आर्ति प्रबंधं – २०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनिगळ श्री रामानुज से पूँछते हैं कि क्या ज्ञानी अपने पुत्रों के पथभ्रष्ट होना सह पायेंगें।  (इरामानुस नूट्रन्दादि ४४ ) “नल्लार परवुम इरामानुसन” अनुसार श्री रामानुज , जो नेक लोगों के मान्यवर हैं, मणवाळ मामुनि के शोक गीत सुनें । वें मामुनि के दयनीय स्तिथि पर विचार किये और सह नहीं पाए । वें सोचते हैं कि ,मणवाळ मामुनि को ज्ञानियों की लक्ष्य जो  परमपद है , वहाँ पहुँचना है और नित्यसुरियों के संग रहना हैं। वे मानते हैं कि वहाँ पहुँचकें मामुनि को नित्यसुरियों के प्रति नित्य  कैंकर्य कि पुरस्कार मिलनी चाहिए। श्री रामानुज के इस इच्छा समझ कर, मामुनि अपने पिता श्री रामानुज की वात्सल्य पर अत्यंत संतुष्ट होते हैं और उनको लगता हैं कि उन्को परमपद प्राप्त ही हो गयी।(मुमुक्षुपडि ,द्वय प्रकरणं १ ) के “पेरू तप्पादु एन्रु तुणिन्दु इरुकैयुम”  वचनानुसार आत्म विश्वास के सात, सँसार पार कर परमपद पधारने वाले जीवात्मा की सफ़र की विवरण करते हैं।

पासुरम

पोम वळियै तरुम एन्नुम इन्बम एल्लाम
पुसित्तु वळिपोय अमुद विरसै आट्रिल
नाम मूळगी मलमट्रू तेळिविसुम्बै
नण्णि नलम तिगळ्मेनि तन्नै पेट्रू
ताम अमरर वंदु एदिर कोणडु अलंकरित्तु
सर्करिप्प मामणि मणडपत्तु चेन्रु
मामलराळ कोन मडियिल वैत्तु उगक्कुम
वाळ्वु नमक्कु एतिरासन अरुळुम वाळ्वे

शब्दार्थ 

वाळ्वु – सौभाग्य
अरुळुम वाळवे – के आशीर्वाद
एतिरासन – एम्पेरुमानार
नमक्कु –  हमारे लिए (जैसे नीचे सूचित हैं )
पोम वळियै – (जब आत्मा शरीर से निकलता है ), परमपद के नित्यानंद तक पहुँचाने वाला “अर्चिरादि” मार्ग पर रवाना होता है
तरुम – जीवात्मा को यह पथ प्राप्त है
एन्नुम – और इसके कारण
पुसित्तु – भोग करता है
इनबम एल्लाम – सारे खुशियाँ
वळिपोय – अर्चिरादि मार्ग में जाते समय
नाम मूळगी – (बाद में ), आत्मा को मिलता है दिव्य स्पर्श
अमुद विरसै आट्रिल – “विरजा” नदी में
मलमट्रू – प्राकृतिक मलो  से मुक्त होता है
नण्णि – (इसके पश्चात )पहुँचता है
तेळिविसुम्बै – निष्कलंक और दोषरहित परमपद को
नलम तिगळ मेनी तन्नै पेट्रू – जीवात्मा की स्वरूप प्रकाशित करने वाली, अप्राकृतिक, शुध्द शरीर पाकर
ताम अमरर – नित्यसूरीया
वंदु – आकर
एदिर कोणडु – स्वागत करते है
अलंकरित्तु – श्रृंगार कर
सर्करिप्प – नवीन अप्राकृत शरीर में उपस्तिथ जीवात्मा की सत्कार कर
मामणि मणडपत्तु चेन्रु – “तिरुमामणि मंड़प” नामक मंडप जाकर देखता है
मामलराळ कोन – पेरिय पिराट्टि के दिव्य पुरुष, श्रियपति नामक श्रीमन नारायण
मडियिल वैत्तु उगक्कुम – श्रीमन नारायण अपने गोदी में बिठाके, हमें स्पर्श करके सूंघ  कर, उस अनुभव में संतुष्ट होते हैं ( यह भाग्य केवल श्री रामानुज के कृपा के कारण ही है )

सरल अनुवाद

एम्पेरुमानार की कृपा, जिस्से ही , जीवात्मा  साँसारिक बंधनों से विमुक्त, परमपद पहुँचते हैं,  इस पासुरम में उसकी गुणगान किया गया है। इस भूमि से प्रारम्भ परमपद तक जाने वाली इस अदबुद रास्ते की मामुनि संतोषी से विवरण करते हैं।  नित्यसूरीया इस जीवात्मा के कैसे सत्कार करते हैं और श्रीमन नारायण कैसे स्वागत कर संतुष्ट होते हैं, इसकी भी मामुनि विवरण देते हैं।

स्पष्टीकरण

नम्माळ्वार के “पोम वळियै तरुम नंगळ” (तिरुवाइमोळि ३.९.३ ) के अनुसार, शरीर से विमुक्त आत्मा परमपद पहुँचाने वाले “अर्चिरादि मार्ग” में अनुप्रस्थ करता है। परमपद जाते समय ,उस मार्ग के सर्व सुखों की भोग करता है। इस अप्राकृतिक और सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य के समान ही मार्ग भी होनी चाहिए।  अतः इस मार्ग पधारने वाले आत्मा पूज्नीय हैं। “कळवन कोल पिराट्टि” (तिरुमंगै आळ्वार के नायिका भाव की नाम हैं परकाल नायकि, विशेष रूप में पेरिय तिरुमोळि ३.७ में ) के जैसे भगवान के नेतृत्व में जीवात्मा इस मार्ग में जाता है।  “विरजामाम अमृतकाराम माम प्राप्यमहानदीम” वचन से चित्रित प्रसिद्द “विरजा” नदी में आत्मा को एक दिव्य डुबकि मिलता है। इस्से अनादि काल के पाप और कलंक से आत्मा शुद्ध होता है।  इसके पश्चात उसको एक दिव्य अप्राकृतिक शरीर मिलता है।  अपने स्वामी श्रीमन नारायण के दास होने के सत्य स्वरूप से यह प्रकाशमान है।  अब इसे नित्यसूरीया मिल कर, सुस्वागत कर, सत्कार कर, श्रृंगार करते हैं,  गुणगान करते हैं।  वें इसे “तिरुमामणि मण्डप” नामक मण्डप ले जाते हैं। यहाँ  श्रीवैकुंठनात नामक श्रीयःपति से मिलता है। वें इस विमुक्त व्यक्ति को स्वीकार कर , आलिँगन कर, (शिशु से पिता जैसे ) उठा कर सिर  सूँगते हैं और अत्यंत खुश होते हैं।  परमपद प्राप्ति में इच्छा रखने वाले हम जैसों को मिलने वाली यह उत्तम सौभाग्य, हमारे प्रति श्री रामानुज की अत्यंत कारुण्य की उधाहरण हैं जिस्से वें हमें यह उत्तम संपत्ति उपहार करते हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/08/arththi-prabandham-20/

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