ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ७                                                                 ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ९

पाशूर ८

vishnu

मुऱ्ऱप् बुवनम् एल्लाम् उण्ड मुगिल् वण्णन्
कऱ्ऱैत् तुळाय् सेर् कळल् अन्ऱि – मऱ्ऱोन्ऱै
इच्चिया अन्बर् तनक्कु एन्ग्न्गने सेय्दिडिनुम्
उच्चियाल् एऱ्कुम् उगन्दु

शब्दार्थ

मुऱ्ऱप् बुवनम् एल्लाम् उण्ड = वो जिसने संपूर्ण जगत को बिना कोई चिन्ह छोडे निगलकर अपने उदर में रख लिया ; मुगिल् वण्णन् = वो जो जल से भरे हुये घने काले मेघ के समान रंग धारण किए हुये हैं ; कऱ्ऱैत् तुळाय् सेर् = और सुंदर तुलसी का समुच्चय ; ल् अन्ऱि – मऱ्ऱोन्ऱै इच्चिया अन्बर्  = भगवान के शरणागत जिन्हे भगवान के चरणारविंद के सिवा और कुछ नहीं अच्छा लगता और भगवान के चरणारविंद के सिवा और कोई भी फल की इच्छा नहीं रखते। ; तनक्कु एन्ग्न्गने सेय्दिडिनुम् = तथापि भगवान के प्रति किए हुये कैंकर्य ; उच्चियाल् ऱ्कुम् उगन्दु = बड़े आनन्द से स्वीकार किए जाएँगे और वो भी उन भगवान के मस्तक से।

भूमिका

जिन लोगोंकों भगवान के चरणारविंद के अतिरिक्त और कोई भी चीज में रुचि नहीं है वे सदा सर्वदा भगवान का ही सेवा कैंकर्य करते रहते हैं। उनके किए हुये कैंकर्य में हुये किसी भी गलती, आपत्ति, क्रमभंग की तरफ भगवान श्रीमन्नारायण कभी ध्यान नहीं देते। वे बड़े आनन्द से किसी आशंका के रहित सेवा स्वीकार करते हैं और शरणागत को अपना कैंकर्य करते देख प्रसन्न होते हैं। वे उनके इस कैंकर्य को स्मरण में रखते हैं। भगवान कृष्ण भगवद्गीता में अर्जुन से कहते हैं, “हे अर्जुन मेरे भक्त मुझे शुद्ध प्रेम भक्ति से जो भी पत्र, पुष्प, फल, तोय अर्पण करते हैं वो मुझे अत्यंत प्रिय है और में उसका तुरंत पान करता हूँ। क्या अर्पण किया है इससे किस प्रकार किस भाव से अर्पण किया है यह महत्त्वपूर्ण है भगवान की प्रसन्नता के लिए। यह इस गाथा का भाव है।

विवरण:

मुऱ्ऱप् बुवनम् एल्लाम् उण्ड मुगिल् वण्णन्:  प्रलय के समयमें भगवान श्रीमन्नारायण ने सभी चराचर सृष्टि को निगलकर अपने उदर में संरक्षण दिया। इस प्रकार यह विनाश नहीं है रक्षण ही है। बहोत बार हम उसे विनाश कहते हैं परन्तु वास्तवमें, वह विनाश नहीं है कारण भगवान चराचर सृष्टि को सुरक्षित जगह रखता हैं जहांसे उनका जन्म हुआ था। वे अपना कर्तव्य समझ कर यह करते हैं और बदले में कुछ नहीं चाहतें और ना ही वे यह और कुछ फायदे के लिए करते हैं। भगवान का स्वभाव घने काले मेघ के जैसा है जो सबके समृद्धि के लिए बरसते हैं। मेघ का कर्तव्य है बरसना और वे बदले में कुछ नहीं चाहते हैं। जितने काले मेघ उतना वे ज्यादा बरसते हैं। भगवान भी काले मेघ के वर्ण के हैं यह साम्य है परंतु हमे यह भी ध्यान रखना चाहिए की जब मेघ का काला रंग समाप्त हो जाएगा तब मेघ बरसना बंद कर देंगे परंतु भगवान ऐसा कभी नहीं कर सकते यह अंतर भी ध्यान रखना चाहिए। आल्वार कहते हैं, “ताइ इरुक्कुम् वण्णमे उम्मै तन् वयिट्रु इरुति उय्य कोन्डान्, अर्थात् भगवान संरक्षण करनेमें एक माँ के जैसे हैं। जैसे एक माँ अपने पुत्रका रक्षण करती हैं वैसेही भगवान समस्त विश्व का रक्षण करते हैं जो की उनकी ही रचना है। विश्व को रक्षण के बारेमें पता भी नहीं होते हुये भी भगवान उसका रक्षण करते हैं कारण उनका इस विश्व के साथ माता पुत्र का संबंध है। उनको और क्या कारण चाहिए रक्षण करनेके लिए? अगर बेटा कुएं के नजदीक जाता है तो उसकी माँ तुरंत उसे खींचलेती है क्योंकि वो बेटा उससे निर्मित है और उसका रक्षण करना उसका सर्वतोपरी कर्तव्य है। ठीक उसी तरह, हम सभी उस भगवान के बेटे हैं और यह संबंध पर्याप्त है तथा प्रलय कालमें रक्षण करने के लिए और किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। जब सब चराचर सृष्टि को वे अपने उदर में ले लेते हैं तो उन्हे सभी का रक्षण होने के कारण अत्यंत आनंद होता है। ऐसा करनेमें उनको और कोई फायदा नहीं है। ठीक उसी तरह, जब शरणागत कैंकर्य करता है तो भगवान उसका कैंकर्य देखकार आनंदित होते हैं और कैंकर्य करते हुये होनेवाले सभी अपराधोंकों क्षमा कर देते हैं।

कऱ्ऱैत् तुळाय् सेर् ल् अन्ऱि: भगवान के चरणरविंदोंकी मधुरता का वर्णन यहाँ हो रहा है। “तुळाय्” अर्थात् तुलसी. जमिन मैं उगनेवाली तुलसी और भगवान को सुशोभित करनेवाली तुलसी में अंतर है। भगवान को सुशोभित करनेवाली तुलसी उसके भगवान के विग्रह साथ संस्पर्श के कारण जमिन पर उगनेवाली तुलसी से कई ज्यादा सुगंधित होती है। चुंकी उसे अपना अंतिम गंतव्य स्थान मिल गया उसके लिए अब और कुछ करनेको बाकी नहीं रहा। वो भगवान की सेवा में स्थानापन्न हो गईं और इसी कारण उसके आनंद की सर्वोच्चता उसके सुगंधी में प्रतीत होती है। अत: प्रपन्न जो तुलसी से सुशोभित भगवान के चरणारविन्दोंमें शरणागति करते हैं वे प्रथम उनकी सुंदरता में आकर्षित होंगे भगवान के कल्याण गुण (सौलभ्य और सौशील्य) तो अभी आगे हैं। प्रथम तो सुंदरता तो स्पष्ट रूप से दिखती है और भगवान हमारे हृदय चुरानेका कोई अवसर गवांते नहीं हैं। वे अपने आप को सुंदर और सुंगंधित तुलसी से सजाते हैं। वे अपना सांवला रंग प्रदर्शित करते हैं जो उनकी उदारता दिखाता है। वे अपने साथ अम्माजी को भी धारण करते हैं। श्री मधुरकवी स्वामीजी श्री कणिणुन् सिरुताम्बु में इसका “करिय कोल तिरु उरु काण्बन् नान्” ऐसा वर्णन करते हैं। “कट्रै तुज़्हाइ सेर् कल् अन्ड्ऱि” से मुख्य रूप से भगवान के चरणारविन्दोंका आनन्द प्रतीत होता है।

 

मऱ्ऱोन्ऱै इच्चिया अन्बर्: यहाँ प्रपन्न जो भगवान श्रीमन्नारायण के अतिरिक्त और किसी वस्तु की चाहना नहीं करते उनका वर्णन है। आजके अधिकांश लोग भगवान से लौकिक तथा सांसारिक वस्तुएं, सुख की याचना करते हैं। इसके लिए वे भगवान को प्रसन्न करनेके लिए अपने मन से कुछ करेंगे (जिससे वे सोचते हैं की भगवान प्रसन्न होंगे)। वे तो एक व्यवसाय भी शुरू कर देंगे जहां वे भगवान से सौदा करेंगे और भगवान जो भी देंगे उसका हिस्सा भगवान को देंगे। यह विचित्र तो लगता है परंतु यही आज की परिस्थिति है। तथापि यह पूर्णत: अनुचित है। हमे यह स्मरण करना आवश्यक हो जाता है की श्री गोदाम्बाजी ने भगवान से कहा था, “मेरे प्यारे भगवान, मैंने आपके लिए क्षीरान्न बनाया है। अगर आप आकार इसे पाते हैं तो आपको एक भेंट दूँगी। भेंट और कुछ नहीं मगर और १०० घड़े क्षीरान्न है। मैं यह भेंट दे रही हूँ क्यूंकी आप आए और आप क्षीरान्न पानेकी मेरी इच्छा को आपने पूर्ण कीया है।” आल्वार और आचार्य भगवान का मंगल मनाते हैं; इसलिए नहीं की उन्होने राक्षसोंका और क्रूर राजाओंका अंत किया परंतु इसलिए गाते हैं की वे भगवान को युद्ध में कुछ हो न जाए ऐसा उनको डर लगता है और इसलिए की वे विजयी होगए और अपने आप का रक्षण किया।

तनक्कु एन्ग्न्गने सेय्दिडिनुम्: ऐसे कोटि के प्रपन्न शरणागतोंपर भगवान कृपा बरसाते हैं। उनके कैंकर्य की त्रुटीयोंकि तरफ भी भगवान अनदेखा कर देते हैं। वे केवल हृदय के भाव छोडकर और किसी चीज को नहीं देखते।

उच्चियाल् ऱ्कुम् उगन्दु:  ऐसे प्रपन्न शरणागतोंका कैंकर्य भगवान बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार करते हैं। श्री गोदाम्बाजी भगवान के लिए बनाई माला को खुद पहले धारण करती थीं। वे अपने आप को सुशोभित करनेके लिए नहीं बल्कि भगवान कृष्ण को यह माला अच्छी लगेगी की नहीं यह देखने के लिए माला प्रथम स्वयं धारण करती थीं। वें एकबार मा धारण करके दर्पण में देख रही थी की अचानक उनके पिता श्री विष्णुचित्त स्वामीजी आए और वें पकड़ी गईं। श्री विष्णुचित्त स्वामीजी गोदा की यह हरकत देखकर हताश हुये और तो और उस माला में गोदा का केश भी अटक गया था। उन्होने उस माला को दूर रखकर नई माला बनाई। वे नई माला श्री वटपत्रशायी भगवान को धारण करानेके लिए गए। नई माला देखकर भगवान नाराज होगए। उन्होने श्री विष्णुचित्त स्वामीजी को गोदा की प्रसादी माला लाने के लिए आज्ञा प्रदान की क्योंकि उस माला में गोदा के केश थे और भगवान को उसका आनंद लेना था। श्री विष्णुचित्त स्वामीजी को आश्चर्य हुआ परंतु वे अपनी बेटी गोदा के लिए बड़े प्रसन्न हुये। उन्होने जाकर सारा वृत्तांत श्री गोदाम्बाजी को सुनाया। वो सुनकर श्री गोदाम्बाजी हर्षित हो गई। इस प्रकार हम देख सकते हैं की भगवान भी भागवत संबंध की इच्छा रखते हैं। उनको केवल प्रपन्नोंकी ही आवश्यकता है। वे प्रपन्नोंका आनंद लेते हैं और उनके दोषोंकी तरफ ध्यान नहीं देतें।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-8-murrap-buvanam/

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