आर्ति प्रबंधं – ४४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप
पिछले पासुरम में मामुनि ने कहा, “इंद उलगिल पोरुंदामै एदुमिल्लै अंद उलगिल पोग आसयिल्लै” . इस्का अर्थ है कि मामुनि को इस साँसारिक लोक में रहने कि दिलचस्पी में कोई कमी नहीं और परमपद पहुँचने में ख़ास दिलचस्पी नहीं हैं। यह प्रस्ताव करने के पश्चात वे सँसार के लोगों को और उन्के क्रियाओं पर ध्यान देते हैं। इन लोगों कि निरंतर पाप इकट्ठा करने का कारण समझतें हैं। यही इस पासुरम का विषय है।

पासुरम ४४
माकान्त नारणनार वैगुम वगै अरिंदोर्क्कु
एकान्तं इल्लै इरुळ इल्लै
मोकांतर इव्विडम येकांतम इरुळ एन्ड्रु भयं अट्र इरुंदु
सेयवारगळ ताम पावत्तिरम

शब्दार्थ :
नारणनार – सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान श्रीमन नारायणन
मकांत – जो श्री महालक्ष्मि के पति हैं
वैगुम वगै – जिस तरह से वें इस प्रपंच के हर चित और अचित जीवों के बाहर और अंदर व्यापित हैं (नारायण दिव्य नाम से यह अर्थ जुडा है )
अरिंदोर्क्कु – जिन्को इसकी ज्ञान है
एकान्तं इल्लै – उन्हें अकेलापन नहीं हैं
इरुळ इल्लै – नहीं ही है अंधकार
मोकांतर – “मोहांत तमसासवृत्त:” वचनानुसार साँसारिक विषयों से अँधा हुए लोगों को कुछ नज़र नहीं आता है और वे सोचते है कि
इव्विडम येकांतम इरुळ एन्ड्रु – यहाँ किसी के न होने के कारण, यह एक सूना जगह है
भयं अट्र इरुंदु – निर्भय रहेंगे और
सेयवारगळ ताम – और अपने अज्ञान के कारण , करते रहेंगें
पावत्तिरम – अधिक से अधिक पाप

सरल अनुवाद
इस पासुरम में मामुनि दो तरह के लोगों में अंतर कि विवरण देतें हैं। पहले गण के लोग सर्वत्र, प्रकाशमान श्रीमन नारायण को देखतें हैं। अत: इस तरह के व्यक्तियों का ऐसा समय ही नहीं होता है जब वे श्रीमन नारायण के सान्निध्य को महसूस नहीं करतें हैं। और परमात्मा के प्रकाशमय होने के कारण उन्को अंधकार भी दिखाई नहीं देतीं है। इसके विरुद्ध कई ऐसे जन हैं, जिन्को यह दृश्य नहीं हैं और जिन्हें लगता है कि वे अंधकार में अकेले हैं। इससे वे अनेक पाप करतें हैं जो ही उन्की अपकर्ष कि कारण बन जाति हैं।

स्पष्टीकरण
नम्माळ्वार तिरुवाय्मोळि १. १०.८ पासुरम में “सेल्व नारणन” दिव्य नाम का उपयोग किये। वें पेरिय पिराट्टि श्री महालक्ष्मि के दिव्य पति हैं। वे हर चित और अचित जीव के अंदर और बाहर व्यापित हैं। “नारायणन” दिव्य नाम का यहीं सारार्थ हैं। श्रीमन नारायण के सर्वव्यापी होने के इस कल्याण गुण कि ज्ञान कुछ व्यक्तियों को हैं। “नारायण परंज्योति:” (नारायण सूक्तं ४ ), “पगल कंडेन नारणनै कंडेन” (इरँडाम तिरुवन्दादि ८१), “अवन एन्नुळ तान अर वीट्रिरुंदान” (तिरुवाय्मोळि ८.७.३) जैसे पंक्तियों के अनुसार, इन व्यक्तियों को प्रकाशमान श्रीमन नारायण सर्वत्र दृश्य हैं। वें कभी अकेलापन और अंधकार महसूस नहीं करतें हैं। वे अपने जैसे मित्रों के समूह में ही रहते हैं। हमेशा अच्छे संगत में रहने के कारण वे निर्भय भी रहते हैं। “हृति नारायणं पश्यनाप्य कच्छत्रहस्ता यस्वतारधौछापि गोविन्दं तम उपास्महे” (विष्णु पुराणम) के अनुसार यह लोग कभी भी कहीं भी अंधकार नहीं देखतें हैं।
आगे प्रस्ताव किये गए व्यक्तियों के विपर्यय में “मोहान्तक” माने जाने लोग हैं। “मोहांत तमसा वृत्त:” के अनुसार इन लोगों के कथित अंधकार के कारण, इनमें आगे आने वाले विषयों को देखने कि सामर्थ्य नहीं हैं। इसको यतिराज विंशति के १२वे श्लोक में “अंतर बहिस सकल वस्तुषु संतमीसम अंद: पुरःस्थितमीवहमवीक्षमाण:” से विविरित किया गया है। अर्थात, श्रीमन नारायण, अनादि काल से निरंतर प्रकाशमान होते हुए, हर एक चित और अचित जीव के बाहर और अंदर एक समान व्यापित हैं। जो परमात्मा को अपने आन्तरिक आँखों से नहीं देखते, उनका अनुभव विपरीत होता है। उन्को किसी भी जगह में उपस्थित विषयों और लोगों को छोड़ केवल अंधकार ही दिखतीं है। इससे निर्भय होकर, वें “तस्यान्ति केत्वं व्रजिनं करोषि” के अनुसार अनेक पाप करतें हैं। मामुनि को एहसास होता हैं कि श्रीमन नारायण को न देखने वालोँ कि यही स्थिति है।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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