Category Archives: ashta SlOkI

अष्ट श्लोकी – श्लोक 7 – 8- चरम श्लोक

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

अष्ट श्लोकी

<< श्लोक 5 – 6 – द्वयमंत्र

githai-karappangadu-wrapperअंतिम 2 श्लोक, चरम श्लोक का वर्णन करते है, जो भगवान द्वारा कहा गया है ।

श्लोक 7

मत्प्राप्यर्थतया मयोक्तमखिलम संत्यज्य धर्मं पुन :
मामेकं मदवाप्तये शरनमित्यार्तोवसायम कुरु ।
त्वामेवम व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णोह्यहं
मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितम कुर्यां शुचं मा कृतः ।।

अर्थ

मेरी प्राप्ति हेतु, मेरे कहे अनुसार अन्य सभी उपाय (कर्म, भक्ति ,ज्ञान योग) को छोड़कर, केवल मेरी शरण को ही अपना उपाय मानकर, निश्चिन्त होकर, दृढ़ विश्वासित रहो। इस दृढ़ विश्वास के रहने पर, मैं, अपने ज्ञान एवं कल्याण गुणों के द्वारा, इस मार्ग में उत्पन्न होने वाले सभी विरोधि तत्वों से तुम्हें मुक्त करूँगा और मोक्ष प्रदान करूँगा।

श्लोक 8

निश्चित्य त्वदधीनतां मयी सदा कर्माध्युपायान् हरे
कर्तुमं त्यक्तुमपि प्रपत्तुमनलम सिद्धामी दुःखाकुल:।
एतज्ज्ञानमुपेयुषो मम् पुनस्सर्वापराधक्षयम्
कर्तासीति दृदोस्मि ते तु चरमं वाक्यं स्मरन् सारथे: ।।

अर्थ

हे प्रभु! मैं अपने कर्मों को न उत्तम प्रकार से निभा पाने में समर्थ हूँ, न ही उन्हें त्यागकर आपकी शुद्ध शरणागति करने में समर्थ हूँ। मैं इस शोक से अत्यंत दुखी हूँ। क्यूंकि आपने अपनी कृपा से मुझे यह भाव और ज्ञान प्रदान किया है तों में आश्वस्त हूँ कि आप चरम श्लोक में कहे अनुसार ही आप मेरे अज्ञान, दोष और अन्य बाधाओं को हटाकर मेरी रक्षा करेंगे और मुझे अपनाएंगे।

अष्ट श्लोकी यहाँ संपन्न होती है।

श्रीआलवारों के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीआलवन्दार के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ
श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – श्लोक 5 – 6 – द्वयमंत्र

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

अष्टश्लोकी

<< श्लोक 1- 4 – तिरुमंत्र

vishnu-lakshmi

श्लोक 5

नेतृत्वं नित्ययोगं समुचितगुणजातं तनुख्यापनम् च उपायं
कर्तव्यभागं त्वत् मिथुनपरम् प्राप्यमेवम् प्रसिद्धं ।
स्वामित्वं प्रार्थनां च प्रबलतरविरोधिप्रहाणम दशैतान
मंतारम त्रायते चेत्यधिगति निगम: षट्पदोयम् द्विखण्ड: ।।

अर्थ

यह श्लोक, मंत्रो में रत्न, द्वय महामंत्र का विवरण प्रदान करता है। द्वय के दो अंग और छः शब्द है। इसमें दस अर्थ निहित हैं। १) जीवात्मा को भगवान द्वारा निर्धारित मार्ग में प्रशस्त करना २) भगवान और श्रीमहालक्ष्मी से नित्य मिलन की स्थिति ३) दिव्य गुण समूह, जो केवल परमात्मा के ही अनुकूल है ४) ईश्वर का अत्यन्त सुन्दर स्वरूप ५) उपाय स्वरुप अर्थात परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ६) चेतन/ जीवात्मा के कर्त्तव्य ७) श्रीमहालक्ष्मी संग उपस्थित भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति कैंकर्य ८) अत्यंत सुंदर संबंध, जो सत्य है ९) उनके कैंकर्य की प्रार्थना १०) कैंकर्य के विघ्न, बाधाओं से मुक्ति। वैदिक शास्त्र में निपुण लोगों का मानना है कि द्वय मन्त्र के इन अर्थो का निरंतर ध्यान करने से प्रपन्न की रक्षा होती है।

श्लोक 6

इशानाम् जगथामधीशदयिताम नित्यानपायां श्रियं
संश्रित्ठयाश्रयणोचित अखिलगुणस्याङ्ग्रि हरेराश्रये ।
इष्टोपायतया श्रियाच सहितायात्मेश्वरायार्थये
कर्तुं दास्यमसेशमप्रतिहतम नित्यं त्वहं निर्मम: ।।

अर्थ

इस श्लोक में, श्री लक्ष्मीजी के माध्यम से भगवान का कैंकर्य प्राप्त करने की प्रार्थना की गयी है। मैं इस ब्रह्माण के स्वामी के चरणों में श्रीमहालक्ष्मीजी के माध्यम से आश्रय लेता हूँ, जो उन स्वामी से सम्पूर्ण रूप से प्रीति करती है। मेरे आश्रय को स्वीकार करने के वाले वे सभी गुणों से संपन्न है और मेरे मोक्ष, जो उनके द्वारा ही प्रदत्त है, के लिए मेरे एकमात्र साधन है।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – श्लोक 1 – 4 – तिरुमंत्र

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

अष्टश्लोकी

<< तनियन

nara-narayananनारायण ऋषि , नर ऋषि को तिरुमंत्र का उपदेश प्रदान करते हुए (दोनों ही श्रीमन्नारायण भगवान के अवतार है)

श्लोक 1

अकारार्थो विष्णुः जगदुध्यरक्षा प्रळयकृत
मकारार्थो जीव: तदुपकरणम् वैष्णवमिदम ।
उकारो अनन्यार्हम नियमयति संबंधमनयो:
त्रयी सारस्त्रयात्मा प्रणव इमामर्थम् समधिष्ठ ।।

अर्थ

सृष्टी, स्थिति एवं संहार, तीनों करने वाले साक्षात भगवान विष्णु ही तिरुमंत्र में “अ” अक्षर का अर्थ है। “म” अक्षर चेतनो को,जीवों को दर्शाता है, जिनके अनुभव के लिए सारी सृष्टि उपकरण हैं। अक्षर “उ”, इन दोनों के मध्य के विशेष संबंध को प्रस्तुत करता है, जो किसी भी अन्य के समान नहीं है। इसप्रकार, ॐ शब्द, जो प्रणव है, सभी वेदों के सार को स्थापित करता है।

श्लोक 2

मन्त्रब्रह्मणि मध्यमेन नमसा पुंस स्वरूपं गति:
गम्यम् शिक्षितमीक्षितेन परत: पश्चादपि स्थानत:।
स्वातंत्र्यम् निजरक्षणम् च समुचिता वृत्तिश्च नांयोचित
तस्यैवेति हरेर्विवीच्य कथितं स्वस्यापि नारहं तत : ।।

अर्थ

तिरुमंत्र के मध्य में उपस्थित “नम:” शब्द द्वारा जीव की गति, उस गति का साधन तथा जीव का स्वरूप, इन त्रय विषयों को दर्शाया गया है। स्वतंत्रता, स्वरक्षण, और भगवान के अलावा अन्यों से अनुकूलता न रखना, उपरोक्त बताये स्वरुप गुणों को प्रकट करते हुए जोर देता है कि भगवान के शेषभूत होते हुए भी, जीवात्मा को इस आनंद अनुभव का कोई भान नहीं है।

श्लोक 3

अकारार्थायैव सवमहमथ मह्यं न निवहा:
नराणाम् नित्यानामयनमिति नारायणपदम् ।
यमाहास्मै कालम सकलमपि सर्वत्र सकलासु
अवस्थास्वावि:स्युः मम् सहज कैंकर्यविधय: ।।

अर्थ

मैं भगवान का हूँ, अपना नहीं हूँ। “नारायण” शब्द दर्शाता है कि जीवात्माओं एवं क्षर विषय सारों के लिए मात्र भगवान ही परम गति है। भगवान के प्रति कैंकर्य जीवात्मा का नैसर्गिक स्वभाव है। वह यह भी समझाता है कि हर काल, हर अवस्था में उनका कैंकर्य करना ही स्वभाव है।

श्लोक 4

देहासक्तात्मबुद्धिर्यदि भवति पदम् साधु विद्यात्तृतीयं  
स्वातंत्र्यान्धो यदिस्यात् प्रथममित्रश्शेषत्वधिश्चेत द्वितीयं ।
आत्मत्रहाणोन्मुखस्चेन्नम इति च पदम् बांधवाभासलोल:
शब्दं नारायणाख्यम् विषयचपलधीश्चेत चतुर्थीम प्रपन्न: ।।

अर्थ

इस श्लोक में प्रपत्ति मार्ग को अपनाने वाले, भगवान के शरणागत मुमुक्षुओं, जिन्होंने अपने मोक्ष के उपाय स्वरुप भगवान को अपना सम्पूर्ण आश्रय स्वीकार किया है, उनकी शंकाओं के निवारण के लिए कुछ स्पष्टीकरण प्रदान किये गए है। जब भी देह और आत्मा के भेद के विषय में शंका उत्पन्न हो, तब तृतीय अक्षर “म” की ओर देखकर उस शंका का निवारण करना चाहिए। उसके द्वारा यह समझा जा सकता है कि निंद्रा अथवा म्रत्यु के समय देह का बोध नहीं रहता है, देह आत्मा से भिन्न है। इसलिए वह ज्ञान का आधार नहीं है। एक बार यह ज्ञात होने पर कि देह नहीं अपितु आत्मा ही ज्ञान का आधार है, वह इस तत्व को भी जान सकता है कि आत्मा स्वयं स्वतंत्र नहीं है अपितु भगवान द्वारा पोषित है, जैसा “अ” अक्षर द्वारा प्रकटित है। एक बार यह ज्ञात होने पर कि आत्मा, भगवान नारायण की संपत्ति है, वह यह भी जान जायेगा की द्वितीय अक्षर “उ” भी यही दर्शाता है कि जीवात्मा मात्र उनकी ही दास है। जब स्वयं के रक्षण की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, तब “नमः” पद के अर्थों को देखना चाहिए, जिसका अर्थ है “मेरा नहीं”। लौकिक संबंधों के प्रति उत्पन्न भ्रम की स्थिति में उसके द्वारा समझा जा सकता है कि यह सभी संबंध क्षणिक और अनित्य है और केवल भगवान के साथ संबंध ही नित्य है। जब सांसारिक मोह उत्पन्न हो, तब वह चतुर्थ अक्षर “आय” का ध्यान कर, भगवान के प्रति कैंकर्य ही जीवात्मा का स्वरुप है, उसका स्मरण करके सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – तनियन

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:

अष्टश्लोकी

azhwan-bhattar-srirangamश्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीपराशर भट्टर – श्रीरंगम

श्री पराशर भट्टार्य श्रीरंगेश पुरोहित: ।
श्रीवत्सांग सुत : श्रीमान् श्रेयसे मेस्तु भुयसे ।।

श्री रंगनाथ भगवान के पुरोहित और श्रीवत्सांग (श्रीकुरेश स्वामीजी) के पुत्र, श्रीपराशर भट्टर जो दिव्य गुण संपत्ति से परिपूर्ण है, वे मुझे श्रेय प्रदान करे।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:

namperumal-nachiar_serthi2

parasara-bhattarश्रीपराशर भट्टर

रहस्य त्रय के गहरे अर्थों को प्रकाशित करने के लिए श्री पराशर भट्टर ने अत्यंत कृपापूर्वक अष्ट श्लोकी नामक स्तोत्रमाला की संस्कृत में रचना की। यह रहस्य त्रय को विस्तृत रूप से प्रस्तुत करने वाला पहला प्रबंध है।

न्याय वेदांत विद्वान् दामल वंकीपुरम श्री उ. वे. पार्थसारथि स्वामी ने सरल तमिळ में इस प्रबंध का अनुवाद किया है। हम उस के हिन्दी अनुवाद को यहाँ देखते है।

इन आठ श्लोकों के अलावा इस पबंध के रचयिता श्रीपराशर भट्टर के यश को स्थापित करती वंदन तनियन भी प्रस्तुत है।

इस प्रबंध को आगे निम्न अनुच्छेदों में देखेंगे।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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ashta SlOkI – SlOkams 7 – 8 – charama SlOkam

SrI:
SrImathE SatakOpAya nama:
SrImathE rAmAnujAya nama:
SrImath varavaramunayE nama:

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githai-karappangadu-wrapper

The last two stanzas are the details of the charama SlOka, uttered by the Lord.

SlOkam 7

mathprApthyarthathayA mayOkthamakhilam samthyajya dharmam puna:
mAmEkam madhavApthayE SaraNamithyArtOvasAyam kuru |
thvAmEvam vyavasAyayukthamakhilagyAnAdhipUrNOhyaham
mathprApthiprathibandhakair virahitham kuryAm Sucham mA kruthA: ||

Meaning

To attain me, give up all the means I had stated and surrender unto me as the only safe refuge, Be confident with heavy heart. When you have such firm faith, I with all my knowledge and auspicious qualities, shall bail you out of all the obstacles so that you attain me.

 

SlOkam 8

niSchithya thvadhadhInathAm mayi sadhA karmAdhyupAyAn harE
karthum thyakthumapi prapaththumanalam SIdhAmi dhu:kAkula: |
EtajgyAnamupEyuShO mama punassarvAparAdhakshayam
karthAsIthi drudhOsmi thE thu charamam vAkyam smaran sArathE: ||

Meaning

O Lord! I am unable either to perform my actions within my reach or give up them with absolute unshakable faith in you. I am depressed with sorrow. As You gave me this much of feeling and wisdom I am confident that as stated by you in your charama SlOka, You shall remove all my ignorance, shortcomings, and obstacles and save me in your fold.

ashta SlOkI completed.

AzhwAr thiruvadigaLE SaraNam
emperumAnAr thiruvadigaLE SaraNam
bhattar thiruvadigaLE SaraNam
jIyar thiruvadigaLE SaraNam

adiyEn satakOpa rAmAnuja dhAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/01/ashta-sloki-tamil-slokams-7-8/

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ashta SlOkI – SlOkams 5 – 6 – dhvayam

SrI:
SrImathE SatakOpAya nama:
SrImathE rAmAnujAya nama:
SrImath varavaramunayE nama:

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vishnu-lakshmi

SlOkam 5

nEthruthvam nithyayOgam samuchitaguNajAtham thanukyApanam cha upAyam
karthavyabhAgam thvatha mithunaparam prApyamEvam prasidhdham |
svAmithvam prArthanAm cha prabalatharavirOdhiprahANam daSaithAn
manthAram thrAyatE chEthyadhigatha nigama:shatpadhOyam dhvikaNda: ||

Meaning

This SlOka details dhvayam, the manthra rathna – jewel among manthras. dhvayam has two parts and six words. (1) ability to conduct the human soul in His vision (2) inseparable togetherness with Mother SrI mahAlakshmi (3) endearing qualities ideal for the Supreme Soul (4) very graceful appearance (5) upAyam, being the means to attain Him (6) duties to be discharged by the soul (7) service in the auspicious togetherness of the Lord and His divine consort SrI mahAlakshmi (8) the most pleasing relationship which is rightful (9) prayer for service unto Him (10) relief from the obstacles to the service unto Him. People well versed in the vaidhika scriptures say that thinking constantly the ten meanings of the manthra protects the devotee.

SlOkam 6

ISAnAm jagathAmadhISadhayithAm nithyAnapAyAm Sriyam
samSrityASrayaNOchithAkhila guNasyAnggrI harErASrayE |
ishtOpAyathayA SriyAcha sahithAyAthmESvarAyArthayE
karthum dhAsyamaSEshamaprathihatham nithyam thvaham nirmama: ||

Meaning

This conveys the prayer for Service unto Him, through pirAtti. I surrender to the feet of the Lord who ordains the whole universe, through Her who has the love of the Lord in full measure, Herself indestructible, He has all the qualities to take up my surrender and He is the means for my liberation to be granted by Him only.

adiyEn satakOpa rAmAnuja dhAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/01/ashta-sloki-tamil-slokams-5-6/

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அஷ்ட ச்லோகீ – ச்லோகங்கள் 7 – 8 – சரம ச்லோகம்

ஸ்ரீ:
ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம:
ஸ்ரீமதே ராமாநுஜாய நம:
ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

அஷ்ட ச்லோகீ

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இனி இரண்டு ச்லோகங்கள் சரம ச்லோக விவரணம்.

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ச்லோகம் 7

மத் ப்ராப்த்யர்த்த தயா மயோக்தமகிலம் ஸந்த்யஜ்ய தர்மம் புன:
மாமேகம் மதவாப்தயே சரணமித்யார்த்தோவசாயம் குரு |
த்வாமேவம் வ்யவஸாய யுக்தமகிலம் ஞாநாதி பூர்ணோஹ்யஹம்
மத்ப்ராப்தி ப்ரதிபந்தகம் விரஹிதம் குர்யாம்சுசம் மாக்ருதா: ||

பொருள்

என்னை அடைவதற்குறுப்பாக நான் கூறின எல்லா உபாயங்களையும் விட்டு என்னை அடைய என்னையே ரக்ஷகமாக அடைவாய். மிக துக்கத்துடன் நிச்சயித்திரு. இப்படிப்பட்ட நிச்சயத்தை உடைய உன்னை, எல்லா வகையான ஞானம் முதலிய குணங்கள் நிறைந்த நான், என்னை அடைவதற்குத் தடையாக உள்ளவைகளிலிருந்து உன்னை விடுதலை அடையச் செய்வேனாக. நீ சோகிக்க வேண்டா.

ச்லோகம் 8

நிஸ்சித்ய த்வததீநதாம் மயி ஸதா கர்மாத்யுபாயான் ஹரே:
கர்த்தும் த்யக்துமபி ப்ரபத்துமநலம் ஸீதாமி து:காகுல: |
ஏதத் ஞாநமுபேயுஷோ மம புனஸ் ஸர்வாபராதக்ஷயம்
கர்த்தா ஸீதி த்ருடோஸ்மி தே து சரமம் வாக்யம் ஸ்மரன் ஸாரதே! ||

பொருள்

என்னிடம் உள்ள கர்மம் முதலிய உபாயங்களை எப்போதும் உன் அதீநமாகவே நிச்சயித்து, எம்பெருமானே! கர்மங்களைச் செய்யவும், விடவும் அல்லது சரணாகதி செய்வதற்கும் திறமையற்றவனாக வருந்துகிறேன். மிக வருத்தத்தால் கலங்குகிறேன். இந்த அறிவை அடைந்துள்ள எனக்கு உள்ள எல்லா வகையான குற்றங்களையும் அழித்து ரக்ஷிக்கக் கடவாய் என்பதை உனது கடைசியான வார்த்தையைக் கேட்டுத் தெளிகிறேன்.

அஷ்ட ச்லோகீ ஸம்பூர்ணம்.

ஆழ்வார் திருவடிகளே சரணம்
எம்பெருமானார் திருவடிகளே சரணம்
பட்டர் திருவடிகளே சரணம்
ஜீயர் திருவடிகளே சரணம்

வலைத்தளம் –  http://divyaprabandham.koyil.org

ப்ரமேயம் (குறிக்கோள்) – http://koyil.org
ப்ரமாணம் (க்ரந்தங்கள்) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
ப்ரமாதா (ஆசார்யர்கள்) – http://acharyas.koyil.org
ஸ்ரீவைஷ்ணவக் கல்வி வலைத்தளம் – http://pillai.koyil.org

அஷ்ட ச்லோகீ – ச்லோகங்கள் 5 – 6 – த்வயம்

ஸ்ரீ:
ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம:
ஸ்ரீமதே ராமாநுஜாய நம:
ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

அஷ்ட ச்லோகீ

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vishnu-lakshmi

ச்லோகம் 5

நேத்ருத்வம் நித்யயோகம் ஸமுசித குண ஜாதம் தநுக்யாபநம் ச உபாயம்
கர்த்தவ்ய பாகம் து அத மிதுநபரம் ப்ராப்யமேவம் ப்ரஸித்தம் |
ஸ்வாமித்வம் ப்ரார்த்தநாஞ்ச ப்ரபலதர விரோதிப்ரஹாணம்
தசைதான் மந்தாரம் த்ராயதே சேத்யதிகத நிகம: ஷட்பதோயம் த்விகண்ட: ||

பொருள்

இந்த ச்லோகம் மந்த்ர ரத்னமான த்வயத்தை விவரிக்கிறது. த்வயம் என்பது இரு கண்டங்களும் ஆறு பதங்களும் கொண்டு அமைந்தது. பத்துப் பொருளை உட்கொண்டிருக்கிறது: (1) சேதனனைத் தன் வயமாக நடத்தும் திறமை (2) பிராட்டியோடு பிரிக்க முடியாத நிலை (3) ஈச்வரத் தன்மைக்கேற்ற இனிய குண ஸமூஹம் (4) அழகிய திருமேனி (5) உபாயம் (6) சேதனன் செய்ய வேண்டிய கடமை (7) இருவருமான சேர்த்தியில் கைங்கர்யம் என்னும் பலன் (8) உரிமை என்னும் ஸம்பந்தம் (9) கைங்கர்ய ப்ரார்த்தனை (10) கைங்கர்யத்துக்கு இடையூறாக உள்ளவைகளிலிருந்து விடுதலை – ஆகிய இந்தப் பத்துப் பொருள்களையும் இடைவிடாது நினைப்பவனை ரக்ஷிக்கிறது என்னும் இதை வேதத்தை அறிந்தவர்கள் கூறுகிறார்கள்.

 

ச்லோகம் 6

ஈசாநாம் ஜகதாம் அதீச தயிதாம் நித்யாநபாயாம் ச்ரியம்
ஸம்ஸ்ரீத்யாச்ரயணோசிதாகில குணஸ்யாங்க்ரீர் ஹரேராச்ரயே |
இஷ்டோபாயதயா ச்ரியாச ஸஹிதாயாத்மேஸ்வராயார்த்தயே
கர்த்தும் தாஸ்யம் அசேஷமப்ரதிஹதம் நித்யம் த்வஹம் நிர்மம: ||

பொருள்

பிராட்டியை முன்னிட்டு எம்பெருமானிடத்தில் கைங்கர்ய ப்ரார்த்தனையைத் தெரிவிக்கிறது. உலகத்தை நியமிப்பவனாம் எம்பெருமானுடைய அன்பைப் பெற்றவளும் என்றைக்கும் அழிவில்லாதவளுமான பிராட்டியை முன்பு ஆச்ரயித்து ஆச்ரயணத்துக்குத் தேவையான எல்லாக் குணங்களையும் பெற்றிருக்கும் எம்பெருமானுடைய திருவடிகளை நான் பற்றுகிறேன். எனக்கு இஷ்டமான மோக்ஷத்துக்கு உபாயமாகப் பற்றுகிறேன். பிராட்டியுடன் கூடியவனும் சேதனங்களுக்கு நியாமகனுமான எம்பெருமானை உத்தேசித்தே நித்தியமான எல்லா விதமான கைங்கர்யத்தைச் செய்யவும் அடியேனுக்குக் கைங்கர்ய பலத்தில் ஸம்பந்தம் இராமலும் தடையின்றிச் செய்ய வேண்டும் எனப் ப்ரார்த்திக்கிறேன்.

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ashta SlOkI – SlOkams 1 – 4 – thirumanthram

SrI:
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SrImath varavaramunayE nama:

Full Series

<< thaniyan

nara-narayanannArAyaNa rishi instructing thirumanthram to nara rishi (both are incarnations of SrIman nArAyaNan)

SlOkam 1

akArArthO viShNu: jagadhudhayarakShA praLayakruth
makarArthO jIva: thadhupakaraNam vaiShNavamidham |
ukArO ananyArham niyamayathi sambandhamanayO:
thrayI sArasthrayAthmA praNava imamartham samadhishath ||

Meaning

vishNu who performs all the three acts of creation, preservation and destruction, is Himself the meaning of the letter “a”; “ma” stands to mean the animate life, jIva for whose enjoyment/experience the whole hemisphere is an instrument; the letter “u” establishes a special relationship between these two which is not congruent to anybody else. Thus, the single word, aum, i.e., praNava, gives this meaning which is the essence of all the vEdhas.

SlOkam 2

manthrabrahmaNi madhyamEna namasA pumsa: svarUpam gathi:
gamyam SikshithamIkshithEna puratha: paschAdhapi sthAnatha: |
svAthanthryam nijarakshaNam samuchithA vruththischa nAnyOchithA
thasyaivEthi harErvivichya kathitham svasyApi nArham thatha: ||

Meaning

By the central word of ‘nama:’, man’s end, means for that end and his personality, all these three subjects are indicated. Independence, self protection, and certainly no subjugation to anybody other than Him as these are His personality are hinted by stressing that even while at His disposal the individual soul has no conscious experience of the bliss.

SlOkam 3

akArArthAyaiva svamahamatha mahyam na nivahA:
narANAm nithyAnAmayanamithi nArAyaNapadham |
yamAhAsmai kAlam sakalamapi sarvathra sakalASu
avasthAsvAvi:syu: mama sahaja kainkaryavidhaya: ||

Meaning

I belong to the Lord. So I do not belong to myself. The word ‘nArAyaNa’ stresses that for all the souls and transient perishable things, the ultimate destination is the Lord. Service unto Him is inborn. It also emphasizes service unto Him in all times and circumstances.

SlOkam 4

dhEhAsakthAtmabudhdhiryadhi bhavathi padham sAdhu vidhyAthruthIyam
svAtanthryAndhO yadhi syAth prathamamitharaSEshathvadhIshchEdhvithIyam |
AthmatrhANOn mukhashchEnnama ithi cha padham bAndhavAbhAsalOla:
Sabdham nArAyaNAkhyam vishayachapaladhISchEdh chathurthIm prapanna: ||

Meaning

In this SlOka certain explanations are offered to the person who has adopted prapaththi, absolute surrender to Him as means for realization, for the frequent doubts occurring in the mind. When a doubt arises about the difference between the identity of body and soul, he should watch closely the 3rd letter ‘ma’ and get clarity. He can realize that as the body is non-knowing object during sleep and/or death, it is different from the soul. So it is not the base for knowledge. Once he knows the body is not the base for knowledge, and the soul is, he can gain insight into the fact that the soul is not independent on its own but sustained by the Lord by looking at the first letter ‘a’. Once he realizes the soul belongs to nArAyaNa, he shall know that the second letter ‘u’ indicates it belongs to none else but only to Him. When the tendency for protecting self arises, he shall look for the meaning of ‘nama:’ which means ‘not mine’. When illusion occurs about relationships with people he shall realize these relationships are transient, but His is permanent. When temptations stir he shall look at the fourth clause, ‘Aya’ and remember service unto Him is his personality/identity, and thus rid himself of worldly bonds/petty desires.

adiyEn satakOpa rAmAnuja dhAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/01/ashta-sloki-tamil-slokams-1-4/

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