Author Archives: narasimhantsl

पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २६

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २५                                                                                                           श्लोक २७

श्लोक २६

अथ श्रीशैलनाथार्यनाम्नि श्रीमति मण्डपे
तडङ्घ्रिपङ्कजद्वन्द्वच्छायामध्यनिवासिनाम् ॥२६॥

शब्दार्थ
अथ                         – अपने मट्ट पहुँचकर,
श्रीशैलनाथार्य नाम्नि – अपने आचार्य जिनका नाम श्रीशैलनाथ यानि श्री तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै स्वामीजी है,
श्रीमति                    – कान्तिमान, (प्रदीप्तिमान), चमकदार,
मण्डपे                     – मण्डप मे,
तदङ्घ्रिपङ्कजद्वन्द्वच्छायामध्यनिवासिनाम् – उनके नक्कशीदार चित्र के चरणकमलों की छाया के मध्य मे बैठे ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

यह कालक्षेप मण्डप है जिसका नाम तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै मण्डप रखा गया । और इस मण्डप मे उनकी नक्कशीदार चित्र का भी चित्रीकरण उपलब्ध है । श्री वरवरमुनि अपने आचार्य की चित्रित नक्कशीदार चित्र के चरणकमलों की छाया मे बींच मे बैठे थे । यहाँ श्रीमति (चमकदार – प्रदीप्तिमान) का अर्थ इस प्रकार से है । श्री वरवरमुनि के द्वारा पूर्वाचार्यों जैसे पिळ्ळैलोकाचार्य इत्यादियों के तिरुमालिगै (दिव्य घरों) से लाया हुआ मिट्टि के कणों से दिवारों पर अलंकार करने से जो जगमग दिखाई देता है, वह । जो जगह दिव्य विशुद्ध महापुरुष श्रीवैष्णवाचार्यों के चरणकमलों से द्रवित है उस जगह या उस स्थान की शुद्धता और पवित्रता सवाल से परे है । अतः यह मण्डप पवित्र और शुद्ध है । यहाँ षष्ठी विभक्ति और बहुवचन मे प्रयुक्त “तदङ्घ्रिपङ्कज द्वन्द्वच्छायामध्यनिवासिनाम्”  शब्द का दूसरा अर्थ भी है जो इस प्रकार से है । यहाँ याने श्री शैलनाथ मण्डप मे श्री शैलनाथ के नक्कशीदार चित्र के चरणमकमलों के मध्य मे श्री वरवरमुनि जैसे शिष्यगण बैठे हुए है । यही भाव और अर्थ अगले श्लोक “तत्वम् दिव्यप्रबन्धनांसारम् .. व्याचक्षाणं नमामि तं” मे स्वामि एरुम्बियप्पा प्रस्तुत करते है कि वो अपने ऐसे आचार्य श्रीवरवरमुनि की पूजा कर रहे है जो उन सभी को इस मण्डप मे बैठकर दिव्यप्रबंध के अर्थों को बता रहे है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २५

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श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २४                                                                                                             श्लोक २६

श्लोक २५

मङ्गलाशासनम् कृत्वा तत्र तत्र यथोचितम्
धाम्नस्तस्माद्विनिष्क्रम्य प्रविश्य स्वम् निकेतनम् २५

शब्दार्थ
तत्र तत्र               – अर्चावतार के विषय मे, श्री गोदा अम्मा जी के शुरु होते हुए परमपदनाथ तक,
मङ्गलाशासनम्  – दोशों का निवारण, सद्गुणों की समृद्धि हेतु मङ्गलाशासन करना,
यथोचितम्          – उस विषय मे जैसे उचित,
कृत्वा                 – करने के पश्चात,
तस्मात् धाम्नः   – उस सन्निधि से,
विनिष्क्रम्य        – बडे भारि मन से छोडने लगे (भीतर आये),
स्वम् निकेतनम्  – अपने घर (मट्ट),
प्रविष्य               – प्रवेश किये ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

श्री वरवरमुनि गोदा अम्माजी और अन्य सन्निधियों का मङ्गलाशासन करने हेतु गये परन्तु पूजा करने नही । इसी कारण इस श्लोक मे मङ्गलाशासन शब्द प्रयोग हुआ है । वरवरमुनि ने विशेषतः श्री एम्पेरुमानार (रामानुजाचार्य) का मङ्गलाशासन किया और रामानुजाचार्य के नाते (इच्छानुसार) अन्यों का भी मङ्गलाशासन किया । इस प्रकार का उत्थान और पतन होता रहता है इसी कारण श्री एरुम्बियप्पा ने “यथोचितम् जैसा उचित है” शब्द को उपयुक्त समझकर प्रयोग किया । हलांकि शास्त्र संत महपुरुषों के बारे मे कहता है – “अनग्निः अनिकेतः स्यात्” अर्थात संत यानि साधु को कदाचित भी घर को अपने अधिकार मे हमेशा रखना, होम इत्यादि नहि करना चाहिये । परन्तु इस श्लोक मे “स्वम् निकेतनम् प्रविष्य” मायने वह स्थान जिसे स्वयम श्री रङ्गनाथ भगवान ने अपने इच्छानुसार उन्हे दिया जिसे हम सभी मट्ट कहते है उसमे प्रवेश किये । भगवान ने उन्हे आदेश दिया था कि वे श्रीरङ्ग मे हमेशा के लिये रहे अतः इस कारण हम इसे गलती नही समझ सकते और उनके स्वभाव के बारे मे संकोच नही कर सकते है । “विनिष्क्रम्य” शब्द का अर्थ है – मामुनि जी अपने भारी मन के साथ अन्य श्रीवैष्णव के संगत को छोडकर अपने नित्यकर्म (जो कि अनिवार्य है – जैसे तिरुवाराधन, सन्ध्यावन्दन, ग्रंथ कालक्षेप) करने हेतु मन्दिर के भीतर आकर अपने मट्ट चले गए ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २४

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २३                                                                                                   श्लोक २५

श्लोक २४

देवी गोदा यतिपतिशठद्वेषिणौ रङ्गश्रृङ्गं सेनानाथो विहगवृषभश्श्रीनिधिस्सिन्धुकन्या
भूमानिलागुरुजनवृतः पूरुषश्चेत्यमीषामग्रे नित्यम् वरवरमुनेर्ङ्घ्रियुग्मम् प्रपद्ये २४

शब्दार्थ

देवी गोदा                  – गोदा अम्मा जी,
यतिपतिशठद्वेषिणौ   – श्री यतिराज जी (रामानुजाचार्य/एम्पेरुमानार) और श्री शठकोप सुरी जी (श्री नम्माळ्वार), रङ्गश्रृङ्गम्              – मन्दिर का विमान (श्रीरङ्ग मन्दिर का सबसे ऊपरी भाग),
सेननाथाः                 – श्री विवक्सेन जी (सेनै मुदयिलार),
विहगवृषभहः            – श्री गरुड जी (पक्षियों के राजा),
श्रीनिधि                   – श्री महालक्ष्मी अम्मा जी का निज बहुमूल्य निधि यानि साक्षात श्रीरङ्ग भगवान,
सिन्धु कन्या            – श्रीरङ्ग नाच्चियार (क्षीर सागर जी की पुत्री श्रीरङ्गवल्ली अम्मा जी),
भूमानीलगुरुजनवृतः – श्री भूमी पिराट्टि, पेरिय पिराट्टि, नीला देवी, नम्माळ्वार और अन्य नित्य सूरियों से घिरे हुए,
पूरुषश्च                   – श्री परमपद के प्रमुख अधिकारि,
इति अमीषम् अग्रे     – ऐसे महापुरुषों के सम्मुख (समक्ष),
वरवरमुनेः               – श्री मणवाळमामुनि,
अन्घ्रियुग्मम्           – चरणकमल,
नित्यम्                   – प्रतिदिन,
प्रपद्ये                    – पूजा करता हूँ

भावार्थ (टिप्पणि) –

नान्मुगन कोट्टै के प्रवेश द्वार से प्रवेश करते हुए, श्री मणवाळमामुनि दक्षिणावर्त दिशा से होते हुए सर्वप्रथम श्री गोदा अम्माजी, फिर बारि बारि मे श्री रामानुज, श्री नम्माळ्वार, श्रीरङ्गविमान, सेनैमुदलियार, गरुडाळ्वार, भूमि पिराट्टि, नीला देवी, नम्माळ्वार और अन्य आळ्वारों के साथ, अन्त मे परमपदनाथ की सन्निधि से होते हुए परमपदनाथ जी का दर्शन इस क्रमानुसार किया करते थे ।  एरुम्बियप्पा इन शिलाविग्रहों की पूजा करने के बजाय केवल श्री वरवरमुनि की पूजा करते थे । इधर यह प्रश्न उठता है कि – ऐसा उन्होने क्यों किया ? वे कहते है , मै अपने आचार्य श्री वरवरमुनि की उपासना करता हूँ, क्योंकि सर्व प्रथम आचार्य जी इन सभी शिला विग्रहों याने भगवान और भगवद्-संबन्धियों का दर्शन कर आये,अतः उनकी पूजा करना श्रेय और यथेष्ट है । क्योंकि वे आचार्य परन्तर थे इसी कारण वह केवल अपने श्री आचार्य की उपासना किया करते थे । श्री भारद्वाज के अनुसार, भगवान श्रीमन्नारायण (एम्पेरुमान) की अर्चारूप मे सेवा अत्यन्त अत्यधिक भक्ति और प्रेम भावना से करनी चाहिये । साथ मे उनके सभी पार्षदों, भक्तों, आचार्य-गण, निज सामग्री, इत्यादि सहित उनकी उपासना करनी चाहिये । इसी के अनुसार श्री वरवरमुनि ने क्रमानुसार भगवान के सभी पार्षदों और भगवद्-सम्बन्धियों के साथ भगवान का मंगलाशासन किया । श्री वरवरमुनि ने श्रीरङ्गनाथ भगवान के साथ श्री आण्डाल (गोदा), सेनैमुदळियार गरुडाळ्वार इत्यादि का मंगलाशासन किया । गोदा अम्मा जी (श्री भूमि पिराट्टि) की अवतार है, जिन्होने अपने आप को एक भक्त, शिष्य, दासि इत्यादि के रूप मे प्रस्तुत कर श्री वराह भगवान के शरणागत हुई (अहम् शिष्यश्च दासी भक्त पुरुषोत्तमा) । भू , नीळा, पेरिय पिराट्टि जो श्रीरङ्गनाच्चियार से जाने जाते है इत्यादि ये सभी भगवान की पत्नियों के दर्जा मे आती है । अतः श्री वरवरमुनि श्रीरङ्गनाथ भगवान का मंगलाशासन करते समय, उनकी पत्नियाँ, पार्षद, आचार्यगण, और अन्य भक्तों की अराधना करते थे । एरुम्बियप्पा ऐसे श्री वरवरमुनि की पूजा सबके समक्ष किया करते थे ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २३

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २२                                                                                                     श्लोक २४

श्लोक २३

महति श्रीमति द्वारे गोपुरं चतुराननम्
प्रणिपत्य शनैरन्तः प्रविशिन्तं भजामि तम् २३

शब्दार्थ
श्रीमति                    – पर्याप्त मात्रा मे धनसंपत्ति,
महति                      – ज़्यादा विशाल / विस्तीर्ण,
द्वारे                       – मन्दिर के दुर्ग के मार्ग पर,
चतुराननम् गोपुरम्  – नान्मुगन मन्दिर का दुर्ग (गोपुर),
प्रणिपत्य                 – मनसा, वाचा, कर्मणा ( मन, वाक, कर्म) से अर्चित (प्रणिपात करते हुए) ,
शनैः                       – धीरे धीरे (उन दिव्य आंखों को नम्रतापूर्वक घुमाते है जो इस दिव्य भव्य मन्दिर के दुर्ग की सुन्दरता                                 का आनन्द लिये),
प्रविशन्तम्             – प्रवेश करते है ,
तम्                       – ऐसे वरवरमुनि,
भजामि                  – की पूजा करता हूँ  |

भावार्थ (टिप्पणि) –

यहाँ श्रीमति और महति दोनो शब्द प्रसिद्ध नान्मुगन मन्दिर के प्रवेश द्वार की विशेषता और परिशिष्टता को व्यक्त करते है । इसी द्वार से प्रवेश कर, ब्रम्हा और अन्य देवतान्तर विशेष धन-संपत्ति को प्राप्त करते है । हलांकि भगवान श्रीरंगनाथ के भक्तों की भीड के बावज़ूद वहाँ इतना जगह अश्वय है जिसका प्रयोग किया जा सकता है । यह उस जगह की विशालता को दर्शाता है । इस दुर्ग का नाम चतुराननम् – नान्मुगन गोपुर है । प्रणिपत्य शब्द दण्डवत प्रणाम की विचार धारणा, उच्च स्वर मे बोलना, और शारीरिक रूप से दण्डवत प्रणाम करना (मन, वाक, कर्म से दण्डवत प्रणाम) को दर्शाता है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २२

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परिचय

श्लोक २१                                                                                                       श्लोक २३

श्लोक २२

ततस्सार्धम् विनिर्गत्य भृत्यैर्नित्यानपायिभिः ।
श्रीरङ्गमङ्गलं दृष्टुं पुरुषं भुजगेशयं ॥ २२

शब्दार्थ ततः              – द्वयमहामंत्र का उपदेश देने के बाद,
श्रीरङ्गमङ्गलम्         – (जो) श्रीरङ्गनगर का नियंत्रण करता हो,
भुजगेशयं                   – (जो) आदिशेष का सहारा लेते हुए उस पर सोते है,
पुरुषं                          – पेरियपेरुमाळ (पुरुषोत्तम),
द्रष्टुम्                        – देखे गए,
नित्यानपयिभिः भृतयैः – जो कोइल अण्णन और अन्य शिष्यों के संगत से अवियोज्य है,
विनिर्गत्य                   – अपने आश्रम (मट्ठ) से शुरु हुए

भावार्थ (टिप्पणि) – यहा “श्री” शब्द का अर्थ समान्यतः श्रेष्ठता को बतलाता है परन्तु यह शब्द इस संदर्भ मे श्रीरंगनगर का विशेषण होते हुए श्रीरंगनगर की श्रेष्ठता को दर्शाता है । रंगम् मायने “श्री” अतः श्रीरंगम् कहा गया है । क्या अरंगनगर पेरियपेरुमाळ ( जो शयित रूप मे स्थित है ) की वजह से विख्यात है ? पेरियपेरुमाळ की वजह से विख्यात नही है । पेरियपेरुमाळ जो अपने स्वेच्छा से श्रीरंग मे स्थित है जो अपने भक्तों को महत्ता प्रदान करते है इसी कारण श्रीरंग विख्यात है । इसी संदर्भ मे श्रीवरवरमुनि ने अज्ञात अनुमोदक के श्लोक “क्षीरपदेर्मण्डलत्पनोहि योगिनाम् हृदयद्यपि रतिनगतो हरिर्यत्र तस्मात् रंगमितिस्मृतं” को पेरियाऴ्वार के पेरियतिरुमोऴि (४.८.१) के टिप्पणि मे प्रस्तुत करते है । इस श्लोक मे अज्ञात अनुमोदक कहते है – भगवान अपने इच्छा से श्रीरंग मे स्थित है और इस स्थान से उन्हे इतना लगाव है की वे इस स्थान मे सदैव निवास करना चाहते है बजाय योगियों के हृदय मे, क्षीरसागर मे, सूर्यमण्डल इत्यादि मे । इसी कारण यह भगवान का निवास स्थान हुआ अतः श्रीरंगनगर से जाना गया है । पूर्वाचार्यों के आधार पर हमे यह सोचना चाहिये की भगवान स्वयम श्रीरंगनगर को विख्यात कर रहे है और हम सभी वैष्णवों को इसका आनंद लेना चाहिये ।  सच कहे तो दोनो अर्थ महत्व और विशेष है । यहा “पुरुषः” शब्द के तीन अर्थ है । पहला – पुरति इति पुरुषः अर्थात पहला शब्द व्युत्पत्ति है । पुरुषः का वाचनिकमूल “पुरु अग्रगमने” है जिसका अर्थ है – भगवान सृष्टि के सृजन के पहले भी मौज़ूद है और उसके बाद भी । अतः इस वाचनिकमूल शब्द का अर्थ “इस सृष्टि के सृजन का स्वरूप” है ।

दूसरा – पुरि चेते इति पुरुषः अर्थात जो हृदय मे निवास करता है । तीसरा – पुरोषोनति इति पुरुषः अर्थात जो बिना आरक्षण के पर्यात मात्रा मे हर एक चीज़ को प्रदान करता है । अतः यह औदार्य को प्रकाशित करता है । कहा गया है की पूर्वोक्त अर्थों का समावेश अऴगिय मणवाळपेरुमाळ है । विशिष्टवर्ग के लोगों का कहना है की – आदिशेष पर शयन करना आधिपत्य का प्रतीक है । यहा ध्यान दिया जाना चाहिये की – श्रीवरवरमुनि श्रीरंगनगर के अधिपती श्रीरंगनाथ का आश्रय केवल श्रीरामानुजाचार्य के आनन्द के लिये ही कर रहे है और किसी के खातिर नही । कहते है – हमारा परछाई ही ऐसा एक मात्र है जो हमसे अवियोज्य है और अन्धकार मे खुद की परछाई छिप जाती है परन्तु इस श्लोक मे कहा गया है की श्रीवरवरमुनि के शिष्य उनका त्याग अन्धकार मे भी कभी नही करेंगे । अतः कुछ इस प्रकार से अन्नप्पनगरस्वामि ने श्रीवरवरमुनि के शिष्यों के आचार्यभक्ति के वैभव का वर्णन किया है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २१

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  २०                                                                                                         श्लोक २२

श्लोक २१

साक्षात् फलैक लक्ष्यत्व प्रतिपत्ति पवित्रितम् ।
मन्त्ररत्नं प्रयच्छन्तं वन्दे वरवरं मुनिम् ॥ २१

शब्दार्थ

साक्षात्फल                              – दिव्यमहमंत्र के उपदेश के सुखानुभव से प्राप्त फल (भगवान के प्रति किया जाने वाला                                                   मंगलाशासन),
एक लक्ष्यत्वप्रतिपत्तिपवित्रितं – केवल यह सोचने से ही,
मंत्ररत्नं                                 – द्व्यमहामंत्र जिसे पूर्वाचार्य मंत्ररत्नं कहते आये है,
प्रयच्छन्तं                             – (जिसका) उपदेश मुझे दिया गया,
वरवरमुनिम्                          – अळगियमणवाळमामुनि,
वन्दे                                     – (मै) ऐसे गुरु का अभिवादन करता हूँ

भावार्थ (टिप्पणि) – श्रीवरवरमुनि अपने शिष्यों को द्व्यमहामंत्र का उपदेश देकर सोचते है की मेरे शिष्य अब परिवर्तित होकर द्व्यमहामंत्र का अर्थ जानते हुए भगवान का मंगलाशासन कैंकर्य करेंगे और अगर वरवरमुनि यह सोंचे तो ही उनका यह उपदेश सर्वोच्च पवित्रता प्राप्त करेगा । अतः हम यह कह सकते है की श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को द्व्यमहामंत्र का उपदेश पवित्रता के सर्वोच्च क्रम पर दिया ।  अगर कोई द्व्यमहामंत्र का उपदेश उपर्युक्त भावना से नही करते है बल्कि इन निम्नलिखित भावनाओं जैसे

१) लौकिक विषयासक्त (पैसों, सेवा इत्यादि), २) शिष्य को मोक्ष के प्रति प्रेरित करना और इसी कारण शिष्य को मोक्ष की प्राप्ति होना, ३) शिष्य को नियंत्रित करते हुए भगवान की सेवा करना, ४) अपना व्यक्तिगत एकांतता को दूर करने के हेतु शिष्य के संगत मे रहना इत्यादि की इच्छा रखने से अन्ततः उपदेश का पवित्रता कम हो जाति है । यहा पर एक प्रश्न उठ सकता है की – पूर्वोत्क बिंदुवें आचार्य के लिये उपयुक्त नही है क्या ? क्योंकि आचार्य भी इस भौतिक जगत मे रहते है जिनको सेवार्थ के लिये पैसों की जरूरत होती है, शिष्य को मोक्ष दिलाने का कार्य, जीवन काल मे भगवान के प्रति सद्भावना से उनकी सेवा करना, और शिष्य के साथ अच्छे संबन्ध बनाये रखना – क्या ये सभी सच नही है और क्या ये सही नही है ? अगर इस प्रकार से द्वयमहामंत्र के उपकारों को सोचा जाये तो इन सभी से कभी उपदेश मंत्र की पवित्रता नही घटेगी और कैसे घट सकती है ? इन पूर्वोक्त उपकारों कौत्तर कुछ इस प्रकार है – पहला उत्तर – आचार्य के मामले मे, कोई भी शिष्य आचार्य को धनसंपत्ति समर्पित करता है, वह पूर्वोक्त प्रथम उपकार का आधिकारि है । दूसरा उत्तर – यह विचार की भगवान (जो एक जीव के संबन्ध मे पूर्वानुमान लगा सकते है), ऐसे भगवान जीव को आचार्य/गुरु के लिये निर्देशन देते है जिससे द्व्यमहामंत्रोपदेश जीव को प्राप्त हो सकता है और अन्ततः उसे भगवद्धाम के प्रति सक्षम बनाकर मोक्ष प्रदान करते है, इस प्रकार की भावना प्रत्येक आचार्य को होनी चाहिये । तीसरा उत्तर – अपने सदाचार्य के दिव्यमंगलगुणों को ध्यान मे रखते हुए, प्रत्येक आचार्य अपने शिष्यों को भगवान का मंगलाशासन करने का सदुपदेश देते है जिससे भगवान सहमत है । चौथा उत्तर – एक शिष्य जो कई लम्बे समय तक अहंकार और ममकार (मै, मेरा, इत्यादि) स्वभाव से प्रभावित था,  और इस कारण अपने व्यक्तिगत रूप का नष्ट किया  (आत्मा-परमात्मा का आधारभूततथ्य) और अपने आचार्य ( जिन्होने उस प्रपन्नजीव का उद्धार अपने दिव्य उपदेशों से करके उस जीव को भगवान का मंगलाशासन कैंकर्य मे संलग्न किया) के प्रति कृतज्ञता का भाव है, ऐसा प्रपन्नजीवशिष्य सदैव अपने आचार्य से अवियोज्य सत्संबन्ध की इच्छा रखने का प्रयास करता है । अतः एक आचार्य कभी भी एक शिष्य (जो अभी भगवान का मंगलाशासनकैंकर्य मे जुटा हो) को परिवर्तित करने का उपकारफल स्वीकार नही करते और इस प्रकार से अपना अध्यापन को पवित्र रखते है । इस प्रकार श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को द्व्यमहामंत्र का उपदेश दिया । यहा ध्यान दिया जाने चाहिये की – श्रीवरवरमुनि ने श्रीरामानुजाचार्य के चरणकमलों पर केंद्रित कर द्व्यमहामंत्र का उपदेश दिया क्योंकि श्रीरामानुजाचार्य आचार्यगोष्ठी मे सर्वोच्च है । कहा गया है की द्व्यमहामंत्र का अनुसंधान केवल आचार्य परंपरा का ध्यान करने के बाद ही करना चाहिये । यह सौलवे श्लोक मे पहले ही प्रतिपादित है – “यतीन्द्र चरणद्वन्द्व प्रणवेनैव चेतसा” । अतः यह हमारे लिये स्मरणयोग्य है की द्वयमहामंत्र का अनुसंधान से पहले हमे अपने आचार्य जो रामानुजाचार्य से पहले और बाद मे प्रकट हुए है उन सभी का ध्यान करना चाहिये । श्रीवैष्णव जो पांच अंगों का नित्यानुशीलन करते है उसी मे उपादान (मायने – भगवान के तिरुवाराधन क्रम मे उपयोग करने वालि वस्तुएँ का एकत्रिकरण) का अनुशीलन श्रीवरवरमुनि ने एरुम्बियप्पा को शिष्य के रूप मे स्वीकार कर, (उन्हे) परिवर्तित कर, भगवान को समर्पित करने वालि वस्तुएँ के कैंकर्य मे संलग्न किया । यह पहले ग्यारहवें श्लोक “आत्मलाभात्परंकिञ्चित्” मे प्रतिपातिद है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २०

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श्रीमते शठकोपाय नमः
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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  १९                                                                                                           श्लोक २१

श्लोक  २०

अनुकम्पा परीवाहै: अभिषेचनपूर्वकम् ।
दिव्यं पदद्वयं दत्त्वा दीर्घं प्रणमतो मम ॥ २०

शब्दार्थ –

अनुकम्पापरीवाहैः – अनुकम्पा(कृपा) के तेज़ प्रवाह से (यानि कृपा का ऐसा प्रवाह जो बद्धजीवात्माओं के दुःखों को सह नही                               सकता),
अभीषेचनपूर्वकं     – मेरे शुरुवात के दुःखों का उन्मूलन आपके पवित्र दृष्टि से करे,
दीर्घम्                  – लम्बी देर तक,
प्रनमतः               – उत्कृष्ठ भक्तिभाव से दण्दवत प्रणाम करते हुए,
मम                     – मेरे लिये,
दिव्यम्                – दिप्तीमान ( वैभवशालि ),
पदद्व्यम्             – दिव्य चरणकमल,
दत्वा                   – (ऐसे चरणकमलों को) मेरे मस्तिष्क पर रखा

भावार्थ (टिप्पणि) – एरुम्बियप्पा कहते है – जब उन्होने श्री मणवाळमामुनि को देखकर दण्डवत प्रणाम करते हुए बहुत देर तक उस अवस्था रहे, उसके प्रश्चात श्री  मणवाळमामुनि कृपालु दृष्तिकोण से देखकर अपने दिव्य कीर्तिमान चरणकमलों को उनके मस्तिष्क पर रखा और इसके प्रभाव से उनके दुःखों का विनाश हुआ । यहा “अनुकम्पा” शब्द व्यक्तिगत रूप से दुःखो से पीडित दिशा को प्रस्तुत करता है और यही अवस्था से श्री मणवाळमामुनि भी दुःखित और चिंतित थे । यही कृपालु- दयालु भाव को दर्शाता है । अमरकोश मे कहा गया है – “कृपा दया अनुकम्पा” इत्यादि । विष्णुधर्म (४-३६) कहता है – भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने का फल दस अश्वमेध यज्ञ के फल के बराबर है । अगर कोई दस अश्वमेध यज्ञ सम्पूर्ण करे तो उसके फल मे उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है और यह फल का भोग करने के बाद वापस भौतिक जगत मे आना पड़ता है  । परन्तु भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने के फल स्वरूप मे उनके स्वधाम (विष्णुलोक) की प्राप्ति होती है और फिर इस भौतिक जगत मे आने की ज़रूरत नही है । इस संदर्भ मे कहते है – अगर भगवान के प्रती कोई दण्डवत प्रणाम करे और उनकी पूजा करने के फल स्वरूप मे भगवद्धाम की प्राप्ति होती है तो सोचिये की आचार्य के चरणकमलों का आश्रय (आचार्य के समक्ष दण्डवत प्रणाम करने) से क्या प्राप्त हो सक्ता है और क्या फ़ायदा होता है । “दिव्यम् पदद्यवम्” – यानि आचार्य ने चरणकमल भगवान के चरणकमलों से भी श्रेष्ठ है । इसी संदर्भ के विषय मे श्री वचनाभूषण दिव्यशास्त्र के ४३३ सूत्र मे कहा गया है – की आचार्यसंबन्ध के कारण से मोक्ष की प्राप्ति होती है वह (मोक्ष) भगवद्-संबन्ध से प्राप्त जन्म और मोक्ष से कई गुना फ़ायदेमंद और सर्वोच्च है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १९

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श्री:
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परिचय

श्लोक  १८                                                                                                             श्लोक  २०

श्लोक  १९

भृत्यैह् प्रियहितैकाग्रैह्  प्रमपूर्वमुपासितम् ।
तत्प्रार्थनानुसारेण संस्कारान् संविधाय मे ॥ १९ ॥

प्रियहितैकाग्रैह्       स्वामीजी की इच्छानुसार और चार धार्मिक आदेश के अनुसार तिरुवाराधन के लिये                                                       सामग्रियों को एकत्रित करने की व्यवस्था करना,
भृत्यैह्                   कोइल अण्णन जैसे शिष्यों द्वारा ,
प्रमपूर्वम               तीव्र भक्ति के साथ ,
उपासितम्             तिरुवाराधान के लिये जरूरी सामग्रियों को संग्रहीत करना जो की अत्यन्त विशेष और रमणीय                                       होती है,
तत्प्रार्थनानुसारेण – वरवरमुनि स्वामीजी के श्रीचरणों का आश्रय लेनेवाले शिष्यों की इच्छा को स्वीकार करने के                                          लिये,
संस्कारान्           –    पंच संस्कार ताप, पुण्ड्र, नाम, मंत्र, याग ।
संविधाय मे         –    शास्त्र में वर्णन किये गये अनुसार करना ।

पहले वर्णन किये गये अनुसार वरवरमुनि स्वामीजी भगवत सन्निधि में स्तम्भ के पास विराजमान है । उनके शिष्य जन अत्यन्त श्रद्धा के साथ चावल, फल, दुध, दहि आदि सामग्रियों को संग्रहीत करके तिरुवाराधन के लिये स्वामीजी को भेंट किया । स्वामीजी ने उत्साह के साथ ग्रहण किया ।  पराशर संहिता में वर्णन आता है की श्रीवैष्णव धर्म का प्रचार करने के लिये पंच संस्कारों से समाश्रित करना, उभय वेदान्त के रहस्यों का कालक्षेप करना, उसमें वर्णन किये गये अनुसार शिष्यों को पालन करने के लिये आज्ञा करना, यह सभी करनेवाले महात्मा को मठाधीश के रूप में स्वीकार किया जाता है । अलगीय मनवाल  वरवरमुनि स्वामीजी को मठाधीश के पद को स्वीकार करने के लिये आज्ञा करते है, और कोईल अण्णन जैसे अनेक आचार्य जन वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार किये है ।

इसलिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को शिष्यों द्वारा भेंट दी हुयी सामाग्री को तिरुवाराधन के लिये उपयोग करना योग्य है, जहाँ पर भगवान को भोग लगाकर तदियाराधन होनेवाला है ।

ऐसा कहा जाता है की वरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य जन स्वामीजी से प्रार्थना करते है की कल ही आप की शरण में आए हुये श्रीदेवराज स्वामीजी को पंच संस्कारों से समाश्रित कीजिये । अपने परम आप्त शिष्यों की प्रार्थना को स्वामीजी ने अत्यन्त उत्साह के साथ स्वीकार किया । जिसे श्लोक की दूसरी पंक्ति में वर्णन किया गया है । शास्त्र के आदेशानुसार शिष्य को एक साल तक आचार्य का ध्यान और स्मरण करने पर उसे पंच संस्कार से समाश्रित करना । शास्त्र के आदेश का पालन नहीं करने पर भी वरवरमुनि स्वामीजी की यह गलती नहीं होगी, क्योंकि अपने अपने शिष्यों द्वारा की गयी विनंती शास्त्र के आदेश से भी बढ़कर है । इसलिये तिरुवाराधान समाप्ति के पश्च्यात स्वामीजी ने पंच संस्कार किया ।

पराशर संहिता में वर्णन किये गये अनुसार आचार्य प्रातः स्नान आदि करके तिरुवारधान करते है, पश्च्यात शिष्य को आमंत्रित करके पंच संस्कार से सुशोभित करते है । इस श्लोक में तीन संस्कारों का वर्णन है –

ताप    – शिष्य के बाहुमूलों को शंख और चक्र से आंकित करना ।
पुण्ड्र   – शरीर के द्वादश स्थानों पर तिलक लगाना ।
नामम– रामानुज दास नाम रखना ।
याग  – भगवान का तिरुवाराधान कैसे करे इसका वर्णन आचार्य द्वारा शिष्य को किया जाता है ।
मंत्र   – रहस्यत्रय का उपदेश दिया जाता है ।

पंच संस्कार याने किसी जीव को श्रीवैष्णव बनाने के लिये आचार्य द्वारा की गयी विधि / अनुष्ठान है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १८

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परिचय

श्लोक  १७                                                                                                               श्लोक  १९

श्लोक  १८

ततस्तत्सन्निधिस्तम्भमूलभूतलभूषणम् ।
प्राड्ःमुखं सुखमासिनं प्रसादमधुरस्मितम् ॥ १८ ॥

तत                                                      –  अरगंनगरप्प के तिरुवाराधन समाप्ति के पश्च्यात ,
ततस्तत्सन्निधिस्तम्भमूलभूतलभूषणम्    सन्निधि के स्तम्भों के नजदीक बैठकर उस स्थान को अलंकृत करना,
प्राड्ःमुखं                                                पूर्वाभिमुख होकर विराजमान है ,
सुख                                                    –  उपयुक्त रूप से ( शांतमन का प्रतिक )
आसीनम                                               वरवरमुनि स्वामीजी जो विराजमान है ,
प्रसाद मधुरस्मितम्                              –  साफ मन से बाहर निकली हुई सौम्य मुस्कुराहट के साथ ।

पहले श्लोक में बताये अनुसार तिरुवाराधान समापन करके स्वामीजी द्वयानुसन्धान में निरत रहते है, जो की दैनिक अनुष्ठान का एक भाग है । पराशर मुनि कहते है दिन में तीन बार तिरुवाराधान के पश्च्यात द्वय मंत्र जिसे मंत्र रत्न भी कहा जाता है उसका १००८ बार या १०८ बार संभव नहीं है तो कम से कम २८ बार जरूर करना चाहिये । वरवरमुनि स्वामीजी इस मंत्र का अनुसन्धान करते समय श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीचरणारविन्दों का ध्यान करते है ।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी का मन निर्मल और स्पष्ट रूप से प्रफुल्लित है और मुखारविन्द अत्यन्त सुन्दर और सौम्य मुस्कुराहट के साथ संयुक्त है । शास्त्र कहता है कोई भी सत्कार्य करते समय पूर्वाभिमुख या उतराभिमुख होकर करना चाहिये । इसलिये देवराज स्वामीजी “ प्राड्ःमुखं सुखमासिनं ” कहते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १७

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परिचय

श्लोक  १६                                                                                                                 श्लोक  १८

श्लोक  १७

अथ रंगनिधिं सम्यगभिगम्य निजं प्रभूम् ।
श्रीनिधानं शनैस्तस्य शोधयित्वा पदव्दयम् ॥ १७ ॥

अथ                   –   सुबह के कार्यों को सम्पन्न करके मठ में पहुँचे ,
निजं                  –   तिरुवाराधन करने की वजह से ,
प्रभुं                    –   भगवान ,
रंगनिधिं             –   अरगंनगरप्प, जो श्रीरंगम के निधि है, वे मठ में विराजमान है,
सम्यगभिगम्य   –   निष्ठा के साथ व्यवस्थित रीति से साष्ठांग करना ,
तस्य पदद्वयम  –   पवित्र श्रीचरण ,
शोधयित्वा         –   तिरुमंजन करके तिरुवाराधान करना ।

शाण्डील्य स्मृति में कहा गया है की स्नान करने के पश्च्यात भगवत सन्निधि में जाना चाहिये । शाण्डील्य ऋषी कहते है भगवत सन्निधि में जाते समय शुद्ध स्नान करके, ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना, मंदिर में प्रवेश करते समय अपने पैरों को सफाई करना, पानी से आचमन करना, मन और शरीर को नियंत्रित करना, सुबह सूर्योदय के समय और शाम में तारों  के उदय के समय मंत्रानुसन्धान करना, ऐसे करते हुये भगवान के सन्निधि में पहुँचना । यहाँ पर रंगनाथ भगवान के श्रीचरणों की सेवा का उल्लेख किया गया है, जो कि पूर्ण तिरुवाराधन को दर्शाता है । वरवरमुनि स्वामीजी अरगंनगरप्प कि सेवा करते है जो कि रामानुज स्वामीजी को अत्यन्त प्रिय है, यहाँ पर रामानुज स्वामीजी के श्रीचरणों कि निष्ठा को भी हम अनुभव कर सकते है । जैसे शत्रुघ्नजी सदैव भरतजी की मुखोल्लास के लिये श्रीरामजी के बारे में स्मरण करते रहते थे ।

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