Daily Archives: July 30, 2016

प्रमेय सारम् – श्लोक – ६

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ५                                                                                                             श्लोक  ७

श्लोक  ६

उल्लपडि उणरिल ओन्रु नमक्कु उण्डेन्रु
विल्ल विरगिलदाय विट्टदे – कोल्लक
कुरै एदुम इल्लार्क्कुक कूरुवदेन सोल्लीर
इरै एदुम इल्लाद याम

अर्थ:

उल्लपडि:            : अगर हमे सही तरिके से समझना है और
उणरिल               : जीवात्मा का सही स्वभाव जानना है
ओन्रु                   : तब हम उसे देख सकते है
उण्डेन्रु                 : वहाँ है
नमक्कु               : हमारे उपर कुछ नहीं है (जो बहुत कम स्वभाव के कारण)
विल्ल                 : हमारे पास कुछ नहीं है जिसके बारें में हम बात कर सके
विरगिलदाय        : हमारी स्थिति यही है और हमारे पास कोई राह नहीं जिसके बारे में हम बात कर सके
विट्टदे                  : हमारे सत्य स्वभाव को देखिये!!!
एदुम इल्लार्क्कुक : भगवान श्रीमन्नारायण जिनका स्वभाव वर्णन करता है
एदुम इल्लाद       : किसीका भी सम्पूर्ण दुर्लभता
कोल्लक कुरै        : हमसे भगवान को सम्पूर्ण बनाने के लिये
सोल्लीर              : हे मनुष्य जन !!! कृपा कर मुझे कहिये
याम                   : हम, जिनका बुनियादि स्वभाव भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना है
कूरु वदेन            : हमे अपने आप कि रक्षा करने के लिये हम पर ही क्या कहना है

स्पष्टीकरन:

उल्लपडि उणरिल: यह पद का अर्थ यह है कि “अगर हमें जीवात्मा के सही स्वभाव को जानने और पहिचाने का”। तिरुवल्लूवर कहते है “एप्पोरुल एत्तंमै ताईनुम अप्पोरुल में पोरुल काण्बधु अरिवु”। इसका अर्थ है ज्ञान / समझ और कुछ नहीं जीवात्मा का सही स्वभाव जानना है। जब हम हमारे संसार को देखते है हम पदार्थ को सजीव निर्जीव (चित अचित) समझते है। उसमे ही हम मनुष्य, जानवर, पेड़ आदि भेद को देखते है। हम उस जीवात्मा को जानते नहीं है जो उसमे रहता है। एक समझदार व्यक्ति कभी उसमे सजीव / निर्जीव स्वभाव या वर्ग / उप वर्ग ऐसा सतही स्वभाव नहीं देखेगा। वह जीव के जो उनमें सत्य स्वभाव है उसको देखते है। हालाकि स्वयं हमसे जीव के सत्य स्वभाव को देखना आसान नहीं है। हमें उसे शास्त्रों कि सहायता से जानना चाहिये। जीवात्मा ज्ञान से बना है जिसे हम “विवेक” कहना पसन्द करते है। आत्मा को विवेक से मनुष्य गुण प्राप्त होते है। इसके अलावा आत्मा में एक और स्वभाव है “विवेक”। इसलिये हमारे लेख आत्मा को इस तरह समझाते है (अ) वह जो कुछ भी नहीं परन्तु सम्पूर्ण विवेक है और (आ) वह जिसमे विवेक प्राप्त है। इसीलिए आत्मा स्वाभाविकता से अहंकार स्वभाववाला है कि “मैं हीं वो हूँ जो यह कर सकता है”। अगर हम इस वर्णन को घेहराई से देख सकते है तो हम कुछ मनभावक अर्थ निकाल सकते है। आत्मा में विवेक मनुष्यगुण आदि है फिर भी वह स्वयं नहीं कर सकता है। उसे उस कार्य को करने के लिये कोई मार्गदर्शक चाहिये। वह और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायाण है जो आत्मा के अन्दर है जो “आत्मा के आत्मा” का कार्य करता है। अत: श्रीमन्नारायाण आत्मा है और आत्मा शरीर बन जाता है जहाँ भगवान श्रीमन्नारायाण निवास करते है और आत्मा को राह बताते है। अत: आत्मा जिसे हम देखते है स्वयं कुछ कार्य नहीं कर सकती है। अत: आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण कि निरन्तर दास है। भगवान श्रीमन्नारायाण का निरन्तर दास बनकर रहना आत्मा का सत्य स्वभाव है। अगर कोई इस बात को जान ले तो उसको स्वयं के रक्षा के लिये और कुछ भी जानने कि जरुरत नहीं है। तिरुवल्लूवर कहते है “इयल्बागुम नोन्बिर्का ओनृ इनमै उदैमै मयालागुम मर्रुम पेयार्त्तु”। ऋषियों कि स्थिति ऐसी है कि उन्हें यह समझ है कि भगवान श्रीमन्नारायाण छोड़ और कोई भी हमारा लक्ष्य नहीं प्राप्त करा सकता। अगर हम यह सोचे कि इसे छोड़ और कोई दूसरा राह है तो  केवल यह सोच हमारे दूसरे जन्म का कारण बन जाती है।

ओन्रु नमक्कु उण्डेन्रु विल्ल विरगिलदाय विट्टदे: इस पद का अर्थ यह है कि हम अपना मुख नहीं खोल सकते और अभिमान भी नहीं कर सकते कि हम केवल अपने आप के लिये “मोक्ष” भी नहीं ले सकते। “विनोदगृह” का अर्थ “कहना”। इस शब्द का एक और अर्थ है “विल्ला विलगि निर्का”। यह उस व्यक्ति के अवस्था को दर्शाता है जो यह भी नहीं कह सकता है कि उसके पास कोई ऐसी राह है जिससे वह अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकता है और भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल के शरण नहीं होता है। इस व्यक्ति कि दशा जो अपने आप को अलग रखने कि कोशिश करता है और कर नहीं पाता है इसलिये “विल्ला विलगि निर्का” यह कहा गया है। इस तथ्य का अर्थ यह है कि सभी आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण के शरीर जैसा कार्य करते है और वही सत्य आत्मा है जो शरीर में निवास करता है। एक शरीर बिना आत्मा के कोई भी काम नहीं कर सकता है।

इस भाग में एक प्रश्न आता है। हमारे शरीर में हम जानते है एक आत्मा है। यह शरीर-आत्मा का एक सामान्य उदाहरण है। एक कदम आगे बढ़कर एक आत्मा के लिये आत्मा क्या है? हमने यह देखा कि आत्मा के लिये आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण है और अत: अगर हम आत्मा को शरीर समझे तो उस आत्मा का आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण है। हमने पहिले देखा कि आत्मा पूर्ण विवेक है, वह जो हमारे भीतर रहे या आत्मा के आत्मा के अन्दर रहे। क्योंकि उसमें विवेक है और इसलिये उसे अपने पक्ष मे रहकर सब कार्य करना है। क्योंकि वह स्वयं कार्य कर सकता है क्या परमात्मा जीवात्मा से कोई कार्य कि अपेक्षा करता है उससे यह सुनकर कि “हे परमात्मा आप मेरी रक्षा करें”। क्या इसका यह अर्थ है कि केवल जीवात्मा ही कह सकता है “ओ परमात्मा! कृपया मेरी रक्षा करें”। परमात्मा इस पर कार्य कर उस पर अपनी कृपा बरसा सकते है? अगर वह कृपा बरसाने से पहिले कुछ अपेक्षा करता है तो वह उसके लिये “भूल” हो जाता है। इसके अलावा, हम दूसरी तरफ कुछ नहीं दे सकते है। यह आगे समझाया गया है।

कोल्लक कुरै एदुम इल्लाद याम: हमारे पास जो शरीर है और उसमे जो आत्मा है वह सब भगवान श्रीमन्नारायण के है। शारीर और आत्मा को स्वतंत्र कार्य करने कि क्षमता नहीं है। उनके पास स्वयं का कुछ भी नहीं है। इसलिये वह शरीर से कुछ अपेक्षा नहीं करते है। यह बात एक कहानी के जरिये समझाया गया है।

एक समय कि बात है एक व्यक्ति था उसने भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाकर कहा “हे भगवान! मैं आपको क्या दे सकता हूँ? मेरे पास कुछ भी नहीं है क्योंकि मैं आपका दास हूँ। कुछ भी वस्तु जो मैं सोचता हूँ कि मेरी है वह सच में आपकी हीं है। अत: मेरे पास आपको अर्पण करने हेतु कुछ भी नहीं है। हालाकि मेरे पास आपको अर्पण करने के लिये कुछ है। वह और कुछ नहीं मेरे कर्म है जो मुझे कल्प वर्षो से प्राप्त हुए है। मेरे पास वही है और वहीं मे आपको अर्पण कर सकता हूं। इसके अलावा मेरे पास और कुछ भी नहीं है”। एक अध्याय है श्रीरामायण में भरत और ऋषी वशिष्ठ के बीच जो इधर बताया गया है।

ऋषी वशिष्ठ भरत से कहते है “हे भरत! श्रीराम वन चले गये है। आपके पिता स्वर्ग पहूंच गये है। अब आपको हीं इस राज्य पर राज करना चाहिये”। यह सुनकर भरत अपने हाथों से कान बन्द कर यह कहते है “आप कहते है श्रीराम वन चले गये है। अगर ऐसा है तो क्या मैं यह राज्य ले सकता हूँ जो उनका है? अगर कोई दूसरे कि वस्तु लेता है तो वह चोरी है”। भरत अपनी तर्क उन लेख के आधार पर करते है जो कहते है “उल्लात्ताल उल्ललूम थिधे पिरन पोरुलै कल्लात्ताई कल्वम एनल”। इसके पश्चात भी ऋषी वशिष्ठ ने उनको नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा “क्योंकि श्रीराम अभी यहाँ नहीं है, यह राज्य जो उनकी आस्ती है जब तक वें लौट कर नहीं आते आप ले सकते है”। भरत उत्तर देते है “यह अयोग्य है। किसी को भी किसी कि वस्तु को नहीं लेना चाहिये। मैं और राज्य दोनों श्रीराम के हीं है। अत: मैं उनका राज्य नहीं ले सकता”। उनकी बात सुनकर भी वशिष्ठजी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह आगे कहते है “राज्य वह है जिसे कोई विवेक नही है। हालाकि आप ऐसे नही हो। आपको विवेक और ज्ञान है। इसलिये आप जिसके पास ज्ञान है वह राज्य ले सकता है। इसके लिये मैं आपको एक समानता देता हूँ”। एक व्यक्ति के पास बहुत आभूषण है। वह एक सन्दूक में रखकर उसे ताला लगाता है। वह सन्दूक उन आभूषण कि रक्षा करता है। हालाकि दोनों आभूषण और सन्दूक उस व्यक्ति के संपत्ति है। परन्तु आप देख सकते है कि वह सन्दूक उसमे रहने वाले आभूषण कि रक्षा करता है। उसी तरह, आप जो श्रीराम कि संपत्ति है इस राज को राज्य कर सकते है जो भी श्रीराम कि हीं संपत्ति है? भरत उत्तर देते है “स्वामीजी। यह समानता जो आपने दिया है वह निर्जीव वस्तु है जिनमे कोई विवेक नहीं है। सन्दूक को यह ज्ञान नहीं है कि उसमे जो आभूषण है उन्हें उसका मालिक धारण करता है। क्योंकि उसे ज्ञान नहीं है वह वहीं करता जो उसे कहा गया हो। परंतु मुझमे विवेक है मैं अपने स्वामी श्रीराम कि संपत्ति पर अधिकार ग्रहण नहीं कर सकता मैं और राज्य दोनों श्रीराम कि संपत्ति है। हालाकि यह सत्य है कि मुझमे ज्ञान है और राज्य में नहीं यह अन्तर है। मुझमे ज्ञान है कि मैं श्रीराम का दास हूँ जो कि राज्य में नहीं है। अत: मुझे  इस ज्ञान के तथ्य पर रहना है और उसके प्रति सत्यवादी रहना है और मिले हुए संपत्ति के गुण को प्रदर्शित करना है”। इसके पश्चात वशिष्ठजी तर्क कर नहीं पाते और भरतजी के तर्क को स्वीकार करते है। यह इस तथ्य को साबीत करता है कि जीवात्मा के पास ज्ञान है यह ज्ञान तभी अच्छा है जब जीवात्मा को इसके सत्य स्वभाव का एहसास होता है जो और कुछ नहीं भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना। सत्य स्वभाव को जानने के बाद कोई भी “मैं” या “मेरा” नहीं करेगा।

यह ध्यान में रखकर श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है भगवान श्रीमन्नारायण सम्पूर्ण है। उन्हें  स्वयं को सम्पूर्ण करने के लिये कुछ भी जरूरत नहीं है। इसके उपर जीवात्मा के पास कुछ भी नहीं जिसे वह खुद का कह सके। उनके पास भगवान को अर्पण करने हेतु कुछ भी नहीं है। यह देखकर हम यह कह सकते है कि वह कुछ भी स्वीकार नहीं करते और हम कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी वहाँ उपस्थित जनों से पूछते है “आप इसके बारें क्या कहते है”। “इरै एदुम इल्लाद याम:” में “नाम” शब्द श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को शामिल करता है और जो लोग बाकि सभी सिवाय भगवान श्रीमन्नारायण के उनके सामने है। यहाँ “इरै” शब्द का अर्थ कण है और “इरै एदुम” बिना कण के। यह “अगलगिल्लेंन ईरैयुंम एनृ” के समान है जहाँ उसका अर्थ “क्षण भर के लिये भी अम्माजी भगवान से अलग नहीं होती है”। अगर कोई जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को जानना चाहता है तो उसके विशेष लक्षण इस प्रकार है (अ) भगवान कि संपत्ति बनकर रहना (आ) क्योंकि भगवान से मालिक का सम्बन्ध होने के कारण जीवात्मा को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। वह हर रूप से सम्पूर्ण है और इसलिये स्वयं को सम्पूर्ण करने के लिये उसे दूसरों से कुछ भी आवश्यकता नहीं है। एक भिखारी एक धनवान को कुछ भी दे नही सकता है। स्वयं को ज्यादा धनवान होने के लिये धनवान को उस भिखारी के पास जाकर उसकी संपत्ति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिये जीवात्मा क्या दे सकता है? परमात्मा क्या ले सकते है? दोनों सवालों का उत्तर कुछ नहीं है।

इसलिये यह सत्य जानने के पश्चात जीवात्मा इस सत्य को जाने और उसके अनुरूप जीवन व्यतित करें। जीवात्मा यह जाने कि यह भगवान कि संपत्ति है और उन्हें कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते है। मालिक स्वयं उस सब कि देख-रेख कर लेगा। ऐसा जीवन व्यतित करना हर जीवात्मा का कर्तव्य है। यह मूल मन्त्र के “नम:” शब्द का तत्त्व है।

इस मोड पर हमें श्रीवचन भूषण के निम्म चूर्णिकै पर विचार करना चाहिये। “पलत्तुक्कु आत्म ग्यानमुम् अप्रतिशेदमुमे वेण्डुवदु. अल्लाद पोदु बन्दतुक्कुम् पूर्त्तिक्कुम् कोत्तैयाम्”. “अन्तिम कालत्तुक्कु तन्जम्, इप्पोदु तन्जमेन् एन्र निनैवु कुलैगै एन्ऱु जीयर् अरुळिच्चेय्वर्” और्  “प्राप्तावुम् प्रापगनुम् प्ऱप्तिक्कु उगपानुम् अवने” जैसे सूत्र है जिनके तत्त्व के साथ एक कथा प्रचलित है। श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी अपने एक शिष्य के पास जाते हैं जो अपने अन्तिम समय के निकट था। वह शिष्य अपने आचार्य श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी को निकट देख बहुत प्रसन्न हुआ और पूछता है की अन्तिम क्षणों में आप कुछ कहना चाहते है। श्रीवेदान्त देशिक स्वामीजी उत्तर देते है “हम सब भगवान श्रीमन्नारायण कि सम्पत्ति है। केवल मालिक हीं उसकी रक्षा हेतु सोच सकता है और कोई नहीं। हमें अपने रक्षा हेतु कभी कुछ नहीं करना चाहिये, चाहे वो आज हो या जीवन का अन्तिम क्षण। हमारे में यदि यह विचार भी आवे तो हटा देना चाहिये। तभी भगवान श्रीमन्नारायण हमारे रक्षा हेतु आते है। तब तक कितना भी मनुष्य कोशिश कर ले सब व्यर्थ है”।

श्रीरामायण में जब ऋषी गण वन में श्रीराम से मिलते है वें अपने आप को उस शिशु समान समझते है जो माँ के गर्भ में है। कारण यह है कि शिशु के सभी कार्य कि रक्षा गर्भ में उसकी माता करती है। उसी तरह ऋषी कहते है वें भगवान श्रीमन्नारायण के सुरक्षा में है। इसलिये जीवात्मा कि गतिविधियाँ स्वयं से नहीं परमात्मा से बंधी है। इसीको “पारतंत्रियम” कहते है। कभी कभी इसे “अचितत्त्व पारतंत्रियम” भी कहते है। यह और कुछ नहीं जीवात्मा का गुण है जहाँ वह निर्जीव वस्तु के समान है जो एक हीं स्थान पर रहता है जहाँ उसे रखा गया है। उसी तरह जीवात्मा आज्ञा पालन करता है और स्वयं कि रक्षा के लिये कुछ भी नहीं करता है। वह पूर्णत: परमात्मा पर निर्भर है और वहीं रहता है जहाँ भगवान उसे उस समय रहने के लिये कहे है।

तिरुकककोलूर्पेन्पिळ्ळै अम्माळ् कहते है – “वैत्त इडत्तिल् इरुन्दॅओ भरताळ्वानैप् पोले”. कुळशेखर आळ्वार कहते है – “पडियाय्क् किडन्दु उन् पवळ वाइ काण्बेने”. अगर कोई व्यक्ति इस स्थिति में है तो भगवान अपने संकल्प से बाहर आकर उसकी रक्षा करते है। समुन्द्र दण्ड पर क्या हुआ था इसे पक्का करने के लिये कि हमारे पूर्वज एक कथा लेते है।

समुन्द्र किनारे पर श्रीराम और श्रीलक्ष्मण कि सुरक्षा हेतु बहुत से वानर थे। वह आपसमे बात करते है कि उन्हें श्रीराम और श्रीलक्ष्मण को राक्षसों के हमले से बचाना है। हालाकी जैसे रात बढ़ती गयी वानरों को नींद आगयी और वें सो गये। यह तो श्रीराम और श्रीलक्ष्मण थे जो हाथ में धनुष और बाण लेकर उन वानरों कि रक्षा किये थे। अत: यह भगवान श्रीमन्नारायण का कर्तव्य है उनके भक्तों कि रक्षा करें। यह जीवात्मा का काम हैं भगवान के रक्षत्व में बाधा न करें।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ५

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श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ४                                                                                                                श्लोक  ६

श्लोक  ५

प्रस्तावना:

श्रीमन्नारायण, पेरिया पिराट्टी श्रीमहालक्ष्मी के स्वामी जीव को परमपदधाम में स्थान प्रदान करते है। यह वह अपने निर्हेतुक कृपा से करते है। वह जो बुद्धि विषयक, वीरतापूर्ण विशेषताओंसे और वह जो कल्याण गुणों से और वह जो किसी मनुष्य से इस संसार में जुदा नहीं हो सकते। इसलिए किसी आत्मा के प्रति भगवान जो भी करते है उस जीव के उज्जीवन के लिये करते है। मनुष्य को अपने बेहतर जीवन के लिये शास्त्र में और भी राह बताये गये है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। शास्त्र उसके सामने कही राह दिखाकर और सहीं राह को अंगिकार करने के लिये आत्मा के ज्ञान की परिक्षा लेता है। जीवात्मा जिसे इस तथ्य का ज्ञान है कि उपर बताये गये राह भगवान कि कृपा पाने के लिये पर्याप्त नहीं है। अत: यह व्यक्ति उन्हें कभी भी पहिले स्थान में स्वीकार नहीं करेंगे परन्तु उनके चरण कमल को हीं स्वीकार करेंगे। इस तरह करने से कोई यह सोचेगा कि किसी व्यक्ति का भगवान के शरण होना उसकी कृपा पाने की  एक राह है। इसका उत्तर यह है कि यह जीव जब भगवान के चरण कमलों के शरण होते है यह विचार करके करते है कि उनकी शरण होना भगवान तक पहूँचने की एक राह नहीं है। अत: उन तक पहूंचने का और कोई मार्ग नहीं बल्कि वों हीं है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है कि अगर किसी के मन में यह बात आती भी है तो यह विचार भी उसके मन में भगवान हीं लाते है।

वळियावदु ओन्रु एन्राल् मट्रेवै मुट्रुम
ओळियावदु ओन्रु  एन्राल् ओम् एन्रु – इळियादे
इत्तलैयाल एदुमिलै एन्रिरुंददु तान
अत्तलैयाल वन्द अरुल

अर्थ:

वळियावदु                   : राह जिसे “शरणागति” कहते है,
ओन्रु एन्राल्                 : अगर उसे समझना है कि यह हीं वह राह है तब
मुट्रुम                          : सभी
मट्रेवैयुम                     : दूसरे राह जैसे कर्म, ज्ञान और भक्ति योग
ओळि                          : का त्याग करना बिना कोई लक्षण के
यावदु                          : शरणागति कि राह
ओन्रु  एन्राल्                 : यह अहसास होना कि यही वही राह है
ओम् एन्रु                     : अगर कोई मनुष्य उसे स्वीकार करता है और अंगीकार करता है और
इळियादे                      : फिर भी शरण नहीं होता है (क्योंकि यहीं एक राह है और फिर उसके न करने का उपाय हीं नहीं है)
इत्तलैयाल                   : अगर कोई व्यक्ति इस दिशा में सोचता है कि
एदुमिलै                       : यहाँ कोई अच्छा कर्म नहीं है जो उससे स्वयं हीं किया जा सकता है
एन्रु                             : और उस पथ पर “प्रयत्न नहीं” उसके बारे मे सोचता है
इरुंददु तान                  : और उस मत से लगा रहता है
अत्तलैयाल वन्द अरुल : यह उसके कृपा से हीं मुमकिन है

स्पष्टीकरण:

वळियावदु ओन्रु एन्राल्: यह पद जिसने शास्त्र के परिणाम के अर्थ को समझा है उस मनुष्य कि मन कि स्थिति को समझाता है। यह और कुछ नहीं दूसरे साधन जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि की तुच्छता को प्रमाणित करना है, जो स्वतंत्रपने से भगवान श्रीमन्नारायन के स्वाधीन होना है। पूर्णत: शरण होना जिसे शरणागति भी कहते है परंतु दूसरे साधन के अच्छे परिणाम के लिये भगवान के सहारे कि जरूरत होती है। इसीलिये उनके पास किसी मनुष्य को बिना भगवान के सहायता के भगवान के चरण कमल के पास ले जाने के लिये अधिकार नहीं होता है। इसीलिये एक समझदार मनुष्य इन राह में कभी नहीं चलेगा परन्तु प्रपत्ति या शरणागति का पालन करेगा क्योंकि यह सीधे भगवान से जुड़े है।

मट्रवै मुट्रुम् ओळिया: शरणागति छोड़ दूसरे उपाय के परिणाम का सत्य जानकार सभी को कुछ क्षण भी न सोचकर उन्हें त्याग देना चाहिये। “मट्रेवै” शब्द सामूहिक रूप से कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग को दर्शाता है। “मुट्रुम” शब्द  यह बताता है कि तीनों साधन को बिना सोचे समझे त्याग देना चाहिये। “ओलि:” शब्द “ओलितु” शब्द का व्याकरणिक रूपांतर है यानि त्यागना।

अदु ओनृ एन्राल्: “अदु” – प्रपत्ति या शरणागति। इसे “भगवान” भी कहते है। “ओनृ” शब्द जो केवल भगवान से जुड़ा है और इसलिये उसका अर्थ “भगवान हीं” है। तमिल व्याकरण में इसे “पिरिनीलै एकाराम” कहते है। जिसका अर्थ “केवल भगवान और कोई नहीं और भगवान के सिवाय और कुछ नहीं”। यह बुद्दिमान व्यक्ति जो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों कि शरण लेता है वह कभी यह सोच भी नहीं सकता है कि उसका भगवान के शरण होना भगवान के पास पहूँचने कि एक राह है। क्योंकि वह व्यक्ति यह जानता है कि उसके द्वारा किया गया कार्य भी उसे भगवान के पास नहीं ले जा सकता। अगर कोई व्यक्ति यह सोचता है “भगवान ही उपेय है” और हमेशा यही विचार के बारें में सोचता है तब यही विचार भगवान के पास पहूँचने में बाधा बन जाता है क्योंकि वह व्यक्ति अनुचित ढंग से यह सोचता है कि उसका यह विचार उसे भगवान के पास ले जाता है। यह सत्य नहीं है। दूसरे शब्दों में किसी व्यक्ति से कुछ भी कार्य करने से उसे भगवान के पास ले नहीं जा सकता। उसे तो भगवान ही अपने पास ले जाते है। वह स्वयं अपने सिवाय कुछ स्वीकार नहीं करते है। अत: शरणागति शब्द भगवान के साथ बदला जा सकता है। इसिलिये भगवान को “अदु ओनृ” ऐसे संबोधित करते है जो र्निजीव वस्तु के लिये उपयोग करते है। यह और कुछ नहीं परन्तु यह समझाने के लिये कि उपेय और भगवान एक हीं है और इसलिये “अदु ओनृ” को “अवन ओनृ” के जगह उपयोग किया गया है। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अदु इदु उदु एदु”। इसलिये यह पद “अदु ओनृ” का अर्थ “केवल भगवान और कुछ नहीं”।

ॐ एनृ इळियादे: यह पद पिछले पद “अदु ओनृ एंराई:” के संयोग से समझने के लिये है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह बात कह रहे है कि कोई भी व्यक्ति यह समझता है कि शरणागति कि राह जो और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायण ही है वें ही रक्षक है। अत: वह व्यक्ति यह सोचकर कि यहीं शरणागति कि राह उसे भगवान के चरण कमलों तक ले जायेगी उनके शरण हो जाता है। दूसरे शब्दों में वह व्यक्ति भगवान के शरण होना उस तक पहूँचने कि राह है यह सम्पादन करता है। शास्त्र कहता है यह भी गलत है और बड़ा विरोधी भी हो सकता है। “पूर्ण शरण” होना यह शब्द का अर्थ एकही पर सब कुछ छोड़ उसके पास जाना है यह विचार भी त्यागकर कि वह उसके शरण गया है। इसलिये इस पद में “ॐ” शब्द का अर्थ वह व्यक्ति ने शरणागति को स्वीकार किया है जो सर्वोत्तम राह है और “इलियादे:” शब्द का भाव वह व्यक्ति जो शरणागति को यह विचार करके कि उसने यह कर लिया है स्वीकार नहीं करता।

इत्तलैयाल एदुमिलै एन्रिरुंददु तान: इसलिये अब यह प्रश्न आता है कि किसी व्यक्ति को शरणागति करते समय क्या विचार करना चाहिये। इसका उत्तर यह है कि उस व्यक्ति को कुछ नहीं करना चाहिये और इस विचार के साथ रहना चाहिये वह भगवान के कृपा बिना कुछ भी नहीं कर सकता है। एक व्यक्ति जब किसी भी कार्य को करता है जो भगवान के पास पहुचता है तब उसे उससे बनी हुई खालीपन के बारे मे सोचना चाहिये।

अत्तलैयाल वन्द अरुल: अत: में श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कहते है कि अगर किसी व्यक्ति को ऐसे उपरोक्त विचार आते है तो वह विचार भी भगवान कि निर्हेतुक कृपा का हीं परिणाम है और कुछ नहीं। शास्त्र में यह कहा गया है कि मोक्ष प्राप्त करने का और भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों तक पहूँचने का एक मात्र उपाय है “पूर्ण शरणागति”। जब कोई इस सर्वोच्च अर्थ के बारें में सचेत हो जाता है तब उसे अन्य अर्थ को जैसे कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग के बारें में जानने कि आवश्यकता नहीं है। इसका अर्थ यह है कि भगवान तक पहूँचने का उपाय “शरणागति” है। इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति का यह शरणागति करना भगवान तक पहूँचने की एक राह है। इस प्रश्न को हमारे सम्प्रदाय में निरर्थक कर दिया गया है और वों ही जरिया है और कोई है भी नहीं और हो भी नहीं सकता। जब शास्त्र यह कहता है कि “केवल भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा हीं उपेय है” तब “केवल” शब्द सारे प्रश्न को निकाल देता है जो दूसरे योग को साधन रूप में स्वीकार करने को कहता है। यह “केवल” एक विशेष अनयता है जिसे “पिरिनिलै एकाराम” कहते है। यह एकाराम यह स्पष्ट करता है कि अन्य योग उपाय नहीं है बल्कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं उपाय हैं और कोई नहीं। इसलिये अगर भगवान श्रीमन्नारायण किसी पर कृपा करते है तो वह कुछ भी नहीं माँगता नाहीं कुछ आशा करता है।  वह अपनी कृपा से आगे बढ़कर निर्हेतुक कृपा करते है। इसे “वेरिधे अरुल सेय्वर” पाशुर में देखा जा सकता है। अत: भगवान श्रीमन्नारायण एक व्यक्ति जिसके पात्र में वहाँ कण मात्र भी क्रियाशीलता नहीं है उसको अपने संकल्प से बाहर जाकर आशीर्वाद और कृपा करते है। अगर कोई व्यक्ति इस विषय को समझ सके तब यह अंतर्निहित तथ्य है कि यह व्यक्ति इस दृग्विषय को समझने के लिये स्वयं से कुछ नहीं करता है। उचित रूप से यह समझने कि योग्यता भी और निरर्थक रहना और कुछ न करना यह सोच भी भगवान श्रीमन्नारायण ने हीं किसी व्यक्ति को प्रदान कि है। एक प्रश्न यहाँ आ सकता है कि कुछ नहीं करने के लिये भी भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा कि जरूरत है। इसका उत्तर “हां” है। कुछ न करना एक बहुत बड़ा आव्हान है। कुछ किए बिना रहना बहुत मुश्किल है। इसलिये एक व्यक्ति के तरफ से उसके स्वयं के पास उनके कृपा के सिवाय और कुछ भी नहीं है। यह विषय विस्तार से कई आल्वारों द्वारा कहा गया है। श्रीभक्तान्घ्रिरेणु स्वामीजी कहते है “vAzhum sOmbar”। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कहते है “निनरुळे पुरिन्दिरुन्देन्”। “एन् उणर्विन् उल्ले इरुत्तिनेन्” श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है। “उन् मनत्तिनाल् एन् निनैन्दु इरुन्दाय्” श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है। “निरन्तरम् निनैप्पदाग नी निनैक्क वेण्डुमे” श्रीभक्तिसार स्वामीजे कहते है। “सिरु मानिडवर् नाम् सेय्वदेन्” श्री गोदाम्बाजी  कहती है। तिरुकएनण्णमंगै आण्डन इस तत्त्व के आधार पर अपना जीवन व्यतित करते थे।

इसे मुमुक्षुपड़ी चूर्णीकै (२३०) देखा जा सकता है जो कहता है “अवनै इवन् पट्रुम् पट्रु अहन्कार गर्भम्. अवद्यकरम्. अवनुडय स्वीकारमे रक्शकम्”। यहाँ एक उदाहरण के बारें में कहा गया है। श्रीरामायणजी में माता सीता भगवान श्रीराम से मिलने के हेतु कोई राह के पीछे नहीं जाती है। परन्तु श्रीराम बहुत से कार्य करते है जैसे धनुष का तोड़ना आदि, वह श्रीराम ही थे जो जहां माता सीता थी वहाँ गये। उपर बताये विचार इस उदाहरण से स्पष्ट हो जायेंगे। यह वाल्मीकि ऋषि कि महानता है।

अत: यह देखा जाता है कि पूर्ण शरणागति का विचार निर्जीव है। यह भगवान श्रीमन्नारायण कि कृपा है जो किसी को ऐसे विचार आते है। तिरुवाय्मोलि ६.१० (उलगमुन्ड पेरुवाया) दशक पासुरों मे, हम सभी एक दृष्टान्त को देख सकते है जिसका उल्लेख “आवावेन्नुम्” पासुर की ईडु व्याख्या मे है |
श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीवेदांति स्वामीजी से पूछते है कि “स्वामीजी लोग कहते है भगवान तक पहूँचने का ५वा मार्ग भी है”? क्या यह सत्य है कि ५वा मार्ग भी है? श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी उत्तर देते है “अड़िएन को इसके बारें में जानकारी नहीं है। जो चौथे मार्ग को अपनाता है वही अन्तिम मार्ग है। उससे बढ़कर और कोई नहीं है”।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ४

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  ३                                                                                                                    श्लोक ५

श्लोक ४

भगवान श्रीमन्नारायण सभी के स्वामी है। कोई उन्हें आज्ञा नहीं कर सकता है। वह स्वतंत्र है और कोई उन्हें रोक भी नहीं सकता नाहीं गलत राह दिखा सकता है। अत: जीवों को उन्हें प्राप्त करने हेतु शास्त्र में कई मार्ग है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। जिसे शास्त्रों के बारीकी और तीव्रता पता नहीं होती है वह उपर बताये कठिन मार्ग से भगवान को पाने कि कोशिश करते है। यह एक सत्य है जो बताया गया है कि वह उन लोगों कि तरफ निर्देश किया गया है। जबतक भगवान स्वयं अपने चरण कमल उनके मस्तक पर नहीं रखते इनके पास भगवान के पास पहूंचने के लिये अपने कर्म के सिवाय और कोई भी राह नहीं है। अत: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह सलाह देते है कि हम सब यह चाहना करे कि भगवान स्वयं अपने इच्छा से अपने चरण कमल हम पर रखे।

“करूमत्ताल ज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे?
दरूमत्ताल अन्रि इरै तालगल
ओरुमत्ताल मुन्नीर कडैन्दान अडैन्दान मुदल पडैत्तान
अन्नीर अमर्न्दान अडि”

अर्थ:

कडैन्दान              : भगवान श्रीमन्नारायण देवताओ के लिये मथते है।
मुन्नीर                 : समुंदर जो तीन स्त्रोतों के जल से बनता है यानि बारीश का पानी, नदी का पानी और पानी जो निचे से उछलता है
ओरुमत्ताल          : “मंथारम” पर्वत का उपयोग करके
अडैन्दान              : उन्होंने माता सीता को लाने के लिये समुंदर के उपर एक सेतु बनाया
मुदल पडैत्तान      : उन्होंने पहीले जल कि रचना कि और उत्पत्ति करते वक्त
अन्नीर अमर्न्दान  : उस जल पर चले
अडि                     : ऐसे भगवान के
इरै तालगल          : चरण कमल
दरूमत्ताल अन्रि   : हमें स्वयंगतिशीलता प्रदान करते है। इसके अतिरिक्त
करूमत्ताल          : दूसरे मार्ग जैसे कर्म योग जो अपने स्वयं के प्रयत्न से करते है
ज्ञानत्ताल            : मार्ग जैसे ज्ञान योग और भक्ति योग
काणुम वगै उण्डे?  : हमें भगवान के चरण कमल प्रदान नहीं करेंगे। क्या वह?

स्पष्टीकरण:

करूमत्तालज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे?:- क्या कोई व्यक्ति स्वयं के प्रयत्न जैसे कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग से भगवान के चरण कमल को प्राप्त कर सकता है? इसका जवाब है नहीं। भक्ति “ज्ञान” में अपने आप शामिल हो जाती है। भक्ति और कुछ नहीं “ज्ञान” का सर्वोच्च  पद है। तीनों मार्ग भगवान को पाने के लिये कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग वेदांती के लेख अनुसार समझाया गया है। राजा जनक माता सीता के पिताश्री भगवान के चरण कमल कर्म योग द्वारा प्राप्त किये। भगवद् गीता में ज्ञान योग से पवित्र और कुछ भी नहीं कहा गया है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा “अगर कोई व्यक्ति मुझे प्राप्त करना चाहता है तो उसे अपना मन और हृदय दोनों को मेरे में लगाना होगा और बिना अपना ध्यान को एक क्षण के लिये भी नष्ट किये बिना निरन्तर मेरे बारें में विचार करना होगा। उसे मेरी हीं पूजा करनी होगी”। अब हमें एक प्रश्न आता है कि क्यों श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ने कहा “इवर्राई काणुम वगै उण्डे”? इस पर विचार करना होगा। श्रीदेवराज स्वामीजी को उपर बताये भगवान को प्राप्त करने के राह का सही गुण पता था। उन्हें यह श्रीरामानुज स्वामीजी से प्राप्त हुये ज्ञान के कारण पता था। इसलिये उन्होंने यह कहा। यही वह राह है जिसे भगवान कि पूर्ण शरणागति करने के पश्चात सबको को पालन करना है। इसलिये यह स्पष्ट है कि वें जो शरणागति करते है वह उनके कार्य के लिये आधार बन जाते है। अत: यह बिना बोले हो जाता है कि यह राह स्वयं के प्रयत्न से होते है, शरणागति का सहारा लेना हीं है। अत: शरणागति के मदद से हीं इस तरह से भगवान के पास पहूंचने कि राह जा सकती है। अत: कोई भगवान को अपने स्वयं के राह से प्राप्त नहीं कर सकता है क्योंकि सफल होने के लिये इस राह को कुछ और की भी जरूरत है। अगर कोई शरणागति नहीं करता हो तो जो कुछ भी जैसे कर्म योग या ज्ञान योग नियम वह निभाता हो फिर भी कुछ भी जरूरी फल नहीं देंगे। यह संदेश अत्यंत गोपनिय है जो वेदांतिक लेख में दिये गये है। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इस पाशुर का विशेष भाव बताकर श्रीरामानुज स्वामीजी के निर्हेतु कृपा से हम सब कृपा करते है ।

यह जीवात्मा और भगवान के बीच सम्बन्ध हैं। अत: जीवात्मा को भगवान पर पूर्ण अधिकार होता है। जब उनके पास पहूंचने के आसान राह है तो हम कर्म योग आदि जैसे कठिन राह क्यों अपनाये। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी अपने गीतार्थ संग्रह में यह कहते है:

“निज कर्माधि भक्त्ययातम कुर्यात पृत्यैव कारितह
उपायधाम परित्यज्य न्यसेत देवेतु तामफि”

श्री भक्तिसार आल्वार नान्मुगन तिरुवंदादि में कहते है:

“इन्राग नालैये आग इनिच्चिरिदुम
निंराग निन अरुल एन पालदे – नंराग
नान उन्नै अन्रि इलेन कण्ड़ाय नारणने
नी एन्नै अन्रि इलै” (नान्मुगन तिरुवंदादि-७)

यह दो पद यह प्रमाण करते है कि भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों के सिवाय और कोई राह हैं हीं नहीं।

दरूमत्ताल अन्रि इरै तालगल:– इस पद का वाचन इस तरह करना चाहिये “इरै तालगल दरूमत्ताल अन्रि”। इस का अर्थ यह हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण अपने चरण कमल स्वयं हीं दे देते है और इसके अलावा और कोई राह है ही नहीं। यह उस विषय को आधार देता हैं कि भगवान के चरण कमल हीं हमारे क मात्र उपाय है। यहीं मुमुक्षुपड़ी चूर्णिकै में बताया गया है “पिराट्टियुं विदाधु, तिंकझलाई इरुक्कुम”। इस पाशुर में “इरै” का अर्थ वहीं है जो अष्टाक्षर महामन्त्र के पहिले शब्द का है (ॐ नमो नारायणाय) यानि “ॐ” शब्द में अकार। वह और कोई नहीं “ॐ” शब्द में जिसे “अ” कहा गया हो।

“तालगल दरुम अत्ताल अन्रि” का अर्थ यह हैं कि हम सब के एक मात्र उपाय केवल भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल हीं हैं और कुछ नहीं। यह वेदों में विस्तार से लिखा गया है। द्वय महामन्त्र के पहिले भाग में हम यह देख सकते है कि “तिरुवडिगले शरणमाग पट्रुगिरेन” मे अनयता है। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “आरेनेक्कु निन पादमे शरणागा तंधोझिंदाई”, “कझगल अवये शरनागा कोण्डा”, “अडिमेल सेमम्कोल तेन कुरुगूर शठकोपन” और “चरणे चरणं नमकु”। हम यह देख सकते है कि उन्होंने बहुत से पाशुरों में विशेषकर भगवान के चरण कमल हीं हमारे उपाय है यह कहा हैं और इसीलिए आल्वारों ने भी यही कहा है। अत: भगवान के चरण कमलों  के अतिरिक्ति मनुष्य को और कुछ भी पकड़ना हीं नहीं है। बहुत से उदाहरण हैं जो बताये गये हैं।

ओरुमत्ताल मुन्नीर कडैन्दान: एक समय कि बात हैं देवलोक में इन्द्र अपने वाहन “ऐरावत” हाथी पर विराजमान होकर भ्रमण करने लगे। ऐसे करते समय वें दुर्वासा मुनि के आश्रम पर से गुजर रहे थे जिनके पास एक माला थी जिसे उन्होंने देवी कि आराधना करके प्रसाद रूप में पाया था। इन्द्र को उस माला में बिल्कुल भी रुचि न थी इसलिये “ऐरावत” हाथी को उसे लेकर उसको नष्ट करवा दिया। यह देख कर दुर्वासा मुनि क्रोधित हो गये और इन्द्र को श्राप दिया कि उनका सारा धन नष्ट हो जाये और उनका अहंकार जमीन पर आ जाये। इन्द्र का सारा धन उसी क्षण मिट गया। उनको अपनी गलती का एहसास हुआ परंतु उन्हें क्या करना कुछ समझ मे नहीं आया और उन्होंने भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों का शरण स्वीकार किया। भगवान उनके शरण में आये किसी को नहीं छोड़ते। उन्होंने वासुकि नामक सर्प को रस्सी जैसे और मंथारा पर्वत को घुमने का औज़ार बनाकर समुंदर को मथा। उन्होंने कछुआ का अवतार लिया और पर्वत का सारा बोझ अपने उपर लिया। उन्होंने न हिलने वाले समुंदर को हीलाया जो कोई भी कर नहीं पाता। उन्होंने इस पाशुर के अनुसार मथा “आयीरम तोलाई अलाई कदल कदैंधान” (उन्होंने समुंदर को १००० कन्धों से मथा)। मथने के क्रिया से बहुत सा धन उत्पन हुआ और भगवान ने यह सब धन इन्द्र को दिया और उनका धन वापस जमा किया।

अडैन्दान: माता सीता जो भगवान श्रीराम से बहुत दूर थी बहुत उदास थी। भगवान श्रीराम ने माता सीता कि प्रसन्नता हेतु समुंदर पर एक सेतु का निर्माण किया। उन्होंने यह सेतु वानरों कि सहायता से बनाया। उन्होंने उस सेतु को बनाने के लिये बड़े पहाड़ के पत्थरों का उपयोग किया जिसे कोई भी नाप नहीं सकता।

मुदल पडैत्तान: लौकिक अतिवृष्टि के समय सभी जीव जन्तु के पास कोई शरीर न था और ना  ही उस स्थिति में थे जहाँ वें खुशी या दुख को समझ सके। उस समय जब सभी जन उस स्थिति में थे तब भगवान एक और समय का निर्माण कर रहे थे। उन्होंने समुंदर बनाया, तत्पश्चात चार मुखों वाला ब्रह्मा और फिर सब कुछ। इसलिये वह जल है जिसे भगवान ने सर्व प्रथम बनाया।

अन्नीर अमर्न्दान: उन्होंने उस समुंदर का सहारा लिया जिसे उन्होंने निर्माण किया और सब कि रक्षा की। कुछ पाशुर जैसे “वेल्ला तड़ंकदलूल विदनागणै मे मरुवि”, “पार्कदल योगा नितीरै सेयधाई”, “पार्कदलूल पय्या तुईंरा परमन”, “वेल्ल वेल्लातिन मे ओरु पाम्बै मेतयाग विरितु अधन मेईए कल्ला निधिरै कोलगिरा मार्गम”  यही भगवान कि दशा दर्शाते हैं जहाँ वें क्षीरसागर पर विराजमान है।

अडि:- क्या हमारे पास भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करने का कोई स्वयं का उपाय है जिन्हें उपर समझाया गया है? ऐसे भगवान के चरण कमल जिन्होंने समुंदर को मथा, सेतु का निर्माण किया, जल का निर्माण किया और जिन्होंने क्षीरसागर का सहारा लिया यह समझाया गया है। यह कथाएं यह सूचित करती है कि वें हीं सब के रक्षक है जैसे इन्द्र जो सांसारिक वस्तु के लिये उनके पास गया, माता सीता जिन्होने भगवान को छोड़ और किसी कि इच्छा नहीं कि और अनगिनत मनुष्य जो प्रलय में नाश हो गये और फिर जन्म भी लिया। उन्होंने किसी में भेद नहीं किया जिसने शरण लिया या नही लिया हो। ऐसे भगवान के चरण कमल को इस पाशुर में “अडि” समझाया गया है। अत: इस पाशुर का अर्थ इस क्रम में होगा “मुन्नीर अडैन्दान मुदल पडैत्तान अन्नीर अमर्न्दान अडि इरै वनुदया अड़ियागिरा इरैतालगल दरूमत्ताल अन्रि करूमत्ताल, ज्ञानत्ताल काणुम वगै उण्डे”

अत: इसका पूर्ण संदेश यह है कि हम स्वयं अपने प्रयत्न से कुछ भी कर ले भगवान के चरण कमलों को प्राप्त करने के लिये वह उपाय नहीं है। उपाय तो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल हीं है। उसके अलावा और कुछ भी नहीं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – ३

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श्रीः
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श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक  २                                                                                                                        श्लोक ४

श्लोक ३

सभी जीवात्मा को यह समझना चाहिये कि उनका स्वाभाविक गुण भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना है। यह जानकर हमें केवल इसे यहाँ नहीं रुकना है बल्कि उनके प्रति सेवा करते हुए उच्च चोटी पर पहूंचना है। इसे अपमान नहीं समझना और पथभ्रष्ट न होकर लाभ लेना चाहिये। अगर किसी कारण वश कोई जीवात्मा भगवान कि सेवा छोड़ अन्य कार्य में लगा है तो तब यह विचार करना चाहिये कि वह जीवात्मा “दास” प्रकार का है। भगवान कि सेवा छोड़ अन्य कार्य करना व्यर्थ है। भगवान श्रीमन्नारायण जब त्रिविक्रम अवतार लिये उन्होंने पूरे संसार को मापा जिसमे सभी जीव शामील थे। यह आगे बताता है कि सब जीव उनके दास है। क्या इसका यह अर्थ है कि यह उन जीवों को उपयोगी है? नहीं। उस समय वह जीवात्मा यह नहीं समझ सके कि वें भगवान के आधीन है वें इस संसार में अपने प्रारब्ध के कारण जन्म मरण का चक्कर काट रहे है। अत: एक आत्मा को अपने सत्य स्वभाव को जानना चाहिये और भगवान कि सेवा करनी चाहिये। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इस विचार के अलावा उन जीवों के बारें में भी बात करते है जो इस जन्म मरण के चक्कर से बाहर आना हीं नहीं चाहते।


पलङ्गोण्डु मीलाद पावम उलदागिल
कुलङ्गोण्डु कारियम एन कूरीर
तलङ्गोण्ड तालिणैयान अन्रे तनै ओलिन्द यावरैयुम
आलुडैयान अन्रे अवन

अर्थ:

पावम                        : (अगर) दोष
उलदागिल                 : कहाँ होना
पलङ्गोण्डु                 : व्यर्थ धन, पैसा आदि, भगवान से मिलने के पश्चात
मीलाद                      : आध्यात्मिक सलाह के जरिये यह जाने बिना कि वह व्यर्थ है
कारियम एन कूरीर?   : उसका पाने का क्या उपयोग है
कुलङ्गोण्डु                : यह जाने बिना कि हम भगवान कि सेवा हेतु पूर्वनिर्दिष्ट कुल में जन्म लिये है
तालिणैयान               : वह जिसके इतने सुन्दर चरण है जिससे वह
तलङ्गोण्ड                : पूरे संसार को माप लिया
अवन                        : वह हीं व्यक्ति
अन्रे                          : उस वक्त यह सुनिश्चित किया कि
यावरैयुम                  : सभी जीव
तनै ओलिन्द             : उन्हें जोड़
आलुडैयान                : उनके सेवक हीं है

स्पष्टीकरण:

पलङ्गोण्डु मीलाद पावम उलदागिल:- यह उन कुछ लोगों को संबोधित करता है जो सामान्य लाभ जैसे पैसा आदि के पीछे जाते है। इसके पश्चात उनके पास एक अवसर हो सकता है कि वह महान आचार्य कि बाते सुनकर उसके व्यर्थता को समझ सके। यह लोग फिर भी अपनी इस गलती को सुधारने कि कोशिश न करके तात्पूर्तिक धन के पीछे जाते है। यह वह जन है जो बुरे कर्मों से घिरे है। “पावम” शब्द का एक और अर्थ “स्मरण शक्ति” है इसका यह अर्थ हुआ कि उन जन के पास इस दशा में स्मरण शक्ति नहीं है और अपने मूल दशा में जाने से उन्हें रोकता है यानि जब उनके पास यह ज्ञान था कि वह भगवान के सदैव दास है। यह जन अपने आचार्य के परामर्श को सुनते थे, भगवद गीता आदि शास्त्रों से भी सिखते थे। फिर भी वहीं गलती हमेशा करते है और अपने आप को उस बुरे कर्मों से बाहर निकाल नहीं पाते और उस गलती को दोगुणा करते है।

कुलङ्गोण्डु कारियम एन कूरीर?: अगर कसी को भगवान श्रीमन्नारायण को छोड़ अन्य विषयो में रुचि हो तो ऐसा व्यक्ति जन्म मरण के चक्कर में पड़ा रहेगा। वह इसे अपने जीवन से तोड़ना भी नहीं चाहेगा। भगवान उसे अपने चरण कमलों में भी नहीं लेंगे। अत: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी पुछते है कि अगर किसी व्यक्ति को आत्मा के स्वाभाव के बारें में पता हो और फिर भी दूसरे विषयों में रुचि हो तो ऐसे ज्ञान को पहिले स्थान में पाने का क्या मतलब है।

इस मिलाप के समय एक प्रश्न उठता है। क्या यह उस जीव को संतुष्ट नहीं करता है और आत्मा का स्वाभाविक गुण है भगवान का दास बनकर रहना? क्या यह ज्ञान भगवान को आनन्द देता है और अन्त में उसे जीव को भगवान के प्रेम और दया को प्रदान करेगा?

तलङ्गोण्ड तालिणैयान:  यह पद भगवान के त्रिविक्रम अवतार को समझाता है। एक समय कि बात है एक व्यक्ति “महाबलि” था जो तीनों लोक (भूलोक, भुवरलोक और सुवरलोक) पर राज करना चाहता था। अपनी मनोकामना को पूर्ण करने हेतु उसने एक तपस्या कि। यह तीन लोक इन्द्र के पास थे। क्योंकि उनकी संपत्ति को महाबलि से खतरा था इन्द्र ने भगवान कि शरणागति कर ली। भगवान उन सब कि रक्षा करते है जो उनके शरण आते है। इसलिये वह स्वयं “वामन” रूप लेकर उस स्थान पर जाते है जहां महाबलि तपस्या कर रहा था। तपस्या रूप से वह व्यक्ति जो यह करता है उसे वो सब कुछ देना पड़ता है जो कोई व्यक्ति उससे मांगता  है। वामन भगवान दान करने वाले के पास जाकर तीन कदम जमीन मांगे। महाबलि उन्हें तीन कदम जमीन देने के लिये तैयार हो गये। भगवान उसी क्षण अपने पैर से तीन कदम जमीन नापने के लिये बहुत बड़े हो गये। उनके एक कदम ने सारी धरती को नाप लिया। और दूसरे कदम से आकाश। ऐसा कर १४ दुनिया (७ ऊपर और ७ नीचे) को नाप लिया। अब उनके पास नापने के लिए कुछ न था तो उन्होंने अपना तीसरा कदम महाबलि के मस्तक पर रख दिया और उसे पाताल लोक में पहूंचा दिया। इस तरह उन्होंने इन्द्र को बचाया और यह सुनिश्चित किया कि उसके तीनों लोकों को कोई खतरा नहीं है। इस पाशुर “तलङ्गोण्ड तालिणैयान” का अर्थ वह जिसने धरती और आकाश को नाप लिया।

अन्रे तनै ओलिन्द यावरैयुम आलुडैयान अन्रे अवन: जब भगवान ने तीनों लोकों को नापा क्या उन्होंने सारे संसार को यह संदेश नहीं दिया कि वें खुदको छोड़कर इस जगत के मालिक है? वें हीं स्वामी है और हम सब उनके दास है। जब उन्होंने यह कार्य किया उन्होंने नाहि इस बात को सहारा दिया की वह एक हीं हम सब के मालिक है परन्तु वह इतने आनंदित थे वें त्रिविक्रम के रूप में खड़े रह गये। श्रीयोगीवाहन स्वामीजी कहते है “उवंधा उल्लातनै उलगलम अलन्धु”। वह आनंदित थे क्योंकि उन सब को अपने चरणों से छु सकते थे जो उनके दास थे। यह उसी तरह था जैसे एक माँ अपने सोते हुए बच्चे को गले लगाती है। यह समझने के पश्चात मन में एक प्रश्न आ सकता है कि अपने बच्चे पर निर्हेतुक कृपा करनेवाले कैसे उनको जन्म मरण के चक्कर में हमेशा के लिये रख सकता है? इसका कारण आगे बताया जायेगा। एक व्यक्ति भगवान और उनकी कृपा को भूल जाता है। वह सांसारिक कार्य में लगा हुआ रहता है, सांसारिक धन कमाने में और उनके प्रति आसक्त हो जाता है। इसके फल स्वरूप वह सांसारिक धन के जाल में इस तरह फस जाता है कि वह स्वयं अपनी असली पहिचान भूल जाता है। सांसारिक धन में रुचि के कारण वह अपने आचार्य कि सलाह सुनकर भी यह सब नहीं छोड़ सकता। वह “अड़िएन” आदि जैसे शब्दों का प्रयोग करता है यह कहने के लिये कि वह भगवान का दास है वह फिर भी भगवान छोड़ दूसरे लाभ के पीछे जाता है। अगर यह दशा है तो भगवान सही समय का इंतजार करते है की उसे यह एहसास हो जाय कि यह गलती है और वह भगवान के चरण कमलों कि चाहना करने लगे। जब तक यह अद्भुत समय नहीं आता है भगवान उस व्यक्ति कि रक्षा नहीं करते है।

श्रीतिरुवल्लुवर इस तत्त्व का निचोड़ कहते है “पिरवि पेरुंकडल निंधुवर, निंधार इरैवन अदी सेराधार” और “पर्रुगा पर्रारान पर्रिनै अप्पर्राई पर्रुगा पर्रू विदर्कु”। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अर्राधु उर्रदु विदु उयिर”।

अत: प्रमेयसारम के पहिले तीन पाशुर “उव्वानवर”, “कुलम ओन्रु” और “पावम” में “ॐ नमो नारायणाय” में “ॐ” शब्द का अर्थ समझाया गया है। अगले चार पाशुर में “नमो” शब्द पर चर्चा करेंगे।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – २

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

श्लोक १                                                                                                                         श्लोक ३

श्लोक  २

प्रस्तावना: पिछले पाशुर में हमने यह देखा कि जीवात्मा को तीन प्रकार में बांटा गया है (अ) वह जिसका जन्म उसके कर्मानुसार शरीर में ही बार बार होता है, (आ) वह जो भगवान कि निर्हेतुक कृपा से संसार के जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा पाता है और (इ) वह जो कर्म से प्रभावित नहीं है और भगवान के साथ समान स्वर में है। पहिले श्रेणी का आत्मा वह है जो उसके कर्मानुसार किसी शरीर में रहती है। इन आत्माओं को जन्म मरण का चक्कर निरन्तर आते रहता है जैसे नदी में बाढ़ आती है। इसका क्या कारण है और इससे मुक्त होने कि राह क्या है? यह पाशुर इन सब प्रश्नों का उत्तर देते है:

“कुलम ओन्रु उयिर पल तम् कुट्रत्ताल इट्ट
कलम ओन्रु करियमुम वेरम
पलम ओन्रु काणामै काणुम करुत्तार तिरुत्तालगल
पेणामै काणुम पीलै”

अर्थ :

ओन्रु               : केवल एक हीं
कुलम             : जाति / दासों का परिवार (भगवान श्रीमन्नारायण के)
उयिर              : हालाकि वह आत्मा जिसमे यह दास होने का गुण है
पल                 : वह ज्यादा है
तम् कुट्रत्ताल  :  ऐसे आत्मा के अच्छे और बुरे कर्म
इट्ट                 : भगवान श्रीमन्नारायण तक सीमित है
कलम             : एक पात्र में जिसे “शरीर” कहते है
ओन्रु               : वह एक ही तरह का होता है जो एक हीं पदार्थ से बना है “मूल पोरुल”
करियमुम       : ऐसे आत्मा के क्रिया
वेरम               : बिरंगा है उसके कर्मानुसार
पीलै               : एक आत्मा के लिये गलत कार्य करने का है
पेणामै काणुम : नहीं पकड़ना
तिरुत्तालगल  : चरण कमल
करुत्तार         :  आचार्य के
काणुम           : जो आत्मा पर कृपा करते है
काणामै          : बिना
पलम ओन्रु     : कोई लोभ देखते हुए
स्पष्टीकरन:

कुलम ओन्रु: इस संसार में सभी जीव एक हीं परिवार से है जो उनके स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण के दास है। जीव का सच्चा गुण यह है कि उसके अच्छाई और बुराई में कुछ गड़बड़ न करे परन्तु अपने स्वामी के प्रति निष्ठावान रहें। यह जीव का प्राकृतिक गुण है और बदलेगा नहीं। यह परिवार” दासों का परिवार “है ऐसे कहकर संबोधित करते है। इसका उदाहरण “तोण्ड़कुलतिलुलर” (तिरुपल्लाण्डु -५)।

उयिर पल: ऐसी आत्मा अनगिनत है। ऐसे अनगिनत आत्मा हमेशा के लिये अपने स्वामी श्रीमन्नारायण के दास है।

तम् कुट्रत्ताल इट्ट कलाम ओन्रु: ऐसे आत्मा एक पात्र में रहते जिसे “शरीर” कहते है। उन्हें यह शरीर उनके अच्छे और बुरे कर्मानुसार भगवान श्रीमन्नारायण ने दिया है । ऐसी सभी शरीर एक हीं पदार्थ से बना है। इस पदार्थ को “प्रकृति” कहते है। अत: यह कहा जा सकता है कि शरीर वह है जो एक ही पदार्थ से बना है। इसके लिये यह समानता है कि जो भी रेत से बना है वह रेत है। जो भी बहुमूल्य धातु से बना है वह बहुमूल्य है। उसी तरह जो प्रकृति से बना है वह प्रकृति है। यह पद “तम् कुट्रत्ताल इट्ट कलाम ओन्रु” को उसके हर एक बाद का अर्थ जानकर समझा जा सकता है। भगवान श्रीमन्नारायण इन आत्मा को उनके कर्मानुसार शरीर देते है। “कलाम” का सही अर्थ पात्र है परन्तु यहाँ उसका अर्थ “शरीर” है। क्योंकि सभी शरीर धातु से ही बने है उसे “कलाम ओन्रु” ऐसा समझाया गया है।

“ऊर्वा पढ़िनोंराम ओन्बधु मानुदम
निर परावै नार्काल ऑर पप्पतु
स्ल्रिया बंधमान्धेवर पढ़िनालु अयन पदैता
अंधमिल स्ल्र्तावरम नालैन्धु”

इस पद्य में हम यह समझ सकते है कि रंग बिरंगे रूप जिसमे आत्मा वास कर सकता है। यह दोनों रूप के मध्य में अनगिनत उप-रूप है जिसे हम गिन सकते है। कितने भी अनगिनत शरीर के वर्ग हो हम उन्हें एक ही छत्री के नीचे रख सकते जिसे “शरीर” कहते है क्योंकि वह एक हीं पदार्थ से बना हुआ है जिसे “प्रकृति” कहते है। श्री शठकोप स्वामीजी अपने सहस्त्रगीति में कहते है “पिणाक्कि यावयुं पिझयामल बेदितुम बेधियाधधु ऑर कणक्किल कीर्ति वेला कढ़ी ज्ञान मूर्तियिनाई”

यहाँ श्री शठकोप स्वामीजी भगवान के अद्भुत ज्ञान का उत्सव मनाते है जो इतने अनगिनत आत्मा को उस आत्मा के छोटे से छोटे कर्म जो उसने अपने अनगिनत जीवन में किये है उसे भूले बिना शरीर देते है ।

करियमुम वेरम:  जैसे अनगिनत आत्मा यह आत्मा जो इन शरीर में रहकर अनगिनत क्रियाये करती है वह भी अनगिनत है। जबकी उन आत्मा के अच्छे गुण उसे कम समय के लिये स्वर्ग में बेजेगा और बुरे कर्म उसे नरक में डालेगा। और फिर सुख/सजा का स्वर्ग और नरक में अन्त होने के पश्चात फिर इस जन्म मरण के चक्कर में आना पड़ता है।

“वगुत्तान वगुत वगयल्लाल कोडी तोगुतार्क्कुम तुयतलरिधु” यह एक तिरुक्कुरल है। “वगुत्तान” विषय भगवान श्रीमन्नारायण को संबोधित करता है जो जीव के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब रखते है और यह सुनिश्चित करते है कि उस आत्मा को उसके कर्मानुसार सजा मिले। वह किसी एक के कर्म की सजा गलती से भी या अयोग्यता के कारण दूसरे को नहीं देते।

“करियमुम” शब्द में “उम” कुछ दर्शाता है। यहाँ कई आत्मा है परन्तु उनके लिये केवल एक हीं परिवार है “दासों का परिवार”। उसी प्रकार यह आत्मा केवल एक हीं प्रकार के शरीर में प्रवेश करते है परन्तु यह अनगिनत क्रियाये करते है। जीव का सामान्य स्वभाव अपने स्वामी श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहना है। हालाकि इस सत्य स्वभाव का एहसास हुए बिना वहाँ अनगिनत आत्मायें है जो जन्म-मरण, स्वर्ग-नरक, अनगिनत कार्य करना आदि में पडे रहते है। यह कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है जैसे तुफान में बहता हुआ पानी। अगर कोई इसका सही कारण जानना चाहता है और इस संसार बन्धन से छुटना चाहता है तो सबको इन बातों पर गौर करना चाहिए:

पलम ओन्रु काणामै काणुम करुत्तार तिरुत्तालगल पेणामै काणुम पीलै: इसका कारण बहुत सरल है। गलती यह है कि जीव आचार्य के समीप जाकर उनके चरण कमलों को नहीं पकडा है। यह “करुत्तार तिरुत्तालगल पेणामै काणुम पीलै” इस पद में समझाया गया है। एक आचार्य को “पलम ओन्रु काणामै काणुम करुत्तार” इस तरह इस पाशुर में बताया गया है। एक आचार्य जब एक शिष्य बनाते है तो वह उस शिष्य से अपने लिये कोई सांसारिक लाभ कि अपेक्षा नहीं करते जैसे प्रतिष्ठा, पैसा या स्वयं के पास इतने शिष्य होने की अपेक्षा कि वह शिष्य उनके लिये दासों कि तरह सेवा करे, आदि। वक अपने शिष्य के लिये उसे परमपद प्राप्त हो जाये इस एक ही बात कि कामना करते है। वह केवल इसीके लिये तरसते है और कुछ नहीं। इसके साथ वह अपने शिष्य को आशिर्वाद प्रदान करते है और वह सब ज्ञान देते है जिससे वह अपने अंतिम लक्ष्य परमपद पहुँच जाये। आचार्य के चरण कमलों में शरण ना लेना इस जन्म मरण के चक्कर में पड़े रहने का यहीं कारण है । आचार्य कि कृपा ही इस जीवात्मा के लिये अच्छा संसार बनाता है। सभी को आचार्य के पास जाकर उनके चरण कमलों में शरण लेना चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि जीव के जो अनगिनत कर्मानुसार प्रारब्ध जमा हुआ है वह आचार्य कृपा से मुक्त हो जायेगा। आचार्य कि ऐसी महिमा इस पाशुर में समझायी गयी है “तिरुत्तालगल पेणुधल”। “तिरुत्तालगल पेणुधल” का अर्थ आचार्य के चरण कमलों को पकड़ना है। “तिरुत्तालगल पेणामै”  इसके विपरित बताता है यानि आचार्य के चरण कमलों को नहीं पकड़ना। यह भूल (पीलै) है। हम आचार्य कि महिमा श्रीवचण भूषण में देख सकते है —
भगवलाभम् आचार्यनाले | आचार्य लाभम् भगवानाळे | आचार्य संभन्धम् कुलयादे किडन्दाल् ज्ञान भक्ति वैराज्ञङ्गळ् उण्दाक्कि कोळ्ळलाम् | आचार्य संभन्धम् कुलैन्दाल् इवै (ज्ञान, भक्ति) उण्डानालुम् प्रयोजनम् इल्लै | तालि किडन्दाल् भूषणङ्गळ् पण्णिप्पोडलाम् | तालि पोनाल् भूषणङ्गळ् एल्लाम् अवदयतै (श्राप का मूल कारक) विळैककुम् | स्वाभिमानत्ताले ईश्वर अभिमानत्तैक्कुलैत्तु कोन्ड इवनुक्कु आचार्य अभिमानम् ओळिय गति इल्लै एन्रु पिळ्ळै पल कालुमरुळिच्चेय्य केटु इरुकैयायिरुककुम् | स्वस्वातन्त्रिय भयत्ताले भक्ति नळुविट्रु (नळुवित्तु), भगवद् स्वातन्त्रिय भयत्ताले प्रपत्ति नळुविट्रु (नळुवित्तृ) | आचार्यनयुम् तान् पट्रुम् (पत्तुम्) पट्टृ अहंकार गर्भमागयाले कालन् कोण्डु मोदिरम् इडुमो पादि | आचार्य अभिमानमे उत्तारकम् — श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र – ४३४

शास्त्र भक्ति के बारें में चर्चा करता है जो हर एक को परमपद ले जाने का वचन देता है। इससे भी अधिक प्रपत्ति (शरणागति) है जो उसे भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों में ले जाता है। अगर दोनों विधि मनुष्य को परमपद नहीं ले जाता है तो ऐसी स्थिति में आचार्य के शरण होना यही विकल्प उस व्यक्ति के पास बचता है । अगर ऐसे आचार्य अपने शिष्य को “यह मेरा है” ऐसा बुलाते है तो इससे अधिक उस व्यक्ति और कुछ नहीं चाहिये । वह उस मनुष्य को परमपद ले जायेंगे । अत: इस पाशुर का यह तत्त्व है कि जिस पर आचार्य कृपा हो गयी हो उसका परमपद जाना निश्चित है और जिस पर नहीं हुयी है तो उसे तो इस संसार के जन्म मरण के चक्कर में पड़े रहना है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय सारम् – श्लोक – १

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

प्रमेय सारम्

तनियन्                                                                                                                          श्लोक  २

श्लोक १

तिरुमन्त्र का तत्त्व “ॐ” है जिसे “प्रणव” भी कहते है। प्रणव कि कठिनाई यहाँ पहिले पशुर में समझायी गयी है।

अव्वानवरूक्कु मव्वानवर एल्लाम
उव्वानवर अडिमै एन्रु रैत्तार – इव्वारु
केट्टिरुप्पार्क्कु आलेन्रु कण्डिरुप्पार मीद्चियिला
नाट्टिरुप्पार् एन्रि रुप्पन नान्!!!

 अर्थ:

उव्वानवर              : आचार्य
उरैत्तार                 : कहते है कि
मव्वानवर एल्लाम : सभी आत्मा एकत्रित में “म” शब्द को संबोधित करते है वह
अडिमै                  : सेवक है
अव्वानवरूक्कु      : भगवान श्रीमन्नारायण के जो “अ” शब्द से संबोधित किये हुए है।
इव्वारु                  : कुछ लोग है जो
केटु                      : ध्यान से सुनते है
रुप्पार्क्कु               : आचार्य द्वारा उपर बताये उपदेशानुसार रहना।
कण्डिरुप्पार          : वह लोग जिन्हें यह एहसास हो जाता है कि
आलेन्रु                  : वह उन जनों के सेवक है जो अपने आचार्य के आज्ञानुसार रहते और सुनते है
इरुप्पार् एन्रि         : और नित्य, मुक्त और अन्य भक्तों के साथ जाते और हमेशा के लिये रहते
नाडु                      : परमपदधाम में जहाँ
मीद्चियिला          : से वापस नहीं आना है
नान्                     : अड़िएन जो श्रीरामानुज स्वामीजी का भक्त है
इरुप्पन                : वह दृढ़ता से इस पर विश्वास करता है।

स्पष्टीकरन:

अव्वानवरूक्कु: “अ” शब्द / शब्दांश का अर्थ भगवान श्रीमन्नारायण हीं है। वेदों में भगवान को “अ” बताया गया है। इस पाशुर में “अ” शब्द दोनों “नाम” और उसके अर्थ के लिये उपयोग किया गया है यानि “अ” शब्द भगवान उसका लक्ष्य ऐसा दर्शाया गया है और उसका अर्थ भगवान ऐसा बताया गया है। नाम और उसका अर्थ दोनों के बीच में सम्बन्ध का अस्तित्व अलग अलग नहीं है यह हमेशा सामांजस्य होना चाहिये। यह इस पाशुर में “अ” शब्द से समझाया जा सकता है। महाकवि कालिदास अपने महान कलाकृत “रघुवंशं” में यह स्थिति समझाते है जहाँ भगवान और अम्माजी साथ में है। वह उन्हें न जुदा होनेवाला ऐसा समझाया जैसे “शब्द और उसका अर्थ”। यह “नमक” ऐसे कहने के समान है क्योंकि यह नमकिन है। इसलिये भगवान स्वयं भगवद् गीता में कहते है “सभी अक्षरों में मैं हीं “अ” हूँ”। इसलिये तिरुवल्लुवर कहते है “अगरा मुधला एझुतेल्लाम आदिभगवान मूधर्रे”।

“अ” नाम श्रीमन्नारायण को हीं संबोधित करता है। इसका मूल है “अ” = “अव रक्षणे” यानि वह जो रक्षा करता है। वेदों में एक अलग विभाग है जो यह चर्चा करता है और कोई नहीं। यह “सामन्याधिकरणं” तर्क शास्त्र पर चर्चा करता है जो यहाँ से नही गुजरता है। पर हम इसे एक बहुत सरल और सामान्य शास्त्र में समझेंगे। श्रीमन्नारायण सभी कारणों के कारण है। यह आल्वारों के पाशुर, वेदों, उपनिषद आदि में सिद्ध हुआ है। वह सभी वस्तु, सीमित, अनंत, चेत, अचेत के सूत्र है। इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उनके या उनके सम्बन्ध के बिना जन्म न लिया हो। उसी तरह “अ” शब्द सभी शब्दों में है एक रूप या अलग रूप में।

वह सभी अक्षरों / शब्दों / ध्वनी का स्त्रोत है जैसे भगवान सभी वस्तु के स्त्रोत है। श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में कहते है “करन्धेंगुम परंधुलन” और “करन्धा सिलिदम थोरूं इदन थिगझ पोरुल थोरूं”। वह सभी अस्तित्व में है। वह दूध में घी देखने के समान है। वह दूध में मौजूद है परन्तु हमें दिखता नहीं है। परन्तु दूध में घी की उपस्थिती नकारी नहीं जा सकता। इसलिये “अ” शब्द और भगवान एक हीं समान है क्योंकि यह दोनों में से सब का जन्म हुआ है। इसलिये “अ” भगवान को संबोधित करता है और किसी को नहीं।

कंबनात्ताझ्वान अपने बाल काण्ड के कड़िमणप पदलम में कहते है “भू मगल पोरुलूम एना”। इसका अर्थ यह है कि अगर हम “अ” उसका अर्थ कहते है यानि “भगवान” के बारे में अपने आप हीं समझाया जा सकता है।

मव्वानवर एल्लाम: “म” शब्द सभी आत्मा के स्वर को दर्शाता है। यही “म” शब्द का अर्थ है। शास्त्र कहता है “म” कार हमेशा एक वस्तु को दिखाता है जिसके पास विवेक है। हालाकि वह यह कहता है कि “एक” वस्तु और इस का अर्थ एक आत्मा, वह सामुहिक नाम है उसमे सब कुछ शामिल है। इसको एक उदाहरण देते हुए अगर हम कहे कि “यह एक धान का बीज है” हम यह नहीं कहते कि वहाँ केवल धान का एक ही बीज है। हमारा यह अर्थ है कि वहाँ केवल एक प्रकार के धान का हीं बीज है। इसलिये एक वचन एक प्रकार के लिए है ना कि इकाई के लिए। उसी तरह “म” सभी आत्मा जिसमे विवेक है उन्हें शामिल करता है। आत्मा को तीन प्रकार कि श्रेणी में बांटा गया है। (अ) वह जिसका जन्म उसके कर्मानुसार शरीर में ही बार बार होता है, (आ) वह जो भगवान कि निर्हेतुक कृपा से संसार के जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा पाता है और (इ) वह जो कर्म से प्रभावित नहीं है और भगवान के साथ समान स्वर में है। यह तीन को “बद्ध”, “मुक्त” और “नित्य” कहते है। इन तीनों को सामुहिक एक ही शब्द “म” से कहते है ।

उव्वानवर: “उव्वानवर” शब्द उस व्यक्ति को संबोधित करता है जो “उ” शब्द का अर्थ है। “उकार” आचार्य को समझाता है। शास्त्र कहते है “उ” कार का सीधा अर्थ अम्माजी पेरिया पिरट्टी श्री महालक्ष्मी है। वह एक आत्मा और परमात्मा के बीच कि डोर है और दोनों का मिलन हो जाये यह सुनिश्चित करती है। उसी तरह वह आचार्य हीं है जो आत्मा और भगवान श्रीमन्नारायण को मिलाते है। क्योंकि अम्माजी और आचार्य का कार्य एक ही है इसलिये “उ” कार आचार्य को भी संबोधित करता है। इसके अलावा आचार्य को अम्माजी के प्रति भक्ति और उनका स्नेह प्राप्त है। आचार्य यह सुनिश्चित करते है कि जो आचार्य के चरण कमलों के शरण होता है उसे अम्माजी का स्नेह प्राप्त होता है और फिर भगवान का प्रेम और स्नेह भी प्राप्त  होता है। क्योंकि आचार्य और अम्माजी वही कार्य करते है यानि भगवान का हमारे प्रति प्रेम, आचार्य को “उ” से संबोधित किया है वही शब्द जिसका अर्थ “अम्माजी” है।

इस दृष्टांत के लिये एक कथा है। एक बार जब श्रीरामानुज स्वामीजी प्रसन्न थे उन्होंने अपने शिष्य “श्रीदाशरथी स्वामीजी” को “उ” कार का अर्थ समझाया। श्रीदाशरथी स्वामीजी ने यह अपने पुत्र “कन्धादै आण्डान” को बताया जिन्होंने यह “भट्टर” को बताया। जैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने “उ” कार का अर्थ समझाया था उसे एक ग्रन्थ रूप में संग्रह किया गया जिसका नाम “प्रणव संग्रहं” है। इस ग्रन्थ में “उ” कार का अर्थ आचार्य कहा गया है। “प्रमेय सारम” के लेखक है श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी। क्योंकि वह इस ग्रन्थ में “उ” कार के अर्थ कि चर्चा करते है, यह हम परिणाम निकाल सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को “उ” कार का सही अर्थ कहते है। वह श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। उन्होंने उनकी कई वर्षो तक सेवा कि और उनके श्रेष्ठ दया का लक्ष्य बने।

अडिमै एन्रुरैत्तार: यह जीवात्मायें उनके अनादि स्वामी जिन्हें “अ” (श्रीमन्नारायण) कहते है उनकि सेवा करते है । “म” और “अ” के बीच में जो सम्बन्ध उत्पन्न हुआ वह “स्वामी-दास” है। यह सम्बन्ध “म” को आचार्य प्रधान करते है जो मध्यस्थ है। केवल जब आचार्य (जो यहा उ से दर्शाया गया है) शिष्य (जो यहा म से दर्शाया गया है) को सम्बन्ध दिखाते है तब शिष्य को पूरी विवेक से यह मालुम होता है। इसलिये यह पद उव्वानवरूक्कु मव्वानवर एल्लाम उव्वानवर अडिमै एन्रु रैत्तार” आगे बढ़कर आचार्य भगवान और आत्मा के बीच में “स्वामी / दास” सम्बन्ध को बाताते है। इसे बताने के लिये एक कथा है जो श्रीसहस्त्रगीति के इडु व्याख्यान में है।

एक समय एक व्यापारी था जिसका काम दूसरे जगह जाकर व्यापार कर धन कमाना था। उसकी पत्नी गर्भवती थी। एक दिन वह घर छोड़ समुद्र के उस पार दूसरे देश व्यापार के लिये पहुँच गया। जाने से पूर्व उसने अपनी पत्नी से कह गया कि उसे आने में समय लगेगा और वह उनके आनेवाले पुत्र को “व्यापार” का पाठ सिखाये। कुछ समय बाद उसने एक लड़के को जन्म दिया। वह लड़का बड़ा हुआ और वह व्यापार के गुण सिख गया। अब दूसरे देश में व्यापार करने का उस लड़के का समय था। संयोग से वह उसी देश में चला गया जहाँ उसके पिता गये थे। वह वहाँ व्यापार करने लगा। एक दिन पिता पुत्र में कुछ व्यापार नियम को लेकर झगड़ा हो गया। यह देख बहुत जन जमा होगये। उन लोगों में एक बुढ़ा था जो बाप बेटे दोनों को जानता था। यह देख वह बुढ़ा बोला “आप दोनों झगड़ा क्यों कर रहे हो? आप दोनों पिता पुत्र हो”। उसने  उनका सम्बन्ध बताकर उन्हें एक कर दिया। उनके सम्बन्ध जानकर उनके खुशी का ठिकाना न रहा। अत: आचार्य भक्त और भगवान के बीच में मध्यस्थ है। यह सम्बन्ध कोई नहीं बनाता। यह सदैव के लिये है। इस कथा में उस बुढे व्यक्ति ने कोई नया सम्बन्ध नहीं बनाया उसने केवल उनके सम्बन्ध को याद करवाया। एक बात इस कथा में यह है कि पिता यह भूल गया कि वह पिता है परन्तु सच्चाई में भगवान कभी कुछ नहीं भुलते। वह सिर्फ आचार्य के रूप में अवतार लेते है ताकि कोई भी उन तक आसानी से पहुँछ जाये और शरण हो जाये।

अत: आचार्य वह है जो भगवान और भागवत के बीच मध्यस्थ का कार्य करते है । वह उनमें “भगवद-सेवक” सम्बन्ध प्रगट करते है। आचार्य शिष्य को भगवान के बारें में बताते है। वह कहते है भगवान हीं हम सब के लिये माता, पिता, सम्बन्धी और सब कुछ है। दूसरी तरफ यही आचार्य भगवान से कहते है कि यह आत्मा आप से अलग रह नहीं सकता इस पुत्र को क्षमा कर आपके चरण कमलों में शरण दे। आचार्य ऐसा कर उस आत्मा को मुक्त कर देते है। यही कार्य आचार्य एक व्यक्ति के लिये करते है जिसे इस पाशुर में उत्सव रूप में मनाया गया है।

इव्वारु केट्टिरुप्पार्क्कु: यह उन समूह के लोगों को दर्शाता है जो “अ”, “उ” और “म” कार को अच्छी तरह सुनकर उसका पालन करते है। तिरुमन्त्र स्वयं में भगवान का नाम है “नारायण”।  इसको “नर” और “आयण” में अलग किया जा सकता है। एक बार आचार्य अपने शिष्य को “नर” और “आयण” के सम्बन्ध के बारें में समझाते है। “नर” आत्मा है और “आयण” भगवान श्रीमन्नारायण है। आचार्य यह ज्ञान देते है कि आत्मा अपने स्वामी श्रीमन्नारायण का दास है। यह ज्ञान प्राप्त कर शिष्य अपना जीवन इसे पालन करके बिताता है।

आलेन्रु कण्डिरुप्पार: कुछ लोग है जो ऐसे शिष्य कि सेवा करते जो पिछले प्रकरण में समझाया गया है। यह लोग इन शिष्य को उनके लिये सब कुछ मानते है। सबसे पहिले भगवान श्रीमन्नारायण का दास हूँ ऐसा मानना चाहिये। इस शास्त्र को आगे बढ़ाते हुए यह मतलब है कि वह दास सबकुछ करेगा जो उसके स्वामी श्रीमन्नारायण को पसन्द है। भगवान कि पसन्द और कुछ नहीं वह व्यक्ति उनके दासों का दास रहे और उनका कैकर्य करें यही है। अत: एक व्यक्ति के अंतिम नियम यह है कि वह भगवान श्रीमन्नारायण के दासों का दास रहे। इस पाशुर में “आलेन्रु कण्डिरुप्पार”  पद में यहीं समझाया गया है।

तिरुमन्त्र में एक आत्मा के तीन गुण को समझाया गया है। वह है (अ) यह आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण का हीं दास है। (आ) भगवान श्रीमन्नारायण छोड़ आत्मा को शरण लेने के लिए और कोई स्थान हीं नहीं है और (इ) भगवान छोड़ आत्मा के पास और कोई आनंदमय नहीं है। इन आत्मा के तीन गुणों में एक ऐसा अर्थ है जो अंतनिर्हित है। अगर हम “श्रीमन्नारायण” को “श्रीमन्नारायण के भक्तों” से बदलते है तो हमें आत्मा के तीन गुण प्राप्त होते है जो भगवान श्रीमन्नारायण के भक्तों के सम्बन्ध से है। वह है (अ) यह आत्मा श्रीमन्नारायण के भक्तों के सिवाय और किसी का दास नहीं। (आ) श्रीमन्नारायण के भक्तों के अलावा इस आत्मा का और कोई शरण नहीं है। (इ) श्रीमन्नारायण के भक्तों के सिवाय आत्मा के पास और कोई खुशी नहीं है। “श्रीमन्नारायण” को छोड़ “श्रीमन्नारायण के भक्तों” के बारें में चर्चा करने का यह कारण है कि भगवान श्रीमन्नारायण अपने भक्तों से हीं सर्वाधिक प्रेम करते है। अत: यह अंतर्विरोधि नहीं है। यह आगे बढ़कर भगवान के भक्तों के दास होने का अर्थ समझाता है जिसे “चरम पर्व निष्ठा” कहते है। अत: किसी को सही पहचानना हो तो यह जानना चाहिये कि वह भगवान का भक्त है। यह समझने के पश्चात दूसरे कदम कि और चलना नाकि अंतिम पडाव कि ओर।

मीद्चियिला नाट्टिरुप्पार् एन्रि रुप्पन नान्: श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को यह दृढ़ विश्वास है कि जो भगवान के दासों के दास है वह परमपद अवश्य जायेंगे जहाँ से कोई वापस नहीं आता। वहाँ वें सब नित्यसूरी के संग में रहेंगे जो हमेशा भगवान के निकट रहते है। वह “नान्” शब्द का प्रयोग करते हुऐ यह ज़ोर देते है कि वह इस पर विश्वास करते है। इसका यह कारण है कि श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी से वेदों के गुप्त अर्थ कि शिक्षा प्राप्त किये है। वह बहुत सम्माननीय थे क्योंकि वह अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी के शब्दानुसार जीवन व्यतीत करते थे। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी से वेद और अन्य शास्त्र सीखने के पश्चात यह निर्णय किये कि यही सत्य है। सत्य यह है कि यह लोग जो भगवान के दासों के दास है इस संसार के भोगो को भोगने के लिये फिर वापस नहीं आते। वह परमपद पहूंचकर वहाँ नित्यसुरीयों के साथ हमेशा रहते है।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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thiruvAimozhi – 3.2.10 – thalaippey kAlam

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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krishna-thirumalai

Introduction for this pAsuram

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s introduction

No specific introduction.

Highlights from nanjIyar‘s introduction

In tenth pAsuram – AzhwAr becomes hopeless and is unable to survive the grief; seeing that emperumAn manifests his divine form in thirumalA (thiruvEnkatam) to AzhwAr’s total satisfaction and makes AzhwAr sustain himself.

Highlights from vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s introduction

Subsequently, krishNa seeing AzhwAr hopelessness in “engu inith thalaip peyvan” (How I am I going to attain the goal?), manifests his form in well known vicinity where he is present to help the people of future generation [in the form of deity in a temple] and AzhwAr having his sorrows removed becomes satisfied.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s introduction

See nanjIyar‘s introduction.

Highlights from nampiLLai‘s introduction as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

Tenth pAsuram. Seeing AzhwAr‘s hopeless state, emperumAn thinking that “AzhwAr cannot wait patiently for the result” says “Knowing you are greatly desirous, I am standing in north thirumalA specifically for you” to sustain him and AzhwAr becomes pleased by sustaining himself.

pAsuram

thalaip pey kAlam naman thamar pAsam vittAl
alaippUN uNNum avvallal ellAm agalak
kalaip pal gyAnaththen kaNNanaik kaNdu koNdu
nilaip peRRen nenjam peRRadhu nIduyirE

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Word-by-Word meanings (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

naman thamar – the servitors of yama
thalaip pey kAlam – in the last moments
pAsam – rope
vittAl – throw
alaippUN – being tortured
uNNum – such as experiencing it (due to seeing enemies)
a – that
allal ellAm – sorrows
agala – to eliminate
pal – many types of
kalai – vEdhams
gyAnam – having known
en – [emperumAn] who is easily approachable by me
kaNNanai – krishNa
kaNdu koNdu – having seen
en nenjam – my heart (which is broken)
nilai – stability
peRRu – acquired
uyir – AthmA (which was going to be finished due to grief)
nIdu – eternity
peRRadhu – acquired

Simple translation (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

In the last moments, when the servitors of yama throw their rope and will torture [the AthmA], that will lead to experiencing great sorrows (due to seeing enemies – i.e, the servitors of yama); after seeing krishNa who is known by many types of vEdham, eliminating such sorrows, my broken heart acquired stability and the AthmA (which was going to be finished due to grief) acquired eternity.

vyAkyAnams (commentaries)

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s vyAkyAnam

See vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s translation.

Highlights from nanjIyar‘s vyAkyAnam

See nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s vyAkyAnam

See nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from nampiLLai‘s vyAkyAnam as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

  • thalaip pey kAlam naman thamar – thalaip pey kAlam – the time when the servitors of yama reach us [to take our life]. When one was alive and engaging in whatever sins he liked, they will keep noting them down and will arrive and manifest themselves when one is about to reap the fruits of their activities.
  • pAsam vittAl – when they throw the ropes from their hands towards such a person in his last moments [to strangle him and pull him]
  • alaippUN uNNum – There is no end to their suffering, as the AthmA will try to pull the rope towards his side since he likes his mundane life and the servitors of yama will pull the rope towards their side.
  • avvallal ellAm agala – “avvallal” can only be said as “that suffering” – there is no example to explain that suffering. Will these be applicable for SrIvaishNavas as there are certain pramANams which say that it is not applicable for SrIvaishNavas? embAr explains that these sufferings [of AzhwAr] are similar to AthmAs suffering in the hands of the servitors of yama. i.e., the sufferings in separation from bhagavAn is the same as the sufferings of AthmA‘s final moments. Alternatively – ANdAn explains this as – once we have not attained bhagavAn, naturally we will end up with the servitors of yama – to eliminate such sorrows.
  • kalai … – As said in SrI bhagavath gIthA 15.15 “vEdhaiScha sarvair ahamEva vEdhya:” (from all of vEdhams, I am only known), having the glories of being known from many [parts of] vEdhams; instead of being in too far away place and only heard from pramANams (SAsthrams), having seen his appearance as krishNa.
  • nilaip peRRu en nenjam – The heart that was said in thiruvAimozhi 3.2.5 “sindhAmal seyyAy” (you are not protecting my heart from being broken), also became stable somehow.
  • uyir nIdu peRRadhu – That AthmA which is explained in SrI bhagavath gIthA 2.24 as “achchEdhyO ’yam adhAhyO” (This AthmA cannot be cut, burnt) was going to be finished. Only now, it acquired permanence. But is there destruction for AthmA which is eternal while it is explained as “chEdhyAdhi visajAthIyam” (distinguished category which cannot be cut etc)? There is no destruction to bhagavAn‘s qualities which can enter subtly into the AthmA and destroy it [by fully taking over the AthmA]. Destruction for the eternal AthmA is dhAsya asidhdhi (not having servitude). When SEshathvam (being a servitor) is the true identity of AthmA, there is no identity other than this.

In the next article we will enjoy the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

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rAmAnusa nURRanthAdhi – 38

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Introduction (given by maNavALa mAmunigaL)

When SrIvaishNavas make one join like this, one would need acceptance to go for it (adhvEsham) etc., which are possible by the reason of ISvaran (emperumAn), thinks amudhanAr,  as said in ‘sAkshAn nArAyaNO dhEva:’, etc., and he considers emperumAnAr himself as the ISvaran, and so he is saying like how AzhvAr divined about it in the pAsuram of ‘inRu ennaip poruLAkki [thiruvAimozhi – 10.8.9] (emperumAn now considered me as worthy, when all these time eternal I was left out).

Or, Since emperumAnAr took him based on their effort, he is looking at emperumAnAr’s divine face and asking – Even as I have been living in this place all these time, you had not taken me up, and now you have taken me up, so what is the reason for that (delay)?

Introduction (given by piLLailOkam jIyar)

In this way through AzhvAn you corrected me and took me, you made me amicable to be subservient, and you made me go up to the level of its true meaning which is the ultimate state that is of subservience to devotees/AchAryan, but in the time before this your highness had not given me the experience of taste of this, and kept me uselessly in worldly matters – what is the root cause of this? Oh emperumAnAr who is at all times worshiped by the fortunate ones! For even the most learned ones it would be hard to know the ways of your kindness (related to the question above), so you yourself please explain that – asks amudhanAr directly looking at emperumAnAr.

Akki adimai nilappiththanai ennai inRu avamE
pOkkip puRaththittadhu en poruLA munbu – puNNiyar tham
vAkkil piriyA irAmAnusa! nin aruLin vaNNam
nOkkil therivaRidhAl uraiyAy indha nuN poruLE  –                 38

Listen

Word by word meaning (given by maNavALa mAmunigaL)

ennai – Me who has been like ‘IsvarOham’ (considering my self as the lord) from time eternal,
Akki – made me agree for being subservient
adimai – and made it go up to the ultimate state of being subservient to devotees
nilaippiththanai – and so your highness made me be in that state;
inRu – while you have been able to do this now,
munbu – in the times before this
avamE – (you had) uselessly
pOkki – kept
puRaththittadhu – (me) left away in worldly matters –
en poruLA –  for what purpose is that?
puNNiyar tham – Those fortunate ones who know your highness as is,
vAkkil piriyA irAmAnusa – you are being the matter of their talk at all times!
nOkkil– When seeing that
therivaridhu – it is not being possible to know
aruLin vaNNam – the way/nature of kindness
nin – of your highness {such that you had kept me away all this time},;
uraiyAy – your highness itself should tell us about
indha nuN poruL – these subtle ways.

vyAkyAnam

ennai – Starting from time eternal, for some time there was lack of knowledge (agyAnam) that the body is the AthmA;

after that even though knew that there is something separate from the body which is AthmA, but having misunderstanding about its actual nature (so, thinking that AthmA is independent) (anyathA gyAnam) because of being as said in ‘ISvarOham aham bhOgeesidhdhOham bhalavAn sukee’,

then fell on desires for worldly things, as said in ‘kAmaisdhair hrutha gyAnA: prapadhyanthE anya dhEvathA:’  and thus losing knowledge on wrong things (vipareetha gyAnam), and so wandered through these and became a nobody; you getting such adiyEn,

inRu – now,

Akki – released from all such aforementioned, and first, made me involve in subservience to emperumAn as said in ‘nAnum unakkup pazhavadiyEn [thiruppallANdu – 11]’ (I too am being an eternal servitor),

adimai nilaippiththanai – then, like how emperumAn helped when asked ‘adiyArkku ennai Atpadhuththa vimalan [amalanAdhipirAn – 1](He being without blemish, who is able to make me subservient to His devotees), and ‘un adiyArkku AtpadhuththAy [thiruppaLLiyezhuchchi – 10](Please engage me in the service of your devotees who are the servants of your holiness),

as said in ‘gururEva param brahma’ and ‘AchAryassa harissAkshAth chara rUpi nasamsaya:’ , and your highness is the one who is Isvaran for me, have let me to be in the upper limit of subservience that is towards His devotees.

munbu – During earlier times,

avamE pOkki – (you) left me out to be wasteful

puRaththittadhu  –  and kept me interested in inappropriate matters;

en poruLA what is the use/reason for that?

(emperumAnAr asking) What is the reason for you saying like this?

amudhanAr – Like said in ‘magnAn udhdharathE lOkAn’ you had incarnated for uplifting everyone, but you too, like sarvESvaran, had kept me all these days for your leelai.

emperumAnAr – Till now you did not have the qualifications, that is why I kept you like this.

amudhanAr – As said in ‘adhikAram uNdEl arangarum irangArO, adhikAram illAdhArkku anRO ethirAsA nee iranga vENduvadhu [Arththi prabandham – 14]’ (~ If one is having qualification then arangan emperumAn would have shown mercy; for those (like me) who do not have any qualification, you are the one who has to show mercy (and liberate us) (mOksham)).

But then what eligibility did you see for accepting me now, why did you keep me away wastefully?

and so amudhanAr is catching emperumAnAr, in the same way AzhvAr caught emperumAn in ‘inRu ennaip poruL Akki [thiruvAimozhi – 10.8.9] (emperumAn now considered me as some thing, when all these time eternal I was left out);

If you are saying that due to your kindness you made me like this now, then please let us know the nature of that kindness {which had let me go waste all this time} – says amudhanAr.

puNNiyar tham – those having the fortune of grace of emperumAn without any means from our side; the grace that would help get mayarvaRa mathi nalam [thiruvAimozhi – 1.1.1]’ (unblemished knowledge);

vAkkil piriyA – being there in their divine speech without any break;

That is, they are the ones like nammAzhvAr who can be said as ‘pUrvE mUrdhnA yasvAnvayAm upagadhA dhEsikA:’, had done mangaLASasnam to emperumAnAr, like in ‘poliga poliga poliga [thiruvAimozhi – 5.2.1]’;

nammazhvar_bavishyadhAcharnammAzhvAr presenting bhavishyadhAchAryar (emperumAnAr) statue

Or (about AchAryas) – since he (maNavALa mAmunigaL) is being like ‘gurOr nAma sadhA japEth | gurOr vArththAScha kathayEth’,  

he prays to emperumAnAr as:

nithyam yatheendhra thava dhivya vapusmruthaumE saktham manO bhavathu vAk guNa keerththanEsau | kruthyancha dhAsya karaNEthu karadhvayasya vruthyantharE [yathirAja vimSathi]’,

As said in ‘vAchA yatheendhra manasA vapushAchayushmath pAdhAravindhayugaLam bhajathAm gurUNAm | kUrAdhinAtha kurugEsa mukhAdhya pumsAm’ [yathirAja vimSathi], always being worshiped in the minds of the fortunate ones like kUraththAzhvAn, piLLAn and others;

irAmAnusa! – Oh (such) emperumAnAr!

nin aruLin vaNNam – Unlike His kindness which is common for both ties and liberation, your kindness is for only liberation; vaNNam – its ways – nature;

nOkkil – If it (nature of your kindness) is analyzed well; if tried to see for knowing it, it would be hard;  If I tried to figure out why the one that did not work out all this time has worked out now, it would be hard to know that (by myself);

Al -> wondering.

You see, amudhanAr is wondering as – your kindness that is for giving one thing (liberation) (EkAkAram), had become one of giving both (ties and liberation) only in my case?

Or, Al -> The kindness which became fruitful now without any effort from my part, had not worked out earlier, and so like how AzhvAr felt terrible in ‘pOra vaiththAy puRamE [thiruvAimozhi – 5.1.5]’ (You had kept me out into matters other than You), and in ‘aRpa sArangaL avai suvaiththu aganRu ozhindhEn [thiruvAimozhi – 3.2.6]’ (I had kept away from you and enjoying lowly matters), amudhanAr is loathe to think that he had missed this great experience all these days, and had gone behind worldly things all these days;

uraiyAy indha nuN poruLE – Since your highness sees the matters of both the worlds, you must be knowing the meaning/reason of this subtle matter (of keeping me away all these days and showing kindness only now), so please tell us about it, says amudhanAr.

From AzhwAr thirunagari SrI U.Ve. vidhwAn thirumalai nallAn chakravarththi rAmakrishNa iyengAr’s ‘amudha virundhu’:

Akki – Says ‘made me’, instead of ‘thiruththi´ (corrected me), after seeing the vast difference between how he was earlier compared to now after emperumAnAr getting him. So this is looking like a new thing for him.

emperumAnAr – The noble ones made you like this now.
amudhanAr – Why did they not do this till now?
emperumAnAr – You were not agreeable till now.
amudhanAr – How did the agreeableness come now?
emperumAnAr – Because you got the amicability (adhvEsham), etc., now.
amudhanAr – Why should that happen only now?
emperumAnAr – That is due to ISvara katAksham, that is prathama sukrutham (emperumAn’s grace due to some good deed of yours)
amudhanAr – That ISvaran is you only (for me), isn’t it? Why should you have not saved me earlier? Did some eligibility got gained now for you to protect me?  So it is not clear at all for the reason of not protecting earlier and protecting now. This matter is being very subtle/hard to know. Your highness should explain the reason, says amudhanAr.

– – – – –

Translation: raghurAm SrInivAsa dasan

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thirumAlai – 2 – pachchai mA malai – Part 1

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periyaperumal

avathArikai (Introduction)

In the first pAsuram, AzhwAr spoke about the purity that reciting emperumAn’s divine names gave him and how it made him great (to the extent of keeping his feet on the heads of yama and his followers). In this pAsuram (the 2nd) he speaks about how great the divine names are, as a source of enjoyment. vyAkhyAthA (commentator) asks here as to why AzhwAr had mentioned about the purity that the divine names give in the first pAsuram and how sweet they are and fit for enjoyment in the 2nd pAsuram, and not vice versa? i.e. why did he not say first that they are sweet and fit for enjoyment in the first and how they purified him in the second pAsuram? He himself gives the explanation – if a person were sick, the sickness has to be cured first and only then he can enjoy milk. In the same way, when the fear of yama is there in the mind, one cannot enjoy the sweetness of reciting the divine names. First the fear of yama has to be removed. This is the reason that AzhwAr mentioned about the purity that he obtained by reciting emperumAn’s divine names first and then the joy that he found, in the second. Reciting the divine names will bestow whatever benefit that a prayOjanAnthaparar (one who is engaged in worldly pleasures and pursuits) desires; it will remove the hurdles in the path of a upAyANtharanishtar (one who is attempting to reach emperumAn through means other than prapaththi or surrendering) and purify him; it will provide the means for spending remaining days (like a pastime) for a prapannan (one who has surrendered to emperumAn). This is similar to a pearl diver exchanging his pearl for rice or fruits or such lowly materials; or selling it to a merchant for a price and the merchant who knows its value offering it to the king for a higher price and the king wearing it as on ornament. Thus the same pearl can be sold for a very low value, for a high value or be an ornament adorning the king. This is the case with divine names at the hands of a prayOjanAnthaparar, an upAyAntharanishtar and a prapannan.

The vyAkhyAthA gives another explanation for connecting the first and second pAsurams: emperumAn tells AzhwAr that he has recited his divine names. He would like to present a gift (SrIvaikuNtam) to the AzhwAr. emperumAn says that it is not possible for him not to give that gift to one who has recited his names and it is also not possible for the person to whom he has given the gift, to reject it. So, please accept this gift, says emperumAn. AzhwAr says that the joy of reciting his divine names itself is enough for him and he doesn’t want any other gift to enjoy, as a gift for this.

பச்சைமா மலை போல் மேனி பவளவாய் கமலச் செங்கண்
அச்சுதா அமரரேறே ஆயர்தம் கொழுந்தே என்னும்
இச்சுவை தவிர யான் போய் இந்திரலோகம் ஆளும்
அச்சுவை பெறினும் வேண்டேன் அரங்கமா நகருளானே.

pachchaimA malaipOl mEnip pavaLavAik kamalach chengaN
achchuthA amararERE Ayartham kozhundhE ennum
ichchuvai thavira yAnpOy indhiralOgam ALum
achchuvai peRineum vENdEn arangamA nagaruLAnE

Listen

Word-by-word meaning

arangamA nagaruLAnE – Oh emperumAn! who is residing permanently in thiruvarangam for the sake of his servitors
pachchai mA malai pOl mEni – having thirumEni (divine physical form) similar to a huge emerald mountain
pavaLa vAi – having coral like bright, divine,  lips
sem kamala kaN – having divine eyes similar to lotus
achchuthA – one who does not let go of his followers [Oh achyutha!]
amarar ERE – the controller of nithyasUris
Ayar tham kozhundhE – the leader of cow-herds
ennum – like these [as a figure of speech]
ichchuvai thavira – leaving aside this wonderful taste
yAn – I (who takes pleasure in reciting your divine names)
pOy – go far off
indhira lOgam ALum – if I have to rule over SrIvaikuNtam
achchuvai – that enjoyment
peRinum – even if I were to get that
vENdEn – I will not like (that)

vyAkhyAnam (Explanatory Notes)

AzhwAr describes the physical features of emperumAn‘s thirumEni (physical form) and says that he cannot take his eyes off even one angam (part of his thirumEni) and asks emperumAn as to how he expects AzhwAr to leave all these things and go to SrivaikuNtam.

pachchai mA malai pOl mEni emperumAn’s thirumEni is green in colour like a green top mountain and is also special (mA). It is pleasing to the eyes as well as to the heart. Since it is green in colour, it is cool (pleasing) to the eyes and heart. chEthanas (sentient entities) suffer from three types of bodily discomforts, collectively called as thAPathrayam AdhyAthmikam, Adhi dhaivikam and Adhi bhoudhikam – discomfort brought on by the chEthan himself, brought on by God and brought on by other living beings respectively [Example for the first type is fever, stomach ailments etc; for the second, it is cyclone, hot summer etc; for the third trouble from animals, reptiles etc]. emperumAn’s thirumEni would be an antidote to these thApathrayam. Just as ghee solidifies on top of food when the food cools, the auspicious qualities of emperumAn also come out from deep inside and settle on top (of his thirumEni) and exhibit as a green mountain.

When we attempt to reach emperumAn (through bhakthi yOgam, path of meditation), we keep our five senses on his thirumEni so that these senses remain under control and do not wander as they please, allowing us to meditate in bhakthi. His thirumEni is called as subhASrayam (auspicious resting place) for our senses. Once we attain emperumAn and the time comes to reap the fruit of our labour, it is the same thirumEni which is the object of enjoyment [purushArtham or fruit of enjoyment]. This is the reason for qualifying the mountain as special (mA malai).

While mountain was taken as a simile for emperumAn’s thirumEni, it can at best be taken as an equivalent for firmness and growth. There is nothing to enjoy in a mountain unlike emperumAn’s thirumEni or the wondrous nature of his thirumEni with all auspicious qualities.

mEni AzhwAr is not concerned with emperumAn’s svarUpam (basic nature) or auspicious qualities. He sees only the thirumEni of emperumAn, which is full of joy. Just as SrIvishNu purANam says “ichchAgruhIthAbhimathOrudhEha:” emperumAn, who is full of auspicious qualities and who bears the universe through an infinitesimal part of his physical form, exhibits many forms of his physical body as he desires. Similarly, periyAzhwAr says (in periyAzhwAr thirumozhi 4-8-9) that emperumAn lies like heavily laden clouds that cannot take a step further because of their heaviness and rest atop a mountain; he displays himself like a flower in a pond which we can see and admire; at the same time he is like the ocean which we cannot enjoy completely as it is so huge and expansive; and he is like the colour of the peacock’s neck. Peacock is taken as a simile here because we will never tire of seeing a peacock and in the same way we will never tire of having emperumAn’s thirumEni dharSan (vision).

pavaLavAi kamalachchengaN – If emperumAn’s thirumEni is like an ocean, different divine parts of his thirumEni are like the swirling waters in that ocean. Just as we get trapped in the swirling waters, we can be trapped by different divine parts of his thirumEni. AzhwAr first describes his divine lips. The lips are red in colour like coral. Just as a coral-spread would add beauty to an emerald green mountain, his reddish lips add beauty to his green coloured physical form (pachchai mA malai pOl mEni). Another explanation given is that sea, on a full moon day, would be very excited and in its excitement would throw up the waves repeatedly. In the same way, emperumAn, like the sea, looks at his moon-like ASrithars (his followers) who come to have his dharSan and the waves thrown are his lips and his eyes.

kamalachchengaN – For those jIvAthmAs who escaped the trap of the first swirl in the ocean (lips, as seen above) due to their long life, this swirl (the divine eyes) would certainly trap them. What the lips try to speak to, is completed by the eyes. When SrI rAma received vibhIshaNa at the sea-side camp when he came to surrender, he felt sad that he had made him wait for a while till he was able to convince sugrIva and others to allow vibhIshaNa inside. After hearing vibhIshaNa, SrI rAma comforted him with his words and further looked at him softly with his eyes. Thus when words are not sufficient, it is the eyes that come to the rescue to complete the task. The divine eyes of emperumAn bring out the auspicious qualities such as vAthsalyam (motherly love), souSeelyam (simplicity) etc from his heart. While it would have been sufficient to say “kamalakkaN” (lotus-like eyes) why did AzhwAr further qualify it with the word “chengaN”? While lotus would have been a (somewhat inadequate) simile for softness, coolness and sweet smell, how could it bring out the meanings of the auspicious qualities of emperumAn such as his vAthsalyam etc? This is the reason for calling it as sem kaN (chengaN when the two words are joined into one) [“sem” means beautiful].

achchuthA – unchanging. The similes taken earlier (mountain for his thirumEni, coral for his lips and lotus for his eyes) may over a period of time change their form. However when it comes to emperumAn, his divine thirumEni and its components will not change. vyAkhyAthA quotes from SrIvishNu purAnam “…sadhaika rUpa rUpAya” (he is always with the same form which is unchanging at all times). Another explanation given is that AzhwAr is singing mangaLASAsanam (singing praises of emperumAn) by saying that he is always unchanging. A third meaning given is that he does not let go of his followers who get trapped by his divine lips or eyes or thirumEni.

We shall enjoy the remaining portion of this pAsuram in the next part.

adiyEn krishNa ramanuja dasan

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