Author Archives: preeti madhusudhan

आर्ति प्रबंधं – ४६

री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४५

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि ,आचार्य के महत्त्व कि श्रेय जो गाते हुए उन्हीं के कृपा को अपनी उन्नति की कारण बतातें हैं।  इसी विषय कि इस पासुरम में और विवरण देतें हैं।

पासुरम ४६

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै तीविनैयोंदम्मै

गुरुवागि वंदु उय्यक्कोंडु – पोरुविल

मदि तान अळित्तरूळुम वाळवंरो नेंजे

एतिरासरक्कु आळानोम याम

 

शब्दार्थ:

नेंजे – हे मेरे ह्रदय !

याम – हम

आळानोम  – सेवक बने

एतिरासरक्कु –  एम्पेरुमानार के

(इसका कारण है )

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै – तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै (मामुनि के आचार्य )

गुरुवागि  – आचार्य के रूप में अवतार किये

वंदु –   और हमारे जगह को पधारें

तीविनैयोंदम्मै – हम, जो क्रूर पापों के घने बादल हैं

उय्यक्कोंडु  –  उन्के कृपा से स्वीकृत किये गए और उन्नति के योग्य माने गए

अळित्तरूळुम  – हमें आशीर्वाद किये , (यह देकर )

मदि तान  – तिरुमंत्र की ज्ञान

पोरुविल – जो अद्वितीय ( शास्त्र की भी किसी और से तुलना की जा सकती हैं, पर इसकी नहीं )

वाळवंरो – (हे मेरे ह्रदय!) यह इसी आचार्य के कृपा से ही हैं न ? ( इन्हीं के कारण हम एम्पेरुमानार के सेवक बने)

 

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि अपने आचार्य के श्रेय की वर्णन करतें हैं।  वें कहतें कि आचार्य के कृपा से पाए गए तिरुमंत्र से ही वें श्रीमन नारायण के सेवक के सेवक बन सकें।  

 

सपष्टीकरण

यहाँ पहले तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै की श्रेयस कि प्रशंसा की गयी हैं। श्रीमन नारायण के सारे भक्त जो श्री वैष्णव और इस साँसारिक लोक के दिव्य जीव याने  भूसुरर कहलातें हैं, इन सारें लोगों से तिरुवाय्मोळि दिव्य प्रबंध और अमृत मानी जातीं हैं। नम्माळ्वार खुद कहतें हैं, “तोंडरक्कमुदु उण्ण चोल मालैगळ सोन्नेन” (तिरुवाय्मोळि ९.४.९). तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै एक ऐसे आचार्य हैं जो तिरुवाय्मोळि को स्वास में लेकर उसी में जीतें थे। उसमें से तरह तरह के मकरंद कि आनंद उठाते हैं, जैसे शब्दों कि सजावट कि मकरंद , अर्थों की मकरंद और उन पासुरमो के मनोभाव कि मकरंद। वे केवल तिरुवाय्मोळि को धर्म मानकर जियें और अन्य शास्त्रों को घास समान मानें। वें नम्माळ्वार के चरण कमलों में शरणागति कर, उन्के प्रति सारें कैंकर्य किये।  तिरुवाय्मोळि के संबंध के कारण वें तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै कहलायें गए। मामुनि अपने ह्रदय को कहतें हैं , “हे मेरे प्रिय ह्रदय! हमें देखो। “अोप्पिल्ला तीविनैयेनै उय्यक्कोंडु (तिरुवाय्मोळि ७.९.४)” के वचनानुसार हम क्रूर पापों के प्रतिनिधि हैं। और तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै आचार्य के रूप में अवतार किये और हमें विमुक्त किये।” इसी को वें अपने उपदेश रत्न मालै में, “तेनार कमल तिरुमामगळ कोळूनन ताने गुरुवागि (उपदेश रत्न मालै ६१) कहतें हैं। आगे मामुनि कहतें हैं , “ वें (तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै) हमारें जगह पधारें और तिरुमंत्र से जनित यह दिव्य ज्ञान दिए। यह अन्य शास्त्रोँ से जनित ज्ञान से अलग हैं। हे मेरे ह्रदय!  उनके इस कृपा के कारण ही हमें एम्पेरुमानार के प्रति कैंकर्यं करने का भाग्य मिला। तिरुमंत्र में यहि उत्तम अर्थ प्रकट किया गया हैं कि, भगवान श्रीमन नारायण के सेवकों के सेवक रहना सर्व श्रेष्ट स्थिति हैं। और इस अर्थ को महसूस करने के कारण ही हम एम्पेरुमानार के नित्य सेवक बनते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४४

उपक्षेप

पिछले पासुरम में, मामुनि सर्वव्यापी श्रीमन नारायण की  “माकांत नारणनार वैगुम वगै” से श्रेय गाए। वें उस पासुरम के “मोहान्तक” से चित्रित किये गए सबसे नीच जीव खुद को मान्ते हैं। यहीं इस पासुरम का सारांश हैं जहाँ वें खुद को,, श्रीमन नारायण को न पहचान पाने के कारण ,केवल अंधकार और अकेलापन महसूस करने वाले लोगों में सबसे नीचे स्थान में रख़ते हैं।  मामुनि का मानना हैं कि उन्हें श्रीमन नारायण की सर्वव्यापित्व की और उनके संग उपस्थित निरंतर संबंध की ज्ञान नहीं हैं। इसी अज्ञान के कारण वें मोहान्तको में से एक बन गये। किन्तु इन विषयों के पश्चात भी मामुनि अपने ह्रदय को याद दिलातें हैं कि आचार्य संबंध के कारण ही उन्नति पाए। यही इस पासुरम का सारांश है।  

पासुरम ४५

नारायणन तिरुमाल नारम नाम एन्नुम मुरै

आरायिल नेंजे अनादि अंरो सीरारुम

आचार्यनाले अंरो नाम उयंददु एन्ड्रु

कूसामल एप्पोलुदुम कूरु

शब्दार्थ

 

नेंजे – हे मेरे ह्रदय

नारायणन तिरुमाल –  जैसे “ तिरुमाले नानुम उनक्कु पळवडियेन” से चित्रित किया गया है, श्रीय:पति श्रीमन नारायणन ही सामूहिक शब्द “नारम” से पहचाने जाने वाले सारे आत्माओं के अधिकारी और स्वामी हैं।  

नारम नाम – हम आत्मायें सब नित्य हैं

आरायिल – अगर यह साबित करना है

एन्नुम मुरै –  (श्रीमन नारायण और जीवात्मा के बीच) वह नित्य संबंध

अनादि अंरो – यह कोई नया संबंध है क्या ? नहीं।  क्या यह सत्य नहीं कि यह नित्य हैं ? ( हाँ यह सत्य है)

(हे मेरे ह्रदय!!!)

सीरारुम – जो हमें यह संबंध दिखाकर उसे दृढ़ बनाके और खुद ज्ञान जैसे कल्याण गुणों से भरे व्यक्ति

आचार्यनाले अंरो – आचार्यन हैं, है न ?

नाम उयंददु एन्ड्रु – हमारी मुक्ति कि कारण वें ही हैं

(हे मेरे ह्रदय)

कूरु – कृपया इस बात को दोहराते रहो

एप्पोलुदुम – सदा

कूसामल – बिना कोई लज्जा के

 

सरल अनुवाद

मामुनि, इस पासुरम में ,श्रीमन नारायण और जीवात्मा के संबंध को दृढ़ करने वाले आचार्यन के महत्त्व प्रस्तुत करतें हैं। और वें कहतें हैं कि इस दृढ़ संबंध के पहले वें अचित वस्तु समान थे।  अत: वे अपने ह्रदय को यह बात प्रकट करने को प्रेरणा देते है कि, उन्कि उन्नति केवल आचार्य कृपा के कारण ही हुयी है।

सपष्टीकरण :

मामुनि कहतें हैं, “हे! मेरे प्रिय ह्रदय! पेरियाळ्वार नें कहाँ था, “तिरुमाले नानुम उनक्कु पळवडियेन (तिरुप्पल्लाण्डु ११)”. वें श्री कि दिव्य पति, श्रीय:पति श्रीमन नारायण हैं।  हम (जीवात्मायें) “नारम” कहलातें हैं। श्रीमन नारायण और जीवात्मा के बीच का संबंध नित्य और निरंतर है। अगर सोचा जाए , तो हम समझेंगें कि यह कोई आधुनिक संबंध नहीं हैं न हैं यह कोई अचानक सृष्टि , क्योंकी यह अनादि और नित्य हैं।  किंतु हमें (मामुनि और उन्के ह्रदय को) यह एहसास न हुआ और इस विषय से अज्ञानी रहें। और अचित वस्तु के समान इस संबंध को समझने कि योग्यता न थी। लेकिन हमारें आचार्य के समझाने पर यह स्थिति बदला और इस संबंध की और उस्की महत्त्व की ज्ञान हुई। आचार्य ज्ञान और अन्य कल्याण गुणों से भरपूर हैं। आचार्यन ही हमारी उन्नति के कारण हैं। (तिरुवाय्मोळि ३.५.१०) के “पेरुमैयुम नाणुम तविर्न्दु पिदट्रूमिन” के प्रकार कृपया इस्को हर जगह प्रकट करें जिस्से सारे लोग यह जान सकें। यह विषय को प्रमेय सारम १० , “इरैयुम उयिरुम” पासुरम में वर्णन किया गया हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४३

उपक्षेप
पिछले पासुरम में मामुनि ने कहा, “इंद उलगिल पोरुंदामै एदुमिल्लै अंद उलगिल पोग आसयिल्लै” . इस्का अर्थ है कि मामुनि को इस साँसारिक लोक में रहने कि दिलचस्पी में कोई कमी नहीं और परमपद पहुँचने में ख़ास दिलचस्पी नहीं हैं। यह प्रस्ताव करने के पश्चात वे सँसार के लोगों को और उन्के क्रियाओं पर ध्यान देते हैं। इन लोगों कि निरंतर पाप इकट्ठा करने का कारण समझतें हैं। यही इस पासुरम का विषय है।

पासुरम ४४
माकान्त नारणनार वैगुम वगै अरिंदोर्क्कु
एकान्तं इल्लै इरुळ इल्लै
मोकांतर इव्विडम येकांतम इरुळ एन्ड्रु भयं अट्र इरुंदु
सेयवारगळ ताम पावत्तिरम

शब्दार्थ :
नारणनार – सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान श्रीमन नारायणन
मकांत – जो श्री महालक्ष्मि के पति हैं
वैगुम वगै – जिस तरह से वें इस प्रपंच के हर चित और अचित जीवों के बाहर और अंदर व्यापित हैं (नारायण दिव्य नाम से यह अर्थ जुडा है )
अरिंदोर्क्कु – जिन्को इसकी ज्ञान है
एकान्तं इल्लै – उन्हें अकेलापन नहीं हैं
इरुळ इल्लै – नहीं ही है अंधकार
मोकांतर – “मोहांत तमसासवृत्त:” वचनानुसार साँसारिक विषयों से अँधा हुए लोगों को कुछ नज़र नहीं आता है और वे सोचते है कि
इव्विडम येकांतम इरुळ एन्ड्रु – यहाँ किसी के न होने के कारण, यह एक सूना जगह है
भयं अट्र इरुंदु – निर्भय रहेंगे और
सेयवारगळ ताम – और अपने अज्ञान के कारण , करते रहेंगें
पावत्तिरम – अधिक से अधिक पाप

सरल अनुवाद
इस पासुरम में मामुनि दो तरह के लोगों में अंतर कि विवरण देतें हैं। पहले गण के लोग सर्वत्र, प्रकाशमान श्रीमन नारायण को देखतें हैं। अत: इस तरह के व्यक्तियों का ऐसा समय ही नहीं होता है जब वे श्रीमन नारायण के सान्निध्य को महसूस नहीं करतें हैं। और परमात्मा के प्रकाशमय होने के कारण उन्को अंधकार भी दिखाई नहीं देतीं है। इसके विरुद्ध कई ऐसे जन हैं, जिन्को यह दृश्य नहीं हैं और जिन्हें लगता है कि वे अंधकार में अकेले हैं। इससे वे अनेक पाप करतें हैं जो ही उन्की अपकर्ष कि कारण बन जाति हैं।

स्पष्टीकरण
नम्माळ्वार तिरुवाय्मोळि १. १०.८ पासुरम में “सेल्व नारणन” दिव्य नाम का उपयोग किये। वें पेरिय पिराट्टि श्री महालक्ष्मि के दिव्य पति हैं। वे हर चित और अचित जीव के अंदर और बाहर व्यापित हैं। “नारायणन” दिव्य नाम का यहीं सारार्थ हैं। श्रीमन नारायण के सर्वव्यापी होने के इस कल्याण गुण कि ज्ञान कुछ व्यक्तियों को हैं। “नारायण परंज्योति:” (नारायण सूक्तं ४ ), “पगल कंडेन नारणनै कंडेन” (इरँडाम तिरुवन्दादि ८१), “अवन एन्नुळ तान अर वीट्रिरुंदान” (तिरुवाय्मोळि ८.७.३) जैसे पंक्तियों के अनुसार, इन व्यक्तियों को प्रकाशमान श्रीमन नारायण सर्वत्र दृश्य हैं। वें कभी अकेलापन और अंधकार महसूस नहीं करतें हैं। वे अपने जैसे मित्रों के समूह में ही रहते हैं। हमेशा अच्छे संगत में रहने के कारण वे निर्भय भी रहते हैं। “हृति नारायणं पश्यनाप्य कच्छत्रहस्ता यस्वतारधौछापि गोविन्दं तम उपास्महे” (विष्णु पुराणम) के अनुसार यह लोग कभी भी कहीं भी अंधकार नहीं देखतें हैं।
आगे प्रस्ताव किये गए व्यक्तियों के विपर्यय में “मोहान्तक” माने जाने लोग हैं। “मोहांत तमसा वृत्त:” के अनुसार इन लोगों के कथित अंधकार के कारण, इनमें आगे आने वाले विषयों को देखने कि सामर्थ्य नहीं हैं। इसको यतिराज विंशति के १२वे श्लोक में “अंतर बहिस सकल वस्तुषु संतमीसम अंद: पुरःस्थितमीवहमवीक्षमाण:” से विविरित किया गया है। अर्थात, श्रीमन नारायण, अनादि काल से निरंतर प्रकाशमान होते हुए, हर एक चित और अचित जीव के बाहर और अंदर एक समान व्यापित हैं। जो परमात्मा को अपने आन्तरिक आँखों से नहीं देखते, उनका अनुभव विपरीत होता है। उन्को किसी भी जगह में उपस्थित विषयों और लोगों को छोड़ केवल अंधकार ही दिखतीं है। इससे निर्भय होकर, वें “तस्यान्ति केत्वं व्रजिनं करोषि” के अनुसार अनेक पाप करतें हैं। मामुनि को एहसास होता हैं कि श्रीमन नारायण को न देखने वालोँ कि यही स्थिति है।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४१

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि कहतें हैं : “इरंगाय एतिरासा” . इससे ये माना जा सकता है कि मामुनि अपनि निराशा प्रकट कर रहें हैं।  परमपद पहुँचने कि इच्छा करने वाले को दो विषयाँ आवश्यक हैं १) वहाँ जाने कि इच्छा २) (इस भूमि पर) यहाँ रहने से द्वेष। इसी का सारांश है (श्री वचनभूषणम ४५८) “प्राप्य भूमियिल प्रावण्यमुम त्याज्य भूमियिल जिहासयुम” सूत्र। मामुनि को निराशा  हैं कि यह दोनों उनमें नहीं है। अत्यंत उदास होकर मामुनि सोच में पड़ते हैं कि इन दोनों गुण न होते हुए श्री रामानुज उन्को (मामुनि को) परमपद प्राप्ति कैसे दिलाएँगे।

पासुरम ४३

इन्द उलगिल पोरूंदामै  ऐदुमिल्लै

अंद उलगिल पोग आसैयिल्लै

इंद नमक्कु एप्पडियो  तान तरुवार एँदै  एतिरासर

ओप्पिल तिरुनाडु उगंदु

 

शब्दार्थ

ऐदुमिल्लै  – (मुझे) एक अणु  भी नहीं है

पोरूंदामै – दिलचस्पी कि अनुपस्तिथि  जो मुझे निकाल सकती है

इन्द उलगिल – इस क्रूर लोक (से) जिसको फेंकना है

आसैयिल्लै  – (और मुझे ) कोई दिलचस्पि नहीं

पोग – जाने में

अंद उलगिल – परमपद को , जो परम लक्ष्य है

इंद नमक्कु – ऐसे व्यक्ति (मैं ) के प्रति, जिसके पास यह दो आवश्यक गुण नहीं हैं।  

एप्पडियो तान  – किस उपाय से 

एँदै – मेरे पिताश्री

एतिरासर – एम्पेरुमानार (को)

तरुवार  – देंगे

उगंदु – संतोष से

तिरुनाडु – परमपदम

ओप्पिल – जो अद्वितीय है

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मामुनि कहतें हैं कि, परमपदम पहुँचने कि आवश्यक दो गुण उन्के पास नहीं हैं। वें कहतें हैं कि उनमें इस साँसारिक लोक के प्रति एक अणुमात्र द्वेष नहीं है और न ही परमपदम पहुँचने के लिए विशेश दिलचस्पी। वे सोचतें हैं कि ऐसे स्तिथि में उन्के पिता श्री रामानुज कैसे ख़ुशी से परमपदम कि प्राप्ति देँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “(तिरुवाय्मोळि ४.९.७)”कोडुवुलगम काट्टेल” के अनुसार कठोर और हटाने लायक इस सँसार में मेरी दिलचस्पी की कोई कमी नहीं हैं।  उसी समय (पेरिय तिरुमोळि ६.३.८)”वान उलगम तेळिंदे एन्ड्रैदुवदु” के अनुसार पहुँचने केलिए तरसने लायक जगह जो परमपदम हैं, वहाँ पहुँचने केलिए दिलचस्पी भी नहीं हैं। ऐसे स्तिथि में इस अद्वितीय परमपदम तक मेरे पिताश्री एम्पेरुमानार आनन्द से कैसे ले जाएँगे?

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४१

उपक्षेप

श्री रामानुज सोचने लगे, “हमारी  कितनि सौभाग्य है जो मामुनि जैसे “आकिंचन्यम” (उपहार के रूप में देने केलिए कुछ न हो) और “अनन्यगतित्वं” (कोई भी किस्म कि आश्रय न होना ) में अटल व्यक्ति को हम पाये। अति प्रसन्नता के सात मामुनि को आशीर्वाद के रूप में दिए जाने वाले वस्तुओँ कि सूची बनातें हैं।  मधुर और प्यारे गुणों से भरें मामुनि को श्री रामानुज आशीर्वाद कर रहें थे। उस समय, मामुनि “उंणिलाविय” (तिरुवाय्मोळी ७.१) पदिगम (दशक- दस पासूरम की समूह) कि अर्थ कि विवरण करके अपने “अनन्यगतित्वं” को और प्रकट किये। इस पदिगम में इन्द्रियों की विनाशकार शक्ति की अत्यंत विवरण की गयी है। मामुनि से यह सुनने के पश्चात श्री रामानुज उस स्तिथि पर पहुँच गए जहाँ उनको लगा कि मामुनि कि तुरंत रक्षा किये बिना वें जी नहीं सकतें।  

पासुरम ४२

आईंपुलंगळ मेलिटु अड़रूमपोलुदु अडियेन

उन पदंगळ तम्मै निनैत्तु ओलमिट्टाल

पिन्बु अवैताम एन्नै अड़रामल इरंगाय ऐतिरासा

उन्नै अल्लाल एनक्कु उंडो ?

शब्दार्थ

आईंपुलंगळ – (मेरे) पाँच इन्द्रियाँ

मेलिटु – मेरे ऊपर इतना दबाव डाल रहें है कि

अड़रूमपोलुदु – हर एक , मेरे ऊपर आक्रमण करके अपने भूख बुझाने को आदेश देता है

अडियेन – (उस समय) मैं , जो आपका निरंतर सेवक हूँ , मेरे स्वामि श्री रामानुज

निनैत्तु – के ऊपर ध्यान करूँगा ( जैसे गजेंद्र ने एम्पेरुमान के बारे में सोचा।  मगरमच्छ ने हाथी को पैर पकड़ कर नदी में खींचा , हाथी खुद को किनारे के ओर खींचा। ये १००० देव सालों तक चला ( एक मनुष्य साल , एक देव दिन के समान है ) इतने लम्बे समय के पश्चात , मगरमच्छ की शक्ति बड़ा और हाथी किनारे पर पकड़ खोने लगा।  हाथी को पानी से धरती पर शक्ति अधिक होने पर भी, इस जंग में ऊँचा हाथ होने के कारण मगरमच्छ हाथी को और पानी में खींचता गया। केवल हाथी की सूंड ही पानी के बाहर था। इस समय पर ही हाथी गजेंद्र को एहसास हुआ कि विरोधियों का विनाश करके जनरक्षन करने वाले श्रीमन नारायण ही उसकी रक्षा कर सकेंगें। गजेंद्र ने  “नारायणावो” करके सहाय कि पुकार किया और श्रीमन नारायण को तुरंत रक्षा करने कि प्रार्थना किया। इसी प्रकार मामुनि भी अपनी बेबसी की एहसास होते हुए, एकमात्र सहारा ,श्री रामानुज को पुकारतेँ हैं। )

उन – आपके

पदंगळ तम्मै  – चरण कमलों को

ओलमिट्टाल – (आपके चरण कमलों पर ध्यान करते हुए) अगर मैं आपको पुकारूँ, “रामानुजा”

एतिरासा – हे ! यतियों के नेता

पिन्बु – इसके पश्चात (आपके चरण कमलों पर ध्यान करते हुये आपके दिव्य नाम को पुकारने के पश्चात )

इरंगाय – कृपया आशीर्वाद करें

एन्नै – मुझें

अवैतम – कि, वे इन्द्रियाँ जो अधिक्तर हानिकारक हैं

अड़रामल – मेरे ऊपर न आक्रमण करें

उंडो ? – है कोई अन्य रक्षक? (आप ही एकमात्र सहारा हैं )

एनक्कु – मेरे लिए

उन्नै अल्लाल ? – आपसे अन्य कोई ?

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि कहतें हैं कि श्री रामानुज ही उन्के एकमात्र सहारा और रक्षक हैं।  अनेकों कठिनाईयों से पीड़ित सारे जनों के वे ही रक्षक हैं। अपने बेबसी कि एहसास होने पर श्रीमन नारायण को ही अपने रक्षक मानने वाले हाथी गजेंद्र से अपनी तुलना कर, मामुनि अपनी “अनन्यगतित्वं” कि स्थापना करतें हैं। इसी प्रकार मामुनि, श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों पर ध्यान करते हुए उनके दिव्य नाम को पुकारे , जो “आत्म-रक्षा” कि पुकार है।   

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं कि उन्के पाँचों इन्द्रियाँ उन्पर आक्रमण करके सारें दिशाओँ के ओर खींचते हैं। (पेरिय तिरुमोळि ७.७.९) “कोवै आइवर एन मेय कुड़ियेरि” पासुरम के अनुसार, हर एक इन्द्रिय मुझे सेवक बनाकर अपनी इच्छा पूर्ति केलिए उपयोग करती है।  हे मेरे स्वामि श्रीरामनुज! उस समय मैं,आपका नित्यदास, सहारे के लिए आपका दिव्य नाम पुकारा। यह, मगरमच्छ के पकड़ में फसे, पानी में खीचें गए बेसहारे हाथी, गजेन्द्राळवान के श्रीमन नारायण के दिव्य नाम के चिल्लाहट के जैसे है। पानी मगरमच्छ कि स्थान होने कि कारण, वहाँ मगरमच्छ कि शक्ति बढ़ती है।  यह “ग्राहम आकर्षते जले” वचन से स्पष्ट है। पानी में खींचे जाने पर, गजेंद्र ने ,(विष्णु धर्मं) “मनसा चिन्तयन हरिम” वचनानुसार श्रीमन नारायण पर ध्यान किया। हाथी ने “नारायणावो” पुकारा और मैंने सभी को सारे हानियों से रक्षा करने वाले आपको पुकारा।

मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आत्मा केलिए अत्यंत हानिकारक, मेरे पाँच इन्द्रियों के निमंत्रण से मुझे रक्षा करें।  हे साधुओँ के नेता ! आपसे अन्य कोई मेरी रक्षा कर सकता है क्या ? अत: आपको ही मेरि रक्षा करना है। “उन पदंगळ तम्मै निनैत्तु ओलमिट्ठाल” वचन का अर्थ ऐसे समझना चाहिए: श्री रामानुज को चरण कमलों को एकमात्र सहारा मानकर, उन पर ध्यान करते हुए , मामुनि श्री रामानुज के दिव्य तिरुनामम को जोर से पुकारे।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४१

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आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ४०

उपक्षेप

मामुनि के कल्पना में श्री रामानुज के एक और प्रश्न का उत्तर स्वरूप में यह पासुर है । श्री रामानुजार्य का प्रश्न है, “ आप मेरा सहारा माँगते हैं , किंतु स्वयं के पापों की जानकारी नहीं हैं । यह उपकार संभव है क्या?” मामुनि इसके उत्तर में कहतें हैं, “ स्वामी कृपया दया करें । प्रकृति संबंध के कारण मैंने अनेक पाप किये है । मुझसे बड़े पापी आप देख न पाएंगे । चित तथा उचित जीवों की रक्षा ही आपका अवतार रहस्य है । अत: कृपा बरसाने कि प्रार्थना करता हूँ ।   

पासुरम ४१

एनैप्पोल् पिळै सेयवार् इव्वुलगिल् उण्डो?

उनैप्पोल् पोरुक्कवल्लार् उण्डो?

अनैत्तुलगम् वाळप्पिरंद एतिरासा मामुनिवा  

ऐळैक्कु इरंगाय इनि

शब्दार्थ

इव्वुलगिल् उण्डो?  इस सारे सँसार में खोजने पर भी मिलेगा क्या

सेयवार्  –  जिन्होंने किया है

पिळै – पाप

एनैप्पोल्  –  मेरे जैसे

उनैप्पोल् – आपके जैसे हैं कोई?

पोरुक्कवल्लार् उण्डो? –  जो सहन करतें हैं (जनों के पापों को)?

एतिरासा  – जिन्का दिव्य नाम हैं, “ऐतिरासा” और

मा – पूजनीय हैं

मुनिवा – और योगियों में प्रथम तथा सर्वश्रेष्ठ हैं

पिरन्द – आपके अवतार की कारण है

अनैत्तुलगम्  – (सारें जन) सारें अँड चराचर  

वाळ  – का जीना ( मोक्ष के मार्ग प्राप्त करना)

इरंगाय इनि  – कृपया दया करें !

ऐळैक्कु –  प्रकृति सम्बंधित हर नीच विषय में इच्छा रखने वाले मुझ पर  

सरल अनुवाद

इस पासुर में मामुनि कहतें हैं कि उनसे बडा पापी नहीं हो सकता । इसी प्रकार, श्री रामानुज से अधिक, पापों को क्षमा कर स्वीकार करने वाले सहनशील व्यक्ति भी नहीं हो सकतें हैं । इसी सहनशीलता के विश्वास पर, मामुनि, श्री रामानुज को अपने अनेकों पापों को क्षमा कर आशीर्वाद करने की प्रार्थना करतें हैं। आगे, वें कहतें हैं कि श्री रामानुज के इस सँसार में अवतार का कारण ही लोगों का उत्थापन है । अत: मामुनि श्री रामानुज से मदद करने कि प्रार्थना करतें हैं।     

स्पष्टीकरण

रामानुज नूट्रन्दादि के ४८ वे पासुर के “निगरिंरि निँर एन् नीसदैक्कु” वचन, एक व्यक्ति का अप्रतिम नीचता को प्रकट करता है। मामुनि कहतें हैं कि, “मेरे समान पापी को अगर कोई ढूँढ़ने कि कोशिश करें तो वे खाली हाथ लौटेंगे।” मामुनि का मानना है कि दुनियाँ में उनके जैसा पापी कोई नहीं है।  उसी रामानुस नूट्रन्दादि पासुर में, एक और वचन है, “अरुळुक्कुम अहदे पुगल”. इसका अर्थ है, इस सारे सँसार में, पापों को झेलने कि सहनशीलता में श्री रामानुज अप्रतिम हैं। मामुनि आगे कहतें हैं, “हे एम्पेरुमानार! आप हमेशा सभी लोगों और चीज़ो को भव-बंधनों से छुटकारा दिलाने की राहों के विचार में हैं। विमुक्त कर सब को बेहतर बनाने के ही विचार में आप हैं।  यही आपके अवतार का कारण भी है। अत: आपसे विनती है कि इस गरीब (मन की कमज़ोर स्तिथि जिसमें वह देखने वाली सारें विषयों को चाहता है और अनुभव करना चाहता है , मन की यह स्तिथि “चपल” कहलाता है) पर कृपा करें।   

अडियेन् प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ४०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३९

पासुरम ४०

अवत्ते पोळुदाई अडियेन कळित्तु

इप्पवत्ते इरुक्कुम अदु पणबो ?

तिवत्ते यान सेरुम वगै अरुळाय सीरार ऐतिरासा

पोरुम इनि इव्वुडंबै पोक्कु

शब्दार्थ

अडियेन  – मैं, श्री रामानुज के नित्य दास

अवत्ते  कळित्तु  –  ऐसे ही व्यर्थ  किए

पोळुदाई  – वे सुनहरे पल जो श्री रामानुज के चरण कमलों में कैंकर्य करके बिताए जा सकते थे

पणबो? – (हे श्री रामानुज!) क्या आपके गुणों और कीर्ति के लायक होगा?

इरुक्कुम अदु  –  अगर मैं रहूँ

इप्पवत्ते – यह सँसार (जो आपके प्रति कैंकर्य केलिए) शत्रु हैं

सीरार ऐतिरासा  – हे यतिराजा ! शुभ गुणों से भरें

पोक्कु – नाश कीजिये

इनि इव्वुडंबै  – यह शरीर और

अरुळाय  – कृपया आशीर्वाद करें

यान – मुझें

सेरुम वगै – पहुँचे की मार्ग के संग

तिवत्ते  – परमपदं

पोरुम  – “सँसार” नामक इस कारागार में रहना काफि है

सरल अनुवाद

अपने स्वामि श्री रामानुज के कैंकर्य में न लगाए हुए व्यर्थ किये गए समय के लिए मामुनि अपना शोक प्रकट करतें हैं।  उन्हें ऐसा लगता है कि वे इस शरीर में इस साँसारिक लोक में लम्बे समय से हैं और श्री रामानुज से प्रार्थना करतें हैं कि वे इस शरीर को काटकर फैंक क्यों नहीं देते? मामुनि के मानना हैं कि इससे वे परमपद पहुँच पाएँगे, जिसके केलिए वे सदा तरस्ते हैं, और वहाँ श्री रामानुज के प्रति नित्य कैंकर्य कर पायेँगे।  

स्पष्टीकरण

मामुनि प्रस्ताव करतें करतें हैं, “ हे श्री रामानुज! आपकी सेवा लिए ही मेरा जन्म हुआ है।  किन्तु जो सुनहरे पल आपके प्रति कैंकर्य में बीते जा सकते थे, वे मैंने व्यर्थ किये।  मैं अभी भी इस सँसार में डूबा हुआ हूँ।  परन्तु इस सँसार में मेरा नित्य वास आपके कृपा के विरुद्ध है। अत: आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे परमपद की मार्ग दिखा कर आशीर्वाद करें, जहाँ आपके प्रति कैंकर्य कि मौकाये, अनेकों हैं। “परंदामम एन्नुम तिवं” से वर्णित इस जगह पहुँचने केलिए मैं अत्यंत बेचैन हूँ।  हे रामानुज, यतियों के नेता, शुभ गुणों से भरपूर आपसे प्रार्थना हैं कि आप इस सँसार में मेरा रहना रोखे।  अज्ञान का मूल तथा आपके प्रति नित्य  कैंकर्य का हानि जो यह शरीर, इस आत्मा के संग इस लोक में जीवित है, इसको नाश करने केलिए आपसे प्रार्थना है। आपके प्रति नित्य कैंकर्य ही सर्व श्रेष्ट लक्ष्य है और आपसे विनती है की आप मुझे वह आशीर्वाद करें।” इस पासुरम को इस प्रकार भी देखा जा सकता है : “अडियेन इप्पवत्ते इरुक्कुम अदु पणबो ?” इसका अर्थ यह होगा की मामुनि श्री रामानुज से पूछ रहे है की, क्या मेरा इस सँसार में रहना स्वाभाविक  है ?

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ३९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३८

उपक्षेप

यह पासुरम कुछ लोगों के प्रश्न कि मामुनि के उत्तर के रूप में है। लोग मामुनि से प्रश्न करतें हैं, “ हे मामुनि! पिछले पासुरम में आपने कहाँ कि, आपका मन श्री रामानुज के चरण कमलों से अन्य सारे विषयों के पीचे जाता है (“उन ताळ ओलिन्दवट्रये उगक्कुम”) . किंचित भी अच्छाईयों के बिना, नीच साँसारिक विषयों से प्रभावित आपको श्री रामानुज स्वीकार कैसे किये ? बंधनों के प्रभाव से दुर्गुणों से भरे आपको श्री रामानुज अनुमोदित कैसे किये  ? उत्तर देते हुए मामुनि कहतें हैं, “उन्के चरण कमलों को एकमात्र आश्रय मानकर शरणागति, श्री रामानुज मेरे संचित अशुभ गुणों को शुभ मानकर अनुमोदित  किये और संतोष से  भोग्य वस्तु के रूप में स्वीकार किये। आगे इसको एक उदाहरण के सात समझाते हैं।  

पासुरम ३९

वेम्बु करियाग विरुंबिनार कैत्तेनृ

ताम पुगडादे पुसिक्कुम तम्मैपोल

तीमबन इवन एनृ निनैत्तु एन्नै इगळार एतिरासर

अनृ अरिन्दू अंगीकरिक्कैयाल

शब्दार्थ

विरुंबिनार ताम  – जिन्मे रस है

वेम्बु  –  नीम(और नीम के पत्ते)

करियाग  –  अपने सब्ज़ी में

पुगडादे –  फेंकते नहीं है

कैत्तेनृ  – कड़वा समझ कर

पुसिक्कुम  – अत्यंत रस से खाते हैं

तम्मैपोल  – यह उन लोगों की गुण हैं

(इसी प्रकार)

एतिरासर  – एम्पेरुमानार

इगळार – मुझें नहीं फेंकेंगे

निनैत्तु  – यह सोच कर कि

एन्नै  – मैं   (मामुनि)

तीमबन इवन एनृ  –  पापी है

अनृ  – उस दिन  जब मैं  उन्से शरणागति किया

अरिन्दू  – यह जान्ते हुए भी कि मैं पापि हूँ

अंगीकरिक्कैयाल  –  मेरे पापों को अपने भोग्य वस्तु मानकर मुझे अनुमोदित किये

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि श्री रामानुज के वात्सल्य के गुणगान करते हुए कहतें हैं कि वे मामुनि के पापों को भी भोग्य वस्तु समझ अपनायें।  इस्को समझाने केलिए मामुनि नीम कि उदाहरण देतें हैं जिस्को कुछ लोग अत्यंत रस से ख़ाते हैं।  

स्पष्टीकरण

तिरुमळीसै आळ्वार के नान्मुगन तिरुवन्दादि ९४वे पासुरम के “वेम्बुं करियागुमेनृ” के अनुसार, ऐसे भी लोग हैं जो नीम तथा नीम के पत्तों को सब्ज़ी के रूप में खातें हैं।  इस पासुरम के सहायता से मामुनि इस विषय कि विवरण देतें हैं। कहतें हैं कि, “ कुछ लोग हैं जो मीठाइ पसंद नहीं करतें हैं। ये जानते हुए, अपने पसंद के कारण, अत्यंत आनंद और  रुचि के सात, नीम के जैसे कड़वी वस्तु अपने भोजन में , खातें हैं। इसी प्रकार मेरे शरणागति करते वक्त, श्री रामानुज को मेरे सारें पापों कि जानकारी होते हुए भी, वे मुझे इंकार करने कि बजाय, उन्हीं पापों को भोग्य वस्तु समझ मुझे स्वीकार किये।”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ३८

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३७

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि “इन्रळवुम इल्लाद अधिकारं” वचन का प्रयोग किए। पासुरम में वे इस वचन कि विश्लेषण , तर्क और कारण विवरण के संग करतें हैं।  

पासुरम ३८

अंजिल अरियादार  अयबदिलुम ताम अरियार

एन्सोल एनक्को ऐतिरासा! – नेंजम

उन ताल ओळींदवट्रये उगक्क इनृम

अनुतापम अट्रू इरुक्कैयाल

शब्दार्थ

ऐतिरासा! – एम्पेरुमानारे

नेंजम – ह्रदय जो नीच विषयों में मग्न है

उगक्क  – तरसता है

ओळींदवट्रये  – उन विषयों केलिए जो हैं सीमा पार

उन – आप्के, जो हैं हमारे नित्य स्वामि तथा लक्ष्य और

ताळ – आप्के चरण कमलों के, जो असीमित आनंद कि मूल हैं

इनृम – अब भी

इरुक्कैयाल  – मै हूँ

अट्रू – बिना कोई

अनुतापम  –  नीच विषयों के मोह में घिरने कि पश्चात्ताप के बिना

एन्सोल  – प्रसिद्द कहावत जो कहता है कि

अरियादार – जो अन्जान हैं

अंजिल – पाँच साल के अम्र में , जब मनुष्यों में अक्ल वृद्धि होती है

अयबदिलुम – पछास साल के उम्र में भी

ताम अरियार – नहीं समझेँगे

एनक्को – यह कहावत मेरे लिए ही जन्मा क्या ?

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि एक प्रसिद्द कहावत कि उद्धरण देतें हैं जो है, “ जो व्यक्ति  पाँच साल के उम्र में न सीख पाता है, वह पचास साल के उम्र में भी न सीख पायेगा। आगे कहतें हैं कि उन्का मन नीच साँसारिक विषयों में मग्न है और इस बात की पश्चात्ताप भी न करता।  सँसार के अंधकार और अज्ञान से रक्षा माँग कर वे श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागति करतें हैं।   

स्पष्टीकरण

मामुनि कहते हैं, हे यतियों के नेता ! मेरा मन (तिरुवाय्मोळि २.७.८) के “तीमणम” वचनानुसार, नीच साँसारिक साँसारिक विषयों में मग्न है और (तिरुविरुत्तम ९५) के “यादानुम पट्री नीँगुम” वचनानुसार, सदा इन्मे उलझीं है। आपके चरण कमलों पर ही धारणा बढ़ाने के बजाय यह मन अन्य नीच सुखों के ही पीछे है।  इन अल्प सुखों को ही लक्ष्य समझ इन्हीं के पीछे जाती है और इस व्यवहार की पश्चात्ताप तक नहीं करती है। “तस्मात् बाल्ये विवेकात्मा” वचनानुसार यह माना जाता है कि ,पाँच साल के अम्र में ,मनुष्य को सही गलत की पहचान आ जाता है। अगर उस उम्र में यह ज्ञान न हुआ तब पचास में भी न आएगा। सालों से प्रसिद्द यह कहावत शायद मेरे लिए ही जन्मा होगा। अच्छाई ज्ञान न होते हुए मैं प्रार्थना करता हूँ कि सर्वज्ञ, मेरे स्वामी, आप ही मुझे मार्ग दिखाएं। “नेंजमुम तानोलिन्दवट्रये उगक्कुम” . इस्का ऐसे भी अर्थ निकाला जा सकता है कि मामुनि के कहना है के, “अगर एक व्यक्ति पाँच में न सीखा तो पचास में भी न सीखेगा। अफ़सोस! मुझे आज भी साँसारिक सुखों के पीछा करने की पश्चात्ताप नहीं है और इसी कारण आपके चरण कमलों (जो सर्वोत्तम लक्ष्य हैं) के बजाय मन अन्य वस्तुओँ केलिए तरसता है।”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – ३७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर ३६

उपक्षेप

वरवरमुनि कल्पना कर रहें हैं कि श्री रामानुज स्वामी उन्हे कुछ बता रहे हैं । यह पासुर, श्री रामानुज स्वामी की यह सोच, का उत्तर स्वरूप है । श्री रामानुज स्वामी कहतें हैं , “हे ! वरवरमुनि ! आप इन्द्रियों के बुरे असर से डरे हुए हैं । चिंता न करें । इन्द्रियों  और पापों के प्रभाव से मैं आपकी रक्षा करूंगा । किन्तु इस सांसारिक लोक में आपको रखने का कारण यह हैं – “ आर्ति अधिकार पूर्तिकेन्नूमदु मुख्यं ”, वचन के अनुसार आर्ति (स्वारस्य) और अधिकार (मुक्त होकर परमपद पधारने कि योग्यता) पाने पर मैं निश्चित आपको परमपद पहुँचाऊँगा । तब तक आपको यहाँ रहना हैं । उत्तर में वरवरमुनि कहते हैं, “ हे ! श्री रामानुज स्वामी ! अब तक मेरी कोई भी योग्यता नहीं रहीं हैं । भविष्य में क्या योग्यता आएगी ? आप स्वयं इन योग्यताओं को मुझमें क्यों उत्पन्न नहीं करतें ? परमपद तक पहुँचने में आने वाले विरोधियों का नाश कर, आप ही मुझे योग्य क्यों नहीं बनातें ?

पासुर ३७

इन्रळवुम् इल्लाद अधिकारम् मेलुम् एनक्कू

एनृ उळदाम् सोल्लाय् एतिरासा

कुन्रा विनैत्तोडरै वेट्टिविट्टु मेलै वैकुंतत्तु

एन्नै कडुग येट्राददु येन् ?  

शब्दार्थ

सोल्लाय  – (हे एम्पेरुमानार) कृपया यह बतायें

इन्रळवुम् – अब तक

इल्लाद अधिकारम् – (परमपद जाने कि मेरे पास) योग्यता नहीं है

मेलुम् – (इस स्तिथि में) अब से

एनक्कु  – मेरे  लिए

एनृ उळदाम् – कब होगा ? होगा क्या? (इतने जन्मों से न होने के कारण) मुझे कब परमपद पहुँचने की योग्यता मिलेगी क्या?

ऐतिरासा – हे एम्पेरुमानार !

येन् ?-  क्यों आप

कडुग एन्नै येट्राददु – शीग्र मुझे ले न जाते

मेलै  – सर्वश्रेष्ठ

वैकुंतत्तु – परमपद तक

वेट्टिविटु – काटकर निकालें  

कुन्रा  –  न घटने वाले

विनैत्तोडरै – पापों के बंधन को

सरल अनुवाद

इस पासुर में वरवरमुनि, (इन) अघटित पापों का संग्रह को नाश न करने का कारण, श्री रामानुज स्वामी से पूँछते हैं । परमपद तक शीग्रता से न ले जाने का भी कारण पूँछते हैं। वरवरमुनि का मानना हैं कि, अगर योग्यता ही कारण है तो उन्हें परमपद पहुँचने कि योग्यता कभी भी नहीं थीं और नहीं मिलने वाली हैं । वरवरमुनि श्री रामानुज स्वामी से प्रश्न करतें हैं कि भविष्य में यह योग्यता कैसे प्राप्त किया जा सकता हैं ?

स्पष्टीकरण

वरवरमुनि कहतें हैं, इनृ तिरुनाडुमेनक्करुळाय् वचनानुसार, अब तक अनुपस्थित (परमपद पधारने कि) योग्यता भविष्य में कैसे आएगा ? हे रामानुज ! तोलमावलविनै तोडर्  के अनुसार मेरे पापों के बंधन घटते नहीं और परमपद प्राप्ति के पथ में विघ्न हैं । इन पापों को नाश कर, मेलै वैकुंतत्तिरुत्तुम (तिरुवाय्मोळी ८.६.११) से वर्णित परमपद जिसमें मुझे अत्यंत स्वारस्य (आर्ति) है, वहाँ क्यों नहीं ले जातें? अज्ञान से पीड़ित इस लोक से आप मुझे तुरंत क्यों नहीं ले जाते ? इस विषय में दुर्बल हूँ और आप ही नियंता हैं? फिर भी आप यह कार्य क्यों नहीं करतें ?

अडियेन् प्रीती रामानुज दासी

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