पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १२-१३

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  ११                                                                                                                         श्लोक  १४

श्लोक  १२-१३

भवन्तमेव नीरन्ध्रम पश्यन्वश्येन चेतसा ।
मुने ! वरवर ! स्वामिन् ! मुहुस्त्वामेव कीर्तयन् ॥१२॥

त्वदन्यविषयस्पर्शविमुखैरखिलेन्द्रीयैः ।
भवेयं भवदुःखानामसहानामनास्पदम् ॥१३॥

स्वामीन वरवर                 – मै तुम्हारी संपति के रूप में हूँ ,
मामुनिगल ! मूने              – एक प्रमुख संत जो महान आत्मा है, दयालुता के साथ मुझे स्वीकार करने के लिये सोच रहे है,
भवन्तमेव                        – आपका दिव्य मंगल विग्रह सादगी के निहित गुणवता के सौन्दर्य की  विशेषताओं से परीपूर्ण                                          हो गया है,
नीरन्ध्रम                         – निर्विघ्न रूप से,
पश्यन                             – एक दृष्टि,
वश्येन चेतसा                   – आपकी कृपा के लिये मेरा मन नियंत्रित है,
तमेव                              – आपकी प्रशंसा करने के लिये,
मुहुहु                               – लगातार,
कीर्तयन                          – प्रशंसा ( अहं – अपने आप को )
त्वदन्यविषयस्पर्शविमुखै  – आपके अलावा अन्य सांसारीक विषयों में ध्यान ही नहीं देते ,
अखिलेन्द्रीयैः                   – ज्ञानेन्द्रिय जैसे त्वचा, जीभ, आँख, कान, नाख और कर्मेन्द्रिय जैसे मुह
असह्यनं                         – इसके साथ सहने योग्य नहीं,
भवदुःखानाम                   – जन्म की वजह से जो पश्चाताप होता है,
अनस्पदम                       – अधीन नहीं,
भावेयम                           – जा रहा है ।

इस श्लोक में देवराजमुनि वरवरमुनि स्वामीजी की प्रार्थना करते हुये कहते है, ज्ञानेन्द्रीयों के अधीन होकर जन्म के भय से ग्रस्त थे, अब निरन्तर आचार्य की सेवा करते हुये गुणगान कर रहे है और पूर्ण रूप से ज्ञानेन्द्रीयों को कैंकर्य में लगाकर मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी हो गये हैं ।

‘पश्यन’ और ‘कीर्तयन’ यह दो शब्द प्रत्यय के रूप में है, जो देखना और प्रार्थना को संबोधित करते है । इन शब्दों के साथ ‘भवदुःखानाम अनास्पदम् भवेयं अगले श्लोक का शब्द भी जोड़ा जा रहा है । यहाँ पर ‘भवेयं’ का अर्थ होता है ‘प्रार्थना’, देवराजमुनि कहते है वरवरमुनि स्वामीजी के दर्शन करने से, स्तुति करने से और सभी इन्द्रीयों को स्वामीजी की सेवा में लगाने से मोक्ष के अधिकारी बन गये है और संसार के दुःख से मुक्त करने के लिये प्रार्थना करते है । यह देखा जाता है की आचार्य के दर्शन और स्तुति करने से शिष्य के सभी सांसारीक दुःख मिटा दिये जाते है, वह सदैव आचार्य के बारे में ही ध्यान करता रहता है जिस कारण से भगवान के मन में अनुराग उत्पन्न होकर उस शिष्य को मोक्ष दे देते है ।

सभी इन्द्रीयाँ, सांसारीक पदार्थ / सुःख – दुःख से विमुख हो रहे है , इससे जाना जाता है की वे सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को प्रार्थना करना चाहते है । इन्द्रीयाँ किसी कारण वश सदैव अन्य विषयों में लिप्त रहती है । इसलिये देवराजमुनि प्रार्थना करते है की सदैव उनकी इन्द्रीयाँ वरवरमुनि स्वामीजी के सेवा में लगी रहे । जिससे वे मोक्ष के अधिकारी बन जायेगें, दुनिया के मामलों में निर्देशित नहीं होगें और पश्च्याताप भी नकार दिया जायेगा । शाण्डील्य स्मृति, भारद्वाज परीशीस्तम और अन्य धर्म शास्त्र बताता है की त्वचा, जीभ, आँख, कान, नाक जैसे सभी इन्द्रीयों को भगवान के कैंकर्य में लगाना चाहीये ।

अभी तक इस स्तोत्र के प्रस्तावना को बताया गया है । आगे अभिगमनम, उपादानम, यागम, स्वाध्याय और योगं ऐसे पाँच कार्यों को बताया गया है, जिसमे यागम को छोड़कर सभी का विवरण दिया गया है । अभिगमनम याने अपने प्रातः काल के कार्यों को करके भगवान की सेवा के लिये तैयार होना । दूसरे श्लोक में इसका विवरण दिया गया है, जहाँ पर वरवरमुनि स्वामीजी भगवान की सेवा करने के लिये मंदिर की ओर जा रहे है । उपादानम याने भगवान की सेवा के लिये आवश्यक सामग्रियों को संग्रहीत करना । ११वें श्लोक में इसका वर्णन किया गया है, जहाँ पर बताया गया है की आत्मा भगवान की शेषी है, उसको प्राप्त करना ही इसका उदेश्य है, वरवरमुनि स्वामीजी देवराजमुनि को शिष्य के रूप में स्वीकार किया है, जिससे देवराजमुनि को भगवान कैंकर्य करने के लिये अपना लेगें है । स्वाध्याय का अर्थ वेद, दिव्य प्रबन्ध आदि का अध्ययन करना, जिसे ९ वें श्लोक में बताया गया है जहाँ पर वरवरमुनि स्वामीजी द्वय मंत्र का अनुसन्धान कर रहे है जो की मंत्रो मे मुकुटमणि है । योगं याने भगवान पर केंद्रीकृत करना, जिसे ९ वें श्लोक में बताया गया है । द्वय मंत्र भगवान और अम्माजी को दर्शाता है अथवा रामानुज स्वामीजी को दर्शाता है जिन्हे वरवरमुनि स्वामीजी सदैव ध्यान करते रहते है । भारद्वाज मुनि बताते है की भगवान की सेवा करने के लिये मंदिर जाना, सेवा के लिये सामग्री संग्रहीत करना, वेद और दिव्यप्रबन्ध का अध्ययन करना, भगवान पर अपना ध्यान केन्द्रीकृत करना , यह सभी कार्य अपने जीवन में कालक्षेप करने के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

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