ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ९

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक)  ८                                                                                        ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १०

पाशूर ९

Lord-Vishnu

 

आसिल् अरुलाल् अनैत्तु उलगुम् कात्तलिक्कुम्
वास मलराल् मणवालन् – तेसु पोलि
विण्णट्टिल् साल विरुम्बुमे वेरोन्ड्रै
एण्णादार् नेन्चत्तु इरुप्पु ।

शब्दार्थ

आसिल् = दोष रहित (सकाम भाव से कोई कार्य करना दोष है) ; अरुळाल् = प्रेम से ; अनैत्तुलगुम् कात्त = सभी लोकोंकी रक्षा करते हैं ; ळिक्कुम् = इच्छा पूर्ण करना; वास मलराळ् मणवाळन् = पद्मजा लक्ष्मीजी के पति (श्रिय:पति) ही भगवान हैं  ; तेसु पोलि विण्णाट्टिल्  = जो श्री वैकुंठधाम में प्रकाशमान हैं ;नेन्ज्चत्तु इरुप्पु = और जीवोंके हृदयमें विराजते हैं ; साल विरुम्बुमे = जो ठीक उसी तरह ; वेऱोन्ऱै एण्णादार् = श्रीमन्नारायण अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं और श्रीमन्नारायण के अतिरिक्त और कोई फल नहीं

भूमिका

भगवान से भगवान की नित्य सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मांगता ऐसा एक शरणागत आश्रित जीव जब भगवान को मिल जाता है तब भगवान को जो आनंद होता है उसका वर्णन पिछले पाशूरमें श्री देवराजमुनी स्वामीजी करते हैं। इस पाशूरमें और भी आगे बढ़कर श्री देवराजमुनी स्वामीजी आश्रितोंके हृदयमें बिराजनेवाले भगवान के आनंद की इसके भी आगेकी स्थिती का वर्णन करते हैं। हृदयमें प्रवेश करनेसे पहले भगवान हमारे हृदयकी परीक्षा करते हैं की यह हृदय केवल भगवान का ही विचार करता है या और किसी सांसारिक वस्तु का भी विचार करता है। अगर भगवान को इस बात का भरोसा हो जाता है की यह जीव भगवान के व्यतिरिक्त और किसी भी वस्तु को नहीं चाहता है तो वें वहाँ आनंदपूर्वक नित्य बिराजते हैं।

विवरण

आसिल् अरुळाल्: जब कोई किसी बदले की ईच्छा से कुछ करता है तो वह मदद कृत्य हो तो भी दोषपूर्ण हो जाता है। अरुळ से भगवान की करुणा का वर्णन होता है। भगवान हमे सबकुछ देते हैं और बदले में कुछ भी नहीं चाहतें। परीमेएलालगर स्वामीजी “अरुळ” का अर्थ समझाते हुए कहते हैं, हमें सभी जीवोंके प्रति निष्कारण करुणा होनी चाहिए। यही स्वरूप है। हम साधारणत: हमारे बालबच्चे, माता-पिता, पत्नी, बंधु, आदि संबन्धित व्यक्तिओंसे प्रेम करते हैं। हम उसी तरह का प्रेम किसी अंजान व्यक्ति की तरफ नहीं प्रदर्शित करतें। परिवार जनोंका प्रेम संबंध से आता है। और अंजान व्यक्ति से कोई ऐसा संबंध नहीं होने के कारण हम उनपर प्रेम नहीं करतें। परंतु, भगवान और उनके सच्चे आश्रित के लिए सभी जीवोंकी तरफ निष्पक्ष प्रेम होना यह सबसे महत्त्वपूर्ण गुण होता है। वें किसी भी व्यक्ति के किसी गुण के कारण प्रेम नहीं करते और ना ही किसी दोष के कारण तिरस्कार भी करते हैं। अगर वे गुण दोष देखते हैं तो प्रेम और करुणा का प्रदर्शन अपने आपमें दोषपूर्ण है। ऐसा दोषपूर्ण प्रेम हम जीवात्मा प्रदर्शित करते हैं, जबकि भगवान हमपर सच्चा प्रेम करते हैं, वें हमसे बदले में कुछ नहीं चाहते हैं।

अनैत्तुलगुम्:  ब्रह्माण्ड में १४ लोक हैं, पृथ्वी समेत ऊपर ७ और पृथ्वी के नीचे ७। ऊपर के ७ लोक हैं, “भूर्लोक”, “भूवर्लोक”, “स्वर्लोक”, “महर्लोक”, “जनलोक”, “तपोलोक”, और “सत्यलोक”। हमारे नीचेके सात लोक हैं, “अतललोक”, “सुतललोक”, “वितललोक”, “तलातललोक”, “महातललोक”, “रसातललोक”, और “पाताललोक”। यह समूह “अण्डम्” कहलाता है। भगवान अपना निष्पक्ष प्रेम इन १४ लोकोंके सभी जीवोंके लिए प्रदर्शित करते हैं। अगर भगवान कुछ कारण के लिए प्रेम रखते हैं तो वह प्रेम दोषपूर्ण हो जाएगा। परंतु भगवान हम सबके लिए एक सरीखे हैं और वे हममे कोई भेदभाव नहीं करतें।

कात्तळिक्कुम्:  भगवान हमारी रक्षा कराते हैं। रक्षा का अर्थ बहोत ध्यान पूर्वक समझके समझना चाहिए क्योंकि रक्षा का अर्थ साधारणत: गलत लगाया जाता है। हम जो मांगते हैं वह सब कुछ देना प्रेम नहीं है। रक्षा का अर्थ है की जो वास्तव में अति आवश्यक हो वह देना। जो आवश्यकता है वह प्रिय भी है और जो प्रिय है वह आवश्यक हो यह जरूरी नहीं है। हम समझते हैं की भगवान रक्षा नहीं करतें क्योंकि वह हमारी इच्छा पूर्ण नहीं करते हैं। इसीलिए हमारे बड़े क़हते हैं की “हमे जो भगवान की तरफ से मिला है उसमे हम हमेशा समाधान रखना चाहिए और भगवान को धन्यवाद करते रहना चाहिए। हमारी रक्षा कैसे करनी है यह उनसे अच्छी तरह और कोई नहीं जानता।

वास मलराळ् मणवाळन्: श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं, “वेरि माराअद पूमेल् इरुप्पाळ्”। भगवान श्री लक्ष्मीजी के पति हैं जो कमाल पर बिराजमान हैं और जिनकी सुंदरता एक क्षणमात्र के लिय भी क्षय नहीं होती। जब भगवान हमारी रक्षा करते हैं तो श्री लक्ष्मी अम्माजी भी उनके साथ बिराजमान होती हैं तभी वो हमारी रक्षा करते हैं नहीं तो नहीं कर सकतें। अत: श्री लक्ष्मी अम्माजी का रक्षा करनेका कार्य भी भगवान जितना ही महत्त्वपूर्ण है। श्री लक्ष्मी अम्माजी पुरुषकार बनकर भगवान की हमारी ओर की करुणा गुण को वृद्धिंगत करती हैं। और तो और वें उनमें सबसे पहली हैं जो हमारी भगवान से हुयी रक्षा देखकर प्रसन्न होते हैं।

तेसु पोलि विण्णाट्टिल्: यह श्री वैकुंठधाम श्री परमपदधाम के लिए कहा गया है। हर एक मोक्ष प्राप्त जीव यहाँ आते हैं। नित्य सूरी यहाँ का नित्य परमानंद लूटते रहते हैं। यहाँ काल/समय का प्रभाव नहीं होता। कोई वृद्ध अथवा व्याधिग्रस्त नहीं होता। हर कोई अपने इच्छा अनुसार कैंकर्य कर सकते हैं। यहाँ कैंकर्यमें कोई बाधा नहीं है। संक्षिप्त में, यह सर्वोच्च सर्वोत्कृष्ट स्थान है।

साल विरुम्बुमे*: भगवान को एक स्थान परमपद से भी ज्यादा प्रिय है। वें यहाँ रहना परमपद में रहने से भी अधिक चाहते हैं। यहाँ “विरुम्बुमे” में एकार के उपयोग से अधिक महत्त्व प्रतिपादित किया गया है।

वेऱोन्ऱै एण्णादार् नेन्ज्चत्तु इरुप्पु: “साल विरुम्बुमे” में वर्णित यह स्थान है भगवान के शरणागतोंका हृदय। ऐसे शरणागत प्रपन्न कहे जाते हैं, जो भगवान के अतिरिक्त और किसी चीज को नहीं चाहतें और नहीं मांगतें। श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं, “उण्णुम् सोऱु, परुगुम् नीर्, तिन्नुम् वेऋइलै एल्लाम् कण्णन्” अर्थात्, श्रे कृष्ण भगवान आल्वारोंका अन्न, जल, तुलसी (सर्व सुख) हैं। ऐसे शरणागतोंके हृदयमें भगवान को अति आनंद प्राप्त होता है। इतना आनंद भगवान को अपने परमपदधाममें रहनेमें भी नहीं आता है। भगवान आश्रितोंसे कुछ नहीं चाहते हैं। उन्हे ऐसे आश्रित मिल जाएँ जो भगवान से भगवान के सिवा और कुछ नहीं चाहते तो वें अति आनंदित हो जाते हैं और ऐसे आश्रितोंके हृदयमें रहने को उत्सुक रहते हैं।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-9-asil-arulal/

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