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शरणागति गद्य- तनियन

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

शरणागति गद्य
ramanujar-periyavachanpillai

श्रीरामानुज स्वामीजीश्रीपेरियवाच्चान पिल्लै

श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै की तनियन (उनके अद्भुत व्याख्यान के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिए यह तनियन प्रस्तुत की गयी है) –

श्रीमत कृष्ण समाह्वाय नमो यामुन शूनवे|
यत कटाक्षैक लक्ष्याणम् सुलभ: श्रीधरस्सदा ||

अर्थात: मैं श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै स्वामीजी के चरणों की आराधना करता हूँ, जो श्रीयामुन के सुपुत्र है और जिनकी कृपाकटाक्ष से अत्यंत ही सुलभता से भगवान श्रीमन्नारायण की कृपा प्राप्त होती है।

शरणागति गद्य की तनियन –

वन्दे वेदांत कर्पूर चामीकर करंडकम
रामनुजार्यमार्याणाम चूड़ामणिमहर्निषम्

अर्थात: मैं, दिन-रात श्रीरामानुज स्वामीजी की आराधना करता हूँ, जो सभी आचार्यों के मुकुटमणि के समान है, और जो उस स्वर्णिम कोष के समान है- जो कपूर जैसी सुगंध वाले वेदांत की रक्षा करते है।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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शरणागति गद्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

भगवद श्रीरामानुज स्वामीजी ने नौ उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की– श्रीभाष्य, वेदांत सारम, वेदांत दीपम, वेदार्थ संग्रहम, गीता भाष्यम, नित्य ग्रंथ, शरणागति गद्यम, श्रीरंग गद्यम और श्रीवैकुंठ गद्यम।

प्रथम तीन ग्रंथ, ब्रह्म सूत्र से सम्बंधित है, चतुर्थ ग्रंथ, वेदांत के कुछ विशिष्ट छंदों से संबंधित है, पंचम ग्रंथ, भगवद गीता पर रचित व्याख्यान है और नित्य ग्रंथ, श्रीवैष्णवों द्वारा किये जाने वाले दैनिक अनुष्ठानों (विशेषतः तिरुवाराधन) से संबंधित है।

अंतिम तीन ग्रंथ हमारे सिद्धांत की जीवनरेखा हैं– यह शरणागति के स्वरुप और उसे कैसे अनुसरण किया जाता है, उस विषय में अत्यंत सुंदर वर्णन प्रदान करता है। गद्य अर्थात छंदरहित और त्रय अर्थात तीन। क्यूंकि इस श्रृंखला में त्रय/ तीन गद्य हैं, इसलिए एक रूप में इसे गद्य त्रय भी कहा जाता है। हमारे पूर्वाचार्यों ने इन गद्य त्रय को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया है। यही कारण है कि जिनमें अन्य दिव्य संप्रदाय ग्रंथों के सार को आत्मसात करने का सामर्थ्य नहीं है, वे भी अपने आचार्य की कृपा से इन तीन ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आज की अत्यंत तेज जीवनशैली में, कभी-कभी आचार्य के लिए अपने अनुयायियों को इनके समस्त अर्थों का ज्ञान प्रदान करना कठिन हो जाता है। इसलिए इन तीन गद्यों की विशेषता को लेखों की श्रृंखला द्वारा समझाने का यह एक छोटा सा प्रयास है।

namperumal-nachiyar-serthiश्रीरंगनाच्चियार और श्रीरंगनाथ भगवान– श्रीरंगमramanuja-srirangam श्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीरंगम

श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीरंगम में पेरिय पिराट्टियार के तिरुनक्षत्र दिवस, उत्तर-फाल्गुन का चयन कर, उस दिन दिव्य दंपत्ति के श्रीचरणों में शरणागति की और अपने अनुयायियों को भी अनुकरणीय मार्ग दर्शाया। इस दिन श्रीरंगम में श्रीरंगनाथ भगवान और श्रीरंगनाच्चियार दोनों एक ही सिंहासन पर विराजमान होकर अपने दासों पर कृपा करते हैं। यह वर्ष का एकमात्र दिवस है, जब दिव्य दंपत्ति एक साथ विराजते हैं। श्रीरंगनाच्चियार के साथ विराजे भगवान श्रीरंगनाथ अपना सख्त स्वरुप त्यागकर, अपने दासों पर दया करते हैं। इसलिए श्रीरामानुज स्वामीजी ने इस दिन का चयन किया।

सर्वप्रथम उन्होंने पेरिय पिराट्टीयार के श्रीचरणों में शरणागति की, और तद्पश्चात नम्पेरुमाल के श्रीचरणों में। शरणागति गद्य में इसी की व्याख्या की गयी है। फिर उन्होंने श्रीरंग गद्य की रचना की, जो विशेषतः श्रीरंगम में विराजे नम्पेरुमाल के प्रति समर्पित है। तृतीय गद्य (श्रीवैकुंठ गद्य) में श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीवैकुंठ की विशेषताओं का वर्णन करते हैं, जिससे प्रपन्न (वह प्राणी जो प्रपत्ति अथवा शरणागति करता है) उस स्थान के महत्त्व को समझ सके जहाँ मोक्ष (लौकिक संसार से, जन्म मरण के चक्र से मुक्ति) प्राप्ति पर उन्हें जाना है।

periyavachan-pillaiश्रीपेरियवाच्चान पिल्लै

इस गद्य के अर्थों का प्रयास, परमकरुणाकर श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान पर आधारित है। शरणागति गद्य में 23 चूर्णिकायें हैं (एक चूर्णिका लगभग एक परिच्छेद के समान है)। सर्वप्रथम प्रत्येक चूर्णिका के शब्दों का अर्थ समझाया गया है और फिर श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान के माध्यम से श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा प्रकट किये गए सार को समझाया गया है। हम श्रीवेलुक्कुड़ी श्री उ.वे. कृष्णन स्वामीजी के आभारी हैं, जिनके कालक्षेप के द्वारा श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै के अद्भुत व्याख्यान को समझने में सहायता प्राप्त हुई।

अब हम इस अद्भुत ग्रंथ के हिंदी अनुवाद को प्रारंभ करेंगे।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

अंग्रेजी संस्करण – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/11/saranagathi-gadhyam/

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अष्ट श्लोकी – श्लोक 7 – 8- चरम श्लोक

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

अष्ट श्लोकी

<< श्लोक 5 – 6 – द्वयमंत्र

githai-karappangadu-wrapperअंतिम 2 श्लोक, चरम श्लोक का वर्णन करते है, जो भगवान द्वारा कहा गया है ।

श्लोक 7

मत्प्राप्यर्थतया मयोक्तमखिलम संत्यज्य धर्मं पुन :
मामेकं मदवाप्तये शरनमित्यार्तोवसायम कुरु ।
त्वामेवम व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णोह्यहं
मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितम कुर्यां शुचं मा कृतः ।।

अर्थ

मेरी प्राप्ति हेतु, मेरे कहे अनुसार अन्य सभी उपाय (कर्म, भक्ति ,ज्ञान योग) को छोड़कर, केवल मेरी शरण को ही अपना उपाय मानकर, निश्चिन्त होकर, दृढ़ विश्वासित रहो। इस दृढ़ विश्वास के रहने पर, मैं, अपने ज्ञान एवं कल्याण गुणों के द्वारा, इस मार्ग में उत्पन्न होने वाले सभी विरोधि तत्वों से तुम्हें मुक्त करूँगा और मोक्ष प्रदान करूँगा।

श्लोक 8

निश्चित्य त्वदधीनतां मयी सदा कर्माध्युपायान् हरे
कर्तुमं त्यक्तुमपि प्रपत्तुमनलम सिद्धामी दुःखाकुल:।
एतज्ज्ञानमुपेयुषो मम् पुनस्सर्वापराधक्षयम्
कर्तासीति दृदोस्मि ते तु चरमं वाक्यं स्मरन् सारथे: ।।

अर्थ

हे प्रभु! मैं अपने कर्मों को न उत्तम प्रकार से निभा पाने में समर्थ हूँ, न ही उन्हें त्यागकर आपकी शुद्ध शरणागति करने में समर्थ हूँ। मैं इस शोक से अत्यंत दुखी हूँ। क्यूंकि आपने अपनी कृपा से मुझे यह भाव और ज्ञान प्रदान किया है तों में आश्वस्त हूँ कि आप चरम श्लोक में कहे अनुसार ही आप मेरे अज्ञान, दोष और अन्य बाधाओं को हटाकर मेरी रक्षा करेंगे और मुझे अपनाएंगे।

अष्ट श्लोकी यहाँ संपन्न होती है।

श्रीआलवारों के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीआलवन्दार के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ
श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – श्लोक 5 – 6 – द्वयमंत्र

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

अष्टश्लोकी

<< श्लोक 1- 4 – तिरुमंत्र

vishnu-lakshmi

श्लोक 5

नेतृत्वं नित्ययोगं समुचितगुणजातं तनुख्यापनम् च उपायं
कर्तव्यभागं त्वत् मिथुनपरम् प्राप्यमेवम् प्रसिद्धं ।
स्वामित्वं प्रार्थनां च प्रबलतरविरोधिप्रहाणम दशैतान
मंतारम त्रायते चेत्यधिगति निगम: षट्पदोयम् द्विखण्ड: ।।

अर्थ

यह श्लोक, मंत्रो में रत्न, द्वय महामंत्र का विवरण प्रदान करता है। द्वय के दो अंग और छः शब्द है। इसमें दस अर्थ निहित हैं। १) जीवात्मा को भगवान द्वारा निर्धारित मार्ग में प्रशस्त करना २) भगवान और श्रीमहालक्ष्मी से नित्य मिलन की स्थिति ३) दिव्य गुण समूह, जो केवल परमात्मा के ही अनुकूल है ४) ईश्वर का अत्यन्त सुन्दर स्वरूप ५) उपाय स्वरुप अर्थात परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ६) चेतन/ जीवात्मा के कर्त्तव्य ७) श्रीमहालक्ष्मी संग उपस्थित भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति कैंकर्य ८) अत्यंत सुंदर संबंध, जो सत्य है ९) उनके कैंकर्य की प्रार्थना १०) कैंकर्य के विघ्न, बाधाओं से मुक्ति। वैदिक शास्त्र में निपुण लोगों का मानना है कि द्वय मन्त्र के इन अर्थो का निरंतर ध्यान करने से प्रपन्न की रक्षा होती है।

श्लोक 6

इशानाम् जगथामधीशदयिताम नित्यानपायां श्रियं
संश्रित्ठयाश्रयणोचित अखिलगुणस्याङ्ग्रि हरेराश्रये ।
इष्टोपायतया श्रियाच सहितायात्मेश्वरायार्थये
कर्तुं दास्यमसेशमप्रतिहतम नित्यं त्वहं निर्मम: ।।

अर्थ

इस श्लोक में, श्री लक्ष्मीजी के माध्यम से भगवान का कैंकर्य प्राप्त करने की प्रार्थना की गयी है। मैं इस ब्रह्माण के स्वामी के चरणों में श्रीमहालक्ष्मीजी के माध्यम से आश्रय लेता हूँ, जो उन स्वामी से सम्पूर्ण रूप से प्रीति करती है। मेरे आश्रय को स्वीकार करने के वाले वे सभी गुणों से संपन्न है और मेरे मोक्ष, जो उनके द्वारा ही प्रदत्त है, के लिए मेरे एकमात्र साधन है।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – श्लोक 1 – 4 – तिरुमंत्र

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

अष्टश्लोकी

<< तनियन

nara-narayananनारायण ऋषि , नर ऋषि को तिरुमंत्र का उपदेश प्रदान करते हुए (दोनों ही श्रीमन्नारायण भगवान के अवतार है)

श्लोक 1

अकारार्थो विष्णुः जगदुध्यरक्षा प्रळयकृत
मकारार्थो जीव: तदुपकरणम् वैष्णवमिदम ।
उकारो अनन्यार्हम नियमयति संबंधमनयो:
त्रयी सारस्त्रयात्मा प्रणव इमामर्थम् समधिष्ठ ।।

अर्थ

सृष्टी, स्थिति एवं संहार, तीनों करने वाले साक्षात भगवान विष्णु ही तिरुमंत्र में “अ” अक्षर का अर्थ है। “म” अक्षर चेतनो को,जीवों को दर्शाता है, जिनके अनुभव के लिए सारी सृष्टि उपकरण हैं। अक्षर “उ”, इन दोनों के मध्य के विशेष संबंध को प्रस्तुत करता है, जो किसी भी अन्य के समान नहीं है। इसप्रकार, ॐ शब्द, जो प्रणव है, सभी वेदों के सार को स्थापित करता है।

श्लोक 2

मन्त्रब्रह्मणि मध्यमेन नमसा पुंस स्वरूपं गति:
गम्यम् शिक्षितमीक्षितेन परत: पश्चादपि स्थानत:।
स्वातंत्र्यम् निजरक्षणम् च समुचिता वृत्तिश्च नांयोचित
तस्यैवेति हरेर्विवीच्य कथितं स्वस्यापि नारहं तत : ।।

अर्थ

तिरुमंत्र के मध्य में उपस्थित “नम:” शब्द द्वारा जीव की गति, उस गति का साधन तथा जीव का स्वरूप, इन त्रय विषयों को दर्शाया गया है। स्वतंत्रता, स्वरक्षण, और भगवान के अलावा अन्यों से अनुकूलता न रखना, उपरोक्त बताये स्वरुप गुणों को प्रकट करते हुए जोर देता है कि भगवान के शेषभूत होते हुए भी, जीवात्मा को इस आनंद अनुभव का कोई भान नहीं है।

श्लोक 3

अकारार्थायैव सवमहमथ मह्यं न निवहा:
नराणाम् नित्यानामयनमिति नारायणपदम् ।
यमाहास्मै कालम सकलमपि सर्वत्र सकलासु
अवस्थास्वावि:स्युः मम् सहज कैंकर्यविधय: ।।

अर्थ

मैं भगवान का हूँ, अपना नहीं हूँ। “नारायण” शब्द दर्शाता है कि जीवात्माओं एवं क्षर विषय सारों के लिए मात्र भगवान ही परम गति है। भगवान के प्रति कैंकर्य जीवात्मा का नैसर्गिक स्वभाव है। वह यह भी समझाता है कि हर काल, हर अवस्था में उनका कैंकर्य करना ही स्वभाव है।

श्लोक 4

देहासक्तात्मबुद्धिर्यदि भवति पदम् साधु विद्यात्तृतीयं  
स्वातंत्र्यान्धो यदिस्यात् प्रथममित्रश्शेषत्वधिश्चेत द्वितीयं ।
आत्मत्रहाणोन्मुखस्चेन्नम इति च पदम् बांधवाभासलोल:
शब्दं नारायणाख्यम् विषयचपलधीश्चेत चतुर्थीम प्रपन्न: ।।

अर्थ

इस श्लोक में प्रपत्ति मार्ग को अपनाने वाले, भगवान के शरणागत मुमुक्षुओं, जिन्होंने अपने मोक्ष के उपाय स्वरुप भगवान को अपना सम्पूर्ण आश्रय स्वीकार किया है, उनकी शंकाओं के निवारण के लिए कुछ स्पष्टीकरण प्रदान किये गए है। जब भी देह और आत्मा के भेद के विषय में शंका उत्पन्न हो, तब तृतीय अक्षर “म” की ओर देखकर उस शंका का निवारण करना चाहिए। उसके द्वारा यह समझा जा सकता है कि निंद्रा अथवा म्रत्यु के समय देह का बोध नहीं रहता है, देह आत्मा से भिन्न है। इसलिए वह ज्ञान का आधार नहीं है। एक बार यह ज्ञात होने पर कि देह नहीं अपितु आत्मा ही ज्ञान का आधार है, वह इस तत्व को भी जान सकता है कि आत्मा स्वयं स्वतंत्र नहीं है अपितु भगवान द्वारा पोषित है, जैसा “अ” अक्षर द्वारा प्रकटित है। एक बार यह ज्ञात होने पर कि आत्मा, भगवान नारायण की संपत्ति है, वह यह भी जान जायेगा की द्वितीय अक्षर “उ” भी यही दर्शाता है कि जीवात्मा मात्र उनकी ही दास है। जब स्वयं के रक्षण की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, तब “नमः” पद के अर्थों को देखना चाहिए, जिसका अर्थ है “मेरा नहीं”। लौकिक संबंधों के प्रति उत्पन्न भ्रम की स्थिति में उसके द्वारा समझा जा सकता है कि यह सभी संबंध क्षणिक और अनित्य है और केवल भगवान के साथ संबंध ही नित्य है। जब सांसारिक मोह उत्पन्न हो, तब वह चतुर्थ अक्षर “आय” का ध्यान कर, भगवान के प्रति कैंकर्य ही जीवात्मा का स्वरुप है, उसका स्मरण करके सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – तनियन

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:

अष्टश्लोकी

azhwan-bhattar-srirangamश्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीपराशर भट्टर – श्रीरंगम

श्री पराशर भट्टार्य श्रीरंगेश पुरोहित: ।
श्रीवत्सांग सुत : श्रीमान् श्रेयसे मेस्तु भुयसे ।।

श्री रंगनाथ भगवान के पुरोहित और श्रीवत्सांग (श्रीकुरेश स्वामीजी) के पुत्र, श्रीपराशर भट्टर जो दिव्य गुण संपत्ति से परिपूर्ण है, वे मुझे श्रेय प्रदान करे।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:

namperumal-nachiar_serthi2

parasara-bhattarश्रीपराशर भट्टर

रहस्य त्रय के गहरे अर्थों को प्रकाशित करने के लिए श्री पराशर भट्टर ने अत्यंत कृपापूर्वक अष्ट श्लोकी नामक स्तोत्रमाला की संस्कृत में रचना की। यह रहस्य त्रय को विस्तृत रूप से प्रस्तुत करने वाला पहला प्रबंध है।

न्याय वेदांत विद्वान् दामल वंकीपुरम श्री उ. वे. पार्थसारथि स्वामी ने सरल तमिळ में इस प्रबंध का अनुवाद किया है। हम उस के हिन्दी अनुवाद को यहाँ देखते है।

इन आठ श्लोकों के अलावा इस पबंध के रचयिता श्रीपराशर भट्टर के यश को स्थापित करती वंदन तनियन भी प्रस्तुत है।

इस प्रबंध को आगे निम्न अनुच्छेदों में देखेंगे।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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श्री देवराज अष्टकम् – श्लोक

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:

thirukkachi-nambi-kanchi varadhar-3

श्लोक 1

नमस्ते हस्त्भी शैलेष ! श्रीमन ! अम्भ्जलोचन !
शरणं त्वां प्रपन्नोस्मी प्रणतार्ति हराच्युत ! ।।

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हे हस्तगिरी नाथ! श्रीपति! अरविंदाक्ष! आपके चरणों में प्रणाम है। आप उनके दुखों का नाश करते है, जो आपके चरणों की आराधना करते है। आप अच्युत है, अपने दासों की सदा रक्षा करने वाले। मैं आपके चरणों में आश्रय लेता हूँ।

श्लोक 2

समस्त प्राणी संत्राण प्रवीण करुणोलबण
विलसंतु कटाक्षास्ते मय्यस्मिन जगतांपते ।।

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आप सभीजन की रक्षा करने में पुर्णतः सक्षम, दया/ कृपा से परिपूर्ण, इस जगत के एक मात्र रक्षक है। आपकी कृपामय दृष्टि मुझ पर भी अनुग्रहित हो।

श्लोक 3

निन्दिताचार करणं निवृत्तम कृत्य कर्मण:
पापियांसं अमर्यादम् पाहिमाम् वरद प्रभो! ।।

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हे देवराज! उत्तम मनुष्यों द्वारा निषेध कार्यों को करनेवाला, अपने विहित कर्तव्यों को न करनेवाला, अपराधो में लिप्त और अनुशासनहीन मेरी, कृपया आप रक्षा करें।

श्लोक 4

संसार मरुकांतारे ध्रुव्याधि व्याग्र भीषणे
विषय क्षुद्र गुलमाद्ये तृषा दपशालिनी ।।

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श्लोक 5

पुत्र धार गृह क्षेत्र मृग तृषण्म्बू पुष्कले
कृत्या कृत्य विवेकान्दम परिभ्रान्तं इतस तथ: ।।

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श्लोक 6

अजश्रम जात तृष्णार्थ अवसंनांगमक्षमम्
विलसंतु कटाक्षास्ते मय्यस्मिन जगतांपते ।।

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श्लोक 7

संतप्तं विविदैर दु:खै: ध्रुवचैरेवमाधीभि
देवराज ! दयासिंधो देव देव जगतपते ।।

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श्लोक 8

त्वाधिक्षण सुधासिंधु विचि विक्षेपसिकरै
कारुण्य मरूतानितै शीतलैरभीशिन्चमाम् ।।

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इन पांच श्लोकों में वे अपनी स्थिति को उपमा के द्वारा दर्शाते है और देवराज भगवान से अपनी रक्षा की विनती करते है। यह जीवन एक मरुस्थल है। इस मरुस्थल में रोग भयावह व्याघ्र के समान है। यहाँ, तुच्छ सुख आदि काँटों के समान है। वासनाएं, पेड़ के समान है। पत्नी, संतान, घर, भूमि, संपत्ति आदि इस मरुस्थल में मृगजल के समान है। इस मरुस्थल में यह जाने बिना ही कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, मैं एक विक्षिप्त मनुष्य के समान भटक रहा हूँ, वह करते हुए जो नहीं करना चाहिए और उसे न करते हुए जिसे करना चाहिए, शरीर से दुर्बल, निर्बल/ क्षीण, मंद बुद्धि, सभी कार्यों में अयोग्य, आपके प्रति भक्ति से हीन, हे देवराज! दयासागर! देवो के देव! आप अपनी दया की शीतल पवन के द्वारा मेरी रक्षा करें, जो आपके आनंदायी रूप और आपकी प्रभूत कृपा की तरंगों से जल की बूंदों के समान बरसती है। मैं याचना करता हूँ कि आपकी यह कृपामयी दयादृष्टि मुझ पर भी हो।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

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श्री देवराज अष्टकम् – तनियन

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:

श्री देवराज अष्टकम्

1. thyaga-mandapam

श्रीमत कांची मुनिं वन्दे कमलापति नन्दनं |
वरदान्घ्री सदा संग रसायन परायणं ||

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मैं श्रीकांचिपूर्ण स्वामीजी, श्रीकमलापतिजी के पुत्र को प्रणाम करता हूँ, जो श्रीवरदराज के प्रति अनवरत भक्ति रसायन के आश्रित है।

देवराज दया पात्रं श्री कांची पूर्णं उत्तमं |
रामानुज मुनेर मान्यं वन्देहम् सज्जनाश्रयम् ||

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मैं श्रीकांचिपूर्ण स्वामीजी को प्रणाम करता हूँ, जो श्रीवरदराज भगवान के कृपा पात्र, श्रीरामानुज स्वामीजी के सम्मान और उत्तम जन के लिए आश्रय है।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

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श्री देवराज अष्टकम्

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:

1.dhevaperumal-nachiyars-perundhevi-thayar-e1449467380568

पेरुन्देवित् तायार, देव पेरुमाल (श्रीवरदराज भगवान) उभय नाच्चियार के साथ – कांचीपुरम

2.thirukkachi-nambi-kanchi

श्री कांचिपूर्ण स्वामीजी– कांचीपुरम

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श्री कांचिपूर्ण स्वामीजी ने कृपा करके श्री देवराज अष्टकम् (8 श्लोक) नामक एक सुंदर संस्कृत स्तोत्र प्रबंध की रचना की जो पेरुन्देवित् तायार के स्वामी देव पेरुमाल (श्रीवरदराज भगवान) की महिमा का गान करता है।

न्याय वेदांत विद्वान् दामल वन्गिपुरम श्री ऊ.वे. पार्थसारथी ऐयेंगार स्वामी ने इस अद्भुत प्रबंध का अनुवाद सरल और सुगम तमिल भाषा में किया है। हम यहाँ उसके हिंदी अनुवाद को देखेंगे।

हम इसे निम्न अंकों में देखेंगे:

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

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