Author Archives: narasimhantsl

पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ५

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  ४                                                                                                                               श्लोक  ६

श्लोक  ५

आम्लान कोमलाकारं आताम्रविमला म्बरम ।
आपीनविपुलोरस्कं आजानुभुजभूषणम ॥ ५ ॥

आम्लान कोमलाकारं   – स्वामीजी का दिव्य मंगल विग्रह बिना मुरझाये हुये पुष्प कि तरह है,
आताम्रविमला म्बरम  – लाल केसरीया वस्त्रों को धारण किए हुये,
आपीनविपुलोरस्कं      – व्यापक रूप से विस्तारित छाती,
आजानुभुजभूषणम     – जैसे आभूषण शरीर पर विस्तृत होते है वैसे हाथ घुटनों तक विस्तृत है ।

इस श्लोक में श्रीदेवराज स्वामी के मंगल विग्रह कि कोमलता सुन्दरता और वस्त्रों का अनुभव कर रहे है । स्वामीजी का दिव्य मंगल विग्रह छुई – मुई के पुष्प से भी मोलयाम है । पिछले श्लोक में स्वामीजी के श्रीचरणों कि कोमलता को वर्णन किया और इस श्लोक में स्वामीजी के दिव्य मंगल विग्रह कि कोमलता का वर्णन कर रहे है । श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को अनंतालवान स्वामीजी के अवतार के रूप में माना जाता है । सन्यासियों के लिये लाल रंग के वस्त्र सुशोभित करते है । स्वामीजी का मंगल विग्रह दूधिया सागर कि तरह सफ़ेद है और लाल रंग के वस्त्र धारण करने के कारण सौंदर्यता और बढ़ जाती है । स्वामीजी उत्तम पुरुष के प्रकृति कि तरह छाती को विस्तारीत करने के अधिकारी है । स्वामीजी के हाथ इतने लंबे है कि वे घुटनों तक विस्तारित होते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ४

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श्रीमते शठकोपाय नमः
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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  ३                                                                                                                               श्लोक  ५

श्लोक ४

पार्श्वतः पाणिपद्माभ्यां परिगृह भवत्प्रियौ ।
विन्यस्यन्तं शनैरड़घ्रि मृदुलौ मेदिनीतलै ॥ ४ ॥

शब्दार्थ 

पार्श्वतः            –  दोनों तरफ
पाणिपद्माभ्यां   –   कमल की तरह हाथ
परीगृह            –   पकड़ना
भवत              –   वरवरमुनी स्वामीजी के बारे में
प्रियौ              –   कोइल अण्णन और उनके भाई की तरह योग्य आचार्य
विन्यस्यन्तं    –   नीचे रखना
शनै                –   धीरे–धीरे
अंघ्रि              –    चरण
मृदुलौ            –    नाजुक
मेदिनीतलै     –     इस पृथ्वी में

इस श्लोक में देवराज स्वामीजी वरवरमुनी स्वामीजी की बढ़ाई करते हुये कहते है । श्रीवरवरमुनी स्वामीजी तीन कारणों से विशेष है, यह जानकर की आचार्य ही प्रमुख है, आचार्य ही एक मात्र साधन है और आचार्य के दास बनकर उनकी सेवा करना । इसलिये आचार्य कोइल अण्णन ( वरद नारायण गुरु ) और उनके भाई श्रीनिवास गुरु वरवरमुनी स्वामीजी के अत्यन्त प्रिय हो गये । शुद्धता और सौन्दर्य के कारण उनके हाथ कमल की तरह है । परिग्रह याने प्रेम , अत्यन्त प्रेम के साथ वरवरमुनी स्वामीजी उनको पकड़ते है । इसका अर्थ है वे ऐसा नहीं सोचते है कि मै बढ़ा हूँ, मेरे शिष्य छोटे है, उनके औदार्य गुणों के कारण वे सब लोगों को पकड़ते है ।

यहाँ पर प्रश्न उठता है कि अगर वे अपने हाथों से अपने शिष्यों को पकड़े हुये है तो त्रिदण्ड को कैसे पकड़ेगें ? और सन्यासियों के लिये त्रिदण्ड का होना नियम है । श्री पांचरात्र तत्वसागर संहिता के अनुसार सन्यासी के साथ त्रिदण्ड रहना चाहीये, जो कि विष्णु का प्रतीक है । विष्णु स्मृति में कहा गया है कि एक सन्यासी को अपने अंतिम समय तक यज्ञोपवीत, त्रिदण्ड, जलपवित्रम, शिखा और कौपीन को धारण करना चाहीये । कुछ विशेष संदर्भ में और समय में पूर्ण रूप ज्ञान अनुष्ठान पूर्ण सन्यासी त्रिदण्ड धारण नहीं करते है तो गलती नहीं है । क्रतु के वचनानुसार जो सन्यासी पूर्ण रूप से ज्ञान अनुष्ठान करता हो, इच्छाओं का अभाव हो, पूरी तरह से जिज्ञासा हो, दुनिया को नियंत्रित करने कि शक्ति हो ऐसे सन्यासी त्रिदण्ड नहीं लिये तो भी चलता है । मंदिर में साष्ठांग करते वक्त दोनों हाथ जमीन पर रखकर प्रणाम किया जाता है उस समय त्रिदण्ड को धारण नहीं कर सकते है । इसलिये मंदिर जाते समय त्रिदण्ड धारण नहीं करना योग्य है । दोनों हाथों से हाथ जोड़ते समय भी त्रिदण्ड को धारण नहीं कर सकते है । ऐसे एक सन्यासी को त्रिदण्ड धारण करना नियम है परन्तु मंदिर में साष्ठांग करते वक्त त्रिदण्ड धारण नहीं करने के लिये छूट भी है ।

यहाँ पर भूमितले के बजाय मेदिनीतले को बताया गया है जब भगवान विष्णु मधुकैटभ राक्षस का ध्वंस किया तब उनका मांस भूमि को स्पर्श किया जिससे भूमि को मेधीनी कहा गया है । भूमि जिस कारण से अपवित्र हुयी थी, वरवरमुनि स्वामीजी के चरण स्पर्श से भूमि पवित्र हो गयी । श्री विष्णुचित्त स्वामीजी अपने पेरियालवार तिरुमोली ( ४.४.६ ) प्रबन्ध में कहते है, भागवतों के चरण स्पर्श से यह भूमि पहिले कि तरह पवित्र हो गयी है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ३

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  २                                                                                                                                   श्लोक  ४

श्लोक ३

सुधानिधिमिव स्वैरस्वीकृतोदग्रविग्रहम ।
प्रसन्नार्क प्रतिकाश प्रकाश परिवेष्टितम ॥ ३ ॥

 

शब्दार्थ

सुधानिधिमिव                                      – क्षीरसागर कि तरह श्वैत रंग में प्रतीत होता है ।
स्वैरस्वीकृतोदग्रविग्रहम                        – सुन्दर शरीर जिसे उन्होने स्वयं स्वीकारना चाहा ।
प्रसन्नार्क प्रतिकाश प्रकाश परिवेष्टितम – वरवरमुनी स्वामीजी चमकदार सूर्य की तरह है जिसका अनुभव                                                                                  बिना किसी भ्रम निवृत्ति के इन नेत्रों से होता है ।

शिष्य का कर्तव्य है कि सदैव आचार्य के दिव्य मंगल विग्रह का श्रीचरणों से लेकर मुखारविन्द तक ध्यान करते रहना और साष्ठांग करने में रुचि रखना । इसीके अनुसार देवराज स्वामीजी अपने आचार्य श्री वरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य मंगल विग्रह का वर्णन कर रहे है । वरवरमुनि स्वामीजी अनंतालवान स्वामीजी के अवतार माने जाते है , जिनका दिव्य मंगल विग्रह अत्यन्त सफ़ेद है , और वे सफ़ेद दिव्य मंगल विग्रह को क्षीरसागर कि तरह समझ रहे है । क्षीरसागर अत्यन्त सफ़ेद न होने के कारण सूर्य के तेज को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य मंगल विग्रह के साथ किया जाता है । सूर्य का प्रकाश अत्यन्त उग्र और प्रखर है , इसको मिटाने के लिये सूर्य के साथ विशेषण के रूप में प्रसन्न शब्द का उपयोग किया जाता है । प्रसन्न शब्द स्पष्ट और ताजगी को सूचित करता है , जिस प्रकार सूर्य उभरता है उसी तरह श्री वरवरमुनि स्वामीजी आलंकारीक होते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १                                                                                                                                   श्लोक  ३

श्लोक २

मयि प्रविशति श्रीमन्मन्दिरं रंगशायिनः ।
पत्यूः पदाम्बुजं द्रष्टुमायान्तमविदुरतः ॥ 2 ॥

मंगलाशासन के बाद अब आचार्य श्री वरवरमुनि स्वामीजी के कृपा कि बौछार कैसे हुयी इसका वर्णन करते हुये वे अपने जीवन का उदेश्य बता रहे है कि आचार्य का भजन सुनते हुये इनके सन्मुख होकर रहना , जिससे संसार कि सभी परेशानियाँ स्वयं मीट जायेगी । एक शिष्य का कर्तव्य है कि अपने आचार्य कि प्रशंसा करना , इस कर्तव्य को निभाते हुये श्री देवराज गुरुजी “ मायि प्रविशति ” से लेकर “ अनस्पदम ” श्लोक तक श्री वरवरमुनि स्वामीजी कि दिनचर्या का वर्णन कर रहे है ।

शब्दार्थ

मयि                –      अडियन , दास
प्रविशति          –      प्रवेश करते समय
श्रीमान            –      कैंकर्य रूपी धन के स्वामी ( भगवान के दास ) श्री वरवरमुनि स्वामीजी
मन्मन्दिरं       –      मंदिर के बारे में
रंगशायिनः      –      श्रीरंगम में शयन शैया में विराजमान श्रीरंगनाथ भगवान
पत्यूः              –      श्रीरंगनाथ भगवान के
पदाम्बुजं         –      कमल कि तरह श्री चरण
द्रष्टुम             –      सेवा करने के लिये
आयान्तम       –      पहुँचने तक
अविदूरतः        –      नजदीक

श्रीमान और मंदिरम शब्दों को अलग किये बिना, श्रीमत शब्द मंदिरम के लिये विशेषण के रूप में उपयोग कर सकते है । इस प्रकार श्रीरंगम मंदिर कैंकर्य करने के लिये सही स्थल और परमधन है , इसको दर्शाता है । देवराज गुरुजी कहते है “ मै वरवरमुनि स्वामीजी के पहिले श्रीरंगनाथ भगवान के दर्शन करने के लिये गया , लेकिन जब मैने भगवान के दर्शन करने के लिये मंदिर में प्रवेश किया जो कि आचार्य के दर्शन से ज्यादा महत्व नहीं है , आश्चर्य कि बात है कि श्री वरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगनाथ भगवान के दर्शन करते हुये मेरे सामने ही खड़े थे। ”

अतः आचार्य के दर्शन पहिले न करके जो पाप मुझे लगा था, उस पाप को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दर्शन करते ही मिट गया । श्री उ.वे.अण्णा अप्पागंर स्वामी अपने व्याख्या में कहते है कि आचार्य भगवान से भी श्रेष्ठ है ,जैसे जंगल में कुल्हाड़ी अपने आय सम्पादन हेतु पेड़ों को काटने के लिये ढूँढता रहता है और अनायास उसे कोई धन का खजाना मिल जाता है , ऐसे आचार्य कि पूजा करने कि चाहना रखनेवाले श्री देवराज स्वामीजी को आचार्य स्वयं दर्शन देने के लिये सामने प्रकट हो गये ।

वरवरमुनि स्वामीजी सोचते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीचरणों में सेवा करना ही परम पुरुषार्थ है और उसके लिये श्रीचरण ही एक साधन है । इसी विश्वास के साथ वरवरमुनि स्वामीजी रंगनाथ भगवान कि सेवा करते हुये मंगलाशासन करते है अपने पुरुषार्थ के लिये नहीं करते है ।जो केवल भगवान के मंगलाशासन करने में ध्यान देते  है और अन्य विषय  ( देवतांतर, प्रयोजनान्तर, विषयांतर, मोक्ष के लिये भगवान कि शरणागति करनेवाले यह सभी विषय समान है ) उनके लिये कोई मान्य नहीं रखते है उन्हे परमैकान्ती कहते है । यह सब विशेष लक्षण श्री वरवरमुनी स्वामीजी में रहने के कारण उन्हे परमैकान्ती कहते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १

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श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय                                                                                                                                     श्लोक  २

श्लोक १

अंके कवेरकन्यायास्तुङ्गे भुवनमंगले ।
रंगे धाम्नि सूखासिनं वन्दे वरवरं मुनिम ॥ १ ॥

इस श्लोक मेँ देवराज गुरुजी अपने आचार्य वरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते है की इस स्तोत्र कि रचना बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाये । शास्त्र के अनुसार आचार्य को भगवान श्रीमन्नारायण के अवतार के रूप मेँ माना जाता है , शिष्य को सदैव आचार्य के नाम का जप करना चाहिये , पूर्ण रूप से उनमें निष्ठा रखना , इसके लिये गुरु जीससे प्रेम भाव रखते है उनमे प्रेम भाव रखना , गुर जब दुखी हो तो शिष्य को भी दुखी होना चाहिये । गुरु के नाम और विशेषताओं का सदैव स्मरण करना । जैसे भगवान के लिये भक्त रहता है , राजा के लिये सेवक रहता है , उसी तरह शिष्य को आचार्य के लिये पूर्ण समर्पण भाव से सेवा कैंकर्य करना चाहिये । शिष्य का परम कर्तव्य है कि अपने आचार्य का शिष्य बनकर गर्व होना चाहिये , आचार्य के श्री चरणों के चिन्हो का अनुसरण करना , सदैव उनका स्मरण करना , उनके वैभव को सुनना और दूसरों को उनकी विशेषताओं का वर्णन करना । देवराज गुरुजी शिष्य के सभी कर्तव्यों को जानते थे । वरवरमुनी स्वामीजी से संबंधित शतकम , काव्यम , चम्पु और अनेक स्तोत्रों कि रचना करने पर भी उनको समाधान नहीं था । शास्त्र बताता है कि शिष्य को अपने आचार्य कि पूर्ण दिनचर्या का वर्णन करना चाहिये । आचार्य निष्ठा और शास्त्र मेँ विश्वास रखते हुये देवराज गुरुजी ने अपने आचार्य श्री वरवरमुनि स्वामीजी कि दिनचर्या को लिखना प्रारम्भ किया और उसके सफलता के साथ समापन होने के लिये प्रार्थना कर रहे है ।

इस कार्य में श्री वरवरमुनि स्वामीजी का ज्ञान, गुण, दैनिक गतिविधियाँ और सांसारिक  इच्छाओं कि अनुपस्थिति को दर्शाता है और स्वामीजी के उपस्थिती से पूर्ण गोष्ठी पवित्र हो जाती है । तदियाराधन के पहिले जो श्रीवैष्णव सत्वगुण वाले है वे भी इसका पठन करते है और पवित्र हो जाते है । जब  तदियाराधन बड़े पैमाने पर होता है तब वहाँ पर एकत्रित लोग कम ज्ञान वाले और पारंपरिक प्रथाओं का पालन कम करनेवाले भी हो सकते है , इससे उस जगह कि पवित्रता भी कम हो जाती है । वरवरमुनि स्वामीजी उस जगह को और उपस्थित लोगों को पवित्र करते है । इसलिये इस स्तोत्र को “ पंक्तिपावनम ”भी कहते है , जो की पूर्ण गोष्ठी को पवित्र कर देता है ।

शब्दार्थ

कवेरकन्याया        –      कावेरी नदी के बीच में
तुगें                      –      अधिक
भुवनमंगले           –      दुनिया के लोगो के कल्याण हेतु
रगें धाम्नि            –      श्रीरंगम दिव्यदेश
सुखासीनं             –      बिना किसी बाधा के शांतता से
वन्दे                    –      साष्ठांग प्रणाम करना
वरवरं                  –      अलगीय मणवाल पेरूमाल के समान इनकी छवि,गुणवता को दर्शाया गया है
मुनिम                 –      वरवरमुनि स्वामीजी ,जो आचार्य को मुख्य घोषित करते है ।

मंगलम शब्द लक्ष्य प्राप्ति को संबोधित करता है । मंगलम शब्द का उपयोग कावेरी नदी और श्रीरंगम दिव्यदेश के साथ किया जाता है । रंगम शब्द भगवान श्रीरंगनाथ के प्रेम को सूचित करता है । “ सुखासीनं ” शब्द संबोधित करता है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समय में मुसलमान एवं इतर लोगों द्वारा कोई भी तकलीप का सामना नहीं करना पड़ा जैसे रामानुज स्वामीजी के समय में शैव लोगो से , पिल्लै लोकाचार्य और वेदान्त देशिक स्वामीजी के समय में मुसलमानों द्वारा तकलीप का सामना करना पड़ा ।

संस्कृत में “वन्दे ” शब्द “ वादि अभिवादन स्तुति ” को संबोधित करता है , इसका अर्थ है आदरपूर्वक नीचे बैठकर स्तोत्र पठन करते हुये आराधना करना । श्री वरवरमुनि स्वामीजी के कृपा के बिना ये दोनों ( मंगलम और वन्दे ) नहीं आ सकते है और साथ ही साथ हमारे मन, वाणी और कर्मो को मंगलमय बना देगें ।

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प्रमेय सारम् – श्लोक – १०

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ९ 

श्लोक  १०

प्रस्तावना:

पहिले के पाशुरों में यह चर्चा हुई कि आचार्य स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण के अपरावतार है। ३९वें पाशुर में यह पद “तिरुमामगळ कोळुनन ताने गुरुवागि ” बहुत ध्यान देने योग्य है।

आचार्य के स्तुति के बारें में बात करते हुए श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इसके महत्त्व को समझाकर समाप्त करते है।

इरैयुम उयिरुम इरुवर्क्कु मुलल
मुरैयुम मुरैये मोलियुम – मरैयै
उणर्त्तुवारिल्ला नाल ओन्रल्ल आन
उणर्त्तुवार उण्डान पोदु

अर्थ:
इरैयुम                         : श्रीमन्नारायण जिन्हें “अकार” या “अ” ऐसे दर्शाया गया है
उयिरुम                       : जीवात्मा जो “मकार” या “म” ऐसे दर्शाया गया है
इरुवर्क्कु मुलल मुरैयुम : उनके मध्य में सम्बन्ध (जैसे पहले दर्शित हैं, तमिळ व्याखरण के अनुसार चौती कारक कि विधि यहाँ उपयोग ) और कुछ नहीं “भगवान होना” या “सेवक होना”
मुरैये मोलियुम           : इस सम्बन्ध को प्रकाशित करने की योग्यता रखना
मरैयै                         : क्या तिरुमन्त्र जिसे वेदों का तथ्य माना गया है
उणर्त्तुवारिल्ला नाल   : किसी समय में जब कोई भी (आचार्य भी नहीं) समझाने वाला नहीं है
ओन्रल्ल                     : जीवात्मा और परमात्मा उनका उत्पन्न होना कोई अर्थ नहीं करता है और व्यर्थ है (वें सोचे कि वे है और उनका होना नहीं होने के समान है)
उण्डान पोदु                : परन्तु जब एक आचार्य
उणर्त्तुवार                  : तिरुमन्त्र का अर्थ समझाते है
आन                          : वह दोनों में प्राण आ जाता है

स्पष्टीकरण:
इरैयुम उयिरुम इरुवर्क्कु मुलल मुरैयुम: इस ग्रंथ के पहिले पाशुर में जो “अव्वानवर” से प्रारम्भ होता है श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी “अ” का अर्थ समझाते है और किसे वो संबोधित करता है। वह और कोई नहीं स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण है। आगे के पदों में उन्होंने “म” का अर्थ समझाया। इस संसार के स्वर में जो कुछ भी और सब कुछ स्थापित करते है और वें कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायण है। इस अस्तित्व को जीवात्मा कहते है। भगवान श्रीमन्नारायण और जीवात्मा के मध्य में जो सम्बन्ध है उसे “उव्वानवरूक्कु मव्वानवर” ऐसा दर्शाया गया है। इसका अर्थ सभी जीवात्मा परमात्मा श्रीमन्नारायण के लिये है। एक कहावत है “परमात्मा का जीवात्मा” यानि “पिता का बेटा” है। “अकार” कि चौथी कारक से अर्थ बनती हैं के जीवात्मा परमात्मा केलिए है.

यह तमिळ व्याखरण ग्रन्थ नन्नूल में उपस्थित हैं . “अव्वानवरकु” में प्रस्तुत “कु” की अर्थ समझने केलिए नन्नूल की अंश देखते हैं।    वह कहती हैं :

“नांगावदर्कु  उरुबागुम  कुव्वे
कोडै पगै नेर्चि  तगवु  अदुवादल
पोरुट्टू मुरै  आदियिन  इन्दर्कु  इदु पोरुळे ”

यहाँ हम देख सकते हैं कि,” कु” का अर्थ हैं  सीधा सम्बंध, (इसका उससे). अथवा तमिळ व्याखरण के अनुसार “अव्वानवरुक्कु मव्वानवर ” का अर्थ  “मव्वानवर अव्वानवर के  हैं ” हैं.

मुरैये मोलियुम – मरैयै: उपर बताया हुआ सम्बन्ध वेदों में, तिरुमन्त्र, में स्पष्ट समझाया गया है। ज्ञान सारम के ३१वें पाशुर में (वेदं  ओरु  नांगिन  उत्पोदिन्द  मेइप्पोरुळुम ) वेदों में पूर्ण रूप से तिरुमन्त्र का अर्थ समझाया गया है।

उणर्त्तुवारिल्ला नाल ओन्रल्ल: यह जीवात्मा और परमात्मा के मध्य में जो सम्बन्ध है यह कोई एक समय में नहीं किया गया है। यह निरन्तर के लिये है। हालकि जब तक जीवात्मा इस सम्बन्ध को नहीं समझता है (आचार्य कृपा द्वारा) और हालाकि दोनों उत्पन्न है उनका होना नहीं के बराबर है।

आन उणर्त्तुवार उण्डान पोदु: “आन” एक क्रिया है। इसका अर्थ जीवात्मा और परमात्मा उत्पन्न होना तभी प्रारम्भ होते है जब कोई उन्हें इस सम्बन्ध के बारें में बताते है। आचार्य के सिवाय कौन यह कार्य कर सकते है। केवल आचार्य हीं स्पष्ट रूप से यह सम्बन्ध प्रकाशित कर सकते है जैसे तिरुमन्त्र में बताया गया है। इस ग्रन्थ के पहिले पाशुर में “उव्वानवर  उरैत्थार ” द्वारा यही कहा गया है। यह सबसे बड़ा कार्य आचार्य हम मनुष्य के लिये करते है। श्रीशठकोप स्वामीजी इस कार्य को “अरियादन अरिवित्थ अत्था ” ऐसा बुलाते है। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी इसे  ऐसे समझाते है “पीदग आडै पिरानार  पिरम  गुरुवागि  वंदु ”। अत: आचार्य कि बढाई और महिमा को समझाया गया है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ९

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ८                                                                                                  श्लोक  १०

श्लोक  ९

प्रस्तावना:

पिछले ८ पाशुरों में “उव्वानवरूक्कु” से प्रारम्ब होकर “वित्तीम ईझवु” तक श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी तिरुमन्त्र(ॐ नमो नारायणाय) के तथ्य के विषय में बात किये है जिसे तीन विभागों में बाटा गया है। इस पाशुर में यह कहा गया है कि हम सब को अपने आचार्य जिन्होंने हमें तिरुमन्त्र सिखाया है उन्हें भगवान श्रीमन्नारायण का अवतार मानना चाहिये। जैसे शास्त्र में बताया गया है हमें पूर्ण सम्मान के साथ उनकी सेवा करनी चाहिये और उसका एहसास होना चाहिये। इस पाशुर में श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी दो समूह के लोगों को अंकित करते है और उसके जोखिम और इनाम के बारें में बात करते है। पहिले समूह के लोग अपने आचार्य का सन्मान कर उन्हें भगवान श्रीमन्नारायण का अवतार मानते है और दूसरे समूह के लोग उनका अनादर करते है।

तत्तम इरै यिन वडिवेन्रु तालिणैयै
वैत्तवरै वणग्ङियिरा – पित्तराय
निन्दिप्पार्क्कु उण्डेर नीणिरयम नीदियाल
वन्दिप्पार्क्कु उण्डिलि यावान

अर्थ:

अवरै                        : आचार्य के प्रति
तालिणैयै वैत्त          : जिन्होंने अपने शिष्य के सिर पर अपना चरण कमल रखकर उसकी नासमझ को दूर किया
वडिवेन्रु                    : हमें उन्हें भगवान श्रीमन्नारायण ही मानना चाहिये
तत्तम इरै यिन         :  और उनका “हमारे भगवान” जैसे उत्सव मनाना चाहिये
वणग्ङियिरा             : मनुष्य जो ऐसा नहीं करते है और उनका निरादर करते है
पित्तराय                 : जो आचार्य के सच्ची महिमा को समझ नहीं सकते है
निन्दिप्पार्क्कु          : और उन्हें एक साधारण मनुष्य समझकर नकार देते है
एरा नीणिरयम उण्डु : नरक प्रतिक्षा करता है जहाँ से स्वतन्त्र होना नामुमकिन है
नीदियाल                : परन्तु जो उनकी पुजा करता है जैसे शास्त्र में बताया गया है
वन्दिप्पार्क्कु           : और उनको पूर्ण सम्मान के साथ सम्मान करना
लिया वान              : एक जगह है जहाँ से आना नामुमकिन है वह प्रतिक्षा कर रहा है और इसलिये पुर्नजन्म नहीं है
उण्डु                      : यह निश्चय है

स्पष्टीकरण:

तत्तम इरै यिन वडिवेन्रु: “थम थम” मूल शब्द का व्याकरणिक रूपांतर है “तत्तम” शब्द। “तत्तम इरै यिन वडिवेन्रु” पद का अर्थ “भगवान का रुप”। भगवान श्रीमन्नारायण सबके लिये सामान्य है। जब एक व्यक्ति अपने भगवान कि पुजा करता है तब वह उन्हें “मेरे भगवान श्रीमन्नारायण” ऐसे संबोधित कर सकता है क्योंकि वह सब के अंतरयाम में विराजमान है (देवताओ में भी जिनकी एक साधारण मनुष्य पुजा करता है)। यह भगवान श्रीमन्नारायण सबके स्वामी है। वह अपनेआप को आचार्य ऐसे कहते है और मनुष्य रुप लेते है जो सबको सुलभता से प्राप्त होते है और हमारे अज्ञानता को मिटाते है जो हमारे में आगया है। शास्त्र यह दिखाता है कि सबको यह समझना चाहिये कि हमारे आचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण है।

तालिणैयै वैत्तवरै: यह हमे ज्ञानसारम का ३६वां पाशुर देखने को कहता है जो “विल्लार मणि कोलिक्कुम” से शुरू होता है। उस पाशुर में “मरुलाम इरूलोड मत्तगत्तुत तन ताल अरूलालै वैत्त अवर” पद है। यह उन आचार्य के बारें में कहता है जो अपने शिष्य के माथे पर उसके पापों को मिटाने के लिये अपना श्रीचरण कमल रखते है। वहीं अर्थ इस पद में भी कहा गया है जो आचार्य कि कृपा के विषय में चर्चा करता है।

वणग्ङियिरा – पित्तराय: बिना ऐसे आचार्य का सत्य स्वभाव और महानता जाने बिना कुछ जन ऐसे भी है जो अपने आचार्य के पास नहीं जाते है और उनके चरणों के शरण नहीं होते है। इसके उपर वें उन्हें साधारण मनुष्य समझते है और नकार देते है। सच्चाई यह है कि आचार्य के चरण कमल हमारे थोड़े से भी अंधकार को मिटा देते है जो यहा देखा जा सकता है “चायै पोल  पाड़ वल्लार  तामुम  अणुक्कर्गळे ”।

एक समय कुछ जन श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के पास गये और इस पद का स्पष्टीकरण करने को कहते है। इस पद का अर्थ “जो श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के तिरुमोझी के अन्तिम १० पाशुर गाते है जैसे “परछाई भगवान को प्रिय है”। वह समूह के लोग श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी से पूछते है कि श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी का यह कहने से कि “परछाई के जैसे गाना का क्या मतलब है” जैसे इस पद में कहा गया है “चायै पोल  पाड़ वल्लार ”। श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी उन्हें उत्तर देते है “अडियन को इसका अर्थ पता नहीं है क्योंकि अडियन ने इन पाशुरों का अर्थ अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी से नहीं सिखा। हालाकि श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी ने क्यों गाया इसके लिये कोई व्याख्या होनी चाहिये। मेरे आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी से मिलने हेतु तिरुक्कोटीयूर के लिये प्रस्थान कर दिये है। इसलिये इस समय अडियन उन्हें नहीं मिल सकता है”। यह कहकर वें अन्दर चले गये और अपने आचार्य कि चरण पादुका अपने सिर पर रखा। उसी समय उन्हें इसका समाधान मिल गया। श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी ने उत्तर दिया “मित्रों!!! क्या आपने नहीं सुना श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझसे क्या कहा। हमें यह पद इस तरह गाना चाहिये “पाड़ वल्लार -चायै पोल तामुम  अणुक्कर्गळे ”। अब इसका अर्थ इस तरह है जो यह श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के तिरुमोझी के १० पाशुर को गाता है वह इतना प्रिय और समीप हो जाता है जैसे शरीर के लिये परछाई”।

इस पाशुर के अन्त में आचार्य को सामान्य व्यक्ति समझने के नुकसान से बारें में चर्चा कि गयी है।

निन्दिप्पार्क्कु उण्डेर नीणिरयम: “येरा” शब्द का अर्थ अजय है और “नील” सदैव है। “नीरयम” नरक है और इसलिये यह पद “येरा नील नीणिरयम” अजय नरक जहाँ एक व्यक्ति को आजीवन बांध दिया जाता है यह दर्शाता है। यह स्थान उन जनों के लिये है जो अपने आचार्य का निरादर करते है गलत शब्द का उपयोग करके और उन्हें दूसरे साधारण मनुष्य के जैसे सम्मान देते है। यह नरक नियमित नरक से भिन्न है जहाँ यम शासन करते है। जिस नरक में यम शासन करते है एक समय के पश्चात वहाँ के लोग मुक्त हो जाते है जैसे इस पद में कहा गया है  “नरगमे सुवर्गमागुम ”। हालाकि नरक जो इस पाशुर में कहा गया है भिन्न और खास है और जहाँ से कोई वापस नहीं आता है।

अत: हम यह कह सकते है कि व्यक्ति जो अपने आचार्य को साधारण मनुष्य समझते है कभी मुक्त नहीं होती है। नाहीं मुक्त होने के लिये इन्हें कोई ज्ञान प्राप्त होता है। वें इस संसार में निरंतर जन्म लेते रहेंगे। तिरुवल्लूर इसे इस तरह समझाते है “उरंगुवदु  पोलुम  साक्काडु  उरंगी  विळिप्पदु  पोलुम  पिरप्पु ”। इसका अर्थ यह है कि जन्म और मरण उसी तरह है जैसे निद्रा से उठकर फिर सो जाना।

नीदियाल वन्दिप्पार्क्कु उण्डिलि यावान: जैसे ज्ञान सारम के पाशुर में कहा गया है “तेनार  कमल  तिरुमामगळ  कोळुनन  ताने  गुरुवागि  तन्नरुळाल  मानिडर्का इन्नीलाते तोंदृदलाल ”, कि हमें अपने आचार्य को भगवान श्रीमन्नारायण का अवतार समझना चाहिये और जैसे शास्त्र में कहा गया है उन्हें पूर्ण सम्मान देना चाहिये। ऐसे लोगों के लिये पुर्नजन्म नहीं है क्योंकि वें इस संसार बन्धन से मुक्त हो जाते है।

“नीदि” आचार्य कि पूजा करने कि एक विधी है और वन्दित्तल यानि पुजा करना है। “उण्डिलि यावान” परमपदधाम को संबोधित करता है जहाँ से कोई वापस नहीं आता है। अत: हम आचार्य कि महानता को जान सकते है और उनके चरण कमल कि शरण हो सकते है। हमें इससे अधिक और कुछ जानने कि आवश्यकता नहीं जैसे श्रीमधुरकवि स्वामीजी इन पदों में कहते है “तेवु  मत्रु  अरिएन ”। उन्हें श्रीशठकोप स्वामीजी के चरण कमल के सिवाय और कुछ भी पता नहीं था। जो लोग यह करते है वें परमपदधाम को जाते है और नित्यसुरी के संगत में रहते है और भगवान का अनुभव करते है। ऐसे जन जिनमें ऐसी आचार्य भक्ति है वें पुन: इस संसार में जन्म नहीं लेते है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ८

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ७                                                                                                      श्लोक  ९

श्लोक  ८

प्रस्तावना:

इस ग्रंथ में श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी पहिले ३ पाशुर में “ॐ” शब्द के अर्थ का विवरण देते है “उव्वानवर”, “कुलम ओन्रु” और “पलङ्गोण्डु”। अगले ४ पाशुर यानि “करूमत्ताल”, “वलि यावदु”, “उल्लपडि:” और “इरै इरुवर्क्कुम” में “नम:” शब्द के अर्थ पर चर्चा करते है। इस पाशुर में “नारायण” शब्द के अर्थ पर बात करते है।

“नारायण” शब्द का अर्थ जो यहा बताया गया है वों यह है कि सब को भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना चाहिये और उनकी सेवा करनी चाहिये। यही सब से उच्च बात है जो सब को प्राप्त हो सकती है। इस “नारायण” शब्द के अर्थ में बहुत से परत है। जिसमें भगवान श्रीमन्नारायण को श्रेष्ठ मानकर आनन्द प्राप्त करने कि, उनके दर्शन प्राप्त करने कि, यह तथ्य को ग्रहण करने कि की उनको छोड़ ओर कही आनन्द नहीं है, उनकी सेवा करना और अन्त में उनकी सेवा कैसे करन इसकी अतोषणीय प्यास है। यह सब “नारायण” शब्द में भरा हुआ है। यहीं इस पाशुर में समझाया गया है।

वित्तम इळवु  इन्बम तुन्ब नो य वीकालम
तत्तम अवैये तलै अलिक्कुम – अत्तै विडीर
इच्चियान इच्चियादु एत्त एलिल वानत्तु
उच्चियान उच्चियानाम

अर्थ:

वित्तम              : धन
इळवु                 : हानि
इन्बम               : खुशी
तुन्ब                 : दु:ख
नो य                 : रोग
वीकालम           : बुढ़ापे का समय और परिणाम स्वरूप मृत्यु
तत्तम अवैये     : हर एक के कर्म के आधार पर
तलै अलिक्कुम  : दर्द और लाभ सही समय पर उसका अभ्यास किया जायेगा
विडीर               : कृपया छोड़िये
अत्तै                : उसके बारें विचार
इच्चियान         : वह जो उसे पसन्द नहीं करता है जैसे भगवान श्रीमन्नारायण का आनन्द छोड़ और कुछ नहीं
इच्चियादु         : दूसरे लाभ की और नहीं देखेगा
एत्त                : वह अपने स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण कि हीं प्रशंसा करेगा
एलिल वानत्तु  : सुन्दर परमपद धाम में
उच्चियान        : जहाँ भगवान श्रीमन्नारायण सबसे उपर है
उच्चियानाम    : जिसके सर पर ऐसे अच्छे गुण ऐसा व्यक्ति

स्पष्टीकरण:

“नारायण” पद के विषय में समझाने के वक्त उदाहरण जैसे “इळय पेरुमाळै पोले इरुवरुमान सेर्थियिले  अडिमै सेयगै मुरै।  (श्रीलक्ष्मणजी के जैसे सेवा करना जिन्होने दोनों श्रीराम और माता सीता कि सेवा की)”, “अत्थै नित्यामाग प्रार्थित्थे पेरा वेणुम” (उनकी सेवा के लिये निरन्तर पुछते रहना)”, “उनक्के नाम आटचेय वेणुम  (आप और केवल आपकी हीं सेवा करना)”।

श्रीरामायण में “कैंकर्य” का विचार श्रीलक्ष्मणजी के द्वारा हीं बताया गया था। उन्होंने श्रीराम को अपना भाई नहीं माना। बल्कि उन्हें भगवान का स्थान दिया। कम्बनाटाळ्वार  कहते है कि

“एंदैयूम यायुम एम्बिरानुम एम्मुनुम
अंदमिल पेरुंगुणतु इरामन आदलाल
वंदनै अवन  कळल वैत पोदु आदलाल
सिंदै वेंग कोदुन्थूयर् तीरगिलेन ”
–           कम्बरामायणम् , अयोध्याकाण्डम् , पल्लि पडलं  58)

श्रीराम को ही अपने संपूर्ण रिश्तो के रूप मानकर, उनकी प्रति कैंकर्य को अपनी कर्थव्य समझ कर श्री लक्ष्मण श्रीराम के अनुगमन किये।

“आगददु अनराल उनक्कु अववनम् इव्वयोथि
माकादल  इरामन नाम मन्नवन वैयम ईंदुम
पोग उयिरतायर नम पॊङ्गुळल सीतै एँऱे
एकै इनि इव्वयिन  नित्रलुम  येदं ”
–           कम्बरामायणम् ,अयोध्याकाण्डम् ,नगर नीँगु पडलम 146)

“पिन्नुम पगरवाळ ,”मगने इवन पिन सेल: तम्बी
एँनुमपडी अनृ अड़ियारिन इवळ सेय्दि
मन्नुम नगरके इवन वन्दिडिन वा अदु अन्रेल
मुन्नम मुड़ि एन्रनळ  वार वळी सोर निंराळ
–           कम्बरामायणम् ,अयोध्याकाण्डम् ,नगर नीँगु पडलम 147)

उपर बताये पद माता सुमित्रा (श्रीलक्ष्मणमन्नी जी की माताजी) के शब्द है। यहा पर जो ध्यान देने वाला जो पद है वह “अड़ियारिनिन एवल् सेय्दि ”। श्रीलक्ष्मणजी ने सिवाय श्रीरामजी के सभी के साथ सभी सम्बन्ध छोड़ दिये और उनके पिछे चले गये। उन्होने उनकी सेवा केवल 14 वर्ष तक नहीं बल्कि सारी उमर की। जीवात्मा को कैसे रहना यह उसकी परिभाषा है। यह अवसर बादमें और भगवान श्रीमन्नारायण से प्राप्त करना होगा। तिरुपावै जो सब वेदों का मूल माना जाता है कहता है “एट्रैक्कुम एलेळ पिरविक्कुम उट्रोमे आवोम उमक्के नाम आट सैवोम मत्रै नम कामंगळ माट्र ” श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कहते है “उनक्कु पणि सेईदिरुक्कुम तवमुडयेन ”। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “ओळिविल कालमेल्लाम उड़ानाइ वळूविला अडिमै सैय्य वेंडुम नाम ”। श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है “आळुम पणियुं अडियेनै कोंडान ” और  “उनक्काग तोंडु पट्ट नल्लेनै ”।

अत: हमारे पूर्वज इसीको अपने जीवन का उद्देश मानते थे यानि भगवान कि निरन्तर सेवा करना। उनके जीवन में उन्होने कभी भी धन संचय में आनन्द का पर्व नहीं मनाया नाहीं धन खो जाने पर दु:ख मनाया। आल्वारों के सिखाये अनुसार धन का त्याग करना चाहिये। यह कई पाशुरों में देखा जा सकता है। “वेंडेन मनै वाळ्कैयै ”, “कूरै सोरु इवै वेण्डुवदिल्लै  ” और “नीळ सेल्वम  वेण्डादान ” कुछ उदाहरण है। वह श्रीकृष्ण को हीं सब कुछ मानते थे और उनकी सेवा करना यही उनका एक हीं लक्ष्य था। धन और सेहत के फायदे या नुकसान को लेकर उनकी सेवा करने हेतु किसीका हृदय भटकना नहीं चाहिये । इस पाशुर में श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है उस व्यक्ति को कैसे रहना चाहिये।

वित्तम : खुशी जो धन जैसे सोना, चाँदी, और उसके जैसे से प्राप्त होती है।

इळवु : दु:ख जो उस धन के गवाने से प्राप्त होता है जो अस्थाई है। तिरुवल्लूवर ऐसे धन कि निन्दा करते है “निल्लादवत्रै  निलयिन  एनृ  उणरुम  पुल्लरिवाण्मै  कड़ै ”।

इन्बम: आनन्द उन वस्तु से प्राप्त होता है खुशी उत्पन्न करता है।

तुन्ब: शोक जो उन वस्तु से प्राप्त होता है जो दु:ख देते है।

नो य: रोग जो शरीर पर हमला करते है।

वीकालम: अन्तिम समय में मृत्यु शय्या पर।

तत्तम अवैये: उपर बताये हुए सब के कारण है उनके उनके कर्म।

तलै अलिक्कुम: यह कर्म अपना खतरा प्राप्त करने को शुरू कर देता है और किसी व्यक्ति को सही समय पर पारितोषीक प्रदान करता है जब भी वह प्रारब्ध बटोरता है। जब भी कोई पैदा होता है वह उसके पूर्व जन्म के कर्मानुसार पैदा होता है। कर्म के परिणाम को अनुभव करना चाहिये। कोई भी बच नहीं सकता है। तिरुवल्लूर इसके बारें में दूसरे लेख में इस तरह कहते है “ऊळ ”। वह कहते है “आकॊळार  तोंरूम  असैविन्मै कैपोरुळ  पोकॊळार  तोंरु मडि ”। जब किसी व्यक्ति को धन प्राप्त होता है तो वह उसको उसके काम के कारण प्राप्त होता है। उसी तरह जब वह उसे खोता है तो वह अपने कर्मानुसार खोता है। वह और भी कहते है  “पेदै  पडुक्कुम  इळवॊळ  अरिवगत्रु   आगळूळ उत्र कडै । एक व्यक्ति के पास कितना भी ज्ञान हो परन्तु अगर वों धन को खोता है तो जो भी ज्ञान उसने अर्जित किया है उसके बचाव में नहीं आयेगा। वह तात्पुर्तिक के लिये उसके कर्मों के कारण खो देगा। उसी तरह अगर कोई अनपढ़ है और धन कमाना शुरु करता है, उसके कर्मानुसार वह ज्ञान भी प्राप्त  करना शुरु करता और उसे अधिक धनवान बनता है। अत: ज्ञान के बढ़ने और कम होने का कारण और कुछ नहीं कर्म है। हालाकि हमें यह ज्ञात रहना चाहिये कि धन संबन्धित कर्म और ज्ञान संभन्धित कर्म दोनों भिन्न है, हालाकि एक जगह दोनों मिलते है। यह भी देखना चाहिये कि कर्म अच्छे को बुरा बना देता है और इसका विपरित भी। तिरुवल्लूरजी ने इसके बारें में बहुत विस्तार पूर्वक कहा है। इसका सारांश यह है कि जो ज्ञानी है उसे कर्म के उपर नीचे के बारें में सोचने कि कोई जरूरत नहीं है।

अत्तै विडीर: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह उपदेश देते है कि हमें सुख दु:ख के तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये यह और कुछ नहीं हमारे कर्म के फल रुप है। वह जो इन कर्मों के परिणाम से घबराता नहीं है वह सच में भगवान श्रीमन्नारायण कि सेवा करने में सफल है। यह पाशुर के दूसरे भाग में समझाया गया है।

इच्चियान: यह वों व्यक्ति है जिसे सांसारिक धन में कोई रुचि नहीं है। केवल ऐसा व्यक्ति हीं भगवान श्रीमन्नारायण कि सेवा करने में सक्षम है। श्रीभक्तिसार स्वामीजी कहते है “अडक्करुम  पुलंगळ  ऐंधड़क्की  आसाइयामवै  तोड़करुत्तु  वन्दु निन तोळिर कण निन्र एन्नै ”।

इच्चियादु एत्त: जो भगवान कि सेवा करता है उसे वापस उनसे कुछ अपेक्षा नहीं करनी चाहिये, चाहे वह परमपदधाम हो या कोई कैंकर्य। सेवा के पीछे कोई कारण नहीं होना चाहिये। जैसे श्रीमधुरकवि स्वामीजी कहते है “पाविन इन्निसै पाड़ि तिरिवन ”, सेवा करना हीं लाभ है और इसलिये इसके पीछे कोई इच्छा नहीं होनी चाहिये। “पयन तेरिन्दुणर  ओन्रिमयाल  तीविनएं  वाळा  इरुन्दोळिन्देन  कॆळ्नाळेल्लाम  करंदुरूविल अम्मानै  अन्नानृ पिन तोडरंधा  आळियनकै  अम्मानै एतादु अयर्तु  (तिरुवंदादी )। यहाँ “येतुदल ” शब्द मुख के जरिये यानि गाकर भगवान के प्रति सेवा को दर्शाता है। इसे ऐसे गिनना चाहिए जिसमे मन और शरीर शामिल हो इसीतरह मन और शरीर से की गई सेवायें भी। इसलिये सेवा हृदय, मुख और शरीर का उपयोग करके करना चाहिये।

एलिल वानत्तु उच्चियान उच्चियानाम: पिछले प्रकरण में समझाये हुए जैसे कोई व्यक्ति हो तो उसका उत्सव भगवान श्रीमन्नारायण द्वारा उनके धाम परमपद में मनाया जायेगा। वह ऐसे व्यक्ति को अपने साथ अपने धाम में लेकर जायेंगे। “एळिल  वानत्थु ” परमपदधाम है जिसे  “विण तलै ” ऐसा भी संबोधित किया जाता है। भगवान जो वहाँ विराजमान है उन्हें वैकुण्ठनाथ कहते है जिन्हें “विण्मीदु इरूप्पाई   ” भी कहते है। वहीं भगवान को अब “एळिल  वानत्थु उच्चियान ” कहते है। “एळिल वानं ” वह स्थान है जिसे “मोक्ष भूमी” या “परमाकाक्षम” या “सबसे उच्च स्थान” कहते है। वह जो इस उच्च स्थान पर सबसे उपर है उसे “उच्चियान” कहते है। इसलिये “एलिल वानत्तु उच्चियान” वैकुण्ठनाथ है। ऐसे वैकुण्ठनाथ भगवान उसके माथे पर विराजमान होते है, उस भक्त पर जो उनकी निर्हेतुक सेवा करता है और उनकी सेवा करता है केवल सेवा करने हेतु और कुछ नहीं। ऐसे व्यक्ति को “उच्चियान उच्चियानाम” कहते है। यहाँ तमिळ व्याकरण विधि के अनुसार चौथी कारक (नाँगाम वेट्रुमै उरुबु ) में यह  “उच्चियानुक्कु उच्चियान ” होगी .

अन्त में हम यह देख सकते है कि जो भगवान कि निर्हेतुक सेवा करते है वें कभी धन के नुकसान या फायदे के विषय में नहीं सोचते है। वों यह जानते है कि यह सब कर्मानुसार है और इसे हमें भोगना हीं है। इस परिस्थिति में वें भगवान से कभी कुछ नहीं मांगते है। वें भगवान कि सेवा कुछ पाने हेतु नहीं परन्तु केवल उनकी सेवा भक्ति हेतु करते है। ऐसे भक्त जब परमपद पहूंचते है तो भगवान उन्हें अपने माथे पर विराजमान कर उत्सव मनाते है। इसलिये यह हम सब को सलाह है कि हम भगवान कि निर्हेतुक सेवा करें और यह तभी संभव है जब हम कर्म के प्रभाव से सांसारिक वस्तु में न पडे।

बिना कुछ मांगे भगवान कि पुजा करनी चाहिये। भगवान कि पुजा करना ही सेवा है। मुख से पुजा करना भी तीन में से एक तरह कि सेवा है। बाकि दो सेवायें भी एक मन द्वारा और दूसरी शरीर द्वारा। मुख का होना केवल भगवान कि स्तुति करना है और कुछ नहीं। दिव्य प्रबन्ध से कुछ अंश नीचे बताये गये है।

१.         वाय अवनै अल्लदु वाळ्तादु  (209)
२.         नाक्कु निन्नै अल्लाल अरियादु  (433)
३.         येतुगिंरोम नातळुम्ब  (1863)
४.         नातळुम्ब नारायणा  एन्रळैत्थु  (561)
५.         इरवु नण्पगलुम  विडादु एनरुम येतुदल  मनम वैमिनो  (2954)
६.         पेसुमिन कूसमिन्रि  (3681)
७.         वायिनाल पाड़ि  (478)

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ७

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ६                                                                                                           श्लोक  ८

श्लोक  ७

प्रस्तावना:

पिछले पाशुर में परमात्मा को हीं ऐसा समझाया गया है कि केवल वों हीं सम्पूर्ण है और कोई नहीं। जीवात्मा वों है जो परमात्मा को कुछ भी नहीं दे सकते। कम्बन श्रीराम और माता सीता को इस तरह वर्णन करते है “मरूंगीला नंगैयुं वसैयिल ऐय्यनुम”। वह उन्हें कौतुक व्यवहार में वर्णन करते है। वह माता सीता को बिना कूल्हा और श्रीराम बिना कोई शिकायत वाला ऐसे बुलाते है। उसी तरह योग्यता के अभाव के कारण कुछ स्वीकार करना और योग्यता के अभाव के कारण कुछ अर्पण करना दोनों पर पिछले पाशुर में चर्चा कि गयी है। इसी विचार पर आगे बढ़ते हुए श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है भगवान पर विजय पाने वाला कोई नहीं है। यह सच जानने वाला “ज्ञानी” कहलाता है। श्रीकृष्ण कहते है ऐसे ज्ञानी मेरे आत्मा है। ये ज्ञानी जन मेरे प्रेम को नित्य ग्रहण करने वाले है। “मैं उनके प्रेम के नीचे हमेशा हार जाता हूँ”। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इन ज्ञानीयों में उत्सव मनाते है यह कहकर कि ऐसे ज्ञानी कहाँ प्राप्त होते है? श्री आण्डाल भगवान का वर्णन इस तरह करती है “कूड़ारै वेल्लुम श्री गोविन्दा” इसका अर्थ भगवान वों है जो अपने भक्तों के आगे झुक जाते है। यह पाशुर ये ज्ञानी कितने दुर्लभ है यह समझाता है।


इल्लै इरुवर्क्कुम एन्रिरैयैवेन्रि रुप्पार
इल्लै अक्दोरुवर्क्कु एट्टुमदो – इल्लैकुरै
उडैमै तान एन्रु कूरिनार इल्ला मरै
उडैय मार्गत्ते काण

अर्थ:

इरै यै वेन्रि रुप्पार इल्लै  : यहा पर ऐसा कोई उपलब्ध नहीं है जो भगवान से जीत सके ऐसा सोच के की
इरुवर्क्कुम                    : दोनों जीवात्मा और परमात्मा के लिये
इल्लै एन्रि                    : किसी वस्तु की कमी होना
अक्दो                          : यह विचार
एट्टुमदो                        : यह ऐसा कुछ है की
ओरुवर्क्कु                    : एक व्यक्ति को मिल सके?
इल्लै                           : भगवान में कोई गलती नहीं जिसके कारण से
कुरै तान                      : यह स्वीकार करना कि भगवान को सम्पूर्ण बना सके
एन्रु                             : इस विशेष विचार से
मरै उडैय मार्गत्ते         : जो वेदों में डाला गया है
कूरि नार इल्ला            : कुछ वो जो कोई कह नहीं सकता
काण                          : कृपया वेदों में पढ़कर इस तथ्य के बारें मे देखे !!!

स्पष्टीकरण:

इल्लै इरुवर्क्कुम एन्रि: कुछ है जो दोनों परमात्मा और जीवात्मा में है। परमात्मा के विषय में वह जिसमें कोई दोष नहीं है जिसे इस पद में समझाया गया है “कुरै ओनृम इल्लाध गोविंधन”। हालाकि जीवात्मा के विषय में उनमें ऐसा कुछ भी नहीं जिसे इस पद में समझाया गया है “अरिवोनरूमील्लाधा आयकुलम” और “पोरुल अल्लाध”। यह जीवात्मा और परमात्मा कि सच्ची स्थिति है। यह हमें इस सच को स्विकार करने के लिये कहता है। अगर इस आत्मा पर कोई विचार करता है तो ऐसे आत्मा के लिये भगवान श्रीमन्नारायण स्वयं आकर उसकी निरन्तर सेवा करेंगे। यह देखने के लिये हम आल्वारों के पाशुर के उदाहरण दे सकते है। “वळवेळ् उलगु”, “मिन्निडै मडवार्”, “कण्गल् सिवन्दु” और् “ओरायिरमाय्” जैसे तिरुवाय्मोळि ऐसे उदाहरण है जहाँ भगवान् स्वयं पधार कर सेवा करते है | वह लोग जो इस सत्य को नहीं जान सकते है उनके लिये भगवान को सेवा करना नामुमकिन है। यह आगे समझाया गया है।

इरै यै वेन्रि रुप्पार इल्लै: भगवान को किसी कि आज्ञा पालन करने कि जरूरत नहीं है। वह स्वतंत्र है और अपने संकल्पनुसार काम करते है। भगवान को नियंत्रण में करना किसी के लिये भी मुमकिन नहीं है। हालाकि ज्ञानी जन उनको आसानी से अपने वश में कर सकते है। वह उन ज्ञानी जन को आसानी से प्राप्त हो सकते है जो इस तरह कहा गया है “पत्तुडै अडियवर्क्कु एळियवन्”। क्या हम ऐसे ज्ञानी को देख सकेंगे?

अक्दोरुवर्क्कु एट्टुमदो: क्या कोई निरन्तर भगवान के पूर्ण सम्पूर्णता और पूर्ण असम्पूर्णता के बारें में सोच सकता है? यह इस संसार में पालन करना बहुत कठीन है जो पूरी तरह “मैं” और “मेरा” से भरा हुआ है (अहंकार और ममकार)। इसीलिये यह कहा गया है की भगवान को नियंत्रण में करना नामुमकिन है।

इल्लै कुरै उडैमै तान एन्रु कूरि नार इल्ला: उसका अर्थ जानने के लिये इस पद को इस तरह पढ़ा जाना है “कुरै तान इल्लै उडैमै तान इल्लै”। “तान” शब्द मध्य में आता है जिसका अर्थ “इसमें कोई दोष नहीं है” और “इसमें कोई अधिकार नहीं है”। जैसे पहिले कहा गया है भगवान जीवात्मा से कुछ ग्रहण करें इसमें कोई दोष नहीं है। जीवात्मा भगवान को कुछ नहीं दे सकता है। यह सत्य है जिसे आसानी से समझा नहीं जा सकता है और इसका कारण आगे कहा गया है।

मरै उडैय मार्गत्ते काण: वेदों में यह गुप्त है और इसलिये यह समझना बहुत मुश्किल है। वेद कोई साधारण वस्तु नहीं जिसे किसी ने रचा है। यह समय के बन्धन में भी नहीं है। यह दोष रहित है जैसे “ऐयं” और “तिरुबु” (धुंधला और अनेक अर्थ) और इसलिये वह काम में विश्वसनीय और अधिकारिक संस्था है। जिसने पढ़ा है उसी से हमें सिखना चाहिये। “काण” शब्द का अर्थ “हे देखो!” और इसलिये लेखक श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी उनसे वार्ता करते है जो उनके सामने हो (या इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि वह व्यक्ति सभी मनुष्य योनि को संबोधित कर रहा है और अत: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी हमें उपदेश कर रहे है)। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी जिन्होंने इसका स्पष्टीकरन लिखा है ऐसे ज्ञानियों के लिए उत्सुक होते है और सोचते है कि क्या वें इस व्यवहारिक संसार में मिल सकते है।

इस पाशुर का पूर्ण तत्त्व इस प्रकार है। भगवान श्रीमन्नारायण सम्पूर्ण है। जीवात्मा उसकी सम्पत्ति है। अत: ऐसा कुछ “सम्पत्ति” कि सम्पत्ति कहलाने वाला नहीं है। यह वेदों में छुपा गुप्त अभिप्राय है। इसका अर्थ वों हीं जान सकते है जो वेदों को समझ सकते है और बाक़ी के लिये नामुमकिन है। ज्ञानि जो इन दोनों का स्वभाव समझ सकता है भगवान उनके निकट आकर उनके इशारों पर नाचते है और उनकी सेवा करते है। केवल उन ज्ञानियों को छोड़ यह समझने के लिये इस संसार में लोगो को नामुमकिन है। अत: यह “परमात्मा-जीवात्मा” का विचार भगवान को आकर उस मनुष्य कि सेवा करने के लिये मजबुर करता है और यह कमी इसे नामुमकिन कर देता है। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “पट्टुदै अदियवरक्कु एलियवन पिरर्गलुक्कु अरिया विट्टगन”। भगवान शास्त्र को मानने वाले लोगों के करीब होते है और जो नहीं मानते उनसे बहुत दूर रहते है। भगवान श्रीकृष्ण ज्ञानियों को भगवद गीता में उनकी आत्मा ऐसा समझाते है। वह पूर्णत: उनके समीप थे। श्रीगोदम्बाजी समझाती है कि अगर श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कहे “काप्पिड़ा वारै”, “पूच्चूड़ा वारै”, “अम्मां उण्णा वारै” आदि तो भगवान श्रीकृष्ण दौड़ते हुए आयेंगे। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी कहते है “ज्ञानीयर्क्कु ओप्पोरिल्लै इव्वुलगु तन्निल”।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ६

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ५                                                                                                             श्लोक  ७

श्लोक  ६

उल्लपडि उणरिल ओन्रु नमक्कु उण्डेन्रु
विल्ल विरगिलदाय विट्टदे – कोल्लक
कुरै एदुम इल्लार्क्कुक कूरुवदेन सोल्लीर
इरै एदुम इल्लाद याम

अर्थ:

उल्लपडि:            : अगर हमे सही तरिके से समझना है और
उणरिल               : जीवात्मा का सही स्वभाव जानना है
ओन्रु                   : तब हम उसे देख सकते है
उण्डेन्रु                 : वहाँ है
नमक्कु               : हमारे उपर कुछ नहीं है (जो बहुत कम स्वभाव के कारण)
विल्ल                 : हमारे पास कुछ नहीं है जिसके बारें में हम बात कर सके
विरगिलदाय        : हमारी स्थिति यही है और हमारे पास कोई राह नहीं जिसके बारे में हम बात कर सके
विट्टदे                  : हमारे सत्य स्वभाव को देखिये!!!
एदुम इल्लार्क्कुक : भगवान श्रीमन्नारायण जिनका स्वभाव वर्णन करता है
एदुम इल्लाद       : किसीका भी सम्पूर्ण दुर्लभता
कोल्लक कुरै        : हमसे भगवान को सम्पूर्ण बनाने के लिये
सोल्लीर              : हे मनुष्य जन !!! कृपा कर मुझे कहिये
याम                   : हम, जिनका बुनियादि स्वभाव भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना है
कूरु वदेन            : हमे अपने आप कि रक्षा करने के लिये हम पर ही क्या कहना है

स्पष्टीकरन:

उल्लपडि उणरिल: यह पद का अर्थ यह है कि “अगर हमें जीवात्मा के सही स्वभाव को जानने और पहिचाने का”। तिरुवल्लूवर कहते है “एप्पोरुल एत्तंमै ताईनुम अप्पोरुल में पोरुल काण्बधु अरिवु”। इसका अर्थ है ज्ञान / समझ और कुछ नहीं जीवात्मा का सही स्वभाव जानना है। जब हम हमारे संसार को देखते है हम पदार्थ को सजीव निर्जीव (चित अचित) समझते है। उसमे ही हम मनुष्य, जानवर, पेड़ आदि भेद को देखते है। हम उस जीवात्मा को जानते नहीं है जो उसमे रहता है। एक समझदार व्यक्ति कभी उसमे सजीव / निर्जीव स्वभाव या वर्ग / उप वर्ग ऐसा सतही स्वभाव नहीं देखेगा। वह जीव के जो उनमें सत्य स्वभाव है उसको देखते है। हालाकि स्वयं हमसे जीव के सत्य स्वभाव को देखना आसान नहीं है। हमें उसे शास्त्रों कि सहायता से जानना चाहिये। जीवात्मा ज्ञान से बना है जिसे हम “विवेक” कहना पसन्द करते है। आत्मा को विवेक से मनुष्य गुण प्राप्त होते है। इसके अलावा आत्मा में एक और स्वभाव है “विवेक”। इसलिये हमारे लेख आत्मा को इस तरह समझाते है (अ) वह जो कुछ भी नहीं परन्तु सम्पूर्ण विवेक है और (आ) वह जिसमे विवेक प्राप्त है। इसीलिए आत्मा स्वाभाविकता से अहंकार स्वभाववाला है कि “मैं हीं वो हूँ जो यह कर सकता है”। अगर हम इस वर्णन को घेहराई से देख सकते है तो हम कुछ मनभावक अर्थ निकाल सकते है। आत्मा में विवेक मनुष्यगुण आदि है फिर भी वह स्वयं नहीं कर सकता है। उसे उस कार्य को करने के लिये कोई मार्गदर्शक चाहिये। वह और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायाण है जो आत्मा के अन्दर है जो “आत्मा के आत्मा” का कार्य करता है। अत: श्रीमन्नारायाण आत्मा है और आत्मा शरीर बन जाता है जहाँ भगवान श्रीमन्नारायाण निवास करते है और आत्मा को राह बताते है। अत: आत्मा जिसे हम देखते है स्वयं कुछ कार्य नहीं कर सकती है। अत: आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण कि निरन्तर दास है। भगवान श्रीमन्नारायाण का निरन्तर दास बनकर रहना आत्मा का सत्य स्वभाव है। अगर कोई इस बात को जान ले तो उसको स्वयं के रक्षा के लिये और कुछ भी जानने कि जरुरत नहीं है। तिरुवल्लूवर कहते है “इयल्बागुम नोन्बिर्का ओनृ इनमै उदैमै मयालागुम मर्रुम पेयार्त्तु”। ऋषियों कि स्थिति ऐसी है कि उन्हें यह समझ है कि भगवान श्रीमन्नारायाण छोड़ और कोई भी हमारा लक्ष्य नहीं प्राप्त करा सकता। अगर हम यह सोचे कि इसे छोड़ और कोई दूसरा राह है तो  केवल यह सोच हमारे दूसरे जन्म का कारण बन जाती है।

ओन्रु नमक्कु उण्डेन्रु विल्ल विरगिलदाय विट्टदे: इस पद का अर्थ यह है कि हम अपना मुख नहीं खोल सकते और अभिमान भी नहीं कर सकते कि हम केवल अपने आप के लिये “मोक्ष” भी नहीं ले सकते। “विनोदगृह” का अर्थ “कहना”। इस शब्द का एक और अर्थ है “विल्ला विलगि निर्का”। यह उस व्यक्ति के अवस्था को दर्शाता है जो यह भी नहीं कह सकता है कि उसके पास कोई ऐसी राह है जिससे वह अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकता है और भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल के शरण नहीं होता है। इस व्यक्ति कि दशा जो अपने आप को अलग रखने कि कोशिश करता है और कर नहीं पाता है इसलिये “विल्ला विलगि निर्का” यह कहा गया है। इस तथ्य का अर्थ यह है कि सभी आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण के शरीर जैसा कार्य करते है और वही सत्य आत्मा है जो शरीर में निवास करता है। एक शरीर बिना आत्मा के कोई भी काम नहीं कर सकता है।

इस भाग में एक प्रश्न आता है। हमारे शरीर में हम जानते है एक आत्मा है। यह शरीर-आत्मा का एक सामान्य उदाहरण है। एक कदम आगे बढ़कर एक आत्मा के लिये आत्मा क्या है? हमने यह देखा कि आत्मा के लिये आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण है और अत: अगर हम आत्मा को शरीर समझे तो उस आत्मा का आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण है। हमने पहिले देखा कि आत्मा पूर्ण विवेक है, वह जो हमारे भीतर रहे या आत्मा के आत्मा के अन्दर रहे। क्योंकि उसमें विवेक है और इसलिये उसे अपने पक्ष मे रहकर सब कार्य करना है। क्योंकि वह स्वयं कार्य कर सकता है क्या परमात्मा जीवात्मा से कोई कार्य कि अपेक्षा करता है उससे यह सुनकर कि “हे परमात्मा आप मेरी रक्षा करें”। क्या इसका यह अर्थ है कि केवल जीवात्मा ही कह सकता है “ओ परमात्मा! कृपया मेरी रक्षा करें”। परमात्मा इस पर कार्य कर उस पर अपनी कृपा बरसा सकते है? अगर वह कृपा बरसाने से पहिले कुछ अपेक्षा करता है तो वह उसके लिये “भूल” हो जाता है। इसके अलावा, हम दूसरी तरफ कुछ नहीं दे सकते है। यह आगे समझाया गया है।

कोल्लक कुरै एदुम इल्लाद याम: हमारे पास जो शरीर है और उसमे जो आत्मा है वह सब भगवान श्रीमन्नारायण के है। शारीर और आत्मा को स्वतंत्र कार्य करने कि क्षमता नहीं है। उनके पास स्वयं का कुछ भी नहीं है। इसलिये वह शरीर से कुछ अपेक्षा नहीं करते है। यह बात एक कहानी के जरिये समझाया गया है।

एक समय कि बात है एक व्यक्ति था उसने भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाकर कहा “हे भगवान! मैं आपको क्या दे सकता हूँ? मेरे पास कुछ भी नहीं है क्योंकि मैं आपका दास हूँ। कुछ भी वस्तु जो मैं सोचता हूँ कि मेरी है वह सच में आपकी हीं है। अत: मेरे पास आपको अर्पण करने हेतु कुछ भी नहीं है। हालाकि मेरे पास आपको अर्पण करने के लिये कुछ है। वह और कुछ नहीं मेरे कर्म है जो मुझे कल्प वर्षो से प्राप्त हुए है। मेरे पास वही है और वहीं मे आपको अर्पण कर सकता हूं। इसके अलावा मेरे पास और कुछ भी नहीं है”। एक अध्याय है श्रीरामायण में भरत और ऋषी वशिष्ठ के बीच जो इधर बताया गया है।

ऋषी वशिष्ठ भरत से कहते है “हे भरत! श्रीराम वन चले गये है। आपके पिता स्वर्ग पहूंच गये है। अब आपको हीं इस राज्य पर राज करना चाहिये”। यह सुनकर भरत अपने हाथों से कान बन्द कर यह कहते है “आप कहते है श्रीराम वन चले गये है। अगर ऐसा है तो क्या मैं यह राज्य ले सकता हूँ जो उनका है? अगर कोई दूसरे कि वस्तु लेता है तो वह चोरी है”। भरत अपनी तर्क उन लेख के आधार पर करते है जो कहते है “उल्लात्ताल उल्ललूम थिधे पिरन पोरुलै कल्लात्ताई कल्वम एनल”। इसके पश्चात भी ऋषी वशिष्ठ ने उनको नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा “क्योंकि श्रीराम अभी यहाँ नहीं है, यह राज्य जो उनकी आस्ती है जब तक वें लौट कर नहीं आते आप ले सकते है”। भरत उत्तर देते है “यह अयोग्य है। किसी को भी किसी कि वस्तु को नहीं लेना चाहिये। मैं और राज्य दोनों श्रीराम के हीं है। अत: मैं उनका राज्य नहीं ले सकता”। उनकी बात सुनकर भी वशिष्ठजी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह आगे कहते है “राज्य वह है जिसे कोई विवेक नही है। हालाकि आप ऐसे नही हो। आपको विवेक और ज्ञान है। इसलिये आप जिसके पास ज्ञान है वह राज्य ले सकता है। इसके लिये मैं आपको एक समानता देता हूँ”। एक व्यक्ति के पास बहुत आभूषण है। वह एक सन्दूक में रखकर उसे ताला लगाता है। वह सन्दूक उन आभूषण कि रक्षा करता है। हालाकि दोनों आभूषण और सन्दूक उस व्यक्ति के संपत्ति है। परन्तु आप देख सकते है कि वह सन्दूक उसमे रहने वाले आभूषण कि रक्षा करता है। उसी तरह, आप जो श्रीराम कि संपत्ति है इस राज को राज्य कर सकते है जो भी श्रीराम कि हीं संपत्ति है? भरत उत्तर देते है “स्वामीजी। यह समानता जो आपने दिया है वह निर्जीव वस्तु है जिनमे कोई विवेक नहीं है। सन्दूक को यह ज्ञान नहीं है कि उसमे जो आभूषण है उन्हें उसका मालिक धारण करता है। क्योंकि उसे ज्ञान नहीं है वह वहीं करता जो उसे कहा गया हो। परंतु मुझमे विवेक है मैं अपने स्वामी श्रीराम कि संपत्ति पर अधिकार ग्रहण नहीं कर सकता मैं और राज्य दोनों श्रीराम कि संपत्ति है। हालाकि यह सत्य है कि मुझमे ज्ञान है और राज्य में नहीं यह अन्तर है। मुझमे ज्ञान है कि मैं श्रीराम का दास हूँ जो कि राज्य में नहीं है। अत: मुझे  इस ज्ञान के तथ्य पर रहना है और उसके प्रति सत्यवादी रहना है और मिले हुए संपत्ति के गुण को प्रदर्शित करना है”। इसके पश्चात वशिष्ठजी तर्क कर नहीं पाते और भरतजी के तर्क को स्वीकार करते है। यह इस तथ्य को साबीत करता है कि जीवात्मा के पास ज्ञान है यह ज्ञान तभी अच्छा है जब जीवात्मा को इसके सत्य स्वभाव का एहसास होता है जो और कुछ नहीं भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना। सत्य स्वभाव को जानने के बाद कोई भी “मैं” या “मेरा” नहीं करेगा।

यह ध्यान में रखकर श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है भगवान श्रीमन्नारायण सम्पूर्ण है। उन्हें  स्वयं को सम्पूर्ण करने के लिये कुछ भी जरूरत नहीं है। इसके उपर जीवात्मा के पास कुछ भी नहीं जिसे वह खुद का कह सके। उनके पास भगवान को अर्पण करने हेतु कुछ भी नहीं है। यह देखकर हम यह कह सकते है कि वह कुछ भी स्वीकार नहीं करते और हम कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी वहाँ उपस्थित जनों से पूछते है “आप इसके बारें क्या कहते है”। “इरै एदुम इल्लाद याम:” में “नाम” शब्द श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को शामिल करता है और जो लोग बाकि सभी सिवाय भगवान श्रीमन्नारायण के उनके सामने है। यहाँ “इरै” शब्द का अर्थ कण है और “इरै एदुम” बिना कण के। यह “अगलगिल्लेंन ईरैयुंम एनृ” के समान है जहाँ उसका अर्थ “क्षण भर के लिये भी अम्माजी भगवान से अलग नहीं होती है”। अगर कोई जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को जानना चाहता है तो उसके विशेष लक्षण इस प्रकार है (अ) भगवान कि संपत्ति बनकर रहना (आ) क्योंकि भगवान से मालिक का सम्बन्ध होने के कारण जीवात्मा को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। वह हर रूप से सम्पूर्ण है और इसलिये स्वयं को सम्पूर्ण करने के लिये उसे दूसरों से कुछ भी आवश्यकता नहीं है। एक भिखारी एक धनवान को कुछ भी दे नही सकता है। स्वयं को ज्यादा धनवान होने के लिये धनवान को उस भिखारी के पास जाकर उसकी संपत्ति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिये जीवात्मा क्या दे सकता है? परमात्मा क्या ले सकते है? दोनों सवालों का उत्तर कुछ नहीं है।

इसलिये यह सत्य जानने के पश्चात जीवात्मा इस सत्य को जाने और उसके अनुरूप जीवन व्यतित करें। जीवात्मा यह जाने कि यह भगवान कि संपत्ति है और उन्हें कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते है। मालिक स्वयं उस सब कि देख-रेख कर लेगा। ऐसा जीवन व्यतित करना हर जीवात्मा का कर्तव्य है। यह मूल मन्त्र के “नम:” शब्द का तत्त्व है।

इस मोड पर हमें श्रीवचन भूषण के निम्म चूर्णिकै पर विचार करना चाहिये। “पलत्तुक्कु आत्म ग्यानमुम् अप्रतिशेदमुमे वेण्डुवदु. अल्लाद पोदु बन्दतुक्कुम् पूर्त्तिक्कुम् कोत्तैयाम्”. “अन्तिम कालत्तुक्कु तन्जम्, इप्पोदु तन्जमेन् एन्र निनैवु कुलैगै एन्ऱु जीयर् अरुळिच्चेय्वर्” और्  “प्राप्तावुम् प्रापगनुम् प्ऱप्तिक्कु उगपानुम् अवने” जैसे सूत्र है जिनके तत्त्व के साथ एक कथा प्रचलित है। श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी अपने एक शिष्य के पास जाते हैं जो अपने अन्तिम समय के निकट था। वह शिष्य अपने आचार्य श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी को निकट देख बहुत प्रसन्न हुआ और पूछता है की अन्तिम क्षणों में आप कुछ कहना चाहते है। श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी उत्तर देते है “हम सब भगवान श्रीमन्नारायण कि सम्पत्ति है। केवल मालिक हीं उसकी रक्षा हेतु सोच सकता है और कोई नहीं। हमें अपने रक्षा हेतु कभी कुछ नहीं करना चाहिये, चाहे वो आज हो या जीवन का अन्तिम क्षण। हमारे में यदि यह विचार भी आवे तो हटा देना चाहिये। तभी भगवान श्रीमन्नारायण हमारे रक्षा हेतु आते है। तब तक कितना भी मनुष्य कोशिश कर ले सब व्यर्थ है”।

श्रीरामायण में जब ऋषी गण वन में श्रीराम से मिलते है वें अपने आप को उस शिशु समान समझते है जो माँ के गर्भ में है। कारण यह है कि शिशु के सभी कार्य कि रक्षा गर्भ में उसकी माता करती है। उसी तरह ऋषी कहते है वें भगवान श्रीमन्नारायण के सुरक्षा में है। इसलिये जीवात्मा कि गतिविधियाँ स्वयं से नहीं परमात्मा से बंधी है। इसीको “पारतंत्रियम” कहते है। कभी कभी इसे “अचितत्त्व पारतंत्रियम” भी कहते है। यह और कुछ नहीं जीवात्मा का गुण है जहाँ वह निर्जीव वस्तु के समान है जो एक हीं स्थान पर रहता है जहाँ उसे रखा गया है। उसी तरह जीवात्मा आज्ञा पालन करता है और स्वयं कि रक्षा के लिये कुछ भी नहीं करता है। वह पूर्णत: परमात्मा पर निर्भर है और वहीं रहता है जहाँ भगवान उसे उस समय रहने के लिये कहे है।

तिरुकककोलूर्पेन्पिळ्ळै अम्माळ् कहते है – “वैत्त इडत्तिल् इरुन्दॅओ भरताळ्वानैप् पोले”. कुळशेखर आळ्वार कहते है – “पडियाय्क् किडन्दु उन् पवळ वाइ काण्बेने”. अगर कोई व्यक्ति इस स्थिति में है तो भगवान अपने संकल्प से बाहर आकर उसकी रक्षा करते है। समुन्द्र दण्ड पर क्या हुआ था इसे पक्का करने के लिये कि हमारे पूर्वज एक कथा लेते है।

समुन्द्र किनारे पर श्रीराम और श्रीलक्ष्मण कि सुरक्षा हेतु बहुत से वानर थे। वह आपसमे बात करते है कि उन्हें श्रीराम और श्रीलक्ष्मण को राक्षसों के हमले से बचाना है। हालाकी जैसे रात बढ़ती गयी वानरों को नींद आगयी और वें सो गये। यह तो श्रीराम और श्रीलक्ष्मण थे जो हाथ में धनुष और बाण लेकर उन वानरों कि रक्षा किये थे। अत: यह भगवान श्रीमन्नारायण का कर्तव्य है उनके भक्तों कि रक्षा करें। यह जीवात्मा का काम हैं भगवान के रक्षत्व में बाधा न करें।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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