यतिराज विंशति – श्लोक – १५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनय् नमः यतिराज विंशति श्लोक  १४                                                                                   … Read more

यतिराज विंशति – श्लोक – १४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनय् नमः यतिराज विंशति श्लोक  १३                                                                                   … Read more

यतिराज विंशति – श्लोक – १३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनय् नमः यतिराज विंशति श्लोक  १२                                                                                   … Read more

यतिराज विंशति – श्लोक – १२

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनय् नमः यतिराज विंशति श्लोक  ११                                                                                   … Read more

यतिराज विंशति – श्लोक – ११

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनय् नमः यतिराज विंशति श्लोक  १०                                                                                   … Read more

यतिराज विंशति – श्लोक – १०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनय् नमः यतिराज विंशति      श्लोक ९                                                                                … Read more

यतिराज विंशति – श्लोक – ९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनय् नमः यतिराज विंशति      श्लोक  ८                                                                                … Read more

अष्ट श्लोकी – श्लोक 7 – 8- चरम श्लोक

श्री: श्रीमते शठकोपाये नम: श्रीमते रामानुजाये नम: श्रीमदवरवरमुनये नम: अष्ट श्लोकी << श्लोक 5 – 6 – द्वयमंत्र अंतिम 2 श्लोक, चरम श्लोक का वर्णन करते है, जो भगवान द्वारा कहा गया है । श्लोक 7 मत्प्राप्यर्थतया मयोक्तमखिलम संत्यज्य धर्मं पुन : मामेकं मदवाप्तये शरनमित्यार्तोवसायम कुरु । त्वामेवम व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णोह्यहं मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितम कुर्यां शुचं मा कृतः ।। अर्थ … Read more

अष्ट श्लोकी – श्लोक 5 – 6 – द्वयमंत्र

श्री: श्रीमते शठकोपाये नम: श्रीमते रामानुजाये नम: श्रीमदवरवरमुनये नम: अष्टश्लोकी << श्लोक 1- 4 – तिरुमंत्र श्लोक 5 नेतृत्वं नित्ययोगं समुचितगुणजातं तनुख्यापनम् च उपायं कर्तव्यभागं त्वत् मिथुनपरम् प्राप्यमेवम् प्रसिद्धं । स्वामित्वं प्रार्थनां च प्रबलतरविरोधिप्रहाणम दशैतान मंतारम त्रायते चेत्यधिगति निगम: षट्पदोयम् द्विखण्ड: ।। अर्थ यह श्लोक, मंत्रो में रत्न, द्वय महामंत्र का विवरण प्रदान करता है। द्वय … Read more

अष्ट श्लोकी – श्लोक 1 – 4 – तिरुमंत्र

श्री: श्रीमते शठकोपाये नम: श्रीमते रामानुजाये नम: श्रीमदवरवरमुनये नम: अष्टश्लोकी << तनियन नारायण ऋषि , नर ऋषि को तिरुमंत्र का उपदेश प्रदान करते हुए (दोनों ही श्रीमन्नारायण भगवान के अवतार है) श्लोक 1 अकारार्थो विष्णुः जगदुध्यरक्षा प्रळयकृत मकारार्थो जीव: तदुपकरणम् वैष्णवमिदम । उकारो अनन्यार्हम नियमयति संबंधमनयो: त्रयी सारस्त्रयात्मा प्रणव इमामर्थम् समधिष्ठ ।। अर्थ सृष्टी, स्थिति … Read more