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प्रमेय सारम् – श्लोक – ५

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ४                                                                                                                श्लोक  ६

श्लोक  ५

प्रस्तावना:

श्रीमन्नारायण, पेरिया पिराट्टी श्रीमहालक्ष्मी के स्वामी जीव को परमपदधाम में स्थान प्रदान करते है। यह वह अपने निर्हेतुक कृपा से करते है। वह जो बुद्धि विषयक, वीरतापूर्ण विशेषताओंसे और वह जो कल्याण गुणों से और वह जो किसी मनुष्य से इस संसार में जुदा नहीं हो सकते। इसलिए किसी आत्मा के प्रति भगवान जो भी करते है उस जीव के उज्जीवन के लिये करते है। मनुष्य को अपने बेहतर जीवन के लिये शास्त्र में और भी राह बताये गये है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। शास्त्र उसके सामने कही राह दिखाकर और सहीं राह को अंगिकार करने के लिये आत्मा के ज्ञान की परिक्षा लेता है। जीवात्मा जिसे इस तथ्य का ज्ञान है कि उपर बताये गये राह भगवान कि कृपा पाने के लिये पर्याप्त नहीं है। अत: यह व्यक्ति उन्हें कभी भी पहिले स्थान में स्वीकार नहीं करेंगे परन्तु उनके चरण कमल को हीं स्वीकार करेंगे। इस तरह करने से कोई यह सोचेगा कि किसी व्यक्ति का भगवान के शरण होना उसकी कृपा पाने की  एक राह है। इसका उत्तर यह है कि यह जीव जब भगवान के चरण कमलों के शरण होते है यह विचार करके करते है कि उनकी शरण होना भगवान तक पहूँचने की एक राह नहीं है। अत: उन तक पहूंचने का और कोई मार्ग नहीं बल्कि वों हीं है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है कि अगर किसी के मन में यह बात आती भी है तो यह विचार भी उसके मन में भगवान हीं लाते है।

वळियावदु ओन्रु एन्राल् मट्रेवै मुट्रुम
ओळियावदु ओन्रु  एन्राल् ओम् एन्रु – इळियादे
इत्तलैयाल एदुमिलै एन्रिरुंददु तान
अत्तलैयाल वन्द अरुल

अर्थ:

वळियावदु                   : राह जिसे “शरणागति” कहते है,
ओन्रु एन्राल्                 : अगर उसे समझना है कि यह हीं वह राह है तब
मुट्रुम                          : सभी
मट्रेवैयुम                     : दूसरे राह जैसे कर्म, ज्ञान और भक्ति योग
ओळि                          : का त्याग करना बिना कोई लक्षण के
यावदु                          : शरणागति कि राह
ओन्रु  एन्राल्                 : यह अहसास होना कि यही वही राह है
ओम् एन्रु                     : अगर कोई मनुष्य उसे स्वीकार करता है और अंगीकार करता है और
इळियादे                      : फिर भी शरण नहीं होता है (क्योंकि यहीं एक राह है और फिर उसके न करने का उपाय हीं नहीं है)
इत्तलैयाल                   : अगर कोई व्यक्ति इस दिशा में सोचता है कि
एदुमिलै                       : यहाँ कोई अच्छा कर्म नहीं है जो उससे स्वयं हीं किया जा सकता है
एन्रु                             : और उस पथ पर “प्रयत्न नहीं” उसके बारे मे सोचता है
इरुंददु तान                  : और उस मत से लगा रहता है
अत्तलैयाल वन्द अरुल : यह उसके कृपा से हीं मुमकिन है

स्पष्टीकरण:

वळियावदु ओन्रु एन्राल्: यह पद जिसने शास्त्र के परिणाम के अर्थ को समझा है उस मनुष्य कि मन कि स्थिति को समझाता है। यह और कुछ नहीं दूसरे साधन जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि की तुच्छता को प्रमाणित करना है, जो स्वतंत्रपने से भगवान श्रीमन्नारायन के स्वाधीन होना है। पूर्णत: शरण होना जिसे शरणागति भी कहते है परंतु दूसरे साधन के अच्छे परिणाम के लिये भगवान के सहारे कि जरूरत होती है। इसीलिये उनके पास किसी मनुष्य को बिना भगवान के सहायता के भगवान के चरण कमल के पास ले जाने के लिये अधिकार नहीं होता है। इसीलिये एक समझदार मनुष्य इन राह में कभी नहीं चलेगा परन्तु प्रपत्ति या शरणागति का पालन करेगा क्योंकि यह सीधे भगवान से जुड़े है।

मट्रवै मुट्रुम् ओळिया: शरणागति छोड़ दूसरे उपाय के परिणाम का सत्य जानकार सभी को कुछ क्षण भी न सोचकर उन्हें त्याग देना चाहिये। “मट्रेवै” शब्द सामूहिक रूप से कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग को दर्शाता है। “मुट्रुम” शब्द  यह बताता है कि तीनों साधन को बिना सोचे समझे त्याग देना चाहिये। “ओलि:” शब्द “ओलितु” शब्द का व्याकरणिक रूपांतर है यानि त्यागना।

अदु ओनृ एन्राल्: “अदु” – प्रपत्ति या शरणागति। इसे “भगवान” भी कहते है। “ओनृ” शब्द जो केवल भगवान से जुड़ा है और इसलिये उसका अर्थ “भगवान हीं” है। तमिल व्याकरण में इसे “पिरिनीलै एकाराम” कहते है। जिसका अर्थ “केवल भगवान और कोई नहीं और भगवान के सिवाय और कुछ नहीं”। यह बुद्दिमान व्यक्ति जो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों कि शरण लेता है वह कभी यह सोच भी नहीं सकता है कि उसका भगवान के शरण होना भगवान के पास पहूँचने कि एक राह है। क्योंकि वह व्यक्ति यह जानता है कि उसके द्वारा किया गया कार्य भी उसे भगवान के पास नहीं ले जा सकता। अगर कोई व्यक्ति यह सोचता है “भगवान ही उपेय है” और हमेशा यही विचार के बारें में सोचता है तब यही विचार भगवान के पास पहूँचने में बाधा बन जाता है क्योंकि वह व्यक्ति अनुचित ढंग से यह सोचता है कि उसका यह विचार उसे भगवान के पास ले जाता है। यह सत्य नहीं है। दूसरे शब्दों में किसी व्यक्ति से कुछ भी कार्य करने से उसे भगवान के पास ले नहीं जा सकता। उसे तो भगवान ही अपने पास ले जाते है। वह स्वयं अपने सिवाय कुछ स्वीकार नहीं करते है। अत: शरणागति शब्द भगवान के साथ बदला जा सकता है। इसिलिये भगवान को “अदु ओनृ” ऐसे संबोधित करते है जो र्निजीव वस्तु के लिये उपयोग करते है। यह और कुछ नहीं परन्तु यह समझाने के लिये कि उपेय और भगवान एक हीं है और इसलिये “अदु ओनृ” को “अवन ओनृ” के जगह उपयोग किया गया है। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अदु इदु उदु एदु”। इसलिये यह पद “अदु ओनृ” का अर्थ “केवल भगवान और कुछ नहीं”।

ॐ एनृ इळियादे: यह पद पिछले पद “अदु ओनृ एंराई:” के संयोग से समझने के लिये है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह बात कह रहे है कि कोई भी व्यक्ति यह समझता है कि शरणागति कि राह जो और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायण ही है वें ही रक्षक है। अत: वह व्यक्ति यह सोचकर कि यहीं शरणागति कि राह उसे भगवान के चरण कमलों तक ले जायेगी उनके शरण हो जाता है। दूसरे शब्दों में वह व्यक्ति भगवान के शरण होना उस तक पहूँचने कि राह है यह सम्पादन करता है। शास्त्र कहता है यह भी गलत है और बड़ा विरोधी भी हो सकता है। “पूर्ण शरण” होना यह शब्द का अर्थ एकही पर सब कुछ छोड़ उसके पास जाना है यह विचार भी त्यागकर कि वह उसके शरण गया है। इसलिये इस पद में “ॐ” शब्द का अर्थ वह व्यक्ति ने शरणागति को स्वीकार किया है जो सर्वोत्तम राह है और “इलियादे:” शब्द का भाव वह व्यक्ति जो शरणागति को यह विचार करके कि उसने यह कर लिया है स्वीकार नहीं करता।

इत्तलैयाल एदुमिलै एन्रिरुंददु तान: इसलिये अब यह प्रश्न आता है कि किसी व्यक्ति को शरणागति करते समय क्या विचार करना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि उस व्यक्ति को कुछ नहीं करना चाहिये और इस विचार के साथ रहना चाहिये वह भगवान के कृपा बिना कुछ भी नहीं कर सकता है। एक व्यक्ति जब किसी भी कार्य को करता है जो भगवान के पास पहुचता है तब उसे उससे बनी हुई खालीपन के बारे मे सोचना चाहिये।

अत्तलैयाल वन्द अरुल: अत: में श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है कि अगर किसी व्यक्ति को ऐसे उपरोक्त विचार आते है तो वह विचार भी भगवान कि निर्हेतुक कृपा का हीं परिणाम है और कुछ नहीं। शास्त्र में यह कहा गया है कि मोक्ष प्राप्त करने का और भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों तक पहूँचने का एक मात्र उपाय है “पूर्ण शरणागति”। जब कोई इस सर्वोच्च अर्थ के बारें में सचेत हो जाता है तब उसे अन्य अर्थ को जैसे कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग के बारें में जानने कि आवश्यकता नहीं है। इसका अर्थ यह है कि भगवान तक पहूँचने का उपाय “शरणागति” है। इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति का यह शरणागति करना भगवान तक पहूँचने की एक राह है। इस प्रश्न को हमारे सम्प्रदाय में निरर्थक कर दिया गया है और वों ही जरिया है और कोई है भी नहीं और हो भी नहीं सकता। जब शास्त्र यह कहता है कि “केवल भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा हीं उपेय है” तब “केवल” शब्द सारे प्रश्न को निकाल देता है जो दूसरे योग को साधन रूप में स्वीकार करने को कहता है। यह “केवल” एक विशेष अनयता है जिसे “पिरिनिलै एकाराम” कहते है। यह एकाराम यह स्पष्ट करता है कि अन्य योग उपाय नहीं है बल्कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं उपाय हैं और कोई नहीं। इसलिये अगर भगवान श्रीमन्नारायण किसी पर कृपा करते है तो वह कुछ भी नहीं माँगता नाहीं कुछ आशा करता है।  वह अपनी कृपा से आगे बढ़कर निर्हेतुक कृपा करते है। इसे “वेरिधे अरुल सेय्वर” पाशुर में देखा जा सकता है। अत: भगवान श्रीमन्नारायण एक व्यक्ति जिसके पात्र में वहाँ कण मात्र भी क्रियाशीलता नहीं है उसको अपने संकल्प से बाहर जाकर आशीर्वाद और कृपा करते है। अगर कोई व्यक्ति इस विषय को समझ सके तब यह अंतर्निहित तथ्य है कि यह व्यक्ति इस दृग्विषय को समझने के लिये स्वयं से कुछ नहीं करता है। उचित रूप से यह समझने कि योग्यता भी और निरर्थक रहना और कुछ न करना यह सोच भी भगवान श्रीमन्नारायण ने हीं किसी व्यक्ति को प्रदान कि है। एक प्रश्न यहाँ आ सकता है कि कुछ नहीं करने के लिये भी भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा कि जरूरत है। इसका उत्तर “हां” है। कुछ न करना एक बहुत बड़ा आव्हान है। कुछ किए बिना रहना बहुत मुश्किल है। इसलिये एक व्यक्ति के तरफ से उसके स्वयं के पास उनके कृपा के सिवाय और कुछ भी नहीं है। यह विषय विस्तार से कई आल्वारों द्वारा कहा गया है। श्रीभक्तान्घ्रिरेणु स्वामीजी कहते है “vAzhum sOmbar”। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कहते है “निनरुळे पुरिन्दिरुन्देन्”। “एन् उणर्विन् उल्ले इरुत्तिनेन्” श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है। “उन् मनत्तिनाल् एन् निनैन्दु इरुन्दाय्” श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है। “निरन्तरम् निनैप्पदाग नी निनैक्क वेण्डुमे” श्रीभक्तिसार स्वामीजे कहते है। “सिरु मानिडवर् नाम् सेय्वदेन्” श्री गोदाम्बाजी  कहती है। तिरुकएनण्णमंगै आण्डन इस तत्त्व के आधार पर अपना जीवन व्यतित करते थे।

इसे मुमुक्षुपड़ी चूर्णीकै (२३०) देखा जा सकता है जो कहता है “अवनै इवन् पट्रुम् पट्रु अहन्कार गर्भम्. अवद्यकरम्. अवनुडय स्वीकारमे रक्शकम्”। यहाँ एक उदाहरण के बारें में कहा गया है। श्रीरामायणजी में माता सीता भगवान श्रीराम से मिलने के हेतु कोई राह के पीछे नहीं जाती है। परन्तु श्रीराम बहुत से कार्य करते है जैसे धनुष का तोड़ना आदि, वह श्रीराम ही थे जो जहां माता सीता थी वहाँ गये। उपर बताये विचार इस उदाहरण से स्पष्ट हो जायेंगे। यह वाल्मीकि ऋषि कि महानता है।

अत: यह देखा जाता है कि पूर्ण शरणागति का विचार निर्जीव है। यह भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा है जो किसी को ऐसे विचार आते है। तिरुवाय्मोलि ६.१० (उलगमुन्ड पेरुवाया) दशक पासुरों मे, हम सभी एक दृष्टान्त को देख सकते है जिसका उल्लेख “आवावेन्नुम्” पासुर की ईडु व्याख्या मे है |
श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीवेदांति स्वामीजी से पूछते है कि “स्वामीजी लोग कहते है भगवान तक पहूँचने का ५वा मार्ग भी है”? क्या यह सत्य है कि ५वा मार्ग भी है? श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी उत्तर देते है “अड़िएन को इसके बारें में जानकारी नहीं है। जो चौथे मार्ग को अपनाता है वही अन्तिम मार्ग है। उससे बढ़कर और कोई नहीं है”।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ४

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श्रीः
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प्रमेय सारम्

श्लोक  ३                                                                                                                    श्लोक ५

श्लोक ४

भगवान श्रीमन्नारायण सभी के स्वामी है। कोई उन्हें आज्ञा नहीं कर सकता है। वह स्वतंत्र है और कोई उन्हें रोक भी नहीं सकता नाहीं गलत राह दिखा सकता है। अत: जीवों को उन्हें प्राप्त करने हेतु शास्त्र में कई मार्ग है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। जिसे शास्त्रों के बारीकी और तीव्रता पता नहीं होती है वह उपर बताये कठिन मार्ग से भगवान को पाने कि कोशिश करते है। यह एक सत्य है जो बताया गया है कि वह उन लोगों कि तरफ निर्देश किया गया है। जबतक भगवान स्वयं अपने चरण कमल उनके मस्तक पर नहीं रखते इनके पास भगवान के पास पहूंचने के लिये अपने कर्म के सिवाय और कोई भी राह नहीं है। अत: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह सलाह देते है कि हम सब यह चाहना करे कि भगवान स्वयं अपने इच्छा से अपने चरण कमल हम पर रखे।

“करूमत्ताल ज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे?
दरूमत्ताल अन्रि इरै तालगल
ओरुमत्ताल मुन्नीर कडैन्दान अडैन्दान मुदल पडैत्तान
अन्नीर अमर्न्दान अडि”

अर्थ:

कडैन्दान              : भगवान श्रीमन्नारायण देवताओ के लिये मथते है।
मुन्नीर                 : समुंदर जो तीन स्त्रोतों के जल से बनता है यानि बारीश का पानी, नदी का पानी और पानी जो निचे से उछलता है
ओरुमत्ताल          : “मंथारम” पर्वत का उपयोग करके
अडैन्दान              : उन्होंने माता सीता को लाने के लिये समुंदर के उपर एक सेतु बनाया
मुदल पडैत्तान      : उन्होंने पहीले जल कि रचना कि और उत्पत्ति करते वक्त
अन्नीर अमर्न्दान  : उस जल पर चले
अडि                     : ऐसे भगवान के
इरै तालगल          : चरण कमल
दरूमत्ताल अन्रि   : हमें स्वयंगतिशीलता प्रदान करते है। इसके अतिरिक्त
करूमत्ताल          : दूसरे मार्ग जैसे कर्म योग जो अपने स्वयं के प्रयत्न से करते है
ज्ञानत्ताल            : मार्ग जैसे ज्ञान योग और भक्ति योग
काणुम वगै उण्डे?  : हमें भगवान के चरण कमल प्रदान नहीं करेंगे। क्या वह?

स्पष्टीकरण:

करूमत्तालज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे?:- क्या कोई व्यक्ति स्वयं के प्रयत्न जैसे कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग से भगवान के चरण कमल को प्राप्त कर सकता है? इसका जवाब है नहीं। भक्ति “ज्ञान” में अपने आप शामिल हो जाती है। भक्ति और कुछ नहीं “ज्ञान” का सर्वोच्च  पद है। तीनों मार्ग भगवान को पाने के लिये कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग वेदांती के लेख अनुसार समझाया गया है। राजा जनक माता सीता के पिताश्री भगवान के चरण कमल कर्म योग द्वारा प्राप्त किये। भगवद् गीता में ज्ञान योग से पवित्र और कुछ भी नहीं कहा गया है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा “अगर कोई व्यक्ति मुझे प्राप्त करना चाहता है तो उसे अपना मन और हृदय दोनों को मेरे में लगाना होगा और बिना अपना ध्यान को एक क्षण के लिये भी नष्ट किये बिना निरन्तर मेरे बारें में विचार करना होगा। उसे मेरी हीं पूजा करनी होगी”। अब हमें एक प्रश्न आता है कि क्यों श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ने कहा “इवर्राई काणुम वगै उण्डे”? इस पर विचार करना होगा। श्रीदेवराज स्वामीजी को उपर बताये भगवान को प्राप्त करने के राह का सही गुण पता था। उन्हें यह श्रीरामानुज स्वामीजी से प्राप्त हुये ज्ञान के कारण पता था। इसलिये उन्होंने यह कहा। यही वह राह है जिसे भगवान कि पूर्ण शरणागति करने के पश्चात सबको को पालन करना है। इसलिये यह स्पष्ट है कि वें जो शरणागति करते है वह उनके कार्य के लिये आधार बन जाते है। अत: यह बिना बोले हो जाता है कि यह राह स्वयं के प्रयत्न से होते है, शरणागति का सहारा लेना हीं है। अत: शरणागति के मदद से हीं इस तरह से भगवान के पास पहूंचने कि राह जा सकती है। अत: कोई भगवान को अपने स्वयं के राह से प्राप्त नहीं कर सकता है क्योंकि सफल होने के लिये इस राह को कुछ और की भी जरूरत है। अगर कोई शरणागति नहीं करता हो तो जो कुछ भी जैसे कर्म योग या ज्ञान योग नियम वह निभाता हो फिर भी कुछ भी जरूरी फल नहीं देंगे। यह संदेश अत्यंत गोपनिय है जो वेदांतिक लेख में दिये गये है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इस पाशुर का विशेष भाव बताकर श्रीरामानुज स्वामीजी के निर्हेतु कृपा से हम सब कृपा करते है ।

यह जीवात्मा और भगवान के बीच सम्बन्ध हैं। अत: जीवात्मा को भगवान पर पूर्ण अधिकार होता है। जब उनके पास पहूंचने के आसान राह है तो हम कर्म योग आदि जैसे कठिन राह क्यों अपनाये। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी अपने गीतार्थ संग्रह में यह कहते है:

“निज कर्माधि भक्त्ययातम कुर्यात पृत्यैव कारितह
उपायधाम परित्यज्य न्यसेत देवेतु तामफि”

श्री भक्तिसार आल्वार नान्मुगन तिरुवंदादि में कहते है:

“इन्राग नालैये आग इनिच्चिरिदुम
निंराग निन अरुल एन पालदे – नंराग
नान उन्नै अन्रि इलेन कण्ड़ाय नारणने
नी एन्नै अन्रि इलै” (नान्मुगन तिरुवंदादि-७)

यह दो पद यह प्रमाण करते है कि भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों के सिवाय और कोई राह हैं हीं नहीं।

दरूमत्ताल अन्रि इरै तालगल:– इस पद का वाचन इस तरह करना चाहिये “इरै तालगल दरूमत्ताल अन्रि”। इस का अर्थ यह हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण अपने चरण कमल स्वयं हीं दे देते है और इसके अलावा और कोई राह है ही नहीं। यह उस विषय को आधार देता हैं कि भगवान के चरण कमल हीं हमारे क मात्र उपाय है। यहीं मुमुक्षुपड़ी चूर्णिकै में बताया गया है “पिराट्टियुं विदाधु, तिंकझलाई इरुक्कुम”। इस पाशुर में “इरै” का अर्थ वहीं है जो अष्टाक्षर महामन्त्र के पहिले शब्द का है (ॐ नमो नारायणाय) यानि “ॐ” शब्द में अकार। वह और कोई नहीं “ॐ” शब्द में जिसे “अ” कहा गया हो।

“तालगल दरुम अत्ताल अन्रि” का अर्थ यह हैं कि हम सब के एक मात्र उपाय केवल भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल हीं हैं और कुछ नहीं। यह वेदों में विस्तार से लिखा गया है। द्वय महामन्त्र के पहिले भाग में हम यह देख सकते है कि “तिरुवडिगले शरणमाग पट्रुगिरेन” मे अनयता है। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “आरेनेक्कु निन पादमे शरणागा तंधोझिंदाई”, “कझगल अवये शरनागा कोण्डा”, “अडिमेल सेमम्कोल तेन कुरुगूर शठकोपन” और “चरणे चरणं नमकु”। हम यह देख सकते है कि उन्होंने बहुत से पाशुरों में विशेषकर भगवान के चरण कमल हीं हमारे उपाय है यह कहा हैं और इसीलिए आल्वारों ने भी यही कहा है। अत: भगवान के चरण कमलों  के अतिरिक्ति मनुष्य को और कुछ भी पकड़ना हीं नहीं है। बहुत से उदाहरण हैं जो बताये गये हैं।

ओरुमत्ताल मुन्नीर कडैन्दान: एक समय कि बात हैं देवलोक में इन्द्र अपने वाहन “ऐरावत” हाथी पर विराजमान होकर भ्रमण करने लगे। ऐसे करते समय वें दुर्वासा मुनि के आश्रम पर से गुजर रहे थे जिनके पास एक माला थी जिसे उन्होंने देवी कि आराधना करके प्रसाद रूप में पाया था। इन्द्र को उस माला में बिल्कुल भी रुचि न थी इसलिये “ऐरावत” हाथी को उसे लेकर उसको नष्ट करवा दिया। यह देख कर दुर्वासा मुनि क्रोधित हो गये और इन्द्र को श्राप दिया कि उनका सारा धन नष्ट हो जाये और उनका अहंकार जमीन पर आ जाये। इन्द्र का सारा धन उसी क्षण मिट गया। उनको अपनी गलती का एहसास हुआ परंतु उन्हें क्या करना कुछ समझ मे नहीं आया और उन्होंने भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों का शरण स्वीकार किया। भगवान उनके शरण में आये किसी को नहीं छोड़ते। उन्होंने वासुकि नामक सर्प को रस्सी जैसे और मंथारा पर्वत को घुमने का औज़ार बनाकर समुंदर को मथा। उन्होंने कछुआ का अवतार लिया और पर्वत का सारा बोझ अपने उपर लिया। उन्होंने न हिलने वाले समुंदर को हीलाया जो कोई भी कर नहीं पाता। उन्होंने इस पाशुर के अनुसार मथा “आयीरम तोलाई अलाई कदल कदैंधान” (उन्होंने समुंदर को १००० कन्धों से मथा)। मथने के क्रिया से बहुत सा धन उत्पन हुआ और भगवान ने यह सब धन इन्द्र को दिया और उनका धन वापस जमा किया।

अडैन्दान: माता सीता जो भगवान श्रीराम से बहुत दूर थी बहुत उदास थी। भगवान श्रीराम ने माता सीता कि प्रसन्नता हेतु समुंदर पर एक सेतु का निर्माण किया। उन्होंने यह सेतु वानरों कि सहायता से बनाया। उन्होंने उस सेतु को बनाने के लिये बड़े पहाड़ के पत्थरों का उपयोग किया जिसे कोई भी नाप नहीं सकता।

मुदल पडैत्तान: लौकिक अतिवृष्टि के समय सभी जीव जन्तु के पास कोई शरीर न था और ना  ही उस स्थिति में थे जहाँ वें खुशी या दुख को समझ सके। उस समय जब सभी जन उस स्थिति में थे तब भगवान एक और समय का निर्माण कर रहे थे। उन्होंने समुंदर बनाया, तत्पश्चात चार मुखों वाला ब्रह्मा और फिर सब कुछ। इसलिये वह जल है जिसे भगवान ने सर्व प्रथम बनाया।

अन्नीर अमर्न्दान: उन्होंने उस समुंदर का सहारा लिया जिसे उन्होंने निर्माण किया और सब कि रक्षा की। कुछ पाशुर जैसे “वेल्ला तड़ंकदलूल विदनागणै मे मरुवि”, “पार्कदल योगा नितीरै सेयधाई”, “पार्कदलूल पय्या तुईंरा परमन”, “वेल्ल वेल्लातिन मे ओरु पाम्बै मेतयाग विरितु अधन मेईए कल्ला निधिरै कोलगिरा मार्गम”  यही भगवान कि दशा दर्शाते हैं जहाँ वें क्षीरसागर पर विराजमान है।

अडि:- क्या हमारे पास भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करने का कोई स्वयं का उपाय है जिन्हें उपर समझाया गया है? ऐसे भगवान के चरण कमल जिन्होंने समुंदर को मथा, सेतु का निर्माण किया, जल का निर्माण किया और जिन्होंने क्षीरसागर का सहारा लिया यह समझाया गया है। यह कथाएं यह सूचित करती है कि वें हीं सब के रक्षक है जैसे इन्द्र जो सांसारिक वस्तु के लिये उनके पास गया, माता सीता जिन्होने भगवान को छोड़ और किसी कि इच्छा नहीं कि और अनगिनत मनुष्य जो प्रलय में नाश हो गये और फिर जन्म भी लिया। उन्होंने किसी में भेद नहीं किया जिसने शरण लिया या नही लिया हो। ऐसे भगवान के चरण कमल को इस पाशुर में “अडि” समझाया गया है। अत: इस पाशुर का अर्थ इस क्रम में होगा “मुन्नीर अडैन्दान मुदल पडैत्तान अन्नीर अमर्न्दान अडि इरै वनुदया अड़ियागिरा इरैतालगल दरूमत्ताल अन्रि करूमत्ताल, ज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे”

अत: इसका पूर्ण संदेश यह है कि हम स्वयं अपने प्रयत्न से कुछ भी कर ले भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करने के लिये वह उपाय नहीं है। उपाय तो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल हीं है। उसके अलावा और कुछ भी नहीं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ३

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श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  २                                                                                                                        श्लोक ४

श्लोक ३

सभी जीवात्मा को यह समझना चाहिये कि उनका स्वाभाविक गुण भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना है। यह जानकर हमें केवल इसे यहाँ नहीं रुकना है बल्कि उनके प्रति सेवा करते हुए उच्च चोटी पर पहूंचना है। इसे अपमान नहीं समझना और पथभ्रष्ट न होकर लाभ लेना चाहिये। अगर किसी कारण वश कोई जीवात्मा भगवान कि सेवा छोड़ अन्य कार्य में लगा है तो तब यह विचार करना चाहिये कि वह जीवात्मा “दास” प्रकार का है। भगवान कि सेवा छोड़ अन्य कार्य करना व्यर्थ है। भगवान श्रीमन्नारायण जब त्रिविक्रम अवतार लिये उन्होंने पूरे संसार को मापा जिसमे सभी जीव शामील थे। यह आगे बताता है कि सब जीव उनके दास है। क्या इसका यह अर्थ है कि यह उन जीवों को उपयोगी है? नहीं। उस समय वह जीवात्मा यह नहीं समझ सके कि वें भगवान के आधीन है वें इस संसार में अपने प्रारब्ध के कारण जन्म मरण का चक्कर काट रहे है। अत: एक आत्मा को अपने सत्य स्वभाव को जानना चाहिये और भगवान कि सेवा करनी चाहिये। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इस विचार के अलावा उन जीवों के बारें में भी बात करते है जो इस जन्म मरण के चक्कर से बाहर आना हीं नहीं चाहते।


पलङ्गोण्डु मीलाद पावम उलदागिल
कुलङ्गोण्डु कारियम एन कूरीर
तलङ्गोण्ड तालिणैयान अन्रे तनै ओलिन्द यावरैयुम
आलुडैयान अन्रे अवन

अर्थ:

पावम                        : (अगर) दोष
उलदागिल                 : कहाँ होना
पलङ्गोण्डु                 : व्यर्थ धन, पैसा आदि, भगवान से मिलने के पश्चात
मीलाद                      : आध्यात्मिक सलाह के जरिये यह जाने बिना कि वह व्यर्थ है
कारियम एन कूरीर?   : उसका पाने का क्या उपयोग है
कुलङ्गोण्डु                : यह जाने बिना कि हम भगवान कि सेवा हेतु पूर्वनिर्दिष्ट कुल में जन्म लिये है
तालिणैयान               : वह जिसके इतने सुन्दर चरण है जिससे वह
तलङ्गोण्ड                : पूरे संसार को माप लिया
अवन                        : वह हीं व्यक्ति
अन्रे                          : उस वक्त यह सुनिश्चित किया कि
यावरैयुम                  : सभी जीव
तनै ओलिन्द             : उन्हें जोड़
आलुडैयान                : उनके सेवक हीं है

स्पष्टीकरण:

पलङ्गोण्डु मीलाद पावम उलदागिल:- यह उन कुछ लोगों को संबोधित करता है जो सामान्य लाभ जैसे पैसा आदि के पीछे जाते है। इसके पश्चात उनके पास एक अवसर हो सकता है कि वह महान आचार्य कि बाते सुनकर उसके व्यर्थता को समझ सके। यह लोग फिर भी अपनी इस गलती को सुधारने कि कोशिश न करके तात्पूर्तिक धन के पीछे जाते है। यह वह जन है जो बुरे कर्मों से घिरे है। “पावम” शब्द का एक और अर्थ “स्मरण शक्ति” है इसका यह अर्थ हुआ कि उन जन के पास इस दशा में स्मरण शक्ति नहीं है और अपने मूल दशा में जाने से उन्हें रोकता है यानि जब उनके पास यह ज्ञान था कि वह भगवान के सदैव दास है। यह जन अपने आचार्य के परामर्श को सुनते थे, भगवद गीता आदि शास्त्रों से भी सिखते थे। फिर भी वहीं गलती हमेशा करते है और अपने आप को उस बुरे कर्मों से बाहर निकाल नहीं पाते और उस गलती को दोगुणा करते है।

कुलङ्गोण्डु कारियम एन कूरीर?: अगर कसी को भगवान श्रीमन्नारायण को छोड़ अन्य विषयो में रुचि हो तो ऐसा व्यक्ति जन्म मरण के चक्कर में पड़ा रहेगा। वह इसे अपने जीवन से तोड़ना भी नहीं चाहेगा। भगवान उसे अपने चरण कमलों में भी नहीं लेंगे। अत: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी पुछते है कि अगर किसी व्यक्ति को आत्मा के स्वाभाव के बारें में पता हो और फिर भी दूसरे विषयों में रुचि हो तो ऐसे ज्ञान को पहिले स्थान में पाने का क्या मतलब है।

इस मिलाप के समय एक प्रश्न उठता है। क्या यह उस जीव को संतुष्ट नहीं करता है और आत्मा का स्वाभाविक गुण है भगवान का दास बनकर रहना? क्या यह ज्ञान भगवान को आनन्द देता है और अन्त में उसे जीव को भगवान के प्रेम और दया को प्रदान करेगा?

तलङ्गोण्ड तालिणैयान:  यह पद भगवान के त्रिविक्रम अवतार को समझाता है। एक समय कि बात है एक व्यक्ति “महाबलि” था जो तीनों लोक (भूलोक, भुवरलोक और सुवरलोक) पर राज करना चाहता था। अपनी मनोकामना को पूर्ण करने हेतु उसने एक तपस्या कि। यह तीन लोक इन्द्र के पास थे। क्योंकि उनकी संपत्ति को महाबलि से खतरा था इन्द्र ने भगवान कि शरणागति कर ली। भगवान उन सब कि रक्षा करते है जो उनके शरण आते है। इसलिये वह स्वयं “वामन” रूप लेकर उस स्थान पर जाते है जहां महाबलि तपस्या कर रहा था। तपस्या रूप से वह व्यक्ति जो यह करता है उसे वो सब कुछ देना पड़ता है जो कोई व्यक्ति उससे मांगता  है। वामन भगवान दान करने वाले के पास जाकर तीन कदम जमीन मांगे। महाबलि उन्हें तीन कदम जमीन देने के लिये तैयार हो गये। भगवान उसी क्षण अपने पैर से तीन कदम जमीन नापने के लिये बहुत बड़े हो गये। उनके एक कदम ने सारी धरती को नाप लिया। और दूसरे कदम से आकाश। ऐसा कर १४ दुनिया (७ ऊपर और ७ नीचे) को नाप लिया। अब उनके पास नापने के लिए कुछ न था तो उन्होंने अपना तीसरा कदम महाबलि के मस्तक पर रख दिया और उसे पाताल लोक में पहूंचा दिया। इस तरह उन्होंने इन्द्र को बचाया और यह सुनिश्चित किया कि उसके तीनों लोकों को कोई खतरा नहीं है। इस पाशुर “तलङ्गोण्ड तालिणैयान” का अर्थ वह जिसने धरती और आकाश को नाप लिया।

अन्रे तनै ओलिन्द यावरैयुम आलुडैयान अन्रे अवन: जब भगवान ने तीनों लोकों को नापा क्या उन्होंने सारे संसार को यह संदेश नहीं दिया कि वें खुदको छोड़कर इस जगत के मालिक है? वें हीं स्वामी है और हम सब उनके दास है। जब उन्होंने यह कार्य किया उन्होंने नाहि इस बात को सहारा दिया की वह एक हीं हम सब के मालिक है परन्तु वह इतने आनंदित थे वें त्रिविक्रम के रूप में खड़े रह गये। श्रीयोगीवाहन स्वामीजी कहते है “उवंधा उल्लातनै उलगलम अलन्धु”। वह आनंदित थे क्योंकि उन सब को अपने चरणों से छु सकते थे जो उनके दास थे। यह उसी तरह था जैसे एक माँ अपने सोते हुए बच्चे को गले लगाती है। यह समझने के पश्चात मन में एक प्रश्न आ सकता है कि अपने बच्चे पर निर्हेतुक कृपा करनेवाले कैसे उनको जन्म मरण के चक्कर में हमेशा के लिये रख सकता है? इसका कारण आगे बताया जायेगा। एक व्यक्ति भगवान और उनकी कृपा को भूल जाता है। वह सांसारिक कार्य में लगा हुआ रहता है, सांसारिक धन कमाने में और उनके प्रति आसक्त हो जाता है। इसके फल स्वरूप वह सांसारिक धन के जाल में इस तरह फस जाता है कि वह स्वयं अपनी असली पहिचान भूल जाता है। सांसारिक धन में रुचि के कारण वह अपने आचार्य कि सलाह सुनकर भी यह सब नहीं छोड़ सकता। वह “अड़िएन” आदि जैसे शब्दों का प्रयोग करता है यह कहने के लिये कि वह भगवान का दास है वह फिर भी भगवान छोड़ दूसरे लाभ के पीछे जाता है। अगर यह दशा है तो भगवान सही समय का इंतजार करते है की उसे यह एहसास हो जाय कि यह गलती है और वह भगवान के चरण कमलों कि चाहना करने लगे। जब तक यह अद्भुत समय नहीं आता है भगवान उस व्यक्ति कि रक्षा नहीं करते है।

श्रीतिरुवल्लुवर इस तत्त्व का निचोड़ कहते है “पिरवि पेरुंकडल निंधुवर, निंधार इरैवन अदी सेराधार” और “पर्रुगा पर्रारान पर्रिनै अप्पर्राई पर्रुगा पर्रू विदर्कु”। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अर्राधु उर्रदु विदु उयिर”।

अत: प्रमेयसारम के पहिले तीन पाशुर “उव्वानवर”, “कुलम ओन्रु” और “पावम” में “ॐ नमो नारायणाय” में “ॐ” शब्द का अर्थ समझाया गया है। अगले चार पाशुर में “नमो” शब्द पर चर्चा करेंगे।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – २

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक १                                                                                                                         श्लोक ३

श्लोक  २

प्रस्तावना: पिछले पाशुर में हमने यह देखा कि जीवात्मा को तीन प्रकार में बांटा गया है (अ) वह जिसका जन्म उसके कर्मानुसार शरीर में ही बार बार होता है, (आ) वह जो भगवान कि निर्हेतुक कृपा से संसार के जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा पाता है और (इ) वह जो कर्म से प्रभावित नहीं है और भगवान के साथ समान स्वर में है। पहिले श्रेणी का आत्मा वह है जो उसके कर्मानुसार किसी शरीर में रहती है। इन आत्माओं को जन्म मरण का चक्कर निरन्तर आते रहता है जैसे नदी में बाढ़ आती है। इसका क्या कारण है और इससे मुक्त होने कि राह क्या है? यह पाशुर इन सब प्रश्नों का उत्तर देते है:

“कुलम ओन्रु उयिर पल तम् कुट्रत्ताल इट्ट
कलम ओन्रु करियमुम वेरम
पलम ओन्रु काणामै काणुम करुत्तार तिरुत्तालगल
पेणामै काणुम पीलै”

अर्थ :

ओन्रु               : केवल एक हीं
कुलम             : जाति / दासों का परिवार (भगवान श्रीमन्नारायण के)
उयिर              : हालाकि वह आत्मा जिसमे यह दास होने का गुण है
पल                 : वह ज्यादा है
तम् कुट्रत्ताल  :  ऐसे आत्मा के अच्छे और बुरे कर्म
इट्ट                 : भगवान श्रीमन्नारायण तक सीमित है
कलम             : एक पात्र में जिसे “शरीर” कहते है
ओन्रु               : वह एक ही तरह का होता है जो एक हीं पदार्थ से बना है “मूल पोरुल”
करियमुम       : ऐसे आत्मा के क्रिया
वेरम               : बिरंगा है उसके कर्मानुसार
पीलै               : एक आत्मा के लिये गलत कार्य करने का है
पेणामै काणुम : नहीं पकड़ना
तिरुत्तालगल  : चरण कमल
करुत्तार         :  आचार्य के
काणुम           : जो आत्मा पर कृपा करते है
काणामै          : बिना
पलम ओन्रु     : कोई लोभ देखते हुए
स्पष्टीकरन:

कुलम ओन्रु: इस संसार में सभी जीव एक हीं परिवार से है जो उनके स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण के दास है। जीव का सच्चा गुण यह है कि उसके अच्छाई और बुराई में कुछ गड़बड़ न करे परन्तु अपने स्वामी के प्रति निष्ठावान रहें। यह जीव का प्राकृतिक गुण है और बदलेगा नहीं। यह परिवार” दासों का परिवार “है ऐसे कहकर संबोधित करते है। इसका उदाहरण “तोण्ड़कुलतिलुलर” (तिरुपल्लाण्डु -५)।

उयिर पल: ऐसी आत्मा अनगिनत है। ऐसे अनगिनत आत्मा हमेशा के लिये अपने स्वामी श्रीमन्नारायण के दास है।

तम् कुट्रत्ताल इट्ट कलाम ओन्रु: ऐसे आत्मा एक पात्र में रहते जिसे “शरीर” कहते है। उन्हें यह शरीर उनके अच्छे और बुरे कर्मानुसार भगवान श्रीमन्नारायण ने दिया है । ऐसी सभी शरीर एक हीं पदार्थ से बना है। इस पदार्थ को “प्रकृति” कहते है। अत: यह कहा जा सकता है कि शरीर वह है जो एक ही पदार्थ से बना है। इसके लिये यह समानता है कि जो भी रेत से बना है वह रेत है। जो भी बहुमूल्य धातु से बना है वह बहुमूल्य है। उसी तरह जो प्रकृति से बना है वह प्रकृति है। यह पद “तम् कुट्रत्ताल इट्ट कलाम ओन्रु” को उसके हर एक बाद का अर्थ जानकर समझा जा सकता है। भगवान श्रीमन्नारायण इन आत्मा को उनके कर्मानुसार शरीर देते है। “कलाम” का सही अर्थ पात्र है परन्तु यहाँ उसका अर्थ “शरीर” है। क्योंकि सभी शरीर धातु से ही बने है उसे “कलाम ओन्रु” ऐसा समझाया गया है।

“ऊर्वा पढ़िनोंराम ओन्बधु मानुदम
निर परावै नार्काल ऑर पप्पतु
स्ल्रिया बंधमान्धेवर पढ़िनालु अयन पदैता
अंधमिल स्ल्र्तावरम नालैन्धु”

इस पद्य में हम यह समझ सकते है कि रंग बिरंगे रूप जिसमे आत्मा वास कर सकता है। यह दोनों रूप के मध्य में अनगिनत उप-रूप है जिसे हम गिन सकते है। कितने भी अनगिनत शरीर के वर्ग हो हम उन्हें एक ही छत्री के नीचे रख सकते जिसे “शरीर” कहते है क्योंकि वह एक हीं पदार्थ से बना हुआ है जिसे “प्रकृति” कहते है। श्री शठकोप स्वामीजी अपने सहस्त्रगीति में कहते है “पिणाक्कि यावयुं पिझयामल बेदितुम बेधियाधधु ऑर कणक्किल कीर्ति वेला कढ़ी ज्ञान मूर्तियिनाई”

यहाँ श्री शठकोप स्वामीजी भगवान के अद्भुत ज्ञान का उत्सव मनाते है जो इतने अनगिनत आत्मा को उस आत्मा के छोटे से छोटे कर्म जो उसने अपने अनगिनत जीवन में किये है उसे भूले बिना शरीर देते है ।

करियमुम वेरम:  जैसे अनगिनत आत्मा यह आत्मा जो इन शरीर में रहकर अनगिनत क्रियाये करती है वह भी अनगिनत है। जबकी उन आत्मा के अच्छे गुण उसे कम समय के लिये स्वर्ग में बेजेगा और बुरे कर्म उसे नरक में डालेगा। और फिर सुख/सजा का स्वर्ग और नरक में अन्त होने के पश्चात फिर इस जन्म मरण के चक्कर में आना पड़ता है।

“वगुत्तान वगुत वगयल्लाल कोडी तोगुतार्क्कुम तुयतलरिधु” यह एक तिरुक्कुरल है। “वगुत्तान” विषय भगवान श्रीमन्नारायण को संबोधित करता है जो जीव के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब रखते है और यह सुनिश्चित करते है कि उस आत्मा को उसके कर्मानुसार सजा मिले। वह किसी एक के कर्म की सजा गलती से भी या अयोग्यता के कारण दूसरे को नहीं देते।

“करियमुम” शब्द में “उम” कुछ दर्शाता है। यहाँ कई आत्मा है परन्तु उनके लिये केवल एक हीं परिवार है “दासों का परिवार”। उसी प्रकार यह आत्मा केवल एक हीं प्रकार के शरीर में प्रवेश करते है परन्तु यह अनगिनत क्रियाये करते है। जीव का सामान्य स्वभाव अपने स्वामी श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना है। हालाकि इस सत्य स्वभाव का एहसास हुए बिना वहाँ अनगिनत आत्मायें है जो जन्म-मरण, स्वर्ग-नरक, अनगिनत कार्य करना आदि में पडे रहते है। यह कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है जैसे तुफान में बहता हुआ पानी। अगर कोई इसका सही कारण जानना चाहता है और इस संसार बन्धन से छुटना चाहता है तो सबको इन बातों पर गौर करना चाहिए:

पलम ओन्रु काणामै काणुम करुत्तार तिरुत्तालगल पेणामै काणुम पीलै: इसका कारण बहुत सरल है। गलती यह है कि जीव आचार्य के समीप जाकर उनके चरण कमलों को नहीं पकडा है। यह “करुत्तार तिरुत्तालगल पेणामै काणुम पीलै” इस पद में समझाया गया है। एक आचार्य को “पलम ओन्रु काणामै काणुम करुत्तार” इस तरह इस पाशुर में बताया गया है। एक आचार्य जब एक शिष्य बनाते है तो वह उस शिष्य से अपने लिये कोई सांसारिक लाभ कि अपेक्षा नहीं करते जैसे प्रतिष्ठा, पैसा या स्वयं के पास इतने शिष्य होने की अपेक्षा कि वह शिष्य उनके लिये दासों कि तरह सेवा करे, आदि। वक अपने शिष्य के लिये उसे परमपद प्राप्त हो जाये इस एक ही बात कि कामना करते है। वह केवल इसीके लिये तरसते है और कुछ नहीं। इसके साथ वह अपने शिष्य को आशिर्वाद प्रदान करते है और वह सब ज्ञान देते है जिससे वह अपने अंतिम लक्ष्य परमपद पहुँच जाये। आचार्य के चरण कमलों में शरण ना लेना इस जन्म मरण के चक्कर में पड़े रहने का यहीं कारण है । आचार्य कि कृपा ही इस जीवात्मा के लिये अच्छा संसार बनाता है। सभी को आचार्य के पास जाकर उनके चरण कमलों में शरण लेना चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि जीव के जो अनगिनत कर्मानुसार प्रारब्ध जमा हुआ है वह आचार्य कृपा से मुक्त हो जायेगा। आचार्य कि ऐसी महिमा इस पाशुर में समझायी गयी है “तिरुत्तालगल पेणुधल”। “तिरुत्तालगल पेणुधल” का अर्थ आचार्य के चरण कमलों को पकड़ना है। “तिरुत्तालगल पेणामै”  इसके विपरित बताता है यानि आचार्य के चरण कमलों को नहीं पकड़ना। यह भूल (पीलै) है। हम आचार्य कि महिमा श्रीवचण भूषण में देख सकते है —
भगवलाभम् आचार्यनाले | आचार्य लाभम् भगवानाळे | आचार्य संभन्धम् कुलयादे किडन्दाल् ज्ञान भक्ति वैराज्ञङ्गळ् उण्दाक्कि कोळ्ळलाम् | आचार्य संभन्धम् कुलैन्दाल् इवै (ज्ञान, भक्ति) उण्डानालुम् प्रयोजनम् इल्लै | तालि किडन्दाल् भूषणङ्गळ् पण्णिप्पोडलाम् | तालि पोनाल् भूषणङ्गळ् एल्लाम् अवदयतै (श्राप का मूल कारक) विळैककुम् | स्वाभिमानत्ताले ईश्वर अभिमानत्तैक्कुलैत्तु कोन्ड इवनुक्कु आचार्य अभिमानम् ओळिय गति इल्लै एन्रु पिळ्ळै पल कालुमरुळिच्चेय्य केटु इरुकैयायिरुककुम् | स्वस्वातन्त्रिय भयत्ताले भक्ति नळुविट्रु (नळुवित्तु), भगवद् स्वातन्त्रिय भयत्ताले प्रपत्ति नळुविट्रु (नळुवित्तृ) | आचार्यनयुम् तान् पट्रुम् (पत्तुम्) पट्टृ अहंकार गर्भमागयाले कालन् कोण्डु मोदिरम् इडुमो पादि | आचार्य अभिमानमे उत्तारकम् — श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र – ४३४

शास्त्र भक्ति के बारें में चर्चा करता है जो हर एक को परमपद ले जाने का वचन देता है। इससे भी अधिक प्रपत्ति (शरणागति) है जो उसे भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों में ले जाता है। अगर दोनों विधि मनुष्य को परमपद नहीं ले जाता है तो ऐसी स्थिति में आचार्य के शरण होना यही विकल्प उस व्यक्ति के पास बचता है । अगर ऐसे आचार्य अपने शिष्य को “यह मेरा है” ऐसा बुलाते है तो इससे अधिक उस व्यक्ति और कुछ नहीं चाहिये । वह उस मनुष्य को परमपद ले जायेंगे । अत: इस पाशुर का यह तत्त्व है कि जिस पर आचार्य कृपा हो गयी हो उसका परमपद जाना निश्चित है और जिस पर नहीं हुयी है तो उसे तो इस संसार के जन्म मरण के चक्कर में पड़े रहना है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – १

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

तनियन्                                                                                                                          श्लोक  २

श्लोक १

तिरुमन्त्र का तत्त्व “ॐ” है जिसे “प्रणव” भी कहते है। प्रणव कि कठिनाई यहाँ पहिले पशुर में समझायी गयी है।

अव्वानवरूक्कु मव्वानवर एल्लाम
उव्वानवर अडिमै एन्रु रैत्तार – इव्वारु
केट्टिरुप्पार्क्कु आलेन्रु कण्डिरुप्पार मीद्चियिला
नाट्टिरुप्पार् एन्रि रुप्पन नान्!!!

 अर्थ:

उव्वानवर              : आचार्य
उरैत्तार                 : कहते है कि
मव्वानवर एल्लाम : सभी आत्मा एकत्रित में “म” शब्द को संबोधित करते है वह
अडिमै                  : सेवक है
अव्वानवरूक्कु      : भगवान श्रीमन्नारायण के जो “अ” शब्द से संबोधित किये हुए है।
इव्वारु                  : कुछ लोग है जो
केटु                      : ध्यान से सुनते है
रुप्पार्क्कु               : आचार्य द्वारा उपर बताये उपदेशानुसार रहना।
कण्डिरुप्पार          : वह लोग जिन्हें यह एहसास हो जाता है कि
आलेन्रु                  : वह उन जनों के सेवक है जो अपने आचार्य के आज्ञानुसार रहते और सुनते है
इरुप्पार् एन्रि         : और नित्य, मुक्त और अन्य भक्तों के साथ जाते और हमेशा के लिये रहते
नाडु                      : परमपदधाम में जहाँ
मीद्चियिला          : से वापस नहीं आना है
नान्                     : अड़िएन जो श्रीरामानुज स्वामीजी का भक्त है
इरुप्पन                : वह दृढ़ता से इस पर विश्वास करता है।

स्पष्टीकरन:

अव्वानवरूक्कु: “अ” शब्द / शब्दांश का अर्थ भगवान श्रीमन्नारायण हीं है। वेदों में भगवान को “अ” बताया गया है। इस पाशुर में “अ” शब्द दोनों “नाम” और उसके अर्थ के लिये उपयोग किया गया है यानि “अ” शब्द भगवान उसका लक्ष्य ऐसा दर्शाया गया है और उसका अर्थ भगवान ऐसा बताया गया है। नाम और उसका अर्थ दोनों के बीच में सम्बन्ध का अस्तित्व अलग अलग नहीं है यह हमेशा सामांजस्य होना चाहिये। यह इस पाशुर में “अ” शब्द से समझाया जा सकता है। महाकवि कालिदास अपने महान कलाकृत “रघुवंशं” में यह स्थिति समझाते है जहाँ भगवान और अम्माजी साथ में है। वह उन्हें न जुदा होनेवाला ऐसा समझाया जैसे “शब्द और उसका अर्थ”। यह “नमक” ऐसे कहने के समान है क्योंकि यह नमकिन है। इसलिये भगवान स्वयं भगवद् गीता में कहते है “सभी अक्षरों में मैं हीं “अ” हूँ”। इसलिये तिरुवल्लुवर कहते है “अगरा मुधला एझुतेल्लाम आदिभगवान मूधर्रे”।

“अ” नाम श्रीमन्नारायण को हीं संबोधित करता है। इसका मूल है “अ” = “अव रक्षणे” यानि वह जो रक्षा करता है। वेदों में एक अलग विभाग है जो यह चर्चा करता है और कोई नहीं। यह “सामन्याधिकरणं” तर्क शास्त्र पर चर्चा करता है जो यहाँ से नही गुजरता है। पर हम इसे एक बहुत सरल और सामान्य शास्त्र में समझेंगे। श्रीमन्नारायण सभी कारणों के कारण है। यह आल्वारों के पाशुर, वेदों, उपनिषद आदि में सिद्ध हुआ है। वह सभी वस्तु, सीमित, अनंत, चेत, अचेत के सूत्र है। इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उनके या उनके सम्बन्ध के बिना जन्म न लिया हो। उसी तरह “अ” शब्द सभी शब्दों में है एक रूप या अलग रूप में।

वह सभी अक्षरों / शब्दों / ध्वनी का स्त्रोत है जैसे भगवान सभी वस्तु के स्त्रोत है। श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में कहते है “करन्धेंगुम परंधुलन” और “करन्धा सिलिदम थोरूं इदन थिगझ पोरुल थोरूं”। वह सभी अस्तित्व में है। वह दूध में घी देखने के समान है। वह दूध में मौजूद है परन्तु हमें दिखता नहीं है। परन्तु दूध में घी की उपस्थिती नकारी नहीं जा सकता। इसलिये “अ” शब्द और भगवान एक हीं समान है क्योंकि यह दोनों में से सब का जन्म हुआ है। इसलिये “अ” भगवान को संबोधित करता है और किसी को नहीं।

कंबनात्ताझ्वान अपने बाल काण्ड के कड़िमणप पदलम में कहते है “भू मगल पोरुलूम एना”। इसका अर्थ यह है कि अगर हम “अ” उसका अर्थ कहते है यानि “भगवान” के बारे में अपने आप हीं समझाया जा सकता है।

मव्वानवर एल्लाम: “म” शब्द सभी आत्मा के स्वर को दर्शाता है। यही “म” शब्द का अर्थ है। शास्त्र कहता है “म” कार हमेशा एक वस्तु को दिखाता है जिसके पास विवेक है। हालाकि वह यह कहता है कि “एक” वस्तु और इस का अर्थ एक आत्मा, वह सामुहिक नाम है उसमे सब कुछ शामिल है। इसको एक उदाहरण देते हुए अगर हम कहे कि “यह एक धान का बीज है” हम यह नहीं कहते कि वहाँ केवल धान का एक ही बीज है। हमारा यह अर्थ है कि वहाँ केवल एक प्रकार के धान का हीं बीज है। इसलिये एक वचन एक प्रकार के लिए है ना कि इकाई के लिए। उसी तरह “म” सभी आत्मा जिसमे विवेक है उन्हें शामिल करता है। आत्मा को तीन प्रकार कि श्रेणी में बांटा गया है। (अ) वह जिसका जन्म उसके कर्मानुसार शरीर में ही बार बार होता है, (आ) वह जो भगवान कि निर्हेतुक कृपा से संसार के जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा पाता है और (इ) वह जो कर्म से प्रभावित नहीं है और भगवान के साथ समान स्वर में है। यह तीन को “बद्ध”, “मुक्त” और “नित्य” कहते है। इन तीनों को सामुहिक एक ही शब्द “म” से कहते है ।

उव्वानवर: “उव्वानवर” शब्द उस व्यक्ति को संबोधित करता है जो “उ” शब्द का अर्थ है। “उकार” आचार्य को समझाता है। शास्त्र कहते है “उ” कार का सीधा अर्थ अम्माजी पेरिया पिरट्टी श्री महालक्ष्मी है। वह एक आत्मा और परमात्मा के बीच कि डोर है और दोनों का मिलन हो जाये यह सुनिश्चित करती है। उसी तरह वह आचार्य हीं है जो आत्मा और भगवान श्रीमन्नारायण को मिलाते है। क्योंकि अम्माजी और आचार्य का कार्य एक ही है इसलिये “उ” कार आचार्य को भी संबोधित करता है। इसके अलावा आचार्य को अम्माजी के प्रति भक्ति और उनका स्नेह प्राप्त है। आचार्य यह सुनिश्चित करते है कि जो आचार्य के चरण कमलों के शरण होता है उसे अम्माजी का स्नेह प्राप्त होता है और फिर भगवान का प्रेम और स्नेह भी प्राप्त  होता है। क्योंकि आचार्य और अम्माजी वही कार्य करते है यानि भगवान का हमारे प्रति प्रेम, आचार्य को “उ” से संबोधित किया है वही शब्द जिसका अर्थ “अम्माजी” है।

इस दृष्टांत के लिये एक कथा है। एक बार जब श्रीरामानुज स्वामीजी प्रसन्न थे उन्होंने अपने शिष्य “श्रीदाशरथी स्वामीजी” को “उ” कार का अर्थ समझाया। श्रीदाशरथी स्वामीजी ने यह अपने पुत्र “कन्धादै आण्डान” को बताया जिन्होंने यह “भट्टर” को बताया। जैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने “उ” कार का अर्थ समझाया था उसे एक ग्रन्थ रूप में संग्रह किया गया जिसका नाम “प्रणव संग्रहं” है। इस ग्रन्थ में “उ” कार का अर्थ आचार्य कहा गया है। “प्रमेय सारम” के लेखक है श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी। क्योंकि वह इस ग्रन्थ में “उ” कार के अर्थ कि चर्चा करते है, यह हम परिणाम निकाल सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को “उ” कार का सही अर्थ कहते है। वह श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। उन्होंने उनकी कई वर्षो तक सेवा कि और उनके श्रेष्ठ दया का लक्ष्य बने।

अडिमै एन्रुरैत्तार: यह जीवात्मायें उनके अनादि स्वामी जिन्हें “अ” (श्रीमन्नारायण) कहते है उनकि सेवा करते है । “म” और “अ” के बीच में जो सम्बन्ध उत्पन्न हुआ वह “स्वामी-दास” है। यह सम्बन्ध “म” को आचार्य प्रधान करते है जो मध्यस्थ है। केवल जब आचार्य (जो यहा उ से दर्शाया गया है) शिष्य (जो यहा म से दर्शाया गया है) को सम्बन्ध दिखाते है तब शिष्य को पूरी विवेक से यह मालुम होता है। इसलिये यह पद उव्वानवरूक्कु मव्वानवर एल्लाम उव्वानवर अडिमै एन्रु रैत्तार” आगे बढ़कर आचार्य भगवान और आत्मा के बीच में “स्वामी / दास” सम्बन्ध को बाताते है। इसे बताने के लिये एक कथा है जो श्रीसहस्त्रगीति के इडु व्याख्यान में है।

एक समय एक व्यापारी था जिसका काम दूसरे जगह जाकर व्यापार कर धन कमाना था। उसकी पत्नी गर्भवती थी। एक दिन वह घर छोड़ समुद्र के उस पार दूसरे देश व्यापार के लिये पहुँच गया। जाने से पूर्व उसने अपनी पत्नी से कह गया कि उसे आने में समय लगेगा और वह उनके आनेवाले पुत्र को “व्यापार” का पाठ सिखाये। कुछ समय बाद उसने एक लड़के को जन्म दिया। वह लड़का बड़ा हुआ और वह व्यापार के गुण सिख गया। अब दूसरे देश में व्यापार करने का उस लड़के का समय था। संयोग से वह उसी देश में चला गया जहाँ उसके पिता गये थे। वह वहाँ व्यापार करने लगा। एक दिन पिता पुत्र में कुछ व्यापार नियम को लेकर झगड़ा हो गया। यह देख बहुत जन जमा होगये। उन लोगों में एक बुढ़ा था जो बाप बेटे दोनों को जानता था। यह देख वह बुढ़ा बोला “आप दोनों झगड़ा क्यों कर रहे हो? आप दोनों पिता पुत्र हो”। उसने  उनका सम्बन्ध बताकर उन्हें एक कर दिया। उनके सम्बन्ध जानकर उनके खुशी का ठिकाना न रहा। अत: आचार्य भक्त और भगवान के बीच में मध्यस्थ है। यह सम्बन्ध कोई नहीं बनाता। यह सदैव के लिये है। इस कथा में उस बुढे व्यक्ति ने कोई नया सम्बन्ध नहीं बनाया उसने केवल उनके सम्बन्ध को याद करवाया। एक बात इस कथा में यह है कि पिता यह भूल गया कि वह पिता है परन्तु सच्चाई में भगवान कभी कुछ नहीं भुलते। वह सिर्फ आचार्य के रूप में अवतार लेते है ताकि कोई भी उन तक आसानी से पहुँछ जाये और शरण हो जाये।

अत: आचार्य वह है जो भगवान और भागवत के बीच मध्यस्थ का कार्य करते है । वह उनमें “भगवद-सेवक” सम्बन्ध प्रगट करते है। आचार्य शिष्य को भगवान के बारें में बताते है। वह कहते है भगवान हीं हम सब के लिये माता, पिता, सम्बन्धी और सब कुछ है। दूसरी तरफ यही आचार्य भगवान से कहते है कि यह आत्मा आप से अलग रह नहीं सकता इस पुत्र को क्षमा कर आपके चरण कमलों में शरण दे। आचार्य ऐसा कर उस आत्मा को मुक्त कर देते है। यही कार्य आचार्य एक व्यक्ति के लिये करते है जिसे इस पाशुर में उत्सव रूप में मनाया गया है।

इव्वारु केट्टिरुप्पार्क्कु: यह उन समूह के लोगों को दर्शाता है जो “अ”, “उ” और “म” कार को अच्छी तरह सुनकर उसका पालन करते है। तिरुमन्त्र स्वयं में भगवान का नाम है “नारायण”।  इसको “नर” और “आयण” में अलग किया जा सकता है। एक बार आचार्य अपने शिष्य को “नर” और “आयण” के सम्बन्ध के बारें में समझाते है। “नर” आत्मा है और “आयण” भगवान श्रीमन्नारायण है। आचार्य यह ज्ञान देते है कि आत्मा अपने स्वामी श्रीमन्नारायण का दास है। यह ज्ञान प्राप्त कर शिष्य अपना जीवन इसे पालन करके बिताता है।

आलेन्रु कण्डिरुप्पार: कुछ लोग है जो ऐसे शिष्य कि सेवा करते जो पिछले प्रकरण में समझाया गया है। यह लोग इन शिष्य को उनके लिये सब कुछ मानते है। सबसे पहिले भगवान श्रीमन्नारायण का दास हूँ ऐसा मानना चाहिये। इस शास्त्र को आगे बढ़ाते हुए यह मतलब है कि वह दास सबकुछ करेगा जो उसके स्वामी श्रीमन्नारायण को पसन्द है। भगवान कि पसन्द और कुछ नहीं वह व्यक्ति उनके दासों का दास रहे और उनका कैकर्य करें यही है। अत: एक व्यक्ति के अंतिम नियम यह है कि वह भगवान श्रीमन्नारायण के दासों का दास रहे। इस पाशुर में “आलेन्रु कण्डिरुप्पार”  पद में यहीं समझाया गया है।

तिरुमन्त्र में एक आत्मा के तीन गुण को समझाया गया है। वह है (अ) यह आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण का हीं दास है। (आ) भगवान श्रीमन्नारायण छोड़ आत्मा को शरण लेने के लिए और कोई स्थान हीं नहीं है और (इ) भगवान छोड़ आत्मा के पास और कोई आनंदमय नहीं है। इन आत्मा के तीन गुणों में एक ऐसा अर्थ है जो अंतनिर्हित है। अगर हम “श्रीमन्नारायण” को “श्रीमन्नारायण के भक्तों” से बदलते है तो हमें आत्मा के तीन गुण प्राप्त होते है जो भगवान श्रीमन्नारायण के भक्तों के सम्बन्ध से है। वह है (अ) यह आत्मा श्रीमन्नारायण के भक्तों के सिवाय और किसी का दास नहीं। (आ) श्रीमन्नारायण के भक्तों के अलावा इस आत्मा का और कोई शरण नहीं है। (इ) श्रीमन्नारायण के भक्तों के सिवाय आत्मा के पास और कोई खुशी नहीं है। “श्रीमन्नारायण” को छोड़ “श्रीमन्नारायण के भक्तों” के बारें में चर्चा करने का यह कारण है कि भगवान श्रीमन्नारायण अपने भक्तों से हीं सर्वाधिक प्रेम करते है। अत: यह अंतर्विरोधि नहीं है। यह आगे बढ़कर भगवान के भक्तों के दास होने का अर्थ समझाता है जिसे “चरम पर्व निष्ठा” कहते है। अत: किसी को सही पहचानना हो तो यह जानना चाहिये कि वह भगवान का भक्त है। यह समझने के पश्चात दूसरे कदम कि और चलना नाकि अंतिम पडाव कि ओर।

मीद्चियिला नाट्टिरुप्पार् एन्रि रुप्पन नान्: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को यह दृढ़ विश्वास है कि जो भगवान के दासों के दास है वह परमपद अवश्य जायेंगे जहाँ से कोई वापस नहीं आता। वहाँ वें सब नित्यसूरी के संग में रहेंगे जो हमेशा भगवान के निकट रहते है। वह “नान्” शब्द का प्रयोग करते हुऐ यह ज़ोर देते है कि वह इस पर विश्वास करते है। इसका यह कारण है कि श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी से वेदों के गुप्त अर्थ कि शिक्षा प्राप्त किये है। वह बहुत सम्माननीय थे क्योंकि वह अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी के शब्दानुसार जीवन व्यतीत करते थे। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी से वेद और अन्य शास्त्र सीखने के पश्चात यह निर्णय किये कि यही सत्य है। सत्य यह है कि यह लोग जो भगवान के दासों के दास है इस संसार के भोगो को भोगने के लिये फिर वापस नहीं आते। वह परमपद पहूंचकर वहाँ नित्यसुरीयों के साथ हमेशा रहते है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – तनियन्

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्                                                                                            श्लोक – १

प्रमेय सारम तनियन:

 नीङ्गमल एन्रुम निनैत्तुत तोलु मिंकल नीणिलत्तीर
पाङ्गाग नल्ल पिरमेय सारम परिन्दलिक्कुम
पूङ्गा वलम पोलिल सूल पुडै वालुम पुदुप्पुलि मण
आङ्गारमट्रे अरूलाल मामुनि अम पदमे!!!

अर्थ:

नीणिलत्तीर         : अरे! इस बड़े संसार के लोग!!!
एन्रुम नीङ्गमल    : किसी भी समय में उन्हें अलग नहीं करना
निनैत्तुत             :  निरन्तर सोचना
तोलु मिंकल         : और उनके प्रति विलम्ब करना
अम पदमे            : उनके सुन्दर चरण कमल
अरूलाल मामुनि  : जो श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी है
आङ्गारमट्रे         : एक अभिमान रहित व्यक्ति (ज्ञान, धन और उच्च जाति जन्म) और वह जो
परिन्द                : अपनी कृपा के साथ आशिर्वाद दिया और
लिक्कुम             : हमें ग्रन्थ रूप में प्रदान किया
पिरमेय सारम     : “प्रमेय सारम” कहलाता है जो हमें तिरुमंत्र का तत्त्व देते है
पाङ्गाग             : लाभप्रद है
नल्ल                 : आत्मा के पोषण के लिये
मण                  : यह देवराज मुनि स्वामीजी कवि थे (मार्गदर्शक)
वालुम               : जो रहते थे
पुदुप्पुलि           : एक जगह जिसका नाम “पुधुप्पुली” जो घिरा हुआ था
पूङ्गा               : सुन्दर बागों से और
वलम पोलिल    : उपजाऊ बाग
सूल पुडै            : चारों ओर से
स्पष्टीकरण:

तनियन में पद “नीणिलत्तीर!!! अरूलाल मामुनि अम पदमे नीङ्गमल एन्रुम तोलुमिंकल!!!” होना चाहिये।  इसका अर्थ यह है कि इस तनियन के रचयिता सांसारिक लोगो को बुलाते है और उन्हें जाकर अरूलाल मामुनि के चरण कमलों में हमेशा दण्डवत करने को कहते है। यहाँ “एन्रुम” शब्द “नीङ्गमल” और “निनैत्तुत” से पहिले जोड़ना चाहिये। इसलिये यह पद “एन्रुम नीङ्गमल” का अर्थ “बिछड़े बिना या कभी नहीं जाना” और “एन्रुम निनैत्तुत” यानि “हमेशा इस विषय के बारें में विचार करना”। “प्रमाणम” शब्द विश्वसनिय / उययुक्त मूल है जिसके साथ कोई भी कुछ भी जान सकता है। प्रमाणम का अभिप्राय है प्रमेयम। प्रमेयम का तत्त्व प्रमेयसारम है।

प्रमाणम – मापदण्ड जो एक वस्तु से जाना जाता है
प्रमेय – वह जिसे मापा गया है / समझे
सारम – कठिन बात / तत्त्व
मानम / मेयम – तत्त्व
यहाँ प्रमाण तिरुमंत्र है। तिरुमंत्र का अर्थ प्रमेयम है। प्रमेयम का तत्त्व प्रमेयसारम। “नल्ला प्रमेयसारम” “नल्ला मरई” कहने के समान है जिसका अर्थ बिना दोष या दोषरहित।

पाङ्गाग: प्रमेयसारम ग्रन्थ बहुत सरल है जो इसे पढना चाहते है वह इसके सुन्दरता और सरलता में पकडे जाते है। तिरुमंत्र के तत्त्वों को इन १० पाशुरों में बहुत सुन्दरता से समझाया गया है। इसलिये इसे प्रमेयसारम कहा गया है।

परिन्दलिक्कुम: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ने इस संसार के लोगो पर “प्रमेय सारम” नामक सुन्दर ग्रन्थ देकर कृपा कि है। उन्होंने सभी लोगों को आशीर्वाद दिया कि वह अपने सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य के  तह तक पहूंच जाये। उनका श्रेष्ठ आशीर्वाद एक बहुत आसान संक्षेप ग्रन्थ रूप आ गया। उन्होने  अपने आचार्य श्रीरामानुजाचार्य कि आज्ञा का पालन किया जिन्होंने अपने शिष्यों को उन सब को जिन्हें इसमे रुचि है सर्वश्रेष्ठ अभिप्राय का प्रचार प्रसार करने को कहा ।

अरूलाल मामुनि: “मुनि” वह है जो हमेशा दूसरों कि भलाई के बारें में सोचता है। यह स्वभाव केवल मुनि में देखा जा सकता है और किसी व्यक्ति में नहीं। इसलिये यहाँ उन्हें “मामुनि” या विशेष मुनि कहकर सम्मानित किया है। ऐसे मामुनि  के लक्षण यह है कि वह अभिमान रहित होते है। उनमें पूर्णत: किसी भी अभिमान की दुर्लभता को “अंगाराम अर्रा” कहते है। इस तानियन के लेखक हमे ऐसे आचार्य के चरण कमलों पर दण्डवत करने को कहते है। वह व्यक्ति जब दण्डवत करता है तो उसे अपने मन में उसी तरह एक देह और परछाई के सम्बन्ध के समान मामुनि के चरण कमलों का ध्यान करना चाहिये। “अम पदमे” शब्द में दूसरा दर्जा जो समाप्त हुआ वह गुप्त है। वह टोल्काप्पिया व्याख्यान का पालन करता है जी कहता है “ऐयुं कण्णुम अल्ला पोरुलवैं में उरुबु थोगा”।

अम पदमे: “अम” शब्द का अर्थ सुन्दर और “पदमे” सुन्दर चरण को दर्शाता है। चरण कि सुन्दरता यह है कि अपने किसी भी शिष्य को किसी भी समय में नहीं त्यागना। “अमपदमे” में समाप्त होने वाला शब्दांश “एकाराम” यह तथ्य समझाता है कि अगर हम श्री अरूलाल मामुनि स्वामीजी के चरण कमलों में आ जाये तो हमें भगवान के पास जाने कि कोई जरूरत नहीं है और यही तात्पर्य है।

पुदुप्पुलि: जगह जहाँ श्री अरूलाल मामुनि निवास करते थे।

मण: वह जो मार्गदर्शकों कि सेवा करते थे जो वेदों और शास्त्रों में निपुण थे। वह स्थान “पुदुप्पुलि” जो एक स्थान था सुन्दर बागों और उपजाऊ बाग से घिरा हुआ था। वह आगे और कहते है जिन्हें अधिक ज्ञान ग्रहण करना हो उनके लिये यह उत्तम स्थान है।

पुडै: चारों ओर से घिरा हुआ।

हे! इस महान संसार के लोगों!!! कृपया स्वामी अरूलाल मामुनी स्वामीजी के चरण कमलों कि शरण ले लो जो पुदुप्पुलि नामक ग्राम से है जो सुन्दर बागों और उपजाऊ बाग से घिरा हुआ है और वह जिन्होंने इस संसार को तिरुमंत्र का तत्त्व “प्रमेयसारम” नामक ग्रन्थ रूप में दिया।

इस कार्य कि शुरूवात होने के कारण – श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी एक ऐसे व्यक्ति थे जो वेद लेख के गुप्त अर्थ को समझते थे। उन्हें उसमे बताये दूर के लक्ष्य को पहूंचने कि राह मालूम थी। उन्हें उसके सच्चे लक्ष्य (भगवान श्रीमन्नारायण और उनके भक्त कि खुशी) भी पता थी। वह सभी लोगों में आगे थे जिन्हें यह सत्य का पता था। वह ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें इस संसार के सभी लोगों को इस अनगिनत जन्म मरण के चक्कर से मुक्त करने कि इच्छा थी। वह श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्य थे जिन्होने  ८० वर्ष तक उनकी सेवा कि। वह श्रीरामानुज स्वामीजी के तत्त्व (सच्चे विचार), हितम (उनका मतलब) और पुरुषार्थ (उनके फायदे) इन उपदेशों को सुनते और वह सभी के महत्त्व को सिखते। वह अपने आचार्य के शिक्षा को अपने रोजमर्रा के जीवन में पालन करते। तत्त्व भगवान है, हितम उनके पास पहूंचने कि राह और पुरुषार्थ उनके पास पहूंचने का लाभ। वह इन सब का मूल अर्थ समझते थे। इसे “थल स्पर्श ज्ञानम” कहते है। “थल” (तमिल में स्थलम यानि “भूमि” और स्पर्श यानि छुना)। एक व्यक्ति जो पानी में डुबकी लगाता है उसका शरीर नीचे चला जाता है, रेत को छुता है और किनारे पर आ जाता है। उसी तरह श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें ज्ञान का अन्त पता था। यह एक कदम आगे बढ़कर इसे उनकी दिव्य दृष्टी को बताता है। सबसे पहिला कदम हमें भगवान को जानना है। अन्त में भगवान के भक्तों कि महिमा जानना। यह और कुछ नहीं भगवान के दासानुदास है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी अपने सबसे उच्च योग्यता से और अपनी दया से हमें यह ग्रन्थ दिया “ज्ञान सारम” जिसके जरिये इस संसार के सांसारिक लोग जो जन्म मरण के चक्कर से दु:खी है वह भी मुक्त हो जाते है। ज्ञान सारम समाप्त होने के पश्चात उन्होंने प्रमेय सारम लिखा। वेद ऐसा है जिसे किसीने नहीं लिखा परन्तु वह चिरकाल से है। जैसे भगवान वैसे हीं वेदों का कोई अन्त नहीं है। इसलिये वेदों को “प्रमाण” कहा जाता है। वेदों का तत्त्व “तिरुमंत्र” में है जो “ॐ नमों नारायणाय” है (अष्टाक्षर मंत्र)। तिरुमंत्र का तत्त्व प्रमेय सारम में दिया गया है। इसलिये इस कार्य को “प्रमेय सारम” कहते है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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यतिराज विंशति – श्लोक – २०

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १९

श्लोक  २०

विज्ञापनम यदिदमद्द्य तु मामकीनम् अङ्गिकुरुष्व यतिराज! दयाम्बुराशे! ।
अग्न्योSयमात्मगुणलेशविवर्जितश्च तमादन्नयशरणो भवतीति मत्वा ॥ २०॥ 

दया अम्बुराशे                   : सागर के समान दयालु
यतिराज                           : हे यतिराज
अध्य                                : अभी
मामकीनम                       : मेरा
यद् विज्ञापनम                  : तीसरे श्लोक से पूर्व श्लोक तक जो प्रार्थना किया गया था
इदं                                 : उन प्रार्थनाओं को
अग्न्य अयं                        : यह शुद्ध ज्ञान नहीं होनेवाला
आत्मगुणलेश विवर्जितश्च    :  मानसिक नियंत्रण या शारीरिक नियंत्रण  जैसे कोई आत्म अनुशासन कुछ भी नही
तस्मात्                            : इसलिए
अनन्य शरणः भवति         : इसको आपके अलावा और कोई सहायक नहीं
इति मथवा                       : यह सोचकर
अंगी कुरुष्व                     : मुझे स्वीकार कीजिये |

अब तक उनसे किया गया प्रार्थना को श्री यतिराज स्वीकार करने का विचार करते हैं इस श्लोक में । उनका विचार यह है कि श्री यतिराज के सिवा उनकी सहायता करनेवाला और कोई नहीं है| दयाम्बुरासे – इससे ये प्रकटित होता है कि कभी भी न सूखने वाला सागर के समान दयालु हैं श्री रामानुज | और यह भी प्रस्तावित होता है कि श्री रामानुज का दया स्वाभाविक होता है | और कोई बाहरी कारणों से नहीं | उनकी दया को बहुत बार उल्लिखित करते हैं – १) दयैकसिंधो (६ स्लोक में) २) रामानुजार्य करुणैवतु (१४ स्लोक में) ३) भवददयया (१५ स्लोक में) ४) करुणापरिणाम (१६ स्लोक में) ५) दयाम्बुरासे (२० स्लोक में) | इससे यह प्रकटित होता है कि श्री यतिराज एक “कृपा मात्र प्रसन्नाचार्या” हैं ( इसका अर्थ यह है कि अन्यत्र कोई कारण के बिना अपने स्वाभाविक कृपा से सब लोगों को उपदेश देकर उनको मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं |)

रामानुज नूट्रन्दादि और यतिराज विम्शति का सद्रुश्यता

यतिराज विम्शति का पहला स्लोक है “श्री माधवांग्री जलजद्वय नित्य सेवा प्रेमा विलासय परांकुस पाद भक्तम्” । रामानुज नूट्रन्दादि का पहला स्लोक है “पूमन्नु मादु पोरुन्दिय मार्बन्, पुगळ् मलिन्द पामन्नु मारन् अडि पणिन्दु उयिन्दवन्” । ये दोनो स्लोकों समानार्थक होते हैं ।

इसी तरह , यतिराज विम्शति का उपांत्य स्लोक (श्रीमन् यतीन्द्र तव दिव्य पदाब्ज सेवाम्..)और रामानुज नूट्रनदादि का उपांत्य स्लोक(…उन् तोन्डर्गट्के अन्बुतिरुक्कुम्पडि एन्नै आक्कि अण्गाट्पडुत्ते ) समानार्थक होते हैं ।

इससे हम यह सोचकर निःसन्देह से रह सकते हैं कि जिस प्रकार श्री रामानुज मुनि रामानुज नूट्रन्दादि को स्वयं सुनकर आनन्दित हुए उसी प्रकार यतिराज विम्शति को हमसे सुनकर आनन्दित होंगे |

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यतिराज विंशति – श्लोक – १९

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यतिराज विंशति

श्लोक  १८                                                                                                                  श्लोक  २०

श्लोक  १९

श्रीमन् यतीन्द्र! तव दिव्य पदाब्जसेवां श्रीशैलनाथकरूणा परिणामदत्ताम् |
तामन्वहं मम विवर्धय नाथ तस्या: कामं विरूद्धमखिलं च निवर्त्तय त्वम्| १९ | 

नाथ श्रीमन् यतीन्द्र                        : हमारे नायक आचार्य श्रीरामानुज!
श्रीशैलनाथ करूणा परिणाम दत्ताम् : (मेरे आचार्य) श्रीशैलनाथ ने अपनी करूणा के परिवाह से जिसको दिया था
तां तव दिव्य                                 : आपके उन सुन्दर
पदाब्ज सेवां अन्वहं                       :  चरणकमलों की सेवा को प्रति दिन
मम विवर्धय                                 :  मेरे लिये अभिवृद्धि बना इच्छाओं को
त्वं निवर्तय                                  :  इस संसार में (जहाँ उसकी महिमा जान कर उसकी भक्ति   वाला कोई नहीं

आपके आचार्य श्रीशैलनाथ ने श्रीरामानुज की मूर्ति दिखा कर कहा कि इनके विषय में एक स्तोत्र की रचना करो| उसके फलस्वरूप यह स्तुति निकली| इसका उल्लेख करते हुए एक प्रार्थना करते हैं इस श्लोक में| आचार्य श्रीरामानुज! आपके चरणकमलों का दर्शन मैं स्वयं नहीं कर पाया| आचार्य के कृपया दिखाने के कारण देख सखा| इसलिए वह विषय जेपी परमप्राप्य है आज मुझे नया नहीं मिला, लेकिन पहले ही से प्राप्य है अगर आपको मिल गया है तो अब आपको क्या चाहिए? उसकी शक्ति तो आप में पर्याप्त मात्रा में विध्यामान है| अन्तिम पाद से यह प्राथना भी की जाती है कि उसके विरोधिभूत कामनाओं को भी दूर कीजिए|

“तस्या विरूद्धमखिलञ्च कामं निवर्तय ” इसका भाव है कि सब कामों को दूर कीजिए चाहे भगवत्काम हो या विषयान्तरकाम | जैसे भगवद्विषय में रात भक्तों को विषयान्तरकाम हेय हैं, वैसे ही आचार्यविषय में बैठे रहने वालों को भगवत्काम भी त्याज्य ही होगा|

अगर बात यह है तो विषयान्तरों की तरह भगवद्विषय से दूर रहना चाहिए न ? वैसे तो लोग नहीं देखते| यह इसलिए कि भगवान आचार्य के उपास्य हैं; यदि हम भगवान से प्रेम करें तो वह भी आचार्य के मुखोल्लास का ही कारण होगा| इसलिए भगवान को बिल्कुल छोड़ नहीं देते| जैसे कहा है “शत्रुघ्नो नित्यशत्रुघ्न:” अर्थात् श्रीरामचन्द्र पर अपनी इंद्रियों को विहरने न देकर भरत से ही लगे रहने वाले शत्रुघ्न भी कभी-कभी रामचन्द्र की सेवा करें तो वह भी अपने देवता भरत की तृप्ति ही के लिए || १९ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १८

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यतिराज विंशति

श्लोक  १७                                                                                                श्लोक  १९

श्लोक  १८

कालत्रयेऽपि करणत्रयनिर्मिताति पापक्रियस्य शरणं भगवत्क्षमैव |
सा च त्वयैव कमलारमणेऽर्थिता यत् क्षेम: स एव हि यतीन्द्र! भवच्र्छितानाम्| १८ |

यतीन्द्र                                 : रामानुज स्वामिन्!
कालत्रये                                : भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालों में
करणत्रय निर्मित अतिपाप      : मनो वाक् काय से जिसने बहुत
भगवत् क्षमा एव शरणम्        : भगवान की क्षमा एक ही गति है
सा च त्वया एव                     :  वह क्षमा भी आप से
कमलारमणे अर्थिता इति यत् : श्रीरंगनाथ की सेवा में प्रार्थित थी
स एव भवत् श्रितानां              : वह प्रार्थना ही आपकी शरण में आए हुए मनुष्यों की
क्षेम:                                    :     कुशलता का कारण है||

पिछले श्लोक में उक्त विषय का समर्थन इस श्लोक में किया जाता है| यध्यपि शास्त्रों में कहा जाता है कि अपराधी चेतनों को परमात्मा की क्षमा एक ही गति है, मेरे जैसे अपराधियों को भगवान तक जाने की आवश्यकता नहीं|

एक फाल्गुन उत्तरफाल्गुनी के उत्सव के दिन दिव्यदम्पति के सामने गध्यत्रय का अनुसन्धान करके आपने जो प्रार्थना की थी उसका जो उत्तर आपको भगवान की ओर से प्राप्त हुआ वह विश्वविख्यात है| भगवान तथा लक्ष्मी का यही प्रतिवचन था कि आपको और आपके सम्बन्धी के सम्बन्धी लोगों को भी किसी तरह की कमी नहीं है| जब वह है, तब भगवान के सामने जाकर मुँह बाए बैठने की क्या जरूरत है?

यहाँ पर आचार्य श्रीनिगमान्तदेशिक के न्यासतिलक का श्लोक अनुसन्धेय है;

उक्त्या धनञ्जयविभीषणलक्ष्यया ते, प्रत्याय्य लक्ष्मणमुनेर्भवता वितीर्णम् |
श्रुत्वा वरं तदनुबन्धमदावलिप्ते , नित्यं प्रसीद भगवन्! मयि रंगनाथ
|| ”

अर्थात् अर्जुन और विभीषण सूरि को लक्षित करके आपकी जो उक्ति हुई थी,
अर्जुन के लिये        : सर्वधर्मान् पारित्यज्य मामेकं शरणंव्रज | अहंत्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुचः ||
विभीषण के लिये    : सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते | अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतत् व्रतं मम ||
लक्ष्मणमुनि को, रामानुज स्वामीजी को भी भगवान ने कह दिया था कि रामानुज! :
अस्योचिंता परम वैदिक दर्शनस्य रामानुजार्य कृतिनोऽपि कृतं कृतज्ञ:रंगेश्वर: प्रथयितुं प्रथयाञ्चकार-रामानुजास्य मतमित्यभिधानमस्य ||

श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीभाष्य, गीताभाष्य आदि प्रस्थानत्रयी जो कृति पर तथा उनके द्वारा की गई अद्भुत सेवाओं, जीवों का संरक्षण भाव इत्यादि से प्रसन्न होकर कृतज्ञता ज्ञापन करते हुये श्री रंगनाथ भगवान ने उन्हें एक बड़ा वरदान दिया था कि परम वैदिक दर्शन, विशिष्टाद्वैत दर्शन श्रीरामानुज मत के नाम से कहा जायेगा, अर्थात् आपके नाम से ही यह सम्प्रदाय चलेगा, श्रीरामानुज सम्प्रदाय कहा जायेगा|

(विशिष्टाद्वैत या श्री सम्प्रदाय इसका नाम है और लक्ष्मीनाथ समारम्भां नाथयामुन मध्यमाम् , के अनुसार पहले लक्ष्मीनारायण भगवान हैं, फिर श्रीजी हैं, विष्वक्सेनजी हैं श्रीशठकोप स्वामीजी हैं, फिर नाथमुनि, यामुनमुनि हैम, फिर महापूर्ण स्वामीजी तब रामानुज स्वामीजी हैं, कितना दूर हैं फिर भी श्री रंगनाथ भगवान ने आपसे किये अनेक कृत्यों से उपकृत हो उन्हें यह वरदान दिया था )

कालत्रयेऽपि – अच्छे चालचलन के लिए कोई भी समय न रख कर सभी कालों में मन वाक् शरीर तीनों से पाप ही पाप कराते रहने वाला, भगवान की क्षमा का ही पात्र बन कर ठहरेगा| जो पाप प्रायश्चित्तों से या अनुभव से नहीं कट सकते, उन्हें तो भगवान की क्षमा के सिवाय दूसरी गति नहीं| वह क्षमा भी आज हमको नये सिर से प्रार्थना करके नहीं प्राप्त करनी है| पहले ही आपने प्रार्थना कर ले राखी है| अब आपके अभिमान में अन्तर्भूत होने के अतिरिक्त हमें तो कुछ करना नहीं है || १८ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १७

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १६                                                                                                 श्लोक  १८

श्लोक  १७

श्रुत्यग्र वेध्य निजदिव्य गुणस्वरूप: प्रत्यक्षतामुपगतस्त्विह रङ्गराज: |
वश्यस्सदा भवति ते यतिराज तस्मात् शक्त: स्वकीयाजनपापविमोचने त्वम्|| १७ ||

यतीन्द्र                                    : श्रीरामानुज !
श्रुत्यग्रेवध्य निज दिव्यगुण       : वेदान्तों से ही जिसके गुण
स्वरूप:                                    : स्वरूप आदि का ज्ञान हो सकता है
देशिक वर उक्त समस्त नैच्यम् : उत्तम आचार्यों ने जो नैच्यानुसंधान किया था वह सब
इह                                          : इस संसार में (जहाँ उसकी महिमा जान कर उसकी भक्ति करने वाला कोई नहीं)
प्रत्यक्षतां उपगत:                     : प्रत्यक्ष रूप से जो दीख पड़ता है
रङ्गराज:  सदा                        : वह भगवान श्रीरंगनाथ हमेशा
ते वश्य: भवति तस्मात्            : आपके वश में रहता है इसलिये
स्वकीय जन पाप विमोचन       : अपने दासों के पाप दूर करने में
त्वं शक्त:                               : आप शक्तियुक्त हैं

यह समझ कर कि अब तक के श्लोकों में जो प्रार्थना की गई थी, उसे सुन कर श्रीरामानुज कहते हैं – यह आप क्या कहते हैं, इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति करने वाला तो ईश्वर है| मैं उसे थोड़े ही कर सकता हूँ? इस दशा में मेरे पास प्रार्थना करने से क्या लाभ है यह उन्हीं के सामने की जानी चाहिए| आगे कहते हैं ‘यह प्रसिद्ध है कि वह परमात्मा जब श्रीरंगनाथ बनकर आया, तब सब प्रकार से आपके आधीन है और आप जो कुछ चाहते हैं उसे कर ही देता है| ऐसा हो तो प्रार्थनाएँ आपकी सेवा में ही की जानी चाहिए|’

पुरूषसूक्त नारायणानुवाक आदि ही में गुरूमुख से जिसका स्वरूप, रूप, गुण आदि विदित होता है, वह भगवान आज भूमि पर, संसार के मनुष्यों के उज्जीवन के लिए, सब दु:ख दूर होने एवं सुख अभिवृद्धि होने के लिए श्रीरंग में आकार दक्खिन की और मुहँ करके शयन कर रहा है| जैसे कूरेशजी लिखते हैं;

“ अखिलनेत्रपात्रमिह सन् सह्योद्भवायास्तटे |
श्रीरंगे निजधाम्नि शेषशयने शेष वनाद्रीश्वर || ”

अपनी विभव दशा एवं अर्चा दशा में वह आपका आज्ञाकारी है| तब अपनी इच्छा से उसे आज्ञा देकर काम कराने में क्या संकोच है ?

यह कैसे कहते हैं कि “ वश्यस्सदा भवति ते यतिराज” , इसका उत्तर हो सकता है; शरणागति गध्य में आपने जो जो प्रार्थनाएँ कीं, रंगनाथ ने सबके बारे में यही कहा कि वैसा ही हो| तथा अन्य कई इतिहास भी हैं जिनके बल से आप यह कहते हैं| श्रीशठकोप स्वामी की सहस्त्रगीति की ४.३.५ वीं गाथा की ३६००० व्याख्या में एक ऐतिह्य है – एक दिन एक श्रीवैष्णव धोबी भगवान के पीताम्बर बहुत ही सुन्दर ढंग से साफ कर लाया और रामानुज के सामने रखा| उसे देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उसे रंगनाथ के सामने ले जाकर वस्त्रों को दिखा कर बोले – यह देखने की कृपा कीजिये कि कैसे सुन्दर रूप से इसने पीताम्बर साफ किया है|

वह देख कर भगवान तृप्त हुए और रामानुज से बोले; लीजिये, इसके बदले में उस दोष को क्षमा कर देता हूँ जिसे एक धोबी ने हमारे प्रति किया था| (धोबी का पिछला अपराध – अक्रूर के संग एक बार कृष्ण और बलराम मथुरा गये और वहाँ वीथि में कंस का धोबी कपड़ों की गठरी लाड़ कर आ रहा था| उसे देख दोनों ने उससे कुछ कपड़े माँगे, उसने इनकार कर दिया |)

श्रीरांगनाथ के सम्बन्ध में कुलशेखर कहते हैं कि ये वही श्रीराम हैं जिन्होंने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा कर के उनका अवभृथ कराया| जब वे राम थे तब उनके किंकर बन कर उनकी सेवा करने के लिए विश्वामित्र के पीछे गये|

“ इमौ स्म मुनिशार्दूल किंकरौ समुपस्थितौ |
आज्ञापय यथेष्टं वै शासनं करवाव किम् ||”
श्रीराम होकर विश्वामित्र के विधेय रहे तो श्रीरामानुज के विषय में क्यों पूछें ? १७ ||

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