आर्ति प्रबंधं – ५८

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

पिछले पासुरम के “तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै वासमलर ताळ अडैंद वत्तु” से मामुनि खुद को तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के चरण कमलों को चाहनें वाले वस्तु घोषित करतें हैं। वें आगे कहतें हैं कि तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के संबंध (आचार्य और शिष्य) से ही वें श्रीरामानुज के संबंध की महत्वपूर्णता को पेहचान और समझ सकें।   

 

पासुरम ५८

एंदै तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै इन्नरुळाल

उंदन उरवै उणर्तिय पिन इंद उयिर्क्कु

एल्ला उरवुम नी एनड्रे एतिरासा

निल्लाददु उनडो एन नेंजु

 

शब्दार्थ

एंदै – (मामुनिगळ कहतें हैं) “ एक कहावत हैं: “तिरुमंत्र मातावुम  पिता आचार्ययनुम एनड्रु अरुळि चेयवर्गल’ . इसके आधार पर मेरे पिता तिरुवाईमोळिपिळ्ळै।   

तिरुवाईमोळिपिळ्ळै – उन्के

इन्नरुळाल  – निर्हेतुक कृपा

उंदन उरवै – (मुझे समझाएं) आपके चरण कमलों में उपस्थित सारे संबंध

इंद उयिर्क्कु  – जो इस आत्मा से जुड़े हैं

उणर्तिय पिन –  मेरे अज्ञान को मुझे

एतिरासा  –  हे एम्पेरुमानार !

नी एनरे –  आप ही तो हैं?

एल्ला उरवुम – तिरुमंत्र में कहे गए सारे बंधन?

एन नेंजु निल्लाददु उनडो  – क्या ऐसा भी समय आयेगा जब मेरे हृदय में शंका उठेगा ( उत्तर हैं: कभी नहीं ). यहाँ “तंदै नट्राय तारम तनयर पेरुंजेल्वम एन्दनुक्कु नीये” तथा “अल्लाद सुट्रमागी” को याद करना है।  

 

सरल अनुवाद

मामुनि कहतें हैं कि उन्के आचार्य और आत्मिक पिता तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के कृपा से ही उन्हें श्री रामानुज के संग उपस्थित अपने सारे रिश्तों का एहसास हुआ। आचार्य कृपा में अज्ञान मिटाकर रक्षा किया। इस्के पश्चात मामुनि प्रश्न करतें हैं कि: क्या ऐसा भी समय आएगा जब उनका मन अपने दृढ़ विशवास से हिलेगा ? और इस्का निश्चित उत्तर है : कभी नहीं।       

स्पष्टीकरण

मामुनि कहतें हैं, “ एक कहावत है:तिरुमंत्र मातावुम  पिता आचार्ययनुम एनड्रु अरुळि चेयवर्गल। उसके आधार पर मेरे आत्मिक पिता तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के निर्हेतुक कृपा ने ही आप्के (श्री रामानुज के) चरण कमलों के संग उपस्थित इस आत्मा के सारें बंधनों को समझाये। हे एम्पेरुमानार! मेरे अज्ञान को मिटाकर मेरी रक्षा करने वाले आप ही तो तिरुमंत्र में सारे बंधनों के रूप में कहें गए हैं। क्या ऐसा भी समय आएगा जब उनका मन अपने दृढ़ विशवास से हिलेगा ?(और इस्का निश्चित उत्तर है : कभी नहीं). इस क्षण में (आर्ति प्रबंधं ३)”तंदै नट्राय तारम तनयर पेरुंजेल्वमएन्दनुक्कु नीये ” तथा (आर्ति प्रबंधं ५४) “अल्लाद सुट्रमागी” का अवश्य स्मरण करें।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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