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आर्ति प्रबंधं – ३०

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २९

 

उपक्षेप

इस पासुरम में श्री रामानुज के चरण कमलों से प्रारंभित, उनके सिर तक उन्के श्रेय की मंगळम गाते हैं मणवाळ मामुनि ।  . मणवाळ मामुनि को लगता है कि अन्य धर्मों के जनों के सात बहुत वाद करने से श्री रामानुज थक चुके होंगें। श्री रामानुज को मामुनि ,हाथों में श्री भाष्य और तिरुवाय्मोळि के संग विराजमान चित्रित करतें हैं। यह अति विशेष मुद्रा मणवाळ मामुनि के कल्पना की उत्साह बढ़ाती है, अतः वें श्री रामानुज के हर अंग के श्रेय की मंगळम गाते हैं और चाहतें हैं कि वें सारे नित्य रहें।     

पासुरम ३०

सीरारुम एतिरासर तिरुवडिगळ वाळी
तिरूवरैयिल साट्रीय सेंतुवराडै वाळी
ऐरारुम सेय्यवडिवु एप्पोळूदुम वाळी
इलंगीय मुन्नूल वाळी इणयतोळगळ वाळी
सोराद तुयय सेय्य मुगच्चोदि वाळी
तूमुरुवल वाळी तुणयमलरकणगळ वाळी
इरारु तिरुनामम अणिन्द एळील वाळी
इनितिरुपोडु येळील ज्ञान मुत्तिरै वाळिये!!

शब्दार्थ

वाळी – नित्य जिए !!
ऐतिरासर – श्री रामानुज के
तिरुवडिगळ – चरण कमल जो हमारे सिर की भूषण और भोग की वस्तु
सीर आरुम – शुभ लक्षणों से भरपूर है
वाळी – नित्य जिए !!!
सेंतुवराडै – काषाय वस्त्र( जो सन्यासियाँ पहनतें हैं), जो प्रज्वलित सूर्य के रंग का है
साट्रीय – जो श्री रामानुज पहनतें हैं
तिरूवरैयिल – उन्के कटि/ कमर
वाळी – नित्य जिए !!!
एप्पोळूदुम – हर समय
सेय्यवडिवु – दिव्य शरीर (दिव्य मंगळ विग्रहं) जो तेजोमय है
येरारुम – सौन्दर्यता से भरपूर
वाळी – नित्य जिए !!!
इलंगीय मुन्नूल – पवित्र धागा/सूत्र जो स्थापित करता है कि वें वेदों के सर्व श्रेष्ट विद्यार्थी थे
वाळी – नित्य जिए !!!
इणयतोळगळ – कँधे जो १) सुनहरे करपग वृक्ष के जैसे २) मोक्ष दायी ३) बंधनों से विमुक्त करने वाले ४) बेसहारे को सहारा देनेवाला तथा मोक्ष देने वाला और इस कारण स्वस्थ दिखने वाले ५ ) सुगन्धित “तुळसी” माला को अलंकृत करते हैं।
वाळी – नित्य जिए !!!
सोराद तुयय सेय्य मुगच्चोदि – श्री रामानुज की तेजस असीमित हैं, पवित्र और तेजोमय है।  इसके कारण है १) श्रीमन नारायण और उन्के भक्तों को देखने पर ख़ुशी २) अभक्तों के वादों को नाश करना
वाळी – नित्य जिए !!!
तूमुरुवल – खिलते फूल के तरह मंद स्मित, हल्की मुस्कराहट। इस मुस्कराहट का कारण है १) आश्रित रक्षण २) एम्पेरुमान के संगत का भोग
वाळी – नित्य जिए !!!
तुणयमलरकणगळ – सुन्दर नेत्र जिन्को दृश्य है १) श्रीरंगश्री (पेरिय पेरुमाळ) २) श्री रामानुज से सुधारे गए श्री वैष्णवश्री (श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागत किये सँसार के सर्वत्र ). अपने आश्रितों के प्रति अत्यंत कृपा से देखने वाले नेत्र, जिसके झलक से शरणागत पवित्र हो जाते हैं।
वाळी – नित्य जिए !!!
इरारु तिरुनामम अणिन्द एळील – तेजस्वी गुलाबी शरीर में ,बारह दिव्य “तिरुमण काप्पु” या “ऊर्ध्व पुण्ड्र” . यह सोने पर्वत (श्री रामानुज के शरीर) में सफ़ेद कमल (तिरुमण काप्पु ) के जैसे है। ये तिरुमण काप्पु श्री रामानुज के उल्लेखित गुणों की आविर्भाव है और निश्चित करता है कि “श्रीवैष्णवश्री” फैले।
वाळी – नित्य जिए !!!
ज्ञान मुत्तिरै – “पर तत्व” के विषय में उपदेश देते हुए श्री रामानुज की मुद्र
इनितिरुप्पोडु – सौम्य रूप में विराजमान (संसारियों को ज्ञान अनुग्रह करने से तृप्त और संतुष्ट हैं )
एळील – अति सुन्दर ( यह मुद्र संस्कृत और तमिळ वेदों के साराँश है)

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मणवाळ मामुनि श्री रामानुज की मंगळासासनम करते हैं। उन्के दिव्य चरण कलमों से प्रारंभित काषाय वस्त्र, उन्की शरीर, उन्की ब्रह्म सूत्र, शक्तिमान कंधे, सौंदर्य मुस्कान, कारुण्य नेत्र, उन्की “तिरुमण काप्पु” और अंत में ज्ञान मुद्र जिसमें वें अपने भक्तों के मध्य विराजमान हैं।

स्पष्टीकरण

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज के श्रेय( मंगळासासनम) गाते हैं।  श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों की श्रेय से शुरू करतें हैं और चाहते हैं कि वें नित्य रहें। स्वरूप, रूप और उन्के भक्तों को उद्देश्य और अत्यंत प्रीय गुणों से भरपूर श्री रामानुज यतियों के नेता हैं।  (तिरुक्कुरुंधानडगम ६) के “अमरर सेंनिप्पू” और (रामानुस नूट्रन्दादि१ ) के “ईरामानुसन अडि पू” के अनुसार श्री रामानुज के चरण कमल हमारें सिर के भूषण के रूप में भोग्य हैं। ऐसे चरण कमल नित्य रहें। अब श्री रामानुज के दिव्य मंगळ शरीर को अलंकृत करने वाले काषाय वस्त्र के श्रेय गाते हैं। इस विशेष वस्त्र की भी नित्य रहन चाहतें हैं। काषाय वस्त्र की २ विवरण यहाँ दी गयी है। (१) श्री वचन भूषणम के २४० चूर्णिकै “आरु प्रकारत्ताले परिसुद्धात्मा स्वरूपत्तुक्कु तत्साम्यं उनडायिरुक्कुम” के अनुसार सारे जीवात्मा अपने सच्चे स्वरूप की ज्ञान होने पर पेरिय पिराट्टी के समान हैं।  जीवात्मा के ६  गुण विशेषण हैं  १) अननयार्ह शेषत्व: श्रीमन नारायण से अन्य किसी का दास न रहना।  (२) “अनन्य शरणत्वं”: श्रीमन नारायण  से अन्य किसी के आश्रय न लेना (३) “अनन्य भोगत्वं” : श्रीमन नारायण से अन्य किसी की भोग्य -पात्र न बनना।  (४) संस्लेषत्तिल दरिक्कै: श्रीमन नारायण के मिलन में ही जीवित रहना (५) विस्लेशत्तील दरियामै: श्रीमन नारायण से अलग जीवन को न सहना (६) तदेक निर्वाह्यत्वं: श्रीमन नारायण से ही नियंत्रण किए जाना। उल्लेखित ६ गुण विशेषणों की परिचय होनें पर, जीवात्मा  श्रीमन नारायण के कृपा से, नायकी लक्षण के प्रतीक पेरिय पिराट्टी के समान है। काषाय वस्त्र का दूसरा विवरण “सीताकाषायवासिनी” वचन से है। इन दो सूचनाओँ से तुल्य है कि काषाय “पारतंत्र्य” (आचार्य पर निर्भर रहना और प्रश्न किये बिना आज्ञा  मानना) और “अनन्यारहत्वं” (जीवात्मा केवल श्रीमन नारायण का होना )  को प्रकट करता है। रँग में सूर्य के समान, श्री रामानुज के देह को अलंकृत करने वाले इस सुँदर काषाय वस्त्र को मामुनि यहाँ विवरित करतें हैं।  इसके बाद, श्री रामानुज के दिव्य मंगळ विग्रह (दिव्य शरीर) के श्रेय गाते हैं। मामुनि कहतें हैं कि श्री रामानुज की दिव्य शरीर आश्रुतों को प्रीय है। उन्के हर अंग अत्यंत सौंदर्य प्रकट करती हैं। उन्के मुखाकृति निर्मल फूल के जैसे कोमल और मृदुल है।  “रूपमेवास्यै तन महिमान मासशटे” के अनुसार श्री रामानुज के दिव्य शरीर प्रकाशमान हैं, परमात्मा श्रीमन नारायण, अंदर अन्तर्यामी के रूप में तेजोमय होने के कारण। “नित्यं नित्या कृतितरम” शास्त्र वचन के अनुसार यह दिव्य मंगळ रूप सदा रहें, ऐसे मंगळासासनं करते हैं मामुनि। अब मामुनि श्री रामानुज के पवित्र धागें/ जनेयू (तीन धागे) की श्रेय गाते हैं ,जो स्थापित करती है कि वें वेदिक ग्रंथों की अनुयायी हैं और उस्की सतर्क पालन करतें हैं।  श्री रामानुज की पवित्र धागा शाम के आसमान में चाँदी म्यान के जैसे है।  नित्य काल तक जिए ऐसे पवित्र धागें। आगे , श्री रामानुज के सुँदर कंधों की मंगळासासन करतें हैं। “भाहुच्छायमव अष्टबधोस्यपलको माहातमन:” वचनानुसार श्री रामानुज के कंधे सुनहरें करपग वृक्ष के शाखाओँ के तरह अपने नीचे उपस्थित लोगों को छाँव, आश्रय और आश्वासन देता है।  ये कंधे किसी को भी मोक्ष दिला सकतें हैं। ये  सँसार के नीच को भी मुक्ति दिला सकते हैं।  जनों की रक्षा करने वालें यह कंधे इस कारण चौड़े हैं। ज्ञान सारम के पासुरम ७ के “तोळार चुडरत्तिगिरी संगुडय सुंदरनुक्खु” के अनुसार, श्री रामानुज के कंधे शक्तिमान हैं।  तुळसी, वगळा और नळीनाक्ष पुष्पों के हार से ये कंधे अलंकृत हैं।ऐसे अद्वितीय कंधे नित्य जिए, यह मामुनि की मंगळासासन हैं। अब श्री रामानुज के दिव्य मुख-मंडल की मंगळासासनम करने लगते हैं।  “ब्रह्मविद इव सौम्यते मुखम पादि” और (तिरुवाय्मोळी ३.१.१) “मुगच्चोदि मलर्नददुवो” के अनुसार श्री रामानुज की तेजस असीमित, पवित्र और दीप्तिमान  है। श्रीमन नारायण और उन्के भक्तों को देखने से आने वाली सुख और अभक्तों के वाद को नाश करना ही तेजस की कारण है।   

इस्के पश्चात श्री रामानुज के सुंदर मुस्कान की श्रेय गाते हैं।  “सा विलासस स्मिताधारम भिप्राणम मुख पंकजम” के अनुसार श्री रामानुज के मुख एक सुंदर कमल से तुल्ना की जाती है। इस कमल मुख में एक सुन्दर मंदस्मित आती है, आळ्वार के “निन  पाल निला मुत्तम तवळ कदिर मुरुवल सैदु” (तिरुवाय्मोळि ९.२.५ ) के अनुसार। चंद्र के शीतल हॅसी के समान खिलते पुष्प जैसे यह सुँदर मुस्कान और उल्लेखित ख़ुशी सदा रहें।  श्री रामानुज के दिव्य नेत्र, श्री रंगनाथ और श्री वैष्णवश्री से मिलकर सुधरकर अपनाए गए सर्वों  को सदा दर्शन करतें हैं।  ये नेत्र सदा संगी जनों के प्रति कृपा प्रकट करती हैं। “अमलंगळाग विळीक्कुम” (तिरुवाईमोळी १. ९. ९ ) के अनुसार इन नेत्रों के अनुग्रह से  अश्रुतो के अज्ञान नाश होती है। ये अध्बुध नेत्र सदा रहें, यह मामुनि की चाहत है और उन्के  मंगळासासनं करतें हैं। अब मामुनि, श्री रामानुज के  “तिरुमण काप्पु” (द्वादश ऊर्ध्व पूर्णं) धारण के सौंदर्यता की श्रेय गाते हैं। पासुरम के पूर्व वाक्यों में उल्लेखित गुणों के प्रतिबिम्ब ये “तिरुमण काप्पु”,सुनहरें पहाड़ पर खिले सफ़ेद कमल के समान है। श्री रामानुज की देह लाल-पीली तेजस के संग दृश्य होती हैं, और उस पर “तिरुमण काप्पु” प्रकाशित है। मामुनि चाहते हैं कि यह सौंदर्यता सदा रहें। अंत मे, श्री रामानुज के उंगलियों के मुद्र की श्रेय गातें हैं और मंगळासासन करते है कि ये सदा जिए। श्रीमन नारायण के इच्छा पूर्ती के हेतु श्री रामानुज इस सँसार में आये और भक्तों और प्रतिद्वंदियों को एक समान श्रीमन नारायण के निर्हेतुक कृपा के कारण अपनाएँ।  ये सर्वत्र करने के पश्चात (तिरुवाय्मोळि ४. ३. ११) के “वैयम मन्नी वीट्रीरुंदु” के अनुसार वें राज हँस के जैसे घंभीरता से विराजें हैं। आचार्य सामान्य रूप में, विषयों में अंतर कर पाने से हँस से समानित किए जातें हैं। (पेरिय तिरुमोळि ११. ४.८ ) “अन्नमदाय इरुन्दगु अर नूल उरैत्त” से तिरुमँगै आळ्वार यही विषय प्रकट करतें हैं। (परांकुशाषट्कम) “पद्मासनोपविष्टं पादद्वोपोदमुद्रम” वर्णनानुसार, आचार्यों के नेता श्री रामानुज ज्ञान मुद्र में, पद्मासन में विराजमान, अपने भक्तों के मध्य, गंभीर दृश्य हैं। “श्रीमत तदंगरीयुगळं” में “श्री” के उपयोग के समान, इस पासुरम में “सीरारुम”, चरण कमलो (तिरुवडिगळ) की विशेषण के रूप में है।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २९

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २८

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उपक्षेप

परमपद के पथ में आनेवाली बाधाओँ से रक्षण जिन्की आशीर्वाद से साध्य है उन श्री रामानुज के जयों के श्रेय, मणवाळ मामुनि इस पासुरम में गाते हैं। वेदों को तिरस्कार करने वाले तथा वेदों की अर्थों को अनर्थ प्रकट करने वालों की पराजय श्री रामानुज अपने श्रीभाष्य जैसे ग्रंथों से करते हैं। श्री रामानुज के जयों की प्रशंसा कर उन्की मँगळं भी गाते हैं।   

पासुरम २९

चारुवाग मदनीरु सैदु समण छेडीक्कनल कोळूतिये
साक्कियकडलै वट्रवित्तु मिगुसांकिय किरि मुरित्तिड
मारु सेयदिडु कणाद वादियगळ वाय तगर्थु अरमिगुत्तु मेल
वंद पासुपदर सिंदियोडुम वगै वादु सैद ऐतिरासनार
कूरुम माकुरु मदत्तोडु कुमारिलन मदम अवट्रिन मेल
कोडिय तर्क चरम विट्टपिन कुरुगिय मायावादियरै वेन्रीड
मीरि वादिल वरु पार्करन मदविलक्कडि कोडियेरिंदु पोय
मिक्क यादव मदतै मायत्त पेरुवीरर नाळूम मिग वाळिये !!!

शब्दार्थ

चारुवाग मदनीरु सैदु – “प्रत्यक्षमेकं चार्वाक:” अर्थात चार्वाक सिध्दांत को मानने वाले दृश्य विषयों को ही मानेँगे। इस “चारुवाग” धर्म को श्री रामानुज ने भस्म किया।
समण छेडीक्कनल कोळूतिये – “समण” याने जैन धर्म नामक अपतृण को जलाया
साक्कियकडलै वट्रवित्तु – “साक्कियम” (बौद्ध) धर्म नामक सागर को अपने ग्रंथों के प्रभाव से सुखाया
मिगुसांकिय किरि मुरित्तिड – श्री रामानुज “सांख्य” धर्म को नाश किये ( अधिकतर उपस्थिति के कारण यह पहाड़ कहलाया गया है )
तगर्थु – अपने वाद से नाश किये
वाय- प्रस्तुत ,वाद
मारु सेयदिडु कणाद वादियगळ – “काणाद वादिगळ” नामक गण के तरफ से प्रति वाद के रूप में
अरमिगुत्तु मेल वंद – धर्म सुसंथापित किए , और लगातार आने वाले (हमलों )
पासुपदर सिंदियोडुम वगै – अपने जीवन रक्षण की हेतु अपने कुटुंब के संग दौड़ने वाले रूद्र के जैसे उन्के भक्त “शिवसमयिगळ” भी भगाये गए
वादु सैद ऐतिरासनार – ऐतिरासन के वाद से
कोडिय तर्क चरम विट्टपिन अवट्रिन मेल – (श्री रामानुज)  “तर्क”( सामान्य ज्ञान जैसे तरीखों से वाद करना) के तीरों से हमला कर और  नाश किए
कूरुम – अज्ञानी वाद
मा – अनेकों
कुरु मदत्तोडु – “प्रभाकर मथ” नामक सिद्धांत
कुमारिलन मदम – और “भट्ट मथ” नामक सिद्धांत
कुरुगिय मायावादियरै वेन्रीड – “मायावाद” सिद्धांत के लोगों के स्थान में जा उन्के वादों को जय किये।
पार्करन मदविलक्कडि कोडियेरिंदु पोय  – “भास्कर” सिद्धांत के लोगो के वादों को हिलाकर उखड़े, और उन्को फ़ेंक कर आगे बड़े।
मीरी वादिल वरुम – यही “भास्कर” सिद्धांत के जन अत्यंत घमंड के सात श्री रामानुज से वाद करने आए।
मिक्क यादव मदतै मायत्त – (भास्कर सिद्धांत को पराजित कर, श्री रामानुज) “यादवप्रकाश”सिद्धांत, जिसके अधिक अनुयायी थे ,उसको नाश किए।
नाळूम मिग वाळिये  – जय हो !
पेरुवीरर – अद्वितीय साहसनीय और विरोधियों को पराजित करने वाले एम्पेरुमानार

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि , श्री रामानुज के विजयों की उत्सव मनाते हैं।  उस समय प्रचलित और प्रसिद्द सिद्धांतों की मामुनि सूची देते हैं। “चारुवाक”, “समणम” , “साख्यं”, “सांख्यं”, “काणावादि”, “पाशुपत”, “प्रभाकर”, “भाट्ट”, “मायावाद” और “यादव” आदि धर्मों को पराजित करने वाले श्री रामानुज को मणवाळ मामुनि प्रशंसा करते हैं। और प्रतिदिन, श्री रामानुज को अनेकों विजयों प्राप्त होने  केलिए मणवाळ मामुनि मंगळम गाते हैं।     

स्पष्टीकरण

चारुवाक धर्म की आधारिक तत्व है “प्रत्यक्षमेव चार्वाक:” अर्थात आँखों से दिखने वाले विषयों को ही माननेवाले। यह वाद श्री रामानुज के वाक् चातुर्य के किरणों से भस्म हो गया। “समणम” (जैन) नामक धर्म पर आग लगाए।  “साख्य” धर्म के सागर को अपने वादों से सुखायें। “सांख्य” नामक धर्म अधिकतर फैला हुआ था।  इसी कारण वह पहाड़ समानित की जाता था।  किंतु श्री रामानुज अपने वज्रायुद के समान वादों से नाश किये। “काणाद वादिगळ” नामक धर्म के लोग प्रतिवाद के लिए प्रसिद्द थे। इन्को अपने प्रतिवाद से हराये।  

“पाशुपतर” नामक एक गण था। इस गण के जन श्री रामानुज से वाद कर उन्हें पराजित करना चाहे।  किंतु श्री रामानुज के वाद के कारण ये भागे।  बाणासुर से श्री कृष्ण के युद्ध के समय ऐसे ही रूद्र और उन्के परिवार भागे।”प्रभाकर “ और “ भाट्ट” धर्मों के वादों के सामने श्री रामानुज अपने शक्तिमान वादों को बाणों की तरह प्रयोग किये।   इसके पश्चात श्री रामानुज “ मायावाद” धर्म के लोगों के स्थल तक गए। “वादिल वेनरान नममिरामानुसन” (ईरामानुस नूट्रन्दादि ५८) के अनुसार इन मायावादियों को श्री रामानुज अपने वादों से पराजित किये। “भास्कर” धर्म के लोग श्री रामानुज से वाद करने आये। श्री रामानुज पराजित ही नहीं किये ,बल्के यह निश्चित किये कि उस पथ में कभी कोई न जाए। “यादव” धर्म के अनेकों अनुयायी थे जो श्री रामानुज के  पराजय को ही एकमात्र लक्ष्य समझकर आये। पर उस धर्म कि भी, कोई भी  निशानी के बिना श्री रामानुज नाश किये।   

मणवाळ मामुनि चाहते हैं कि श्री रामानुज के ये वीर साहस( अन्य धर्मों की नाश ) प्रतिदिन प्रचलित रहें।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २८

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आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २७

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उपक्षेप

नेक और ज्ञान संबन्धित कार्यो में व्यस्त रहने पर भी परमपद की रुचि या इच्छा मणवाळ मामुनि के मन में श्री रामानुज के अनुग्रह से ही उत्पन्न हुई।  श्री रामानुज के इस अत्यंत कृपा को मणवाळ मामुनि इस पासुरम में प्रशंसा करते हैं।  

पासुरम

पण्डु पलवायिरम पारुलगोरुय्य
परिवुडने सेय्दरुळुम पल्कलैगळ तम्मै
कण्डदेल्लाम एळुदि अवै कट्रिरुंदुम पिरर्क्कु
कादलुडन करपित्तुम कालत्तै कळित्तेन
पुणडरीगै केळ्वनुरै पोन्नुलगु तन्निल
पोग निनैवु ओन्रुमिन्रि पोरुन्दि इंगे इरुन्देन
एण्डिसैयुम एत्तुम एतिरासन अरुळाले
एळिल विसुम्बेयन्रि इप्पोदेन मनम एण्णादे

शब्दार्थ

पण्डु –  पिछले काल में
कालत्तै कळित्तेन – मैंने जीवन बिताई
कादलुडन – प्रेम से
कर्पित्तुम – प्रचार कर/ सिखा कर
पिरर्क्कु  – दूसरों को
अवै कट्रिरुंदुम – अपने आचार्य से जो मैंने सीखा
कणडदेल्लाम – मेरे दृश्य में आने वाले ग्रंथों में उपस्थित सारा ज्ञान
एळुदि – जो सीखा उस्के विषय में लिखा
पल्कलैगळ तम्मै – अनेकों ग्रंथों
सेय्दरुळुम – अनुग्रह किये गए है
पलवायिरम – “आत्मा की प्रगति एवं उन्नति” की विषय में हमेशा ध्यान देने वाले आचार्यो से
परिवुडने – कृपा से चेतनों को दिए, इसलिए
पारुलगोरुय्य – कि चेतनों को साँसारिक बंधनों से मुक्ति मिले
पोरुन्दि इंगे इरुन्देन – मैं इस विभूति में संतुष्ट था
पोग निनैवु ओन्रुमिन्रि – यहाँ से निकलने का सोच के बिना
पोन्नुलगु तन्निल – “नित्य विभूति” जो परमपद हैं, वहाँ
उरै – जो निवास हैं
पुण्डरीगै केळ्वन – कमल पर विराजमान पेरिय पिराट्टि के दिव्य पति
इप्पोदेन मनम एण्णादे – (किंतु अब) मेरा ह्रदय अन्य कोई विषय पर ध्यान न देगा
एळिल विसुम्बेयन्रि – तेजोमय परमपद से अन्य कोई
एतिरासन अरुळाले – (इसका कारण हैं)  एम्पेरुमानार के आशीर्वाद
एण्डिसैयुम एत्तुम – अष्ट दिशाओं में लोग इन्हीं के श्रेय की प्रशंसा करतें हैं

सरल अनुवाद

पूर्व काल में अपने जीवन बिताने के तरीखे की मामुनि प्रस्ताव करते हैं।  आचार्यो के कृपा से लोक में प्राप्त हुयी ग्रंथों को वे पढ़ते थे। खुद पढ़े तथा उन्के विशेष अर्थों से अपरिचित जनों को सिखायें। पूर्वतः मामुनि को परमपद में कोई इच्छा न थी। एम्पेरुमानार जिन्के आशीर्वाद से ही, अनेकों भगवतो और  पिराट्टियों समेत श्रीमन नारायण के निवास स्थान परमपद  में रूचि, मणवाळ मामुनि में उत्पन्न हुई।  इसलिए वें एम्पेरुमानार के आशीर्वाद की उत्सव मनाते हैं।

स्पष्टीकरण

मामुनि कहते हैं , “अपने पूर्व काल में, चेतनों के उन्नति के हेतु , महान पूर्वाचार्यो से लिखे गए अनेकों ग्रंथों की मैंने पाठ किये। अनेकों आचार्यो से लिखित यें एक कंठी जैसे एक सोच ही प्रकट करते हैं। चेतनों के प्रति अत्यंत कृपा से आचार्यो से प्राप्त इन ग्रंथों को हम पढ़े । (नान्मुगन तिरुवन्दादि ६३),”तेरित्तु एळुदि” के अनुसार, अपने आचार्यो से भी ढंग से सीखें । इन विषयों से अज्ञानियों के आत्मा की उन्नति केलिए इन ग्रंथों के गहरे अर्थों को पढ़ाये और यही हमारी व्यवहार भी थी। साँसारिक भोग्य में मग्न हमें , (मुदल तिरुवन्दादि ६७) “तामरैयाळ केळ्वन” से वर्णित पिराट्टि समेत श्रीमन नारायण के निवास स्थान परमपद में रुचि न थीं। अष्ट दिशाओं में भी माने जाने वाले श्री रामानुज के आशीर्वाद के कारण हमें परमपद में रुचि उत्पन्न हुई और उन्के आशीर्वाद के विशेष से ही अब मेरा ह्रदय अन्य कोई विषय को सोचे बिना, परमपद पर ही विचार कर रहा हैं। “अरुळाले” शब्दान्त के  “ले” से उनके आशीर्वाद के प्रभाव पर विशेष ध्यान दिया गया हैं।  यह व्याकरण में  “तेट्रत्तु ऐकारम” कहा जाता हैं।

पादटीका

“अरुळाले” शब्द में पिळ्ळैलोकम जीयर “तेट्रत्तु ऐकारम” की प्रस्ताव करतें हैं। तमिळ व्याकरण में दो “ऐकारम” हैं। “तेट्रत्तु ऐकारम”, “उरुदी” याने “निश्चय” तथा “सर्वसम्मत” को प्रकट करता है। तिरुप्पावै में आण्डाळ, “नारायणने” के ऐकारम से यह प्रकट करतीं हैं कि नारायण से अन्य कोई “परै” (लाभ, परमपद) न दे सकते। इस्से निश्चित रूप में मोक्ष दायक की पहचान स्थापित की गयी हैं। दूसरा है “पिरिनिलै ऐकारम” जिसका उधाहरण देखते हैं। तिरुप्पावै के उसी पासुरम में आण्डाळ, “नमक्के” में  ऐकारम की प्रयोग करती हैं।  अर्थात, नारायण हम जैसे नीच, पापी, अज्ञानियों को भी परै अनुग्रह करेंगें। इस पासुरम में “एण्णादे” में “तेट्रत्तु ऐकारम” की प्रयोग की गयी हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २७

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २६

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि, श्री रामानुज से प्रार्थना करते हैं , “ ओळि विसुम्बिल अड़ियेनै ओरुप्पडुत्तु विरैन्दे” अर्थात, परमपद पहुँचने की व्यवहार को शीघ्र ही पूर्ण करें। “वाने तरुवान एनक्काइ”(तिरुवाय्मोळि १०. ८. ५ ) के अनुसार श्री रामानुज मणवाळ मामुनि के परमपद प्राप्ति की तरस देख कर, अनुग्रह करने केलिए तैयार भी हैं। परमपद प्राप्ति की आश्वासन मिलने पर मणवाळ मामुनि अब अपने ह्रदय को आगे की आचरण/ढंग की उपदेश देते हैं। साँसारिक बाधाओं पर  ध्यान न देने की सलाह देते हैं। अपने परमपद पहुँचने की आश्वासन मिलने पर वें अपने ह्रदय को यह उपदेश देते हैं।

पासुरम २७

इव्वुलगिनिल इनि ओन्रुम एण्णादे नेञ्जे
इरवुपगल एतिरासर एमक्कु इनिमेल अरुळुम
अव्वुलगै अलर्मगळकोन अंगिरुक्कुम इरुप्पै
अडियार्गळ कुळाङ्गळ तमै अवर्गळ अनुभवत्तै
इव्वुयिरुम अदुक्कु इटटूपिरन्दु इळन्दु किडनददु
एन्नुम अत्तै एन्रुम अदुक्कु इडैछुवराय किडक्कुम
वेव्विनैयाल वंद उड़ल विडुम पोळुदै विटटाइ
विळैयुम इन्बम तन्नै मुटरुम विडामल इरुन्दु एण्णे !

शब्दार्थ

नेञ्जे – हे! मेरे ह्रदय !
एण्णादे – विचार न करो
ओन्रुम – कुछ भी
इव्वुलगिनिल – इस सँसार में
इनि – अब से
एण्णे – (इसके बदले में ) सोचो
विडामल इरुन्दु – लगातार
इरवुपगल – दिन और रात
अव्वुलगै – परमपद के बारे में
एतिरासर – श्री रामानुज
इनिमेल अरुळुम – भविष्य में अनुग्रह करेंगें
एमक्कु – हमें
अलर्मगळकोन – (सोचो) सर्व शक्त, सर्वज्ञ श्रीमन नारायण जो कमल में विराजित पेरिय पिराट्टि के दिव्य पति हैं।
इरूक्कुम  इरुप्पै – (सोचो )दिव्य, गंबीर सिंहासन पर विराजमान उन्को
अंगु – परमपद में
अवर्गळ अनुभवत्तै – (सोचो ) भोग्य के वस्तु होने के बारे में
कुळाङ्गळ तमै – समूहों को
अडियार्गळ – नित्यसूरियाँ
एन्रुम – (सोचो ) हर वक्त
एन्नुम अत्तै – वह
इटटूपिरन्दु – उचित, किंतु
इळन्दु किडनददु – (नित्यसूरियों के भोग्य वस्तु बनने का) खोया अवसर
इव्वुयिरुम – यह आत्मा भी
अदुक्कु इडैछुवराय किडक्कुम – (सोचो) जो बाधा के रूप में हैं
वंद – के कारण
वेव्विनैयाल – क्रूर पाप ( जो शरीर के संगठन से होता है )
उड़ल विडुम पोळुदै – (सोचो) शरीर के घिरने की समय
अदुक्कु – (सोचो) उससे जो आनंद आता हैं
विट्ठाल – जब शरीर घिरता है
विळैयुम – जिसके कारण आता है
इन्बम तन्नै – नित्यानंद
मुटरुम – (सोचो) यहाँ उल्लेखित सभी

सरल अनुवाद

परमपद में मिलने वाले आनंदमय समय पर विचार करने को मणवाळ मामुनि अपने ह्रुदय को कहतें हैं। कहतें हैं कि, परमपद में रुचि श्री रामानुज की ही अनुग्रह से उत्पन्न हुई। मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय को, परमपद, दिव्य दंपत्ति श्रीमन नारायण और पेरिय पिराट्टि, उन्के भक्तों, और उन भक्तों के भोग्य वस्तु बन्ने की अवसर, यह अवसर तुरंत न पाने कि दुर्भाग्य, भक्तों के भोग्य वस्तु बन्ने में बाधा, पाप जो बाधा के रूप में हैं , शरीर जो पापो का कारण हैं, शरीर की अंत में घिरना, उस्के पश्चात उसके परमपद यात्रा का समय, इत्यादियों पर विचार करने को कहतें हैं।

स्पष्टीकरण 

मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से कहतें हैं कि, “हे! मेरे ह्रदय! मोक्ष के पथ और साँसारिक बंधन के पथ, दोनों ही तुम्हारे उत्तरदायित्व हैं। “अत देहावसानेच त्यक्त सर्वेदास्ब्रुह” वचन समझाता है कि यह सँसार घृणा से देखे जाने वाली वस्तुओं से भरी है। ये “प्रकृति प्राकृत” को संपूर्ण रूप में हटाना चाहिए। ऐसी वस्तुओं को कभी भी अपनानी नहीं चाहिए। मामुनि, आगे कहतें हैं,”हे! मेरे ह्रदय! परमपद की इच्छा/रूचि  एम्पेरुमानार ने ही मुझ में उत्पन्न किए। अतः निम्नलिखित वस्तुओँ को हमेशा अपने सोच में रखना। पहले, एम्बेरुमानार के उपहार से प्राप्त होने वाली, उस दिव्य लोक, परमपद के बारे में सोचो। पेरिय पिराट्टि के दिव्य पति, सिंहासन में गंभीरता से विराजमान श्रीमन नारायण पर विचार करो। इसके पश्चात, पेरिय पिराट्टि, जिन्की आसन कमल हैं और जो स्वयं साक्षात सुगंध ही हैं, उन पर अपना ध्यान बढ़ाओ। “एळिल मलर मादरुम तानुम इव्वेळुलगै इन्बम पयक्क इनिदुडन वीट्रिरुंदु( तिरुवाइमोळी ७. १०. १)” वचन से वर्णित पिराट्टि श्रीमन नारायण के संग दिव्य सिंहासन को अलंकृत करती हैं। अब सोचो उन श्रेयसी भक्तों को, जिन्के भोग्य की वस्तु बन्ने से तुम आनंदित होंगे। दिव्य दंपत्ति (श्रीमन नारायण और पेरिय पिराट्टि) के कैंकर्य में मग्न इन्हीं को तिरुवाय्मोळि के २. ३. १० पासुरम में “अडियार कुळाङ्गळै” वर्णित किया गया हैं। तुम्हें (आत्मा को) इन भक्तों के भोग्य वस्तु बन्ने की सर्व लक्षण आने पर भी, दुर्भाग्य हैं अब वह स्थिति नहीं प्राप्त हुआ। इस दुर्भाग्य पर ध्यान दो। इसके कारण जो बाधाएं/ आपत्तियाँ,  है उन्पर विचार करो। इस शरीर के जन्म के कारण जो अनेकों पाप है, जिन्हें “पोल्ला ओळुक्कुम अळुक्कुडमबुम (तिरुविरुत्तम १)” में प्रकट किया गया है, उन्पर विचार करो। अंत काल में शरीर के घिरने के बारे में सोचो और साँसारिक बंधनों के घिरने के पश्चात, तुरंत मिलने वाली अत्यंत आनंद पर भी विचार करो। आत्मन के “अवश्य विचार” सूची में यहाँ  उल्लेखित सारे विषय हैं।  इन पर दिन और रात अविछिन्न विचार करो। इस पासुरम के “ इव्वुलगिनिल इनि ओन्रुम एण्णादे” और तिरुवाय्मोळि १०. ६. १ के “मरुळ ओळी नी” दोनों एक समान है।  दोनों ही अर्चावतार के महत्त्व को प्रकट करते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २६

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २५

उपक्षेप

इस पासुरम में श्री रामानुज के ह्रदय की ज्ञान होने के कारण मणवाळ मामुनि श्री रामानुज के पक्ष में बात करतें  हैं। श्री रामानुज के विचार की ज्ञान मामुनि को हैं और उस भाव को , वे इस पासुरम में प्रकट करतें हैं। और पासुरम की समाप्ति परमपद की प्रार्थना के सात करते हैं। श्री रामानुज के विचार हैं कि , “यह मणवाळ मामुनि ने मेरी रक्षण में आये दिन से अनेक पाप किये हैं।  मेरे सिवाय, इन्के पापो के भंडार को क्षमा कर, इन्की रक्षा कौन कर सकता हैं ? इसीलिए हमें ही यह कार्य करना होगा।” श्री रामानुज के इस भाव को ही मामुनि अपने ह्रदय से यहाँ प्रकट कर रहें हैं। आगे कहते हैं कि, निराधार जनों के एकमात्र आश्रय होने के कारण, श्री रामानुज के अलावा और कौन उनकी (मामुनि की ) रक्षा कर सकतें हैं। क्या पेरिय पेरुमाळ के जैसे अत्यंत कृपाळू कर सकते हैं ? उत्तर देते हुए मामुनि कहते हैं कि, श्री रामानुज ही सर्व श्रेष्ट लक्ष्य परमपद की इच्छा दिलाये, इस कारण श्री रामानुज को ही लक्ष्य प्राप्ति भी निश्चित करना हैं। इससे अधिक मामुनि के प्रतिदिन के पापो से भी, श्री रामानुज उन्की रक्षण करना चाह रहें हैं।  मणवाळ मामुनि की दृढ़ विश्वास हैं कि, उन्की पापो से रक्षण में , पेरिय पेरुमाळ इत्यादियों को नहीं , श्री रामानुज की ही आर्ति  हैं।

पासुरम २६

तेन्नरनगर्क्कामो ? देवियर्गटकामो ?
सेनैयर्कोन मुदलान सूरियरगटकामो?
मन्नियसीर मारन अरुळमारी तमक्कामो ?
मट्रूम उळ्ळ देसिगर्गळ तंगलुक्कूमामो ?
एन्नुडैय पिळै पोरुक्क यावरुक्कु मुडियुम ?
एतिरासा उनक्कु अन्रि यान ओरुवरुक्कु आगेन
उन अरुळै एनक्कु रुचि तन्नैयुम उणडाक्की
ओळिविसुम्बिल अडियेनै ओरुप्पडुत्तु विरैन्दे

शब्ढार्थ

एतिरासा – हे एम्पेरुमानारे !
तेन्नरनगर्क्कामो? – (मेरे पापो को क्षमा करना  ) क्या पेरिय पेरुमाळ को साध्य हैं ? या
देवियर्गटकामो? – पेरिय पिराट्टि के संग भू देवी, नीळा देवियों से क्या यह साध्य हैं ? या
सेनैयर्कोन मुदलान सूरियरगटकामो? –  सेनापतियाळ्वान इत्यादि नित्यसूरियाँ क्या यह कर पायेंगें ? या
मन्नियसीर – वें, जो नित्य, भगवान के भक्तों के प्रति वात्सल्यादि गुणों के संग हैं
मारन – और नम्माळ्वार के नाम पहचाने जाने वाले, क्या उनसे साध्य हैं ?
अरुळमारी तमक्कामो ?-  क्या सारे चेतनों पर कृपा बरसाने वाले कलियन को यह साध्य हैं ?
मट्रुम उळ्ळ – और कोई
देसिगर्गळ – नाथमुनि से प्रारंभ आचार्य
तंगळुक्कुमामो ? – क्या यह उन्को साध्य हैं ?
यावरुक्कु मुडियुम ? – किन्कों साध्य हैं
पिळै पोरुक्क – पापो को क्षमा करना
एन्नुडैय – मुझसे किये गए ?
यान –  मैं
ओरुवरुक्कु आगेन – अन्य किसी का दास नहीं बनूँगा
उनक्कु अन्रि – आपके अलावा
उन अरुळै – आपके कृपा से , आपने
रुचि तन्नैयुम उणडाक्कि – प्राप्य में इच्छा उत्पन्न किये
एनक्कु – मुझमें
ओरुप्पडुत्तु अडियेनै
ओळिविसुम्बिल – प्रकाशमान और तेजोमय परमपद
ऐ – (“विरैन्दु” शब्द के अंत में )- पूर्ती चित्रित करने के हेतु, यह अन्तसर्ग है

सरल अनुवाद

श्री रामानुज को छोड़, मणवाळ मामुनि, पेरिय पेरुमाल, उन्के दिव्य महिषियाँ, नित्यसूरियाँ, आळ्वार, आचार्यो जैसे सर्वश्रेष्ठ आत्माओँ के ऊपर विचार करते हैं। उनकी मानना हैं कि, उन्के पापो की क्षमा कर उन्की रक्षा करना इनमें से कोई नहीं कर सकते। केवल श्री रामानुज को ही दया और सामर्थ्य हैं। श्री रामानुज के इस सोच पर विचार करके, समाप्ति में मणवाळ मामुनि उन्से परमपद की प्रार्थना करते हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहतें हैं, “हे ! यतियों के नेता ! सर्वशक्तन (अत्यंत शक्तिशाली ), सर्वज्ञ (सर्वत्र , संपूर्ण रूप में जानने वाले), भगवान भी मेरे पापो की अनुमान न कर पाएँगे। हैं कोई, जिन्को मेरे पापो को क्षमा करना साध्य हैं ? क्या “दोषायद्यभितस्यस्यात” और “एन अडियार अदु सेय्यार सेय्दारेल नन्रु सेय्दार” (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४.९. २ ) वचनों से चित्रित पेरिय पेरुमाळ मेरे पापो को क्षमा कर पाएँगे? जगत प्रसिद्द, उन्की अत्यंत दया की भी मेरे पाप परीक्षण करेंगीं। क्या “नकश्चिन नपराद्यति (श्री रामायणम)” और “किमेतान निर्दोष: इहजगति (श्री गुण रत्नकोसम ) में चित्रित की गयीं पेरिय पिराट्टि आदि पिराट्टियाँ मेरे पापो को क्षमा करेंगीं ?क्या पिरट्टियों समेत पेरिय पेरुमाळ के नित्य कैंकर्य को तरस कर प्राप्त किये हुए, सेनपतियाळ्वान जैसे नित्यसूरियों को मेरे पापो को क्षमा करना साध्य हैं ? “असांभि: तुल्योभवतु” के अनुसार, पेरुमाळ और पिराट्टि के प्रति नित्य कैंकर्य में नित्यसूरियाँ समान हैं।  “विष्वक्सेन सँहिता” तथा “विहकेन्द्र सँहिता” में प्रपत्ति के विचार इन्ही नित्यसूरियों ने किया था, क्या वें मेरे पापो को क्षमा कर पाएँगे ? “पयनन्रागिलुम पाङ्गल्लरागिलुम सेयल नन्राग तिरुत्ति पणि कोळ्वान” (कण्णिनुन सिरुत्ताम्बु १० ) के अनुसार, भक्तों के प्रति नित्य रूप में अत्यंत वात्सल्य प्रकट करने वाले नम्माळ्वार मेरे पापो को क्षमा कर पाएँगे ? सारे चेतनों पर  आशीर्वाद बरसाने वाले तिरुमंगै आळ्वार क्षमा कर पायेंगें? क्या, आळ्वार के अनुग्रह से आशीर्वादित नाथमुनि, यामुनमुनि जैसे कृपामात्र प्रसन्नाचारयो से यह साध्य हैं ? सारे पापो को सहन कर क्षमा करने  वाले अआप्के सिवाय यहाँ उल्लेखित किसी से क्या यह साध्य हैं ? “ निगरिन्रि निन्रवेणनीसदैक्कु निन अरुळिङ्गणन्रि पुगलोन्रुमिल्लै (रामानुस नूट्रन्दादि ४८ )” के अनुसार घोर पापियों को भी क्षमा करने वाले आप कृपा समुद्र हैं।  अतः उचित यही हैं कि मैं केवल आपका हूँ, अन्य किसी का नहीं।  

मणवाळ मामुनि आगे प्रस्ताव करते हैं , “आपके चरण कमलों में शरणागति आपके अनुग्रह के कारण ही साध्य हुआ।  उसके पश्चात आपके आशीर्वाद के कारण ही प्राप्य में रुचि उपलभ्ध हुयी।  “सुडरोळियाइ निन्र तन्नुडै चोदि (तिरुवाय्मोळि ३.१०.५ )” और “तेळिविसुम्बु (तिरुवाय्मोळि ९.७.५ )” से वर्णित परमपद तक अडियेन को पहुँचाकर, उन वासियों में से एक बनाने की देवरीर से प्रार्थना हैं। “अंगुट्रेन अल्लेन” (तिरुवाय्मोळि ५.७. २ )” के जैसे परमपद वासियों से ब्रष्ट न होकर, शीघ्र परमपद प्राप्ति की प्रार्थना करता हूँ। “उनक्कन्रि” शब्द का अर्थ है “आपके अलावा”, यह शब्द, “तेन्नरनगर ……एतिरासा” से और “यान ओरुवर्क्कु आगेन” दोनों से इस तरह सम्बंधित किया जा सकता है : एम्बेरुमानार के अलावा अन्य कोई मामुनि के रक्षण न कर पाएँगे और एम्बेरुमानार से अन्य किसी के नहीं हैं मणवाळ मामुनि।  

आगे, विविरण हैं, यहाँ उल्लेखित श्रेष्ट समूह को मामुनि के पापो को क्षमा कर, उन्की रक्षा करने में ,असमर्थता की ।  

“निरंकुसस्वातंत्र्यम” अर्थात संपूर्ण स्वतंत्रता, श्रीमन नारायण की व्यक्तित्व हैं।”क्षिपामि” और “नक्षमामि” दोनों प्रकट करते हैं की श्रीमन नारायण सर्व स्वतंत्र होने के कारण किसी भी समय, किसी भी व्यक्ति को उन्के पापो के अनुसार दंड दे सकते हैं। और  पिराट्टियाँ चित्रित की जातीं हैं इन वचनों से : “क्षमा लक्षमी बृंगीसकल करणोनमातनमधु” और “तिमिर कोन्डाल ओत्तु निर्क्कुम (तिरुवाय्मोळि ६.५.२), अर्थात अपने स्वामी श्रीमन नारायण में वे इतनी मगन हैं कि शिल्प विग्रह के जैसी हैं। वें शायद मेरे पापो को क्षमा करने के स्थिति में नहीं हैं। नान्मुगन तिरुवन्दादि १० के, “अङ्गरवारम अदु केटु अळलुमिळुम” वचनानुसार नित्यसूरियाँ, सर्व काल सर्वावस्था में भी, सदा पिराट्टियाँ समेत श्रीमन नारायण के रक्षण में ही ध्यान रखतें हैं। अतः मामुनि के पापो को सहने तथा रक्षा करने में वें भी असमर्थ ही रहेंगें। “सिन्दै कलंगी तिरुमाल एन्रळैप्पन” (तिरुवाय्मोळि ९.८. १०)”, “उन्नै काणुम अवाविल वीळून्दु( तिरुवाय्मोळि ५.७.२)”, उन्नैकाणुम आसै एन्नुम कडलील वीळून्दु(पेरिय तिरुमोळि ४. ९. ३ )”, तथा “भक्ति पारवश्यत्ताले प्रपन्नरगळ आळ्वार्गळ (श्रीवचनभूषणं ४३) इत्यादि वचनों से भक्ति की सारांश के रूप पहचाने जाने वाले सारे आळ्वार, पिराट्टियों समेत श्रीमन नारायण के प्रति कैंकर्य को तरसते हैं और उसमें मग्न होकर खुद को भी बूल जाते हैं।  अतः मामुनि को या उन्की पापो को क्षमा न कर पाएँगे। अंत में हैं मुमुक्षुओं (मोक्षानंद में इच्छा रखने वाले, परमपद प्राप्ति में इच्छा रखने वाले जन ) की समूह। शरीर में प्राण रहते समय तक इन्की ध्यान मोक्ष पर ही रहना चाहिए और उसिकेलिये तरसना चाहिए।  इस कारण न ही ये  दूसरों को उपदेश दे सकते हैं , न उनके पापो को क्षमा कर पाएँगे। किंतु किसी को भी उन्के पापो से रक्षण करने की स्तिथि में, श्री रामानुज इन सभी सीमाओँ के पार हैं। अपने विनाश की भी चिंता न करते हुए, सँसारी के ज्ञान या अज्ञान पर ध्यान न देते हुए, सँसारियो के दुःखों से उनकों रक्षा करते हैं और किये गए सारे पापो से भी रक्षा करते हैं। इससे बढ़कर यह निश्चित करते हैं कि, “आळुमाळर एङ्गिरवनुडैय तनिमै तीरूमपड़ि(तिरुवाय्मोळि ८.३. ३)” के अनुसार इस्को भगवान के प्रति मंगळासासनम करने की गुण आए। “अदु तिरुत्तलावदे(पेरिय तिरुवन्दादि २५)” के अनुसार “दोषनिवृत्ति से पार” भावित किये जाने वालों को भी कृपा से सुधारने वाले श्री रामानुज ही हैं। और अंत में यह भी निश्चित करतें हैं कि “तिरुमगळ केळ्वन” श्रीमन नारायण के प्रति यह व्यक्ति, अवश्य ही, नित्य रूप में कैंकर्य करें। इसी विषय की प्रस्ताव “मरुळ कोणडिळैक्कुम नमक्कु नेञ्जे रामानुसन सेय्युम सेमंगळ मट्रूळर तरमो (रामानुस नूट्रन्दादि ३९)”, से तिरुवरंगत्तु अमुदनार करतें हैं।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २४

 

उपक्षेप

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि एक काल्पनिक प्रश्न उठाते हैं। उनका मानना हैं कि यह शायद श्री रामानुज के मन में होगा और इसका अब मणवाळ मामुनि, इस पासुरम में उत्तर देतें हैं। , श्री रामानुज, मणवाळ मामुनि से (काल्पनिक) प्रश्न करतें हैं , “ हे मणवाळ मामुनि! आपने अपने पापों के हिसाब न लेते हुए, कैंकर्य की प्रार्थना की हैं, इस विषय में, अब मैं क्या करूँ?कृपया उत्तर दीजिये।” मणवाळ मामुनि प्रस्ताव करते हैं , “हे! श्री रामानुज! आश्रय उपहार किये दिन से आज तक , आप मेरे पापो को सहते रहें। मेरे पास योग्यता न होने पर भी, आप  परमपद की आश्वासन दिए।  अब, और विलंब के बिना कृपया तुरंत मोक्ष उपहार कीजिये।”

पासुरम २५

एन्रु निरेतुगमाग एन्नै अभिमानित्तु
यानुम अदरिंदु उनक्केयायिरुक्कुम वगै सैदाई
अन्रू मुदल इन्रळवुम अनवरतम पिळैये
अडुतडुत्तु चेयवदु अनुतविप्पदु इनिच्चेय्येन
एन्रु उन्नै वंदु इरप्पदाम एन कोदूमैं कणडुम
इगळादे इरवुपगल अडिमै कोणडु पोंदाय
इन्रु तिरुनाडुम एनक्कु अरुळ एण्णुगिनराय
इनि कडूग चैदरुळवेणडुम एतिरासा !

शब्दार्थ

एतिरासा – हे ! एतिरासा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता !
एन्रु –  जिस दिन से
निरेतुगमाग – (जब आप ) बिना कारण के
एन्नै – मेरे प्रति यह सोच कर
अभिमानित्तु – कि “मैं (मणवाळ मामुनि) आपका हूँ”
यानुम  – मैं भी
अदरिंदु – समझकर
उनक्के – (और सेवा की ) केवल आपके प्रति
आयिरुक्कुम – (और मुझे बनाया ) केवल आपकी वस्तु
सैदाई – आपने यह किया, हैं न ?
वगै – (आपके प्रति) ऐसे (भाव होने केलिए )
अन्रू मुदल – उस दिन से
इन्रळवुम – अब तक
अनवरतम – (मैं) सदा
अडुतडुत्तु – लगातार
चेयवदु
कर रहा हूँ
पिळैये – केवल पाप
अनुतविप्पदु – और उन पापो केलिए  तुरंत  पछताता हूँ
इनि – आगे
चेय्येन एन्रु – (ये पाप) नहीं करनी चाहिए
उन्नै वंदु इरप्पदाम – और आपसे सहारा की प्रार्थना करता हूँ
एन कोडूमै कणडुम – आप, मेरे क्रूर पाप देखने पर भी
इगळादे – कभी अस्वीकार या द्वेष न करते हैं
अडिमै कोंडु पोंदाय – (बल्कि) आप के चरण कमलों के प्रति मेरे कैंकर्य स्वीकार करते हैं
इरवुपगल – दिन और रात
इन्रु – (और ) आज
एण्णुगिन्राय – आप विचार कर रहें हैं
अरुळ – आशीर्वाद करने
एनक्कु – मुझे
तिरुनाडुम – परमपद के सात
इनि कडुग – अतः, शीघ्र
चेयदु अरुळवेणडूम – यह उपहार करें

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से शीघ्र ही परमपद प्राप्ति उपहार करने की प्रार्थना करते हैं। वें कहते हैं कि “मणवाळ मामुनि मेरे हैं”, समझ कर जिस दिन श्री रामानुज आश्रय दिए, तब से , आज तक वे लगातार अनेक पाप करते रहें।  ये पाप करने के पश्चात तुरंत पछताने पर भी वें पाप करने से रूखे नहीं। लंबे समय से यही हो रहा है, किन्तु श्री रामानुज न ही उन पापो पर विचार किये न ही मणवाळ मामुनि के प्रति द्वेष बढ़ाये। मामुनि कहते हैं कि, बल्कि श्री रामानुज उन्को निश्चित रूप में अपने चरण कमलों के प्रति अविछिन्न कैंकर्य उपहार करते रहें। और आज परमपद उपहार करने पर भी विचार कर रहें हैं। मामुनि प्रश्न करतें हैं कि ऐसी स्थिति में विलंब क्यों ? और तुरंत आशीर्वाद करने केलिए प्रार्थना करते हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे ! यतियों के नेता ! “यह आत्मा मेरा हैं”, ऐसे विचार से आपने इस आत्मा पर कृपा किया हैं।  आपकी कृपा निर्हेतुक, बिना हेतु या कारण की हैं। इसकी मुझे जानकारी हैं और आपके कृपा या आशीर्वाद के कारण मैं केवल आपके उपयोग का वस्तु बना।  उस दिन से अब तक मैंने लगातार अविछिन्न रूप में पाप ही किये हैं।  उस्केलिये तुरंत पछतावे से आपसे ही सहारा की प्रार्थना करता हूँ।  मेरे इन पापो के कारण आपने मुझे अस्वीकार या मेरे प्रति द्वेष नहीं दिखाए।  बल्कि आपके चरण कमलों के प्रति अविछिन्न कैंकर्य की उपहार किये।  और इस से बढ़ कर, मुझे परमपद उपहार करने का भी सोचे, जिसकी मेरी योग्यता ही नहीं हैं।  यह निश्चय करने के पश्चात विलंब क्यों ? आप से ,शीघ्र ही आशीर्वाद करने की प्रार्थना करता हूँ।”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

आर्ति प्रबंधं – २४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २३

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उपक्षेप

साँसारिक संबंध के हटने से, अत्यंत सौभाग्य स्तिथि जो हैं ,परम श्रेयसी आचार्यो के मध्य पहुँचने तक के घटनाओँ की विवरण इस पासुरम में मणवाळ मामुनि प्रस्तुत करते हैं।   

पासुरम

इंद उडल विटटु इरविमंडलत्तूडु येगी
इव्वणडम कळित्तु इडैयिल आवरणमेळ पोय
अन्दमिल पाळ कडन्दु अळगार  विरसैतनिल कुळित्तु अंगु
अमानवनाल ओळि कोण्ड सोदियुम पेट्रु अमरर
वंदु एदिरकोणडु अलंकरित्तु वाळ्त्ति वळिनडत्त
वैकुंतम पुक्कु मणिमण्डपत्तु चेन्रु
नम तिरुमालडियारगळ कुळाङ्गळुडन
नाळ एनक्कु कुरुगुम वगै नल्गु एन एतिरासा

शब्दार्थ

एन एतिरासा – हे! एतिरासा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता !
नल्गु – कृपया आशीर्वाद करें
एनक्कु – मुझे
कुरुगुम वगै – कि आज से उस भाग्यवान दिन की अंतर शीघ्र कम हो
कूडुम नाळ – वही सौभाग्य दिन हैं जब मैं मिलूँगा,
नम तिरुमालडियारगळ – हमारे स्वामियां (जो स्वयं श्री:पति श्रीमन नारायण के दास हैं ) जो हैं नित्यसुरियाँ
कुळाङ्गळुडन – और उन्के गण में एक हों
इंद उडल – दोषों से भरे इस अनित्य शरीर
विटटु – के छूटने पर
इरविमंडलत्तूडु येगी – सूर्य मंडल को पार कर
कळित्तु – पार करता हैं
इव्वणडम – यह सँसार
इडैयिल – जो बीच में है
आवरणमेळ पोय – (इसके पश्चात ) सात सागरों को पार करता है
पाळ कडन्दु – “मूल प्रकृति” को पार कर
अन्दमिल – जिस्को असीमित कहा जाता है
अळगार – अंत में जो अति सुन्दर हैं, वहाँ पहुँचता है
विरसैतनिल – “व्रजा” नामक नदि
कुळित्तु – पुण्य स्नान करता है
अंगु – वहाँ
अमानवनाल – “अमानवन” के स्पर्श से उठता है
ओळि कोण्ड सोदियुम पेट्रु – और इससे परिणामित, तेजोमय दिव्य शरीर प्राप्त होता है
अमरर वंदु एदिरकोणडु – इसके पश्चात नित्यसुरियाँ आकर स्वागत करतें हैं
अलंकरित्तु – श्रृंगार करते हैं
वाळ्ति – गुणगान करतें हैं
वळिनडत्त – और मुझें (नए शरीर में ) लेकर जाते हैं
वैकुंतम पुक्कु – श्रीवैकुंटम के पथ में
मणिमण्डपत्तु चेन्रु – और “तिरुमामणि मंडप” नामक वेदी पहुँचता है

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, अब के और नित्यसुरियों के संग रहने के, बीच के समय के अंतर को शीघ्र कम करने की प्रार्थना करते हैं। शरीर के घिरने के पश्चात, आने वाली यात्रा की विवरण कि यहाँ प्रस्ताव करते हैं। जीवात्मा, सूर्य मंडल, अण्ड, सात सागर जैसे अनेक जगहों को पार कर, अंत में , “व्रजा” नामक नदी को पहुँचती है।  उस नदी में पुण्य स्नान करने के पश्चात, अमानवन के स्पर्श से उठकर, नयी तेजोमय शरीर पाती हैं। नित्यसूरिया आकर, स्वागत कर, श्रृंगार कर, उसे तिरुमामणि मण्डप तक ले जातें हैं जहाँ श्री:पति श्रीमन नारायण विराजमान हैं।  मणवाळ मामुनि की प्रार्थना हैं कि वे अब और नित्यसुरियों के नित्य निवास तक पहुँचने के समय के अंतर को शीघ्र कम करें।  

स्पष्टीकरण 

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे! मेरे स्वामी ! यतियों (सन्यासियों ) के नेता ! (तिरुवाय्मोळि १०. ७. ३ ) “इम्मायवाक्कै” के अनुसार मेरा अनित्य शरीर दोषों से भरा है। इसमें इच्छा नहीं रखनी चाहिए और (तिरुवाय्मोळि १०. ७. ९) के “मंग ओटटु” के प्रकार नाश होनी चाहिए। इसके पश्चात जीवात्मा , (पेरिय तिरुमडल १६) के “मण्णुम कडुम कदिरोन मण्डलत्तिन नन्नडुवुळ” के प्रकार सूर्य मंडल से लेकर अनेकों लोकों को पार करता है। इसके बाद, “आदिवाहिकस” नामक लोगों के लोक को पर करता है। और (तिरुवाय्मोळि ४. ९. ८ ) के वचन “इमयोर्वाळ तनि मुटटै कोटटै” के अनुसार, एक करोड़ योजनों की देवों के लोक पार  करता है। इसके पश्चात, (तिरुवाय्मोळि १०. १०. १०) के “मुडिविल पेरुम पाळ” वचन से चित्रित असीमित मूल प्रकृति को सात समुंदरों को पार कर पहुँचता है। इस्के पश्चात अति सुंदर “व्रजा” नदी को जीवात्मा पहुँचता है।  यहाँ पुण्य  स्नान करने के बाद, “अमानवन” नामक व्यक्ति व्रजा नदी से बाहर आने केलिए अपने हात देते  हैं।

इस स्पर्श के पश्चात, “ओळी कोण्ड सोदियुमाइ(तिरुवाय्मोळि २. ३. १०) के अनुसार जीवात्मा को एक नई तेजोमय शरीर प्राप्त होता है। यह “पंचोपनिषद मय” कहलाता है।  अर्थात पञ्च दिव्य भूतों से बनाया हुआ। अब, “मुडियुडै वानवर मुरै मुरै एदिर्कोळ्ळ” (तिरुवाय्मोळि १०. ९. ८) के प्रकार (नवीन शरीर वाले) जीवात्मा को नित्यसुरियां आकर स्वागत करते हैं और उसकी श्रृंगार कर, गुणगान कर, “श्री वैकुंठ” नामक दिव्य स्थल लेकर जाते हैं।  “तिरुमामणि मंडप” नामक प्रसिद्द वेदी तक ले जाते हैं , जहाँ अनेक भक्त उपस्थित हैं। श्री रामानुज से मणवाळ मामुनि प्रश्न करते हैं , “ कहते हैं कि , “अडियारगळ कुळाङ्गळुडन कूडुवदु येनृकोलो (तिरुवाय्मोळि २. ३. १०) और “मतदेवतै: परिजनैस्तव संकिशूय:”, ऐसे भक्तों के समूह में रहने की अवसर कब आएगी ? वें श्री:पति श्रीमन नारायण के दास हैं और उन्के प्रति कैंकर्य को सहारा मानते हैं।  हे ! एतिरासा! कृपया आशीर्वाद करें कि आज और उल्लेखित विषयों के संभव दिन के अंतर के समय शीघ्र कम हो। 

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २२

उपक्षेप

पिछले दो पासुरों में, मणवाळ मामुनि, अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै और परमाचार्य एम्बेरुमानार के आशीर्वाद के विवरण किये। मणवाळ मामुनि के अभिप्राय हैं कि इन्के आशीर्वाद के बल पर वे निश्चित परमपद प्राप्त करेंगें और भगवान की अनुभव करेंगें।  शीघ्र “दिव्यस्थान मण्डप” में निवासित “दिव्य सिंहासन” पर विराजित भगवान की अनुभव  पाने केलिए मणवाळ मामुनि अपनी इच्छा प्रकट करते हैं।  

पासुरम

अडियारगळ कुळाङ्गळ अळगोलक्कम इरुक्क
अनंतमयमान मामणि मण्डपत्तु
पड़ियादूमिल पडुक्कयाय इरुक्कुम अनन्तन
पणमामणिगळ तम्मिन ओळी मंडलत्तिल इडैयिल
वडिवारुम मामलराळ वलवरुगु मट्रै
मण्मगळुम आय्मगळुम इडवरुगुम इरुक्क
नडुवाग वीट्रीरुक्कुम नारणनै कडुग
नान अनुभविक्कुम वगै नल्गु एन एतिरासा

शब्दार्थ 

एन एतिरासा – हे! यतिराजा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता!
कडुग – निश्चित ही आप शीघ्र
नल्गु – आशीर्वाद करें
नान – मैं
अनुभविक्कुम वगै – भोग  करें
नारणनै – श्रीवैकुंठनाथ
नडुवाग वीट्रीरुक्कुम – मध्य में विराजित, बिजली के बीच कमल की तरह, वर्षा की मेघ जैसे साँवले रंग के, दिव्य महिषियों के मध्य विराजित जो जग की राज करतें हैं।
वडिवारुम मामलराळ – प्रस्तावित दिव्य महिषियाँ हैं, दायें भाग में “ वडिवाय निन वलमारबिनिल वाळ्गिन्र मंगै” में प्रकटित  (तिरुपल्लाण्डु २)  अद्वितीय सौंदर्य और कोमल गुण संपन्न  पेरिय पिराट्टियार,
वलवरुगु – दायें भाग में
मट्रै मण्मगळुम आय्मगळुम – और भूमि पिराट्टि और नीळा देवी जो हैं
इडवरुगुम इरुक्क – बायें भाग में
अडियारगळ कुळाङ्गळ – इन्के संग, नित्यसुरियाँ (अनंत, गरुड़ विश्वक्सेन इत्यादि ) और मुक्तात्मायें (परांकुश और परकाल के जैसे ), यह मोतियों और रत्नों की सुन्दर संग्रहण की तरह दिखता हैं
अळगोलक्कम इरुक्क – सुंदर पंक्ति में
आनन्दमयमान मामणि मंडपत्तु – अत्यंत आनंदमय वेदी में , जो “तिरुमामणि मंडपम” जाना जाता हैं
पणमामणिगळ तम्मिन ओळी मंडलत्तिल इडैयिल – के सिरों से उत्पन्न प्रकाश के मध्य
पडियादुमिल – तुलना से पार
पडुक्कैयाय इरुक्कुम – अनंतन, जो दिव्य शय्या (श्रीमन नारायण के ) के रूप में सेवा करते हैं
अनंतन – “अनन्ताळ्वान” नाम से जाने जाते हैं

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, कोई विलंब के बिना शीघ्र श्रीवैकुंठनाथ की भोग करने के हेतु, आशीर्वाद करने को प्रार्थना करते हैं। मणवाळ मामुनि श्री वैकुंठनाथ की विवरण करते हैं कि वे अपने दिव्य महिषियाँ :पेरिय पिराट्टि, भूमि देवी तथा नीळा देवी के मध्य, अनन्त , गरुड़  विश्वक्सेन जैसे नित्यसुरियाँ एवं आळ्वारों और आचार्यो जैसे मुक्तात्माओं के श्रेयसी पंक्ति के मध्य, तिरुमामणि मण्डप में  विराजमान हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता! “अडियारगळ कुळाङ्गळ (तिरुवाय्मोळि २. ३. १० ) और “मामणि मण्टपत्तु अंतमिल पेरिन्बत्तडियार(तिरुवाय्मोळि १०. ९. ११ )” के जैसे सुंदर पंक्ति में हैं।  नित्यसूरियों में अनंत,गरुड़ ,विश्वक्सेन इत्यादि एवं मुक्तों में परांकुश, परकाल तथा यतिवरादि हैं। यें मोतियों और रत्नों के सुंदर संग्रहण की तरह दिखतीं हैं।  यह पंक्ति, “आनंदमयाय मंडप रत्नाय नमः” के अनुसार तेजोमय , अत्यंत आनंद से प्रकाशित “तिरुमामणि मंडप” के आगे हैं। अत्यंत कोमल तथा शीतल  “अनंतन” नामक सर्प  शैय्या, जो भगवान के नित्य कैंकर्य केलिए प्रसिद्द हैं, इस मंडप में हैं।  “आयिरम पैन्तलै अनंतन” (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४. ३. १० ), “सिरप्पुडैय पणनगळ मिसैचेळुमणिगळ विट्टेरिक्कुम (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४. ९. ७ ) तथा “दैवछुडर नडुवुळ (पेरिय तिरूमडल १) जैसे वचनों में अनंतन की वर्णन की गयी हैं। “वडिवाय निन वलमारबिनिल वाळ्गिन्र मंगै (तिरुप्पल्लाण्डु २ )” और “वडिक्कोल वाळ नेडुनकण (इरणडाम तिरुवन्दादि ८२ )” में जैसे वर्णन किया गया है, पेरिय पिराट्टि अपने सौंदर्य और कोमल गुण के  स्वरूप से पहचानी जातीं हैं। वें श्रीमन नारायण के दायें पक्ष में दर्शित हैं।  श्रीमन नारायण के बायें पक्ष में पेरिय पिराट्टि के छाया भूमि पिराट्टि एवं नीळा देवी हैं।  एक कमल तथा तीन बिजलियों के मध्य साँवले वर्षा के मेघ के समान दृश्य हैं, इन तीनों पिराट्टियों के मध्य, श्रीमन नारायण।  ये श्रीवैकुंठनाथ हैं जो (तिरुवाय्मोळि १०. ९. १ ) में “वाळपुगळ नारणन” से वर्णित हैं, जो वहाँ “वीट्रीरुंदु येळुलगम तनिक्कोल सेल्ल” (तिरुवाय्मोळि ४.५. १ ) के अनुसार लोकपरिपालन करने केलिए विराजित हैं। “ हे ! मेरे स्वामी एतिरासा ! कृपया मुझे आशीर्वाद कीजिये, जिससे मैं तुरंत इस श्रीवैकुंठनाथ को भोग कर सकूँ”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २१

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि “एन्न भयं नमक्के”, कहते हैं , अर्थात उन्को अब कोई भय नहीं हैं। अब कहते हैं कि अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के निर्हेतुक आशीर्वाद के कारण श्री रामानुज उन पर गर्व करेंगें। यह इस सँसार के सागर को पार कर श्रीमन नारायण के चरण कमलों तक अवश्य पहुँचायेगा।

पासुरम २२

तीदट्र ज्ञानम् तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै सीररुळै
येदत्तै माट्रूम एतिरासर तन अभिमानमेन्नुम
पोदत्तै एट्री पवमाम पुणरिदनै कडन्दु
कोदट्र माधवन  पादक्करैयै कुरुगुवने

शब्दार्थ

तीदट्र – दोष हीन
ज्ञान – जीवात्मा के स्वरूप की सम्पूर्ण ज्ञान
तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै – तिरुवाय्मोळि के संबंध से ये “तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै” जाने जाते हैं।  श्रीमन नारायण के कवि नम्माळ्वार के दिव्य रचना हैं
सीररुळै – वे मुझे (निर्हेतुक) कृपा से आशीर्वाद करते हैं
येदत्तै माट्रूम – जिस्से मोह तथा इच्छा जैसे दोष नष्ट हों
एतिरासर तम – उन्की  (तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै की )  आशीर्वाद, श्री रामानुज के कृपा पात्र बने रहने की सहाय करेगी
पोदत्तै येट्री – “विष्णु पोत” यानी विष्णु की जलयान के जैसे अटल जहाज़ (जलयान ) जो ही
पवमाम पुणरिदनै कडन्दु – सँसार के सागर को पार करने केलिए सहाय करता हैं
कुरुगुवने – निश्चित प्राप्त होता है
कोदट्र माधवन पादक्करयै – श्रिय:पति श्रीमन नारायण के चरण कमल। यह चरण कमल, “विण्णोर पिरानार मासिल मलरडिकीळ”, “तुयररु सुडरडि” चित्रित किया गया हैं , अर्थात “दोषों से विरुद्ध एवं सदा रोशणमय

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि कहते हैं कि श्रीमन नारायण के चरण कमल प्राप्त होना निश्चित है क्योंकि “विष्णु पोत” की तरह एक जलयान की सहायता से वें साँसारिक बंधनों से विमुक्त होने वाले हैं। यह निश्चित हैं क्योंकि श्री रामानुज उस जहाज़ में चढ़ाएंगे। और श्री रामानुज के यह सहायता मणवाळ मामुनि के आचार्य निष्कलंक तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के आशीर्वाद से ही साध्य है।

स्पष्टीकरण  

विवरणकार अब तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के श्रेय प्रस्ताव करते हैं।  “तत ज्ञानं अज्ञानमतोन्यधुक्तम” और “विद्यान्यासिलपनैपुणम” वचनों के अनुसार , श्रीमन नारायण से असम्बंधित या विरुद्ध किसी प्रकार के कार्यो से आने वाली दोषों से विमुक्त हैं। “तामरैयाळ केळ्वनये नोक्कुम उणर्वु” (मुदल तिरुवन्दादि ६७ ) की तरह श्री महालक्ष्मि के पति श्रीमन नारायण के प्रति ही सदा उन्की ध्यान हैं, अन्य विषयों में किंचित भी नहीं। श्रीमन नारायण के प्रति उन्की भक्ति ऐसी हैं कि श्रीमन नारायण के भक्तों को अपने स्वामी समझते हैं।  श्रीमन नारायण से संबंधित ग्रंथों के अलावा अन्य विषयों पर वें ध्यान नहीं देते हैं। विशेष रूप में तिरुवाय्मोळि के गेहरी दिव्य अर्थों में मग्न होने के कारण “तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै” जाने जाते हैं।  तिरुवाय्मोळि के प्रति उन्के प्रेम के कारण, तिरुवाय्मोळि उन्की पहचान बन गयी।  ऐसे श्रेयसी आचार्य के शिष्य हैं श्री मणवाळ मामुनि। मणवाळ मामुनि कहते हैं कि , उन्के आचार्य के आशीर्वाद से श्री रामानुज के छाये में अवश्य आएँगे, जो प्रेम भाव प्रकट करेंगें। श्री रामानुज “कामादिदोषहरं” (यतिराज विम्शति १ ) विवरित किये जाते हैं।  “विष्णु पोतं” का अर्थ है , “इदंहि वैष्णवं पोतं सम्यकास्ते भवार्णवे” याने, “बिना कोई संकट ,श्रीमन नारायण के दिव्य चरण कमलों तक पहुँचाने वाला”. मणवाळ मामुनि कहते हैं कि श्री रामानुज के संबंध, सँसार के सागर (साँसारिक बंधन ) से विमुक्त करने वाला श्री वैष्णव जलयान हैं। (जितन्ते स्तोत्र ४ ) के “संसार सागरं घोरं अनंत क्लेस भाजनं”, वचनानुसार, यह सँसार सागर हमारे ग्रंथों में भयानक सागर के रूप में चित्रित किया गया है। मणवाळ मामुनि कहते हैं कि यह जलयान उन्को श्रीमन नारायण के चरण कमलों तक ले जाएगा।  भगवान के चरण कमलों के विषय में बताया गया है , “विण्णोर्पिरानार मलरडिकीळ (तिरुविरुत्तम ५४ ) याने नित्यसूरियों से पूजनीय और “तुयररु सुडरडि (तिरुवाय्मोळि १.१. १ ) याने अज्ञान और पीड़ा से निवारण करने वालें। “हेय प्रत्यनीकं”, के अनुसार वें संपूर्ण रूप से दोषों से विमुक्त हैं। ये दिव्य चरण कमल अत्यंत तेजस्वी हैं और भक्त की ,किसी के या किसी विषय के आवश्यकता के बिना रक्षण करतें हैं। श्रीमन नारायण के  ऐसे निष्कलंक चरण कमल ही मेरे लक्ष्य हैं।  वे कहते हैं लक्ष्य प्राप्ति निश्चित हैं।  “कोदट्र” का अर्थ है निष्कलंक और यह चरण कमलों केलिए सही है। पूर्ण वचन है “कोदट्र माधवन” अर्थात  “निष्कलंक या दोषहीन माधवन” . यहाँ उल्लेखित दोष, श्रीमन नारायण के “पिराट्टि”, श्री महालक्ष्मि के संग न होने पर।  इसी  विषय की तिरुवडि (हनुमान) प्रस्ताव करते हैं, “रामस्यलोकत्रय नायकस्य श्रीपादकूलं मनसाजकाम” में और नम्माळ्वार, बताते हैं , “माने नोक्कि मडवाळै मार्बिल कोणडाइ माधवा” जो “उन तेने मलरूम तिरुपादम विनयेन सेरमारु अरुळाइ (तिरुवाय्मोळि १.५.५ )” में पूर्ण होता है।  अतः, “तिरुविललाद कोदु अट्रवन” अर्थात पिराट्टि महालक्ष्मि के संग के बिना श्रीमन नारायण के दर्शन में ही यह उल्लेखित दोष आएगा।  अतः पिराट्टि के संग श्रीमन नारायण ही लक्ष्य हैं क्योंकि वे ही निष्कलंक हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २१

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर १०

ramanujar-srisailesa-mamunigal

उपक्षेप

यह पासुरम मणवाळ मामुनि और उनके मन के बीच की संभाषण है। उनकी मन का प्रश्न है “हे मणवाळ मामुनि ! पिछले पासुरम में आप परमपद के मार्ग की और श्रीमन नारायण से जीवात्मा की मिलन का भी विवरण दिए। अत्यंत ज्ञानियों केलिए भी यह अपूर्व अवसर है। किन्तु आप के बातों से लगता हैं कि आप ने यह अनुभव किया है।  आप अचानक इतने विश्वासपूर्ण और साहसी कैसे बन गए ?”  इसकी उत्तर देते हुए मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से कहते हैं , “हे मेरे प्रिय ह्रदय! निर्भय रहो ! मेरी ज्ञान मेरे आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के निर्हेतुक कृपा से हैं।  उस्से मैं इस निश्चय पर आया हूँ कि आचार्य के कृपा ही मुक्ति दायित्व हैं। मेरी इस स्तिथि देख एम्पेरुमानार अपने कार्य खुद करेंगें।  अतः मैं निर्भय और वैसे ही तुम भी रहना।

पासुरम

तिरुमलै आळ्वार तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै सीररुळै
तरुम मदि कोण्डवर तम्मै उत्तारकराग एण्णि
इरु मनमे ! अवरकाई एतिरासर एमै कडुग
परमपदम तनिल येटरुवार एन्न बयम नमक्के

शब्दार्थ

तिरुमलै आळ्वार – जिनका नाम है “श्रीशैलेशर”
तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै – तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के अलावा कोई नहीं
सीररूळै – अपने निर्हेतुक कृपा से
तरुम – मुझे आशीर्वाद किये
मदि – उन्की दिव्य ज्ञान
मनमे – हे मेरी प्यारी ह्रदय
कोणडु –  उस ज्ञान को उपाय बना कर
इरु – रहिये
एण्णि – इस दृढ़ विश्वास के सात कि
अवर तम्मै – तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै, महान जिन्हों ने इतना मदद किये
उत्तारकराग – साँसारिक बंधनों से विमुक्त करने वाले हैं
एतिरासर – एम्पेरुमानार
अवरकाई – मेरे आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के लिए
येट्रूवार – भेजेँगे
एमै – मैं, जो “स्वाचार्य अभिमानमे उत्तारकम” (शिष्यों के प्रति आचार्य की अभिमान ही शिष्यों की एकमात्र रक्षण है )
कडुग – शीघ्र ही
परमपदम तनिल – परमपदम तक
एन्न बयम नमक्के ! – हे मेरे ह्रदय ! अतः क्यों डरे ! कोई भय नहीं है (सीने में हाथ रख कर निश्चिन्त सो सकते हैं )

सरल अनुवाद

मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से निर्भय रहने को कहते हैं, क्योंकि एम्पेरुमानार उनकी रक्षा करेंगें।  मणवाळ मामुनि के आचार्य तिरुवाइम्ळिप्पिळ्ळै के, मामुनि के प्रति जो प्रेम और कारुण्य हैं, वही इसका कारण हैं। मणवाळ मामुनि को ज्ञान हैं कि आचार्य के आशीर्वाद और कृपा से ही एम्पेरुमानार शीघ्र राहत दिलाएँगे।

स्पष्टीकरण 

तिरुमलै आळ्वार ही तिरुनाम था।  तिरुवाय्मोळि में अत्यंत प्रभाव और ज्ञान के कारण वें तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै नाम से पहचानें गए।  वही उन्की पहचान बन गयी।  मणवाळ मामुनि के कहना हैं की ऐसे महान आचार्य अपने निर्हेतुक कृपा से आशीर्वाद किये और सर्वश्रेष्ठ विषय की ज्ञान भी दिए।  इस ज्ञान के प्रापक हैं मणवाळ मामुनि।  इस ज्ञान को उपाय बना कर, अपने ह्रदय से कहते हैं , “हे ह्रदय ! स्मरण रखो के महान तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै ने हमें यह ज्ञान उपहार किया हैं।  इसका प्रयोग यह हैं कि हमें एहसास होना हैं कि इस साँसारिक बंधन से वे ही हमें विमुक्त करेंगें।  इस पर दृढ़ विश्वास रखो।  इस दृढ़ विश्वास को देख श्री रामानुज हमारी स्तिथि की प्रोत्साहन करेंगें।  इसके पश्चात हमारे आचार्य पर विचार करेंगें और उन्के हेतु (तिरुवाय्मोळि ७.६. १० ) के “येट्रारुम वैकुन्दम” वचनानुसार, हमें शीघ्र परमपग भेजेँगे।  (इरामानुस नूट्रन्दादि ९८) के “मनमे नैयल मेवुदर्क्के” के  अनुसार मणवाळ मामुनि अपने ह्रदय से कहते हैं , “तुम निर्भय रहो” श्री रामानुज परमपद तक पहुँचायेंगे, इसलिए सीने में हाथ रख निश्चिन्त सो सकते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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