पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २१

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  २०                                                                                                         श्लोक २२

श्लोक २१

साक्षात् फलैक लक्ष्यत्व प्रतिपत्ति पवित्रितम् ।
मन्त्ररत्नं प्रयच्छन्तं वन्दे वरवरं मुनिम् ॥ २१

शब्दार्थ

साक्षात्फल                              – दिव्यमहमंत्र के उपदेश के सुखानुभव से प्राप्त फल (भगवान के प्रति किया जाने वाला                                                   मंगलाशासन),
एक लक्ष्यत्वप्रतिपत्तिपवित्रितं – केवल यह सोचने से ही,
मंत्ररत्नं                                 – द्व्यमहामंत्र जिसे पूर्वाचार्य मंत्ररत्नं कहते आये है,
प्रयच्छन्तं                             – (जिसका) उपदेश मुझे दिया गया,
वरवरमुनिम्                          – अळगियमणवाळमामुनि,
वन्दे                                     – (मै) ऐसे गुरु का अभिवादन करता हूँ

भावार्थ (टिप्पणि) – श्रीवरवरमुनि अपने शिष्यों को द्व्यमहामंत्र का उपदेश देकर सोचते है की मेरे शिष्य अब परिवर्तित होकर द्व्यमहामंत्र का अर्थ जानते हुए भगवान का मंगलाशासन कैंकर्य करेंगे और अगर वरवरमुनि यह सोंचे तो ही उनका यह उपदेश सर्वोच्च पवित्रता प्राप्त करेगा । अतः हम यह कह सकते है की श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को द्व्यमहामंत्र का उपदेश पवित्रता के सर्वोच्च क्रम पर दिया ।  अगर कोई द्व्यमहामंत्र का उपदेश उपर्युक्त भावना से नही करते है बल्कि इन निम्नलिखित भावनाओं जैसे

१) लौकिक विषयासक्त (पैसों, सेवा इत्यादि), २) शिष्य को मोक्ष के प्रति प्रेरित करना और इसी कारण शिष्य को मोक्ष की प्राप्ति होना, ३) शिष्य को नियंत्रित करते हुए भगवान की सेवा करना, ४) अपना व्यक्तिगत एकांतता को दूर करने के हेतु शिष्य के संगत मे रहना इत्यादि की इच्छा रखने से अन्ततः उपदेश का पवित्रता कम हो जाति है । यहा पर एक प्रश्न उठ सकता है की – पूर्वोत्क बिंदुवें आचार्य के लिये उपयुक्त नही है क्या ? क्योंकि आचार्य भी इस भौतिक जगत मे रहते है जिनको सेवार्थ के लिये पैसों की जरूरत होती है, शिष्य को मोक्ष दिलाने का कार्य, जीवन काल मे भगवान के प्रति सद्भावना से उनकी सेवा करना, और शिष्य के साथ अच्छे संबन्ध बनाये रखना – क्या ये सभी सच नही है और क्या ये सही नही है ? अगर इस प्रकार से द्वयमहामंत्र के उपकारों को सोचा जाये तो इन सभी से कभी उपदेश मंत्र की पवित्रता नही घटेगी और कैसे घट सकती है ? इन पूर्वोक्त उपकारों कौत्तर कुछ इस प्रकार है – पहला उत्तर – आचार्य के मामले मे, कोई भी शिष्य आचार्य को धनसंपत्ति समर्पित करता है, वह पूर्वोक्त प्रथम उपकार का आधिकारि है । दूसरा उत्तर – यह विचार की भगवान (जो एक जीव के संबन्ध मे पूर्वानुमान लगा सकते है), ऐसे भगवान जीव को आचार्य/गुरु के लिये निर्देशन देते है जिससे द्व्यमहामंत्रोपदेश जीव को प्राप्त हो सकता है और अन्ततः उसे भगवद्धाम के प्रति सक्षम बनाकर मोक्ष प्रदान करते है, इस प्रकार की भावना प्रत्येक आचार्य को होनी चाहिये । तीसरा उत्तर – अपने सदाचार्य के दिव्यमंगलगुणों को ध्यान मे रखते हुए, प्रत्येक आचार्य अपने शिष्यों को भगवान का मंगलाशासन करने का सदुपदेश देते है जिससे भगवान सहमत है । चौथा उत्तर – एक शिष्य जो कई लम्बे समय तक अहंकार और ममकार (मै, मेरा, इत्यादि) स्वभाव से प्रभावित था,  और इस कारण अपने व्यक्तिगत रूप का नष्ट किया  (आत्मा-परमात्मा का आधारभूततथ्य) और अपने आचार्य ( जिन्होने उस प्रपन्नजीव का उद्धार अपने दिव्य उपदेशों से करके उस जीव को भगवान का मंगलाशासन कैंकर्य मे संलग्न किया) के प्रति कृतज्ञता का भाव है, ऐसा प्रपन्नजीवशिष्य सदैव अपने आचार्य से अवियोज्य सत्संबन्ध की इच्छा रखने का प्रयास करता है । अतः एक आचार्य कभी भी एक शिष्य (जो अभी भगवान का मंगलाशासनकैंकर्य मे जुटा हो) को परिवर्तित करने का उपकारफल स्वीकार नही करते और इस प्रकार से अपना अध्यापन को पवित्र रखते है । इस प्रकार श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को द्व्यमहामंत्र का उपदेश दिया । यहा ध्यान दिया जाने चाहिये की – श्रीवरवरमुनि ने श्रीरामानुजाचार्य के चरणकमलों पर केंद्रित कर द्व्यमहामंत्र का उपदेश दिया क्योंकि श्रीरामानुजाचार्य आचार्यगोष्ठी मे सर्वोच्च है । कहा गया है की द्व्यमहामंत्र का अनुसंधान केवल आचार्य परंपरा का ध्यान करने के बाद ही करना चाहिये । यह सौलवे श्लोक मे पहले ही प्रतिपादित है – “यतीन्द्र चरणद्वन्द्व प्रणवेनैव चेतसा” । अतः यह हमारे लिये स्मरणयोग्य है की द्वयमहामंत्र का अनुसंधान से पहले हमे अपने आचार्य जो रामानुजाचार्य से पहले और बाद मे प्रकट हुए है उन सभी का ध्यान करना चाहिये । श्रीवैष्णव जो पांच अंगों का नित्यानुशीलन करते है उसी मे उपादान (मायने – भगवान के तिरुवाराधन क्रम मे उपयोग करने वालि वस्तुएँ का एकत्रिकरण) का अनुशीलन श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को शिष्य के रूप मे स्वीकार कर, (उन्हे) परिवर्तित कर, भगवान को समर्पित करने वालि वस्तुएँ के कैंकर्य मे संलग्न किया । यह पहले ग्यारहवें श्लोक “आत्मलाभात्परंकिञ्चित्” मे प्रतिपातिद है ।

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