Author Archives: preeti madhusudhan

आर्ति प्रबंधं – ३७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३६

उपक्षेप

वरवरमुनि कल्पना कर रहें हैं कि श्री रामानुज स्वामी उन्हे कुछ बता रहे हैं । यह पासुर, श्री रामानुज स्वामी की यह सोच, का उत्तर स्वरूप है । श्री रामानुज स्वामी कहतें हैं , “हे ! वरवरमुनि ! आप इन्द्रियों के बुरे असर से डरे हुए हैं । चिंता न करें । इन्द्रियों  और पापों के प्रभाव से मैं आपकी रक्षा करूंगा । किन्तु इस सांसारिक लोक में आपको रखने का कारण यह हैं – “ आर्ति अधिकार पूर्तिकेन्नूमदु मुख्यं ”, वचन के अनुसार आर्ति (स्वारस्य) और अधिकार (मुक्त होकर परमपद पधारने कि योग्यता) पाने पर मैं निश्चित आपको परमपद पहुँचाऊँगा । तब तक आपको यहाँ रहना हैं । उत्तर में वरवरमुनि कहते हैं, “ हे ! श्री रामानुज स्वामी ! अब तक मेरी कोई भी योग्यता नहीं रहीं हैं । भविष्य में क्या योग्यता आएगी ? आप स्वयं इन योग्यताओं को मुझमें क्यों उत्पन्न नहीं करतें ? परमपद तक पहुँचने में आने वाले विरोधियों का नाश कर, आप ही मुझे योग्य क्यों नहीं बनातें ?

पासुर ३७

इन्रळवुम् इल्लाद अधिकारम् मेलुम् एनक्कू

एनृ उळदाम् सोल्लाय् एतिरासा

कुन्रा विनैत्तोडरै वेट्टिविट्टु मेलै वैकुंतत्तु

एन्नै कडुग येट्राददु येन् ?  

शब्दार्थ

सोल्लाय  – (हे एम्पेरुमानार) कृपया यह बतायें

इन्रळवुम् – अब तक

इल्लाद अधिकारम् – (परमपद जाने कि मेरे पास) योग्यता नहीं है

मेलुम् – (इस स्तिथि में) अब से

एनक्कु  – मेरे  लिए

एनृ उळदाम् – कब होगा ? होगा क्या? (इतने जन्मों से न होने के कारण) मुझे कब परमपद पहुँचने की योग्यता मिलेगी क्या?

ऐतिरासा – हे एम्पेरुमानार !

येन् ?-  क्यों आप

कडुग एन्नै येट्राददु – शीग्र मुझे ले न जाते

मेलै  – सर्वश्रेष्ठ

वैकुंतत्तु – परमपद तक

वेट्टिविटु – काटकर निकालें  

कुन्रा  –  न घटने वाले

विनैत्तोडरै – पापों के बंधन को

सरल अनुवाद

इस पासुर में वरवरमुनि, (इन) अघटित पापों का संग्रह को नाश न करने का कारण, श्री रामानुज स्वामी से पूँछते हैं । परमपद तक शीग्रता से न ले जाने का भी कारण पूँछते हैं। वरवरमुनि का मानना हैं कि, अगर योग्यता ही कारण है तो उन्हें परमपद पहुँचने कि योग्यता कभी भी नहीं थीं और नहीं मिलने वाली हैं । वरवरमुनि श्री रामानुज स्वामी से प्रश्न करतें हैं कि भविष्य में यह योग्यता कैसे प्राप्त किया जा सकता हैं ?

स्पष्टीकरण

वरवरमुनि कहतें हैं, इनृ तिरुनाडुमेनक्करुळाय् वचनानुसार, अब तक अनुपस्थित (परमपद पधारने कि) योग्यता भविष्य में कैसे आएगा ? हे रामानुज ! तोलमावलविनै तोडर्  के अनुसार मेरे पापों के बंधन घटते नहीं और परमपद प्राप्ति के पथ में विघ्न हैं । इन पापों को नाश कर, मेलै वैकुंतत्तिरुत्तुम (तिरुवाय्मोळी ८.६.११) से वर्णित परमपद जिसमें मुझे अत्यंत स्वारस्य (आर्ति) है, वहाँ क्यों नहीं ले जातें? अज्ञान से पीड़ित इस लोक से आप मुझे तुरंत क्यों नहीं ले जाते ? इस विषय में दुर्बल हूँ और आप ही नियंता हैं? फिर भी आप यह कार्य क्यों नहीं करतें ?

अडियेन् प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/02/arththi-prabandham-37/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

 

आर्ति प्रबंधं ३६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३५

 उपक्षेप

पिछले पासुरम में, मामुनि कहते हैं कि, “मरुळाले पुलन पोग वांजै सेय्युं एनदन”, जिस्से वें श्री रामानुज से, क्रूर पापों से प्रभावित इन्द्रियों के निमंत्रण से अपने बुद्धि को बहलाने केलिए  विनति करतें हैं। परंतु इसके पश्चात भी पापों का असर रहती  हैं। मामुनि कहतें हैं कि, उन्कि मन इन सारे नीच साँसारिक रुचियों के पीछे जाती है।  इतने संकट पहुँचाने वाले इन पापों की कारण पर मामुनि विचार करतें हैं और अंत में कहतें हैं कि इस प्रश्न का उत्तर वें नहीं जानते।  

पासुरम ३६

वासनयिल उट्रामो माळाद वलविनैयो

येदेंररियेन ऐतिरासा! तीदागुम

आईंपुलनिल अडियेन मनंतन्नै

वनबुडने तानदरुम वंदु

शब्दार्थ

ऐतिरासा – हे एम्पेरुमानारे

तीदागुम – वह जो आत्मा केलिए हानिकारक है

आईंपुलनिल – जो “पाँच इन्द्रियाँ” कहलातीं हैं और प्रभाव करति रहतीं हैं

अडियेन – मेरे

मनंतन्नै – मन के

आसै – (साँसारिक खुशियों) की इच्छा

वनबुडने – (ये इन्द्रियाँ) सशक्त रूप से

तान वंदु – अपने इच्छा से, बिना कोई दबाव के

अदारुम – मुझमे निरंतर  निवास करने कि तय किये

(इन विषयों में रुचि की, मामुनि श्री रामानुज से कारण पूछते हैं)

उट्रामो – क्या यह बंधन आधारित है

वासनयिल – पूर्व समय के असंख्येय पापों पर ?

वलविनैयो – क्या मेरे प्रसिद्द कर्म संबंधित पाप है

माळाद – जो हैं किसी सहायता के पार ( किसी प्रकार के तप से भी जो निकाल नहीं जा सकता )

येदेंरु – वह क्या है ?

अरियेन – मुझे पता नहीं ( अर्थात मामुनि, श्री रामानुज को इसका कारण पता कर, इसकी नाश करना चाहते हैं)

सरल अनुवाद

मामुनि श्री रामानुज से पूछते हैं कि, यह जानते भी कि यह सब  शास्त्रों से हानिकारक माने जाते  हैं ,उन्की मन और बुद्धि , पापों के प्रभाव से साँसारिक रुचियों के पीछे क्यों जातें हैं । इन इन्द्रियों और पापों के लगातार कष्ट कि कारण न जानते हुए, वे श्री रामानुज से कारण ढूंढ़ने कि और उनको नाश कर अपनाने कि  विनति करते हैं।  

स्पष्टीकरण

कुछ विषय आत्मा केलिए हानिकारक माने जातें हैं। “आईंकरुवी कंडविंबं” (तिरुवाय्मोळी ४.९. १०) वचनानुसार , पाँच इन्द्रियों के प्रभाव में आत्मा साँसारिक सुखों के पीछे जाता है। आत्मा इन रुचियों केलिए तरसता है।  शास्त्रों में यहीं सब हानिकारक कहे गए हैं।  “हरंदिप्रसपम मन” वचनानुसार ये इन्द्रियाँ मुझे हर दिशा में खींचतीं हैं।  मैं आप्के चरण कमलों को एकमात्र राह समझ कर शरणागति करता हूँ। मामुनि इस्के कारण का अनुमान करते हैं। क्या  कूरत्ताळ्वान के “धुर्वासनात्रदि मतस सूखमिन्दिरयोत्तम हातुम नमे मदिरलं वरदादिराज:” वचनानुसार अनादि काल के पापों के छाल में फसना ही कारण हैं ? या नम्माळ्वार के “मदियिलेन वलविनये माळादो” (तिरुवाय्मोळि १.४. ३) वचनानुसार क्या मेरे कर्म इतने शक्तिशाली हैं कि न तप से मिटा सके न फल अनुभव कि कष्ट को झेल कर छुटकारा पायें? कारण कि मुझे जानकारी नही हैं। हे रामानुज, आपसे विनति हैं कि आप इस पर विचार करें और कारण को नाश करें।  पिछले और इस पासुरम में “ आईंपुलनिल” इन्द्रियों से पाने वाली साँसारिक सुख हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/02/arththi-prabandham-36/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

आर्ति प्रबंधं ३५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३४

 

उपक्षेप

मामुनि श्री रामानुज से कहतें हैं , “स्वामी! बाधाओं को निकाल कर मेरी रक्षा करने में ही आपकी चिंता हैं।  आपके अत्यंत कृपा के कारण, आपके प्रति कैंकर्य करने  कि अवसर दिलाने की इच्छा रखते हैं।  किन्तु साँसारिक रुचियाँ ऐसे कैंकर्य के प्रति मेरी दिलचस्पी को घटाने की कोशिश करतें हैं।  यह मेरे कर्मों की ही फल हैं। आपसे प्रार्थना हैं कि  इन्को नाश कर आपके प्रति नित्य दास्य भाव को  बढ़ाये रखें।   

पासुरम ३५

अरुळाले अडियेनै अबिमानित्तरुळी  

अनवरदम अडिमै कोळ निनैत्तु नीयिरुक्क

मरुळाले पुलन पोग वानजै सेय्युं एन्रान

वलविनैयै माट्री उन्पाल मनम वैक्क पन्नाय

तेरुळारुम कूरत्ताळवानुम अवर सेल्व

तिरुमगनार तामुम अरुळीचेयद तीमै

तिरळान अत्तनैयुम सीरवुळ एन्नै

तिरुत्ति उय्यक्कोलुम वगै तीरुम ऐतिरासा

शब्दार्थ

अनवरदम – (हे श्री रामानुज) हमेशा

निनैत्तु नीयिरुक्क – आप इस सोच में हैं

अरुळाले – आपके अत्यंत कृपा के कारण  

अडियेनै अबिमानित्तरुळी – कि मै परमपद के लायक हूँ और इस सँसार का नहीं

अडिमैं कोल्ल – और आप मुझें अपने प्रति नित्य कैंकर्य के लिए उपयोग करने का सोच रहें हैं।  

पुलन – (मेरे) इन्द्रियाँ

एन्रन – मेरे (जिनके कारण )

वल – शक्तिशाली

विनैयै – कर्म

वांजै सेय्युं – तरसते हैं  

पोग – और साँसारिक विषयों के पीछे जायें  

मरुळाले – और अज्ञान देते हैं जो आपके शुद्ध विचार को छिपाते हैं।  

पण्णाइ – (आपसे विनति करता हूँ) मुझे आशीर्वाद कीजिये

माट्री – ध्यान उस्से हटाएँ

मनम वैक्क – और मन को बहलाएँ

उन्पाल – अपने ओर

तेरुळारुम – जो ज्ञान से भरें हैं और जिन्का नाम हैं

कूरत्ताळवानुम – श्री कूरेश और

अवर सेल्व तिरुमगनार तामुम – कूरत्ताळवान के पुत्र होने की सौभाग्य मिलने वाले पेरिय भट्टर

अरुळीचेयद – अपने को नीच समज

तीमै तिरळान – पापों के समूह के सूची दिए

अत्तनयुम – (अत्यंत विनम्रता से ऐसे बतातें हैं ) वें सारें

सेरवुल्ल – (एक को भी न छोड़ कर) उपस्थित हैं

एन्नै – मुझ में

ऐतिरासा – यतिराजा

तेरुम – कृपया सोचें

वगै – कोई मार्ग

तिरुत्ति – मुझे सुधार कर

उय्यकोल्लुम – विमुक्त करने केलिए

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि कहते हैं कि, श्री कूरेश और उन्के श्रेयस्वी पुत्र अपने ग्रंथों में, विनम्रता से जितने असंखित पापों कि प्रस्ताव किये हैं , वें  सबी उनमें (मामुनि में ) उपस्थित हैं।  यह पाप मामुनि को घेरे हैं जिसके कारण उन्हें, श्री रामानुज के, मामुनि को मुक्ति दिलाकर कैंकर्य दिलाने कि शुद्ध विचार समझने से रोखते हैं। क्रूर पापों से प्रभावित अपने इन्द्रियों से नियंत्रित बुद्धि को सही रास्ते में निर्माण करने को, श्री रामानुज से मामुनि  विनति करतें हैं।  

स्पष्टीकरण

मामुनि प्रस्ताव करतें हैं , “हे श्री रामानुज! श्री कूरेश और उन्के पुत्र होने की महान मौका पाने वाले पेरिय भट्टर के ज्ञान को प्रशंसा करने वाली वचन है , कूरनाथभट्टाक्य देसिकवरोक्त समस्तनैच्यं अद्यास्ति असंकुचितामेव (यतिराज विंशति १५) .  श्री कूरेश के पुत्र होने के सौभाग्य के कारण, भट्टर “श्रीरंगराज कमलापदलालि तत्त्वं” कहलातें हैं।  अत्यंत विनम्रता के कारण, श्री कूरेशर और भट्टर अपने पापों के सूची देतें हैं जिन्मे “पुत्वाचनोच अधिक्रामांग्यां (वरदराज स्तवं)” जैसे वचन भी हैं। यह सारे पाप मुझ में अधिकतर रूप में उपस्थित हैं। मामुनि आगे कहतें हैं, “हे रामानुज! “सेयल ननराग तिरुत्ति पणिकोळवान (कणणिनुन सिरु ताम्बु १०) वचनानुसार आप हमेशा जनों को सुधार कर मुक्ति दिलाने कि विचार में ही हैं। मेरे प्रति अत्यंत कृपा के कारण आप मुझे परमपद के लायक समझतें हैं और इस सँसार से विमुक्त करने की विचार में हैं।  इससे बढ़कर अपने प्रति नित्य कैंकर्य देने कि मार्ग सोचते हैं। परंतु मेरे इन्द्रियाँ और क्रूर पाप, मेरे बुद्धि से आपके शुद्ध विचारों को छिपाती हैं। यतिराज विंशति १६ के “शब्दादि भोग रूचिरनवहमेधदेह” वचनानुसार, मेरे क्रूर पापों से प्रभावित मेरे इन्द्रियाँ, आपसे दूर और साँसारिक रुचियों के निकट ले जातीं हैं। आपसे विनति करता हूँ कि तिरुवाय्मोळि(१.५.१०) के “तनपाल मनमवैक्क तिरुत्ति” के अनुसार आप मेरे विचारों को सुधार अपने और खींच लें। हे मेरे निरंतर स्वामि, मैं विनती करता हूँ कि, आपके ही सोच में रहने वाली मन दें।  कृपया इस पर विचार कीजिये।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/02/arththi-prabandham-35/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

आर्ति प्रबंधं ३४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३३

उपक्षेप

मणवाळ मामुनि के कल्पना में श्री रामानुज के एक प्रश्न, इस पासुरम का मुखबंध के रूप में है।  इस काल्पनिक प्रश्न का उत्तर ही यह पासुरम है।  वह प्रश्न है, “ ऐसा मान लें कि मेरी अत्यंत कृपा हैं , परन्तु आपके विरोधियाँ/ संकट (पूर्व कर्मा के रूप में ) इतने हैं कि कितने भी  बड़े कृपालुओं की दया को सुखा सकती हैं।  तो इस बात के प्रति मैं क्या कर सकता हूँ? उत्तर में मामुनि कहतें हैं , “सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मासुच:” (तुम्हारे सारें पापों से तुझे मैं छुटकारा दिलाऊँगा, शोक न करो) कहने वाले (कृष्ण के रूप में) स्वयं श्रीरंगम के पेरिय पेरुमाळ ही थे।  और वे भी आपके सुझाव तथा आज्ञा मान्ने वाले हैं।  अत: मेरे स्वामि ! श्री रामानुज ! आपके दिव्य चरण कमलों से अन्य कोई भी आश्रय न मान्ने वाले मुझे कृपया मुक्ति दिलाएं।  आपसे विनति हैं कि कर्मों के फल से मेरी रक्षा करें और बंधनों से मुक्ति करें।  

पासुरम ३४

मुन्नैविनै पिन्नैविनै आरत्तम एन्नुम

मूनृ वगयान विनैतोगै अनैत्तुम याने

एन्नै अड़ैंदोर तमक्कु कळीप्पन एन्नुम अरँगर

ऐतिरासा नीयिठ्ठ वळकन्रो ? सोल्लाय

उन्नै अल्लदु अरियाद यान इंद उडंबोडु

उळनृ विनैपयन पुसिक्क वेणडुवदु ओनृ उणडो

एन्नुडैय इरुविनैयै इरैपोळूदिल माट्री

येरारुम वैगुणडत्तु एट्री विडाय नीये

शब्दार्थ

अरँगर – पेरिय पेरुमाळ

एन्नुम – जिन्होंने यह कहा कि

अड़ैंदोर तमक्कु – “उन्के प्रति जो पहुँचते हैं

एन्नै – मुझें  , जो वात्सल्य जैसे शुभ गुणों से चित्रित हूँ

याने – मैं , जो सर्व शक्तिमान , सर्वज्ञ  और सर्वव्यापी हूँ

कळीप्पन  – नाश करूंगा

अनैत्तुम – सारे

विनैतोगै – कर्मों का संग्रह

मूंरू वगैयान – तीन तरह के हैं

एन्नुम – के जैसे

मन्नैविनै – पूर्वागं ( पूर्व संग्रहित पाप)

पिन्नैविनै – उत्तरागम (भविष्य के पाप)

आरत्तम – प्रारब्धम ( अनुभव किये जाने वाले कर्मों का पूरा भाग संचित कर्म हैं और उसमें से एक भाग है प्रारब्ध)

एतिरासा – हे ! यतियों के नेता !

नीयिठ्ठ वळक्कँरो? – ऐसे सर्वेश्वर अरंगर (पेरिय पेरुमाळ) भी आपके आज्ञा मानते हैं

सोल्लाय – कृपया मुझें बताएं कि यह सच्चाई है

यान – मैं

अरियाद – नहीं जानता

उन्नै अल्लदु – आपके सिवाय (रक्षक के रूप में)

विनैपयन पुसिक्क वेणडुवदु ओनृ उणडो? – मेरे कर्मों के फलों को अनुभव करना हैं क्या ?

इंद उडंबोडु – इस शरीर के अंदर

उळनृ – और क्या यह  यात्रा सदा करना हैं ?

नीये – आपको ही यह करना है (कर सकते हैं)

इरैपोळूदिल – आँख के पलक में

माट्री – निशाने के बिना नाश करें

एन्नुडय – मेरे

इरुविनैयै – घोर कर्म

येट्री विडाई – (ऐसे करने से) कृपया मुझे चढ़ाये

ऐरारुम – सुँदर

वैगुंडत्तु – परमपद

सरल अनुवाद

मामुनि, श्री रामानुज से कहतें हैं कि जन्मों से संग्रहित पापों को नाश कर, केवल वें ही  मोक्ष दिला सकतें हैं। सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान पेरिय पेरुमाळ भी जिन्की आज्ञा मानते हैं, उन श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों से अन्य कोई सहारा न होने कि सच्चाई को फिर से मामुनि  दोहराते हैं।  

स्पष्टीकरण

पेरिय पेरुमाळ के वचन को यहाँ मामुनि फिर दोहराते हैं।  भगवान कि वचन हैं कि , “कर्म , “पूर्वागं”, “उत्तरागम”, और “प्रारब्धं” जैसे तीन प्रकार के हैं।  पूर्वागमुत्तारागारंच समारब्धमकमतथ  यहीं बताता हैं। अन्य मार्गों को उपाय मान्ने कि सोच को छोड़कर, केवल मुझे ही एकमात्र आश्रय मानकर मेरे पास आने वालों की कर्मों को, मैं जो सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्व नियंता, वात्सल्यादि कल्याण गुणों से भरपूर हूँ,  सम्पूर्ण तरह से नाश करता हूँ।”आगे श्री रामानुज से मामुनि कहतें हैं, “हे ऐतिरासा ! यतियों के नेता ! क्या “वस्यस्सता भवतिते ” से प्रकट नहीं किया गया है की सर्व स्वामी पेरिय पेरुमाळ भी आपके आज्ञा मान्ने वाले हैं? स्वयं पेरिय पेरुमाळ को अपने प्रेम से बाँधने वालें आप, इस सच्चाई को प्रकट क्यों नहीं करतें ? मैं आप के अलावा अन्य कोई आश्रय नहीं जानता। मैं अपने इस शरीर में हूँ और एक शरीर से दूसरे तक लंबे समय से सफर कर रहा हूँ।  इस शरीर के संबंध से उत्पन्न होनें वाले कर्मों के फलों को और कितने समय तक मैं यह सफर कायम रख कर अनुभव करूँगा ? परंतु आँखे पलकने के समय में, अनादि कालों से संग्रहित इन शक्तिशाली कर्मों को , “कड़ीवार तीय विनैगळ नोडियारूम अळवाईकण (तिरुवाईमोळी १.६.१०)” के अनुसार केवल आप ही नाश कर सकते हैं।  यह कार्य कर केवल आप ही मुझे सुंदर परमपद तक छडा सकतें हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/01/arththi-prabandham-34/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

 

आर्ति प्रबंधं ३३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३२

पासुरम ३३

इन्नम एत्तनै कालम इंद उडम्बुडन यान इरुप्पन  

इन्नपोळूदु उडम्बु  विडुम इन्नपडि अदुतान  

इन्नविडत्ते  अदुवुम एन्नुम इवैयेल्लाम

ऐतिरासा नी अरिदी यान इवै ओन्ररियेन

एन्नै इनि इव्वुडैमबै विडुवित्तु उन अरुळै

ऐरारुम वैकुंठत्तेट्र निनैवु उणडेल

पिन्नै विरैयामल मरन्दु इरुक्कीरदेन ? पेसाय

पेदैमै तीरन्दु एन्नै अडिमै कोंड पेरुमाने

 

शब्दार्थ

इन्नम – अब से

यान इरुप्पन  – मैं रहूँगा, बिना संबंध के

इंद उडम्बुडन – इस नीच शरीर में

ऐतिरासा ! – एम्पेरुमानारे !!!

नी अरिदि – आपको ज्ञान हैं

एत्तनै कालम – कितनी समय तक इन्नपोळूदु उडम्बु  विडुम – कि यह शरीर किस समय पर घिरने वाला है

इन्नपडि अदुतान – किस प्रकार

इन्नविडत्ते  अदुवुम – किस जगह

एन्नुम इवैयेल्लाम – ( यह सारी बातों कि  ) आपको निश्चित ज्ञान है

यान – अज्ञानी मुझको

इवै ओन्ररियेन – इनमें से एक अणु की भी ज्ञान नहीं है

पेदैमै तीरन्दु – अत: मेरी अज्ञान को हटाइये !!!

अडिमै कोंड पेरुमाने !!! – जिनका सम्पूर्ण आधिपत्य है

एन्नै – मुझ पर, (जन्म पर दिए गए) इस साँसारिक बंधन से असंबंधित जो हूँ  

इनि उन अरुळै – अब से ऐसे आशीर्वाद दीजिए कि

इव्वुडैमबै विडुवित्तु – शरीर को हटाकर (छुटकारा दिलाकर )

वैकुंठत्तेट्र – परमपद के ओर बढ़ाए

ऐरारुम – जो सुंदरता से भरपूर जगह है

निनैवु उणडेल – (एमपेरुमानारे) अगर आपकी ऐसी इच्छा हो

पिन्नै – फिर

पेसाय – कृपया मुझे बताएं

मरन्दु इरुक्कीरदेन? – आप क्या विचार कर रहें हैं और यह देरी किसलिए?  

विरैयामल  – और यह शीग्र क्यों नहीं करतें हैं ?

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से अपने जीवात्मा की मुक्ति प्राप्त कर परमपद पधारने में देरी की कारण पूछते हैं।  मामुनि यह शारीर छोड़ने केलिए तैयार हैं और एम्पेरुमानार अत्यंत कृपाळु हैं।  फिर भी यह कार्य की असफ़लता पर मामुनि आश्चर्य करते हैं।  यहीं इस पासुरम में प्रश्न के रूप में प्रकट हुआ हैं।  

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहतें  हैं , “एम्पेरुमानारे! मेरे स्वामी ! इसके पहले आपके संबंध की ज्ञान इसके पहले मुझे नहीं था। यह सूनापन मिटाकर आप मुझे खुद का सच्चा स्वरूप समझायें। “ (तिरुवाय्मोळि ४.९. ६) के विनैयेन उनक्कडिमैयरककोंडाई के अनुसार मुझे यह एहसास दिलाये कि मैं दास  हूँ।  दास का जीवन जीकर, उस्का महत्वपूर्ण समझकर, आपके प्रति मेरे दासत्व की ज्ञान दिए।  आप ही मेरे स्वामी हैं।  आपसे एक प्रश्न  हैं। और कितने समय तक इस नीच शरीर में मेरी आत्मा को रखने का विचार हैं  ?  जब इस शरीर से सच्चा बंधन कुछ न रहा, और कितने समय मुझे इसके अंदर रहना हैं ? यह शरीर कब, कहाँ , किस प्रकार घिरेगा इन सारे बातों का आपको ज्ञान है और मुझे नहीं है।  

आगे मामुनि  प्रस्ताव करतें हैं, “मेरे  स्वामि! मेरा जीवात्मा बिना इच्छा या संबंध कि इस शरीर के अंदर है।  अगर आपको इस आत्मा को शरीर से मुक्ति दिलाकर परमपद प्राप्ति दिलाना हैं, तो देरी किस बात की ? (तिरुवाय्मोळि १०.६. ३) के, “विण्णुलगम तरुवानाय विरैगिंरान” के अनुसार, यह कार्य आप शीग्र क्यों नहीं करतें? कृपया देरी की कारण बताएं। आपकी कृपा असीमित हैं और मेरे पास साँसारिक संबंध नहीं है , तो आपको क्या रोख रहीं हैं ? “मरंदु इरुक्कीरदेन? पेसाय” को “अमरन्दु इरुक्किरदेन पेसाय” भी कहतें हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/01/arththi-prabandham-33/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

 

आर्ति प्रबंधं ३२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३१

उपक्षेप

पिछले पासुरम के “अऱमिगु नरपेरुमबूदूर अवदरित्तान वाळिये” का अर्थ यह हैं कि श्री रामानुज “श्रीपेरुमबूदूर” नामक क्षेत्र में अवतार किये। उससे, इस पासुरम में मणवाळ मामुनि उस श्रेष्ट दिवस को मनाते हैं, जो हैं हम संसारियों के प्रति श्री रामानुज के इस लोक में जन्म लेने का दिन।  

पासुराम ३२

संकरभारकर यादवभाट्ट प्रभाकरर तनगळ मदम

सायवुरवादियर मायकुवरेंरु सदुमरै वाळंदिडुनाळ

वेंकली इंगिनी वीरू नमकिलै एनरु मिगत्तळर नाळ

मेदिनिनन्जुमैयारुमेनतुयर विटटु विळंगिय नाळ

मँगैयर आळी  परांकुश मुन्नवर वाळवु मुळैत्तिडु नाळ

मंनिय तेन्नरंगापुरी मामलै मट्रूमुवन्दीडु नाळ  

सेंकयलवाविगळ सूळवयलनालुम सिरन्द पेरुमबूदूर  

सीमान इळैयाळवार वंदरुळीय नाळ तिरुवादिरै नाळे

शब्दार्थ

शंकरा- शंकरा के सिद्धांत

भारकर- भास्करा के सिद्धांत

यादव – यादवप्रकाश के सिद्धांत

भाट्ट – भाट्टो के सिद्धान्ते

प्रभाकरर तनगळ मदम – प्रभाकर के सिद्धांत , यह सारे सिद्धांतें

सायवुर  – नाश हुए (श्री रामानुज के अवतार के पश्चात)

वाळंदिडुनाळ सदुमरै – चारों वेदों की समृद्धि ( अर्थात वेदों के सही अर्थ प्रचार होने का दिन) तभी होगा जब

वादियर – शंकरा के जैसे लोग वाद करके

मायकुवरेन्रू – निश्चित पराजय होंगे

नाळ – वह दिन (जब श्री रामानुज के अवतार किये) तब है  

वेंकली – (जब)क्रूर कलि

इँगु वीरू नमकिलै एनरु – इस सोच में की यह लोक इसके पश्चात (सहायता केलिए अन्य दुष्ट शक्ति न होने के कारण) उस्के वास स्थल /आधिपत्य में न रहा

मिगत्तळर – खाँप कर क्षय होगी

नाळ – उस खास दिवस (श्री रामानुज के अवतार के दिन )

मेदिनी – पृथ्वी भी

विळँगिया – प्रकाशित हुयी

नन्जुमै आरुम येन तुयर विटटू – (जब उस्को एहसास हुआ) कि उस्की भार  कम होने वाली हैं

नाळ – वो श्रेष्ट दिवस (जब श्री रामानुज जन्म हुए) में ही

वाळवु – श्रेयस

मुन्नवर – हमारे सारें पूर्वजों की, जैसे

मँगैयर आळी – तिरुमँगै आळ्वार और

परांकुश – नम्माळ्वार

मुळैत्तिडु – खिलकर वृद्धि होगी

नाळ – वह महत्वपूर्ण दिन (श्री रामानुज के अवतार दिवस )

मननिय – पेरिय पेरुमाळ (श्री रंगनाथ) के नित्य वास स्थल

तेन्नरंगापुरी – जो रमणीय है और श्री रंगम कहलाता है

मामलै – और जो दिव्य  क्षेत्र “पेरिय तिरुमलै” (तिरुवेंगटम)  जाना जाता है

मट्रूम – और अन्य दिव्य क्षेत्र

उवन्दिडु – संतुष्ट होंगीं

नाळे – वही दिन है

वनदरूळीयनाळ – जब श्री रामानुज अवतरित हुए

सीमानिळैयाळवार – श्रीमान स्वरूप “इळैयाळवार” नामक

पेरुमबूदूर – श्रीपेरुमबूदूर में

सूळ – जो घेरा है

वाविगळ – झील और तालाबों से जो भरे हैं

सेंकयल – लाल मच्छलीयों से

वयल – और धान के खेतों से

नालुम – श्रीपेरुमबूदूर नामक यह जगह हमेशा दिखता है

सिरन्द – एक महान नगर जैसे

तिरुवादिरै – (श्रीपेरुमबूदूर में श्री रामानुज के अवतार होने की नक्षत्र) था तिरुवादिरै। यही सबसे सर्वश्रेष्ठ दिवस हो सकता हैं।  “श्रीमान आविर्भूत भूमौ रामानुज दिवाकर:” वचन की ज्ञान अपनाना हमारा कर्तव्य हैं।  

सरल अनुवाद  

मणवाळ मामुनि श्री रामानुज के इस लोक में अवतार करने की  नक्षत्र तिरुवादिरै को मनातें हैं। जब वें  इस लोक में अवतार किये, अनेक शुभ कार्य हुए। वेदों की गलत अर्थ निकालने वाली सिद्धांतों का नाश हुआ। श्री  रामानुज के जन्म के पश्चात ,  बेसहारा होने के डर में कलि खाँपने लगा।  यह पृथ्वी , उसमें उपस्थित दिव्य क्षेत्रें , जन ,सारे अपने अपने बोज श्री रामानुज के अवतार से हल्का होने के आशा में अत्यंत संतुष्ट थे। ऐसे दिव्य श्री रामानुज लाल मछलियों से भरे सुंदर तालाबों से घेरे, महान नगरी के सौंदर्य से भरपूर श्री पेरुमबूदूर में अवतार किये।  धन्य हो वह अति उत्तम दिवस।   

स्पष्टीकरण

“कुदृष्टि” नामक कुछ लोग हैं।  नाम से ही पता चलता है कि, उन्की दृष्टी साधारण नही है। वेदों के सम्पूर्ण गहरे अर्थों की समझ या दृष्टी न होने के कारण उनकी  व्याख्या ओछा है और वेदों के गलत अर्थ निकालते है। वे १)श्रीमन नारायण (विशेषणम) और २) उन्के गुण (विशेष्यम) दोनों को निषेध करते हैं।  शंकर, भास्कर जैसे लोग कुदृष्टियाँ थे। इसके कारण  वैदिक धर्म बेसाहरे  स्तिथि में थी। परन्त्तु श्री रामानुज के अवतार के पश्चात, इन कुदृष्टियों और उन्के वादों और सिद्धांन्तों के नाश अथवा खुद के स्वास्त्य के ज्ञान में वेद संतुष्ट हुए।     

श्री रामानुज के अवतार के बाद, कठोर कलि को यह भय हुआ कि वह अब धर्ती पर सुखी नहीं रह पायेगा। इस डर में कलि खाप्ने लगा।  “तवं तारणि पेट्रदु (इरामानुस नूट्रन्दादि ६५)” में यही चित्रित है, कि कलि से प्रभावित कुदृष्टियाँ डर में दौडे और पृथ्वी शांति की साँस ली और प्रकाश हुई।  

दिव्य देश वे है जो आळवारों से गाये (पासूरम के रूप में ) गए हैं।  इन्मे में अधिकतर क्षेत्र तिरुमंगै आळवार से गाये गए हैं।  अत: श्री रामानुज के अवतार से आळवारों की कीर्ति फ़िर से विशेष रूप में फैलने लगीं। स्वामी रामानुज के जन्म से सारे दिव्य देश फिर से  खुश हुए। पेरिय पेरुमाळ के निवास स्थल श्रीरंगम और (तिरुविरुत्तम ५०)  “अरुवीसेय्य निर्कुंम मामले” के अनुसार  तिरुवेंघटम भी खुश हुए। श्री रामानुज, लाल मछलियों से भरे तालाबों से घेरे श्रीपेरुमबूदूर नामक  सुंदर नगरि में तिरुवादिरै नक्षत्र में अवतार किए।  उन्के जन्म में दिया हुआ “इळैयाळवार” नाम ही उनके अवतार रहस्य और माहात्म्य को वर्णित करतीं हैं।  

अत्यंत आश्चर्य में चौंके मणवाळ मामुनि कहतें हैं , “यहीं हैं वह दिन! और कैसे आश्चर्यमय दिन हैं यह! इस्के समान और दूसरा कोई दिन हो सकता हैं ?” यहाँ “श्रीमान रामानुज दिवाकर:” वचन की हमें स्मरण होनी चाहिए। श्रीरंगम और तिरुवेंघटम, अन्य दिव्य क्षेत्रो के प्रतिनिधि होने के कारण, “तेनरंगापुरी मामलै मट्रूमुवन्दीडु नाळ” वचन को, इन क्षेत्रों के निवासियों और अन्य क्षेत्रो के भी निवासियों की भी, श्री रामानुज के अवतार से उत्पन्न हुई अत्यंत संतोष की प्रसंग समझ सकते हैं।  इरामानुस नूट्रन्दादि तनियन के , “ उन नाममेल्लाम एनरन नाविनुळे अल्लुमपगलुं अमरुमपड़ि नल्गु” से देखा जा सकता है कि मणवाळ मामुनि, एम्पेरुमानार, इरामानुस, ऐतिरासा जैसे इस पासुरम में “इळैयाळवार” तिरुनाम का उपयोग करतें हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/12/arththi-prabandham-32/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

आर्ति प्रबंधं ३१

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३०

उपक्षेप

पिछले पासुरं में मणवाळ मामुनि, एक से अधिक बार श्री रामानुज के मँगळं (श्रेय) गायें। हर एक को  इस आदत की तरस/आर्ति होनी चाहिए।  इस पासुरं में मणवाळ मामुनि , १) वेदों से भिन्न कई सिद्दांतों को रचने वालों और २) वेदो की अर्थ न समझनें वालों पर जीतने वाले  श्री रामानुज की  शौर्य की श्रेय गातें हैं।  जैसे पिछले पासुरं श्री रामानुज के दिव्य शरीर की मँगळं गाता हैं , यह उनके गुणों की करता हैं।  

पासुरं ३१

अरुसमय चेडियदनै अडियरुत्तान वाळिये

अडरंदुवरुम कुदिट्ठिगळै अरत्तुरंदान वाळिये

सेरु कलियै चिरिदुम अर तीरत्तु विट्टान वाळिये

तेन अरंगर सेल्वम मुट्रूम तिरुत्ति वैत्तान वाळिये

मरैयदनिल पोरुळ अनैत्तुम वाई मोळीन्दान वाळिये

मारनुरै सैद तमिळ मरै वळरत्तोन वाळिये

अऱमिगु नर पेरुम्बुदूर अवदरित्तान वाळिये

अळगारुम एतिरासर अडियिणेगळ वाळिये

शब्दार्थ

वाळिये  – नित्य जिए !

अडियरुत्तान – जिन्होंने नाश किये इन्के  जड़ों को

अरुसमय चेडियदनै – छे सिद्धांतों के वृक्षों के, जो वेदों के विरुद्ध थे

वाळिये – नित्य जिए

अरत्तुरंदान – जो भगाये

अडरंदुवरुम  – अत्यधिक सँख्या में आने वाले

कुदिट्ठिगळै – “नान मरैयुम निर्क कुरुम्बु सै नीसरूम मांडनर” वचनानुसार “कुदृष्टि” पहचाने जाने वाले ये वेदों की गलत अर्थ समझते हैं

वाळिये – नित्य जिए

तीरत्तु विट्टान – जिन्होंने नाश किये

सेरु कलियै – कलि नामक खतर्नाक दुष्ट शक्ति

अर – निकले, बिना

चिरिदुम – छोटे निशानी की

वाळिये – नित्य जिए

तिरुत्ति वैत्तान – जो प्रशासन किये

सेल्वम मुट्रूम – सारे ख़ज़ाने

तेन अरंगर – पेरिय पेरुमाळ (श्रीरंगम के शासक देव) के, जो सौंदर्य से भरपूर हैं  

वाळिये – नित्य जिए

वाई मोळीन्दान – ( श्री भाष्य नामक) अपने दिव्य व्याख्यानों से हमें आशीर्वाद करने वालें। जो संकेत देता है

पोरुळ अनैत्तुम – सारे शास्त्रों की

मरैयदनिल – वेदों से प्रचार किये जाने वाले

वाळिये – नित्य जिए

वळरतोन – प्रसिद्द कर फैलाये

तमिळ मरै – तमिळ वेदं

उरै सैद – प्रस्तूत हैं

मारन – नम्माळ्वार से

वाळिये – नित्य जियें

अवदरित्तान – जो प्रकाशित हुए

नर पेरुम्बुदूर – श्रीपेरुम्बूदूर नामक दिव्य क्षेत्र में

अऱमिगु – आगे प्रस्तुत तमिळ वेदं के अनुसार “सम्पूर्ण शरणागति” प्रचार करने के हेतु

वाळिये – नित्य जिए

अडियिणेगळ – एकमात्र आश्रय, जो कमल पद हैं

ऐतिरासर – श्री रामानुज के जो हैं

अळगारुम – सौंदर्य इत्यादि अनेक दिव्य गुणों से सम्पूर्ण हैं

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनिगळ कहतें हैं , “ श्री रामानुज जिन्होनें १) वेदों के सीमाओं के पार, उसके विरुद्ध खडे छे सिद्धांतों की नाश किये एंड वैदिक साम्प्रदाय को स्थापित किये २) वेदों के गलत अर्थ निकालने वालों को भयभीत किये ३) कलि के ऐसा नाश किये की उसकी निशानी भी भूमि में न रही ४) श्रीरंगम के असीमित निधि को पुन: निर्माण किये और मंदिर के अनुशासन को सुधार, विधि स्थापित किये ५) अपने सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ “श्री भाष्य” के द्वारा वेदों के सच्चे अर्थ दिलाये ६) रूचि रखने वालों के मध्य तिरुवाय्मोळि के सारार्थ प्रचार किये और ७) श्रेयसी श्रीपेरुमबूदूर में अवतार किये , उनकी जय हो। और जय हों उन्के दिव्य चरण कमलों की।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि श्री रामानुज के गुण विशेषों की श्रेय गाते हैं।  इनमें प्रतम स्थान वें श्री रामानुज के वेदों के विरुद्ध खड़े छे सिद्धांतों के नाश को देते हैं।  “साख्योंलुख्याक्षपादक्षपणक कपिलपतंजलि मदाणुसारिण:” वचनानुसार वेदों के सीमा पार छे सिद्धांत थे।  श्री रामानुज ने उनको झड़ से मिटा दिया। इसके पश्चात “नान मरैयुम निर्क कुरुम्बु सेय नीसरूम माण्डनर (रामानुस नूट्रन्दादि ९९)” के अनुसार वेद मंत्रों के गलत अर्थ समझाने वालों को भगाएं। “अरुसमयम पोनदु पानरी इरनददु वेंकली”(रामानुस नूट्रन्दादि ४९) के अनुसार, आगे उल्लेखित लोग और उन्के विचारे  वृद्धि होने  की कारण, दुष्ट कलि की प्रभाव था ।  परंतु श्री रामानुज ने कलि के निशाने को भी इस लोक में नहीं छोड़ा। ऐसे कृपालु श्री रामानुज की श्रेय गाते हैं मणवाळ मामुनि।  और आगे, “श्रीमन श्रीरंग श्रियम अनुभद्रवाम अनुदिनं सम्वर्द्धय” में चित्रित किये गए श्रीरंगम की कोश की निर्माण, मंदिर के अनुशासन के विधियों के पुन: निर्माण अथवा कार्य करने वालें श्री रामानुज के जयकार करतें हैं। अर्थ समझाने वाले के पांडित्य पर निर्भर वेद नित्य भय में थे। पूर्ण प्रकार से  वेदों के गहरे अर्थ खुद न समझने वालों के व्याख्यान, टिप्पणी या भाष्य भी उचित न होगी। वेदों के गहरे अर्थों पर सम्पूर्ण आधिपत्य होने के कारण श्री रामानुज वेदों की इस भय को अपने “श्री भाष्यं” (वेद व्यास के ब्रह्म सूत्र पर एक व्याख्या) नामक ग्रंथ से निकाले। ऐसे महान श्री रामानुज की मणवाळ मामुनि यहाँ श्रेय गाते हैं। तिरुवाय्मोळि के तनियन में उपस्तित “ वलर्त इडत्ताइ इरामानुसन” वचन, श्री रामानुज के  “तिरुवाय्मोळि” नामक तमिळ वेदं को आश्रितों के मध्य प्रचार कर, बढ़ाने केलिए किये गए  मेहनत को चित्रित करती हैं।  शरणागति (श्रीमान नारायण के ओर सम्पूर्ण समर्पण) की सार, जो तिरुवाय्मोळि में प्रशंसा किया गया हैं, उस्के महत्त्व आम जनता तक फैलने की कारण केवल श्री रामानुज हैं, जो श्रीपेरुम्बूदूर में इसी कार्य निभाने के प्रति अवतार किये।  मानव जाती की हित में किये गए इस कार्य के प्रति मणवाळ मामुनि अपनी कृतज्ञता  प्रकट करते हैं।  अंत में “ सम्पूर्ण सुंदरता से भरपूर श्री रामानुज के दिव्य चरण कमल नित्य काल तक जिए”, से समाप्त करतें हैं।  यहाँ “अळगारुम”, “अडियिणेगळ” के संबंध में रखा जा सकता हैं, जिस्से यह अर्थ होगा कि स्वामी के दो पैर दो सुन्दर कमलों के तरह हैं।  और श्री रामानुज के चरणों के स्वाभाविक सुंदरता की भी यह उल्लेख होगी। “ इरामानुसन मिक्क पुण्यन” (रामानुस नूट्रन्दादि ९१), में जैसे चित्रित हैं वैसे “अऱमिगु नर पेरुम्बुदूर” की भी अर्थ यह हैं कि श्री रामानुज धार्मिक संस्कारों के भंडार हैं।   

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/12/arththi-prabandham-31/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

आर्ति प्रबंधं – ३०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २९

 

उपक्षेप

इस पासुरम में श्री रामानुज के चरण कमलों से प्रारंभित, उनके सिर तक उन्के श्रेय की मंगळम गाते हैं मणवाळ मामुनि ।  . मणवाळ मामुनि को लगता है कि अन्य धर्मों के जनों के सात बहुत वाद करने से श्री रामानुज थक चुके होंगें। श्री रामानुज को मामुनि ,हाथों में श्री भाष्य और तिरुवाय्मोळि के संग विराजमान चित्रित करतें हैं। यह अति विशेष मुद्रा मणवाळ मामुनि के कल्पना की उत्साह बढ़ाती है, अतः वें श्री रामानुज के हर अंग के श्रेय की मंगळम गाते हैं और चाहतें हैं कि वें सारे नित्य रहें।     

पासुरम ३०

सीरारुम एतिरासर तिरुवडिगळ वाळी
तिरूवरैयिल साट्रीय सेंतुवराडै वाळी
ऐरारुम सेय्यवडिवु एप्पोळूदुम वाळी
इलंगीय मुन्नूल वाळी इणयतोळगळ वाळी
सोराद तुयय सेय्य मुगच्चोदि वाळी
तूमुरुवल वाळी तुणयमलरकणगळ वाळी
इरारु तिरुनामम अणिन्द एळील वाळी
इनितिरुपोडु येळील ज्ञान मुत्तिरै वाळिये!!

शब्दार्थ

वाळी – नित्य जिए !!
ऐतिरासर – श्री रामानुज के
तिरुवडिगळ – चरण कमल जो हमारे सिर की भूषण और भोग की वस्तु
सीर आरुम – शुभ लक्षणों से भरपूर है
वाळी – नित्य जिए !!!
सेंतुवराडै – काषाय वस्त्र( जो सन्यासियाँ पहनतें हैं), जो प्रज्वलित सूर्य के रंग का है
साट्रीय – जो श्री रामानुज पहनतें हैं
तिरूवरैयिल – उन्के कटि/ कमर
वाळी – नित्य जिए !!!
एप्पोळूदुम – हर समय
सेय्यवडिवु – दिव्य शरीर (दिव्य मंगळ विग्रहं) जो तेजोमय है
येरारुम – सौन्दर्यता से भरपूर
वाळी – नित्य जिए !!!
इलंगीय मुन्नूल – पवित्र धागा/सूत्र जो स्थापित करता है कि वें वेदों के सर्व श्रेष्ट विद्यार्थी थे
वाळी – नित्य जिए !!!
इणयतोळगळ – कँधे जो १) सुनहरे करपग वृक्ष के जैसे २) मोक्ष दायी ३) बंधनों से विमुक्त करने वाले ४) बेसहारे को सहारा देनेवाला तथा मोक्ष देने वाला और इस कारण स्वस्थ दिखने वाले ५ ) सुगन्धित “तुळसी” माला को अलंकृत करते हैं।
वाळी – नित्य जिए !!!
सोराद तुयय सेय्य मुगच्चोदि – श्री रामानुज की तेजस असीमित हैं, पवित्र और तेजोमय है।  इसके कारण है १) श्रीमन नारायण और उन्के भक्तों को देखने पर ख़ुशी २) अभक्तों के वादों को नाश करना
वाळी – नित्य जिए !!!
तूमुरुवल – खिलते फूल के तरह मंद स्मित, हल्की मुस्कराहट। इस मुस्कराहट का कारण है १) आश्रित रक्षण २) एम्पेरुमान के संगत का भोग
वाळी – नित्य जिए !!!
तुणयमलरकणगळ – सुन्दर नेत्र जिन्को दृश्य है १) श्रीरंगश्री (पेरिय पेरुमाळ) २) श्री रामानुज से सुधारे गए श्री वैष्णवश्री (श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागत किये सँसार के सर्वत्र ). अपने आश्रितों के प्रति अत्यंत कृपा से देखने वाले नेत्र, जिसके झलक से शरणागत पवित्र हो जाते हैं।
वाळी – नित्य जिए !!!
इरारु तिरुनामम अणिन्द एळील – तेजस्वी गुलाबी शरीर में ,बारह दिव्य “तिरुमण काप्पु” या “ऊर्ध्व पुण्ड्र” . यह सोने पर्वत (श्री रामानुज के शरीर) में सफ़ेद कमल (तिरुमण काप्पु ) के जैसे है। ये तिरुमण काप्पु श्री रामानुज के उल्लेखित गुणों की आविर्भाव है और निश्चित करता है कि “श्रीवैष्णवश्री” फैले।
वाळी – नित्य जिए !!!
ज्ञान मुत्तिरै – “पर तत्व” के विषय में उपदेश देते हुए श्री रामानुज की मुद्र
इनितिरुप्पोडु – सौम्य रूप में विराजमान (संसारियों को ज्ञान अनुग्रह करने से तृप्त और संतुष्ट हैं )
एळील – अति सुन्दर ( यह मुद्र संस्कृत और तमिळ वेदों के साराँश है)

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मणवाळ मामुनि श्री रामानुज की मंगळासासनम करते हैं। उन्के दिव्य चरण कलमों से प्रारंभित काषाय वस्त्र, उन्की शरीर, उन्की ब्रह्म सूत्र, शक्तिमान कंधे, सौंदर्य मुस्कान, कारुण्य नेत्र, उन्की “तिरुमण काप्पु” और अंत में ज्ञान मुद्र जिसमें वें अपने भक्तों के मध्य विराजमान हैं।

स्पष्टीकरण

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज के श्रेय( मंगळासासनम) गाते हैं।  श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों की श्रेय से शुरू करतें हैं और चाहते हैं कि वें नित्य रहें। स्वरूप, रूप और उन्के भक्तों को उद्देश्य और अत्यंत प्रीय गुणों से भरपूर श्री रामानुज यतियों के नेता हैं।  (तिरुक्कुरुंधानडगम ६) के “अमरर सेंनिप्पू” और (रामानुस नूट्रन्दादि१ ) के “ईरामानुसन अडि पू” के अनुसार श्री रामानुज के चरण कमल हमारें सिर के भूषण के रूप में भोग्य हैं। ऐसे चरण कमल नित्य रहें। अब श्री रामानुज के दिव्य मंगळ शरीर को अलंकृत करने वाले काषाय वस्त्र के श्रेय गाते हैं। इस विशेष वस्त्र की भी नित्य रहन चाहतें हैं। काषाय वस्त्र की २ विवरण यहाँ दी गयी है। (१) श्री वचन भूषणम के २४० चूर्णिकै “आरु प्रकारत्ताले परिसुद्धात्मा स्वरूपत्तुक्कु तत्साम्यं उनडायिरुक्कुम” के अनुसार सारे जीवात्मा अपने सच्चे स्वरूप की ज्ञान होने पर पेरिय पिराट्टी के समान हैं।  जीवात्मा के ६  गुण विशेषण हैं  १) अननयार्ह शेषत्व: श्रीमन नारायण से अन्य किसी का दास न रहना।  (२) “अनन्य शरणत्वं”: श्रीमन नारायण  से अन्य किसी के आश्रय न लेना (३) “अनन्य भोगत्वं” : श्रीमन नारायण से अन्य किसी की भोग्य -पात्र न बनना।  (४) संस्लेषत्तिल दरिक्कै: श्रीमन नारायण के मिलन में ही जीवित रहना (५) विस्लेशत्तील दरियामै: श्रीमन नारायण से अलग जीवन को न सहना (६) तदेक निर्वाह्यत्वं: श्रीमन नारायण से ही नियंत्रण किए जाना। उल्लेखित ६ गुण विशेषणों की परिचय होनें पर, जीवात्मा  श्रीमन नारायण के कृपा से, नायकी लक्षण के प्रतीक पेरिय पिराट्टी के समान है। काषाय वस्त्र का दूसरा विवरण “सीताकाषायवासिनी” वचन से है। इन दो सूचनाओँ से तुल्य है कि काषाय “पारतंत्र्य” (आचार्य पर निर्भर रहना और प्रश्न किये बिना आज्ञा  मानना) और “अनन्यारहत्वं” (जीवात्मा केवल श्रीमन नारायण का होना )  को प्रकट करता है। रँग में सूर्य के समान, श्री रामानुज के देह को अलंकृत करने वाले इस सुँदर काषाय वस्त्र को मामुनि यहाँ विवरित करतें हैं।  इसके बाद, श्री रामानुज के दिव्य मंगळ विग्रह (दिव्य शरीर) के श्रेय गाते हैं। मामुनि कहतें हैं कि श्री रामानुज की दिव्य शरीर आश्रुतों को प्रीय है। उन्के हर अंग अत्यंत सौंदर्य प्रकट करती हैं। उन्के मुखाकृति निर्मल फूल के जैसे कोमल और मृदुल है।  “रूपमेवास्यै तन महिमान मासशटे” के अनुसार श्री रामानुज के दिव्य शरीर प्रकाशमान हैं, परमात्मा श्रीमन नारायण, अंदर अन्तर्यामी के रूप में तेजोमय होने के कारण। “नित्यं नित्या कृतितरम” शास्त्र वचन के अनुसार यह दिव्य मंगळ रूप सदा रहें, ऐसे मंगळासासनं करते हैं मामुनि। अब मामुनि श्री रामानुज के पवित्र धागें/ जनेयू (तीन धागे) की श्रेय गाते हैं ,जो स्थापित करती है कि वें वेदिक ग्रंथों की अनुयायी हैं और उस्की सतर्क पालन करतें हैं।  श्री रामानुज की पवित्र धागा शाम के आसमान में चाँदी म्यान के जैसे है।  नित्य काल तक जिए ऐसे पवित्र धागें। आगे , श्री रामानुज के सुँदर कंधों की मंगळासासन करतें हैं। “भाहुच्छायमव अष्टबधोस्यपलको माहातमन:” वचनानुसार श्री रामानुज के कंधे सुनहरें करपग वृक्ष के शाखाओँ के तरह अपने नीचे उपस्थित लोगों को छाँव, आश्रय और आश्वासन देता है।  ये कंधे किसी को भी मोक्ष दिला सकतें हैं। ये  सँसार के नीच को भी मुक्ति दिला सकते हैं।  जनों की रक्षा करने वालें यह कंधे इस कारण चौड़े हैं। ज्ञान सारम के पासुरम ७ के “तोळार चुडरत्तिगिरी संगुडय सुंदरनुक्खु” के अनुसार, श्री रामानुज के कंधे शक्तिमान हैं।  तुळसी, वगळा और नळीनाक्ष पुष्पों के हार से ये कंधे अलंकृत हैं।ऐसे अद्वितीय कंधे नित्य जिए, यह मामुनि की मंगळासासन हैं। अब श्री रामानुज के दिव्य मुख-मंडल की मंगळासासनम करने लगते हैं।  “ब्रह्मविद इव सौम्यते मुखम पादि” और (तिरुवाय्मोळी ३.१.१) “मुगच्चोदि मलर्नददुवो” के अनुसार श्री रामानुज की तेजस असीमित, पवित्र और दीप्तिमान  है। श्रीमन नारायण और उन्के भक्तों को देखने से आने वाली सुख और अभक्तों के वाद को नाश करना ही तेजस की कारण है।   

इस्के पश्चात श्री रामानुज के सुंदर मुस्कान की श्रेय गाते हैं।  “सा विलासस स्मिताधारम भिप्राणम मुख पंकजम” के अनुसार श्री रामानुज के मुख एक सुंदर कमल से तुल्ना की जाती है। इस कमल मुख में एक सुन्दर मंदस्मित आती है, आळ्वार के “निन  पाल निला मुत्तम तवळ कदिर मुरुवल सैदु” (तिरुवाय्मोळि ९.२.५ ) के अनुसार। चंद्र के शीतल हॅसी के समान खिलते पुष्प जैसे यह सुँदर मुस्कान और उल्लेखित ख़ुशी सदा रहें।  श्री रामानुज के दिव्य नेत्र, श्री रंगनाथ और श्री वैष्णवश्री से मिलकर सुधरकर अपनाए गए सर्वों  को सदा दर्शन करतें हैं।  ये नेत्र सदा संगी जनों के प्रति कृपा प्रकट करती हैं। “अमलंगळाग विळीक्कुम” (तिरुवाईमोळी १. ९. ९ ) के अनुसार इन नेत्रों के अनुग्रह से  अश्रुतो के अज्ञान नाश होती है। ये अध्बुध नेत्र सदा रहें, यह मामुनि की चाहत है और उन्के  मंगळासासनं करतें हैं। अब मामुनि, श्री रामानुज के  “तिरुमण काप्पु” (द्वादश ऊर्ध्व पूर्णं) धारण के सौंदर्यता की श्रेय गाते हैं। पासुरम के पूर्व वाक्यों में उल्लेखित गुणों के प्रतिबिम्ब ये “तिरुमण काप्पु”,सुनहरें पहाड़ पर खिले सफ़ेद कमल के समान है। श्री रामानुज की देह लाल-पीली तेजस के संग दृश्य होती हैं, और उस पर “तिरुमण काप्पु” प्रकाशित है। मामुनि चाहते हैं कि यह सौंदर्यता सदा रहें। अंत मे, श्री रामानुज के उंगलियों के मुद्र की श्रेय गातें हैं और मंगळासासन करते है कि ये सदा जिए। श्रीमन नारायण के इच्छा पूर्ती के हेतु श्री रामानुज इस सँसार में आये और भक्तों और प्रतिद्वंदियों को एक समान श्रीमन नारायण के निर्हेतुक कृपा के कारण अपनाएँ।  ये सर्वत्र करने के पश्चात (तिरुवाय्मोळि ४. ३. ११) के “वैयम मन्नी वीट्रीरुंदु” के अनुसार वें राज हँस के जैसे घंभीरता से विराजें हैं। आचार्य सामान्य रूप में, विषयों में अंतर कर पाने से हँस से समानित किए जातें हैं। (पेरिय तिरुमोळि ११. ४.८ ) “अन्नमदाय इरुन्दगु अर नूल उरैत्त” से तिरुमँगै आळ्वार यही विषय प्रकट करतें हैं। (परांकुशाषट्कम) “पद्मासनोपविष्टं पादद्वोपोदमुद्रम” वर्णनानुसार, आचार्यों के नेता श्री रामानुज ज्ञान मुद्र में, पद्मासन में विराजमान, अपने भक्तों के मध्य, गंभीर दृश्य हैं। “श्रीमत तदंगरीयुगळं” में “श्री” के उपयोग के समान, इस पासुरम में “सीरारुम”, चरण कमलो (तिरुवडिगळ) की विशेषण के रूप में है।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/11/arththi-prabandham-30/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

आर्ति प्रबंधं – २९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २८

bhagavad_ramanuja_2011_may-624x907

उपक्षेप

परमपद के पथ में आनेवाली बाधाओँ से रक्षण जिन्की आशीर्वाद से साध्य है उन श्री रामानुज के जयों के श्रेय, मणवाळ मामुनि इस पासुरम में गाते हैं। वेदों को तिरस्कार करने वाले तथा वेदों की अर्थों को अनर्थ प्रकट करने वालों की पराजय श्री रामानुज अपने श्रीभाष्य जैसे ग्रंथों से करते हैं। श्री रामानुज के जयों की प्रशंसा कर उन्की मँगळं भी गाते हैं।   

पासुरम २९

चारुवाग मदनीरु सैदु समण छेडीक्कनल कोळूतिये
साक्कियकडलै वट्रवित्तु मिगुसांकिय किरि मुरित्तिड
मारु सेयदिडु कणाद वादियगळ वाय तगर्थु अरमिगुत्तु मेल
वंद पासुपदर सिंदियोडुम वगै वादु सैद ऐतिरासनार
कूरुम माकुरु मदत्तोडु कुमारिलन मदम अवट्रिन मेल
कोडिय तर्क चरम विट्टपिन कुरुगिय मायावादियरै वेन्रीड
मीरि वादिल वरु पार्करन मदविलक्कडि कोडियेरिंदु पोय
मिक्क यादव मदतै मायत्त पेरुवीरर नाळूम मिग वाळिये !!!

शब्दार्थ

चारुवाग मदनीरु सैदु – “प्रत्यक्षमेकं चार्वाक:” अर्थात चार्वाक सिध्दांत को मानने वाले दृश्य विषयों को ही मानेँगे। इस “चारुवाग” धर्म को श्री रामानुज ने भस्म किया।
समण छेडीक्कनल कोळूतिये – “समण” याने जैन धर्म नामक अपतृण को जलाया
साक्कियकडलै वट्रवित्तु – “साक्कियम” (बौद्ध) धर्म नामक सागर को अपने ग्रंथों के प्रभाव से सुखाया
मिगुसांकिय किरि मुरित्तिड – श्री रामानुज “सांख्य” धर्म को नाश किये ( अधिकतर उपस्थिति के कारण यह पहाड़ कहलाया गया है )
तगर्थु – अपने वाद से नाश किये
वाय- प्रस्तुत ,वाद
मारु सेयदिडु कणाद वादियगळ – “काणाद वादिगळ” नामक गण के तरफ से प्रति वाद के रूप में
अरमिगुत्तु मेल वंद – धर्म सुसंथापित किए , और लगातार आने वाले (हमलों )
पासुपदर सिंदियोडुम वगै – अपने जीवन रक्षण की हेतु अपने कुटुंब के संग दौड़ने वाले रूद्र के जैसे उन्के भक्त “शिवसमयिगळ” भी भगाये गए
वादु सैद ऐतिरासनार – ऐतिरासन के वाद से
कोडिय तर्क चरम विट्टपिन अवट्रिन मेल – (श्री रामानुज)  “तर्क”( सामान्य ज्ञान जैसे तरीखों से वाद करना) के तीरों से हमला कर और  नाश किए
कूरुम – अज्ञानी वाद
मा – अनेकों
कुरु मदत्तोडु – “प्रभाकर मथ” नामक सिद्धांत
कुमारिलन मदम – और “भट्ट मथ” नामक सिद्धांत
कुरुगिय मायावादियरै वेन्रीड – “मायावाद” सिद्धांत के लोगों के स्थान में जा उन्के वादों को जय किये।
पार्करन मदविलक्कडि कोडियेरिंदु पोय  – “भास्कर” सिद्धांत के लोगो के वादों को हिलाकर उखड़े, और उन्को फ़ेंक कर आगे बड़े।
मीरी वादिल वरुम – यही “भास्कर” सिद्धांत के जन अत्यंत घमंड के सात श्री रामानुज से वाद करने आए।
मिक्क यादव मदतै मायत्त – (भास्कर सिद्धांत को पराजित कर, श्री रामानुज) “यादवप्रकाश”सिद्धांत, जिसके अधिक अनुयायी थे ,उसको नाश किए।
नाळूम मिग वाळिये  – जय हो !
पेरुवीरर – अद्वितीय साहसनीय और विरोधियों को पराजित करने वाले एम्पेरुमानार

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि , श्री रामानुज के विजयों की उत्सव मनाते हैं।  उस समय प्रचलित और प्रसिद्द सिद्धांतों की मामुनि सूची देते हैं। “चारुवाक”, “समणम” , “साख्यं”, “सांख्यं”, “काणावादि”, “पाशुपत”, “प्रभाकर”, “भाट्ट”, “मायावाद” और “यादव” आदि धर्मों को पराजित करने वाले श्री रामानुज को मणवाळ मामुनि प्रशंसा करते हैं। और प्रतिदिन, श्री रामानुज को अनेकों विजयों प्राप्त होने  केलिए मणवाळ मामुनि मंगळम गाते हैं।     

स्पष्टीकरण

चारुवाक धर्म की आधारिक तत्व है “प्रत्यक्षमेव चार्वाक:” अर्थात आँखों से दिखने वाले विषयों को ही माननेवाले। यह वाद श्री रामानुज के वाक् चातुर्य के किरणों से भस्म हो गया। “समणम” (जैन) नामक धर्म पर आग लगाए।  “साख्य” धर्म के सागर को अपने वादों से सुखायें। “सांख्य” नामक धर्म अधिकतर फैला हुआ था।  इसी कारण वह पहाड़ समानित की जाता था।  किंतु श्री रामानुज अपने वज्रायुद के समान वादों से नाश किये। “काणाद वादिगळ” नामक धर्म के लोग प्रतिवाद के लिए प्रसिद्द थे। इन्को अपने प्रतिवाद से हराये।  

“पाशुपतर” नामक एक गण था। इस गण के जन श्री रामानुज से वाद कर उन्हें पराजित करना चाहे।  किंतु श्री रामानुज के वाद के कारण ये भागे।  बाणासुर से श्री कृष्ण के युद्ध के समय ऐसे ही रूद्र और उन्के परिवार भागे।”प्रभाकर “ और “ भाट्ट” धर्मों के वादों के सामने श्री रामानुज अपने शक्तिमान वादों को बाणों की तरह प्रयोग किये।   इसके पश्चात श्री रामानुज “ मायावाद” धर्म के लोगों के स्थल तक गए। “वादिल वेनरान नममिरामानुसन” (ईरामानुस नूट्रन्दादि ५८) के अनुसार इन मायावादियों को श्री रामानुज अपने वादों से पराजित किये। “भास्कर” धर्म के लोग श्री रामानुज से वाद करने आये। श्री रामानुज पराजित ही नहीं किये ,बल्के यह निश्चित किये कि उस पथ में कभी कोई न जाए। “यादव” धर्म के अनेकों अनुयायी थे जो श्री रामानुज के  पराजय को ही एकमात्र लक्ष्य समझकर आये। पर उस धर्म कि भी, कोई भी  निशानी के बिना श्री रामानुज नाश किये।   

मणवाळ मामुनि चाहते हैं कि श्री रामानुज के ये वीर साहस( अन्य धर्मों की नाश ) प्रतिदिन प्रचलित रहें।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/10/arththi-prabandham-29/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

आर्ति प्रबंधं – २८

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २७

srivaishna-guruparamparai

उपक्षेप

नेक और ज्ञान संबन्धित कार्यो में व्यस्त रहने पर भी परमपद की रुचि या इच्छा मणवाळ मामुनि के मन में श्री रामानुज के अनुग्रह से ही उत्पन्न हुई।  श्री रामानुज के इस अत्यंत कृपा को मणवाळ मामुनि इस पासुरम में प्रशंसा करते हैं।  

पासुरम

पण्डु पलवायिरम पारुलगोरुय्य
परिवुडने सेय्दरुळुम पल्कलैगळ तम्मै
कण्डदेल्लाम एळुदि अवै कट्रिरुंदुम पिरर्क्कु
कादलुडन करपित्तुम कालत्तै कळित्तेन
पुणडरीगै केळ्वनुरै पोन्नुलगु तन्निल
पोग निनैवु ओन्रुमिन्रि पोरुन्दि इंगे इरुन्देन
एण्डिसैयुम एत्तुम एतिरासन अरुळाले
एळिल विसुम्बेयन्रि इप्पोदेन मनम एण्णादे

शब्दार्थ

पण्डु –  पिछले काल में
कालत्तै कळित्तेन – मैंने जीवन बिताई
कादलुडन – प्रेम से
कर्पित्तुम – प्रचार कर/ सिखा कर
पिरर्क्कु  – दूसरों को
अवै कट्रिरुंदुम – अपने आचार्य से जो मैंने सीखा
कणडदेल्लाम – मेरे दृश्य में आने वाले ग्रंथों में उपस्थित सारा ज्ञान
एळुदि – जो सीखा उस्के विषय में लिखा
पल्कलैगळ तम्मै – अनेकों ग्रंथों
सेय्दरुळुम – अनुग्रह किये गए है
पलवायिरम – “आत्मा की प्रगति एवं उन्नति” की विषय में हमेशा ध्यान देने वाले आचार्यो से
परिवुडने – कृपा से चेतनों को दिए, इसलिए
पारुलगोरुय्य – कि चेतनों को साँसारिक बंधनों से मुक्ति मिले
पोरुन्दि इंगे इरुन्देन – मैं इस विभूति में संतुष्ट था
पोग निनैवु ओन्रुमिन्रि – यहाँ से निकलने का सोच के बिना
पोन्नुलगु तन्निल – “नित्य विभूति” जो परमपद हैं, वहाँ
उरै – जो निवास हैं
पुण्डरीगै केळ्वन – कमल पर विराजमान पेरिय पिराट्टि के दिव्य पति
इप्पोदेन मनम एण्णादे – (किंतु अब) मेरा ह्रदय अन्य कोई विषय पर ध्यान न देगा
एळिल विसुम्बेयन्रि – तेजोमय परमपद से अन्य कोई
एतिरासन अरुळाले – (इसका कारण हैं)  एम्पेरुमानार के आशीर्वाद
एण्डिसैयुम एत्तुम – अष्ट दिशाओं में लोग इन्हीं के श्रेय की प्रशंसा करतें हैं

सरल अनुवाद

पूर्व काल में अपने जीवन बिताने के तरीखे की मामुनि प्रस्ताव करते हैं।  आचार्यो के कृपा से लोक में प्राप्त हुयी ग्रंथों को वे पढ़ते थे। खुद पढ़े तथा उन्के विशेष अर्थों से अपरिचित जनों को सिखायें। पूर्वतः मामुनि को परमपद में कोई इच्छा न थी। एम्पेरुमानार जिन्के आशीर्वाद से ही, अनेकों भगवतो और  पिराट्टियों समेत श्रीमन नारायण के निवास स्थान परमपद  में रूचि, मणवाळ मामुनि में उत्पन्न हुई।  इसलिए वें एम्पेरुमानार के आशीर्वाद की उत्सव मनाते हैं।

स्पष्टीकरण

मामुनि कहते हैं , “अपने पूर्व काल में, चेतनों के उन्नति के हेतु , महान पूर्वाचार्यो से लिखे गए अनेकों ग्रंथों की मैंने पाठ किये। अनेकों आचार्यो से लिखित यें एक कंठी जैसे एक सोच ही प्रकट करते हैं। चेतनों के प्रति अत्यंत कृपा से आचार्यो से प्राप्त इन ग्रंथों को हम पढ़े । (नान्मुगन तिरुवन्दादि ६३),”तेरित्तु एळुदि” के अनुसार, अपने आचार्यो से भी ढंग से सीखें । इन विषयों से अज्ञानियों के आत्मा की उन्नति केलिए इन ग्रंथों के गहरे अर्थों को पढ़ाये और यही हमारी व्यवहार भी थी। साँसारिक भोग्य में मग्न हमें , (मुदल तिरुवन्दादि ६७) “तामरैयाळ केळ्वन” से वर्णित पिराट्टि समेत श्रीमन नारायण के निवास स्थान परमपद में रुचि न थीं। अष्ट दिशाओं में भी माने जाने वाले श्री रामानुज के आशीर्वाद के कारण हमें परमपद में रुचि उत्पन्न हुई और उन्के आशीर्वाद के विशेष से ही अब मेरा ह्रदय अन्य कोई विषय को सोचे बिना, परमपद पर ही विचार कर रहा हैं। “अरुळाले” शब्दान्त के  “ले” से उनके आशीर्वाद के प्रभाव पर विशेष ध्यान दिया गया हैं।  यह व्याकरण में  “तेट्रत्तु ऐकारम” कहा जाता हैं।

पादटीका

“अरुळाले” शब्द में पिळ्ळैलोकम जीयर “तेट्रत्तु ऐकारम” की प्रस्ताव करतें हैं। तमिळ व्याकरण में दो “ऐकारम” हैं। “तेट्रत्तु ऐकारम”, “उरुदी” याने “निश्चय” तथा “सर्वसम्मत” को प्रकट करता है। तिरुप्पावै में आण्डाळ, “नारायणने” के ऐकारम से यह प्रकट करतीं हैं कि नारायण से अन्य कोई “परै” (लाभ, परमपद) न दे सकते। इस्से निश्चित रूप में मोक्ष दायक की पहचान स्थापित की गयी हैं। दूसरा है “पिरिनिलै ऐकारम” जिसका उधाहरण देखते हैं। तिरुप्पावै के उसी पासुरम में आण्डाळ, “नमक्के” में  ऐकारम की प्रयोग करती हैं।  अर्थात, नारायण हम जैसे नीच, पापी, अज्ञानियों को भी परै अनुग्रह करेंगें। इस पासुरम में “एण्णादे” में “तेट्रत्तु ऐकारम” की प्रयोग की गयी हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/10/arththi-prabandham-28/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org