्म हो जाते है, भविष्य में अनजाने में किये दुष्कर्म, कमल के पत्तों पर पानी की तरह,  बिना किसी निशान के मिट जाते है।

विशेष बात यह है की भगवान आप के सारे गत कर्म मिटा देते है, और भविष्य में भी अनजाने में हुये गलत कर्मो को मिटा देते है, पर साथ ही जानकारी रख कर किये हुये दुष्कर्मों के दुष्फल भी देते है।

मायनै मन्नु वड मदुरै मैन्दनैत्
  तूय पेरुनीर् यमुनैत् तुऱैवनै
आयर् कुलत्तिनिल् तोन्ऱुम् अणिविळक्कै
  तायैक् कुडल् विळक्कम् सेय्द दामोदरनै
तूयोमाय् वन्दु नाम् तूमलर्त् तूवित् तोळुदु
  वायिनाल् पाडि मनत्तिनाल् सिन्दिक्क
पोय पिळैयुम् पुगु तरुवान् निन्ऱनवुम्
  तीयिनिल् तूसागुम् सेप्पु एलोर् एम्बावाय्

उत्तर में मथुरा के देदीप्यमान राजा है दामोदर, उनकी अद्भुत लीलायें है, वह गहरी बहती हुयी यमुना किनारे खेलते है,  ग्वालकुल में अवतीर्ण माँ यशोदा को धन्य करने वाले कुलदीपक है।

हम पवित्रता से उन्ही का ध्यान धरते हुये, मुख से उन्ही के नामो का उच्चारण करते हुये, पुष्पों से उनकी आराधना सेवा करेंगे, (याने हम मन बुद्धि कर्म से उनकी आराधना करेंगे) ।

भविष्य में हमसे अनजाने में हुये दुष्कर्मों को भगवान मिटा देते है, ऐसे ही जैसे अग्नि रुई को भस्म कर देती है, इसलिये सदा उन्ही के नामों का गुणगान करते रहो।   

ऐसे आण्डाळ् ने इन पांच पासुरों में भगवान के विभिन्न व्यूहों को सम्बोधित करते हुये प्रार्थना की।

भगवान का पर स्वरुप (श्रीवैकुंठम में भगवान श्रीमन्नारायण) ।

व्यूह स्वरुप (क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान) ।

विभव स्वरुप (भगवान त्रिविक्रम) ।

अंतर्यामी स्वरुप (वरुणदेव में वसित भगवान श्रीमन्नारायण) ।

और अर्चा स्वरुप (मथुरा  में विराजित भगवान)।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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तिरुप्पावै – सरल व्यख्या – तनियन्

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श्रीः  श्रीमते शठःकोपाय  नमः   श्रीमते रामानुजाय  नमः   श्रीमत् वरवरमुनये नमः

तिरुप्पावै

नीळा तुङ्ग स्तनगिरि तटीसुप्तम् उद्बोद्य कृश्णम्

पारार्त्यम् स्वम् श्रुति शत शिरस् सिद्दम् अद्यापयन्ती

स्वोच्चिश्टायाम् स्रजि निगळितम् या बलात् क्रुत्य भुन्ग्ते

गोदा तस्यै नम इदम् इदम् भूय एवास्तु भूय:।

भगवान श्रीकृष्ण ,नैप्पीनै पिराट्टि (जो भगवान श्रीमन् नारायण् की एक सहचरी नीळा देवी की अवतार है) के वक्षस्थल, जो पहाड़ की ढलान की तरह है, उन पर सर रख सो रहे है।

आण्डाळ् उन्ही श्रीकृष्ण को, स्वयं पहनी हुयी माला पहनाकर अपने बंधन में बाँध लिया है। वह उन्हें जगाकर, जैसे वेदांत (वेदों के अंतिम भाग) में बतलाया गया, वैसे अपने पारतन्त्रियम् (पूर्ण रूप से एम्पेरुमान पर निर्भर), होने के बारे में बतलाती है।

आण्डाळ् जो हठपूर्वक एम्पेरुमान के पास जाकर, उन्हें अपना बनाकर आनंदित हो सदा उन्ही के पास रह गयी, ऐसी देवी को मेरा अभिवादन।

अन्नवयल् पुदुवै आण्डाळ् अरन्गर्कुप्

पन्नु तिरुप्पावैप् पल्पदियम् – इन्निसैयाल्

पाडिक् कोडुत्ताळ् नऱ्पामालै पूमालै

सूडिक् कोडुत्ताळैच् चोल्लु।

आण्डाळ् नाच्चियार्, हरे भरे खेतों से घिरे, जिनके चारों ओर  हंस घूम रहे है ऐसे श्रीविल्लिपुत्तूर में अवतरित हुयी है।

कृपा करते हुये अपने मधुर कंठ से इस तिरुप्पावै पाशुर रूपी माला को भगवान श्री रंगनाथजी को समर्पित की और पहले स्वयं धारण की हुयी पुष्प माला भी अर्पित की| उस् महान् आन्डाळ् के गुण् गायें 

सूडिक् कोडुत्त सुडर्क् कोडिये तोल्पावै

पाडि अरुळ वल्ल पल् वळैयाय् – नाडि नी

वेन्गडवर्कु  एन्नै विदि एन्र इम्माट्रम्

नाम् कडवा वण्णमे नल्गु

वह जो स्वयं धारण की हुयी माला अर्पितकरने वाली, जो एक अमरलता है!

वह जो कृपा कर, पावै नोन्बु (एक अनुष्ठान जो लड़कियां करती है) के बारे में गान किया, व्रत जो लम्बे समय तक रखा जाता है।

वह जो अपने दिव्य हाथों में चूड़ियां धारण करती है। वह जिसने मन्मथ (कामदेव) से तिरुवेंगड़म में एम्पेरुमान की सेविका बनाने की प्रार्थना की।

आप हम पर अनुग्रह कीजिये ताकि हमें उसे बताना न पड़े|

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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तिरुप्पावै – सरल व्यख्या

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श्रीः  श्रीमते शठःकोपाय  नमः   श्रीमते रामानुजाय  नमः   श्रीमत् वरवरमुनये नमः

मुदलायिरम्

श्री मणवाळ मामुनिगळ् अपने उपदेश रत्त्नमालैः के २२ वे पाशुर में, बहुत ही सुन्दर ढंग से  देवी आण्डाळ् की महानता का वर्णन करते है।

इन्ऱो तिरुवाडिप्पूरम् एमक्काग
अन्ऱो इन्गु आण्डाळ् अवदरित्ताळ् – कुन्ऱाद
वाळ्वान वैगुन्द वान् बोगम् तन्नै इगळ्न्दु
आळ्वार् तिरुमगळाराय् ।

क्या आज तिरुवाडिप्पूरम् (द्रविड़ आदि माह (उत्तर भारतीय आषाढ़ माह ) का पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र है ?

जैसे एक माता कुएं में गिरे अपने बच्चे को बचाने के लिये, कुएं में कूद जाती है, वैसे ही

श्री भूदेवी, श्री वैकुण्ठ के असीमित,आनंदमय अनुभव को छोड़कर

पेरियाळ्वार की पुत्री के रूप में श्रीविल्लिपुत्तूर में अवतरित हुयी ।

भगवान वराह अवतार में श्री भूदेवी के उद्धार के समय देवीसे  कहा था, “जीवात्मा मन से मेरा ध्यान करते हुये, पुष्पों से पूजा, आरधना करते, मनसे प्रार्थना करे, तो मुझे प्राप्त कर सकता है । ” कितनी कृपा और आश्चर्य की बात है।

आण्डाळ् ने स्वयं को ग्वालिन, श्रीविल्लिपुत्तूर को श्री गोकुल, उसकी सहेलियोंको ग्वालिनें, श्रीविल्लिपुत्तूर के वटपत्रशायि मन्दिर में विराजित भगवान वटपत्रशायि को कृष्ण (कान्हा ), और मन्दिर को नन्दगोप का घर माना।

अपनी अपार करुणा से आण्डाळ् ने भगवान को पाने के उपाय में, तमिल भाषा में,  सरलता से समझ में आने वाली पाशुर रचे, जिसे तिरुप्पावै कहते है।

यह भी बतलाया की एम्पेरुमान को पाने के लिये, एम्पेरुमान ही उपेय (साधन् है। एम्पेरुमान की प्रसन्नता के लिये उनका कैंकर्य ही काफी है। भागवतों के माध्यम से  और  नैप्पीनै पिराट्टि के पुरुषकार (सिफारिश्) से ही  एम्पेरुमान की प्राप्त्ति  हो सकती है.| यह हर जीवात्माका स्वरुप ( मूल गुण ) है 

सम्प्रदाय में आचार्यो पूर्वाचार्यों ने तिरुप्पावै को वेदों का सार माना है।

इसमें भगवद प्राप्ति का रहस्योद्घाटन भी है।

वेद यह कहते है की वेदज्ञ की सहायता से भगवान के, दिव्य श्रीचरणों की प्राप्ति हो सकती है। 

ऐसे ही तिरुप्पावै  कहता है कि  भगवद प्राप्त्ति के लिये, भागवतों के साथ भगवान की सेवा करना, केवल भगवानकी प्रसन्नता के लिये, सेवा जरुरी है।

इस रहस्य को हम तिरुप्पावै में पूरी तरह जान उसका आनन्दानुभव कर सकते है।

भगवद रामानुज स्वामीजी के अनेक नामों में एक नाम तिरुप्पावै जीयर भी था, यह उनके सदा तिरुप्पावै के अनुसन्धान के कारण पड़ा।  

इस प्रबंध की एक और विशेषता है कि, सिर्फ यही एक ऐसा प्रबंध है, जिसे बच्चो से लेकर बड़ों तक बहुत ही आनंद और उत्साह से गायन कर सकते है।

इस तिरुप्पावै का यह सरल भावार्थ पूर्वाचार्यों (उपदेशक) के व्याख्यानों पर आधारित है।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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साट्रुमुरै (सात्तुमुरै ) – सरल व्याख्या

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमते वरवरमुनये नम:

सर्व देश दशा कालेष्वव्याहत पराक्रमा | रामानुजार्य दिव्याज्ञा वर्धताम अभिवर्धताम ||

श्री भगवद रामानुज स्वामीजी के दिव्य आदेशों (विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त और श्रीवैष्णव संप्रदाय के सिद्धान्त) का उत्तम रूप में बिना किसी बाधा के सभी स्थानों और सभी समय में उन्नति हो। उनकी उन्नति हो। 

रामानुजार्य दिव्याज्ञा प्रतिवासरमुज्वला | दिगंतव्यापीनी भूयात साहि लोक हितैषिणी ||

श्री भगवद रामानुज स्वामीजी के दिव्य आदेशों की प्रतिदिन अनेकानेक बार उज्ज्वल उन्नति हो। इन आदेशों का सभी दिशाओं में विस्तार हो और वे लोक हितैषिणी हो।

श्रीमन ! श्रीरंग श्रीयम अनुपदरवाम अनुदिनम संवर्धय |
श्रीमन! श्रीरंग श्रीयम अनुपदरवाम अनुदिनम संवर्धय ||

श्रीरंगश्री का प्रतिदिन बिना बाधा के अनेकानेक मंगल/उन्नति हो। श्रीरंगश्री का प्रतिदिन बिना बाधा के अनेकानेक मंगल हो।

नमः श्रीशैलनाथाय कुंती नगर जन्मने | प्रसाधलब्ध परम प्राप्य कैंकर्य शालिने||

श्रीशैलनाथ स्वामीजी को मेरा प्रणाम जिनका जन्म कुंती नगर में हुआ, और जिन्हें चरम कैंकर्य की प्राप्ति हुई (आचार्य कृपा से).

श्रीशैलेश दायपात्रम धीभक्त्यादि गुणार्णवम
यतीन्द्र प्रवणम वंदे रम्य जामातरम मुनीम

मैं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की वंदना करता हूँ, जो श्रीशैलनाथ स्वामीजी के कृपा पात्र है, जो अनंत कल्याण गुण जैसे ज्ञान, श्रद्धा, आदि के अपार सागर है और जो श्रीरामानुज स्वामीजी (यतीन्द्र) के अत्यंत अनुरक्त हैI

[रम्य जामातृ योगीन्द्र पादरेखा मयम सदा
तथा यत्तात्म
सत्तादिम रामानुज मुनीम भजे

– श्री वानमामलै मट अनुसन्धानं]

मैं श्रीवानमामलै जीयर की वंदना करता हूँ, जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों के चिन्ह स्वरूप है और जो अपने सच्चे स्वरूप (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दास होने का), अपने उपजीवन, कार्यों आदि को स्थापित करने के लिए पूर्ण रूप से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कृपा पर आश्रित है|

वाळितिरुवायमोलि पिळ्ळै मादगवाल
वाळुम मणावाळ
मामुनिवन वाळियवन
मारन तिरुवायमोळि
प्पोरुळै मानिलत्तोर

तेरुम्पडि उरैक्कुम् सीर्

श्री शैलनाथ स्वामीजी की अत्यंत कृपा के पात्र श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को लंबी आयु की प्राप्ति हो! श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा अत्यंत सुंदरता से समझाये- श्रीशठकोप स्वामीजी के तिरुवायमौली के दिव्य अर्थों को लंबी आयु की प्राप्ति हो जिस से इस विशाल संसार के निवासी उसे समझ सके और उनका कल्याण हो!

सेय्य तामरैत्तळिणै वाळिये
सेलै वालि तिरुनाबि वाळिये
तुय्य मार्बुम पुरीनूलुम वाळिये
सुन्दरत्तिरुत्तोलिणै
वाळिये
कैयुमेन्दिय मुक्कोलुम वाळिये
करुणै पोंगीय कण्णिणै वाळिये
पोय्यिल्लात मणवाल मामुनि
पुन्दि वाळि
पुगळ वाळि वाळिये

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के कमल के समान लालिमा लिए दिव्य चरणों को लंबी आयु की प्राप्ति हो! उनके पहने हुए केसरिया वस्त्र और उनकी दिव्य नाभि को लंबी आयु की प्राप्ति हो! उनके पवित्र दिव्य वक्ष-स्थल और अक्षय सूत्र को लंबी आयु की प्राप्ति हो! उनके दिव्य कंधों को लंबी आयु की प्राप्ति हो! उनके दिव्य कर कमलों में धारण किए हुए त्रिदण्ड को लंबी आयु की प्राप्ति हो! कृपा प्रसार करने वाले उनके दिव्य नेत्रों को लंबी आयु की प्राप्ति हो! श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के परम ज्ञान, जो सदैव कृत्रिमता से परे है, को लंबी आयु की प्राप्ति हो!

अडियार्गळ वाळअरंग नगर वाळ
सडगोपन तण्तमि नूल वाळकडल सूलन्द
मन्नूलगम वाळ मणवाळ मामुनिये
इन्नुमोरु नूट्रान्डिरुम

श्री भगवान के भक्तों और भागवतों को लंबी आयु की प्राप्ति हो! श्रीरंगम के महान स्थान को लंबी आयु की प्राप्ति हो! श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य प्रबंधन को लंबी आयु की प्राप्ति हो! इस संसार को लंबी आयु की प्राप्ति हो जो विशाल महासागरों से घिरा हुआ है! हे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी! आपकी कृपा सदा हम दासों पर बनी रहे और हमें अनुग्रहित करे।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/07/sarrumurai-simple/

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रामानुस नूट्रन्दादी (रामानुज नूत्तन्दादि)– सरल व्याख्या

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। ।श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नमः। ।

इयर्पा

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमालै के अड़तीसवें (३८) पासुर मे बड़ी सुन्दरता से श्रीरामानुज स्वामीजी के
अनूठी श्रेष्ठता को दर्शाते कहतें हैं:

एम्बेरुमानार् दरिसनम एन्ऱे इदर्कु
नम्बेरुमाल् पेरिट्टटु नाट्टिवैत्तार् – अम्बुवियोर्
इन्द दरिसनत्तै एम्बेरुमानार् वलर्त्त
अन्दच्चेयलरिकैक्का

श्रीरंगनाथ भगवान (श्रीरंगम में उत्सव मूर्ति) ने हमारे श्रीवैष्णव सम्प्रदाय (भगवान विष्णु के श्रेष्ठ शिष्यों की पवित्र परंपरा)
को श्रीरामानुज सम्प्रदाय नाम दिया और उसे अच्छी तरह स्थापित किया। यह इस तथ्य के कारण है कि
श्रीरामानुज स्वामीजी ने बड़ी कृपा से  श्रीभाष्य जैसे ग्रन्थ आदि को रचा और सुबोधागम्य रूप से
समझाया , तथा भक्ति की राह को विकसित किया और सभी को अपने सम्प्रदाय के गूढ़ार्थ को अनेक
आचार्यों के माध्यम से समझाया, भगवान के अनेकों मंदिरों मे सुधार किया जैसे कि मन्दिर
के प्रशासन, शास्त्रों मे बताये अनुसार भगवान के उत्सव करना, आदि। श्रीरंगनाथ भगवान ने यह स्थापित
किया ताकि सभी जन श्रीरामानुज स्वामीजी के द्वारा किये हुए उपयोगी कार्यों को जान सके।  कहा जा सकता है कि,इसे ध्यान
मे रखकर, कि  श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी (श्रीरामानुज स्वामीजी के पाँच आचार्यों मे से
एक) ने श्रीरामानुज स्वामीजी को एम्बेरुमानार् नाम की उपादी दी, श्रीरंगनाथ भगवान श्रीरामानुज
स्वामीजी की इस महानता को सामने लाने सुनियोजित किये ।
पिल्लै तिरुवरंगत्तु अमुदनार , (श्रीरंगामृत स्वामीजी) जो एक आचार्य थे, श्रीरामानुज स्वामीजी के समय
श्रीरंगम रहते थे। प्रारम्भ मे उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति आदर नहीं था। श्रीरामानुज स्वामीजी की

आज्ञा से श्रीरंगामृत स्वामीजी को श्रीकूरेश स्वामीजी (श्रीरामानुज स्वामीजी के मुख्य शिष्यों मे से एक) के
पास उनमें हृदय परिवर्तन लाने के लिए भेजा गया। श्रीकूरेश स्वामीजी की बड़ी कृपा से श्रीरंगामृत
स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी की महानता को एहसास किया और दयापूर्वक एक अद्भुत प्रबन्धम
रामानुस नूट्रन्दादी (रामानुज नूत्तन्दादि) की रचना की जिसमे विस्तारपूर्वक श्रीरामानुज स्वामीजी के गुणों को बताया गया
हैं।

श्रीवरवर मुनि स्वामीजी ने इस प्रबन्धम के लिए एक संक्षिप्त व्याख्यान दिये हैं। इस व्याख्या के
प्रस्तावना में उन्होंने इस प्रबन्धम की महानता को बड़ी सुन्दरता से वर्णन किया हैं। हम संक्षिप्त मे इन
गुणों को देखेंगे।

जैसे श्रीमधुरकवि आल्वार ने कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु ग्रन्थ की रचना की, जिसमे स्वयं का स्थान श्रीशठकोप
स्वामीजी के सन्दर्भ मे समझाया हैं (कि श्रीशठकोप स्वामीजी हीं उनके लिये सब कुछ हैं)  वैसे ही सभी के
लिये एक उपदेश के रूप में  श्रीरंगामृत स्वामीजी ने भी बड़ी दया से श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति
इस ग्रन्थ की रचना किये। हालाकि श्रीमधुरकवि स्वामीजी जिन्होंने एक छोटे प्रबन्धम कि रचना किये
श्रीरंगामृत स्वामीजी ने दयापूर्वक एक विशाल प्रबन्धम की रचना किये। जिन्होंने ब्रह्मोपदेश (एक समारोह जिसमें एक युवा को सर्वोच्च ब्रह्मन के ज्ञान प्राप्त करने की दीक्षा दी जाती है )ग्रहण किया है वें नित्य प्रति गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते है वैसे ही जो अपने आचार्य से सम्बन्ध रखते हैं और जो श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों की इच्छा रखते हैं, उन्हें,प्रति दिन इस प्रबन्धम का उच्चारण करना चाहिये । इस प्रबन्धम के सभी पासुरों मे श्रीरामानुज स्वामीजी का नाम स्मरण किया गया हैं। अत: हमारे पूर्वज इस प्रबन्धम को प्रपन्न गायत्री कहते थे।

यह साधारण अनुवाद श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्या की सहायता से लिखा गया हैं।

  • तनियन्
  • पाशुर 1 – 10
  • पाशुर 11 – 20
  • पाशुर 21 – 30
  • पाशुर 31 – 40
  • पाशुर 41 – 50
  • पाशुर 51 – 60
  • पाशुर 61 – 70
  • पाशुर 71 – 80
  • पाशुर 81 – 90
  • पाशुर 91 – 100
  • पाशुर 101 – 108
अगले श्रृंखला में, हम इस प्रबंध के तनियन् का आनंद लेंगे।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/04/ramanusa-nurrandhadhi-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि- सरल व्यख्या

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मुदलायिरम्

श्री मणवाळ मामुनिगळ् अपनी उपदेश रत्नमालै के ११ वे पाशुर में तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् (भक्तांघ्रिरेणू आळ्वार्) के बारे मैं बहुत ही सुन्दर ढंग से बतला रहे है

“मन्निय सीर् मार्गळियिल् केटै इन्ऱु मानिलत्तीर्

एन्निदन्क्कु एट्रम् एनिल् उरैक्केन् – तुन्नु पुगळ्

मामऱैयोन् तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् पिऱप्पाल्

नान्मऱैयोर् कोण्डाडुम् नाळ् ।“

इस पाशुर में श्री मणवाळ मामुनिगळ् कह रहे है “हे इस जगत के लोगों सुनो मै तुम्हे इस मार्गळि मास, जो वैष्णव मास की महत्ता रखता है, उसका महत्व बतलाता हूँ। यह दिन सम्प्रदाय विद्वानों, वेदों के ज्ञाता जैसे एम्पेरुमानार (भगवत रामानुज स्वामीजी), के द्वारा तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् (भक्तांघ्रिरेणू आळ्वार्) के, प्राकट्य दिवस के रूप में मनाते आ रहे है।  तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार्, जो सारे वेदों के ज्ञाता थे, और उन्ही के मनन में मग्न रहते थे।  तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् ख़ास तौर से, स्वयं को श्रीमन्नारायण के भक्तों का दास मानते थे।

श्री अळगिय मणवाळप् पेरुमाळ् नायनार् (हमारे पूर्वाचार्यों में एक) ने अपनी रचना आचार्य हृदयम की ८५ वि चूर्णिका (छोटे छंद) में कह रहे है की, नित्य प्रातः भगवान् श्रीमन्नारायण को सुन्दर सुप्रभातम गाकर उनको योग निद्रा (योग निद्रा उसे कहते जहाँ शरीर सुप्तावस्था में रहता है, पर अपने आस पास घटित सारी बातों का ध्यान रहता है याने मन बुद्धि से जाग्रत अवस्था) से जगाने वाले तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् (भक्तांघ्रिरेणू आळ्वार्) को  तुळसीभ्रुत्यर् (भगवान् श्रीमन्नारायण की तुलसी सेवा में रूचि रखने वाले) नाम से भी जानते है।

यह बात तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् अपने तिरुमलै प्रबन्धम् में अपने लिये स्वयं कह रहे है,  “तुळबत्तोण्डाय तोल् सीर्त् तोण्डराडिप्पोडि एन्नुम् अडियनै” (वह सेवक जो तुलसी से श्रीमन्नारायण की सेवा का निर्वहन करते है)। तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि भगवान श्रीमन्नारायण को प्रातः योगनिद्रा से जगाने का महानतम प्रबन्ध है। 

यहाँ पूर्वाचार्यों के व्याख्यानों से उद्घृत, तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि का सरल भाषा में अर्थानुसंघान प्रस्तुत है।

तनियन्

(तिरुमालै आण्डान्  द्वारा रचित तनियन्।)

तमेव मत्वा परवासुदेवम्

रन्गेसयम् राजवदर्हणीयम्

प्राबोधिकीम् योक्रुत सूक्तिमालाम्

 भक्तांघ्रिरेणू म् भगवन्तमीडे।।

में तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् की स्तुति करता हूँ, जिन्होंने ऐसे पेरिया पेरुमाळ (श्रीरंगम में विराजित भगवान् श्रीरंगनाथजी का श्रीविग्रह), जो आदिशेष पर शयन कर रहे है, जो श्रीवैकुण्ठ में परवासुदेव कहलाते है, जिन्हे यह चराचर जगत, राजा की तरह पूजता है,  उन्हें योग निद्रा से जगाने इतनी सुन्दर प्रबन्ध माला समर्पित किये है।

(तिरुवरन्गप् पेरुमाळ् अरयर् द्वारा रचित तनियन्।)

मण्डन्गुडि एन्बर् मामऱैयोर् मन्निय सीर्

तोण्डरडिप्पोडि तोन्नगरन् – वण्डु

तिणर्त्त वयल् तेन्नरन्गत्तम्मानै पळ्ळि

उणर्त्तुम् पिरान् उदित्त ऊर्।।

विद्वान् लोग जो  वेदों के ज्ञाता है, कह रहे है तिरुमण्डन्गुडि वह मंगल स्थान है जहाँ तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् प्रकट हुये है। आळ्वार् ने तिरुवरंगम में जो चहुँ और खेतो से घिरा हुआ है और जहाँ भृंगों के झुंड रहते है, में शेषशैया पर शयन कर रहे पेरिया पेरुमाळ को प्रातः जगाकर हम पर बहुत उपकार किया है।

*****

प्रथम पाशुर :

अपने प्रथम पाशुर में ही आळवार संत कृपा करके बतला रहे है की, सभी लोकों के देवी देवता भगवान् पेरिय पेरुमाळ को जगाने श्रीरंगम आते है। इससे यह स्पष्ट होता है की, सिर्फ भगवान् श्रीमन्नारायण ही सबके पूजनीय है। अन्य सभी लोकों के देवी देवता भी इनकी पूजा करते है।

कदिरवन् गुणदिसैच् चिगरम् वन्दणैन्दान्

    कन इरुळ् अगन्ऱदु कालै अम् पोळुदाय्

मदु विरिन्दु ओळुगिन मामलर् एल्लाम्

    वानवर् अरसर्गळ् वन्दु वन्दु ईन्डि

एदिर् दिसै निऱैन्दनर् इवरोडुम् पुगुन्द

    इरुन्गळिट्रु ईट्टमुम् पिडियोडु मुरसुम्

अदिर्दलिल् अलै कडल् पोन्ऱु उळदु एन्गुम्

    अरन्गत्तम्मा पळ्ळि एळुन्दरुळाये।।

तिरुवरंगम में शेष शैया पर शयन करने वाले, हे नाथ ! पूर्व दिशा में रात्रि के अन्धकार को दूर करते हुये पर्वत चोटियों से सूर्यदेव प्रकट हो, दिन के आगमन की सुचना दे  रहे है। प्रातः पल्लवित पुष्पों से मधु पात हो रहा है। सभी लोकों  के देवी देवता, राजा महाराजा, स्वयं को प्रथम आया हुआ बतलाते हुये, आपकी प्रातः उठते ही एक झलक दर्शन पाकर धन्य होने, आपके दक्षिण द्वार पर इकट्ठे हुये है। उनके साथ ही हाथी और हथिनी जो उनके वाहन है, वह भी आये हुये है। आपकी निद्रा से उठते ही एक झलक  पाने, उनके साथ विविध प्रकार के वाद्य लिये  वाद्यकार उन्हें  उत्साह से बजा रहे है, इन वाद्यों की ध्वनि समुद्र की उत्ताल लहरों की ध्वनि की तरह चहुँ और गुंजायमान हो रही है।

द्वितीय पाशुरम :

अपने द्वितीय पाशुर में आळ्वार संत कह रहे है पूर्व दिशा से ठंडी बयार रही है, जो हंसो को जगा कर भोर होने का अहसास दिला रही है। आपका भागवतों के प्रति अति स्नेह प्रेम है, इस लिये आपको भी योगनिद्रा से जाग जाना चाहिये।

कोळुन्गोडि मुल्लैयिन् कोळुमलर् अणवि

    कूर्न्ददु गुणदिसै मारुदम् इदुवो

एळुन्दन मलर् अणैप् पळ्ळि कोळ् अन्नम्

    ईन्पणि ननैन्द तम् इरुम् सिऱगु उदऱि

विळुन्गिय मुदलैयिन् पिलम्बुरै पेळ्वाय्

    वेळ्ळुयिर् उऱ अदन् विडत्तिनुक्कु अनुन्गि

अळुन्गिय आनैयिन् अरुम् तुयर् केडुत्त

    अरन्गत्तम्मा पळ्ळि एळुन्दरुळाये।।

पूर्वी दिशाओं  से उठती  ठंडी हवायेँ, अभी पल्लवित हुये चमेली के फूलों की बेल को छू कर बह रही है, इन फूलो की बैल पर सो रहे हंस भी इस मदमस्त बयार की सुगंध से अपने पंखो को हिलाते जाग गये है, बरसात की बूंदों की तरह ओस की बुँदे उनके पंखो से झर रही है

तिरुवरंगम में शयन करने वाले हे नाथ ! आपने, ग्राह द्वारा अपने नुकीले दातों से गजराज का पैर पकड़कर  अथाह जल राशि में ले जाकर अपने विशाल गुफा जैसे मुँह से निगलने की चेष्टा करने वाले ग्राह को मार कर गजराज की रक्षा की, अब आप को अपनी योगनिद्रा त्याग कर हम पर कृपा बरसाना चाहिये।

तीसरा पाशुर :

इस तीसरे पाशुर  में आळ्वार संत कह रहे है भगवान् भुवन भास्कर अपनी किरणों से तारो के प्रकाश की भव्यता को ढक दिये है। संत कह रहे है, वह भगवान् श्रीमन्नारायण के चक्र धारण किये हुये, हस्त की पूजा आराधना करना चाहते है।

सुडर् ओळि परन्दन सूळ् दिसै एल्लाम्

    तुन्निय तारगै मिन्नोळि सुरुन्गिप्

पडर् ओळि पसुत्तनन् पनि मदि इवनो

    पायिरुळ् अगन्ऱदु पैम् पोळिल् कमुगिन्

मडल् इडैक् कीऱि वण् पाळैगळ् नाऱ

    वैगऱै कूर्न्ददु मारुदम् इदुवो

अडल् ओळि तिगळ् तरु तिगिरि अम् तडक्कै

    अरन्गत्तम्मा पळ्ळि एळुन्दरुळाये।।

भगवान सूर्य की किरणे, चहुँ और फ़ैल गयी है। टिमटिमाते तारों का प्रकाश भी सूर्य की किरणों के उजियारे में छुप गया है । शीतल चन्द्रमा की रौशनी भी फीकी पड़ गयी, सुपारी के वृक्षों को स्पर्श कर आती ठंडी हवा वातावरण में मधुर सुवास फैला रही है। अपने हाथों में सुदर्शन चक्र धारण करने वाले, हे तिरुवरंगम में शयन करने वाले, अब जागिये अपने भक्तो पर अपनी करुणा बरसाइये।

चतुर्थ पाशुर :

इस चतुर्थ पाशुर  में आळ्वार संत भगवान् से कह रहे है की, उन्हें , प्रातः जल्दी उठकर, उनकी आराधना में आड़े रहे शत्रुओं  का विनाश करना चाहिये, ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने रामावतार के समय किया था।

मेट्टु इळ मेदिगळ् तळै विडुम् आयर्गळ्

     वेय्न्गुळल् ओसैयुम्  विडै मनिक् कुरलुम्

ईट्टिय  इसै दिसै परन्दन वयलुळ्

     इरिन्दिन सुरुम्बिनम् इलन्गैयर् कुलत्तै

वाट्टिय वरिसिलै वानवर् एऱे

    मामुनि वेळ्वियैक् कात्तु अवबिरदम्

आट्टिय अडु तिऱल् अयोद्दि एम् अरसे

    अरन्गत्तम्मा पळ्ळि एळुन्दरुळाये।।

अपने पशुओं को चराने गये चरवाहों के बांसुरी की धुन की आवाज़ रही है, चरते हुए पशुओं के गले में बंधे गलपट्टी की घंटियों के बजने  की आवाज़ भी चहूँ और सुनायी दे रही है। भृंगी भी हरी घांस देख गिनगीना रहे है। अपने  सारंग धनुष से,  शत्रुओं का नाश करने वाले,  हे श्री राम ! आपका सत्व महान है, आप  दैत्यों का संहार कर विश्वामित्र जी के यज्ञ को सफल बनाकर, अवभृथ स्नान कर, शत्रुओं का नाश करने वाली, अयोध्या के राजा बने । 

हे तिरुवरंगम में योगनिद्रा में लीन, हे रंगनाथ! आपको भी प्रातः उठकर हम दास लोगों पर कृपा बरसानी चाहिये।

पंचम पाशुर :

पंचम पाशुर में आळ्वार संत कहते है सभी लोकों से देवता लोग पुष्प लेकर आपकी पूजा करने पधारे है। आप, आपके भक्त भागवतों में किसी प्रकार का भेद नहीं रखते है, इसीलिये आपको उठकर सभी की सेवाएं स्वीकार करनी चाहिये।

पुलम्बिन पुट्कळुम् पूम् पोळिल्गळिन् वाय्

   पोयिट्रुक् कन्गुल् पुगुन्ददु पुलरि

कलन्ददु गुणदिसैक् कनैकडल् अरवम्

  कळि वण्डु मिळट्रिय कलम्बगम् पुनैन्द

अलन्गल् अम् तोडैयल् कोण्डु अडियिणै पणिवान्

  अमरर्गळ् पुगुन्दनर् आदलिल् अम्मा

इलन्गैयर् कोन् वळिपाडु सेय् कोयिल्

  एम्पेरुमान् पळ्ळी एळुन्दरुळाये।।

नव खिले हुए फूलों से भरे उद्यान में पक्षी ख़ुशी से कलरव कर रहे है। भोर हो चुकी, रात्रि चली गयी है । पूर्व दिशा से समुद्र के लहरों की गर्जना चहूँ और सुनाई दे रही है। सभी लोकों के देवता लोग, फूलों के हार लिये खड़े है, भँवरे उन फूलों से मधु पान करने उनपर मंडरा रहे है। 

हे !  लंकापति विभीषण के आराध्य, तिरुवरंगम में शेष पर शयन कर रहे हे भगवान आप उठिये और हम पर अनुग्रह कीजिये। 

छटवां पाशुर :  

इस पाशुर में आळ्वार संत कह रहे है, सुब्रमण्यम (कार्तिकेय जी)  जो आपके द्वारा देवताओं की सेना में शासन के लिये ,देवताओं की सेना के सेनापति  नियुक्त हुये है, आये है साथ ही अन्य देवता भी अपनी अपनी अर्धांगिनियों के साथ अपने अपने वाहनों में अपने अपने अनुगामियों के साथ आपकी पूजा कर अपने अपने मनोरथ सिद्ध करने आये है। आप अपनी दिव्य निद्रा त्याग कर उन सब पर अपनी करुणा बरसाइये।

इरवियर् मणि नेडुम् तेरोडुम् इवरो

  इऱैयवर् पदिनोरु विडैयरुम् इवरो

मरुविय मयिलिनन् अऱुमुगन् इवनो

  मरुदरुम् वसुक्कळुम् वन्दु वन्दु ईन्डि

पुरवियोडु आडलुम् पाडलुम् तेरुम्

  कुमरदण्डम् पुगुन्दु ईण्डिय वेळ्ळम्

अरुवरै अनैय निन् कोयिल् मुन्  इवरो।।

  अरन्गत्तम्मा पळ्ळि एळुन्दरुळाये

द्वादश आदित्य अपने रथों में सवार हो आये है, ११ रूद्र जो इस धरा पर शासन करते है वह भी आये है, षण्मुख सुब्रमण्यम (कार्तिकेय जी) भी, अपने मयूर वाहन पर आये है। अन्य लोकों के देवताओं के आलावा,  उनचास मरुतगण, अष्ट वसु (यह भी अन्य देवताओं में आते है)  भी आये है। आपके प्रथम  दर्शन पाने, कतार में प्रथम खड़े रहने यह आपस में लड़ रहे है।  सभी देवता आपकी नज़रों में आने, आपका ध्यान आकर्षित करने , अपने अपने रथो और अश्वों पर बैठे गा रहे है और नाच रहे है। सभी देवता और देव सेना के सेनापति षण्मुगम भी, विशाल पर्वत की तरह दीखते तिरुवरंगम के द्वार पर एकत्रित हुये  है।  तिरुवरंगम में दिव्य निद्रा में शयन कर रहे, हे भगवान् ! आपको उठकर इन सब पर कृपा करनी चाहिये।

सप्तम पाशुर :

सप्तम पाशुर, इस पाशुर में आळ्वार संत कह रहे है, सभी लोकों के देवताओं के साथ, देवताओं  के राजा इंद्र और सप्त ऋषि आकाश मार्ग में अंतरिक्ष में , खड़े हो आपका गुणगान कर रहे है। आपको उठकर उन्हें दर्शन देना चाहिये।

अन्दरत्तु अमरर्गळ् कूट्टन्गळ् इवैयो

  अरुन्दव मुनिवरुम् मरुदरुम् इवरो

इन्दिरन् आनैयुम् तानुम् वन्दु इवनो

  एम्पेरुमान् उन कोयिलिन् वासल्

सुन्दरर् नेरुक्क विच्चादरर् नूक्क

  इयक्करुम् मयन्गिनर् तिरुवडि तोळुवान्

अन्दरम् पार् इडम् इल्लै मट्रु इदुवो

  अरन्गत्तम्मा पळ्ळि एळुन्दरुळाये।।

हे नाथ! इंद्र अपने ऐरावत पर विराजे आपके दिव्य मंदिर के द्वार पर खड़े है स्वर्ग के देवता अपने गणो के साथ आये हुये है। ऋषि महानुभाव और सनकादिक ऋषि , मरुतगण और उनके अनुयायी, यक्ष, गन्धर्व सभी  विद्यावाचस्पति गण (अन्य समूह के देवता)  सभी आकर आकाश मार्ग में खड़े है।  सभी आपकी चरण वंदना करने, एक दूसरे से धक्का मुक्की कर रहे है, सभी व्यामोह में है।  हे तिरुवरंगम ! में शयन करने वाले नाथ, उठिये और हम सब पर कृपा करिये।

अष्टम पाशुर :

इस अष्टम पाशुर में आळ्वार संत कह रहे है , आपकी आराधना के लिये यह भोर का समय सबसे उचित है , सारे ऋषि प्रवर, जिन्हे आपकी आराधना के अलावा और कोई दूसरी इच्छा नहीं है। आपकी पूजा आराधना के लिये, समग्र सामग्री लेकर आपके द्वार खड़े है (कृपा निधानअपनी दिव्य निद्रा से जागिये और हम सब पर कृपा कीजिये।

वम्बविळ् वानवर् वायुऱै वळन्ग

  मानिदि कपिलै ओण् कण्णाडि मुदला

एम्पेरुमान् पडिमैक्कलम् काण्डऱ्कु

  एऱ्पन आयिन कोण्डु नन् मुनिवर्

तुम्बुरु नारदर् पुगुन्दनर् इवरो

  तोन्ऱिनन् इरवियुम् तुलन्गु ओळि परप्पि

अम्बर तलत्तिनिन्ऱु अगल्गिन्ऱदु इरुळ् पोय्

  अरन्गत्तम्मा पळ्ळि एळुन्दरुळाये।।

हे नाथ, हे भगवान् प्रख्यात ऋषि तुम्बुरु और नारदजी, स्वर्ग में वासित दिव्यात्मा, कामधेनु भी आपके श्रृंगार के लिये दिव्य पत्र, दिव्य सामग्री और निहारने के लिये दर्पण लेकर, तिरुवरंगम में आपकी तिरुआरधना के लिये आये है अँधेरा दूर हो गया है, सूर्य की किरणे चहूँ और अपना प्रकाश फैला रही है हे तिरुवरंगम ! में शेष शैया पर शयन कर रहे भगवान, आप जागिये हम पर कृपा बरसाइये

नवम पाशुर :

नवम पाशुर, में आळ्वार संत कह रहे है, स्वर्ग के प्रख्यात वाद्य वादक और नर्तकियां भी आपकी सेवा में उपस्थित है, एम्पेरुमान आप उठकर उनकी सेवा स्वीकार कीजिये।

एदमिल् तण्णुमै एक्कम् मत्तळि

  याळ् कुळल् मुळवमोडु  इसै दिसै केळुमि

गीदन्गळ् पाडिनर् किन्नरर् गेरुडर्गळ्

  गेन्दरुवर् अवर् कन्गुलुळ् एल्लाम्

मादवर् वानवर् सारणर् इयक्कर्

  सित्तरुम् मयन्गिनर् तिरुवडि तोळुवान्

आदलिल् अवर्क्कु नाळोलक्कम् अरुळ

  अरन्गत्तम्मा पळ्ळि एळुन्दरुळाये।।

स्वर्ग लोक के किन्नर, गरुड़, गन्धर्व सभी अपने अपने विविध वाद्य बजा रहे है, जैसे एक्कम (एक तार वाला वाद्य), मत्ताली , वीणा बांसुरी आदि वाद्य की तरंगे और धुन चहूँ और गूँज रही है।  इनमे से कुछ सारी रात बजते रहे है, कुछ वाद्य अभी भोर में बजना शुरू हुये है । विख्यात ऋषियों के साथ दिव्य लोकों के देव, चारण, यक्ष , सिद्ध और अन्य सभी आपकी चरण वन्दना करने आये है।  तिरुवरंगम में अपनी दिव्य योग निद्रा में सोये,  हे नाथ ! जागिये, उन पर कृपा बरसाते हुये अपनी सभा में उन्हें स्थान प्रदान कीजिये।

दशम पाशुर :

दशम पाशुर , इस पाशुर में आळ्वार संत एम्पेरुमान से सभी पर कृपा बरसाने की प्रार्थना कर रहे है, साथ ही खुद पर भी कृपा बरसाने की वनती करते हुये कहते है की,  वह पेरिया पेरुमाळ के  सिवाय  किसी और को नहीं जानते।

कडि मलर्क् कमलन्गळ् मलर्न्दन इवैयो

  कदिरवन् कनै कडल् मुळैत्तनन् इवनो

तुडि इडैयार् सुरि कुळल् पिळिन्दु उदऱित्

  तुगिल् उडुत्तु Eऱिनर् सूळ् पुनल् अरन्गा

तोडै ओत्त तुळवमुम् कूडैयुम् पोलिन्दु

  तोन्ऱिय तोळ् तोण्डराडिप्पोडि एन्नुम्

अडियनै अळियन् एन्ऱु अरुळि उन् अडियार्क्कु

  आट्पडुत्ताय् पळ्ळि एळुन्दरुळाये।।

दिव्य कावेरी के मध्य दिव्य योग निद्रा में शयन करे रहे, हे! रंगनाथ, समुद्र उत्ताल लहरों से उगते हुये सूर्य की प्रकाश किरणों का स्पर्श  पाकर कावेरी में कमल पुष्प खिल रहे है। नाज़ुक कमरवाली कन्यायें कावेरी में स्नान कर अपने बाल सुखाकर, शुभ्र स्वच्छ वस्त्र पहन कर कावेरी के घाट पर गयी है। 

(हे नाथ !) इस  सेवक तोण्डरडिप्पोडि की तुलसी माला के सेवा स्वीकार कीजिये । इस सेवक को आपके भक्तों की, सेवा भी प्रदान कीजिये। इस सेवा को स्वीकार करने आपको उठकर हम पर आपकी कृपा बरसानी होगी।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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तिरुवाय्मोळि – सरल व्याख्या – तनियन

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श्री: श्रीमते शटकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत वरवरमुनये नम:

कोयिल तिरुवाय्मोळि

Nammalwar-emperumanar

भक्तामृतं विश्वजनानुमोदनम सर्वार्थदम श्री शटकोप वांग्मयम |

सहस्र शाकोपनिषद समागमम नमाम्यहम द्राविड़ वेद सागरं ||

तिरुवाय्मोळि जो श्रीमन नारायण के भक्तों को अमृत समान है , जो सबको आनंद देने वालि है , जो सबको सारे मंगलमय फल देने वालि हैं, जो साम वेद और चांदोग्य उपनिषद् के सहस्र शाकों (हज़ार शाखाएं) के समान हैं, जो नम्माळ्वार के दिव्य शब्दों से बरी हैं, और जो द्राविड़ (तमिळ) वेदों की समुद्र हैं।

तिरुवळुदि नाडेन्नुम तेनकुरुगूर एनृम

मरुविनिय वण्पोरुनल एनृम अरुमरैगळ

अंदादि सैदान अडि इणैये एप्पोळुदुम

सिंदियाय नेंजे तेळिंदु

हे मन! स्पष्टता के सात नम्माळ्वार के दिव्य चरण कमलों पर ध्यान करो, जो तिरुवळुदि नाडु और तिरुक्कुरुगूर नामक सुँदर , पवित्र प्रदेश और उसमें बहनें वालि तामिरभरणी नदी पर ध्यान करतें, अंदादि रूप में वेदों के अर्थ अपने तिरुवाय्मोळि में प्रकट किये|

मनत्तालुम वायालुम वण्कु रुगूर पेणुं 

इनत्तारै अल्लादु इरैंजेन दनत्तालुम 

ऐदुम कुरैविलेन एंदै शटकोपन 

पादंगळ् यामुडैय पट्रू 

मेरे स्वामी नम्माळ्वार  के चरण कमलों के प्रति शरणागति करने से मेरी धन की भी कोई कमी नहीं हैं के में आळ्वारतिरुनगरि के सेवा करनेवालों से असंगत लोगों की पूजा करूँ।

एइंद पेरुं कीर्ति इरामानुस मुनि तन 

वायंद मलर पादं वणंगुगिंरेन आईंद पेरुं 

सीरार सडगोपन सेंतमिळ वेदं दरिक्कुम 

पेराद उळ्ळम पेर 

सर्वश्रेष्ठ कल्याण गुणों से भरे एम्पेरुमानार के दिव्य चरण कमलों को पूजता हूँ जिस्से ऐसा मन पाऊँ जिसे निष्कलंक और कल्याण गुणों से सम्पूर्ण नम्माळ्वार से रचित सुँदर तमिळ वेदं जो तिरुवाय्मोळी हैं, उसके सिवाय अन्य कोई विषय में दिलचस्प न हो |

वान तिगळुं सोलै मदिळ् अरंगर वण्पुगळ् मेल 

आन्र तमिळ मरैगळ आयिरमुम ईन्र 

मुदल ताय सडगोपन मोयंबाल वळर्त 

इद ताय इरामानुसन 

सप्त प्राहारों, आस्मान को छूने वाले पेड़ो से भरे वाटिकाओं के मध्य शयन करने वाले पेरिय पेरुमाळ के दिव्य गुणों पर रचित तमिळ वेदं के नाम से मानें जानें वालें तिरुवाय्मोळि के जनम देने वाली माँ स्वामि नम्माळ्वार और सुरक्षण कर पालन पोषण करने वाली चुस्त माँ एम्पेरुमानार हैं |

मिक्क इरै निलैयुम मेय्याम उयिर निलैयुम

तक्क नेरियुम तड़ैयागि तोक्कियलुम 

ऊळ् विनैयुम वाळ्विनैयुम ओदुम कुरुगैयर कोन 

याळिन इसै वेदत्तियल 

आळ्वारतिरुनगरी के वासियों के नेता नम्माळ्वार हैं।  वीणा के जैसे सुरीले तिरुवाय्मोळि पॉंच तत्त्वों की विषय प्रकट करती हैं, वें हैं- सर्वेश्वर श्रीमन नारायण के सच्चा स्वरूप (परमात्म स्वरूप), नित्य जीवात्मा की सच्चा स्वरूप, भगवान तक पहुँचाने वाले मार्ग कि सच्ची स्वरूप (उपाय स्वरूप), कर्मों के रूप में आने वाले आपत्तियाँ (विरोधि स्वरूप) और सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य (उपेय स्वरूप).

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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कोयिल तिरुवाईमोळी – सरल व्याख्या

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श्री: श्रीमते शटकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत वरवरमुनये नम: 

तिरुवाईमोळी

paramapadhanathan

उपदेशरत्न मालै के १५वे पासुरम में श्री मणवाळ मामुनिगळ वैकासि विसागम, नम्माळ्वार, तिरुवाईमोळी और तिरुक्कुरुगूर के वैभवों को विशिष्ट रूप में चित्रित करतें हैं. 

उंडो वैकासि विसागत्तुक्कु ओप्पोरु नाळ

उंडो सडगोपर्कोप्पोरूवर – उंडों

तिरुवाईमोळीक्कोप्पु  तेनकुरुगैकुंडो 

ओरु पार तनिल ओक्कुम ऊर 

सर्वेश्वर श्रीमन नारायण के और उन्के समृद्धि के प्रति मंगळासासनं कर महान्ता लाने वाले नम्माळ्वार के दिव्य जन्म दिवस वैकासि विसागं से अन्य कोई श्रेष्ट दिन हो सकती हैं? (नहीं) नम्माळ्वार दिव्यनाम से मानें जाने वाले शटकोप कि कोई तुलना की जा सकती हैं? (नहीं, सर्वेश्वरन, नित्यसूरिया, मुक्तात्मायें, भूलोक के निवासि कोई उनके समान नहीं हैं.) वेदों के सार को विस्तीर्ण रूप में प्रदर्शित करने वालें तिरुवाईमोळी कि समान कुछ हैं? (नहीं) आळ्वार को देनें वालें तिरुक्कुरुगूर के समान कोई नगर हैं ? (नहीं) यह ऐसा दिव्यदेश हैं जहाँ आदिनात पेरुमाळ और नम्माळ्वार कि समान महत्वपूर्णता हैं, यहाँ एम्पेरुमान कि आधिपत्य अर्चावतार रूप में दृश्य हैं, यह आळ्वार कि अवतार क्षेत्र हैं, यहीं पर उन्के दिव्य अवतार के ४००० सालों के पूर्व एम्पेरुमानार के दिव्य विग्रहं नम्माळ्वार के कृपा के कारण प्राप्त हुई तथा यहीं एम्पेरुमानार के पुनरवतार श्री मणवाळ मामुनिगळ के भी जन्म हुईं . ऐसी एम्पेरुमान, आळ्वार एवं आचार्यों से सम्बंधित और उनके वैभवों को अधिक करने वालें इस महत्वपूर्ण क्षेत्र कि वैभव कि तुलना अन्य किसी भी क्षेत्र से की नहीं जा सकती.  

दिव्य ज्ञान तथा भक्ति से आशीर्वादित आळ्वारो के नेता नम्माळ्वार हैं।  ये  तिरुविरुत्तम, तिरुवासिरियम, पेरिय तिरुवन्दादि तथा तिरुवाईमोळी के ग्रंथकर्ता है।  इन में से तिरुवाईमोळी हमारें पूर्वाचार्यों से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता हैं| मंत्रों में माणिक्य मानें जानें वालें द्वय महामंत्र की यह विस्तीर्ण अर्थ के रूप में हैं और इसकी तुलना साम वेद से की जाती हैं|

इस तिरुवाय्मोळी के व्याख्यान ग्रंथों को उपदेश रत्नमाला के ३९वे पासुरम में मामुनिगळ दिखातें हैं, 

पिळ्ळान नन्जीयर पेरियवाच्चान्पिळ्ळै 

तेळ्ळार वडक्कुतिरुविदीपिळ्ळै 

मणवाळ योगि तिरुवाय्मोळियै  कात्त

गुणवाळर एंरू नेंजे  कूरु 

हे ह्रदय! एम्पेरुमानार के पुत्र समान तिरुक्कुरुगुरपिरान पिळ्ळान, पराशर बट्टर के शिष्य वेदान्ति नन्जीयर, व्याख्यान चक्रवर्ती माने जाने वाले पेरिय वाचान्पिळ्ळै, नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य और ज्ञानी वडक्कुतिरुवीदीपिळ्ळै, तथा पेरिय वाचान्पिळ्ळै से आशीर्वादित वादि केसरी अळगिय मणवाळ जीयर, इन सारे महात्मावों ने सम्प्रदाय के आधार द्वय महामन्त्र की विस्तीर्ण अर्थ तिरुवाय्मोळी की व्याख्यान किए हैं.  नम्माळ्वार के दिव्य मुख से जनित, सम्प्रदाय के इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ की पालन एवं पोषण करने वाले महानों की जय.   

आचार्य हृदयं के ३७ वें चूर्णिका में अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार, नम्माळ्वार और तिरुवाय्मोळि के विशेष महान्ता किवर्णन करते हुए कहतें हैं, “संदंगळ् आईरमुम अरिय कट्रू वल्लारानाल वैष्णवत्व सिद्धि”, अर्थात तिरुवाय्मोळि को परिपूर्ण रूप में अर्थ के संग जानकर, इस ज्ञान कि अभ्यास करने वालें श्रीवैष्णव मानें जाएँगे।  

अत: इस्से यह समझ लेना चाहिए की हम श्रीवैष्णवों को तिरुवाय्मोळि सीखनी चाहिए और याद रखना चाहिए कि हमारें संप्रदाय में सर्वत्र आचार्य के द्वारा ही सीखनी चाहिए।  

प्रतिदिन जब तिरुवाय्मोळि की अनुसंधान न की जा सकती हैं, तब हमारें पूर्वजो के व्यवस्थानुसार कोयिल तिरुवाय्मोळि जो तिरुवाय्मोळि के मुख्य पदिगम की संग्रह है, उस्की अनुसंधान की जा सकती हैं. भिन्न भिन्न दिव्यदेशों में इस्की पद्धति भिन्न है पर हम यहाँ अधिकतर क्षेत्रों के अनुसंधान क्रम पर आधारित पदिगम को पूर्वाचार्यों के व्याख्यानों के सात देखेंगें. 

  • तनियन्
  • 1.1 – उयर्वर
  • 1.2 – वीडुमिन्
  • 2.10 – किळरोळि
  • 3.3 – ओळिविल्
  • 4.1 – ओरुनायगमाय
  • 4.10 – ओन्रु
  • 5.5 – एङ्गनेयो
  • 5.7 – नोत्त
  • 5.8 – आरावमुदे
  • 6.10 – उलगमुण्ड
  • 7.2 – कङ्गुलुम
  • 7.4 – आळियेळ
  • 8.10 – नेडुमर्कु
  • 9.10 – मलैनण्णि
  • 10.1 – ताळतामरै
  • 10.7 – सेनोल
  • 10.8 – तिरुमालिरुंजोलै
  • 10.9 – सूळ्विसुम्बु
  • 10.10 – मुनिये

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु – सरल व्याख्या

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। । श्रीः  श्रीमते शठःकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमत् वरवरमुनये नमः । ।

मुदलयिरं

nammazhwar-madhurakavi

नम्माळ्वार् और् मधुरकवि आळ्वार्

श्री मणवाळ मामुनिगळ् अपनी उपदेश रत्न मालै के २६ वे पाशुर में “कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु” का महत्त्व बतला रहे है ।

वाय्त्त तिरुमन्दिरत्तिन् मद्दिममाम् पदम्पोल्

सीर्त्त मदुरकवि सेय् कलैयै – आर्त्त पुगळ्।

आरियर्गळ् तान्गळ् अरुळिच् चेयल् नडुवे

सेर्वित्तार् ताऱ्परियम् तेर्न्दु । ।

हमारे श्रीसम्प्रदाय का तिरुमंत्र (अष्टाक्षर) मंत्र, अपने आप में सम्पूर्णता लिये हुये है।

चाहे वह शब्द हो या अथवा अर्थ, जैसे  तिरुमंत्र (अष्टाक्षर) का मध्य नाम ” नमः” महत्व रखता है, ऐसे ही मधुरकवि आळ्वार द्वारा रचित “कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु” महत्वपूर्ण अद्भुत दिव्य प्रबंधों में अपना महत्व रखता है।

आळ्वार संत द्वारा रचित इन पाशुरों के अर्थ को जानकर हमारे श्रद्धेय पूर्वाचर्यों ने इन पाशुरों को दिव्य प्रबंध पाठ में स्लंगित कर दिया, जिससे दिव्य प्रबंध पारायण में इनका भी अनुसंघान हो सके। अपने श्री सम्प्रदाय में आळ्वार संत, अपना सारा जीवन भगवद सेवा, समर्पण और भगवद गुणगान में ही व्यतीत किया है। एक और यह मधुरकवि आळ्वार, इनके लिये इनके आचार्य ही सब कुछ थे।

यह संत अपने आचार्य (गुरु) नम्माळ्वार की सेवा में, शिष्यत्व में आने के बाद, कभी किसी और का ध्यान नहीं किया, इनके लिये सिर्फ नम्माळ्वार ही भगवान थे और उनका ही गुणानुवाद करते थे। मधुरकवि आळ्वार की जीवनी उनकी रचना, हमारे सम्प्रदाय ही नहीं वैदिक सनातन के एक सिद्धांत की गुरु (आचार्य) ही भगवान का स्वरुप है, को सिद्ध करते है। आळ्वार संत की यह रचना संत की नम्माळ्वार के प्रति अनूठी अद्वितीय श्रद्धा बतलाती है।

[यहाँ तक की मधुरकवि आळ्वार, आदिनात पेरुमाळ के मंदिर में स्थित तिंत्रिणी के पेड़ के पास, अपने आचार्य के पास नित्य जाते, पर कभी आदिनात पेरुमाळ के दर्शन नहीं किये।]

आळ्वार संत की रचना “कण्णिनुण् चिऱुत्ताम्बु” की यह सरल व्याख्या पूर्वाचार्यों की व्यख्या पर आधारित है।

तनियन

अविदित विश्यान्तरः सठारेर् उपनिशताम् उपगानमात्रभोगः।

अपि च गुणवसात् तदेक सेशि मदुरकविर् ह्रुदये ममाविरस्तु।।

हम मधुरकवि आळ्वार को, अपने ह्रदय में ध्यान करते है, वह आळ्वार संत जिन्होंने नम्माळ्वार के सिवा किसी और को जाना ही नहीं, वह संत जिन्होंने नम्माळ्वार के प्रबंध पाशुर के गान के आलावा और कुछ नहीं गया, यह प्रबंध पाठ उन्हें परमानन्द प्रदान करते थे, वह संत जो अपने आचार्य के गुणानुभव में मग्न रहते थे।

वेऱोन्ऱुम् नान् अऱियेन् वेदम् तमिळ् सेय्द

माऱन् शठःकोपन् वण् कुरुगूर् एऱु एन्गळ्।

वाळ्वाम् एन्ऱेत्तुम् मदुरकवियार् एम्मै

आळ्वार् अवरे अरण्।।

मधुर कवी आळ्वार ने कहा है ” में नम्माळ्वार से ज्यादा कुछ नहीं जानता- नम्माळ्वार ने ही द्रविड़ लोगों पर अपनी करुणा  बरसाते हुये वेदों के अर्थ को मधुर द्रविड़ भाषा में प्रबंध रूप में दिया है”,  नम्माळ्वार इस सुन्दर कुरुगूर के नायक है, हम सब पर शासन कर, हम सबका उद्धार कर सकते है, प्रपन्न शरणागत जीवों को आश्रय प्रदान करने वाले है।

प्रथम पाशुर:

प्रथम पाशुर में मधुरकवि आळ्वार, नम्माळ्वार के गुणागान में भगवान् कृष्ण के अनुभव का परमानन्द ले रहे है, क्योकि नम्माळ्वार को भगवान कृष्ण बहुत प्रिय थे ।

कण्णि नुण् चिऱुत्ताम्बिनाल् कट्टुण्णप्

पण्णिय पेरु मायन् एन् अप्पनिल्

नण्णित् तेन् कुरुगूर् नम्बि एन्ऱक्काल्

अण्णिक्कुम् अमुदूऱुम् एन् नावुक्के

भगवन कृष्ण जो मेरे स्वामी है, ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च सत्ता, सर्व जगत नियंत्रक होकर भी मातृ प्रेम में,  माँ यशोदा के हाथों पतली सी रस्सी से बंध गये।मेरी जिव्हा को ऐसे करुणानिधान भगवान के नाम से भी ज्यादा मधुर और अमृतमय नाम, दक्षिण में स्थित तिरुक्कुरुगुर के नायक नम्माळ्वार का नाम रटना ज्यादा अच्छा लगता है ।

द्वितीय पाशुर:

द्वितीय पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कह रहे है की, अकेले नम्माळ्वार के पाशुर इतने मधुर है की निरंतर इनका जाप ही मेरे लिए पुष्टिकारक है।

नाविनाल् नविऱ्ऱु इन्बम् एय्दिनेन्

मेविनेन् अवन् पोन्नडि मेय्म्मैये

देवु मऱ्ऱु अऱियेन् कुरुगूर् नम्बि

पाविन् इन्निसै पाडित् तिरिवने

मेरी जिव्हा से आळ्वार के पाशुर गाकर मैं स्वयं को बहुत ही परम सुखी अनुभव कर रहा हूँ। मैं ने स्वयं को आळ्वार के चरणों में समर्पित कर दिया है I मैं, मंगल गुणों से परिपूर्ण आळ्वार के आलावा किसी और भगवान को नहीं जानता, मैं तिरुक्कुरुगुर नायक आळ्वार के पाशुर का संगीत बद्ध गायन हर जगह जाकर करूँगा।

तृतीय पाशुर:

तीसरे पाशुर में मधुरकवि आळ्वार बहुत ही खुशी से कह रहे है, कैसे भगवान उन्हें नम्माळ्वार का सेवक जानकर उन्हें नम्मलवार स्वरुप में दर्शन दिये।

तिरि तन्दागिलुम् देवपिरान् उडै

करिय कोलत् तिरु उरुक् काण्बन् नान्

पेरिय वण् कुरुगूर् नगर् नम्बिक्कु आळ्

उरियनाय् अडियेन् पेऱ्ऱ नन्मैये

में आळ्वार का सेवक था, भटक गया था, तब आळ्वार द्वारा बतलाये गये , नित्यसुरियों के अधिपति भगवान् नारायण जो सांवले रंग के है मुझे दर्शन दिये, देखो मेरा भाग्य, सदाशय तिरुक्कुरुगुर में अवतरित नम्माळ्वार के सेवक होने से भगवान के दर्शन हुये।

चतुर्थ पाशुर:

इस चतुर्थ पाशुर में मधुरकवि आळ्वार, संत नम्माळ्वार की अपार बरसती करुण वर्षा को देखते हुये, कह रहे है की उन्हें हर उस बात की चाह रखना चाहिये जो नम्माळ्वार को पसंद थी।

यह भी बतला रहे है कैसे संत आळ्वार ने उन जैसे दीन को अपनाया।

नन्मैयाल् मिक्क नान्मऱैयाळर्गळ्

पुन्मै आगक् करुदुवर् आदलिल्

अन्नैयाय् अत्तनाय् एन्नै आण्डिडुम्

तन्मैयान् सडगोपन् एन् नम्बिये

वह जो विशिष्ट गतविधियों में सलंगन रहनेवाले, प्रकांड विद्वान चारों वेदों के ज्ञाता, जो मुझ जैसे दीनता के प्रतिक को छोड़ दिये थे, पर संत नम्मळ्वार, मेरे माता पिता बन मुझे आश्रय दिया, बस वही एक मेरे भगवान् है।

पञ्चम पाशुर:

इस पंचम पाशुर में मधुरकवि आळ्वार, पिछले पाशुर में वर्णित अपनी दीनता से कैसे नम्माळ्वार अपनी अकारण करुणा बरसाते इनमें बदलाव लाकर भक्त बनाकर अपनाया, इसके लिए वह आळ्वार संत को धन्यवाद दे रहे है।

नम्बिनॅ पिऱर् नन्पोरुळ् तन्नैयुम्

नम्बिनॅ मडवारैयुम् मुन्नेलाम्

सेम् पोन् माडत् तुक्कुरुगूर् नम्बिक्कु

अन्बनाय् अडियॅ सदिर्त्तॅ इन्ऱे

मधुरकवि आळ्वार कह रहे है, में भी पहले दूसरों की तरह धन और भोगों का लालची था, स्वर्ण महलों से सज्जित तिरुक्कुरुगूर् के नायक की सेवा पाकर, उनकी शरण में आने से में भी श्रेष्ठ हो गया, उनका सेवक हो गया।

षष्ठम पाशुर:

इस पाशुर में मधुरकवि आळ्वार पूछने पर की, आप में इतनी श्रेष्ठता कैसे आ गयी , कह रहे है संत नम्माळ्वार की अनुकम्पा और अनुग्रह से आ गयी , अब इस श्रेष्ठता से निचे गिरना असंभव है।

इन्ऱु तोट्टुम् एळुमैयुम् एम्पिरान्

निन्ऱु तन् इन्ऱु पुगळ् एत्त अरुळिनान्

कुन्ऱ माडत् तिरुक्कुरुगूर् नम्बि

एन्ऱुम् एन्नै इगळ्वु इलन् काण्मिने

तिरुक्कुरुगूर् के नायक संत नम्माळ्वार जो मेरे स्वामी है, उन्होंने मुझ पर कृपा अनुग्रह कर इस काबिल बनाया, इस लिए में उन्ही के गुणगान करता हूँ ,आप देखिये वह कभी मुझे मझधार नहीं छोड़ेंगे।

सप्तम पाशुर:

इस सप्तम पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कह रहे है की, संत नम्माळ्वार की दया के पात्र बनकर, वह उन सबको, जो किसी न किसी रूप से पीड़ित है, उन सभी को जो अब तक संत के सम्मुख नहीं आये, जिनपर संत की कृपा नहीं हुयी, उन सबको  नम्माळ्वार की महानता बतलाकर उन सबको भी, हर तरह से समृद्ध हो सके ऐसा करूँगा।

कण्डु कोण्डु एन्नैक् कारिमाऱप् पिरान्

पण्डै वविनै पाऱ्ऱि अरुळिनान्

एण् तिसैयुम् अऱिय इयम्बुगेन्

ओण् तमिळ् सडगोपन् अरुळैये

नम्माळ्वार्, जो  कारिमाऱन्, नाम से भी जाने जाते है , जो पोऱ्कारि के पुत्र है अपना अनुग्रह बरसाते हुये अपने संरक्षण में लेकर, अपनी सेवा में लेकर मेरे जन्म जन्मांतर के पापों को मिटा दिया। आळ्वार संत की इस करुण महानता का और इनके द्वारा रचित दिव्य तमिल पाशुरों का अष्ट दिशाओं में, मै सभी को बतलाऊंगा।

अष्टम पाशुर:

इस अष्टम पाशुर में, मधुरकवि आळ्वार कह रहे है की, संत नम्माळ्वार की करुणा स्वयं भगवान की करुणा से भी ज्यादा है, कह रहे है की आळ्वार संत द्वारा रचित तिरुवाय्मौली स्वयं भगवान द्वारा कही गयी श्रीमद्भगवद गीता से ज्यादा कारुणिक है।

अरुळ् कोण्डाडुम् अडियवर् इन्बुऱ

अरुळिनान् अव्वरुमऱैयिन् पोरुळ्

अरुळ् कोण्डु आयिरम् इन् तमिळ् पाडिनान्

अरुळ् कण्डीर् इव् वुलगिनिल् मिक्कदे

भागवतों और भगवद गुणानु रागियों के प्रसन्न चित्तार्थ, नम्माळ्वार ने  वेदों के तत्व सार को  (तिरुवाय्मौली) सहस्त्रगीति में समझाया है, नम्माळ्वार की यह कृति भागवतों पर भगवान कि करुणा से भी ज्यादा ही है।

नवम पाशुर:

इस पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कहते  है की, नम्माळ्वार ने इनकी दीनता को अनदेखा कर, वेदों के सार का ज्ञान इन्हे दिया, और बतलाया की मानव को सदा भगवान के सेवकों का सेवक बन कर रहना चाहिये, इसके लिये में सदा सदा के लिये आळ्वार संत का ऋणी हूँ।

मिक्क वेदियर् वेदत्तिम् उट्पोरुळ्

निऱ्कप् पाडि एन् नेन्जुळ् निऱुत्तिनान्

तक्क सीर्च् चटकोपन् नम्बिक्कु आट्

पुक्क कादल् अडिमैप् पयन् अन्ऱे

नम्माळ्वार् ने मुझे वेदों का सार बतलाया है, जिनका  सिर्फ महानतम विद्वानों के द्वारा ही पठन होता है, आळ्वार संत की यह कृपा मेरे मन में सदा के लिये घर कर गयी, इससे मुझे यह नम्माळ्वार का विशिष्ट सेवक होने का आभास हो रहा है।

दशम पाशुर:

इस दशम पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कहते है की नम्माळ्वार ने उन पर इतनी विशिष्ट कृपा की है, जिसका ऋण वह जीवन भर नहीं उतार सकते ।

इस कारण नम्माळ्वार के चरणों में अति प्रगाढ़ प्रेम उत्पन्न हो गया।

पयन् अन्ऱु आगिलुम् पान्गु अल्लर् आगिलुम्

सेयल् नन्ऱागत् तिरुत्तिप् पणि कोळ्वान्

कुयिल् निन्ऱु आर् पोयिल् सूळ् कुरुगूर् नम्बि

मुयल्गिन्ऱेन् उन् तन् मोय् कळऱ्कु अन्बैये

ओह, नम्माळ्वार आप उस तिरुक्कुरुगूर् में विराजते है, जो चहुँ और से वनो से घेरा हुवा है, उन वनों में कोयल की कुक गुंजायमान हो रही है, आप इस जग के लोगों को अकारण निस्वार्थ भाव में उचित ज्ञान देकर, निर्देश देकर  भगवान की सेवा में लगा रहे हो, ऐसे निस्वार्थ संत के प्रति मेरा मोह बढ़ रहा है।

एकादश पाशुर:

इस एकादश पाशुर में मधुरकवि आळ्वार कह रहे है, जो कोई भी इन प्रबंध पाशुरों को कंठस्थ कर नित्य पठन करले, निश्चय ही वह श्रीवैकुण्ठ को प्राप्त करेगा, क्योंकि श्रीवैकुण्ठ नम्माळ्वार (विष्क्सेनजी के अवतार) के सञ्चालन में है। इसका लक्षित सार यह है की, आळ्वार तिरुनगरि में भगवान आदिनाथार पेरुमाल है और नम्माळ्वार इस तिरुकुरुगुर के नायक है, जबकि श्रीवैकुण्ठ का संरक्षण संचालन तो सिर्फ नम्माळ्वार के हाथ में है।

अन्बन् तन्नै अडैन्दवर्गट्कु एल्लाम्

अन्बन् तेन् कुरुगूर् नगर् नम्बिक्कु

अन्बनाय् मदुरकवि सोन्न सोल्

नम्बुवार् पदि वैकुन्दम् काण्मिने

अपने भक्तो भागवतों के प्रति पेरुमाळ को अत्यधिक स्नेह होता है, नम्माळ्वार को भी पेरुमाळ के भक्तों से प्रेम होता है, पर में मधुरकवि, सिर्फ नम्माळ्वार से प्रेम करता हूँ।

मेरे द्वारा रचित यह प्रबंध पाशुरों का जो भी पठन करेगा वह श्रीवैकुण्ठ में वास करेगा।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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