ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३०

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २९                                                      ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३१

पाशुर-३०

ramanuj

 माडुम मनैयुम मरै मुनिवर
तेडुम उयर वीडुम सेन्नेरियुम
पीडुडैय एट्टेलु त्तम तन्दवने एन्रि रादार उरवै
विट्टिडुगै कण्डीर विदि

 प्रस्तावना: इस पाशुर में श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी शास्त्र कि एक बात समझाते हैं कि हमें किसी भी तरह के लोगों से कैसे रिश्ता रखना चाहिये यह निश्चित करना चाहिए। यह वें लोग हैं जो यह विचार भी नहीं करते हैं कि जो धन उन्होंने अपने जीवन के लिये जोड़ा हैं, वह अपने भविष्य के लिये और वह कुछ नहीं बल्कि अपने आचार्य द्वारा बताया हुआ आठ अक्षरों वाला अष्टाक्षरमन्त्र (मूलमंत्र) (तिरुमन्त्र) हैं।

 अर्थ:

माडुम: गाय जो दूध उत्पन्न करती हैं, | मनैयुम: घर जो खुशियाँ का पालन पोषण करता हैं,

किलयुं: सम्बन्धी | मरै मुनिवर तेडुम: वह जो साधु माँगते हैं वह और कुछ नहीं परन्तु

उयर वीडुम: बस एकहीं परमपदधाम हैं और अन्त में | सेन्नेरियुम: श्रेष्ठ मार्ग (अर्चिरादिक) जो हमें सबसे निराला परमपदधाम पहुँचाता हैं, यह उपर बताई गयी बातें और कुछ नहीं बल्कि | तन्दवने: प्रत्येक के आचार्य हैं जिन्होंने यह मतलब बताया | पीडुडैय: विशेष

एट्टेलु त्तम: अष्टाक्षरमन्त्र (मूलमंत्र) यानि “तिरुमन्त्र”| एन्रि रादार: लोग यह विचार करते हैं उपर कि हुई बातें और कुछ नहीं बल्कि उनके आचार्य कि | उरवै: हमारा उनके साथ सम्बन्ध किसी भी तरह ऐसा होना चाहिये कि | विट्टिडुगै: किसी भी लक्षण के सिवाये त्यागना।

विदि: यह शास्त्र का एक आदेश हैं | कण्डीर: कृपया इस आज्ञा को देखिये और इसके महत्त्व को समझिये।

 

स्पष्टीकरण:

माडुम: “माडु” गय्यों को दर्शाता हैं। यहाँ श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह समझाते हैं कि गाय वह हैं जो बहुत अधिक मात्रा में स्वादिष्ट दूध, दही और पौष्टीक वस्तुएं देती हैं। वह इतने बहुमूल्य वस्तुएं देने कि वजह से गाय को धनकोष किया जाता हैं और अपने आप में ही उसे धन भी मानते हैं। बहुत सी गाय होने का सीधा साधा मतलब हैं कि वह धनवान हैं।

मनैयुम: एक घर जो किसी एक के जीवन में पूरी खुशी का स्त्रोत / नींव की तरह निभाता हैं।

किलयुं: यह उन सम्बन्धीयों को शामील करता हैं जो यह सोचते हैं कि आनन्द और भाग्यवान होने के लिये एक होकर रहना हैं। जीवन के पोषण और खुशी के लिये तीन वस्तु गाय, घर और सम्बन्धी कि जरूरत हैं।

मरै मुनिवर: वेद में साधु हीं अधिकारी हैं। ये वों हैं जो भगवान श्रीमन्नारायण के बारें अपने चित्त और हृदय में निरन्तर सोचते रहते हैं।

तेडुम उयर वीडुम: खोजने कि क्रिया को “तेडु” कहते हैं और इसलिए “तेडुम उयर वीडुम” का अर्थ हैं परमपदधाम जो कि खोजा गया और अनुसंधान किया गया और वह अंतिम जगह जहाँ कोई भी जा सकता हैं। क्योंकि “उयर” का अर्थ “उच्च” हैं “उयर वीडुम” यह समझाता हैं कि वहाँ एक और “न्यूनतम” वस्तु हैं । यह और कुछ नहीं “कैवल्यं” जो और कुछ नहीं अपने ही आत्मा का सदैव के लिये आनन्द उठाना और परमात्मा के आनन्द को नाकारना है। हमारे पूर्वाचार्य इस तरह के “कैवल्यं” को छोटा मानते हैं। क्योंकि यह ऐसा हैं जिसे छोड़ना ही पड़ेगा इसीलिए स्वामीजी श्री देवराज मुनि परमपदधाम को कैवल्यं से भेद करने के लिये विशेषण पद “उयर” (उच्च) वीडुम पद के सामने इस्तेमाल करते हैं और परमपदधाम को दर्शाते हैं। क्योंकि “सिरुवीड़ुम” का अर्थ कैवल्यं हैं और सभी अनिश्चयता को साफ करने के लिये विशेषण पद “उयर” को “वीडुम” पद के सामने लगाया गया हैं।

सेन्नेरियुम: जब कोई आत्मा भगवान के परमपदधाम पहुँच जाता हैं उसका अर्थ यह हैं कि उसको मोक्ष प्राप्त हो गया या वह मुक्त हो गया हैं। “परमपदधाम” जाने की राह तो “अर्चिरादि” हीं हैं। यह राह लक्ष्य की तरह हीं महान हैं। और दूसरे शब्दों में “सेन्नरि” खुद भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाने के दूसरे साधनों को भी शामील कर सकता हैं। प्रपन्नों (वह जिसने शरणागति कर ली हो) के इसमें खुद श्रीमन्नारायण हीं जरिया हैं।

पीडुडैय एट्टेलु त्तम तन्दवने एन्रि रादार उरवै: “उरवै” एक सम्बन्ध हैं। यहाँ श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कुछ खास लोगों से सम्बन्ध के बारें में बात कर रहे हैं। ये लोग यह बात नहीं जान सकते हैं कि जिन गुरू ने उन्हें अष्टाक्षर मन्त्र बताया हैं वें हीं उनके लिये सब कुछ हैं। जो एक व्यक्ति दूसरों को सुख देते समय असल में गाय, घर और संबंधी सभी सांसारिक दुखो को पाया हैं। यह सभी दुखों का एक ही औषधी हैं आठ अक्षरोंवाला अष्टाक्षर मन्त्र जिसे “तिरुमन्त्रं” कहते हैं जो हमें यह सिखाता हैं कि सभी वस्तु का लाभ सांसारिक और स्वर्गीय हैं। तिरुमन्त्र हमें सबसे उच्च भगवान श्रीमन्नारायण के तिरुमाली जाने की राह भी बतायेगी। ऐसे तिरुमन्त्रं को तो हर एक के आचार्य हीं सीखा सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति का किसी ऐसे व्यक्ति के साथ सम्बन्ध हो जो यह समझ नहीं सकता हैं कि सबकुछ आचार्य हीं हैं जिन्होंने हमें तिरुमन्त्रं सिखाया हैं तो शास्त्र के अनुसार ऐसे व्यक्ति के साथ सम्बन्ध तुरन्त छोड़ देना चाहिये।

विट्टिडुगै: एक कण भी शंका या सवाल रखते हुए उसे छोड़ा देना चाहिये।

विदि: यह शास्त्र कि आज्ञा हैं।

कण्डीर: आपको यह मालुम रहने दो!!! आप यह सच्चाई देख लीजिये!!! आप इसे पा लीजिये और समझ लीजिये!!! अत: किसी को भी ऐसे लोगों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये जिसने अपने आचार्य से सम्बन्ध नहीं रखा हो। वह एक हीं क्षण में ऐसे लोगों से रिश्ता तोड़ देना चाहिये।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-30-madum-manayum/

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