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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३३

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३२                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३४

पाशुर-३३

एट्ट इरुन्द गुरुवै इवै अन्रेन्रु
विट्टोर परनै विरुप्पुरुदल – पोट्टनेत्तन
कण सेम्पलित्तिरुन्दु कैत्तुरुत्ति नीर तूवि
अम्पुदत्तैप पार्त्तिरुप्पानट्रु

प्रस्तावना: इस पाशुर में यह समझाया गया है की कैसे एक व्यक्ति बुद्धिहीन है जो अपने आचार्य में मनुष्य भाव रखता है। इसके अलावा वह एक कदम आगे बढ़कर और भगवान श्रीमन्नारायण जो बहुत दूर हैं उनके पास पहुँचने की इच्छा करता है और यह सोचता है कि भगवान उसकी जरूरत के समय आकर उसकी मदद करेंगे। यह व्यक्ति मुर्खता कर रहा है और इसे एक समानता से दर्शाया गया है।

अर्थ:

एट्ट इरुन्द: (अगर कोई व्यक्ति अनादर करता है) जो बहुत करीब है | गुरुवै : यानि आचार्य | इवै अन्रेन्रु: और यह सोचता है कि वह उसका गुरू नहीं है | विट्टो: और उन्हें अस्वीकार करता है | र परनै: और उसके पास बाहर जाता हैं जो बहुत दूर है और आसानी से प्राप्त नहीं होता है (श्रीमन्नारायण) | विरुप्पुरुदल: और उसके पास पहुँचने कि इच्छा करता हो। यह कार्य उस व्यक्ति के कार्य के समान हैं जो | पोट्टनेत्तन: तुरन्त | सेम्पलित्तिरुन्दु: बन्द करता हैं (कि जल्द क्या होने वाला हैं यह जाने बिना) | तन कण: अपनी आँखे | तूवि: और जमीन पर रो पड़ता हैं | कैत्तुरुत्ति नीर: वह जल जो कि एक हाथ के घड़े में जमा कर लेते हैं और | अम्पुदत्तैप: बादल में जो जल हैं उसे ढुँढते हैं | पार्त्तिरुप्पानट्रु: और उसके पास पहुँचने का तरीका तलाश करते हैं (यह उसी के तरह मूर्खता हैं जैसे)
 

स्पष्टीकरण:

एट्ट इरुन्द गुरुवै: “एत्तुधल” शब्द का अर्थ पकड़ना है और इसलिये भाव “नजदिक” या “निकटवर्ती” से बतलाया गया हैं । इस प्रसङ्ग मे एक आचार्य जो एक व्यक्ति के इतना नजदिक हैं उसे समझाया गया हैं। भौगोलिक निकटता के अलावा आचार्य से निकटता कुछ इस तरह भी वर्णन करेंगे कि, वह जिसे हम अपने खुले नेत्र से भी देख सकेंगे (असमान भगवान), वह जो जब हमें रक्षा कि जरूरत हैं हमारी रक्षा करेंगे, वह जो बहुत प्रिय हैं, वह जो हमेशा हम जीव के कल्याण हेतु मदद करते रहते हैं और अन्त में वह जिससे हम बात कर सकते हैं और मिल सकते हैं। वह सब जीवों के बहुत नजदिक हैं।

इवै अन्रेन्रु विट्टो: यह अपने आचार्य को दूसरा इन्सान समझना यह त्याग करना या अस्वीकार करना। श्री देवराज मुनिजी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में वर्णन करते है जो अपने आचार्य को अस्वीकार करते है और उन्हे अपने गुरु के रूप मे स्वीकार नहीं करते। उस पर दृढ़ रहने के अलावा “शरणागति तन्द तन इरै वन ताले (३१वें पाशुर में), इसका मतलब आचार्य के चरण कमलों को एकबार सबकुछ मानना, या उस व्यक्ति द्वारा उनके आचार्य का पूर्णत: अनादर करना और उनको जो उन्हे रोज मिलते है ऐसे अनेक अनगिनत व्यक्तियों मे से एक ही समझना। इसी वजह से वह उन्हें अपने आचार्य की तरह नहीं समझता।

र परनै विरुप्पुरुदल: वह व्यक्ति जो अपने आचार्य का अनादर करता हैं वह भगवान श्रीमन्नारायण को पाने को देखता हैं जो किसी के भी पहुँच के कही बाहर हैं। वह भगवान जिन्हे कोई भी याने शास्त्र भी पूर्णत: नहीं समझा है थोड़ी तो दूरी है, और किसी के भी पहोच से दूर है। वह व्यक्ति ऐसे भगवान से मिलने की इच्छा करता है, इसी सोच के साथ की वही रक्षक है और उससे बहोत नर्म है। श्री देवराज मुनिजी इसी कार्य की तुलना एक सुंदर उपमा से करते हैं।

पोट्टनेत्तन: इसका अर्थ हैं “तुरन्त” यानि बिना परिणाम के बारें में सोचे वह कार्य करना

तन कण सेम्पलित्तिरुन्दु: इसका मतलब हैं आँखे बन्ध करना जैसे कि एक व्यक्ति आराम कर रहा है बिना यह जाने उसका परिणाम क्या होगा।

कैत्तुरुत्ति नीर तूवि: जब कोई प्यासा हो तो वह व्यक्ति अपने पास जो कटोरा उससे पानी पी लेगा। वह उसे पहिले हीं भर कर रख लेगा। परन्तु अगर वह व्यक्ति प्यासा हैं तो वह पानी जमीन पर फेंख देगा।

अम्पुदत्तैप पार्त्तिरुप्पानट्रु: कटोरे से पानी बाहर फेकने के बाद वह व्यक्ति ऊपर आसमान में बादलों कि तरफ देखेगा और यह ईच्छा करेगा कि बादलों में जो जल है उसे बारिश के रूप में मिल जायें। वह यह सोचता हैं कि बादलों में जो बारीश का पानी हैं वह सबसे आसानी से उसे प्राप्त हो जायेगा और जो प्यास का अनुभव अभी वह कर रहा है उसे मिटा देगा। यह उसी के समान हैं जब एक व्यक्ति यह सोचता है कि भगवान श्रीमन्नारायण उसे आसानी से प्राप्त हो जाते हैं और जो इतने आसानी से हमारे लिये तत्पर हैं ऐसे अपने आचार्य कि तरफ वह ध्यान नहीं देता है। यह सादृश्य के कार्य को “तोझिल उवमं” (सादृश्य से कार्य करना) कहते हैं। इस पाशुर के तथ्य को श्रीवचन भूषण के चूर्निकै में समझाया गया हैं “विदाइ पिरंधपोधु करस्थमाना उधगतै उपेक्षितु ज्ल्मूत जलतयुं, सागरा सलिलतयुं, सरित सलिलतयुं वापि कूपा पयसुकलयुं वंजीक्का कदवन अल्लन (श्रीवचन भूषण #४४९)

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३२

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३१                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३३

पाशुर-३२

मानिडवन एन्रुम गुरुवै मलर मगल कोन
तान उगन्द कोलम उलोगम एन्रुम – ईनमदा
एण्णुगिन्रु नीसर इरुवरुमे एक्कालुम
नण्णिडुवर कीलाम नरगु

३०वें पाशुर में (माडुम मनैयुम), श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी उस विधी विधान शास्त्र के बारें में बात करते हैं जो यह कहता है कि हमें उन लोगों के साथ सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये जो अपने उस आचार्य को सन्मान नहीं देते हैं जिन्होंने हमें आठ अक्षरों वाला तिरुमन्त्रं समझाया है। ३१वें पाशुर में (वेदमोरू नान्किन) यह बताया गया है कि हमारे आचार्य जिन्होंने हमें द्वय महामन्त्रं कहा है जिसमे शरणागति शास्त्र भी है उनके चरण कमल हीं किसी व्यक्ति के लिये उपाय हैं। इन दो पाशुरों में इस तरह आचार्य कि बढाई की गयी है। ऐसे आचार्य को भगवान के अन्य अवतार जैसे रामावतार, कृष्णावतार आदि के जैसे समझना चाहिये। हमें आचार्य अवतार को भगवान श्रीमन्नारायण के विशेष अवतार समझकर आनंदित होना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य को भगवान श्रीमन्नारायण का अवतार न समझता हो और उनको वह दूसरे इन्सानों के जैसे ही समझता है तो ऐसे विचारों के परिणाम को इस पाशुर में समझाया गया है। इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति भगवान के दिव्य मंगल विग्रह (भगवान का अर्चा रूप जिसमें भगवान मंदिरों में विराजमान हैं) किस धातु या उस तरीके से बने हैं इसके खोज या तलाश में लगा हो तो उसके परिणाम को भी इस पाशुर में समझाया गया है।

 गुरुवै – अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य के बारें जिन्होंने हमें मन्त्रं सिखाया और समझाया हैं यह सोचता है कि | मानिडवन एन्रुम – वह हमारे जैसे दूसरे इन्सान हैं | मलर मगल कोन – अगर कोई व्यक्ति भगवान श्रीमन्नारायण के बारें में यह सोचते हैं कि | तान उगन्द कोलम – मूर्ति समझते हैं जिसमें वह स्पष्ट रूप से प्रसन्न हैं | उलोगम एन्रुम – एक मूर्ति जो एक धातु जैसे “पञ्चलोकं” आदि से बना हैं | ईनमदा – और उनके (आचार्य और भगवान के श्रीविग्रह) साथ व्यवहार करना / निकाल देना जैसे अल्पमूल्य / अयोग्य | एण्णुगिन्रु – ऐसे लोग जो ऐसा विचार करते हैं | नीसर – वे नीचे से भी नीचे लोग हटे हैं | एक्कालुम – यह दो प्रकार के लोग (एक जो अपने आचार्य का निरादार करते हैं और एक जो भगवान का निरादार करते हैं) | एक्कालुम – वह सदैव के लिये | नण्णिडुवर – पहुँचेंगे | कीलाम नरगु – नरक में और हमेशा के लिये वहीं रहेंगे।

स्पष्टीकरण:

मानिडवन एन्रुम गुरुवै: हर एक को यह विश्वास करना चाहिये कि भगवान श्रीमन्नारायण ने इस सन्सार में जो निरन्तर जन्म मरण के चक्कर में फँसे हैं ऐसे लोगों का दु:ख दूर करने के लिये “आचार्य” के रूप में अवतार ग्रहण किया है। बहुत से ग्रन्थों में विस्तृत रूप से भगवान नारायण के बारें में कहा गया हैं जिन्होंने मनुष्य रूप में जन्म लिया (जो आचार्य हीं हैं)। अत: आचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण हीं हैं। हमारे शास्त्र यह कहते हैं अगर कोई अपने आचार्य को दूसरे मनुष्य के जैसे हीं व्यवहार करता हैं तो जो कुछ भी ज्ञान उसने अपने आचार्य से प्राप्त किया है वह सम्पूर्ण निष्फल है। मलर मगल कोन तान उगन्द कोलम उलोगम एन्रुम: पेरिया पिरट्टी के स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण खुशी से अर्चा रूप में मन्दिर में वास करते हैं। वह हमेशा हम सब में रहते हैं। परन्तु अगर कोई व्यक्ति इस बात कि खोज करना शुरु करता है वह मूर्ति किस संयोजन और धातु जैसे पञ्चलोकं, लकड़ी आदि से बनी है वहीं अपने आप में एक अपचार है। श्री शठकोप स्वामीजी अपने सहस्त्रगीति ८-१-४ “उमर उगन्धा उरुवं निनुरुवं” में भगवान श्रीमन्नारायण के इस अर्चा रूप के बारें में समझाया हैं। इसका यह अर्थ हैं कि अगर भक्त कौनसे भी रूप में भगवान श्रीमन्नारायण की आराधना करता है तो भगवान उसे उसी रूप में खुशी से उसकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं और विराजमान होते हैं। उस अर्चा रूप में भगवान अपने आप को स्पष्टता से अपने दूसरे श्रेष्ठ रूप के जैसे परमपदधाम, तिरुपार्कदल आदि में दर्शन देते हैं। यह रूप और कुछ नहीं वह रूप है जो उनके भक्त जन उनसे अपेक्षा करते हैं और इसलिये यह उनका रूप श्रेष्ठ हो जाता है। ऐसे अर्चा रूप में जिनसे उनके भक्त जन उनसे अपेक्षा करते हैं वह खुशी से आकर उनके पास अपने श्रेष्ठ गुणों के साथ रहते हैं। इसलिये वह अर्चा रूप तुरन्त हीं श्रेष्ठ हो जाते हैं। इसके अलावा जो भी शृंगार आभूषण भगवान ने उनके इस अर्चा रूप में धारण किये हो वह भी भगवान के समान दिव्य हो जाते हैं न कि इसके प्रतिकुल जो सांसारिक विचार और सम्बन्ध होने से। शास्त्र के अनुसार इसको “अप्राकृतं” कहते है। वहीं शास्त्र उनका पूरे कठोरता से विरोध करते हैं जो भगवान के अर्चा रूप का बाह्य दर्शन करते हैं और उस मूर्ति के बारें में खोज शुरू कर देते हैं कि वह किस धातु से बनी हैं और उसका संयोजन क्या हैं। वह उसको केवल एक धातु / लकड़ी समझते हैं और यह विश्वास नहीं करते कि वह सच में वहाँ विराजमान हैं। यह एक बहुत निर्दयी अपचार हैं। इसके लिए एक उदाहरण देते हुए शास्त्र कहते हैं कि यह पाप उसी तरह हैं कि जिस तरह उस कि खोज करना कि एक शिशु अपने माँ के गर्भ से पहिली बार कहाँ से बाहर आया था।

ईनमदा एण्णुगिन्रु नीसर: – यह आदर करना कि वह नीच / तुच्छ है। यह दोनों प्रकार के लोगों को शामिल करता है वह जो अपने आचार्य को मनुष्य समझता है और वह जो भगवान के विग्रह को धातु जो पञ्चलोकं आदि से बना है ऐसा समझता है। “नीसर” शब्द यह समझाता है कि वह लोग जिनके नीचे और कोई व्यक्ति कहीं भी नहीं हैं। यहाँ दोनों को तीक्ष्ण अपराधी कहा गया है और इसलिये योग्यता अनुसार उन्हें “कर्म चांडालर्गल” कहते हैं क्योंकि उन्होंने अपने आचार्य को मनुष्य और भगवान के अर्चा विग्रह को एक धातु के जैसे देखा हैं। इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों को उनके अत्यन्त नीच विचार के कारण (नीसर) सबसे नीच ऐसा देखा है। तमील पद “उल्लुवधेल्लां उयर वल्लाल” को फिर से यहाँ एकत्रित करना उचित होगा। अगर कोई बढाई के बारें में सोचता हैं और अगर उसके विपरित सोचता हैं तो वह अपचार हैं।

इरुवरुमे: उपर बताये गये दोनों प्रकार के लोगों को एक साथ जोड़कर उनके दोष के कारण उन्हें एक वर्ग “अपराधी” में रखा गया हैं। जबकि एक अपने आचार्य को मनुष्य मानकर अपमान करता है और दूसरा केवल यह प्रश्न करता है और खोज करता है कि भगवान का अर्चा विग्रह किस धातु से बना है और यह ध्यान नहीं देता है कि उस अर्चा रूप में कौन विराजमान हैं। यह दोनों अपराधी को एक ही परिणाम भोगना पड़ेगा जिसकी आगे चर्चा करेंगे।

एक्कालुम नण्णिडुवर कीलाम नरगु: यह दोनों अपराधी नरक हीं जायेंगे और हमेशा के लिये वहाँ हीं रहेंगे। यहाँ हमेशा के लिये का अर्थ है जब भी समय का विचार होगा। जिस प्रकार का नरक यहाँ बताया गया हैं वह बहुत निर्दयी है। वह इतना निर्दयी हैं कि इससे निर्दयी नरक और कौनसा भी हो हीं नहीं सकता। नरक वह जगह है जहां केवल दु:ख ही है यानि यहाँ कण मात्र भी खुशी नहीं हैं जो एक व्यक्ति अनुभव कर सकता हैं न हीं एक पल भी दु:ख से बाहर आ सकता है। नरक वह जगह हैं जहां एक व्यक्ति बिना रुके दु:खों को भोगता हैं। ये अपराधी इस नरक में कोई नियमित समय के लिये नहीं बल्कि आजीवन वहीं रहते हैं। वे उस नरक में हीं पैदा होते हैं, वहीं रहते हैं और वहीं मर जाते हैं। यह जीवन का चक्र ऐसे ही चलता जाता है। इस चक्र का कोई अन्त नहीं है। यह वह लोग हैं जो संसार सागर के चक्र से कभी बाहर नहीं आते हैं और सागर के दूसरे किनारे में नहीं पहुँचते। यह ऐसे मुर्ख हैं जो सन्सार सागर के दु:खों में ही रहते हैं। अत: इन दोनों अपराधियों को बचने के लिये और कोई रास्ता हीं नहीं है। यह दोनों अपराधियों को जोड़ने का विचार यानि अपने आचार्य को मनुष्य समझना और भगवान के अर्चा रूप को धातु कहना तमील व्याकरण “उड़ान नवीर्चि पोरुल” मे बताया गया हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३१

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३०                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३२

पाशुर-३१

Ramanujar-Melkote

वेदमोरू नान्किन उट्पोदिन्द मेय्प्पोरूलुम
कोदिल मनु मुदल नूल कूरूवदुम तीदिल
सरणागति तन्द तन इरै वन ताले
अरणागुम एन्नुम अदु

प्रस्तावना:

यह पाशुर यह समझाता हैं कि हमारे आचार्य हीं हमारे लिये सबकुछ हैं। सभी तत्त्वों का अर्थ जो सभी वेदों और अन्य ग्रंथों में बताया गया हैं वह और कुछ नहीं पूर्ण समर्पण कि राह हैं (शरणागति)। शरणागति का यह अर्थ किसी व्यक्ति को उसके आचार्य हीं समझाते हैं। अत: अपने आचार्य के चरण कमलों को हीं हमें सबकुछ समझना चाहिये। इसे इस पाशुर में समझाया गया हैं।

अर्थ:

तीदिल: – निर्दोष को | सरणागति – भगवान श्रीमन्नारायण के पूर्ण शरण होना | तन्द – वह जिसने यह दिखाया हैं वह और कोई नहीं | तन इरै वन – उसके आचार्य हीं हैं, जिन्होंने उसे शरणागति कि राह बतायी। वह उसके भगवान हैं। ऐसे आचार्य के | ताले: चरण कमल |अरणागुम: किसी व्यक्ति के शरण या उपाय हैं। एन्नुम अदु: शरणागति शास्त्र जो यह कहता हैं और | ओरुणाङ्गुवेधं: अनोखे और अद्भुत वेद जिसमे ऋग, यजुर, साम और अथर्व शामील हैं | ट्पोदिन्द: वह वस्तु जो वेदों से भरा हैं | मेय्प्पोरूलुम: सच्चा और भितरी मतलब | कोदिल: निर्दोष का | मनु मुदल नूल: शास्त्र जैसे “मनुशास्त्र” आदि। कूरू वदुम: वह विचार जो “मनुशास्त्र” जैसे शास्त्रों में कहा गया हैं | अधुवे: वह और कुछ नहीं बल्कि अपने आचार्य के चरण कमलों के शरण होना।

स्पष्टीकरण:

वेदमोरू नान्किन उट्पोदिन्द मेय्प्पोरूलुम: “ओरु” पद यहाँ वेदों के अद्भुत गुणों को समझाता हैं, यानि उन्हें इंसान ने नहीं बनाया। उन्हें किसी ने लिखा नहीं हैं और बिना शंका, संदेह और उलझन के हैं। उनमें बेचने के हीसाब से भी कोई फेरबदल नहीं किया गया हैं।

उपर के पद में “नांगु” यानि चार हैं इसलिये वह चार वेदों को यानि ऋग, यजुर, साम और अथर्व वेदों को संभोधीत” करता हैं। किसी भी वस्तु को सुरक्षित और दृढ़, कसा हुआ रखने के लिये उसे आठ छोटे धागे वाले रस्सी से बाँधते हैं। उसी तरह तिरुमन्त्रं जिसमें आठ अक्षर हैं वह भगवान श्रीमन्नारायण को अपने में सुरक्षित और दृढ़ बाँध कर रखता हैं। यह “अष्टाक्षर मन्त्रं” सभी वेदों में अंतर्निहित हो गया हैं और अदृश्य हैं (यह देखने को बहुत अच्छा हैं कि तिरुचंधविरुत्तं कहते हैं “एट्टीनोदुमिरण्देनुंकैरिनालनंथनैकट्टि”)। वेद (जो सब को नापता हैं) के शब्द सभी ग्रन्थों से उच्च हैं और उसका कार्य है की जो अंतिम भगवान श्रीमन्नारायण के बारें में ही बात करता हैं उसे “गुप्त” रखते हैं। क्योंकि वेदों को “चार” भागों में बांटा गया हैं वह यह प्रमाण करता हैं कि यह कुछ और नहीं जो कि वेद के एक कोने में एक साथ रखा गया हैं। वह यह बताता हैं कि वेद जिसे अनगिनत भागों में बांटा गया हैं उसका अभिप्राय और कुछ नहीं बल्कि अष्टाक्षर मन्त्रं हैं। और इस मंत्र का अर्थ सभी को बटोरने के लिये ऊपर नहीं रख्खा गया हैं। उसको धन कि तरह संभालकर रखा गया हैं क्योंकि वहीं अंतिम भगवान श्रीमन्नारायण हैं। “मेय्प्पोरूलुम” पद का अर्थ “सच्चा भितरी”। वह एक कदम आगे बढ़कर कहता हैं कि वेद उस अंतिम वस्तु कि केवल बढ़ाई नहीं करते परन्तु भगवान श्रीमन्नारायण के सच्चे गुण को कहते हैं।

कोदिल मनु मुदल नूल कूरूवदुम: “कोदु” दोष हैं और इसलिये “कोदिल” का अर्थ हैं वह जो दोषरहित हैं। यहा जो दोष दर्शाया गया हैं वह वों दोष हैं जब एक विशेष वस्तु को उसके मूल से दूसरे तरीखें से बताया गया हो और उसके मूल से तरंगे और मनोगतियों को पहचान कर उसे उभारा गया हो। उदाहरण के तौर पर अगर किसिको सागर में शंख दिखा है तो उसे यह कहना पड़ेगा कि उसने शंख देखा हैं। परन्तु अगर वह केवल आकर्षण के लिये यह कहता हैं कि उसने चांदी देखी हैं तो वह बयान एक झूठा बयान होगा। मनु शास्त्र एक ऐसा शास्त्र हैं जो दोष रहित हैं। “कोदिल” विशेषण “मनुशास्त्र” के लिये हीं इस्तेमाल किया गया हैं जिसका यह समझना हैं कि जो मनु जो भी कहता हैं वह औषधि हैं। ऐसा मनुशास्त्र कि बढाई का परिणाम हैं। इसलिए किसी को भी मनुशास्त्र में कोई भी अनुसंधान करने कि जरूरत नहीं हैं चाहे हम उसका शब्दशः ले और या फिर अपने जीवन में उतारे। यह विशेषण “कोदिल” जब दुसरें ग्रन्थों को योग्य करने के लिये इस्तेमाल किया जाता हैं तब उन ग्रन्थों में जो सम्बन्ध हैं उनकि बढाई का पता चलता हैं और अन्त में उसकी प्रतिष्ठा को सहारा देता हैं। वह यह कहने के लिये कि यह ग्रन्थ हमें कोई भ्रम या उपाय आचरण के बारें में नहीं कहता हैं। ऐसे ग्रन्थ में इतिहास जैसे सात्विकस्मृति, श्रीविष्णुपुराण, श्रीमदभागवत, महाभारत और आगमास जैसे पञ्चतन्त्रं आदि शामील हैं। उपर बताये हुए ग्रन्थों में हमें यह मतलब समझाता हैं जो “अष्टाक्षर मन्त्रं” के खजाने में हैं जो वेदों का हृदय हीं बनाता हैं। वह धन जिसे खजाने के जैसे रखा हैं वह और कुछ नहीं शरणागति कि राह हैं और मनु जैसे ग्रन्थों का यह कर्तव्य हैं कि इस अर्थ को स्पष्ट रूप से और निर्मलता से कहें। इसका तात्पर्य यह हैं कि शरणागति कि राह वेदों कि कठिन बातों से और मनुशास्त्र जैसे ग्रन्थों से आती हैं।

तीदिल सरणागति तन्द:- “तीदु” का अर्थ दोष हैं और इसलिये “तीदिल” का अर्थ हैं दोषरहित। शरणागति कि राह तो दोषरहित हैं। जिन ग्रन्थों में हमें शरणागति क्या हैं यह बताया हैं उन्हीं ग्रन्थों के अन्य अध्याय में शरणागति के अलावा अन्य राह के न्यूनता बताता हैं जैसे कर्म योगं, ज्ञान योगं, भक्ति योगं आदि। यह अन्य राह हर कोई नहीं कर सकता हैं। कुछ हीं लोग इसे करने के लिये योग्य हैं। जो योग्य हैं वह भी सभी इन अन्य राह को कर नहीं पाते जो यहाँ बताया गया हैं। अगर कोई इन इतर राह में बाताये के अनुसार नहीं रहता हैं तो उसे वह कहीं नहीं ले चलता हैं। क्योंकि हमारे पास सबसे सुलभ मार्ग हैं “शरणागति” इसलिये हमें कोई अन्य राह पर चलाने कि कोई जरूरत नहीं हैं। इस शरणागति के राह में कोई दोष नहीं देख सकता हैं जहां भगवान श्रीमन्नारायण से सीधा सम्पर्क हैं। यह उसकी सबसे उच्च योग्यता हैं जैसे कि भगवद्विशयमं के अनुसार “प्रपत्ति” शब्द खुद बताता हैं कि वह “ईश्वर” (श्रीमन्नारायण) हैं। यह सुलभ मार्ग हमें हमारे आचार्य ने दिया हैं जैसे कि एक गरीब को हमेशा के लिये जीवन का आनंद लेने के लिये बहुत सा धन दिया गया हो। ऐसी शरणागति का राह हमको हमारे आचार्य ने दि हैं।

तन इरै वन: ३०वें पाशुर में, जिन्होंने हमें अष्टाक्षर महामन्त्रं समझाया (एत्तेझुतुंथंधवने) हैं उन्हें हीं हमारे आचार्य बताया गया हैं। इस पाशुर में उन्हें हमें जिसने शरणागति (शरणागतिथंधवं) दिया हैं ऐसा बताया हैं। इससे हम यह समझ सकते हैं अष्टाक्षर महामन्त्रं के अर्थ और शरणागति के अर्थ में भेद हैं। इस पाशुर में इसे गुप्तानिय रूप से “शरणागति” ऐसा समझाया गया हैं और पिछले पाशुर में इसे स्पष्ट रूप से “आठ अक्षरों” वाला मन्त्र बताया गया हैं। तीन मुख्य मन्त्रं हैं वह तिरुमन्त्र, द्वयमन्त्र और चरमश्लोक। तिरुमन्त्र और चरमश्लोक में हमारे पूर्वजो कि यह प्रथा रही हैं कि मन्त्र के अर्थ को गुप्तनिय रखना और मन्त्र को स्पष्ट रूप से कहे। और द्वयमन्त्र के सम्बन्ध में जो शरणागति कि बात करता हैं वें नाहीं उसके अर्थ को छिपाते थे बल्कि उस मन्त्र को भी सब के सामने न बोलकर वह केवल उसे अपने हृदय में हीं बोलते थे। इससे हम यह जान सकते हैं कि उस मन्त्र जिसे द्वयमन्त्र कहते हैं उसमें कोई विशेष बहुमूल्य बात हैं। इसके बारें में कहते हुए श्रीवेदान्तदेशिक स्वामीजी द्वयमन्त्र के बारें में यह कहते हैं कि हर कोई भगवान के सुन्दर और पवित्र विग्रह, पवित्र गुणों, परमात्मा के गुणधर्म, उनके अनगिनत लक्षण,हमेशा खुश रहने वाले नित्यात्मा, मुक्तामा आदि के बारें में सीख सकता हैं। फिर भी अगर कोई व्यक्ति शरणागति कि राह का पालन करता हो और अगर वह भगवान श्रीमान्नारायण के परम धाम जाना चाहता हो तो द्वयमन्त्रं अपने आप को स्पष्ट बनाता हैं जैसे सुन्दर रूप और वह उस व्यक्ति को आनंददायक करता हैं। यह सब सीधे रूप से शरणागति मन्त्र के परम बढाई कि तरफ नोक करता हैं जो द्वयमहामन्त्रं के अन्दर हैं। ऐसा द्वयमहामन्त्रं वह हैं जो एक शिष्य को उसके आचार्य ने पढाया हैं। अत: आचार्य जिन्होंने किसी शिष्य को द्वयमहामन्त्रं कि शिक्षा दि हैं वह उस व्यक्ति के लिए सर्वोत्तम भगवान हैं। “इरै वन” के पहिले “तन” का प्रयोग करने का अर्थ हैं कि जैसे भगवान श्रीमन्नारायण हीं सब के लिये भगवान हैं हमारे लिये “आचार्य” हीं भगवान हैं। वह एक व्यक्ति के लिये या फिर कुछ व्यक्तियों के लिये भगवान हैं। भगवान कि बात “तन” के प्रयोग में छिपा हैं।

ताले: आचार्य के चरण कमल जो एक व्यक्ति के लिये भगवान हैं। अगर केवल हम “ताले” शब्द को देखें तो हम यह समझ सकते हैं कि जिन्होंने भगवान को पकड़ रखा हैं और जिन्होंने आचार्य को पकड़ रखा हैं उनके लिये उनके चरण कमल हीं शरण / उपाय हैं। “ताले” शब्द में “एकाराम” शब्द हैं जिसका यह मतलब हैं कि आचार्य के चरण कमलों को और किसी कि मदद कि जरूरत नहीं हैं। वह अपना काम खुद हीं कर लेंगे।

अरणागुम एन्नुम अदु: “अरण” यानि शरण; केवल आचार्य के चरण कमल हीं किसी व्यक्ति के लिये उपाय हैं। “इरैवन” शब्द के लिये तीन साधारण / जातिगत अर्थ हैं वह हैं नेतृत्व, राह और लाभ। “इरैवन” वह हैं जिसमें यह तीन हैं। परन्तु “तन इरैवन” में आचार्य के चरण कमल हीं किसी व्यक्ति के लिये मार्गदर्शक हैं। वहीं चरण कमल किसी के लिये राह हैं और वहीं चरण कमल किसी व्यक्ति के लाभ का कार्य करती हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३०

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २९                                                      ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३१

पाशुर-३०

ramanuj

 माडुम मनैयुम मरै मुनिवर
तेडुम उयर वीडुम सेन्नेरियुम
पीडुडैय एट्टेलु त्तम तन्दवने एन्रि रादार उरवै
विट्टिडुगै कण्डीर विदि

 प्रस्तावना: इस पाशुर में श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी शास्त्र कि एक बात समझाते हैं कि हमें किसी भी तरह के लोगों से कैसे रिश्ता रखना चाहिये यह निश्चित करना चाहिए। यह वें लोग हैं जो यह विचार भी नहीं करते हैं कि जो धन उन्होंने अपने जीवन के लिये जोड़ा हैं, वह अपने भविष्य के लिये और वह कुछ नहीं बल्कि अपने आचार्य द्वारा बताया हुआ आठ अक्षरों वाला अष्टाक्षरमन्त्र (मूलमंत्र) (तिरुमन्त्र) हैं।

 अर्थ:

माडुम: गाय जो दूध उत्पन्न करती हैं, | मनैयुम: घर जो खुशियाँ का पालन पोषण करता हैं,

किलयुं: सम्बन्धी | मरै मुनिवर तेडुम: वह जो साधु माँगते हैं वह और कुछ नहीं परन्तु

उयर वीडुम: बस एकहीं परमपदधाम हैं और अन्त में | सेन्नेरियुम: श्रेष्ठ मार्ग (अर्चिरादिक) जो हमें सबसे निराला परमपदधाम पहुँचाता हैं, यह उपर बताई गयी बातें और कुछ नहीं बल्कि | तन्दवने: प्रत्येक के आचार्य हैं जिन्होंने यह मतलब बताया | पीडुडैय: विशेष

एट्टेलु त्तम: अष्टाक्षरमन्त्र (मूलमंत्र) यानि “तिरुमन्त्र”| एन्रि रादार: लोग यह विचार करते हैं उपर कि हुई बातें और कुछ नहीं बल्कि उनके आचार्य कि | उरवै: हमारा उनके साथ सम्बन्ध किसी भी तरह ऐसा होना चाहिये कि | विट्टिडुगै: किसी भी लक्षण के सिवाये त्यागना।

विदि: यह शास्त्र का एक आदेश हैं | कण्डीर: कृपया इस आज्ञा को देखिये और इसके महत्त्व को समझिये।

 

स्पष्टीकरण:

माडुम: “माडु” गय्यों को दर्शाता हैं। यहाँ श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी यह समझाते हैं कि गाय वह हैं जो बहुत अधिक मात्रा में स्वादिष्ट दूध, दही और पौष्टीक वस्तुएं देती हैं। वह इतने बहुमूल्य वस्तुएं देने कि वजह से गाय को धनकोष किया जाता हैं और अपने आप में ही उसे धन भी मानते हैं। बहुत सी गाय होने का सीधा साधा मतलब हैं कि वह धनवान हैं।

मनैयुम: एक घर जो किसी एक के जीवन में पूरी खुशी का स्त्रोत / नींव की तरह निभाता हैं।

किलयुं: यह उन सम्बन्धीयों को शामील करता हैं जो यह सोचते हैं कि आनन्द और भाग्यवान होने के लिये एक होकर रहना हैं। जीवन के पोषण और खुशी के लिये तीन वस्तु गाय, घर और सम्बन्धी कि जरूरत हैं।

मरै मुनिवर: वेद में साधु हीं अधिकारी हैं। ये वों हैं जो भगवान श्रीमन्नारायण के बारें अपने चित्त और हृदय में निरन्तर सोचते रहते हैं।

तेडुम उयर वीडुम: खोजने कि क्रिया को “तेडु” कहते हैं और इसलिए “तेडुम उयर वीडुम” का अर्थ हैं परमपदधाम जो कि खोजा गया और अनुसंधान किया गया और वह अंतिम जगह जहाँ कोई भी जा सकता हैं। क्योंकि “उयर” का अर्थ “उच्च” हैं “उयर वीडुम” यह समझाता हैं कि वहाँ एक और “न्यूनतम” वस्तु हैं । यह और कुछ नहीं “कैवल्यं” जो और कुछ नहीं अपने ही आत्मा का सदैव के लिये आनन्द उठाना और परमात्मा के आनन्द को नाकारना है। हमारे पूर्वाचार्य इस तरह के “कैवल्यं” को छोटा मानते हैं। क्योंकि यह ऐसा हैं जिसे छोड़ना ही पड़ेगा इसीलिए स्वामीजी श्री देवराज मुनि परमपदधाम को कैवल्यं से भेद करने के लिये विशेषण पद “उयर” (उच्च) वीडुम पद के सामने इस्तेमाल करते हैं और परमपदधाम को दर्शाते हैं। क्योंकि “सिरुवीड़ुम” का अर्थ कैवल्यं हैं और सभी अनिश्चयता को साफ करने के लिये विशेषण पद “उयर” को “वीडुम” पद के सामने लगाया गया हैं।

सेन्नेरियुम: जब कोई आत्मा भगवान के परमपदधाम पहुँच जाता हैं उसका अर्थ यह हैं कि उसको मोक्ष प्राप्त हो गया या वह मुक्त हो गया हैं। “परमपदधाम” जाने की राह तो “अर्चिरादि” हीं हैं। यह राह लक्ष्य की तरह हीं महान हैं। और दूसरे शब्दों में “सेन्नरि” खुद भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाने के दूसरे साधनों को भी शामील कर सकता हैं। प्रपन्नों (वह जिसने शरणागति कर ली हो) के इसमें खुद श्रीमन्नारायण हीं जरिया हैं।

पीडुडैय एट्टेलु त्तम तन्दवने एन्रि रादार उरवै: “उरवै” एक सम्बन्ध हैं। यहाँ श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी कुछ खास लोगों से सम्बन्ध के बारें में बात कर रहे हैं। ये लोग यह बात नहीं जान सकते हैं कि जिन गुरू ने उन्हें अष्टाक्षर मन्त्र बताया हैं वें हीं उनके लिये सब कुछ हैं। जो एक व्यक्ति दूसरों को सुख देते समय असल में गाय, घर और संबंधी सभी सांसारिक दुखो को पाया हैं। यह सभी दुखों का एक ही औषधी हैं आठ अक्षरोंवाला अष्टाक्षर मन्त्र जिसे “तिरुमन्त्रं” कहते हैं जो हमें यह सिखाता हैं कि सभी वस्तु का लाभ सांसारिक और स्वर्गीय हैं। तिरुमन्त्र हमें सबसे उच्च भगवान श्रीमन्नारायण के तिरुमाली जाने की राह भी बतायेगी। ऐसे तिरुमन्त्रं को तो हर एक के आचार्य हीं सीखा सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति का किसी ऐसे व्यक्ति के साथ सम्बन्ध हो जो यह समझ नहीं सकता हैं कि सबकुछ आचार्य हीं हैं जिन्होंने हमें तिरुमन्त्रं सिखाया हैं तो शास्त्र के अनुसार ऐसे व्यक्ति के साथ सम्बन्ध तुरन्त छोड़ देना चाहिये।

विट्टिडुगै: एक कण भी शंका या सवाल रखते हुए उसे छोड़ा देना चाहिये।

विदि: यह शास्त्र कि आज्ञा हैं।

कण्डीर: आपको यह मालुम रहने दो!!! आप यह सच्चाई देख लीजिये!!! आप इसे पा लीजिये और समझ लीजिये!!! अत: किसी को भी ऐसे लोगों से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये जिसने अपने आचार्य से सम्बन्ध नहीं रखा हो। वह एक हीं क्षण में ऐसे लोगों से रिश्ता तोड़ देना चाहिये।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २९

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २८                                                          ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३०

पाशुर-२९

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“मन्दिरमुम ईन्द गुरूवुम अम्मन्दिरत्ताल
सिन्दनै सैय्गिन्र तिरूमालुम – नन्दल इलादु
एन्रु अरूल परिवर यावर अवर इडरै
वेन्रु कडिदडैवर वीडु

सारांश :

यह पाशुर यह समझाता हैं कि कुछ गुणों के साथ लोगों का एक समुह हैं और यह सब लोग इस संसार बन्धन से छुट जायेंगे। इन लोगों का यह गुण हैं कि उन्हें आठ अक्षरों वालें मूलमंत्र (तिरुमन्त्र) पर पूर्ण विश्वास हैं और जिन्होंने उन्हें यह मूलमंत्र दिया हैं उन आचार्य पर उन्हें पूर्ण विश्वास हैं और उनका यह मत हैं कि मूलमंत्र “भगवान श्रीमन्नारायण” को ही समझाता हैं।

अर्थ:

मन्दिरमुम: मूलमंत्र (तिरुमन्त्र) | ईन्द गुरूवुम: आचार्य जिन्होंने सभी लोगों को मूलमंत्र (तिरुमन्त्र) दिया और | अम्मन्दिरत्ताल: मूलमंत्र का उद्देश / प्रेम | सिन्दनै सैय्गिन्र: जो बचाव करता हैं | नन्दल इलादु: लगातार / नित्य | तिरूमालुम: जो और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायण हीं हैं | एन्रु: लोग जो इन तीनों के बारें में सोचते हैं वह हमेशा के लिये | अरूल परिवर: भगवान के सन्मुख हीं रहेंगे | यावर: ऐसे लोग | अवर: और ऐसे हीं लोग| इडरै वेन्रु: इस सांसारिक लड़ाई को जीत सकते हैं और | कडिद: जल्दी और | डैवर वीडु: भगवान श्रीमन्नारायण के तिरुमाली पहुँच जाते हैं जो कि परमपद हैं |

स्पष्टीकरण:

मन्दिरमुम: मन्त्र वह हैं जो इसे ना की निरन्तर कहता हैं परंतु उसके प्रति पूर्ण भाव रखता है उसकी रक्षा करता हैं । यहाँ “मन्त्र” को आठ अक्षरों वाले “मूलमंत्र” (तिरुमन्त्र) को दर्शाया गया हैं। तिरुमझिसै पिरान कहते “एत्तेझुतुम ओधुवार्गल वल्लार वानं आलवे।

ईन्द गुरूवुम: आचार्य जिन्होंने हमें मूलमंत्र (तिरुमन्त्र) दिया और सिखाया।

अम्मन्दिरत्ताल सिन्दनै सैय्गिन्र तिरूमालुम: व्यक्ति जिन्होंने यह तिरुमन्त्र दिया वह और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायण हीं हैं।

नन्दल इलादु: “नन्दुधल” किसी को रोकना / तोड़ना यह दर्शाता हैं। अत: नन्दल इलादु यानि नित्य हैं।

एन्रु अरूल परिवर यावर: वह व्यक्ति जो उपर बताया हुआ “मूलमंत्र” (तिरुमन्त्र) को लेने वाला हैं, आचार्य जिन्होंने यह सिखाया हैं और तिरुमन्त्र का उद्देश और कुछ नहीं वह हीं भगवान श्रीमन्नारायण हैं।

अवर इडरै वेन्रु कडिदडैवर वीडु: वह व्यक्ति इस संसार बंधन से छुट जायेगा और उस स्थान पर जायेगा जहां हमेशा के लिये खुशी हैं जो और कुछ नहीं भगवान श्रीमन्नारायण कि तिरुमाली हैं। इस मोड पर मुमुक्षुपडि का सूत्र पढने के लिये बहुत सुन्दर हैं “मंतिरतिलुम मंतिरतुक्कू उल्लेदाना वस्तुविलुम मंतिर प्रधानां आचार्यं पक्कलिलुं प्रेमं गणक्का उंदानाल कार्य कर्मावधु”।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २८

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २७                                                        ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २९

पाशुर-२८ 

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शरणागति मट्रोर् सादनत्तैप पर्रिल
अरण आगादु अञ्जनै तन सेयै
मुरण अलियक कट्टियदु वेरोर कयिरु कोण्डु आर्पदन मुन
विट्ट पडै पोल विडुम

सारांश

पिछले पाशुर “तप्पिल गुरू अरूलाल” में स्वामीजी श्री देवराज मुनि ने अपने आचार्य द्वारा बताई गयी “शरणगति” का अर्थ समझ पाये हैं उनके बारे में बतलाया हैं। वह कहते हैं कि ऐसे लोग निश्चित हीं परमपद पहुँचेंगे। उसके अगले पाशुर “नेरि अरियादारूम” में जो लोग अपने आचार्य द्वारा बताया हुआ शरणागति का अर्थ नहीं समझ सके और जिन्हें भगवान कृष्ण द्वारा हीं उपदेश करने पर भी शरणगति पर थोड़ा भी विश्वास नहीं हैं उनके बारे में बताया हैं। उन्होंने यह कह कर समाप्त किया कि ऐसे लोगों को कभी भी परमपद नहीं मिलेगा। इस पाशुर में शरणागति की कुछ सत्य बातें बताई हैं। शरणागति कुछ और नहीं परन्तु भगवान के चरण कमलों के शरण होना हैं और “केवल आपके चरण कमल हीं मेरे उपाय हैं। मेरे पास और कोई दूसरी राह नहीं हैं”। शरणागति के कुछ अर्थ २३वें पाशुर में भी बताये गये थे (ऊलि विनैक कुरूम्बर)। अगर किसी के मन में यह अस्थिर बात आ जाती हैं कि केवल भगवान के चरण कमलों के शरण होने से हमें मोक्ष प्राप्त हो जायेगा या कुछ पुण्य काम करना पड़ेगा तो भगवान श्रीमन्नारायण उसे शरणागति नहीं देंगे जो उन्होंने उसे पहिले दिया था। उसकी शरणागति व्यर्थ हो जायेगी। शरणागति के इस सुन्दर बात को इस पाशुर में समझाया गया हैं।

अर्थ:

सरणागति: शरणागति जो कि भगवान श्रीमन्नारायण के पूर्ण तरह से उनके चरणों के शरण होना। उसके कुछ लक्षण हैं  जैसे | ट्रोर् सादनत्तैप: अगर कोई व्यक्ति शरणागति में विश्वास खो जाने के पश्चात अपने आप को दूसरे कार्य में लगाता हैं | पर्रिल: अगर वह इसे कार्य समझता हैं जो उसे अच्छा कर्म प्रधान करेगी | अरण आगादु: उसके पश्चात वह शरणागति जो इस व्यक्ति ने कि हैं उसे बचा नहीं सकती बल्कि उसके और उसके शरणागति के कार्य को निश्फल बना देगी | अञ्जनै तन सेयै: यह उसी तरह हैं कि हनुमानजी अंजाना देवी के पुत्र हैं | मुरण अलियक: उनके बड़े सहास से हीं नष्ट हो गये | कट्टियदु: और रावण के पुत्र राक्षस इंद्रजीत के ब्रम्हास्त्र से बन्ध गये थे। वेरोर कयिरु कोण्डु: इंद्रजीत ने ब्रम्हास्त्र पर विश्वास नहीं किया और उन्हें तुच्छ रस्सीयों से बांधने लगा और ब्रम्हास्त्र के योग्यता पर भरोसा न रहा | र्पदन मुन: जिसने ब्रम्हास्त्र को एक ही क्षण में अपने आप ही खोल दिया |

विट्ट पडै पोल: उसी तरह जैसे ब्रम्हास्त्र ने हनुमानजी को छुटकारा दिया | विडुम: शरणागति किसी को कभी मुक्त नहीं करेगी बल्कि उसे पूरी तरह निश्फल कर देगी

स्पष्टीकरण:

शरणागति: भगवान श्रीमन्नारायण के शरण होने के लिए शास्त्र में कई अच्छी राह और कर्म बताये हैं। उसमे शरणागति हीं सबसे उत्तम राह हैं। कारण कि जब कोई दूसरी राह / कर्म करता हैं तो उसे पहिले स्थान पर करता हैं। अगर कोई व्यक्ति यह कर्म नहीं करता हैं तो यह राह उसके लिए उत्पन न होगी। शरणागति दूसरी राह जैसे नहीं हैं वह एक क्षण में तो हो जाती हैं और दूसरे हीं पल खो भी जाती हैं। शरणागति हमेशा के लिए होती हैं और जो कोई भी उसे पालन कर सकता वह उसका पालन करता हैं । शरणागति या शरण होने कि राह और कोई नहीं स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण हीं भगवान स्पष्ट रूप से इसी राह को “पूर्ण शरणागति” कहते हैं। । यह लक्षण विशेष गुण अन्यथा किसी और कार्य मे नहीं हैं । क्योंकि यह शरणागति अच्छे गुण / कर्म (जिसे पुण्य भी कहते हैं) से समझाया गया हैं इसे “शास्त्र” भी कहते हैं।जो भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों के शरण होता हैं (जिसे शरणागति भी कहते हैं) भगवान उसके अच्छे कार्य के लिये उसकी सेवा भी करते हैं और उस पर कृपा भी करते हैं। अत: शरणागति और कुछ नहीं भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों के शरण होना हैं और यह कहना “केवल आप हीं मेरे रक्षक हैं और मेरा और कोई भी नहीं और मैं और कोई भी स्थान में भी नहीं जा सकता हूँ”। इस तरह कि “शरणागति” के लिए अति मुख्य और अति प्रामाणिक वस्तु जो चाहिये वह पूर्ण विश्वास जिसका शास्त्र के अनुसार नाम हो जैसे “महा विश्वास” और “अध्यावसायं” । अगर कोई यह विश्वास खो देता हैं तो भगवान श्रीमन्नारायण कभी अच्छा परिणाम नहीं देंगे। इसके अलावा वह जिसने शरणागति कि हो वह यह कण मात्र भी नहीं सोचना चाहिये कि उसी ने शरणागति कि हैं। उसे यह “अहंकार” (में, मेरा इत्यादि) और “ममकार” (मेरा आदि) नहीं आना चाहिये। वह इस तरह का व्यक्ति होना चाहिये जो भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों को छोड़कर और कोई स्थान में नहीं जा सके। ऐसे व्यक्ति को हीं शरणागति कि आवश्यकता हैं। इस विचार को आल्वार इस तरह दर्शाते हैं “पुगल ओंरीला आडिएन”। अगर कोई व्यक्ति इस सांसारिक जीवन से घृणा करके पूर्णत: भगवान के चरण कमलों के पास पहुँचना चाहता हो तो भगवान यह निश्चित करते हैं कि वह तुरन्त उसके पास पहुँच जाये। यह शरणागति के साहित्य में समझाया गया हैं।

मटोर् सादनत्तैप पर्रिल: किसी को भी शरणागति का अर्थ और अभिप्राय मालुम होना चाहिये। एक बार भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों के शरण होने के पश्चात कोई भी इस शरणागति के राह से दूर नहीं जाना चाहिये और अपने आप को भी बचाने के लिये दूसरे कार्य खुद हीं शुरू नहीं करना चाहिये । अगर कोई कारण से वह यह करता भी हैं तो शरणागति कभी उस व्यक्ति का उपाय नहीं होगी। जो शरणागति उसने कि वह उसको मदद नहीं करेगी बल्कि उसको हमेशा के लिये छोड़ देगी। अत: हर व्यक्ति को पूरे निरंतर विश्वास के साथ अपने तरफ पकड़ के रखता हैं और शरणागति पर संशय नहीं करता हैं परंतु खुद को बचाने के खुद हीं सभी कार्य लिये करने लगता हैं। अगर वह करता हैं तो शरणागति पूरी तरह टूट जायेगी। इसे एक कहानी के जरिये समझाया गया हैं।

अञ्जनै तन सेयै: अंजना का पुत्र, हनुमान हैं

मुरण अलियक कट्टियदु: मुरण ताकत या बल / साहस को दर्शाता हैं और इसलिये यह पद का अर्थ “उस ताकत को ब्रह्मास्त्र के जरिये निष्प्रभाव करना ”।

वेरोर कयिरु कोण्डु आर्प्पदन मुन: वह क्षण जब कोई ब्रह्मास्त्र पर विश्वास न रखकर दूसरे छोटी रस्सीयों पर विश्वास रखकर हनुमानजी को बाँधता हैं। (अर्थल का मतलब बाँधने कि क्रिया)

विट्ट पडै पोल: शरणागति उसी तरह निष्फल हो जायेगी जैसे ब्रह्मास्त्र भी दूसरे छोटी रस्सी के संयोग में आने से निष्फल हो जाती हैं।

रक्का: रामायण में जब श्रीहनुमानजी श्रीलंका में सन्देश लेकर आते हैं तब वें पूरी तरह अशोक वाटीका को नष्ट कर देते हैं। इन्द्रजीत जो रावण का पुत्र था हनुमानजी से युद्ध कर उनको ब्रम्हास्त्र से बांध दिया। फिर भी हनुमानजी ने जो क्रोध लंका पे किया वह याद कर इन्द्रजीत ने उन्हें ब्रम्हास्त्र को आधार देंगी यह सोचकर दूसरी और छोटी रस्सीयों से बांधा । वह मन में यह सोचा कि, “क्या यह ब्रम्हास्त्र हनुमान जैसे योद्धा को बाँधने के लिये काफी हैं” और ब्रम्हास्त्र के शक्ति पर शंका करने लगा । अत: एव उसने एक कदम आगे बढ़कर और छोटी रस्सीयों लाकर हनुमान को बांध दिया। इन्द्रजीत का यह बुद्धिहीन कार्य देखकर ब्रम्हास्त्र ने हनुमान को उनके गांठ से मुक्त कर दिया। उसी तरह किसी को भी शरणागति छोड़ और कोई कार्य में लगना हो तो उसको शरणागति का कभी भी परिणाम नहीं मिलेगा और उस व्यक्ति को हमेशा के लिये मुश्किल में रख देगी। शरणागति की ब्रम्हास्त्र के साथ तुलना कि गई हैं और बाकि अच्छे कर्मों की उन तुच्छ रस्सीयों के साथ तुलना कि गई हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २७

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २६                                                           ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २८

पासुर – २७

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नेरि अरियादारूम अरिन्दवर पार सेन्रु
सेरिदल सेय्यात ती मनत्तर तामुम् इरै उरैयैत
तेरादवरुम तिरुमडन्दै कोन उलगत्तु
एरार इडर अलुन्दुवार

प्रस्तावना: इस पाशुर में श्री देवराज मुनि स्वामीजी तीन प्रकार के व्यक्ति के बारें में कहते हैं। वह कहते हैं कि यह तीन श्रेणी के लोग कभी भी भगवान श्रीमन्नारायण के परमपद को प्राप्त नहीं कर सकते और वें अपने आप को संसार बन्धन के पीड़ा जो कि जन्म मरण हैं उसी में रहते हैं।

अर्थ: अरियादारूम – जिन्हें मालुम नहीं हैं | नेरि – यानि | अरिन्दवर पार सेन्रु– जो आचार्य के पास जाते हैं जिन्हें उसका मतलब मालुम हैं परन्तु | सेरिदल सेय्यात – अपने आचार्य को उनकी आज्ञा पालन न करके उनको प्रसन्न नहीं करता और उनके तक हीं कैंकर्य करता हैं और ती मनत्तर तामुम् – जिसके हृदय में कपट हो और | इरै उरैयैत तेरादवरुम – जिसे भगवान श्री कृष्ण द्वारा भगवद गीता में “शरणागति” शास्त्र को समझाया उस पर विश्वास नहीं हैं; वह लोग | एरार – नहीं पहुंचेंगे | उलगत्तु – परमपद जहाँ राजा और कोई नहीं | तिरुमडन्दै कोन – वह हैं जो श्रीमहालक्ष्मीजी के राजा हैं; ऐसे लोग | अलुन्दुवार उसमे डूब जायेंगे इडर – यह संसार समुद्र जो सभी पीड़ा का मूल हैं।

स्पष्टीकरण: नेरि अरियादारूम:  यहाँ कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें यह नहीं पता जन्म मरण के जंजीरों कि राह कैसे तोड़ते हैं जो कि पुन: पुन: आती हैं। उन्हें इस फंदे से बाहर आने का रास्ता हीं नहीं मिलता हैं वें इसी चक्र में सदैव के लिए फंसे रहते हैं। इन व्यक्तियों को यहाँ दर्शाया गया हैं। अरिन्दवर पार सेन्रु सेरिदल सेय्यात ती मनत्तर तामुम्: यह उन व्यक्तियों को दर्शाया गया हैं जो इस जन्म मरण के संसार बन्धन से किस तरह छुटकारा दिलाना पता होता हैं ऐसे आचार्य कि शरण नहीं लेते हैं, उसे जो इस पद में बताया गया हैं “मारि मारि पला पिरप्पुम पिरन्धु”। यह लोग आचार्य के चरण कमलों को नहीं स्वीकारते। अगर वें अपने अपने आचार्य के चरणों में नहीं जाते हैं तो उनका भगवान के प्रति सही आचरण नहीं होगा। हालकि आचार्य इन्हें इस संसार के जन्म मरण के बन्धन से निकाल ने के लिये तैय्यार हैं परन्तु इनका आचरण देखकर उन्हें यह रहस्य उन्हें बताने से निषेद करता हैं। कारण यह हैं कि वह अपने आचार्य के कृपा को न स्वीकारते हैं और वही कार्य करते हैं जो उन्हें खुद को प्रसन्न करें। वह अपने आचार्य से इस संसार बन्धन से छुटने के लिए नम्रता पूर्वक प्रार्थना नहीं करते हैं। वह अपने आचार्य का बताया हुआ कोई भी कार्य नहीं करते हैं। आचार्य से कभी भी बात नहीं करते। वह अपने आचार्य को एक दूसरे व्यक्ति के जैसे हीं देखते हैं और उनमे अनगिनत गलतियाँ ढुँढते हैं जैसे कि एक साधारण व्यक्ति में गलतियाँ ढुँढता हैं। ऐसे लोगों के बारें यहाँ समझाया गया हैं।
इरै उरैयैत तेरादवरुम: एक और समूह के लोग हैं जिन्हें शरणागति शास्त्र (पूर्णत: भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों के शरण होना) में विश्वास नहीं हैं। शरणागति का उपदेश तो अर्जुन को भगवान कृष्ण ने अपने “भगवद् गीता” में दिया था। हालकि भगवान ने अर्जुन से बात कि परन्तु अपने आप को जरिया बनाया। उनका मूल उद्देश तो हम जैसे लोग थे इसलिये उन्होंने अर्जुन को अपना हमारे लिए प्रतिनिधि चुना।

तिरुमडन्दै कोन उलगत्तु एरार: ऐसे लोग कभी भी “श्रीवैकुण्ठ” या “परमपद” नहीं जायेंगे जो भगवान कि तिरुमाली हैं और जो पिराट्टी के स्वामी हैं। इडर अलुन्दुवार: ऐसे लोग हमेशा के लिए इस शोकमय दु:खी सन्सार में डुब जायेंगे और पुन: जन्म लेते रहेंगे। वह सब पीड़ा का अनुभव करते हैं और कभी भी भगवान के परम धाम परमपद नहीं पहुँचते। स्वामीजी श्री देवराज मुनि कहते हैं ये हमेशा के लिए अत्यन्त दु:ख प्राप्त करेंगे।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २६

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २५                                                          ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २७

पासुर – २६

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तप्पिल गुरू अरूलाल तामरैयाल नायगन तन
ओप्पिल अडिगल नमक्कु उललत्तु वैप्पेन्रु
तेरि इरुप्पार्गल तेसु पोलि वैगुन्दत्तु
एरि इरुप्पार पणिगक्टे एय्न्दु

प्रस्तावना:
भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल के शरण होने को पूर्णत: समर्पण होने कि पथ को ही शरणागति कहते हैं और यही वह पथ हैं जिसे स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण ने ही कहा हैं। तमील कवि तिरुवल्लूवर कहते हैं कि “पोरी वायिल ऐयंधविथ्थान पोयधिर ओझुक्का नेरी”। यहाँ उन शब्दों को समझना चाहिये जैसे कि “ऐयंधविथ्थान आगिरा इरैवनाल सोल्लापत्ता उण्मयान नेरी ओझुक्का नेरी” जिसका अर्थ हैं कि वह भगवान ही हैं जिन्होंने हमें यह दोषरहित पथ बताया हैं। तिरुवल्लूवर अपने और एक पद में जिसकी शुरुवात “पर्रर्रान पर्रिनै” से होती हैं जहाँ वह कहते हैं “इरैवन ओधिया व्ल्ट्टु नेरी”। यहाँ नेरी और कुछ नहीं परन्तु शरणागति (पूर्णत: समर्पण) कि राह हैं। यह भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों को पूर्णत: समर्पण का कर्म केवल आचार्य के सहारे से ही किया जाना चाहिये। शरणागति का गहराई से मतलब अपने आचार्य से ही समझा जा सकता हैं। जो ऐसे ही करते हैं और जिसे पूरा भरोसा हो वह भगवान के परमपद धाम में जरूर पहूंचेगा और निरन्तर वहाँ कैंकर्य करते रहेगा।

 

अर्थ:
अरूलाल – एक श्रेष्ठ आशीर्वाद के साथ गुरू – आचार्य जिनके पास हैं
तप्पिल – ज्ञान में थोड़ा भी अधुरापन नहीं और उसी ज्ञान पर व्यवहारीक आचरण तेरि इरुप्पार्गल – जो कठोरता से यह तथ्य में विश्वास रखते हो
ओप्पिल –असमानबल अडिगल – चरण कमलों का तामरैयाल नायगन तन – पिरट्टी के स्वामी, भगवान ही हैं  वैप्पेन्रु – एकत्रीत करना उललत्तु –एक हृदय जो अपने हृदय पर
नमक्कु – जिसको थोड़ा सा भी ज्ञान न हो, ऐसे व्यक्ति एरि – परमपद जाने का सही पथ पर पणिगक्टे – परमपद जाने के बाद का कैंकर्य करना
एय्न्दु इरुप्पार – और उससे भी उचित कार्य वहा परमपद में करना जो की इस तरह दर्शाया गया हैं   तेसु पोलि –प्रकाशमान वैगुन्दत्तु – नित्य तिरुमली जो कहलाई जाती हैं “श्रीवैकुण्ठ” या “परमपद”

स्पष्टीकरण: तप्पिल गुरू अरूलाल: “तप्पिल गुरू ” उन आचार्य को दर्शाते हैं जो कभी भी कुछ गलत नहीं करते हैं। तिरुकुरल के पद से “कर्का अधर्कु थगा निर्का” कि आचार्य पहिले प्राप्त किए ज्ञान की वजह कभी भी कोई गलत कार्य नहीं करते और यही ज्ञान का परिणाम और सच्चाई हैं । तामरैयाल नायगन तन: यह तिरू (पिरट्टी) के स्वामी को संबोधीत करता हैं, जो कोई और नहीं भगवान श्रीमन्नारायण खुद ही हैं। यह पद का अर्थ दो जगह प्रगट होता हैं: (१) “श्रीमन्न” और (२) नारायण। दोनों ही द्वय मन्त्र के उत्तर भाग में हैं। “तामरैयाल नायगन” इस पद में यह तथ्य हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण कभी भी अम्माजी से अलग नहीं होते हैं। यह द्वय मन्त्र के “श्रीमन्न” पद में देखा जा सकता हैं। “नायगन तन ” द्वय मन्त्र में श्रीमन्न नारायण पद का मतलब ही “नारायण” पद का अर्थ हैं। यह दोनों एक भक्त को उच्च कोटी पर ले जाने के लिए जरूरी हैं। जब भगवान के भक्त अपने आप को पूर्णत: भगवान श्रीमन्नारायण को समर्पण करते हैं तब वात्सल्य, स्वामित्व, सौशील्य, सौलभ्य यह गुण उस समय भगवान में जरूरी हैं। समर्पण के पश्चात भगवान के गुण जैसे ज्ञान और शक्ति यह दोनों जरूरत हैं और इसके अतिरिक्त प्राप्ति और पूर्ति जैसे गुणों कि भी जरूरत हैं। “नायगन तन ” पद में भगवान के वहीं गुण दर्शाते हैं जो द्वय मन्त्र में “नारायण” पद में हैं।

ओप्पिल अडिगल:  यह भगवान श्रीमन्नारायण के “अनोखे चरण कमलों” को दर्शाता हैं जो द्वय मन्त्र में “चरणौ” शब्द के अर्थ को बताता हैं। इसका कारण यह हैं कि भगवान का चरण कमल को हमेशा “अनोखा” ऐसा वर्णन किया हैं क्योंकि भगवान में किसी कि भी सहायता लिए बिना अपने किसी भी भक्तों कि रक्षा करने कि योग्यता हैं । नमक्कु उललत्तु वैप्पेन्रु: यह हमारे जैसे भक्तों को दर्शाता हैं। भगवान कि शरण कि कृपा को ग्रहण करने के सिवाय हमारे पास और कोई भी दूसरा उपाय नहीं हैं। संसार की पूर्णत: सच्चाई के अनुसार भगवान के सिवाय और कोई भी राह नहीं हैं। अत: “हम” यानि हम सब जन जिन्होंने यह सच्चा विश्वास जान लिया हैं और यह सब जन को ही “नमक्कु” पद से दर्शाया गया हैं। जो भक्त अपने हृदय में भगवान के चरण कमलों को रखते हैं वह इसे “संपत्ति” / बचत खाता समझते हैं। इसलिये द्वय मन्त्र में यह दो पद “चरणौ” और “प्रपद्ये” इसी तरह दर्शाते हैं। इसका कारण इस प्रकार हैं: अगर किसी व्यक्ति के पास संपत्ति हैं तो वह कुछ भी अपने पसन्द का कर सकता हैं। उसी तरह अगर किसी व्यक्ति के हृदय में भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमल विराजते हैं तो वह पूर्णत: कुछ भी कर सकता हैं क्योंकि वह हमेशा भगवान के बारे में सोचता हैं कि “सिर्फ उनके चरण कमल हीं मेरे रक्षक हैं”। अत: सम्पत्ति के साथ भगवान के चरण कमलों कि तुलना करना बहुत ही सुन्दर हैं। और जब भी हम यह कहते हैं कि उनके चरण कमलों को पकड़ लो तो वह मानसीक कार्य हैं ना कि शारीरिक। इसे “मानसा स्व्ल्कारम” कहते हैं इसलिये यह मानसीक कार्य हैं ना कि शारीरिक। तेरि इरुप्पार्गल: जो एक भगवान के चरण कमल हीं उनके हृदय में निवास करते हैं उनकी यह सोच पर कभी भी डगमगाते नहीं हैं । यह एक बहुत मनभावन हैं कि भगवान के चरण कमल के ही शरण होना हैं और हृदय में उनकी आराधना करना। हालकि उनके विश्वास का ना डगमगाना यह एक आसान कार्य नहीं हैं। अत: “तेरि इरुप्पार्गल ” उन लोगों को शामील करता हैं जो इसमे निरन्तर विश्वास करते हैं। वह व्यक्ति जिसने शरणागति कि हैं उसके लिये यह विश्वास बहुत प्रभावशाली हैं। अगर इस विश्वास में थोड़ी सी भी कमी हैं तो वह परमपद नहीं जा सकेगा। वह व्यक्ति जिसको यह थोड़ा सा विश्वास हो, उसके लिये यह थोड़ा सा विश्वास हासिल करना आगे कि पंक्तियों में समझाया गया हैं। तेसु पोलि वैगुन्दत्तु: वह अपने अंतिम उद्देश तक पहुँच जायेंगे जो “परमपद” हैं जिसे “अझिविल व्ल्डु” ऐसा समझाया गया हैं। परमपद में कोई भी उच्च आनन्द का अनुभव कर सकता हैं और भगवान श्रीमन्नारायण कि हमेशा सेवा कैंकर्य कर सकता हैं।

एरि इरुप्पार पणिगक्टे एय्न्दु: यह भक्त जन योग्य हैं और परमपद में कैंकर्य करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। “पणिगल” भगवान श्रीमन्नारायण के कैंकर्य करने को दर्शाता हैं। “एयन्धु इरुप्पार” भगवान श्रीमन्नारायण का कैंकर्य करने के लिए हमेशा तत्पर / योग्य रहता हैं। अगर हम “पणि” का दूसरा अर्थ लेते हैं तो इसका एक और अर्थ भी हैं । “पणि” “आदिशेष” को भी दर्शाता हैं और इधर उसका अर्थ हैं कि उन भक्तों को आदिशेष के योग्यता के साथ तुलना करते हैं। इसका अर्थ हैं कि जैसे आदिशेष भगवान श्रीमन्नारायण का पूर्ण कैंकर्य करते हैं वैसे ही भक्त जन भी वह कैंकर्य कर सकते हैं। आदिशेष करने वाले कैंकर्य को बहुत सुन्दरता से यहाँ समझाया गया हैं “सेंराल कुदयाम, इरुन्धाल सिंगासनमाम, निन्राल मरवदियाम, नील कदलूल एनृम पुनैयां मणि विलक्काम, पूम्पट्टाम पुलगुम अणैयां तिरुमार्क्कु अरवु”।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २५

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श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २४                                                           ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २६

पासुर – २५

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अट्रम उरैक्किल अडैन्दवर पाल अम्बुयैकोन
कुट्रम उणर्न्दिगलुम कोलगैयनो – एट्रे
कनिर् न उडम्बिन वलुवनोर् कादलिप्पदु
अनर् दनै ईनर् गन्द आ

सार : पिछले पाशुर में श्री देवराज स्वामीजी ने यह समझाया कि कैसे भगवान अपने भक्तों कि गलतियों पर ध्यान नहीं देते हैं। अगर कोई व्यक्ति उन गलतियों कि तरफ बतलाता भी हैं तो भगवान उसे दोष नहीं मानते हैं। बजाए उसे भगवान आनन्द का खजाना सोचेंगे। इसका कारण यह हैं कि भगवान में मुख्य गुण हैं जिसे “वात्सल्य” कहते हैं। इस गुण के कारण उन्हें “वत्सलन” कहते हैं। इस गुण के कारण ही वह दोषों को कृपा के जैसे वर्णन करते हैं। वह किसी व्यक्ति के पिछले गलतियों / दोषों को खजाने ने कि तरह रखते हैं जिससे उनको बहुत आनन्द आता हैं। इसलिए कोई अगर भगवान के विरुध्द तर्क-वितर्क करना भी चाहता हैं तो कुछ गलतियों पर जिसे उन्हें ध्यान देना चाहिये भगवान उन दोषों कि तरफ ध्यान न देकर उसे “कृपा” समझते हैं और किसी को इससे अपने पिछले कर्मों के लिए डरने कि भी जरूरत नहीं हैं। यहीं इस पाशुर में दर्शाया गया हैं।

शब्दशः अर्थ :

अट्रम उरैक्किल अडैन्दवर पाल अम्बुयैकोन- अगर कोई निसंदेह रूप से कहना चाहता हैं कि जो भी भगवान के चरणों के शरण हुआ हैं वह जो कमल पुष्प के उपर विराजमान उनके स्वामी हैं,

कुट्रम उणर्न्दिगलुम कोलगैयनो? – अपने भक्तों कि गलतियों को देखते हैं और उसरे पसन्द भी नहीं करते, क्या यह सत्य हो सकता हैं?

एट्रे कनिर् न उडम्बिन वलुवनोर् कादलिप्पदु-  नहीं! वैसे ही जैसे गौ माता खुशी से अपने बछड़े के शरीर से गंदगी साफ करती हैं।

अनर् दनै ईनर् गन्द आ– तुरन्त बछड़े को जन्म देने के पश्चात

अट्रम उरैक्किल: इस पद का मतलब हैं कि “अगर कोई निश्चित रूप से कहता हैं”, यानि अगर कोई निश्चित रूप से इसे दृढ़ और अन्त समझता हैं, वह इधर ही हैं।

अडैन्दवर पाल: श्री देवराज स्वामीजी भागवान श्रीमन्नारायण के भक्तों को प्रार्थना करते हैं जिनके प्रति भगवान का अलग ही व्यवहार हैं जिसे आनेवाले पद में बताया गया हैं।

अम्बुयैकोन: भागवान श्रीमन्नारायण को बहुत से विशेषण से संबोधित करते हैं जैसे माता लक्ष्मीजी के स्वामी, श्रीलक्ष्मणजी के बड़े भाई आदि। “पाल” शब्द तमिल में दशा का अन्त हैं जिसका मतलब है “समीप”। अत: इदर “अम्बुयैकोन” यानि अगर भक्त अम्माजी के पुरुषकार से भगवान के पास जाते हैं तो भगवान उन्हें जरूर अपनाते हैं। भगवान उनके भक्तों को अपनाते हैं क्योंकि भक्त उनके शरण में अम्माजी के पुरुषकार से आते हैं तो भगवान उनके गलतियों कि तरफ ध्यान नहीं देते हैं। क्योंकि यह अम्माजी का स्वाभाविक गुण हैं। किसी को अपनाने के बाद अम्माजी यह देखती हैं कि भगवान उन्हें मन से अपनाया हैं कि केवल उनका मन रखने के लिए। भगवान भक्तों को उनके पापों के लिए उसे अस्वीकार करते हैं क्या यह देखने के लिए कि वह भगवान से उस भक्त के सारे पापों के बारें में बात करती हैं। परन्तु भगवान कभी भी ऐसा नहीं करेंगे। वह अम्माजी को यह उत्तर देंगे “एं आडियार अधु सेय्यार” (मेरे भक्त ऐसी गलतियाँ कर सकते है क्या)। इसका यहीं अर्थ हैं कि भगवान उसे पूरी हार्दिकता से अपनाते हैं और उसे कभी नहीं छोड़ेंगे क्योंकि वह अम्माजी के पुरुषकार के जरिए आये हैं। वह एक कदम आगे बढ़कर यह कहते हैं कि “अगर वह गलती करता भी हैं जैसे आप ने बताया हैं तो भी वह एक बड़े और अच्छे कार्य के लिए होगा। अत: में उसे शुरू में गलती न समझुंगा क्योंकि अंत में वह एक अच्छे कार्य के लिए समाप्त हुआ हैं”। यह भगवान और अम्माजी के बीच में संवाद हैं जीसे श्री विष्णुचित्त स्वामीजी के तिरुमोझी पाशुर ४.१०.२ में कहा गया हैं।

कुट्रम उणर्न्दिगलुम कोलगैयनो?: श्रीदेवराजमुनि स्वामीजी प्रश्न पुछकर कुछ बात कि जाँच करते हैं। वह यह पुँछते हैं कि क्या भगवान एसे हैं कि जो अपने भक्तों को उनके अनगिनत गलतियों के लिए उनसे घृणा करेंगे? पहिले यह प्रश्न पुँछने का कारण हैं कि पाठक गण यह जान ले कि यह पुछकर इसमें नि:संदेह अस्वीकारनिय हैं। “कोलगैय” भगवान का खुद का स्वभाव हैं कि अपने भक्तों को स्वीकार करें क्योंकि यह अम्माजी की सिफारीश हैं। वह अपने भक्तों के दोषों को कभी नहीं जानते हैं। अगर अम्माजी खुद भी कहे कि उसे जांचले फिर भी भगवान नहीं जाँचते यहीं कहेंगे कि यह गलतियाँ तो आनन्द की वस्तु हैं। वह कभी भी उस व्यक्ति से उसकी गलतियों के कारण नफरत कि भावना नहीं रखेंगे। यह उनका स्वाभाविक गुण हैं और इसी “वात्सल्यं” गुण के कारण ही उन्हें “वत्सलन” कहा जाता हैं। दोषों को उपाय करके कृपा करना “वात्सल्यं” हैं। “वत्सम” एक बछड़े कि तरह हैं जिसने अभि जन्म लिया हैं और उसकी माँ का उसके प्रति प्रेम हीं “वात्सल्यं” कहा जाता हैं। भगवान को “वत्सलन” कहते हैं और उनके इसी गुण के कारण जिसे आगे एक उदाहरण के साथ हम देखेंगे। यहाँ श्री देवराज मुनि स्वामीजी सभी प्रश्नों के उत्तर देते हैं कि इस गुण को उन्होंने लौकिक जगत में कहाँ देखा हैं।

एट्रे कनिर् न उडम्बिन वलुवनोर् कादलिप्पदु अनर् दनै ईनर् गन्द आ: “एर्रे” चिल्लाहट हैं। जिन्हें “वात्सल्यं” गुण के बारें में पता नहीं होता हैं वह यह समझते हैं कि भगवान जो दोषी होते हैं उनके प्रति घृणा भावना रखते हैं। अरुळाळ पेरुमळ एम्बेरुमानार् स्वामीजी बहुत ही विस्मय से यह पूछते हैं की पहले तो क्या कोई ऐसा मौजूद हैं जिसे उसके(भगवान) के वात्सल्य के बारे मैं न पता हो ? “वात्सल्यं” गुण के स्वभाव को एक उदाहरण के जरिए समझाया गया हैं। एक गाय कभी भी मैला घास का सेवन नहीं करती हैं यानि वह घास जिसे किसीने कुचला हो। परन्तु जब उसने एक बछड़े को जन्म दिया हो तब वह अपने बछड़े के शरीर में सब मैला चाट डालती हैं और मजेसे चाटती हैं। जैसे सब कहते हैं “इंरा पोझुदिन पेरिढुवक्कुम” एक गाय माता अपने बछड़े पर पूर्ण प्रेम बरसाती हैं उसी तरह भगवान भी अपने भक्तों के अनगिनत दोषों को खुशी कि वस्तु कि तरह समझते हैं। जैसे एक गाय अपने बछड़े पर घृणा नहीं करती हैं वैसे ही वह कभी भी उन पर घृणा नहीं करेंगे। जब भी हमारे पूर्वाचार्य भगवान के इस गुण के बारें में बात करते हैं वह यह गाय का उदाहरण के बारें में बात करते हैं। “वात्सल्यं” बछड़े कि तरह हैं और जैसे पहिले देखा गया हैं उस गाय का उसके प्रति प्रेम को “वात्सल्यं” जानते हैं। यह गुण केवल भगवान में देखा जा सकता हैं और किसी में नहीं। इसलिए यह गुण को भगवान का ऐसा कहा जाता हैं। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी इस गुण से बहुत प्रभावित हुए इसलिए उन्होंने “एर्रे” यानि चिल्लाहट का प्रयोग किया।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २४

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २३                                                      ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २५

पासुर – २४

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वण्डु पडि तुलब मार्बीनिडैच् सेय्द पिलै
उण्डु पल एन्रु उलम तलरेल – तोण्डर सेयुम
पल्लायिरम पिलैगल पार्त्तिरुन्दुम काणुम कण
इल्लादवन काण इरै

सार :

जब शास्त्र कर्मों के प्रकार के बारें में बातें करता हैं तो वह उसे तीन अलग श्रेणी में बाटता हैं। पूर्व कर्म, वर्तमान कर्म और भविष्यत कर्म। २३वें पाशुर में स्वामीजी देवराज मुनि ने पूर्व कर्मों के उपर केंद्रीत किया था। हालाकि इस पाशुर में वह वर्तमान कर्मों के बारें में बात कर रहे हैं।क्योकिं  हृदय को बहुत से कर्म करने के कारण बहुत दु:ख हैं इसीलिए वह सान्तवना देते हैं। वह और भी एक बात कहते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण जो उनके सच्चे भक्त बिना उनके विवेक के पालन करेंगे ऐसे कर्मों का खयाल नहीं करेंगे । भगवान उन कर्मों को देखेंगे लेकिन उसे ऐसे अंदेखा कर देंगे कि उन्होंने कुछ देखा ही नहीं हैं।

शब्दशः अर्थ :

वण्डु पडि तुलब मार्बीनिडै– कर्म जो हम भगवान के विरुद्ध करते हैं जिनके वक्षस्थल पर तुलसी (तिरुतुळाय्) की पुष्प माला हैं जो पूरी तरह कलियों से घीरा हैं, और जो मधु मख्खीयों से भरा हैं

चसेय्द पिलै उण्डु पल एन्रु उलम तलरेल – वह अनगिनत हैं जिससे हम डर भी सकते हैं परन्तु डरना नहीं है |

तोण्डर सेयुम पल्लायिरम पिलैगल पार्त्तिरुन्दुम – क्योंकि भगवान श्रीमन्नारायण ऐसे कौन से  भी कर्मों पर ध्यान नहीं देते हैं जो उनके सच्चे भक्त जन बिना ज्ञानता(अनजाने में) के करते हैं।

 काणुम कण इल्लादवन काण इरै – और ध्यान  भी  नहीं  देते  हैं जैसे  कि उन्होंने  कुछ  देखा ही नहीं जैसे कि एक अन्धा जिसे कुछ नहीं दिखाता।

वण्डु पडि तुलब मार्बीनिडैच् सेय्द पिलै: बुरे कर्म जो भागवान श्रीमन्नारायण कि और किया गया हैं जिन्होंने सुन्दर तुलसी (तिरुतुळाय्) की माला धारण कि हैं जो अनगिनत मख्खीयों को आकर्षित करती हैं और उसमें जो अमृत हैं वों पीने आते हैं। यहा हमारे मन में एक प्रश्न आता हैं कि क्यों स्वामी देवराज मुनि ने भागवान श्रीमन्नारायण को एक सुन्दर तुलसी की माला के साथ समझाया हैं। इसका कारण यह हैं कि भगवान हमेशा अपने आपको उस तरह सुन्दर बताते हैं जो उनके चरणों के शरण हुवें हैं। वें सब उनकी सुन्दरता में हमेशा के लिए डुब जाना चाहते हैं। एक बार वें सब भगवान शरण में हो गये फिर वें कभी भी वह कुछ भी नहीं करेंगे जो हम सोचे कि “बुरा” हैं। अगर उन्होंने उसे अनजाने में भी किया हो तो भी भगवान उसे नजर अंदाज कर देंगे। भगवान चाहते हैं कि एक बार हम उनकी शरण में हो गये उसके बाद हम उनकी सुंदरता का आनन्द ले। यह तथ्य समझाने के लिए ही भगवान अपने आप तुलसी की माला को सुन्दरता से धारण करते हैं।

उण्डु पल एन्रु  कोई भी भागवान श्रीमन्नारायण के पूरी तरह शरण हुआ हो, क्योंकि उसका शरीर पाँच इंद्रीयों द्वारा पूरी तरह नियंत्रण किया गया हैं उसे गलतीया करने का बहुत ज्यादा अवसर हैं। तिरुकुरल में कहा गया हैं कि “उरण एंड्रूम टोटियाल ओर ऐंधूम काप्पाण”। यह एक तुलना हैं जहाँ पाँच इंद्रियाँ को एक हाथी से और मन को नियंत्रण करनेवाली छड़ी से तुलना कि गयी हैं। इंद्रियों को नियंत्रण में करना बहुत कठीन हैं। आल्वार श्रीपरकाल स्वामीजी कहते हैं, “ऐवर अरुथु ठिंदृदा अंजी निं अंदैंधेन”। श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं, “उण्णिलाविय ऐवराल कुमैथ्ल्तृ”। क्योंकि यह इंद्रिया इस शरीर से जुडी हुई हैं इसिलीए शरणागति होने के पश्चात हम यह समझ सकते हैं कि किसी एक को गलति करने के लिए  इन पाँच इंद्रियों से अनगिनत मौके मिल सकते है। जब यह होता हैं तब उस व्यक्ति का मन उन गंभीर गलतीयों  के लिए जो उसने कि हैं कांपने लगाता हैं ।

उलम तलरेल:  इस तरह के मन के लिए यह पद इस तरह सान्त्वना देता हैं “हैं मन! चिंता मत करो ना ही कांपना!!! तमिल व्याकरण के अनुसार “उलम” शब्द “उल्लामे” का भाषान्तर हैं “मकरा लृ विलि वेतृमै” ।

तोण्डर सेयुम: तोण्डर भागवान श्रीमन्नारायण के भक्तों को संबोधित करता हैं। यहाँ इसका एक और भी मतलब हैं कि जो इंद्रियों के नियंत्रण और बंदुक कि नोक पर हैं और वह जो अब भी भागवान श्रीमन्नारायण के चरणों के शरण हैं। एक मतलब यह भी हैं कि वह जो भागवान श्रीमन्नारायण का दास हैं। अत: “तोण्डर सेयुम” पद उन सब भगवान श्रीमन्नारायण के भक्तों को संबोधित करता हैं जो अपने आप को भागवान श्रीमन्नारायण के ही दास समझते हैं।

पल्लायिरम पिलैगल:  इसका मतलब “अनगिनत गलतियाँ” हैं। अगर हमें यह गलतियाँ का कारण पहचानना हैं तो हम यह देख सकते हैं कि वह इस शरीर के कारण से हैं जो तीन प्रकार के गुणों से बाध्य हैं “सत्व गुण”, “रजो गुण” और “तमो गुण”।  यह तीन गुण मनुष्य में पवित्रता, ग़ुस्सा/क्रियाशीलता और निद्रा गुण बताता हैं। अविवेकता के कारण मनुष्य इसके प्रभाव और मेलजोल के वजह से रोजाना अनगिनत गलतियाँ करता हैं। “पिझै” का मतलब “पाप” या गलति हैं। अगर कोई व्यक्ति एक क्षण में कोई गलती करता हैं तो उस पाप को मिटाने के लिए हजारों और हजारों ब्रह्म वर्ष लग जाते हैं। यह जानना बहुत जरूरी है एक ब्रह्म वर्ष यानि मनुष्यों के अनेक महासंख वर्ष। अत: हम यह देख सकते हैं कि हमारे एक छोटी सी गलती का परिणाम मिटाना लगभग नामुमकिन हैं । जो कुछ गलतियाँ यहा बताई गयी हैं, वह कार्य करना जिसको शास्त्र ने  दोषयुक्त बताया है जैसे की, दूसरों को तकलीफ देना, दूसरों कि बढ़ाई करना, परस्त्री कि चाहना करना, दूसरों के धन की चाहना करना, झूठ बोलना और वह खाना जो हमारे लिए निषेध हैं। दूसरे वर्ग कि गलतियाँ जो नहीं करना हैं जिसे शास्त्र में बताया हैं, वह हैं भगवत अपचार करना यानि भगवान श्रीमन्नारायण की अन्य देवी-देवताओं के साथ तुलना करना, भगवान के अवतारों में दोष देखना, भगवान का विग्रह किस धातु से बना हैं इसकी खोज करना, अधुरी पुजा, पुजा के पात्र चुराना, जो चोरी कर रहा हैं उसकी मदद करना, चुराई हुई वस्तु को माँग कर या धमका कर लेना, आदि। अगर कोई भागवत अपचार करता हैं तो वह भी गलतीयों में गिना जायेगा।

 इरै पार्त्तिरुन्दुम काणुम कण:  भागवान श्रीमन्नारायण वह हैं जो सब में हैं और जो कुछ भी हो रहा हैं वह सब कुछ जानते भी हैं। ऐसे भागवान श्रीमन्नारायण हैं जो अपने सच्चे भक्तों के उनकी पूर्णता शरणागति होने पर उनके अनगिनत दोषों को नहीं देखते हैं जो उन्होंने किया हैं, वह ऐसे रहते हैं जैसे कि उन्होंने कुछ देखा ही नहीं। यहाँ “कण” का मतलब ज्ञान हैं।

इल्लादवन काण : जैसे हमने पहिले देखा कि “कण” का मतलब ज्ञान हैं और यहां इसका मतलब “वह जिसको कोई ज्ञान नहीं हैं”। इसलिए भागवान श्रीमन्नारायण अपने भक्तों के ज्ञान के बारें में सतर्क रहते हैं। पिछले प्रकरण में “इरै” का मतलब “एक छोटी संख्या” भी हैं। इससे यह पता चलता हैं कि भगवान अपने भक्तों कि गलतियाँ के उपर थोड़ा सा भी ध्यान नहीं देते हैं। वह उनकी गलतियों को पूरी तरह नजर अंदाज़ कर देते हैं। यह विष्णु सहस्त्र नाम स्तोत्र में इस श्लोक में समझाया गया हैं “अविज्ञात”। इस पासुर का अर्थ है कि हमें शरणागति ग्रहण करने के बाद डरने कि कोई भी जरूरत नहीं है | भगवान् श्रीमन्नारायण इन गलतियों / कार्यों पर अनभिज्ञता नहीं दिकायेंगे अर्थात् इन पर ज्यादा ध्यान नहीं देंगे

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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