Daily Archives: September 5, 2016

पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ३२

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ३१

श्लोक ३२

ततश्शुभाश्रये तस्मिन्निमग्मं निभृतं मनः
यतीन्द्रप्रणवं कर्तुम् यतमानम् नमामि तं ३२॥

शब्दार्थ

ततः               – योग का अभ्यास के बाद अन्यथा जिसे भगवान का ध्यान कहते है,
तस्मिन्          – पूर्व मे जिस प्रकार कहा गया,
सुभाश्रये         – वो परमपुरुष भगवान जिनका ध्यान योगी करते है,
निमग्नम्        – पूर्णरूप से निमग्न,
निभृतम्          – निष्ठा से,
मनः               – अपने मन को,
यतीन्द्रप्रणवम् – श्री यतिराज (यतीन्द्र) पर अत्यन्त अनुरक्त होकर,
यतमानम्       – कोशिश करते हुए,
तम्                – ऐसे श्री वरवरमुनि ,
नमामि           – मै भजता हूँ ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

यहाँ यतीन्द्रप्रणवंकर्तुम् अर्थात यतीन्द्रप्रवणमेवकर्तुम् । माने श्री वरवरमुनि ने सारे नित्यकर्मानुष्ठान जैसे भगवदभिगमन और अन्य विधियाँ को श्री यतिराज के दिव्यचरणकमलों का ध्यान करते हुए सम्पूर्ण किया जो सौलह्वे श्लोक मे पूर्व ही प्रतिपादित है – “यतीन्द्रच्चरणात् द्वन्त प्रवणेनैव चेतसा” । अतः आप श्रीमन ने अपने प्रिय श्री-भविष्यदाचार्य-श्रीरामानुजाचार्य की प्रतिमा का ध्यान किया ।  भगवान का वह दिव्यमंगलस्वरूप जिसका केवल स्मरण मात्र से सर्वदुःखों का नाश होता है, जो ध्यान के योग्य है और ध्यानावस्था को प्रभावित करता है, ऐसा स्वरूप हमारे श्री वरवरमुनि को अपनी ओर आकर्शित कर रहा है । केवल चरमपर्व (आचार्याभिमान – पंञ्चमोपाय) के उपाय के आधारपर अगर श्री एरुम्बियप्पा श्री वरवरमुनि को भजते है , तो वह आसानी से चरमपर्व को सिद्ध करते है और इसी कारण उन्होने “यतीन्द्र प्रवणम् कर्तुम् यतमानम् नमामि तम्” का प्रयोग किया है ।

जीयर तिरुवडिगले शरणम
पूर्व दिनचर्या सम्पन्न

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ३१

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श्रीमते शठकोपाय नमः
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परिचय

श्लोक ३०                                                                                                 श्लोक ३२

श्लोक ३१

अब्जासनस्थमवदातसुजातमूर्तिं   आमीलितक्षमनुसंहितमन्त्ररत्नम्
आनम्रमौलिभिरुपासितमन्तरंगैः  नित्यम् मुनिम् वरवरम् निभृतो भजामि ३१॥

शब्दार्थ

अब्जासनस्थम्             – (वह) जो भगवान का ध्यान करने हेतु पद्मासन मे बैठे हुए है,
अवदात सुजात मूर्तिम्   – (वह) जिसका शरीर अत्यन्त सुन्दर और रमणीय है और जिसका रंग गाढे दूध के समान है,
आमीलित लक्षम्           – जिनके नेत्र थोडे थोडे बन्द है (जो भगवान का दिव्यमंगलस्वरूप के ध्यान करने के कारण अपने                                       नेत्रों को थोडा सा बन्द किया है और यही उनके नेत्रों को शामक दे रहा है),
अनुसम्हित मन्त्ररत्नम्  – ध्यानावस्था मे धीरे और गुप्त रूप से मन्त्ररत्न (द्व्यमहामन्त्र) का जप कर रहे है,
आनम्रमौलिभिः             – (जिसने) पूजा करते समय पूर्ण रूप से अपने मस्तिष्क को झुका दिया है,
अन्तरंगैः                      – अपने आन्तरिक भगवद्बन्धुवों (जैसे कोइल् अण्णन्, प्रतिवादिभयन्करम् अण्ण और अन्य                                           शिष्यों) के साथ,
उपसितम्                     – (जो) हर वक्त पूजा कर रहे है, वरवरम् मुनि – मणवाळमहामुनि,
निभृतस्सन्                  – गंभीरता/दृढता से,
नित्यम् भजामि            – नित्य भजता हूँ

भावार्थ (टिप्पणि) –

यहा ज्ञात किया जा रहा है की विश्वामित्रजी ने योग के विषय मे इस प्रकार कहा है – कि एक योगी को ऐसी जगह मे योगसिद्ध करना चाहिये जहाँ ज़्यादा तेज़ हवा ना चलती हो, जहाँ उतार चढाव ना हो, और वह जगह सुन्दर सुशील हो । वहाँ लकडी के आसन को रखकर अपने सर्वांगों को नियन्त्रित कर आसन पर स्वच्छ कपडे, मृगचर्म और घास को फैलाकर उसपर बैठकर भगवद्ध्यान करना चाहिये । धर्मशास्त्र के अनुसार एक योगी को अपने दोनो नेत्रों को अपने नाक के अग्रभाग मे केन्द्रित कर ध्यान करना चाहिये । श्री विष्णु तत्व मे कहा गया है – (ऐसे) योगी (जो) परमात्मा रूपी भगवान के दिव्य गुणों से संबन्धित मन्त्रों के ध्यान से मन्त्रमुग्ध होकर जिसके नेत्र अश्रु से भर गये हो और अश्रु की धारा बह रही हो, (जो) भगवान के अधीन हो, और ऐसी अनुभूति का रसास्वादन कर रहा हो वह सदैव हर किसी से देखने योग्य है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ३०

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परिचय

श्लोक २९                                                                                                   श्लोक ३१

श्लोक ३०

ततश्चेतस्समधाय पुरुषे पुष्करेक्षणे
उत्तंसितकरद्वन्द्वमुपविष्टमुपह्वरे ३०॥

शब्दार्थ

ततः               – प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात,
पुष्करे एक्षणे   – परमपुरुष कमलनयन श्री कृष्ण भगवान को,
चेतः समाधाय – एक चित्त/ दृध होकर,
उत्तम्सित करद्वन्दम् यदा तदा – अपने दोने हाथों को सर के उपर रखकर नमस्कार करते हुए,
उपह्वरे           – एकान्त जगह मे,
उपविष्टम्       – (पूजा करते हुए) मणवाळमहामुनि जो पद्मासन जैसे योगासन मे बैठे है ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

अनुयाग (भोजन) के पश्चात, शास्त्र कहता है – परमात्मा का ध्यान करना चाहिये । इस श्लोक मे यही बताया जा रहा है । जैसे भगवदाराधन तीन बार किया जाता है उसी प्रकार योगाभ्यास भी तीन बार किया जाता है और आगे इसी को बताया गया है । योग माने एक चित्त होकर, बिना हस्तक्षेप के, अपने हृदय मे परमात्मा के दिव्यमंगलस्वरूप का ध्यान करना । भगवान परमात्मा के रूप मे सर्व योनियों जैसे मनुष्य, स्वर्ग के देवगण, पशु, पक्षि इत्यादि मे व्याप्त है । इसी को हम श्री भगवान विष्णु की प्रत्येक विषयवस्तु मे सर्वव्यापकता कहते है । इसी विषय मे श्री पराशरमुनि कहते है – योगाभ्यास करने वालों को अपने हृदय मे परमात्मास्वरूपी अर्चाभगवान का ध्यान करना चाहिये । तैत्त्रियोपनिषद कहता है – ये वही भगवान है जिनका दिव्यमंगल-परमात्मा-स्वरूप हृदय के बींच मे विराजमान है और वही सूर्यग्रहमण्डल के मध्यस्थ भाग मे विराजमान है । छान्दोग्य उपनिषद कहता है – (वह) जो सूर्यमण्डल मे निवास करता है वह कमलनयन है । अतः “पुरुषे पुष्करेक्षणे” शब्द का अर्थ है – वही कमलनयन भगवान जो श्रीमणवाळमहामुनि जैसे योगियों के हृदय मे निवास कर रहे है । “पुरिचेते” शब्द की व्युत्पत्ति का अर्थ यह है – (वह) दिव्यमंगल आनन्दमय अर्चारूपी भगवान जो योगियों के हृदय मे बसे है । “पुरुष” माने भगवान विष्णु जो परमपुरुष है । योग का मूल शब्द है – “युजि समाधौ” माने समाधि – “एक चित्त होकर भगवान का ध्यान करना” ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २९

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परिचय

श्लोक २८                                                                                                     श्लोक ३०

श्लोक २९

आराध्य श्रीनिधिम् पश्चादानुयागम् विधाय
प्रसादपात्रं माम् कृत्वा पश्यन्तं भावयामि तं २९॥

शब्दार्थ

पश्चात्                – तत्पश्चात माध्याह्निक नित्यकर्मानुष्ठानों को सम्पूर्ण कर,
श्रीनिधिम्            – अपने आराध्य अर्चारूपि अरंगनगरप्पन् भगवान,
आराध्य               – की आराधना (अत्यन्त विद्धि-श्रद्धा पूर्वक किये),
अनुयागम् विधाय – भगवान को समर्पित प्रसाद को ग्रहण (किये),
माम्                    – मुझे (जबकी मै अप्रवृत होकर प्रसाद की ओर नही देख रहा था),
प्रसादपात्रम् कृत्वा – (ऐसे मुझको) उन्होने शेष प्रसाद का पात्र दिया और उनके दिव्य शेष प्रसाद को ग्रहण करने के                                          तत्पश्चात,
पश्यन्ताम्           – जो मुझको कृपापूर्वक देख रहे है,
तम्                     – ऐसे श्री वरवरमुनि,
भावयामि            – का मै ध्यान सदा करूंगा ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

इस श्लोक मे आराध्य का अर्थ है परीपूर्णरूप से खुद की संतुष्टि से की गई भगवान की पूजा । शान्डिल्य स्मृति कहता है – जिस प्रकार एक राजा या राजकुमार को, अपने सुशील अतिथियों को, और मदमस्त हाथी को खुश करते है उसी प्रकार भगवान की पूजा प्रेम-भक्ति और भय से करना चाहिये । आगे, जिस प्रकार एक पतिव्रता स्त्री (पत्नी) अपने पती की सेवा करती है, एक माँ अपने शिशु की सेवा करती है, एक शिष्य अपने गुरु की सेवा करता है, और वह जिसने मन्त्रोपदेश पाकर मन्त्र की उपासना जिस प्रकार करता है, थीक उसी प्रकार भगवान की सेवा करनी चाहिये । इसी कथानुसार श्री वरवरमुनि अपने आराध्य भगवान की पूजा करते थे । अनुयागम् का अर्थ है – भगवान की विधि अनुसार पूजा करना जिसके बाद भगवान के प्रसाद को ग्रहण करना । श्री भारद्वाज मुनि कहते है कि सबों को परिषेचन (पीने का पानि को छिडककर) करने के तत्पश्चात आहार ग्रहण करना चाहिये और भगवान जो प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान है उनकी ओर से अन्न को इन उपरोक्त पांच रूपों मे ग्रहण करना चाहिये । श्री शाण्डिल्य ऋषि कहते है – सबों को भगवान की पूजा करनी चाहिये जो सबों के हृदय मे परमात्मा के रूप मे विराजमान है और तीर्थ ग्रहण करते वक्त “ओम् प्राणाय स्वाहा” मन्त्र से अपने मुह मे ग्रहण करना चाहिये और इस प्रकार अपने मुह मे यज्ञ करना चाहिये । तत्पश्चात बिना भागते हुए भगवान का ध्यान करते हुए, और बिना किसी शिकायत के (जैसे नमक कम, मिर्ची ज़्यादा, ज़्यादा इमली इत्यादि विचारों को त्यागकर) भगवद्-प्रसाद को  ग्रहण करण चाहिये । इसके अतिरिक्त श्री शान्डिल्य के अनुसार भगवत्-प्रसाद के निम्नलिमित विशेषताये जैसे स्वच्छता, सीमित मात्रा मे उपलब्ध, स्वाद, दिल से स्वीकृत, शुद्ध देसी घी का चिपचिपाहट, देखने मे रमणीय, और कम गर्म इत्यादि का रसास्वादन करना चाहिये । अनुयागम् विधय च शब्द मे ‘च’ माने श्री वरवरमुनि खुद प्रसाद ग्रहण करने से पहले उपस्थित सभी श्रीवैष्णवों के लिये प्रसाद का प्रबन्ध करते थे और फिर प्रसाद खाते थे । यहाँ विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये की एरुम्बियप्पा के वरवरमुनि-काव्य के अनुसार पहले वह श्री वैष्णवों को स्वच्छ, शुद्ध, रमणीय, अत्यन्त रुचीदायक, मनमोहक, अत्यन्त मधुर, महकीला, कोमल, मुँह मे पानि लाने वाला, और अत्यन्त शुद्ध मनस से भगवान् को समर्पित प्रसाद को खिलाकार तत्पश्चात स्वयम् खाते थे । अतः प्रसाद का वितरण केवल उपस्थित श्रीवैष्णवों के लिये इति भावना से करके, और इससे अपने आप को सन्तुष्ट कर वरवरमुनि प्रसाद ग्रहण करते थे । कहा जाता है कि पूर्व घटना मे एरुम्बियप्पा ने श्री वरवरमुनि के शेषप्रसाद का तिरसकार किया क्योंकि यह प्रथा है कि किसी को भी एक संयासि का शेष ग्रहण नही करना चाहिये और संयासि के प्रात्र मे प्रसाद ग्रहण करना भी अनुचित है । एरुम्बियप्पा ने अपने अनैतिक व्यवहार से यह किया और इस घटना मे उन्होने अपने आप को सही किया । पश्यन्ताम् भावयामि शब्द का अर्थ है – मै ऐसे श्री वरवरमुनि को भजता हूँ जो मेरी ओर देख रहे है । इसके साथ साथ यह भी अर्थ दर्शाता है कि श्री वरवरमुनि को एरुम्बियप्पा के व्यवहार ने आश्चर्यचकित और मन्त्रमुग्ध कर दिया और सोच रहे है यह कैसा परिवर्तन है कि जिसने पूर्व मेरे शेष का तिरस्कार किया और अभी अत्यन्तानन्द भाव से खा रहे है । अतः श्रीमान् एरुम्बियप्पा जी कहते है मै ऐसे औदार्य और उदार स्वभाव के श्री वरवरमुनि को भजता हूँ जिन्होने मुझे सही किया और मेरी गलतियों को सुधारा । अन्त मे, शास्त्रानुसार संयासि के शेष का तिरसकार की क्रिया केवल अवैष्णव संयासि पर लागू होती है परन्तु श्रीवैष्णव संयासि पर नही ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २८

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परिचय

श्लोक २७                                                                                                       श्लोक २९

श्लोक २८

ततः स्वचरणाम्भोजस्पर्शसंपन्नसौरभैः
पावनेर्थिनस्तीर्थैभावयन्तम् भजामि तं २८॥

शब्दार्थ

ततः              – इस प्रकार से दिव्यप्रबन्ध के सारांश को समझाकर,
स्वचरणाम्भोजस्पर्शसम्पन्नसौरभैः – उनके सुगन्धित चरणों के सत्संग मे,
पावनैः          – शुद्ध (पवित्र),
तीर्थैः           – उपभोग हेतु दिया जाने वाला श्रीपादतीर्थ,
अर्थिनः        – शिष्यों ने श्रीपादतीर्थ देने की प्रार्थना किये,
भावयन्तम्   – (जो) सुधारती है या जिससे उत्थान होता है,
तम्             – ऐसे श्री वरवरमुनि,
भजामि       – का नमन करता हूँ ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

इस श्लोक मे, श्री वरवरमुनि, श्री दिव्यप्रबन्धों का सारांश समझाकर, अपने अर्थी शिष्यों द्वारा प्रार्थना किये जाने पर, तत्पश्चात उन्होने उपभोग हेतु अपने श्रीपादतीर्थ का वितरन किया । क्योंकि उस समय मे श्रीरामानुजाचार्य तो स्वयम् तो जीवित नही थे परन्तु वरवरमुनि (जो उनके पुनरावतार है) को लगा – की अगर मै अपने शिष्यों के उत्थापन हेतु अपना श्रीपादतीर्थ का वितरन करूँ तो यह गलत नही होगा । शिष्यों ने भी यही अर्थी की थी याने उनसे प्रार्थना किये कि वो अपने श्रीपादतीर्थ का वितरन करे । यहाँ गौर देने वालि बात यह है की उनके चरणकमल कमल के फूल जैसे है और इन्ही चरणकमलों के सत्संग से तीर्थ अत्यन्त परिमलता और शुद्धता को ग्रहण करता है माने अत्यन्त परिमल और शुद्धता प्राप्त करता है । तीर्थैः शब्द का बहुवचन मे प्रयोग यह निर्दिष्ट करता है की श्रीपादतीर्थ तीन बार दिया गया था । स्मृति कहता है – त्रीः पिबेत् । जिसका अर्थ है श्रीपादतीर्थ तीन बार ग्रहण करना चाहिये । कही कही लिखा है श्रीपादतीर्थ केवल दो बार दिया जाता है और इसका प्रमाण ऊशन स्मृति मे है । कहा जाता है की भागवतों का श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करने से शुद्धता और पवित्रता प्राप्त होती है । और यह सोम रस के पीने के बराबर है । शास्त्र दोनों प्रकार के श्रीपादतीर्थ (दो या तीन बार ग्रहण करने) के प्रमाणों को स्वीकार करता है और हमे अपने सांप्रदाय के अनुसार इसका अनुष्ठान करना चाहिये । भारद्वाज संहिता मे कहा गया है – एक आचार्य से उपदेश प्राप्त करने हेतु एक शिष्य को अपने आचार्य का श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये और यही सांप्रदाय की रीती है जो उपदेश पाने के नियम के अन्तर्गत है । अतः आखरी श्लोक मे, सर्वप्रथम दिव्यप्रबन्धों के सारतम रहस्यों का प्रचार-प्रसार का उल्लेखन है और तत्पश्चात क्रमानुसार श्रीपादतीर्थ शब्द का प्रयोग किया गया है । पूर्णतः उपदेश के आन्तरिक अर्थों मे निमग्न एरुम्बियप्पा ने अन्ततः “नमामि” शब्द का प्रयोग किया है । अब अपने आचार्य के श्रीपादतीर्थ को ग्रहण कर पूर्ण रूप से अनुकूलित भक्ति भाव से उन्होने “भजामि” शब्द का उपयोग किया है । यहा विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये कि श्री वरवरमुनि (जो वासनारहित अभिलाषारहित है)  ने कभी भी किसी से भी उम्मीद नही रखा और उनके प्रति किसी को कुछ करने की भी ज़रूरत नही थी ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २७

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परिचय

श्लोक २६                                                                                                         श्लोक २८

श्लोक २७

तत्वम् दिव्यप्रबन्धानाम् सारम् संसारवैरिणाम्
सरसं सरहस्यानां व्याचक्षाणं नमामि तं २७॥

शब्दार्थ

संसारवैरिणाम्      – जन्म-जन्मान्तर का निर्मूलन (इस भवसागर का वैरी),
सरहस्यानाम्        – मन्त्रत्रय सहित याने तिरुमन्त्र-द्वयमहामन्त्र-चरमश्लोक,
दिव्यप्रबन्धनाम्   – श्री आळ्वारों के दिव्यप्रबन्धों,
सारम्                  – (का) सार,
तत्वम्                 – आचार्य तत्व (याने प्रधान पुरुष आचार्य ही उपाय और उपेय है जो एक जीव का आधारभूत तत्व है                                   और यही पंञ्चोपाय है,
रसं                 – और यही अत्यधिक आस्वादनीय रस (मे),
व्याचक्षाणम्        – बिना किसी संदेह के समझाना,
तम्                    – ऐसे वरवरमुनि की,
नमामि               – (मै) पूजा करता हूँ ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

आळ्वार के दिव्यप्रबन्ध जन्म-मृत्यु के कालचक्र का निर्मूलन करते है । दिव्यप्रबन्ध जैसे तिरुविरट्टम् (100), तिरुवाय्मोळि (4.8.11) इत्यादियों के अन्त पासुर स्पष्ठ रूप से यही बात को प्रतिपादित करते है । सरसरी नज़र से अगर उपरोक्त रहस्यों को देखा जाये तो यह पता चलता है कि – भगवान ही मुख्य है और वे ही उपाय और उपेय है । अगर कोई भी प्रपन्न इस विषय की गहराई को समझता है, तो इससे यही प्रतिपादित होता है कि भगवान के भक्त ही मुख्य है, और वे उपाय और उपेय भी है । अगर इस विषय की गहराई को और गहरेपन से समझता है, तो (एक) प्रपन्न भक्त यही पाता है कि आचार्य ही मुख्य है, साथ मे उपाय और उपेय भी वही है । अतः इस प्रकार से हमारे रहस्य इस तीसरे अर्थ को विषेशतः महत्त्व देते है कि आचार्य ही सब कुछ है । जिस प्रकार से आचार्य मधुरकवि जैसों ने आचार्य-भक्ति आचार्य-निष्ठा का पालन किया था । यहा मणवाळमामुनि, अन्यथा यतीन्द्रप्रणवर के नाम से जाने जाते है, पूर्णरूप से श्री रामानुजाचार्य मे आत्मसात थे । वे केवल श्री रामानुजाचार्य को ही मुख्य, उपाय और उपेय मानते थे । जो दिव्यप्रबन्ध का सारांश है और इसी का उपदेश उन्होने अपने शिष्यों को दिया । जिस प्रकार पहले बताया गया है कि श्री रामानुजाचार्य सर्वश्रेष्ठ है । शेषी – मुख्य, प्राप्य – शरणागत, उपाय –  मुख्य को प्राप्त करना जो कि उपाय है । आचार्य ही मुख्य है जिनकी सेवा करनी चाहिये । हमे किसी और उपाय को खोजने की ज़रूरत नही है और आचार्य ही सब कुछ है इस प्रकार से उनके शरणागत होना चाहिये । और यही रहस्यत्रय का सारांश है । अतः श्री वरवरमुनि ने अपने शिष्यों को यही बताया, इसी का उपदेश दिया, और इसी कारण प्रत्येक को सिर के बल पर गिर कर दण्डवत करना चाहिये ।  अतः “तम् नमामि” शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है एरुम्बियप्पा उनका नमन कर रहे है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २६

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परिचय

श्लोक २५                                                                                                           श्लोक २७

श्लोक २६

अथ श्रीशैलनाथार्यनाम्नि श्रीमति मण्डपे
तडङ्घ्रिपङ्कजद्वन्द्वच्छायामध्यनिवासिनाम् ॥२६॥

शब्दार्थ
अथ                         – अपने मट्ट पहुँचकर,
श्रीशैलनाथार्य नाम्नि – अपने आचार्य जिनका नाम श्रीशैलनाथ यानि श्री तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै स्वामीजी है,
श्रीमति                    – कान्तिमान, (प्रदीप्तिमान), चमकदार,
मण्डपे                     – मण्डप मे,
तदङ्घ्रिपङ्कजद्वन्द्वच्छायामध्यनिवासिनाम् – उनके नक्कशीदार चित्र के चरणकमलों की छाया के मध्य मे बैठे ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

यह कालक्षेप मण्डप है जिसका नाम तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै मण्डप रखा गया । और इस मण्डप मे उनकी नक्कशीदार चित्र का भी चित्रीकरण उपलब्ध है । श्री वरवरमुनि अपने आचार्य की चित्रित नक्कशीदार चित्र के चरणकमलों की छाया मे बींच मे बैठे थे । यहाँ श्रीमति (चमकदार – प्रदीप्तिमान) का अर्थ इस प्रकार से है । श्री वरवरमुनि के द्वारा पूर्वाचार्यों जैसे पिळ्ळैलोकाचार्य इत्यादियों के तिरुमालिगै (दिव्य घरों) से लाया हुआ मिट्टि के कणों से दिवारों पर अलंकार करने से जो जगमग दिखाई देता है, वह । जो जगह दिव्य विशुद्ध महापुरुष श्रीवैष्णवाचार्यों के चरणकमलों से द्रवित है उस जगह या उस स्थान की शुद्धता और पवित्रता सवाल से परे है । अतः यह मण्डप पवित्र और शुद्ध है । यहाँ षष्ठी विभक्ति और बहुवचन मे प्रयुक्त “तदङ्घ्रिपङ्कज द्वन्द्वच्छायामध्यनिवासिनाम्”  शब्द का दूसरा अर्थ भी है जो इस प्रकार से है । यहाँ याने श्री शैलनाथ मण्डप मे श्री शैलनाथ के नक्कशीदार चित्र के चरणमकमलों के मध्य मे श्री वरवरमुनि जैसे शिष्यगण बैठे हुए है । यही भाव और अर्थ अगले श्लोक “तत्वम् दिव्यप्रबन्धनांसारम् .. व्याचक्षाणं नमामि तं” मे स्वामि एरुम्बियप्पा प्रस्तुत करते है कि वो अपने ऐसे आचार्य श्रीवरवरमुनि की पूजा कर रहे है जो उन सभी को इस मण्डप मे बैठकर दिव्यप्रबंध के अर्थों को बता रहे है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २५

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परिचय

श्लोक २४                                                                                                             श्लोक २६

श्लोक २५

मङ्गलाशासनम् कृत्वा तत्र तत्र यथोचितम्
धाम्नस्तस्माद्विनिष्क्रम्य प्रविश्य स्वम् निकेतनम् २५

शब्दार्थ
तत्र तत्र               – अर्चावतार के विषय मे, श्री गोदा अम्मा जी के शुरु होते हुए परमपदनाथ तक,
मङ्गलाशासनम्  – दोशों का निवारण, सद्गुणों की समृद्धि हेतु मङ्गलाशासन करना,
यथोचितम्          – उस विषय मे जैसे उचित,
कृत्वा                 – करने के पश्चात,
तस्मात् धाम्नः   – उस सन्निधि से,
विनिष्क्रम्य        – बडे भारि मन से छोडने लगे (भीतर आये),
स्वम् निकेतनम्  – अपने घर (मट्ट),
प्रविष्य               – प्रवेश किये ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

श्री वरवरमुनि गोदा अम्माजी और अन्य सन्निधियों का मङ्गलाशासन करने हेतु गये परन्तु पूजा करने नही । इसी कारण इस श्लोक मे मङ्गलाशासन शब्द प्रयोग हुआ है । वरवरमुनि ने विशेषतः श्री एम्पेरुमानार (रामानुजाचार्य) का मङ्गलाशासन किया और रामानुजाचार्य के नाते (इच्छानुसार) अन्यों का भी मङ्गलाशासन किया । इस प्रकार का उत्थान और पतन होता रहता है इसी कारण श्री एरुम्बियप्पा ने “यथोचितम् जैसा उचित है” शब्द को उपयुक्त समझकर प्रयोग किया । हलांकि शास्त्र संत महपुरुषों के बारे मे कहता है – “अनग्निः अनिकेतः स्यात्” अर्थात संत यानि साधु को कदाचित भी घर को अपने अधिकार मे हमेशा रखना, होम इत्यादि नहि करना चाहिये । परन्तु इस श्लोक मे “स्वम् निकेतनम् प्रविष्य” मायने वह स्थान जिसे स्वयम श्री रङ्गनाथ भगवान ने अपने इच्छानुसार उन्हे दिया जिसे हम सभी मट्ट कहते है उसमे प्रवेश किये । भगवान ने उन्हे आदेश दिया था कि वे श्रीरङ्ग मे हमेशा के लिये रहे अतः इस कारण हम इसे गलती नही समझ सकते और उनके स्वभाव के बारे मे संकोच नही कर सकते है । “विनिष्क्रम्य” शब्द का अर्थ है – मामुनि जी अपने भारी मन के साथ अन्य श्रीवैष्णव के संगत को छोडकर अपने नित्यकर्म (जो कि अनिवार्य है – जैसे तिरुवाराधन, सन्ध्यावन्दन, ग्रंथ कालक्षेप) करने हेतु मन्दिर के भीतर आकर अपने मट्ट चले गए ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २४

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २३                                                                                                   श्लोक २५

श्लोक २४

देवी गोदा यतिपतिशठद्वेषिणौ रङ्गश्रृङ्गं सेनानाथो विहगवृषभश्श्रीनिधिस्सिन्धुकन्या
भूमानिलागुरुजनवृतः पूरुषश्चेत्यमीषामग्रे नित्यम् वरवरमुनेर्ङ्घ्रियुग्मम् प्रपद्ये २४

शब्दार्थ

देवी गोदा                  – गोदा अम्मा जी,
यतिपतिशठद्वेषिणौ   – श्री यतिराज जी (रामानुजाचार्य/एम्पेरुमानार) और श्री शठकोप सुरी जी (श्री नम्माळ्वार), रङ्गश्रृङ्गम्              – मन्दिर का विमान (श्रीरङ्ग मन्दिर का सबसे ऊपरी भाग),
सेननाथाः                 – श्री विवक्सेन जी (सेनै मुदयिलार),
विहगवृषभहः            – श्री गरुड जी (पक्षियों के राजा),
श्रीनिधि                   – श्री महालक्ष्मी अम्मा जी का निज बहुमूल्य निधि यानि साक्षात श्रीरङ्ग भगवान,
सिन्धु कन्या            – श्रीरङ्ग नाच्चियार (क्षीर सागर जी की पुत्री श्रीरङ्गवल्ली अम्मा जी),
भूमानीलगुरुजनवृतः – श्री भूमी पिराट्टि, पेरिय पिराट्टि, नीला देवी, नम्माळ्वार और अन्य नित्य सूरियों से घिरे हुए,
पूरुषश्च                   – श्री परमपद के प्रमुख अधिकारि,
इति अमीषम् अग्रे     – ऐसे महापुरुषों के सम्मुख (समक्ष),
वरवरमुनेः               – श्री मणवाळमामुनि,
अन्घ्रियुग्मम्           – चरणकमल,
नित्यम्                   – प्रतिदिन,
प्रपद्ये                    – पूजा करता हूँ

भावार्थ (टिप्पणि) –

नान्मुगन कोट्टै के प्रवेश द्वार से प्रवेश करते हुए, श्री मणवाळमामुनि दक्षिणावर्त दिशा से होते हुए सर्वप्रथम श्री गोदा अम्माजी, फिर बारि बारि मे श्री रामानुज, श्री नम्माळ्वार, श्रीरङ्गविमान, सेनैमुदलियार, गरुडाळ्वार, भूमि पिराट्टि, नीला देवी, नम्माळ्वार और अन्य आळ्वारों के साथ, अन्त मे परमपदनाथ की सन्निधि से होते हुए परमपदनाथ जी का दर्शन इस क्रमानुसार किया करते थे ।  एरुम्बियप्पा इन शिलाविग्रहों की पूजा करने के बजाय केवल श्री वरवरमुनि की पूजा करते थे । इधर यह प्रश्न उठता है कि – ऐसा उन्होने क्यों किया ? वे कहते है , मै अपने आचार्य श्री वरवरमुनि की उपासना करता हूँ, क्योंकि सर्व प्रथम आचार्य जी इन सभी शिला विग्रहों याने भगवान और भगवद्-संबन्धियों का दर्शन कर आये,अतः उनकी पूजा करना श्रेय और यथेष्ट है । क्योंकि वे आचार्य परन्तर थे इसी कारण वह केवल अपने श्री आचार्य की उपासना किया करते थे । श्री भारद्वाज के अनुसार, भगवान श्रीमन्नारायण (एम्पेरुमान) की अर्चारूप मे सेवा अत्यन्त अत्यधिक भक्ति और प्रेम भावना से करनी चाहिये । साथ मे उनके सभी पार्षदों, भक्तों, आचार्य-गण, निज सामग्री, इत्यादि सहित उनकी उपासना करनी चाहिये । इसी के अनुसार श्री वरवरमुनि ने क्रमानुसार भगवान के सभी पार्षदों और भगवद्-सम्बन्धियों के साथ भगवान का मंगलाशासन किया । श्री वरवरमुनि ने श्रीरङ्गनाथ भगवान के साथ श्री आण्डाल (गोदा), सेनैमुदळियार गरुडाळ्वार इत्यादि का मंगलाशासन किया । गोदा अम्मा जी (श्री भूमि पिराट्टि) की अवतार है, जिन्होने अपने आप को एक भक्त, शिष्य, दासि इत्यादि के रूप मे प्रस्तुत कर श्री वराह भगवान के शरणागत हुई (अहम् शिष्यश्च दासी भक्त पुरुषोत्तमा) । भू , नीळा, पेरिय पिराट्टि जो श्रीरङ्गनाच्चियार से जाने जाते है इत्यादि ये सभी भगवान की पत्नियों के दर्जा मे आती है । अतः श्री वरवरमुनि श्रीरङ्गनाथ भगवान का मंगलाशासन करते समय, उनकी पत्नियाँ, पार्षद, आचार्यगण, और अन्य भक्तों की अराधना करते थे । एरुम्बियप्पा ऐसे श्री वरवरमुनि की पूजा सबके समक्ष किया करते थे ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २३

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परिचय

श्लोक २२                                                                                                     श्लोक २४

श्लोक २३

महति श्रीमति द्वारे गोपुरं चतुराननम्
प्रणिपत्य शनैरन्तः प्रविशिन्तं भजामि तम् २३

शब्दार्थ
श्रीमति                    – पर्याप्त मात्रा मे धनसंपत्ति,
महति                      – ज़्यादा विशाल / विस्तीर्ण,
द्वारे                       – मन्दिर के दुर्ग के मार्ग पर,
चतुराननम् गोपुरम्  – नान्मुगन मन्दिर का दुर्ग (गोपुर),
प्रणिपत्य                 – मनसा, वाचा, कर्मणा ( मन, वाक, कर्म) से अर्चित (प्रणिपात करते हुए) ,
शनैः                       – धीरे धीरे (उन दिव्य आंखों को नम्रतापूर्वक घुमाते है जो इस दिव्य भव्य मन्दिर के दुर्ग की सुन्दरता                                 का आनन्द लिये),
प्रविशन्तम्             – प्रवेश करते है ,
तम्                       – ऐसे वरवरमुनि,
भजामि                  – की पूजा करता हूँ  |

भावार्थ (टिप्पणि) –

यहाँ श्रीमति और महति दोनो शब्द प्रसिद्ध नान्मुगन मन्दिर के प्रवेश द्वार की विशेषता और परिशिष्टता को व्यक्त करते है । इसी द्वार से प्रवेश कर, ब्रम्हा और अन्य देवतान्तर विशेष धन-संपत्ति को प्राप्त करते है । हलांकि भगवान श्रीरंगनाथ के भक्तों की भीड के बावज़ूद वहाँ इतना जगह अश्वय है जिसका प्रयोग किया जा सकता है । यह उस जगह की विशालता को दर्शाता है । इस दुर्ग का नाम चतुराननम् – नान्मुगन गोपुर है । प्रणिपत्य शब्द दण्डवत प्रणाम की विचार धारणा, उच्च स्वर मे बोलना, और शारीरिक रूप से दण्डवत प्रणाम करना (मन, वाक, कर्म से दण्डवत प्रणाम) को दर्शाता है ।

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