आर्ति प्रबंधं – ३७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

वरवरमुनि कल्पना कर रहें हैं कि श्री रामानुज स्वामी उन्हे कुछ बता रहे हैं । यह पासुर, श्री रामानुज स्वामी की यह सोच, का उत्तर स्वरूप है । श्री रामानुज स्वामी कहतें हैं , “हे ! वरवरमुनि ! आप इन्द्रियों के बुरे असर से डरे हुए हैं । चिंता न करें । इन्द्रियों  और पापों के प्रभाव से मैं आपकी रक्षा करूंगा । किन्तु इस सांसारिक लोक में आपको रखने का कारण यह हैं – “ आर्ति अधिकार पूर्तिकेन्नूमदु मुख्यं ”, वचन के अनुसार आर्ति (स्वारस्य) और अधिकार (मुक्त होकर परमपद पधारने कि योग्यता) पाने पर मैं निश्चित आपको परमपद पहुँचाऊँगा । तब तक आपको यहाँ रहना हैं । उत्तर में वरवरमुनि कहते हैं, “ हे ! श्री रामानुज स्वामी ! अब तक मेरी कोई भी योग्यता नहीं रहीं हैं । भविष्य में क्या योग्यता आएगी ? आप स्वयं इन योग्यताओं को मुझमें क्यों उत्पन्न नहीं करतें ? परमपद तक पहुँचने में आने वाले विरोधियों का नाश कर, आप ही मुझे योग्य क्यों नहीं बनातें ?

पासुर ३७

इन्रळवुम् इल्लाद अधिकारम् मेलुम् एनक्कू

एनृ उळदाम् सोल्लाय् एतिरासा

कुन्रा विनैत्तोडरै वेट्टिविट्टु मेलै वैकुंतत्तु

एन्नै कडुग येट्राददु येन् ?  

शब्दार्थ

सोल्लाय  – (हे एम्पेरुमानार) कृपया यह बतायें

इन्रळवुम् – अब तक

इल्लाद अधिकारम् – (परमपद जाने कि मेरे पास) योग्यता नहीं है

मेलुम् – (इस स्तिथि में) अब से

एनक्कु  – मेरे  लिए

एनृ उळदाम् – कब होगा ? होगा क्या? (इतने जन्मों से न होने के कारण) मुझे कब परमपद पहुँचने की योग्यता मिलेगी क्या?

ऐतिरासा – हे एम्पेरुमानार !

येन् ?-  क्यों आप

कडुग एन्नै येट्राददु – शीग्र मुझे ले न जाते

मेलै  – सर्वश्रेष्ठ

वैकुंतत्तु – परमपद तक

वेट्टिविटु – काटकर निकालें  

कुन्रा  –  न घटने वाले

विनैत्तोडरै – पापों के बंधन को

सरल अनुवाद

इस पासुर में वरवरमुनि, (इन) अघटित पापों का संग्रह को नाश न करने का कारण, श्री रामानुज स्वामी से पूँछते हैं । परमपद तक शीग्रता से न ले जाने का भी कारण पूँछते हैं। वरवरमुनि का मानना हैं कि, अगर योग्यता ही कारण है तो उन्हें परमपद पहुँचने कि योग्यता कभी भी नहीं थीं और नहीं मिलने वाली हैं । वरवरमुनि श्री रामानुज स्वामी से प्रश्न करतें हैं कि भविष्य में यह योग्यता कैसे प्राप्त किया जा सकता हैं ?

स्पष्टीकरण

वरवरमुनि कहतें हैं, इनृ तिरुनाडुमेनक्करुळाय् वचनानुसार, अब तक अनुपस्थित (परमपद पधारने कि) योग्यता भविष्य में कैसे आएगा ? हे रामानुज ! तोलमावलविनै तोडर्  के अनुसार मेरे पापों के बंधन घटते नहीं और परमपद प्राप्ति के पथ में विघ्न हैं । इन पापों को नाश कर, मेलै वैकुंतत्तिरुत्तुम (तिरुवाय्मोळी ८.६.११) से वर्णित परमपद जिसमें मुझे अत्यंत स्वारस्य (आर्ति) है, वहाँ क्यों नहीं ले जातें? अज्ञान से पीड़ित इस लोक से आप मुझे तुरंत क्यों नहीं ले जाते ? इस विषय में दुर्बल हूँ और आप ही नियंता हैं? फिर भी आप यह कार्य क्यों नहीं करतें ?

अडियेन् प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/02/arththi-prabandham-37/

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