Daily Archives: December 5, 2018

thiruvAimozhi nURRandhAdhi – 9 – ivai aRindhOr

Published by:

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Full Series

<< Previous

Nammazhwar-krishna

Essence of thiruvAimozhi 1.9

Introduction

In this pAsuram, mAmunigaL is following AzhwAr’s pAsurams of highlighting emperumAn‘s quality of granting joy in a step by step manner and is mercifully explaining it.

How is that done? When asked “though emperumAn has the quality of honesty, to present himself to the dishonest AthmAs, and interact with them, would he interact with those who approach him now, with the same joy as he interacts with nithyasUris such as thiruvadi (garuda), thiruvananthAzhwAn (AdhiSEsha) et al who fully follow his heart?” AzhwAr mercifully explains in thiruvAimozhi 1.9ivaiyum avaiyum” that emperumAn would unite with this AthmA with all his senses and limbs in a step by step manner in all manners, while he may just interact with each of those nithyasUris in a distinctive manner. mAmunigaL mercifully explains this starting with “ivai aRindhOr tham aLavil“.

pAsuram

ivai aRindhOr tham aLavil Isan uvandhARRa
avayangaL thORum aNaiyum suvai adhanaip
peRRArvaththAl mARan pEsina sol pEsa, mAl
poRRAL nam senni porum

Listen

word-by-word meanings

ivai – the qualities such as Arjava (honesty) which were revealed in previous decad
aRindhOr tham aLavil – towards those who have understood
Isan – sarvESvaran
uvandhu – joyfully
ARRa – step by step
avayangaL thORum – in all limbs
aNaiyum – uniting
suvai adhanaip peRRu – tasting it
ArvaththAl – with bliss (having acquired it)
mARan pEsina – mercifully spoken by AzhwAr
sol – divine words
pEsa – as we speak
mAl – sarvESvaran’s
pon thAL – divine feet
nam senni – on our head
porum – will unite

Simple Translation

As we speak the divine words which were mercifully, blissfully spoken by AzhwAr after acquiring the taste of sarvESvaran joyfully uniting, step by step with all limbs of those who have understood his qualities such as Arjava (honesty) which were revealed in previous decad, sarvESvaran’s divine feet will unite with our head.

Highlights from vyAkyAnam

  • ivai aRindhOr tham aLavil – Towards those who have understood this Arjava quality.
  • Isan uvandhu ARRa avayangaL thORum aNaiyum suvai adhanaip peRRasarvESvaran being blissful, in a step by step manner, united with all limbs of AzhwAr, and AzhwAr having attained such great fortune of being united with emperumAn to the full satisfaction of all his [AzhwAr’s] limbs. That is, as said in SrI rAmAyaNam kishkindhA kANdam 4.21 “sarAmO vAnarEndhrasya prasAdham abikAnkshathE” (Such SrI rAma desired with noble thoughts, the grace of sugrIva), AzhwAr highlighted “ennudaich chUzhaluLAnE”  (he is in my vicinity) [1st pAsuram], “arugalilAnE” (in close proximity) [2nd pAsuram], “ozhivilan ennOdudanE” (inseparable from me) [3rd pAsuram], “kaNNan en okkalaiyAnE” (krishNa is on my hips) [4th pAsuram], “mAyan en nenjinuLAnE” (the amazing lord is in my heart) [5th pAsuram], “ennudaith thOLiNaiyAnE” (he is on my shoulder) [6th pAsuram], “ennudai nAvinuLAnE”  (he is in my tongue) [7th pAsuram], “kamalak kaNNan en kaNNin uLLAn” (lotus eyed lord is in my eye) [8th pAsuram], “en neRRi uLAnE” (he is on my forehead) [9th pAsuram] and climbing up my head as said in “uchchi uLAnE” (he is on my head). mAmunigaL explained this based on these pAsurams. aNaiyum suvai means faultless six types of taste. Here the focus is on how emperumAn unites with AzhwAr as he would feel the collective joy of uniting with pirAtti, thiruvanthAzhwAn et al.
  • ArvaththAl mARan pEsina sol pEsa – AzhwAr being greatly blessed in this manner, out of the great desire/joy mercifully spoke the divine words; just by reciting them,
  • mAl pon thAL nam senni porum – The attractive, divine feet of sarvESvara who is greatly attached to his devotees, will reach our head. poru means match, and hence it implies reaching. mAmunigaL is mercifully explaining what is mercifully spoken by AzhwAr in “nichchalum viNNappam seyya nIL kazhal senni porum” (For those who recite, the lotus feet of kaNNan emperumAn will be on their head forever) [pAsuram 11].

adiyen sarathy ramanuja dasan

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

आर्ति प्रबंधं – ६०

Published by:

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पाशुर ५९

ramanuja.jpg (585×792)

उपक्षेप

आर्ति प्रबंधं के इस अंतिम पासुरम में मामुनिगळ विचार करतें हैं, “ हमें अपने लक्ष्य के विषय में और क्यों तृष्णा हैं? पेरिय पेरुमाळ से श्री रामानुज को सौंपें गए सर्वत्र, श्री रामानुज के चरण कमलों में उपस्थित उन्के सारे बच्चों के भी हैं।” यहीं अत्यंत ख़ुशी प्रकट करतीं हैं इस अति अद्भुध ग्रंथ की अंतिम पासुरम।  

 

मणवाळ मामुनिगळ तिरुवडिगळे शरणम!

पासुरम ६०

इंद अरंगत्तु इनिदु इरु नीयेन्ड्रु अरंगर

एंदै एतिरासर्क्कींद वरं सिंदै सैय्यिल

नम्मदंरो  नेंजमे नट्रादै सोमपुदल्वर

तम्मदंरो तायमुरै तान

 

शब्दार्थ

अरंगर  – पेरिय पेरुमाळ

इंद अरंगत्तु  – कोयिल (श्रीरंगम) में

इनिदु इरु नीयेन्ड्रु  – “श्रीरंगे सुखमास्व” (श्रीरंगम में सुखी रहो )कहें

एंदै एतिरासर्क्कु – मेरे पिता एम्पेरुमानार (से)

नेंजमे  – हे मेरे हृदय

सिंदै सैय्यिल  – अगर हम इस पर विचार करें तो

इंद वरं – पेरिय पेरुमाळ से एम्पेरुमानार को सौंपे गए वरदान

नम्मदंरो  – क्या यह सच नहीं हैं कि यह वर हमारा भी है ?

नट्रादै – एम्पेरुमानार हमारें पिता

तायमुरै तान – क्योंकि हमारें माता-पिता के

सोमपुदल्वर तम्मदंरो  – संपत्ति खुद बच्चों को जाता हैं

(मामुनि अपने हृदय को कहतें हैं, “ अत: हे मेरे प्रिय हृदय। अब हमारे लिए करने केलिए कुछ नहीं हैं, हमारा भोज अब भोज न रहा , क्योंकि श्री रामानुज कृपा से वर देकर, संकटों को मिटा चुके हैं।”)  

 

समाप्ति टिप्पणि

पेरिय पेरुमाल श्री रामानुज को नित्य विभूति (परमपद) और लीला विभूति (परमपद से अन्य सर्वत्र) अपनी सारी संपत्ति सौंपे। इसीलिए धाटी पञ्चकं के ५वे श्लोक से श्री रामानुज, “श्री विष्णु लोक मणि मण्डप मार्ग दायी” कहलातें हैं। एम्पेरुमानार सारें प्रपन्नों के नेता हैं और इन्हीं के प्रति “जीयर” तथा “यतींद्र प्रवणर” दिव्य नामों से पहचाने जाने वाले मणवाळ मामुनिगळ ने प्रपत्ति किया। मामुनि को सर्व श्रेष्ट और अंतिम लक्ष्य परमपदं प्राप्त हुआ और वहाँ भगवान और भागवतों के प्रति नित्य कैंकर्य भी मिला। इसका अर्थ यह है कि यहीं फल हर किसी को मिलेगा जो  एम्पेरुमानार के सद्भाव के पात्र हैं। अर्थात श्री रामानुज के दिव्य चरण कमलों में शरणागति करने पर हर किसी को उनका प्रेम तथा आश्रय प्राप्त होगा जो उन्हें नित्यानंद का निवास परमपदं तक पहुँचायेगा।

 

सरल अनुवाद

इस अंतिम पासुरं में श्री रामानुज के संबंध के कारण, प्रार्थना किये गए सारें वरों के प्राप्ति निश्चित होने के कारण मामुनि आनंद में हैं। यह संभव हैं  क्योंकि, जैसे गद्य त्रयं के पँक्तियो से प्रकट होता हैं : पेरिय पेरुमाळ ने अपनी सारे संपत्ति एम्पेरुमानार को सौंप दिए। एम्पेरुमानार के वत्स होने के कारण मामुनि को ख़ुशी है कि पेरिय पेरुमाळ से एम्पेरुमानार को सौंपे गए वे सारे विषय( शेष जीवन के समय में यहाँ कैंकर्य से लेकर परमपदं में नित्य कैंकर्य तक) वें (मामुनि) भी अनुभव कर सकतें हैं।

 

स्पष्टीकरण

मामुनि अपने हृदय को कहतें हैं, “हे मेरे प्रिय हृदय, “शरणागति गद्य” के शब्दों को स्मरण करतें हुए, हमारे पिता एम्पेरुमानार को पेरिय पेरुमाळ नें जो बताया उस विषय पर ध्यान करो। पहले पेरुमाळ कहें, “द्वयं अर्थानुसन्धानेन सहसदैवं वक्ता यावच्चरीर पादं अत्रैव श्रीरँगे सुखमास्व” .  इस्के पश्चात “शरीर पाद समयेतु” से शुरु और “नित्यकिंकरो भविष्यसि माते भूतत्र समशय: इति मयैव ह्युक्तम अतस्तवं तव तत्वतो मत्ज्ञान दरशनप्राप्तिशु निसशंसय: सुखमास्व” तक पेरुमाळ कहतें हैं। पेरिय पेरुमाळ हमारे पिता एम्पेरुमानार को शेष जीवन केलिए आवश्यक विषय(कैंकर्य ) तथा परमपदं में कैंकर्य भी सौंपे। विचार करने से एहसास होता हैं कि एम्पेरुमानार के बच्चें होने के कारण हमें भी यह सब प्राप्त होगा।  अत: प्रिय हृदय, खुद के रक्षा हेतु हमें कुछ भी नहीं करना है। अत: एम्पेरुमानार के कृपा के कारण हमें सर्व प्राप्त होगा। पेरिय पेरुमाळ परमपद जो नित्य विभूति है और अन्य सारा सृष्टि जो लीला विभूति है दोनों को एम्पेरुमानार को सौंपे। इसीलिए एम्पेरुमानार, धाटी पञ्चकं के ५वे श्लोक “श्री विष्णु लोक मणि मण्डप मार्ग दायी” से प्रशंसा किये जातें हैं। एम्पेरुमानार प्रपन्नों के नेता हैं और उन्के प्रति “जीयर” तथा “यतींद्र प्रवणर”नाम से पहचाने जाने वाले मणवाळ मामुनिगळ शरणागति किये। उन्हें परमपद पहुँच कर भगवान तथा भागवतों को नित्य कैंकर्य करने का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य प्राप्त हुआ।  अर्थात यहीं फल एम्पेरुमानार से सम्बंधित और उन्के सद्भाव के पात्र सारे जनों को यह प्राप्त होगा. और इससे हम समझ सकतें हैं कि एम्पेरुमानार के दिव्य चरण कमलों में शरणागति करने वाले सारे लोगो को स्वामि रामानुज के प्रेम और आश्रय प्राप्त होगा और इस दिव्य शुरुवात के संग ही वें सब निश्चित रूप में नित्यानंद की निवास परमपद को हमेशा केलिए प्राप्त करेँगे।

अनेकों बार एतिरासा! एतिरासा! पुकार कर मामुनिगळ यह संदेश देतें हैं कि एम्पेरुमानार यतियों के नेता हैं। उन्के सारे शिष्य स्वामि यतिराज के दिव्य नामों को लगातार  जप कर उन्को प्रशँसा करतें हैं। स्वामि के शिष्य होने के कारण, मामुनि “यद्यसुधसत्व:” के अनुसार यतिराज के दिव्य नामों को जपना अपना हक़ समझतें हैं। इसलिए मामुनिगळ हमें भी जपने को कहतें हैं:“एतिरासा! एतिरासा !    

जीयर तिरुवडिगळे शरणं

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/04/arththi-prabandham-60/

संगृहीत- http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org