पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय                                                                                                                                     श्लोक  २

श्लोक १

अंके कवेरकन्यायास्तुङ्गे भुवनमंगले ।
रंगे धाम्नि सूखासिनं वन्दे वरवरं मुनिम ॥ १ ॥

इस श्लोक मेँ देवराज गुरुजी अपने आचार्य वरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते है की इस स्तोत्र कि रचना बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाये । शास्त्र के अनुसार आचार्य को भगवान श्रीमन्नारायण के अवतार के रूप मेँ माना जाता है , शिष्य को सदैव आचार्य के नाम का जप करना चाहिये , पूर्ण रूप से उनमें निष्ठा रखना , इसके लिये गुरु जीससे प्रेम भाव रखते है उनमे प्रेम भाव रखना , गुर जब दुखी हो तो शिष्य को भी दुखी होना चाहिये । गुरु के नाम और विशेषताओं का सदैव स्मरण करना । जैसे भगवान के लिये भक्त रहता है , राजा के लिये सेवक रहता है , उसी तरह शिष्य को आचार्य के लिये पूर्ण समर्पण भाव से सेवा कैंकर्य करना चाहिये । शिष्य का परम कर्तव्य है कि अपने आचार्य का शिष्य बनकर गर्व होना चाहिये , आचार्य के श्री चरणों के चिन्हो का अनुसरण करना , सदैव उनका स्मरण करना , उनके वैभव को सुनना और दूसरों को उनकी विशेषताओं का वर्णन करना । देवराज गुरुजी शिष्य के सभी कर्तव्यों को जानते थे । वरवरमुनी स्वामीजी से संबंधित शतकम , काव्यम , चम्पु और अनेक स्तोत्रों कि रचना करने पर भी उनको समाधान नहीं था । शास्त्र बताता है कि शिष्य को अपने आचार्य कि पूर्ण दिनचर्या का वर्णन करना चाहिये । आचार्य निष्ठा और शास्त्र मेँ विश्वास रखते हुये देवराज गुरुजी ने अपने आचार्य श्री वरवरमुनि स्वामीजी कि दिनचर्या को लिखना प्रारम्भ किया और उसके सफलता के साथ समापन होने के लिये प्रार्थना कर रहे है ।

इस कार्य में श्री वरवरमुनि स्वामीजी का ज्ञान, गुण, दैनिक गतिविधियाँ और सांसारिक  इच्छाओं कि अनुपस्थिति को दर्शाता है और स्वामीजी के उपस्थिती से पूर्ण गोष्ठी पवित्र हो जाती है । तदियाराधन के पहिले जो श्रीवैष्णव सत्वगुण वाले है वे भी इसका पठन करते है और पवित्र हो जाते है । जब  तदियाराधन बड़े पैमाने पर होता है तब वहाँ पर एकत्रित लोग कम ज्ञान वाले और पारंपरिक प्रथाओं का पालन कम करनेवाले भी हो सकते है , इससे उस जगह कि पवित्रता भी कम हो जाती है । वरवरमुनि स्वामीजी उस जगह को और उपस्थित लोगों को पवित्र करते है । इसलिये इस स्तोत्र को “ पंक्तिपावनम ”भी कहते है , जो की पूर्ण गोष्ठी को पवित्र कर देता है ।

शब्दार्थ

कवेरकन्याया        –      कावेरी नदी के बीच में
तुगें                      –      अधिक
भुवनमंगले           –      दुनिया के लोगो के कल्याण हेतु
रगें धाम्नि            –      श्रीरंगम दिव्यदेश
सुखासीनं             –      बिना किसी बाधा के शांतता से
वन्दे                    –      साष्ठांग प्रणाम करना
वरवरं                  –      अलगीय मणवाल पेरूमाल के समान इनकी छवि,गुणवता को दर्शाया गया है
मुनिम                 –      वरवरमुनि स्वामीजी ,जो आचार्य को मुख्य घोषित करते है ।

मंगलम शब्द लक्ष्य प्राप्ति को संबोधित करता है । मंगलम शब्द का उपयोग कावेरी नदी और श्रीरंगम दिव्यदेश के साथ किया जाता है । रंगम शब्द भगवान श्रीरंगनाथ के प्रेम को सूचित करता है । “ सुखासीनं ” शब्द संबोधित करता है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समय में मुसलमान एवं इतर लोगों द्वारा कोई भी तकलीप का सामना नहीं करना पड़ा जैसे रामानुज स्वामीजी के समय में शैव लोगो से , पिल्लै लोकाचार्य और वेदान्त देशिक स्वामीजी के समय में मुसलमानों द्वारा तकलीप का सामना करना पड़ा ।

संस्कृत में “वन्दे ” शब्द “ वादि अभिवादन स्तुति ” को संबोधित करता है , इसका अर्थ है आदरपूर्वक नीचे बैठकर स्तोत्र पठन करते हुये आराधना करना । श्री वरवरमुनि स्वामीजी के कृपा के बिना ये दोनों ( मंगलम और वन्दे ) नहीं आ सकते है और साथ ही साथ हमारे मन, वाणी और कर्मो को मंगलमय बना देगें ।

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