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आर्ति प्रबंधं – ५२

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५१

 

उपक्षेप

मामुनि कहतें हैं कि, श्री रामानुज के असीमित कृपा के कारण उन्हें (मामुनि को) अपने व्यर्थ हुए काल कि अफ़सोस करने का मौका मिला।  आगे इस पासुरम में वें ,श्री रामानुज के कृपा की फल के रूप में ,पेरिय पेरुमाळ अपने तरफ पधारने कि अवसर को मनातें हैं। “श्रीमान समारूदपदंगराज:” वचनानुसार पेरिय पेरुमाळ के अपने ओर पधारने कि अवसर कि विवरण देतें हैं।  

पासुरम ५२

कनक गिरि मेल करिय मुगिल पोल

विनतै सिरुवन मेरकोंडु

तनुविडुम पोदु एरार अरंगर एतिरासरक्काग एनपाल

वारा मुन्निर्पर मगिळंदु  

शब्दार्थ

करिय मुगिल पोल –  बादलों के जैसे , जो मँडराते हैं

कनक गिरि मेल –  “मेरु” नामक सुनहरे पर्वत के ऊपर

अरंगर – पेरिय पेरुमाळ

सिरुवन – “वैनतेयन” तथा “पेरिय तिरुवडि” नामों से प्रसिद्द जो हैं उन्के ऊपर आने वाले , जो पुत्र हैं

विनतै  – विनता के

मेरकोंडु –  विनतै सिरुवन वाहन होने के कारण पेरिय पेरुमाळ उनमें सवार होकर आएँगे

तनुविडुम पोदु – जब मेरा शरीर गिरेगा

अरंगर – पेरिय पेरुमाळ जो हैं

आर – भरपूर

येर – सौँदर्य तथा गुणों से

एनपाल वारा – आएँगे मेरे जगह

एतिरासरक्काग  – यतिराज केलिए

(जैसे एक माँ आती हैं)

मुन्निर्पर – वें मेरे सामने खड़े होँगे

मगिळंदु – अत्यधिक ख़ुशी के सात

(पेरिय पेरुमाळ पधारेंगे, अपना दिव्य चेहरा दिखाएँगे, मुस्कुरायेंगे और मुझे भोग्य रूप से अनुभव करेंगे, यह निश्चित है )

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मामुनि अपने अंतिम स्थिति में पेरिय पेरुमाळ के पधारने कि सुन्दर दृश्य की विवरण देकर, ख़ुशी मनातें हैं।  वे कहतें हैं कि पेरुमाळ, “विनतै सिरुवन”, “पेरिय तिरुवडि” एवं नामों से प्रसिद्द अपने वाहन में पधारेँगे। मेरे पास आकर वें मुस्कराहट से अलंकृत अपने सुँदर दिव्य मुख दिखाएँगे। और यह सब वें एम्पेरुमानार केलिए करेँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “काँचनस्प गिरेस् श्रुंघे सगटित्तो यधोयधा” और “मंजुयर पोनमलै मेल एळुंद मामुगिल पोनड्रुलर (पेरिय तिरुमोळि ९.२.८) वाख्यो के जैसे सुनहरे पर्वत “मेरु” के ऊपर काले बरसात के मेघ मँडराते हैं। उसी प्रकार मेरे इस पृथ्वी के बंधनों से विमुक्त होने के समय पर, “पेरुम पव्वम मँडियुन्ड वयिट्र करुमुगिल” (तिरुनेडुंताँडगम २४) में चित्रित किये गए उस रूप में पेरिय पेरुमाळ गरुड़ में सवार पधारेंगे। विनता के पुत्र होने के कारण गरुड़ “पेरिय तिरुवडि” तथा “विनतै सिरुवन” भी कहलातें हैं। मेरे इस शरीर से निकलने के समय, पेरिय पेरुमाळ  एक माता के समान प्रेम के संग आएँगे।। सौंदर्य से भरपूर भगवान्, संतोष ,अपने दिव्य मुख में मुस्कराहट के संग, मेरे यहाँ, श्री रामानुज केलिए आएँगे। यह निश्चित हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ५१

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५०

उपक्षेप

एम्पेरुमानार विचार करतें हैं, “ तुम्हें अन्य तुच्छ विषयों के बारे में बात करने की क्या आवश्यकता हैं? इस्से पूर्व तुम्हारी स्थिति क्या थी?”. इस्के उत्तर में मामुनि कहतें हैं, “ मैं भी उन्हीं लोगों के तरह अनादि कालों से अपना समय व्यर्थ करता रहा और उसके कारण जो भी मुझे नुक्सान हुआ, उसका मुझे पछतावा नहीं हैं।  इस स्थिति में , आप के ही कृपा के कारण मुझे अपने नुक्सान का एह्सास हुआ है,” यह कहकर मामुनि अपने लाभ के बारे में बात करतें हैं।

पासुरम ५१

एंरुळन ईसन उयिरुम अन्रे उंडु इक्कालम एललाम

इन्रळवाग पळुदे कळिंद इरुविनैयाल

एड्रु इळविंरी इरुक्कुम एन्नेंजम इरवु पगल

निंरु तविक्कुम ऐतिरासा नी अरुळ सेयद पिन्ने

शब्दार्थ :  

एंरुळन ईसन – “ नान उन्नै अंरि इलेन कंडाय नारणने नी एन्नै अंरी इलै”(नानमुगन तिरुवंदादि ७) के अनुसार परमात्मा श्रीमन नारायण और जीवात्माओं के मध्य उपस्थित संबंध नित्य है और कभी किसी से टूटा नहीं जा सकता है।  इस्का अर्थ है, सर्वोत्तम नियंता नित्य हैं। उसी तरह ,

उयिरुम – नियंता श्रीमन नारायणन से नियंत्रित जीवात्मा

अन्रे उंडु – भी अनंत है

इक्कालम एल्लाम – इस सारा समय  

इन्ड्रळवाग – अब तक

इरुविनैयाल  – मेरे शक्तिशाली कर्मा के कारण ( अच्छे और बुरे )

पळुदे कळिंद एन्ड्रु  – इस समय को मैं अत्यंत व्यर्थ समझता हूँ

इळविंरी इरुक्कुम  – और इससे भी बुरा , इस नुक्सान केलिए मुझे कभी अफ़सोस भी नहीं हुआ हैं

एतिरासा – ( फ़िर भी)हे  एम्पेरुमानार!

नी अरुळ सेयद पिन्ने  – मेरे ऊपर आपके कृपा बरसाने के पश्चात

एन्नेंजम – मेरा हृदय

निंड्रु – धीरे से

तविक्कुम – पचताना शुरू किया

इरवु पगल – दिन और रात

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि श्री रामानुज के आशीर्वाद कि गुणगान करतें हैं, जिसके कारण ही वे (मामुनि) अब तक व्यर्थ हुए समय केलिए पछतातें हैं।  अनादि कालों से अब तक किये गए समय व्यर्थ का ,अब श्री रामानुज के आशीर्वाद के पश्चात मामुनि बहुत पछताते हैं।

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “ तिरुमळिसै आळवार के (नानमुगन तिरुवंदादि ७) शब्दों में : नान उन्नै अंरि इलेन कंडाय नारणने नी एन्नै अंरि इलै”, परमात्मा श्रीमन नारायण और जीवात्माओं के मध्य जो बंधन है वह नित्य है और कभी किसी से टूट नहीं सकता है। इसका अर्थ है सर्वोत्तम नियंता श्रीमन नारायण नित्य हैं।  और इस से पता चलता है कि, नियंत्रित जीवात्मायें भी नित्य हैं। और इससे पता चलता है कि इन्का सृष्टि का कोई दिनांक नहीं, श्रीमन नारायण और सारे जीवात्मायें हमेशा केलिए हैं। परंतु अत्यंत कृपा से किये गए आपके (एम्पेरुमानार) आशीर्वाद के भाग्य के पहले मैं अपना सारा वक्त मेरे कर्मों के फलों के अनुभव में व्यर्थ करता था। और इस व्यर्थ हुए समय का मुझे अफ़सोस भी न था।  लेकिन आपके कृपा से मैं अब अपने नुक्सान के बारे में ही दिन और रात सोचता हूँ और पछताता हूँ। आपके अत्यंत कृपा की जय हो।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ५०

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४९ 

 

उपक्षेप

पिछले पासुरम में श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों में शरणागति करने केलिए तैयार हुए लोगों को, मामुनि इस पासुरम में और एक महत्वपूर्ण उपदेश देतें हैं: जब श्री रामानुज के दिव्य नाम को जप करने से सबसे सर्व श्रेष्ट निधि प्राप्त हो सकती हैं, तो यह जन तुच्च व्यवहारों में समय क्यों बिताते हैं ?

पासुरम ५०

अवत्ते अरुमंद कालत्तै पोक्कि अरिविनमैयाल

इप्पवत्ते उळलगिंर पावियरगाळ पलकालम निनृ

तवत्ते मुयलबवर तंगगटकुम एयदवोण्णाद

अन्द तिवत्ते उम्मै वैक्कुम सिंदियुम नीर ऐतिरासरेंरु

 

शब्दार्थ:

पावियरगाळ – हे ! पापियों !

अरिविन्मयाल – अज्ञान से

उळलगिंड्र – ( आप लोग) जी रहें हैं

इप्पवत्ते – इस साँसारिक दुनियाँ में

अवत्ते पोक्कि – व्यर्थ करते हैं

अरुमंद कालत्तै  – वह अमूल्य काल जब श्री रामानुज के दिव्य नाम आसानी से जप तथा  ध्यान किया जा सकता था।

अन्द तिवत्ते  – श्रुतियों से “परम व्योम:” के नाम से विवरित किये गए परमपद  

एयदवोण्णाद – ऐसा जगह जो प्राप्त नहीं होता

मुयलबवर तंगगटकुम – उनको भी जो अत्यंत प्रयत्न करतें हैं

तवत्ते – तपस से

नीर – आप लोग

पलकालम – हर समय

निड्रु  – एकाग्र धारणा के संग

ऐतिरासरेंरु सिंदियुम – श्री रामानुज या यतिराज पर अपने हृदय में विचार करें ( प्रयास कम और फल बड़ा हैं )

उमै- अगर आप नित्य संसारी यह करें तो

वैक्कुम – आप नित्यसूरियों के संगत पाएँगे

 

सरल अनुवाद

मामुनि संसारियों से कहतें हैं , “ अपने धारणा एवं कठिन तपस के कारण परमपद पहुँचने को अनेकों लोग प्रयत्न करतें हैं। लेकिन वें पहुँच नहीं पाते। और आप लोगों ने अपना सारा समय तुच्छ विषयों में व्यर्थ कर दिया हैं। पर परमपद पहुँचने का आसान रास्ता है। श्री रामानुज के दिव्य नाम को जप तथा ध्यान करने पर निश्चित परमपद प्राप्त होगा।

स्पष्टीकरण

इस दुनियाँ के लोगों को मामुनि पुकारतेँ हैं, “ हे इस सँसार के पापियोँ ! श्री रामानुज के दिव्य नाम को जप कर जिन सुनहरें फलों को बिता सकतें थे, उन्को आप लोगों ने व्यर्थ कर दिया। बीते उन फलों को सोच कर, उनका व्यर्थ होने कि एह्सास कर सकतें हैं। और इसके पश्चात भी, हल्के प्रयास से ही प्राप्त होने वाली एक अमूल्य विषय हैं।  और वह जगह हैं , श्रुतियों से “तत अक्षरे परमव्योम:” वचन से प्रशंसित,नित्यसूरियों का निवास स्थान और सब से उत्तम लक्ष्य परमपद हैं। अनेकों ऐसे लोग हैं जो यहाँ पहुँचने के लिए कठिन तपस करतें हैं। और इस तरह के घोर तपस के पश्चात भी वें अपने स्व प्रयत्न के बल पर परमपद पहुँच नहीं पाते हैं। किंतु यहाँ पहुँचने केलिए एक आसान मार्ग हैं और वह है श्री रामानुज के दिव्य नामों को जप कर उन्पर ध्यान करना। इसमें प्रयास छोटा और फल सर्व श्रेष्ट, साक्षात परमपद हैं।       

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४९

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४८

उपक्षेप

पिछले पासुरम में, “ऐतिरासन अडि नँणादवरै एँणादु” कहकर वें साँसारिक व्यवहारों में ही ढूबे लोगों के प्रति अपने विरक्ति  प्रकट करतें हैं। किंतु उन्कि हृदय नरम  होने कि कारण उन्से धर्ति वासियों की पीड़ा कि सहन न होती हैं। अपने अत्यंत कृपा के कारण वे उन्को एम्पेरुमानार के चरण कमलों को मोक्ष के मार्ग के रूप में दिखा कर इस मार्ग के विधियों को भी प्रकट करतें हैं।    

 

पासुरम ४९

नंदा नरगत्तु अळुंदामै वेँडिडिल नानिलत्तीर

एन तादैयान एतिरासनै नण्णुम एंरुम अवन

अंदादि तन्नै अनुसंदियुम अवन तोंडरुडन

सिंदाकुलम केड चेरंदिरुम मुत्ति पिन सित्तिकुमे

 

शब्दार्थ:

नानिलत्तीर – हे! इस सँसार के चार प्रकार के वासियों !

वेँडिडिल – अगर चाहें तो

अळुंदामै –  न डूबे

नरगत्तु – साँसारिक सागर नामक यह नरक

नंदा – जो बुगतकर पूरा न हो

(तो मेरी उपदेश सुन)

नण्णुम – जाओ और शरण लो

एन – मेरे

तादैयान – पिता

ऐतिरासनै – एम्पेरुमानार के संग

अनुसंदियुम – जप और ध्यान कर

एँरुम – हमेशा

अवन अंदादि तन्नै – प्रपन्न गायत्रि माने जाने वाली  इरामानुस नूट्रन्दादि ,जो मोक्ष के ओर ले जाने वालि एम्पेरुमानार  के दिव्य नाम से गूँजती हैं।

चेरंदिरुम –  (के) सेवा में रहो

अवन तोंडरुडन  – उन्के भक्त (के प्रति ) जो हैं सर्व श्रेष्ट श्री वैष्णव

सिंदाकुलम – सँसार के अन्य विषयों के संबंध से आने वाले पीड़ाएँ

केड  – नाश होँगे (जिस्के बाद)

मुत्ति – मोक्ष

पिन सित्तिकुमे  – सही वक्त पर प्राप्त होगा

 

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, साँसारिक विषयों से पीड़ित जनों के प्रति तरस खाकर मामुनि मुक्ति का एक सुलभ राह दिखातें हैं।  नरक माने गए इस सँसार के बंधनों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अपने पिता एम्पेरुमानार के दिव्य चरण कमलों को पकड़ने का उपदेश देतें हैं। एम्पेरुमानार के दिव्य नाम को हर पंक्ति में उच्चारण करने वाले “इरामानुस नूट्रन्दादि” को जप और ध्यान करने का सलाह देतें हैं। एम्पेरुमानार के भक्तों के प्रति सेवा करने को भी कहतें हैं। ऐसे करने से श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागति करने के पहले अनुभव किये गए पीड़ाओं से निवारण मिलेगा। और सही समय पर निश्चित मुक्ति प्राप्त होगा।    

 

स्पष्टीकरण

इस सँसार के प्रति अपने विचार प्रकट करतें हुए मामुनि कहतें हैं कि, “हमारें ग्रंतों में  यह सँसार नरक के रूप में चित्रित किया गया हैं। इस विषय में आळ्वारों के पासुरम : (पेरिय तिरुमोळि ११. ८. ९)” नंदा नारगत्तळुंदा वगै”, (पेरिय तिरुमोळि ७. ९. ५) “नरगत्तिडै नणुंगा वगै” और (तिरुवाय्मोळि ८.१.९) “मट्रै नरगम” . सँसार नामक इस नरक के पीड़ाओं और संकटों का कोई भी अंत नहीं होता है। हे! चार प्रकार के धर्ती वासियों!  इस नरक में मग्न न होकर, उस्के कठोरता से विमुक्त होकर बचने के लिए एक उपाय हैं। कृपया मेरे पिता श्री रामानुज के पास जायें और शरणागति करें। प्रपन्न गायत्रि (वह जिसकों प्रपन्न जन हर दिन दोहराना चाहिए) माने वालि “इरामानुस नूट्रन्दादि” में मुक्ति की राह दिखानें वालि एम्पेरुमानार की दिव्य नाम इस ग्रंथ के हर पंक्ति में उपस्थित हैं।  इस दिव्य नामों पर ध्यान करें। इरामानुस नूट्रन्दादि के १०७वे पासुरम के “उन तोंडर्गळुक्के” के अनुसार श्री रामानुज के भक्तों के दिव्य चरण कमलों में सेवा करें। उस क्षण तक के सारें पीड़ाओं से मुक्ति मिलेगी और सही समय पर सँसार से मुक्ति भी मिलेगी।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

आर्ति प्रबंधं – ४८

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ४७

उपक्षेप

मामुनि पिछले पासुरम में भागवदों (भगवान श्रीमन नारायण के भक्त) के प्रति कैंकर्य के बारे में गाये। तब, “इरामानुसाय नम:” कहतें हुए, वें, श्री रामानुज और उन्के भक्तों के प्रति कैंकर्य करने कि लिए उन्के इन्द्रियों और अंगों को आशीर्वाद करने वाले पेरिय पेरुमाळ की स्मरण करतें हैं। वे इस विषय को अत्यंत संतुष्टि के संग कहतें हैं।  

 

पासुरम ४८

एणादु एन्नेंजम इसैयादु एन नावु इरैंजादु सेन्नी

कण्णानवै ओंरुम काणलुरा कलियार नलिय

ओण्णाद वण्णम उलगु अळित्तोन ऐतिरासन अडि

नण्णादवरै अरंगेसर सैयद नलम नमक्के

 

शब्दार्थ

नण्णादवरै – ऐसे भी लोग हैं जो शरणागति नहीं करतें हैं

ऐतिरासन अडि  – चरण कमल श्री एम्पेरुमानार के , जो

अळित्तोन – रक्षा किये

उलगु  – साँसारिक

कलियार – कलियुग के लोग, जो विवेकी होते हैं

नलिय ओण्णाद वण्णम – कलि के क्रूरता के प्रभाव से

एन्नेंजम – (ऐसे लोगों के प्रति ) मेरा ह्रदय नहीं

एण्णादु – नहीं सोचेगा

एन नावु – मेरा वचन

इसैयादु – उनके बारें में नहीं होगा

सेन्नी  – मेरा सिर

इरैंजादु – नहीं झुकेगा (उनके ओर )

कणानवै  – मेरे आँख

ओंरुम काणलुरा  – कुछ नहीं  देखेगा (उनसे संबंधित)

अरंगेसर – पेरिय पेरुमाळ ने ही मुझें सोच और उस्से संबंधित इन्द्रियाँ दिए।  

सैयद नलम नमक्के  – ये इन्द्रियाँ किसी अन्य के सेवक नहीं बनेंगे।  ये केवल श्री रामानुज के ही हैं। और यह श्री नम्पेरुमाळ के आशीर्वाद के द्वारा ही हमें प्राप्त हुआ।  

(कलियार नलिय ओण्णाद वण्णम उलगु अळित्तान ऐतिरासन  – इसका अर्थ ऐसे भी हो सकता हैं : “ कलि के क्रूरता से  सँसार को श्री रामानुज बचाएँ )

सरल अनुवाद

मामुनि का कहना हैं कि श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागति न करने वालों के प्रति , उन्के (मामुनि के ) मन , आँखें, जिह्व, और सिर कभी अपना कर्तव्य न निभायेंगे। वे कहतें हैं कि, उन्के आँखें  उन्हें न देखेंगें , सिर न झुखेगा , मन विचार न करेगा , और जिह्व उन्के विषय नहीं बोलेगा। मामुनि इस विषय को सौंपने वाले पेरिय पेरुमाळ श्री रंगराजन  के कृपा कि अत्यंत प्रशंसा करतें हैं।

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं कि, इरामानुस नूट्रन्दादि १६वे पासुरम के, “ताळवॉण्ड्रिल्ला मरै ताल्ंदु तल मुळुदुम कलिये आळगिन्ड्र नाळवंदळित्तवन” के अनुसार एम्पेरुमानार इस सँसार को कलि के क्रूरता से रक्षा करतें हैं।  इरामानुस नूट्रन्दादि ४५वे पासुरम के “पेर अोनृ मट्रील्लै” के प्रकार, उपाय एवं उपेय (मार्ग तथा लक्ष्य) एम्पेरुमानार के दिव्य चरण कमल हैं। इस बात के अज्ञान पर भी एम्पेरुमानार के दिव्य चरण कमलों में शरणागति करने वालों के प्रति मेरे इन्द्रियाँ और अंग ऐसे रहेंगें: यतिराज विंशति ४ के “नित्यं यतींद्र” और “नैयुम मनं उन गुणंगळै एँण्णि” के प्रकार मेरा बुद्धि और हृदय उछल खूदकर एम्पेरुमानार के श्रेय में मग्न, उन्हीं के गुण-गान करेंगे। किंतु श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों में शरणागति न करने वालों के प्रति, मेरे इन्द्रियाँ और हृदय बंद हो जाएँगे।  पेरिय पेरुमाळ श्री रंगराजन के असीमित कृपा ही मेरे ऐसे बर्ताव की कारण हैं। “नँणादवरै अरंगेसर सैयद नलं” में उपस्तित “नलं” का अर्थ “धन” है। “ मन: पूर्वो वागुत्तर:” वचनानुसार वचन/जिह्व मन से जुड़ा हुआ हैं , क्योंकि मन से उगने वालें विचारों का जिह्व माध्यम है। किंतु तिरुवाय्मोळि ४.५.४ के “नावियल इसै मालैगळ एत्ती” के प्रकार मेरा जिह्व उनकी प्रशंसा ही नहीं उन्के बारे में बात भी न करेगा। कूरत्ताळ्वान के रचित तनियन के “प्रणमामि मूर्ध्ना” को प्रतिबिंबित करते हुए श्री रामानुज के आगे झुकने वाला यह सिर इन लोगों के सामने न झुकेगा। इरामानुस नूट्रन्दादि १०२वे पासुरम के “कण करुदिडुम काण” और यतिराज विंषति १ के “श्री माधवाङ्गरी” के जैसे मेरी आँखें उन्हें कभी नहीं देखेँगे। “कलियार” कलि युग का व्यक्तित्व हैं।  (पेरिय तिरुमोळि १.६.८) “येविनार कलियार” से साबित है कि कलि की क्रूरता इतनी घोर हैं कि भय के कारण उसे मर्यादा से पुकारना पड़ता हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४७

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ४६

उपक्षेप

“ऐतिरासर्काळानोम याम” कहते हुए, संतुष्ट होकर, मामुनि “रामानुज” दिव्य नाम कि महान्ता  को प्रकट करने का इच्छा करतें हैं। मामुनि का मानना है कि पूर्व पासुरम में “ माकान्त नारणनार” और “नारायणन तिरुमाल” से कहें  गए “नारायणा” दिव्य नाम से “रामानुज” दिव्य नाम और भी उत्तम और महत्वपूर्ण हैं।

पासुरम ४७

इरामानुसाय नमवेनृ इरवुम पगलुम सिंदित्तिरा

मानुसरगळ इरुप्पिडम तन्निल इरैपोळुदुमिरा

मानुसर अवरक्कु एल्ला अडिमैयुम सेय्यवेणणि

इरा मानुसर तम्मै मानुसराग एन्कोल एणणुवदे

 

शब्दार्थ

मानुसरगळ – ( हैं) कुछ लोग

इरा  – जो नहीं करतें हैं

इरवुम पगलुम  – दिन और रात

सिंदित्तिरा – (के ओर )द्यान

इरामानुसाय  – श्री रामानुज

नमवेनृ – जो कहे “इरामानुसाय नम:”  ( इस्का अनुवाद है, “ मैं खुद मेरे लिए नहीं हूँ , मैं श्री रामानुज के लिए हूँ )

मानुसर अवरक्कु – ऐसे कुछ लोग ( कूरत्ताळ्वान के जैसे )

इरा – जो नहीं जीतें हैं

इरैपोळुदुम – एक क्षण मात्र भी

इरुप्पिडम तन्निल – आगे बताये गए लोगों के स्थल ( जो दिन रात “इरामानुसाय  नम:” नहीं कहतें हैं)

मानुसर तम्मै  – लोग

इरा – जो नहीं

सेय्यवेणणि  – करतें हैं

एल्ला अडिमैयुम  – सारें कैंकर्यं (कूरत्ताळ्वान के जैसे लोगों के प्रति)

मानुसराग एन्कोल एणणुवदे  – इनको मनुष्य कैसे माने जाए ? यह पशु के समान हैं।  

 

सरल अनुवाद

मामुनि कहतें हैं कि सँसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं।  हम उनको गण १, गण २ , गण ३ के नाम से बुलाएँगे। गण १ के लोग कभी “इरामानुसाय नम:” नहीं कहतें है।  गण २ के लोग ऐसे गुण के हैं कि वें गण १ के संग कभी नहीं रह पाएँगे। इसकी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कूरत्ताळ्वान हैं। आखरी हैं गण ३ के लोग जो न गण २ लोगों कि श्रेयस तथा महान्ता समझते हैं , न ही उनके प्रति नित्य  कैंकर्य में इच्छा रखते हैं। मामुनि को शंका हैं कि गैन ३ के जैसे लोगों को मनुष्य कैसे माना जाए, जब वें पशुओँ के समान हैं।

 

स्पष्टीकरण

मामुनि श्री रामानुज के दिव्य नाम की श्रेयस प्रकट करते हुए कहतें हैं कि , “सारे जनों को निरंतर “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान करना आवश्यक हैं” . तिरुमंगैयाळ्वार के (पेरिय तिरुमोळि १.१.१५) “नळ्ळिरुळ अळवुम पगलुम नान अळैप्पन” के अनुसार यह स्मरण  दिन रात होनी चाहिए। किन्तु अनेक जन हैं जो यह नहीं करतें हैं। हर एक को यह महसूस करना चाहिए कि “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों के संग कभी नहीं रहना हैं। पशुओँ के समान इन जनों के संगत या स्नेह भाव नहीं रखनी चाहिए। कूरत्ताळ्वान कि तरह शास्त्र के अनुसार जीने वालों को कभी भी इन जैसे लोगों के संग नहीं रहना चाहिए। “इरामानुसाय नम:” दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों इस दूर रहने वाले गण के लोगों कि महान्ता को समझ कर उसकी प्रशंसा करनी चाहिए।  ऐसे उत्तम जनों के प्रति निरंतर कैंकर्य करने को तरसना चाहिए। इस भाव को ही तिरुवरंगत्तमुदनार “एत्तोळुंबुम सोल्लाल मनत्ताल करुमत्तिनाल सेयवन सोरविनड्रिये” (इरामानुस नूट्रन्दादि ८० ) में प्रकट करतें हैं। “मानिडवरल्लर एन्रे एन मनत्ते वैत्तेन” के अनुसार, इन उत्तम जनों के प्रति कैंकर्य न करने वाले पशु समान हैं। अंत में मामुनि कहतें हैं कि, “इरामानुसाय नम: दिव्य मंत्र पर ध्यान न करने वालों के संग न रहने वालों के प्रति जो नित्य कैंकर्य न करें , वें मनुष्य कैसे मानें जा सकतें हैं ?”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४६

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४५

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि ,आचार्य के महत्त्व कि श्रेय जो गाते हुए उन्हीं के कृपा को अपनी उन्नति की कारण बतातें हैं।  इसी विषय कि इस पासुरम में और विवरण देतें हैं।

पासुरम ४६

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै तीविनैयोंदम्मै

गुरुवागि वंदु उय्यक्कोंडु – पोरुविल

मदि तान अळित्तरूळुम वाळवंरो नेंजे

एतिरासरक्कु आळानोम याम

 

शब्दार्थ:

नेंजे – हे मेरे ह्रदय !

याम – हम

आळानोम  – सेवक बने

एतिरासरक्कु –  एम्पेरुमानार के

(इसका कारण है )

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै – तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै (मामुनि के आचार्य )

गुरुवागि  – आचार्य के रूप में अवतार किये

वंदु –   और हमारे जगह को पधारें

तीविनैयोंदम्मै – हम, जो क्रूर पापों के घने बादल हैं

उय्यक्कोंडु  –  उन्के कृपा से स्वीकृत किये गए और उन्नति के योग्य माने गए

अळित्तरूळुम  – हमें आशीर्वाद किये , (यह देकर )

मदि तान  – तिरुमंत्र की ज्ञान

पोरुविल – जो अद्वितीय ( शास्त्र की भी किसी और से तुलना की जा सकती हैं, पर इसकी नहीं )

वाळवंरो – (हे मेरे ह्रदय!) यह इसी आचार्य के कृपा से ही हैं न ? ( इन्हीं के कारण हम एम्पेरुमानार के सेवक बने)

 

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि अपने आचार्य के श्रेय की वर्णन करतें हैं।  वें कहतें कि आचार्य के कृपा से पाए गए तिरुमंत्र से ही वें श्रीमन नारायण के सेवक के सेवक बन सकें।  

 

सपष्टीकरण

यहाँ पहले तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै की श्रेयस कि प्रशंसा की गयी हैं। श्रीमन नारायण के सारे भक्त जो श्री वैष्णव और इस साँसारिक लोक के दिव्य जीव याने  भूसुरर कहलातें हैं, इन सारें लोगों से तिरुवाय्मोळि दिव्य प्रबंध और अमृत मानी जातीं हैं। नम्माळ्वार खुद कहतें हैं, “तोंडरक्कमुदु उण्ण चोल मालैगळ सोन्नेन” (तिरुवाय्मोळि ९.४.९). तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै एक ऐसे आचार्य हैं जो तिरुवाय्मोळि को स्वास में लेकर उसी में जीतें थे। उसमें से तरह तरह के मकरंद कि आनंद उठाते हैं, जैसे शब्दों कि सजावट कि मकरंद , अर्थों की मकरंद और उन पासुरमो के मनोभाव कि मकरंद। वे केवल तिरुवाय्मोळि को धर्म मानकर जियें और अन्य शास्त्रों को घास समान मानें। वें नम्माळ्वार के चरण कमलों में शरणागति कर, उन्के प्रति सारें कैंकर्य किये।  तिरुवाय्मोळि के संबंध के कारण वें तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै कहलायें गए। मामुनि अपने ह्रदय को कहतें हैं , “हे मेरे प्रिय ह्रदय! हमें देखो। “अोप्पिल्ला तीविनैयेनै उय्यक्कोंडु (तिरुवाय्मोळि ७.९.४)” के वचनानुसार हम क्रूर पापों के प्रतिनिधि हैं। और तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै आचार्य के रूप में अवतार किये और हमें विमुक्त किये।” इसी को वें अपने उपदेश रत्न मालै में, “तेनार कमल तिरुमामगळ कोळूनन ताने गुरुवागि (उपदेश रत्न मालै ६१) कहतें हैं। आगे मामुनि कहतें हैं , “ वें (तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै) हमारें जगह पधारें और तिरुमंत्र से जनित यह दिव्य ज्ञान दिए। यह अन्य शास्त्रोँ से जनित ज्ञान से अलग हैं। हे मेरे ह्रदय!  उनके इस कृपा के कारण ही हमें एम्पेरुमानार के प्रति कैंकर्यं करने का भाग्य मिला। तिरुमंत्र में यहि उत्तम अर्थ प्रकट किया गया हैं कि, भगवान श्रीमन नारायण के सेवकों के सेवक रहना सर्व श्रेष्ट स्थिति हैं। और इस अर्थ को महसूस करने के कारण ही हम एम्पेरुमानार के नित्य सेवक बनते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४५

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४४

उपक्षेप

पिछले पासुरम में, मामुनि सर्वव्यापी श्रीमन नारायण की  “माकांत नारणनार वैगुम वगै” से श्रेय गाए। वें उस पासुरम के “मोहान्तक” से चित्रित किये गए सबसे नीच जीव खुद को मान्ते हैं। यहीं इस पासुरम का सारांश हैं जहाँ वें खुद को,, श्रीमन नारायण को न पहचान पाने के कारण ,केवल अंधकार और अकेलापन महसूस करने वाले लोगों में सबसे नीचे स्थान में रख़ते हैं।  मामुनि का मानना हैं कि उन्हें श्रीमन नारायण की सर्वव्यापित्व की और उनके संग उपस्थित निरंतर संबंध की ज्ञान नहीं हैं। इसी अज्ञान के कारण वें मोहान्तको में से एक बन गये। किन्तु इन विषयों के पश्चात भी मामुनि अपने ह्रदय को याद दिलातें हैं कि आचार्य संबंध के कारण ही उन्नति पाए। यही इस पासुरम का सारांश है।  

पासुरम ४५

नारायणन तिरुमाल नारम नाम एन्नुम मुरै

आरायिल नेंजे अनादि अंरो सीरारुम

आचार्यनाले अंरो नाम उयंददु एन्ड्रु

कूसामल एप्पोलुदुम कूरु

शब्दार्थ

 

नेंजे – हे मेरे ह्रदय

नारायणन तिरुमाल –  जैसे “ तिरुमाले नानुम उनक्कु पळवडियेन” से चित्रित किया गया है, श्रीय:पति श्रीमन नारायणन ही सामूहिक शब्द “नारम” से पहचाने जाने वाले सारे आत्माओं के अधिकारी और स्वामी हैं।  

नारम नाम – हम आत्मायें सब नित्य हैं

आरायिल – अगर यह साबित करना है

एन्नुम मुरै –  (श्रीमन नारायण और जीवात्मा के बीच) वह नित्य संबंध

अनादि अंरो – यह कोई नया संबंध है क्या ? नहीं।  क्या यह सत्य नहीं कि यह नित्य हैं ? ( हाँ यह सत्य है)

(हे मेरे ह्रदय!!!)

सीरारुम – जो हमें यह संबंध दिखाकर उसे दृढ़ बनाके और खुद ज्ञान जैसे कल्याण गुणों से भरे व्यक्ति

आचार्यनाले अंरो – आचार्यन हैं, है न ?

नाम उयंददु एन्ड्रु – हमारी मुक्ति कि कारण वें ही हैं

(हे मेरे ह्रदय)

कूरु – कृपया इस बात को दोहराते रहो

एप्पोलुदुम – सदा

कूसामल – बिना कोई लज्जा के

 

सरल अनुवाद

मामुनि, इस पासुरम में ,श्रीमन नारायण और जीवात्मा के संबंध को दृढ़ करने वाले आचार्यन के महत्त्व प्रस्तुत करतें हैं। और वें कहतें हैं कि इस दृढ़ संबंध के पहले वें अचित वस्तु समान थे।  अत: वे अपने ह्रदय को यह बात प्रकट करने को प्रेरणा देते है कि, उन्कि उन्नति केवल आचार्य कृपा के कारण ही हुयी है।

सपष्टीकरण :

मामुनि कहतें हैं, “हे! मेरे प्रिय ह्रदय! पेरियाळ्वार नें कहाँ था, “तिरुमाले नानुम उनक्कु पळवडियेन (तिरुप्पल्लाण्डु ११)”. वें श्री कि दिव्य पति, श्रीय:पति श्रीमन नारायण हैं।  हम (जीवात्मायें) “नारम” कहलातें हैं। श्रीमन नारायण और जीवात्मा के बीच का संबंध नित्य और निरंतर है। अगर सोचा जाए , तो हम समझेंगें कि यह कोई आधुनिक संबंध नहीं हैं न हैं यह कोई अचानक सृष्टि , क्योंकी यह अनादि और नित्य हैं।  किंतु हमें (मामुनि और उन्के ह्रदय को) यह एहसास न हुआ और इस विषय से अज्ञानी रहें। और अचित वस्तु के समान इस संबंध को समझने कि योग्यता न थी। लेकिन हमारें आचार्य के समझाने पर यह स्थिति बदला और इस संबंध की और उस्की महत्त्व की ज्ञान हुई। आचार्य ज्ञान और अन्य कल्याण गुणों से भरपूर हैं। आचार्यन ही हमारी उन्नति के कारण हैं। (तिरुवाय्मोळि ३.५.१०) के “पेरुमैयुम नाणुम तविर्न्दु पिदट्रूमिन” के प्रकार कृपया इस्को हर जगह प्रकट करें जिस्से सारे लोग यह जान सकें। यह विषय को प्रमेय सारम १० , “इरैयुम उयिरुम” पासुरम में वर्णन किया गया हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४४

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आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४३

उपक्षेप
पिछले पासुरम में मामुनि ने कहा, “इंद उलगिल पोरुंदामै एदुमिल्लै अंद उलगिल पोग आसयिल्लै” . इस्का अर्थ है कि मामुनि को इस साँसारिक लोक में रहने कि दिलचस्पी में कोई कमी नहीं और परमपद पहुँचने में ख़ास दिलचस्पी नहीं हैं। यह प्रस्ताव करने के पश्चात वे सँसार के लोगों को और उन्के क्रियाओं पर ध्यान देते हैं। इन लोगों कि निरंतर पाप इकट्ठा करने का कारण समझतें हैं। यही इस पासुरम का विषय है।

पासुरम ४४
माकान्त नारणनार वैगुम वगै अरिंदोर्क्कु
एकान्तं इल्लै इरुळ इल्लै
मोकांतर इव्विडम येकांतम इरुळ एन्ड्रु भयं अट्र इरुंदु
सेयवारगळ ताम पावत्तिरम

शब्दार्थ :
नारणनार – सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान श्रीमन नारायणन
मकांत – जो श्री महालक्ष्मि के पति हैं
वैगुम वगै – जिस तरह से वें इस प्रपंच के हर चित और अचित जीवों के बाहर और अंदर व्यापित हैं (नारायण दिव्य नाम से यह अर्थ जुडा है )
अरिंदोर्क्कु – जिन्को इसकी ज्ञान है
एकान्तं इल्लै – उन्हें अकेलापन नहीं हैं
इरुळ इल्लै – नहीं ही है अंधकार
मोकांतर – “मोहांत तमसासवृत्त:” वचनानुसार साँसारिक विषयों से अँधा हुए लोगों को कुछ नज़र नहीं आता है और वे सोचते है कि
इव्विडम येकांतम इरुळ एन्ड्रु – यहाँ किसी के न होने के कारण, यह एक सूना जगह है
भयं अट्र इरुंदु – निर्भय रहेंगे और
सेयवारगळ ताम – और अपने अज्ञान के कारण , करते रहेंगें
पावत्तिरम – अधिक से अधिक पाप

सरल अनुवाद
इस पासुरम में मामुनि दो तरह के लोगों में अंतर कि विवरण देतें हैं। पहले गण के लोग सर्वत्र, प्रकाशमान श्रीमन नारायण को देखतें हैं। अत: इस तरह के व्यक्तियों का ऐसा समय ही नहीं होता है जब वे श्रीमन नारायण के सान्निध्य को महसूस नहीं करतें हैं। और परमात्मा के प्रकाशमय होने के कारण उन्को अंधकार भी दिखाई नहीं देतीं है। इसके विरुद्ध कई ऐसे जन हैं, जिन्को यह दृश्य नहीं हैं और जिन्हें लगता है कि वे अंधकार में अकेले हैं। इससे वे अनेक पाप करतें हैं जो ही उन्की अपकर्ष कि कारण बन जाति हैं।

स्पष्टीकरण
नम्माळ्वार तिरुवाय्मोळि १. १०.८ पासुरम में “सेल्व नारणन” दिव्य नाम का उपयोग किये। वें पेरिय पिराट्टि श्री महालक्ष्मि के दिव्य पति हैं। वे हर चित और अचित जीव के अंदर और बाहर व्यापित हैं। “नारायणन” दिव्य नाम का यहीं सारार्थ हैं। श्रीमन नारायण के सर्वव्यापी होने के इस कल्याण गुण कि ज्ञान कुछ व्यक्तियों को हैं। “नारायण परंज्योति:” (नारायण सूक्तं ४ ), “पगल कंडेन नारणनै कंडेन” (इरँडाम तिरुवन्दादि ८१), “अवन एन्नुळ तान अर वीट्रिरुंदान” (तिरुवाय्मोळि ८.७.३) जैसे पंक्तियों के अनुसार, इन व्यक्तियों को प्रकाशमान श्रीमन नारायण सर्वत्र दृश्य हैं। वें कभी अकेलापन और अंधकार महसूस नहीं करतें हैं। वे अपने जैसे मित्रों के समूह में ही रहते हैं। हमेशा अच्छे संगत में रहने के कारण वे निर्भय भी रहते हैं। “हृति नारायणं पश्यनाप्य कच्छत्रहस्ता यस्वतारधौछापि गोविन्दं तम उपास्महे” (विष्णु पुराणम) के अनुसार यह लोग कभी भी कहीं भी अंधकार नहीं देखतें हैं।
आगे प्रस्ताव किये गए व्यक्तियों के विपर्यय में “मोहान्तक” माने जाने लोग हैं। “मोहांत तमसा वृत्त:” के अनुसार इन लोगों के कथित अंधकार के कारण, इनमें आगे आने वाले विषयों को देखने कि सामर्थ्य नहीं हैं। इसको यतिराज विंशति के १२वे श्लोक में “अंतर बहिस सकल वस्तुषु संतमीसम अंद: पुरःस्थितमीवहमवीक्षमाण:” से विविरित किया गया है। अर्थात, श्रीमन नारायण, अनादि काल से निरंतर प्रकाशमान होते हुए, हर एक चित और अचित जीव के बाहर और अंदर एक समान व्यापित हैं। जो परमात्मा को अपने आन्तरिक आँखों से नहीं देखते, उनका अनुभव विपरीत होता है। उन्को किसी भी जगह में उपस्थित विषयों और लोगों को छोड़ केवल अंधकार ही दिखतीं है। इससे निर्भय होकर, वें “तस्यान्ति केत्वं व्रजिनं करोषि” के अनुसार अनेक पाप करतें हैं। मामुनि को एहसास होता हैं कि श्रीमन नारायण को न देखने वालोँ कि यही स्थिति है।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४३

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आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४१

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि कहतें हैं : “इरंगाय एतिरासा” . इससे ये माना जा सकता है कि मामुनि अपनि निराशा प्रकट कर रहें हैं।  परमपद पहुँचने कि इच्छा करने वाले को दो विषयाँ आवश्यक हैं १) वहाँ जाने कि इच्छा २) (इस भूमि पर) यहाँ रहने से द्वेष। इसी का सारांश है (श्री वचनभूषणम ४५८) “प्राप्य भूमियिल प्रावण्यमुम त्याज्य भूमियिल जिहासयुम” सूत्र। मामुनि को निराशा  हैं कि यह दोनों उनमें नहीं है। अत्यंत उदास होकर मामुनि सोच में पड़ते हैं कि इन दोनों गुण न होते हुए श्री रामानुज उन्को (मामुनि को) परमपद प्राप्ति कैसे दिलाएँगे।

पासुरम ४३

इन्द उलगिल पोरूंदामै  ऐदुमिल्लै

अंद उलगिल पोग आसैयिल्लै

इंद नमक्कु एप्पडियो  तान तरुवार एँदै  एतिरासर

ओप्पिल तिरुनाडु उगंदु

 

शब्दार्थ

ऐदुमिल्लै  – (मुझे) एक अणु  भी नहीं है

पोरूंदामै – दिलचस्पी कि अनुपस्तिथि  जो मुझे निकाल सकती है

इन्द उलगिल – इस क्रूर लोक (से) जिसको फेंकना है

आसैयिल्लै  – (और मुझे ) कोई दिलचस्पि नहीं

पोग – जाने में

अंद उलगिल – परमपद को , जो परम लक्ष्य है

इंद नमक्कु – ऐसे व्यक्ति (मैं ) के प्रति, जिसके पास यह दो आवश्यक गुण नहीं हैं।  

एप्पडियो तान  – किस उपाय से 

एँदै – मेरे पिताश्री

एतिरासर – एम्पेरुमानार (को)

तरुवार  – देंगे

उगंदु – संतोष से

तिरुनाडु – परमपदम

ओप्पिल – जो अद्वितीय है

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मामुनि कहतें हैं कि, परमपदम पहुँचने कि आवश्यक दो गुण उन्के पास नहीं हैं। वें कहतें हैं कि उनमें इस साँसारिक लोक के प्रति एक अणुमात्र द्वेष नहीं है और न ही परमपदम पहुँचने के लिए विशेश दिलचस्पी। वे सोचतें हैं कि ऐसे स्तिथि में उन्के पिता श्री रामानुज कैसे ख़ुशी से परमपदम कि प्राप्ति देँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “(तिरुवाय्मोळि ४.९.७)”कोडुवुलगम काट्टेल” के अनुसार कठोर और हटाने लायक इस सँसार में मेरी दिलचस्पी की कोई कमी नहीं हैं।  उसी समय (पेरिय तिरुमोळि ६.३.८)”वान उलगम तेळिंदे एन्ड्रैदुवदु” के अनुसार पहुँचने केलिए तरसने लायक जगह जो परमपदम हैं, वहाँ पहुँचने केलिए दिलचस्पी भी नहीं हैं। ऐसे स्तिथि में इस अद्वितीय परमपदम तक मेरे पिताश्री एम्पेरुमानार आनन्द से कैसे ले जाएँगे?

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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