ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३१

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३०                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३२

पाशुर-३१

Ramanujar-Melkote

वेदमोरू नान्किन उट्पोदिन्द मेय्प्पोरूलुम
कोदिल मनु मुदल नूल कूरूवदुम तीदिल
सरणागति तन्द तन इरै वन ताले
अरणागुम एन्नुम अदु

प्रस्तावना:

यह पाशुर यह समझाता हैं कि हमारे आचार्य हीं हमारे लिये सबकुछ हैं। सभी तत्त्वों का अर्थ जो सभी वेदों और अन्य ग्रंथों में बताया गया हैं वह और कुछ नहीं पूर्ण समर्पण कि राह हैं (शरणागति)। शरणागति का यह अर्थ किसी व्यक्ति को उसके आचार्य हीं समझाते हैं। अत: अपने आचार्य के चरण कमलों को हीं हमें सबकुछ समझना चाहिये। इसे इस पाशुर में समझाया गया हैं।

अर्थ:

तीदिल: – निर्दोष को | सरणागति – भगवान श्रीमन्नारायण के पूर्ण शरण होना | तन्द – वह जिसने यह दिखाया हैं वह और कोई नहीं | तन इरै वन – उसके आचार्य हीं हैं, जिन्होंने उसे शरणागति कि राह बतायी। वह उसके भगवान हैं। ऐसे आचार्य के | ताले: चरण कमल |अरणागुम: किसी व्यक्ति के शरण या उपाय हैं। एन्नुम अदु: शरणागति शास्त्र जो यह कहता हैं और | ओरुणाङ्गुवेधं: अनोखे और अद्भुत वेद जिसमे ऋग, यजुर, साम और अथर्व शामील हैं | ट्पोदिन्द: वह वस्तु जो वेदों से भरा हैं | मेय्प्पोरूलुम: सच्चा और भितरी मतलब | कोदिल: निर्दोष का | मनु मुदल नूल: शास्त्र जैसे “मनुशास्त्र” आदि। कूरू वदुम: वह विचार जो “मनुशास्त्र” जैसे शास्त्रों में कहा गया हैं | अधुवे: वह और कुछ नहीं बल्कि अपने आचार्य के चरण कमलों के शरण होना।

स्पष्टीकरण:

वेदमोरू नान्किन उट्पोदिन्द मेय्प्पोरूलुम: “ओरु” पद यहाँ वेदों के अद्भुत गुणों को समझाता हैं, यानि उन्हें इंसान ने नहीं बनाया। उन्हें किसी ने लिखा नहीं हैं और बिना शंका, संदेह और उलझन के हैं। उनमें बेचने के हीसाब से भी कोई फेरबदल नहीं किया गया हैं।

उपर के पद में “नांगु” यानि चार हैं इसलिये वह चार वेदों को यानि ऋग, यजुर, साम और अथर्व वेदों को संभोधीत” करता हैं। किसी भी वस्तु को सुरक्षित और दृढ़, कसा हुआ रखने के लिये उसे आठ छोटे धागे वाले रस्सी से बाँधते हैं। उसी तरह तिरुमन्त्रं जिसमें आठ अक्षर हैं वह भगवान श्रीमन्नारायण को अपने में सुरक्षित और दृढ़ बाँध कर रखता हैं। यह “अष्टाक्षर मन्त्रं” सभी वेदों में अंतर्निहित हो गया हैं और अदृश्य हैं (यह देखने को बहुत अच्छा हैं कि तिरुचंधविरुत्तं कहते हैं “एट्टीनोदुमिरण्देनुंकैरिनालनंथनैकट्टि”)। वेद (जो सब को नापता हैं) के शब्द सभी ग्रन्थों से उच्च हैं और उसका कार्य है की जो अंतिम भगवान श्रीमन्नारायण के बारें में ही बात करता हैं उसे “गुप्त” रखते हैं। क्योंकि वेदों को “चार” भागों में बांटा गया हैं वह यह प्रमाण करता हैं कि यह कुछ और नहीं जो कि वेद के एक कोने में एक साथ रखा गया हैं। वह यह बताता हैं कि वेद जिसे अनगिनत भागों में बांटा गया हैं उसका अभिप्राय और कुछ नहीं बल्कि अष्टाक्षर मन्त्रं हैं। और इस मंत्र का अर्थ सभी को बटोरने के लिये ऊपर नहीं रख्खा गया हैं। उसको धन कि तरह संभालकर रखा गया हैं क्योंकि वहीं अंतिम भगवान श्रीमन्नारायण हैं। “मेय्प्पोरूलुम” पद का अर्थ “सच्चा भितरी”। वह एक कदम आगे बढ़कर कहता हैं कि वेद उस अंतिम वस्तु कि केवल बढ़ाई नहीं करते परन्तु भगवान श्रीमन्नारायण के सच्चे गुण को कहते हैं।

कोदिल मनु मुदल नूल कूरूवदुम: “कोदु” दोष हैं और इसलिये “कोदिल” का अर्थ हैं वह जो दोषरहित हैं। यहा जो दोष दर्शाया गया हैं वह वों दोष हैं जब एक विशेष वस्तु को उसके मूल से दूसरे तरीखें से बताया गया हो और उसके मूल से तरंगे और मनोगतियों को पहचान कर उसे उभारा गया हो। उदाहरण के तौर पर अगर किसिको सागर में शंख दिखा है तो उसे यह कहना पड़ेगा कि उसने शंख देखा हैं। परन्तु अगर वह केवल आकर्षण के लिये यह कहता हैं कि उसने चांदी देखी हैं तो वह बयान एक झूठा बयान होगा। मनु शास्त्र एक ऐसा शास्त्र हैं जो दोष रहित हैं। “कोदिल” विशेषण “मनुशास्त्र” के लिये हीं इस्तेमाल किया गया हैं जिसका यह समझना हैं कि जो मनु जो भी कहता हैं वह औषधि हैं। ऐसा मनुशास्त्र कि बढाई का परिणाम हैं। इसलिए किसी को भी मनुशास्त्र में कोई भी अनुसंधान करने कि जरूरत नहीं हैं चाहे हम उसका शब्दशः ले और या फिर अपने जीवन में उतारे। यह विशेषण “कोदिल” जब दुसरें ग्रन्थों को योग्य करने के लिये इस्तेमाल किया जाता हैं तब उन ग्रन्थों में जो सम्बन्ध हैं उनकि बढाई का पता चलता हैं और अन्त में उसकी प्रतिष्ठा को सहारा देता हैं। वह यह कहने के लिये कि यह ग्रन्थ हमें कोई भ्रम या उपाय आचरण के बारें में नहीं कहता हैं। ऐसे ग्रन्थ में इतिहास जैसे सात्विकस्मृति, श्रीविष्णुपुराण, श्रीमदभागवत, महाभारत और आगमास जैसे पञ्चतन्त्रं आदि शामील हैं। उपर बताये हुए ग्रन्थों में हमें यह मतलब समझाता हैं जो “अष्टाक्षर मन्त्रं” के खजाने में हैं जो वेदों का हृदय हीं बनाता हैं। वह धन जिसे खजाने के जैसे रखा हैं वह और कुछ नहीं शरणागति कि राह हैं और मनु जैसे ग्रन्थों का यह कर्तव्य हैं कि इस अर्थ को स्पष्ट रूप से और निर्मलता से कहें। इसका तात्पर्य यह हैं कि शरणागति कि राह वेदों कि कठिन बातों से और मनुशास्त्र जैसे ग्रन्थों से आती हैं।

तीदिल सरणागति तन्द:- “तीदु” का अर्थ दोष हैं और इसलिये “तीदिल” का अर्थ हैं दोषरहित। शरणागति कि राह तो दोषरहित हैं। जिन ग्रन्थों में हमें शरणागति क्या हैं यह बताया हैं उन्हीं ग्रन्थों के अन्य अध्याय में शरणागति के अलावा अन्य राह के न्यूनता बताता हैं जैसे कर्म योगं, ज्ञान योगं, भक्ति योगं आदि। यह अन्य राह हर कोई नहीं कर सकता हैं। कुछ हीं लोग इसे करने के लिये योग्य हैं। जो योग्य हैं वह भी सभी इन अन्य राह को कर नहीं पाते जो यहाँ बताया गया हैं। अगर कोई इन इतर राह में बाताये के अनुसार नहीं रहता हैं तो उसे वह कहीं नहीं ले चलता हैं। क्योंकि हमारे पास सबसे सुलभ मार्ग हैं “शरणागति” इसलिये हमें कोई अन्य राह पर चलाने कि कोई जरूरत नहीं हैं। इस शरणागति के राह में कोई दोष नहीं देख सकता हैं जहां भगवान श्रीमन्नारायण से सीधा सम्पर्क हैं। यह उसकी सबसे उच्च योग्यता हैं जैसे कि भगवद्विशयमं के अनुसार “प्रपत्ति” शब्द खुद बताता हैं कि वह “ईश्वर” (श्रीमन्नारायण) हैं। यह सुलभ मार्ग हमें हमारे आचार्य ने दिया हैं जैसे कि एक गरीब को हमेशा के लिये जीवन का आनंद लेने के लिये बहुत सा धन दिया गया हो। ऐसी शरणागति का राह हमको हमारे आचार्य ने दि हैं।

तन इरै वन: ३०वें पाशुर में, जिन्होंने हमें अष्टाक्षर महामन्त्रं समझाया (एत्तेझुतुंथंधवने) हैं उन्हें हीं हमारे आचार्य बताया गया हैं। इस पाशुर में उन्हें हमें जिसने शरणागति (शरणागतिथंधवं) दिया हैं ऐसा बताया हैं। इससे हम यह समझ सकते हैं अष्टाक्षर महामन्त्रं के अर्थ और शरणागति के अर्थ में भेद हैं। इस पाशुर में इसे गुप्तानिय रूप से “शरणागति” ऐसा समझाया गया हैं और पिछले पाशुर में इसे स्पष्ट रूप से “आठ अक्षरों” वाला मन्त्र बताया गया हैं। तीन मुख्य मन्त्रं हैं वह तिरुमन्त्र, द्वयमन्त्र और चरमश्लोक। तिरुमन्त्र और चरमश्लोक में हमारे पूर्वजो कि यह प्रथा रही हैं कि मन्त्र के अर्थ को गुप्तनिय रखना और मन्त्र को स्पष्ट रूप से कहे। और द्वयमन्त्र के सम्बन्ध में जो शरणागति कि बात करता हैं वें नाहीं उसके अर्थ को छिपाते थे बल्कि उस मन्त्र को भी सब के सामने न बोलकर वह केवल उसे अपने हृदय में हीं बोलते थे। इससे हम यह जान सकते हैं कि उस मन्त्र जिसे द्वयमन्त्र कहते हैं उसमें कोई विशेष बहुमूल्य बात हैं। इसके बारें में कहते हुए श्रीवेदान्तदेशिक स्वामीजी द्वयमन्त्र के बारें में यह कहते हैं कि हर कोई भगवान के सुन्दर और पवित्र विग्रह, पवित्र गुणों, परमात्मा के गुणधर्म, उनके अनगिनत लक्षण,हमेशा खुश रहने वाले नित्यात्मा, मुक्तामा आदि के बारें में सीख सकता हैं। फिर भी अगर कोई व्यक्ति शरणागति कि राह का पालन करता हो और अगर वह भगवान श्रीमान्नारायण के परम धाम जाना चाहता हो तो द्वयमन्त्रं अपने आप को स्पष्ट बनाता हैं जैसे सुन्दर रूप और वह उस व्यक्ति को आनंददायक करता हैं। यह सब सीधे रूप से शरणागति मन्त्र के परम बढाई कि तरफ नोक करता हैं जो द्वयमहामन्त्रं के अन्दर हैं। ऐसा द्वयमहामन्त्रं वह हैं जो एक शिष्य को उसके आचार्य ने पढाया हैं। अत: आचार्य जिन्होंने किसी शिष्य को द्वयमहामन्त्रं कि शिक्षा दि हैं वह उस व्यक्ति के लिए सर्वोत्तम भगवान हैं। “इरै वन” के पहिले “तन” का प्रयोग करने का अर्थ हैं कि जैसे भगवान श्रीमन्नारायण हीं सब के लिये भगवान हैं हमारे लिये “आचार्य” हीं भगवान हैं। वह एक व्यक्ति के लिये या फिर कुछ व्यक्तियों के लिये भगवान हैं। भगवान कि बात “तन” के प्रयोग में छिपा हैं।

ताले: आचार्य के चरण कमल जो एक व्यक्ति के लिये भगवान हैं। अगर केवल हम “ताले” शब्द को देखें तो हम यह समझ सकते हैं कि जिन्होंने भगवान को पकड़ रखा हैं और जिन्होंने आचार्य को पकड़ रखा हैं उनके लिये उनके चरण कमल हीं शरण / उपाय हैं। “ताले” शब्द में “एकाराम” शब्द हैं जिसका यह मतलब हैं कि आचार्य के चरण कमलों को और किसी कि मदद कि जरूरत नहीं हैं। वह अपना काम खुद हीं कर लेंगे।

अरणागुम एन्नुम अदु: “अरण” यानि शरण; केवल आचार्य के चरण कमल हीं किसी व्यक्ति के लिये उपाय हैं। “इरैवन” शब्द के लिये तीन साधारण / जातिगत अर्थ हैं वह हैं नेतृत्व, राह और लाभ। “इरैवन” वह हैं जिसमें यह तीन हैं। परन्तु “तन इरैवन” में आचार्य के चरण कमल हीं किसी व्यक्ति के लिये मार्गदर्शक हैं। वहीं चरण कमल किसी के लिये राह हैं और वहीं चरण कमल किसी व्यक्ति के लाभ का कार्य करती हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-31-vedham-oru-nangin/

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