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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४०

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३९ 

पाशुर ४०:

Arjuna_meets_Krishna_at_Prabhasakshetra

अल्लि मलर पावैक्कन्बर अडिक्कन्बर
सोल्लुम अविडु सुरुदियाम नल्ल
पड़ियाम मनु नूर कवर सरिदै पार्वै
सेडियार विनैत तोगैक्कुत ती

प्रस्तावना:

“आचार्य भक्ति” और “भक्तों के भक्त” के विचार को पिछले कई पाशुरों में विस्तार से बताया गया है। इसके बावजूद भागवतों का महत्त्व और गंभीरता सांसारिक लोगों को बल देकर समझाना होगा। यह भागवत जन निरन्तर आचार्य और दूसरे भागवतों के बारें में वार्ता करते है। उनका कार्य ही आचार्य और दूसरे भागवतों के प्रति कैंकर्य है। अत: उनके शब्दों और कार्य में हमेशा आचार्य और दूसरे भागवत ही रहते हैं। इनके विचार सांसारिक लोगों के विचार से पूर्णत: विपरीत हैं। इस विषय के उदाहरण के लिये हम श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कि कथा देख सकते हैं। एक समय कि बात हैं श्रीरंगम मे पेरिया तिरुनाल उत्सव चल रहा था और भगवान श्रीरंगनाथ कि पालखि श्रीरंगम कि गलियो से गुजर रही थी। श्रीरामानुज स्वामीजी के एक महान शिष्य थे “श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी” जो अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी के सिवाय और किसी को जानाते हीं नहीं थे। श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान कि आराधन के लिये बाहर गये हुवे थे। अपने साथ श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी को न पाकर श्रीरामानुज स्वामीजी ने पुकारा “हे! आन्ध्रपूर्ण भगवान कि पूजा करने के लिये इधर आवों”। तब श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के लिये दूध गरम कर रहे थे। जब उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी कि आवाज सुनी तो कहा कि “अगर अडिएन आपके भगवान कि आराधन करने के लिये बाहर आता तो उनका ध्यान दूध गरम करने के कैंकर्य से हट जाता तब मेरे भगवान (जो और कोई नहीं श्रीरामानुज स्वामीजी है) के लिये दूध न रहता”। अगर कोई सांसारिक मनुष्य यह कथा देखता है और श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के स्वभाव को देखता है तो उसके रोज के दिनचर्या से बहुत विपरीत होगा। अत: वह सांसारिक जीव ऐसे लोग और उनके कार्य के प्रति अपमानजनक शब्द कहेंगे। वह संसारी यहीं नही रुकेगा। यह उन भागवतों के लिये भी सत्य है जो भगवान के भक्त है। ऐसे जन भी श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी और उनके जैसे भक्तों के प्रति गलत या निषेधात्मक शब्द का प्रयोग करेंगे। वह यह कह सकते हैं “भगवान के प्रति इन लोगों कि आज्ञा का पालन देखिये और यह लोग आचार्य और अन्य जनों के पीछे जा रहे है। अन्त मे तो भगवान ही सब पर कृपा करेंगे और ऐसा हैं तो क्यों ये लोग दूसरे लोगों के पीछे घूमते है”। अब यह प्रश्न आता है कि भक्तों के भक्त प्रति क्या होता है अगर इनके उपर शिकायत आती है। यह पाशुर जो सांसारिक लोग और भगवान के भक्त शिकायत करते है उन प्रश्नों का उत्तर देता है। इन जवाबो के अलावा श्री देवराज मुनि स्वामीजी इन महान आत्मा की भाषाए, कार्य और अनुभव को सांसारिक लोगों से पूर्णत: विपरीत बताते है। यह अपने आप मे एक कीर्ति हैं।

पाशुर ४० अर्थ: अविडु सोल्लुम – वह हास्यजनक चर्चाये; अडिक्कन्बर – भक्तों कि जो चरण कमल में है; अंबर – भगवान के जो प्रेमी है ; अल्लि मलर पावैक्कु – पेरिया पिराट्टी का ; सुरुदियाम – स्वयं वेदों के बराबर है ; कवर सरिदै – उनकी गतिविधियाँ ; मनु नूर नल्ल पड़ियाम – मनु धर्म शास्त्र के लिये एक उच्च उदाहरण है ; पार्वै – उनकी दूरदृष्टी ; ती – अग्नि के तरह कार्य करती है ; विनैत तोगैक्कुत – बुरे कर्मो का नाश करने के लिये जो ; सेडियार – एक व्यक्ति को डुबाती है।

स्पष्टीकरण:

अल्लि मलर पावैक्कन्बर अडिक्कन्बर: भगवान श्रीमन्नारायण हमेशा अपने पत्नी पेरिया पिराट्टी से प्रेम करते है जो उनके कमल पुष्प से आयी हैं। क्यों भगवान हमेशा उनकी पत्नी के साथ रहते दिखते है उसके लिये एक कारण है। हमें यह समझाने के लिये कि भगवान कि कृपा के लिये सबसे पहिले अम्माजी का पुरुषकार होना आवश्यक हैं। उनकी कृपा और आशिर्वाद भगवान

कि पहचान बनाता है जिससे हम उन्हे जान सके। यह हमें यह भी दिखाता हैं कि भगवान अम्माजी के प्रति अतृप्त प्रेम व्यक्त करते है। अत: जो भगवान के चरण कमलों में हो जो अपने पत्नी से प्रेम करता हो उसे “अल्लि मलर पावैक्कन्बर अडिक्कन्बर” कहकर बुलाते हैं। वह प्रेम जो यह भक्त भगवान के चरण कमल के प्रति बताते उनकी पहिचान बताते हैं। सोल्लुम अविडु सुरुदियाम: ऐसे भक्त कुछ हास्यजनक और अलग बात बोल सकते है। हालाकि वो जो भी कहते है उसमे वेदों के जैसे हीं विश्वसनीयता है । गुरूपरम्परा मे हम ऐसे शब्दों को देख सकते है। उदाहरण के लिये “उड़यवर वार्ता”, “भट्टर वार्ता”, “कुरेश वार्ता”, “कलिवैरिदास वार्ता”, “तिरुकोलूर वार्ता” शामिल हैं। यह वार्ताएं इन महान पूर्वाचार्यों से कही गयी हैं। वह बहुत महान गुप्त और बहुत ही आनंदित मतलब सरल तरिके से पहूंचाते है। जो श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के लिये वाक्य का प्रयोग करते है उसको दर्शाने के लिये कंबनाताज्वार “वाई तंधना कूरुधियों मरई तंधा वायाल” का प्रयोग करते है। “पेडयैप पीड़िट्टु तन्नै पीड़िक्का वंधदैन्ध पेधै वेदवनुक्कु उधवि सेयधु, विरगीदै वेंध्ल मूति पादुरु पसियै नोक्कि तन उदल कोदुत पैम्पुल व्ल्दु पेट्रू उयर्न्धा वार्ताई वेदांतिन विज़्हुमिधु अनरो?”। यह पद्य कम्बर रामायण से है जो एक शिकारी और कबुतर की कथा को लेकर शरणागति शास्त्र के बारे में चर्चा करता है। शरणागति के बारें में जो उस कबुतर ने वर्णन किया हैं वह वेद से भी उच्च हैं।

नल्ल पड़ियाम मनु नूर कवर सरिदै पार्वै: ऐसे भक्तों का इतिहास और कुछ नहीं उनका आचरण है। लोगों कि रोज कि दिनचर्या और आज्ञा पालन मे पक्का रहना मनु शास्त्र मे दस्तावेज़ किया हैं। ऐसे भक्तों का आचरण मनुशास्त्र के लिये उदाहरण हैं। ऐसे शास्त्र में उनके जाती के अनुसार जिसमे उनका जन्म हुआ है,क्या करना और क्या नहीं करना सब लिखा हैं। जिन्होंने इसे पढ़ा हैं और जानते हैं वह उसके अनुसार रहते है। हालाकि सांसारिक लोगों को जो शास्त्रों में बताया हैं सिखना और आज्ञा पालन समझना आसान नहीं हैं। यह सांसारिक लोग भगवान के भक्तों के रोज कि दिनचर्या और आचरण का पालन कर उसी कि तरह रह सकते है। ऐसे भक्तों का आचरण उसे पालन करने के लिये सभी के लिये एक उदाहरण हैं। वास्तव में यह भी कहा जा सकता है कि स्वयं शास्त्र वह भक्त कैसे व्यवहार करते है इतना ही जानते है। अत: यह देखा जा सकता है कि ऐसे भक्तों का आचरण हीं मूल है और शास्त्र ऐसे भक्तों के आचरण का प्रतिबिम्ब है। ऐसा विश्वास है इन भक्तों के आचरण पर रखा है। फिर से भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाकर,

येनैतू उलमाराइ अवै इयाम्बर्प पालना
पनैतिरल करकरि भरधन सेयगए
अनैतिराम अल्लना अल्ला; अन्नधु
निनैतिलै, येंवायिं नेया नेंजिनाल” (कम्बरामायण, अयोध्या काण्ड, तिरुवड़ी चूट्टू पदलम-४४)

वेद वों है जो पूरे संसार को क्या करना और क्या नही करना यह बताता है। जो भी श्रीभरतजी ने किया वह सब शास्त्र में बताया गया है। ऐसे भी कुछ है जो शास्त्र में बताया गया है परन्तु भरतजी में नही देखा गया है ऐसे भी बाते वेदों को मान्य नहीं है। जो भी श्री भरतजी करते है वह माननिय है और खुशी मनायी जाती हैं। यह बात श्रीरामजी ने श्रीलक्ष्मणजी से कही थी। यह श्रीभरतजी का आचरण और उसी तरह दर्शाया गया है जैसे “मनु नूर्क्कु नल्ला पडियम”। सेडियार विनैत तोगैक्कुत ती: ऐसे भक्तों कि दृष्टी ऐसी होती है कि वह अपराधिय कर्मों को जो कोई एक ने जमा किया है और दबा रखा हैं उसे नष्ट कर देता है। क्योंकि उनकी दृष्टी ऐसे पाप, दबे हुये कर्म एक व्यक्ति को भीतर से नष्ट करती है और वह अपने आप ही उस जीवात्मा को जो उसके भीतर है उसे रास्ता दिखाता है। सम्पूर्ण सारांश: भगवान के भक्तों के शब्द और व्याख्यान, जो हमेशा उनकी पत्नि पेरिया पिराट्टी पर प्रिती रखते है, हालाकि वह हमे व्यंग लगता है परंतु वह हमेशा वेदों के बराबर रहता है। उनकी क्रियावों की नीव मनु शास्त्र जैसे शास्त्र मे से रखी गयी है जो मनुष्य सभ्यता मे क्या करना और क्या न करना ऐसा बतलाता है। यानि उनकी क्रिया मूल है और शास्त्र कि नकली। ऐसे ही भक्तों कि दृष्टी अग्नि की तरह काम करती है और लोगों कि बोझ और अपराधिय कर्मों को नष्ट कर देता है और स्वयं प्राप्ति के लिये राह बताता हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/05/gyana-saram-40-alli-malar-pavaikku/

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३९

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३८                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४०

पाशुर-३९  putna1

अलगै मुलै सुवैत्तार्क्कु अंबर अडिक्कन्बर
तिलदम एनत तिरिवार तम्मै उलगर पलि
तूट्रिल तुदियागुम तूटादवर इवरै
पोट्रिल अदु पुन्मैये याम

प्रस्तावना: पिछले पाशुर में आचार्य कि महिमा के बारे में विस्तार से चर्चा की गयी। आचार्य के चरण कमल का महत्व और वों ही उसके जीवन के लिये सबकुछ हैं यह जानकार एक मनुष्य उन्हें पकड़कर रखता हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी शिष्य को समझता हैं जिसने अपने आचार्य के चरण कमलों को पकड़ा हैं तो वह व्यक्ति सचमुच हीं समझदार हैं। लोग उस व्यक्ति को जो अपने आचार्य को ही सब कुछ समझता हैं उसकि महिमा को नहीं समझते वह उसके बारें में कुछ इस तरह बात करते हैं, “वह अपने आचार्य को ही सब कुछ मान कर उनके पीछे क्यों जा रहा हैं? वह उन्हें भगवान श्रीमन्नारायण से भी बढ़कर क्यों मानता हैं? वह अपने आचार्य के पीछे-पीछे क्यों घुमाता हैं?” इन लोगों कि जो कुछ भी शिकायत हो परंतु यह पाशुर इन सब प्रश्नों का उत्तर देता हैं। यह लोग जो भी प्रश्न सामने रखे उसमे एक अनुमान कि बात हैं। यहाँ एक समुह के लोग हैं जो भगवान श्रीमन्नारायण के पिछे उनकी महिमा, रूप, श्रेष्ठ गुण, अवतार, कथाएं आदि सुनते जाते हैं। अगर यह समुह जो भगवान के पिछे जाता हैं दूसरे समुह के लोगों को जो आचार्य को ही सब कुछ मानते हैं उन्हें पुंछते हैं कि “आप लोग भगवान श्रीमन्नारायण के पिछे क्यों नहीं चलते हो और केवल एक मनुष्य जिसे आचार्य कहते हैं उनके पिछे जाते हो?” यह पाशुर भगवान के भक्तों से ही इन सब प्रश्नों का उत्तर देता हैं । सांसारिक लोगों से इन आचार्य भक्तोके प्रति कुछ भी निन्दा और जो प्रश्न भगवान के भक्तों ने किये हैं उन्हें उनकी महिमा को समझना होगा ना कि उसे शिकायत / फटकार समझना होगा। इस व्याकरणिक ढाचे को तमिल में “वंजपुगझ्चीयणि” कहते हैं। हम इस पर एक उदाहरण देख सकते हैं। एक समय कि बात हैं श्रीरामानुज स्वामीजी के समय बहुत से लोग श्रीरंगम में पुन्नै पेड़ के नीचे खड़े हुये थे। श्रीरामानुज स्वामीजी भी वही पर उन सब लोगों के साथ भगवान कि सवारी के शुरू होने के इंतज़ार में वहाँ खड़े थे। श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के निकट खड़े थे। बहुत से भक्त श्रीरामानुज स्वामीजी के समीप आकर उन्हें दण्डवत करके चले गये। चोल राज का एक कवि जो यह सब कुछ उत्सुकता से देख रहा था उसका नाम “उदयार सुब्रमान्यभट्टर” था। इस का कारण जानने के लिये वह श्रीरामानुज स्वामीजी के निकट गया और पूछा, “हे! स्वामी! मैं आप से कुछ जानना चाहता हूँ”। श्रीरामानुज स्वामीजी ने कहा “पूछिये,कृपा करके आप को जो कुछ भी पूछना चाहते हैं उसे पूछिये”। उस कवि ने उत्तर दिया कि “मैंने बहुत से लोगों को देखा जो आपके पास आकर और आप को दण्डवत किया। उन्हें भी यह करने में आनन्द आ रहा था और आप जो भगवान के निकट खड़े थे आप ने भी उन्हें रोकने कि कोशिश नहीं कि और खुशी से उनके दण्डवत को स्वीकार किया। आप ने उन्हे दण्डवत करने से रोका भी नही। आप ने ऐसे क्यों किया जब उन्होंने आप को दण्डवत किया तब आपने उन्हें कुछ भी नही कहा ।” श्रीरामानुज स्वामीजी ने उत्तर दिया “हाँ, यह वह प्रश्न हैं जो कि पुछना चाहिये। यह बहुत अच्छा सवाल हैं। परन्तु मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि यह प्रश्न आप से आया।” वह कवि थोड़ा हैरान हो गया और कहा “मेरे में क्या विशेषता हैं?” श्रीरामानुज स्वामीजी ने उत्तर दिया “आप राज महल में सेवा करते हैं। आपके राजा के पास

बहुत से लोग आते होंगे। अगर किसी व्यक्ति को राजा से कुछ चाहिये तो वह राजा कि चरण पादुका को लेकर उसे अपने सिर पर रखकर उसको सन्मान देगा। राजा को पता हैं कि वह व्यक्ति उनकी चरण पादुका को सिर पर रकखर उन्हे सन्मान दे रहा हैं और यह राजा को लुभाने का एक तरीका हैं।” यह जानकर राजा निश्चित ही कुछ कर देता हैं कि उस व्यक्ति कि इच्छा पूर्ण हो जायेगी। इसक अर्थ उस व्यक्ति का काम क्या उन चरण पादुकाओंने किया? यह तो राजा ने उस व्यक्ति का काम किया नाकि चरण पादुका। यह घटना आपने बहुत बार राजमहल में जब आप होते हो तब देखी होगी। उसी तरह यहाँ भगवान तो राजा हैं और आडिएन भगवान कि चरण पादुका। लोगों को जो भगवान से कुछ भी चाहिये वह भगवान को खुश करने के लिये मुझे दण्डवत करते हैं, मै जो भगवान कि चरण पादुका कि तरह सेवा कर रहा हूँ। भगवान यह निश्चित करते हैं कि जो उनके प्रति प्रेम और आदर भावना रखेगा उसका कार्य पूर्ण हो जाये। इसलिये वह मुझे दण्डवत करते हैं। वह कवि “उदयार सुब्रमान्यभट्टर” श्रीरामानुज स्वामीजी से इतना बहुमूल अर्थ जानकार आनंदित हो गया। अत: यह देखा जाता हैं जो भगवद भक्त (भगवान श्रीमन्नारायण के भक्त) हैं वह आचार्य भक्तों पर करुणा दिखाते हैं। भगवद भक्तों को आचार्य भक्तों कि महिमा समझना चाहिये। अगर वें निष्फल हो जाते हैं परंतु आचार्य भक्तों पर करुणा दिखाते हैं तो आगे चलकर यह आचार्य भक्तों कि महिमा समझने की शुरुवात हो सकती है।

पाशुर अर्थ: अंबर – भक्त जन जो , अंबर अडिक्कन्बर – भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों में हैं , सुवैत्तार्क्कु – जिन्होंने पिया , अलगै मुलै – पुतना राक्षसी के छाती से दूध , तिलदम एनत – इन भक्तों का स्वभाव ऐसा हैं कि वह कृष्ण भक्तों को पवित्र मानते हैं क्योंकि उनके ललाट पर तिलक हैं, तिरिवार तम्मै – और इन महान आचार्य भक्त सब जगह फिरते हैं। ऐसे लोगों को अगर , उलगर – यह सांसारिक लोग , पलि तूट्रिल – यह कहते हैं कि यह लोग भगवान के पास जाने के सिवाय एक इन्सान के पिछे घुमते है, तुदियागुम – यह उनके लिये केवल एक प्रशंसा हैं क्योंकि यह उनकी आचार्य में भक्ति और भी दृढ़ करती हैं , अवर – हालाकी वही सांसारिक लोग , तूटादवर – अगर अपमान नहीं करते हैं , इवरै – उन आचार्य भक्तों का और , पोट्रिल – अगर वें प्रशंसा करती हैं, अदु – वह प्रशंसा , पुन्मैये याम – प्रशंसा नहीं अपमान हैं।

स्पष्टीकरण:

अलगै मुलै सुवैत्तार्क्कु: “अलगै” शब्द राक्षसी को संबोधित करता हैं। श्री तिरुवल्लुवर भी कहते हैं “वय्यतुललगय्यावैक्कपदुम”। “अलगै” पुतना राक्षसी को संबोधित करता हैं जो वेष बदलकर यशोदा के पास आयी। उसे कंस ने गोकुल में बड़े हो रहे श्रीकृष्ण को मारने भेजा था। पुतना ने अपने स्तन से जहरीला दूध पिलाकर श्रीकृष्ण को मारने कि कोशिश की। श्रीकृष्ण ने नाही दूध को चूसा बल्कि उसके साथ उसके प्राण भी निकाला लिये। यह कथा बहुत जगह बतायी गयी हैं। श्री परकाल स्वामीजी यह पद इस्तेमाल करते है “पेट्टतैपोलवन्धापेयचि पेरुमालैयूडूयीरैवर्रवाङ्गिउंदवायान “और “कंसोरवेंगुरुधिवंधिझियवेन्धझलपोंल्कून्ध्लालाईमण्स ओरमुलाईयुण्डमा मधलै”।श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं “विदपालमुधागामुधूसेयधित्तमायान”। यह कथा यह बताने के लिये ली गयी हैं कि भक्त अपने आप को भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में डुबा देते हैं। अंबर अडिक्कन्बर: भक्त जन जो इन श्री कृष्ण कथाओं में लीन हो जाते हैं। पुतना कृष्ण के मारने के लिये आयी। जो इन कथाओं के बारें में विचार करते हैं वह कृष्ण के विशेष गुण के बारें में भी विचार करते हैं। श्रीकृष्ण ने पुतना को मारा और सिर्फ उसे मारा ही बल्कि अपने आप को बचाया जो इस संसार पर अपनी निर्हेतुक कृपा करने वाला हैं। अगर श्रीकृष्ण ने उसे नहीं मारा होता तो क्या श्रीकृष्ण हमारे लिये नहीं होते? उनमे ऐसा क्या महान गुण हैं जहाँ वह अपने आप को अपने भक्तों के लिये हमेशा प्राप्त हो। यह करने के लिये वह सभी राक्षसो को मार डालता हैं। भक्त उनके यह गुण के बारें में सोचते हैं और उनमे पूर्णत: लीन हो जाते हैं। तिलदम एनत तिरिवार तम्मै: अत: वह लोग जो अपने “आचार्य” के और अन्य भागवतों के भक्त हैं जो भगवान के भी भक्त हैं उन्हें सच में “महान” कहते हैं। सभी महान पूर्वज उन भक्तों का उत्सव मनाते हैं जो सब जगह घुमकर भागवतों और उनके आचार्यों के गुणों कि प्रशंसा करते रहते हैं। “तिलक” औरतों के माथे पर एक चिन्ह हैं जो वह हमेशा रखती हैं। यह शुभ का संकेत हैं इसलिये यह लोग जो भक्तों के भक्त हैं उनकी प्रशंसा होती हैं और शुभ उत्सव कि तरह मनाया जाता हैं। इस भक्तों के भक्त वाली अवस्था को बहुत से आल्वारों ने अपने पाशुरों में वर्णन किया हैं। विशेषत: श्री शठकोप स्वामीजी अपने सहस्त्रगिती के “पलियुम शुडरालि” और “नेडुमार्कडिमै” के पदों में इसका आनन्द लेते हैं। श्री परकाल स्वामीजी पेरिया तिरुमोझि के “कण्शोरवेङ्गुरूदि” और “नण्णद वाल अवुणर इडै प्पुक्कू” के पदों में इसका आनन्द लिया। श्रीकुलशेखर स्वामीजी पेरुमाल तिरुमोलि के “तेट्टरूम तिरल तेनिनै” के पदों में आनन्द लेते हैं। श्रीभक्ताघ्रिरेणु स्वामीजी “मेम्पोरूल्पोगविट्टु” में आनन्द लेते हैं। इसके अलावा हम इतिहास और पूराणों में बहुत से जगह देख सकते हैं। श्रीवचनभूषण के २२६वें चूर्निकै में भी बहुत अच्छी तरह बताया हैं। उलगर पलि तूट्रिल तुदियागुम: जब एक गृहस्थ एक व्यक्ति पर टिप्पणी करता हैं जो भक्तों का भक्त हैं कि “देखों इस व्यक्ति को, वह और एक व्यक्ति के पीछे बिना उस व्यक्ति के बारें में जाने जा रहा हैं। उसे उसकी जात, अभी कि दशा आदि के बारें में कुछ भी पता नहीं हैं। वह केवल उस व्यक्ति के पीछे जा रहा हैं और उसे अपने मोक्ष का साधन मानता हैं और भगवान को तुच्छ समझता हैं”। अगर यह नकारात्मक टिप्पणी हैं तो, यह नकारात्मक टिप्पणी / शिकायत या निन्दा नहीं हैं बल्कि यह एक कदम आगे बढ़कर उस व्यक्ति के गुण को जो अपने आचार्य और अन्य भागवतों को अपना सब कुछ मानता हैं यह सिद्ध करता हैं। अत: यह कोई अभद्र टीप्पणी या शिकायत नहीं बल्कि प्रशंसा करने लायक हैं।

तूटादवर इवरै पोट्रिल अदु पुन्मैये याम: अब हम सीक्के के दूसरी तरफ का पहलू देखेंगे। यह सम्भावना हैं कि यह सामान्य जन भक्तों के भक्त की बहुत सी प्रशंसा करें। क्या यह प्रशंसा सच में पहिले स्थान पर हैं? अगर नहीं तो इसका क्या मतलब हैं? यह सामान्य जन ऐसा कोई भी कार्य नहीं करते जो उन्हें पहिले स्थान पर करने कि जरूरत हैं। वह यह सिर्फ करते ही नहीं पर मिथ्या दिखाते भी है। इससे आगे चलकर वह उनकी दिनचर्या को देखकर यह टिप्पणी उन भक्तों के भक्त पर करते हैं और यह कहते हैं “वह केवल शास्त्र का पालन कर रहे हैं”। वह यह टिप्पणी मिथ्या अवलोकन के आधार पर करते हैं और इसलिये इसका कोई अर्थ नहीं हैं। वह यह इसलिये कहते हैं कि दूसरे लोग भी यह सोचे कि वें भी उनके बराबर हैं और दूसरों का सम्मान करते हैं। हालकि असल बात यह हैं कि यह लोग कितना भी मिथ्या प्रशंसा कर ले वह भक्तों के भक्त के यश की बराबरी नहीं कर सकते। बल्कि यह उन पर उल्ठा ही गिरेगा उनका अपमान होगा। अडियारक्कु अदियर (भक्तों के भक्त): भक्तों के भक्तों का पूरा समूह सम्पूर्ण विश्व के यश का कारण है। स्वयं उन भक्तों के लिये “तिलकं” भी कह सकते हैं। अगर सांसारिक लोगों को यह शिकायत करनी हो तो वह भगवान के पास न जाकर लोगों के पास जाते हैं तब वह शिकायत नहीं हो सकती। तब वह केवल प्रशंसा होगी। अत: हमने भक्तों के भक्त कि महिमा देखी।

विस्तारपूर्वक स्पष्टीकरण: श्रीरामायण में श्रीराम, श्रीलक्ष्मण, श्रीभरत और श्रीशत्रुघ्न जब अच्छाई के लिये खड़े हुये और दूसरों के लिये उनके पथ पर चलने का एक उदाहरण बने। चारों में श्रीशत्रुघ्नजी को ही हमारे पूर्वज पूजते हैं। इसका कारण हैं कि श्रीशत्रुघ्नजी अपने भाई भरत जो अपने भाई श्रीराम का बहुत बड़ा भक्त था उनकि भक्त के तरह सेवा कि । श्रीशत्रुघ्न अपने भाई भरत का सब कैंकर्य करते थे और “भक्तों के भक्त” के लिये एक उदाहरण बने। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “तोंडरतोंडरतोंडरतोंडनशठकोपन”, और “अडियार अडियारदियारेङ्कोकल”। श्रीयोगीवाहन स्वामीजी कहते हैं “अडियारक्कु अनैअत्पडुतै”। श्री भक्ताघ्रिणु स्वामीजी कहते “अडियारक्कु अनैअत्पडुतै”। श्री महायोगि स्वामीजी कहते हैं “अड़ीयार्गलेमतम्मविरिकवुंपेरूवार्गले”। श्री कुलशेकर स्वामीजी कहते हैं “तोंडरतोंडरगलानवर”। यह सब एक ही तथ्य को दर्शाते हैं कि सभी आल्वार एक ही श्रेणी “अडियारक्कु अदियर” (भक्तों के भक्त) में रहना चाहते थे। इस ग्रन्थ के लेखक श्री देवराज मुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी को सब कुछ मानते थे और उन्ही कि सेवा कि। वह एक व्यक्ति हैं जिन्हें इन पदों से समझाया गया “अंबरडिक्कुअंबर” और “तिलधमेनतिरिवार”। यही कारण हैं कि श्री देवराज मुनि स्वामीजी को “तेरूलारूम्मधुरकविनिलैतेलिन्धोंवाझिए” कि तरह मनाया जाता हैं। हम इसमे और भी उदाहरण देख सकते हैं। स्वामी तिरुवरंगामृतयमूधनार श्री रामानुज स्वामीजी के भक्तों कि सेवा कि और “रामानुजनूत्तन्दादि”यह ग्रन्थ लिखा। इसीतरह श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्री वेदांति स्वामीजी के जीवन चरित्र में भी यह देखा जा सकता हैं।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्तों कि सेवा की और “यतिराज विंशती” को गाया। श्री एरुम्बियप्पा स्वामीजी (श्रीदेवराज स्वामीजी, अष्ट गादि में एक) ने श्री वरवरमुनि स्वामीजी के भक्तों कि सेवा करके “पूर्व दिनचर्या”, “उत्तर दिनचर्या”, “वरवरमुनिशतकम”, “वरवर मुनि काव्यम”, “वरवरमुनिचम्पु” आदि गाया। एक में वह यह कहते हैं “सेरुकिल्लादवर्गळुम् आचार्य निश्टैगळिल् इरुपवरुम्, शास्तिर सारार्तन्गळै अऱिन्दवरुम् पणत्तासै, पेण्णासै मुदलिय आसैयट्रवर्गळुम्, पेरुमयट्रवर्गळुम्, अनैतु उयिर्गळ् इडतिल् अन्बु उडयवर्गळुम्, कोबम्, उलोबम् मुदलिय कुट्रन्गळै कडन्दवरुमान मणवाळ मामुनिगलिन् अडियार्गळोडु अडियॅउक्कु एन्ऱुम् उऱवु उन्डाग वेन्डुम्”। इसका अर्थ यह हुआ कि श्री एरुम्बियप्पा स्वामीजी श्री वरवरमुनि स्वामीजी के उन भक्तों के साथ नित्य सम्बन्ध रखना चाहते हैं जो अच्छे गुणों के स्वभाव के साथ है न घमंड और अभिमान, पूर्ण आचार्य भक्ति, शास्त्र ज्ञान और उसके गुप्त अर्थ, सांसारिक वस्तु मे रुचि न होना जिसमे धन और स्त्री भी शामिल हैं, विख्यात होने कि आश न होना और न पहचाना जाना, सभी जीव के प्रति प्रेम जिसमे पक्षी और जानवर भी शामील है, बुरे स्वभाव के प्रति घृणा रखना जैसे ग़ुस्सा, लालसा आदि। अत: हम यह देख सकते हैं कि सभी आचार्य और आल्वार केवल भक्तों के भक्त कि ही तरह होना चाहते है। यह सभी ज्ञान किसी भी जरिये से मलाई पर मलाई ही हैं। इसलिये यह बात ग्रन्थ के अन्त में हीं कही गयी हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/04/gyana-saram-39-alagai-mulai-suvaitharkku/

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३८

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३७                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३९

पाशुर-३८

H

तेनार कमलत् तिरुमामगल कोलुनन
ताने गुरुवागित तन अरूलाल मानिडर्क्का
इन्निलत्ते तो न्रु दलाल यार्क्कुम अवन तालिणैयै
उन्नुवदे साल उरुम

प्रस्तावना: “आचार्य कि कीर्ति और महत्व” का मनोभाव २६वें पाशुर (तप्पिल गुरू अरूलाल) में २७वें पाशुर (पोरुलूं उयिरूम) के जरिये बताया गया। २६वें पाशुर में श्री देवराज मुनि स्वामीजी एक व्यक्ति कि परिस्थिती समझाते हैं जिसने भगवान श्रीमन्नारायण कि शरणागति अपने आचार्य कि सहायता से कि हैं। यह व्यक्ति परमपदधाम जाता हैं और वहाँ भगवान और उनके भक्तों कि निरन्तर सेवा करता हैं। अगले २७वें पाशुर में श्री देवराज मुनि स्वामीजी उन लोगों के बारें में चर्चा करते हैं जिन्होंने शरणागति नहीं कि हैं और उनकी अवस्था को दु:खदायी बताते हैं क्योंकि वह इस संसार में हमेशा के लिये व्यवहार करते रहेंगे। २९वें पाशुर में वह उस व्यक्ति कि चर्चा करते हैं जिसको अपने आचार्य कि कृपा प्राप्त हुयी हैं दु:खों का समुन्दर पार कर लेगा, जन्म और मृत्यु का बाँध तोड़ देगा और अन्त में परमपदधाम पहुँच जायेगा। ३०वें पाशुर में स्वामीजी इस बात कि चर्चा करते हैं कि किस तरह शास्त्र हमें इस बात के लिये रोकता हैं कि हमें उस व्यक्ति के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए जो अपने आचार्य का सम्मान नहीं करता हैं। ३१वें पाशुर में यह कहते हैं कि किस तरह वेद कहते हैं कि आचार्य के चरण कमल हीं एक व्यक्ति के एक मात्र उपाय हैं। ३२वें पाशुर में उस व्यक्ति के बारे में समझाते हैं कि जो अपने आचार्य को केवल एक व्यक्ति समझता हैं उसे नरक जाना पड़ता हैं। ३३वें और ३४वें पाशुर में वह किसी व्यक्ति के क्रिया / कर्म को “अज्ञानी/मुर्ख” बताते हैं जब वह व्यक्ति अपने नजदीक रहने वाले अपने आचार्य को तुच्छ मानता हैं और भगवान कि तलाश में निकलता हैं जो हमारे पहूंच से बाहर हैं। ३५वें पाशुर यह समझाते हैं कि किस तरह भगवान स्वयं उस व्यक्ति को जलाते हैं जो अपने आचार्य के सम्बन्ध से दूर हो जाता हैं। ३६वें पाशुर में शिष्य को कैसे रहना चाहिये यह समझाते हैं। खासकर वह यह समझाते हैं कि १०८ दिव्य देशों के भगवान अपने आचार्य के चरण कमलों में ही विराजते हैं और इसलिये हमें भगवान के दर्शन के लिये और कहीं भटकने कि आवश्यकता नहीं हैं। ३७वें पाशुर में अच्छे शिष्य का एक और स्वभाव समझाया जहां एक शिष्य अपने आचार्य को हीं अपना सबकुछ मानता हैं। उपर जहाँ “सबकुछ” बताया हैं उसमें धन, आत्मा और शरीर आदि शामिल हैं। एक व्यक्ति को जो कुछ भी चाहिये धन, लंबी आयु, घर, अच्छा शरीर, अच्छे गुण आदि सब कुछ उसे आचार्य ही दे सकते हैं।

कुलम तरुम शेल्वम तन्दिडुम अडियार पडु तुयर आयिन एल्लाम
निलम तरम शेय्युम नील्विशुम्बरुलुम अरूलोडु परुनिलम अलिक्कुम
वलम तरुम मटुम तन्दिडुम पेट तायिनुम आयिन शय्युम
नलन्दरूम शाल्लै नान कण्डु काण्डेन नारायणा एन्नुम नामम” (पेरिय तिरुमोळि १-१-९)

इस पाशुर में यह बताया गया हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण वह सब कुछ उस व्यक्ति को देते हैं जो उनका नाम “नारायण” का अनुसन्धान करता है। उसी प्रकार आचार्य भी अपने शिष्य को सब कुछ देते हैं। अत: यह देखा जाता हैं कि आचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण ही है। इसलिये आचार्य के चरण कमल कितने उपकारी हैं यह हमें सोचना हैं। इस सोच के साथ श्री देवराज मुनि स्वामीजी अपना कार्य पूर्ण करते हैं।

पाशुर ३८ अर्थ: साल उरुम – सबसे अच्छा कार्य करना, यार्क्कुम – जीवन के सभी क्षेत्र में लोग, उन्नुवदे – नित्य उसके बारें में विचार करते हैं, अवन तालिणैयै – अपने आचार्य के चरण कमल, तो न्रु दलाल – मनुष्य का अवतार लेना, इन्निलत्ते – इस धरती पर, तन अरूलाल – उनकी अनगिनत कृपा से, मानिडर्क्का – उन लोगों को बराबर करना जो गलती कर रहे हैं, ताने – ऐसे महान, कोलुनन – आचार्य और कोई नहीं भगवान श्रीमन्नारायण ही हैं, उनके स्वामी हैं, कमलत् – जो कमल पुष्प के उपर विराजते हैं, तेनार – जो शहद को बहाते है, तिरुमामगल – और जिन्हें पेरिया पिराट्टियार कहते हैं

स्पष्टीकरण:

तेनार कमलत् तिरुमामगल कोलुनन : क्योंकि अम्माजी भगवान श्रीमन्नारायण के वक्षस्थल में विराजती हैं, उनके निरन्तर स्पर्श से उनका हृदय सुन्दर हो जाता हैं। और जिस कमल पुष्प पर वें नित्य विराजते हैं वहाँ से शहद बहता हैं उससे उनका हृदय और भी सुन्दर हो जाता हैं। अत: भगवान को जो कमल पुष्प को सुन्दरता प्रदान करती हैं उनके पति ऐसे समझाया गया हैं। अम्माजी को “तिरु” भी कहते हैं जो संस्कृत शब्द “श्री” के बराबर हैं। तिरुप्पावै में श्रीआण्डाल ने

भगवान को “तिरुवेतुयिल्येझै” ऐसा समझाया हैं। क्योंकि वह “श्री” के पति हैं इसलिये उनसे बराबर या उनसे बड़ा कोई हो ही नहीं सकता जो आगे इस कविता में देखेंगे:

तिरुवुदयार्तेवरेनिलतेवर्कुंतेवन
मरुवु तिरुमंगै मगिझ नं कोज़्हूनं ओरुवने
अल्लोर्तलैवरेनल, अंबिनाल्मेमरंधु
पुल्लोंरैनल्लारेनल्पों

मदुरै तमिल बदला पुलवर्तीरुन॰ अप्पनयन्नगार

ताने गुरुवागित: श्रीमन्नारायण के पास अपनी पहचान को गुप्त रखने के लिये और आचार्य रूप में आने के लिये एक कारण हैं । ज्यो की आगे पाशुर में समझाया गया हैं। तन अरूलाल: इसका कारण और कुछ नहीं उनकी अपार दया हैं जो उनके निर्हेतुक निमित्त से आती है। इसीलिये उनके आचार्य रूप लेने के कारण के लिये कोई तहक़ीक़ात करने की आवश्यकता नहीं है। वह किस पर अपनी दया बरसाते हैं?

मानिडर्क्का: यह दया पूर्णत: सभी लोगों के प्रति हैं जिन्होंने इस संसार में जन्म लिया हैं, जो शास्त्र का पालन करते हैं और जो यह चाहते हैं कि उन्हें इस संसार के बन्धन से मुक्त करें।

इन्निलत्ते तो न्रु दलाल: अगर कोई बालक कुवें में गिर जाता हैं तो उसकी माँ भी उसकी रक्षा के लिये कुवे में गिर जाती हैं। उसी तरह इस संसार कि माँ और हम सब कि माँ यानि श्रीमन्नारायण इस संसार में हम सब कि रक्षा के लिये आते हैं जहाँ हम गिरे हैं।

यार्क्कुम: वह केवल एक वर्ग के लोगों कि रक्षा नहीं करते। वह सभी कि रक्षा करते हैं जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, क्षुद्र आदि। वह हर अवस्था जैसे ब्रम्ह्मचर्य, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ और सन्यास सभी की रक्षा करते हैं । स्त्री और पुरुष दोनों कि भी रक्षा करते हैं। वह सब कि रक्षा करते हैं।

अवन तालिणैयै उन्नुवदे: “अवन” यहाँ भगवान श्रीमन्नारायण कि बढाई का सक्षेप में वर्णन करते हैं। भगवान सभी जीवात्मा के सिर्फ एक ही मार्गदर्शक, एक ही रक्षा स्थान और एक ही लाभप्रद हैं। सभी जीवात्मा को प्राप्त करने का लक्ष्य और सबसे खास सबसे पहिले उसे प्राप्त करने का जरिया सिर्फ उनके चरण कमल हीं है। यह सभी जीवात्मा को भगवान श्रीमन्नारायण के इस गुण को सोचने के लिये कहता हैं। “उन्नुवदे” पद का निवारक अर्थ यह हैं कि भगवान के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहिये।

साल उरुम: इसका अर्थ बहुत योग्य हैं। “साल” का अर्थ अधिक और “उरुम” का अर्थ उचित हैं। इस पद का अर्थ यह हैं कि अगर जीवात्मा श्रीमन्नारायण के बारें में विचार करता हैं जैसे इस पद “अवन तालिणैयै उन्नुवदे” में बताया गया हैं वह करने के लिये सबसे निपुण और योग्य विषय होगा । अपने निर्हेतुक अनुकम्पा से संसार के जीवों का उद्दार करने हेतु भगवान श्रीमन्नारायण जो कि पेरिय पिराट्टी के स्वामी हैं आचार्य बनकर मनुष्य रूप में आते हैं। वह अकेले सभी जीवात्मा के लिये मार्गदर्शक, शरण और लक्ष्य हैं। ऐसे भगवान के चरण कमल सभी जीवात्मा के पाने का लक्ष्य हैं। और इसके साथ चरण कमल हीं इसका पाने का जरिया हैं। एक जीवात्मा को यह सब तथ्य हमेशा अपने दिमाग में रखना चाहिये। यही करना एक जीवात्मा के लिये सही हैं । यह न करके और इसके सिवाय कोई दूसरा उपाय करना व्यर्थ हैं। इसलिये आचार्य भगवान श्रीमन्नारायण के प्रतिनिधित्व करते हैं जो मनुष्य योनि के उद्दार के लिये अवतार लिये हैं। ऐसे आचार्य के बारें में विचार करना एक आत्मा के लिये बहुत सही हैं। पुराने तमिल साहित्य में इस पद का उल्लेख हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३७

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३८

पाशुर-३७

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पोरूलुम उयिरूम उडम्बुम पुगलुम
तेरूलुम गुणमुम सेयलुम अरुल पुरिन्द
तन आरियन पोरूट्टाच सङ्गर पम सेय्बवर नेञ्जु
एन्नालुम मालुक्किडम

प्रस्तावना: इस पाशुर में श्री देवराजमुनि स्वामीजी यह कहते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण उन लोगों के हृदय में विराजमान रहते हैं जो अपने आचार्य को हीं धन, आत्मा, शरीर आदि समझते हैं।

अर्थ: मालुक्किडम – भगवान श्रीमन्नारायण, एन्नालुम – हमेशा, डम– विराजमान , नेञ्जु – हृदय में , सङ्गर पम सेय्बवर – जो कृपा, पोरूलुम – अपना धन , उयिरूम – अपनी जिन्दगी (हर एक कि आत्मा) , उडम्बुम – उनका शरीर , पुगलुम – ध्यान लगाने का स्थान , तेरूलुम – उनका ज्ञान , गुणमुम – उनके अच्छे गुण और ,

सेयलुम – उनके कर्म , तन आरियन पोरूट्टाच – उनके आचार्य के सिवाय और कोई नहीं जिन्होंने , अरुल पुरिन्द – इस शिष्य को अपनाया हैं अपने पूर्ण दया से,

स्पष्टीकरण:

पोरूलुम: एक शिष्य के सभी सांसारिक धन
उयिरूम: एक शिष्य का जीवन
उडम्बुम: एक शिष्य का शरीर
पुगलुम: एक शिष्य के ध्यान करने का स्थान (घर आदि,)
तेरूलुम: एक शिष्य का ज्ञान
गुणमुम: एक शिष्य के अच्छे गुण जैसे नम्रता।
सेयलुम: एक शिष्य के सभी कार्य का स्वर

अरुल पुरिन्द तन आरियन पोरूट्टाच: यहाँ आचार्य के गुणों को दर्शाया गया हैं। वह एक व्यक्ति हैं जो हमसे अपने कार्य के बदले में कुछ नहीं माँगते और यह भी नहीं देखते कि वह शिष्य उनके जरूरत का कार्य करेगा या नहीं। कुछ भी मांग नहीं कर के , पूर्ण दया रखकर वह अपनी निर्हेतुक कृपा अपने शिष्य पर बरसाते हैं।

सङ्गर पम सेय्बवर नेञ्जु: ऐसे आचार्य के प्रति सम्मान रखकर अगर एक शिष्य अपना सब कुछ जैसे धन, शरीर, घर, ज्ञान, अच्छे गुण और कार्यों का आदर करता हैं तो ऐसे व्यक्ति का हृदय भगवान के लिए निवास स्थान हो जाता हैं।

एन्नालुम मालुक्किडम: भगवान उपर बताये हुए लोगों के हृदय में निवास करते हैं। वह थोड़े समय के लिये नहीं बल्कि हमेशा के लिये निवास करते हैं। अगर शिष्य अपने आचार्य का पूर्ण आदर करता हैं तो भगवान को इस पवित्र विचार से अत्यन्त आनन्द होता हैं और वह हमेशा के लिये वहाँ निवास करते हैं। श्री मधुरकवि आल्वार ऐसे आल्वार थे जिन्हे अपने आचार्य जो कि श्री शठकोप स्वामीजी हैं उनको छोड़ और कोई ज्ञात नहीं

होता था। यह उनके हीं पद से देखा जा सकता हैं “तेवु मर्ररियेन” जिसका अर्थ हैं कि वह सिवाय अपने आचार्य के और कोई दूसरे भगवान को नहीं जानते । उनके हीं एक पद से “अन्नैयाई अत्तानै एन्नै आंदिदुम तन्मयान शठकोपन एन नंबिए” उन्होंने श्री शठकोप स्वामीजी को अपना सब कुछ माना और ऐसा ही सम्मान दिया। श्री कृष्ण ऐसे भक्तों के हृदय में रहना पसन्द करते हैं जिसका हृदय शुद्ध और निर्मल हैं। ऐसे आल्वार का हृदय जो भगवान श्रीमन्नारायण के सिवाय और कोई भगवान को नहीं जानते हैं ऐसा स्थान श्री कृष्ण के लिये हमेशा के लिये वास स्थान बन जाता हैं। श्री देवराज मुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ जो कि ज्ञान सारम हैं उसे “तेरुलारूं मधुरकवि निलय तेलिन्धोन   वाझिये” यह कहकर उत्सव मनाते हैं। अत: हम उनका उनके आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के प्रति प्रेम और आदर देख सकते हैं। श्रीगोदम्बाजी भी इसी श्रेणी में आती हैं। यह हम उनके नाच्चियार तिरुमोलि के पाशुर मे देख सकते हैं “विल्लिपुदुवै विट्टुशित्तर तङ्गल तेवरै वल्ल परिशु वरूविप्परेल अदु काण्डुमे” (नाच्चियार तिरुमोलि १०-१०) |

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source:  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/03/gyana-saram-37-porulum-uyirum/

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३५                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३७

पाशुर-३६

nammalwar-final

विल्लार मणि कोलिक्कुम वेंकटा पोर कुंरु मुदल
सोल्लार पोलिल सूल तिरुप्पदिगल एल्लाम
मरुलाम इरूलोड मत्तगत्तुत तन ताल
अरूलालै वैत्त अवर

प्रस्तावना: एक शिष्य जो अपने आचार्य के शरण हो गया उसके लिये उसके आचार्य के चरण कमल ही १०८ दिव्य देश हैं। यह बात इस पाशुर में बताई गयी हैं।

अर्थ: अवर – आचार्य अपने, अरूलालै – दया से, वैत्त – रखते हैं, तन ताल – अपने पवित्र चरण कमल, मत्तगत्तुत – शिष्य के मस्तक के उपर रखते हैं, लोड – नाश करते हैं, मरुलाम इरू – अज्ञानता के कारण अंधेरा; इसलिये यह शिष्य को जाना नहीं पड़ेगा, तिरुप्पदिगल एल्लाम – कौन से भी १०८ दिव्य देश (भगवान श्रीमन्नारायण के इस धरती पर विराजमान करने वाले पवित्र स्थान), पोर कुंरु मुदल – तिरुमला जैसे सुन्दर पर्वत भी शामील हैं, वेंकटा – तिरुपति में जो, कोलिक्कुम – बहता हैं, विल्लार – चमकीला, प्रकाशमान और , मणि – अधिक मूल्यवान मणि और वह एक , सोल्लार – जगह हैं जहां बादल मिलते हैं , सूल – और घिरे हुए हैं , पोलिल – सुन्दर बागों से

स्पष्टीकरण:

विल्लार मणि कोलिक्कुम: “विल” का अर्थ चमकीला हैं और “आर” अधिक का प्रतिनिधित्व करता हैं। इसलिये “विल्लार” का एकसाथ में अधिक चमकीला ऐसा अर्थ हैं। “अधिक चमकीला” विशेषण को मणियों के जैसे इस्तेमाल किया गया हैं।

नंमणि वण्णन ऊर अलियुम कोलरियुम
पोन मणियुम मुत्तमुम पू मरमुम पंमणि नी –
रोडु पोरूदुरुलुम कानमुम वानरमुम
वेडुमुडै वेंगडम

श्री भक्तिसार आल्वार के इस पाशुर में हम तिरुवेंकट का वर्णन देख सकते हैं। यह वह स्थान हैं जहाँ याझिस (शेर और हाथी के बीच में प्रजाती), शेर, मणि, अनमोल धातु अधिक मात्र में प्राप्त हो सकते हैं। इसके अलावा पाणि के झरने इस जगह में बहुत प्रमाण में मणि और फूलों के पेड़ लेकर आते हैं। झरने जंगल में हैं जहाँ अधिक संख्या में जंगली जानवर और शिकारी हैं। यह दोनों पाशुर के बीच में जो तिरुवेंकट का वर्णन है उसकी समानता को लिख लेना चाहिये।

वेंकटा पोर कुंरु मुदल: जैसे तिरुवेंकट दिव्यदेश जो सुन्दर तिरुमला के पहाड़ो में हैं और जो शोभायमान प्रकृति से घिरा है।

सोल्लार पोलिल सूल: यह स्थान “तिरुवेंकट” कहा गया है जो बगीचों से घिरा है और बादल उस पर मंडराते हैं। अर्थात यह पहाड़ इतने ऊँचे हैं कि बादलों को आसानी से स्पर्श कर सकते हैं।

तिरुप्पदिगल एल्लाम: भगवान के सभी १०८ दिव्यदेश वह स्थान हैं जहाँ भगवान स्वयं स्पष्ट रूप से आनन्दित हैं।

मरुलाम इरूलोड मत्तगत्तुत तन ताल: इसका अर्थ है कि अंधकार के कारण जो गुणों की अज्ञानता है, वह चली जाती हैं।

अरूलालै वैत्त अवर: आचार्य वह है जो अपने दया के कारण अपने शिष्य पर अपने चरण कमलों को रखते हैं। “अरूलालै” शब्द का अर्थ यह है कि आचार्य अपने चरण कमल को शिष्य पर किसी निमित्त के कारण नहीं रखा हैं। कोई यह प्रश्न कर सकता हैं कि शिष्य द्वारा जो अच्छा कार्य किया गया है उसके इस लक्षणों को देखकर आचार्य उनके चरण कमल उसके मस्तक पर रखते है। हालकि ऐसी कोई बात नहीं क्योंकि वह हम से कुछ भी अपेक्षा नही करते हैं। वह अपने नांमुगन तिरुवंदादि # ४८ चरण कमल केवल दया के कारण रखते हैं और इसलिये उन्हें शिष्य से कुछ भी अपेक्षा नहीं होती हैं। वह उसकी रक्षा के लिये करते हैं। “तिरुवेंकटं” को इस पाशुर में प्रतिनिधी के तौर पर इस्तेमाल किया गया हैं और इसलिये परमपद, तिरुपार्कदल आदि। वह भगवान के विभव अवतार जैसे राम, कृष्ण और अन्तर्यामी आदि को शामील किया हैं जहाँ वह सब के अन्दर विराजमान रहते हैं। इसलिये शिष्य को सभी पाँच स्थान जहाँ भगवान स्वयं को स्पष्ट करते हैं (पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चा) वह ओर कुछ नहीं आचार्य के चरण कमल हीं हैं। यही वह बात हैं जिसे श्री वचनभूषण में समझाया गया हैं जो शिष्य के गुण के बारें में चर्चा करता हैं। चूर्निका का भाव यह हैं “पाट्टु केत्कुम इदमुम, कूपिदु केत्कुम इदमुम, कुधिता इदमुम, वलैता इदमुम, ऊतुं इदमुम एल्लां वगुता इदमे एनृ इरुक्का कदवन” (चूर्निकाई #४५०)। इसका अर्थ इस प्रकार हैं: पाट्टु केत्कुम इदमुम = परमपद, कूपिदु केत्कुम इदमुम = तिरुपार्कदल, कुधिता इदमुम = अवतार जैसे राम, कृष्ण आदि जैसे शामील; वलैता इदमुम = अंतर्यामित्वम (वह गुण जिससे भगवान हम सब के अंदर स्पष्ट रहते हैं); ऊतुं इदमुम = मन्दिर जहां भगवान स्वयं को अर्चा रूप में प्रत्यक्ष करते हैं; एल्लां एनृ इरुक्का कदवन = यह पाँचो के साथ इस तरह व्यवहार करना; वगुता इदमे = आचार्य के चरण कमल || एक अच्छे शिष्य के यही लक्षण हैं कि वह उपर बताये हुए पाँच भगवान के स्वरूप को पकड़कर अपने आचार्य को हीं उपाय समझे । इसलिये हम सब को अपने आचार्य को भगवान का हीं स्थान देना चाहिये। यह बात श्रीरामानुजनूत्तंदादि के पाशुर #१०५ में देखा जा सकता हैं।

इरुप्पिडम वैहुंदम वेंगडम मालिरूम शोलैयेन्नुम
पोरुप्पिडम मायनुक्केंबर नल्लोर अवैतन्नोडुमवन्दु
इरुप्पिडम माय निरामानुजन मनत्तु इन्न्वन वन्दु
इरुप्पिडम एनतनिदयत्तुल्ले तनक्किंबुरवे

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३५

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३४                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६

पाशुर-३५:

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एन्रुम अनैत्तुयिर्क्कुम ईरञ्सेय नारणनुम
अन्रुम तन आरियन पाल अन्बोलियिल – निन्र
पुनल पिरिन्द पङ्गयत्तैप पोङ्गु सुडर वेय्योन
अनल उमिलन्दु तान उलर्त्तियट्रु

प्रस्तावना:

आखरि दो पाशुर में स्वामीजी श्री देवराज मुनि लोगों के मूर्ख कार्य को समझाते हैं वह जो अपने आचार्य का अनादर करते हैं और खुद हीं जिसे उन्होंने देखा भी नहीं हैं, दूर रहते हैं ऐसे भगवान कि हमें उनकी शरण मिलेगी इस आशा के साथ उनको प्राप्त करने कि कोशिश करते हैं। ३३वें और ३४वें पाशुर (पट्रु गुरूवैप और एट्ट इरुन्द) विशेष समानताओं के साथ उपाय किया हैं। इस पाशुर में स्वामीजी श्री देवराज मुनि इस तथ्य को समझाते हैं कि जिस मनुष्य को अपने आचार्य में प्रेम न हो ऐसे मनुष्य की भगवान भी कोई मदद नहीं करेंगे बल्कि उसके मूर्ख कार्यों के लिये उसे दण्ड ही देंगे।

अर्थ:

पङ्गयत्तैप – एक कमल का पुष्प अगर वों | पिरिन्द –बिछड़ जाता हैं उसके | निन्र पुनल – घर के पानी से जो कि उसके लिए पोषक हैं तब | वेय्योन – सूर्य उसके | पोङ्गु सुडर – तेज जलती किरणों से | तान – वहीं सूर्य जो एक समय उस कमल को खिलने में मदद किया था वह अब | अनल उमिलन्दु – अग्नि के गेंद उस पर फेंकेगा | उलर्त्तियट्रु – और उस कमल का अस्तित्व तबाह कर देगा। उसी तरह वह जो | एन्रुम – हमेशा | ईरञ्सेय – वह जो अनगिनत दया दिखाता हैं | अनैत्तुयिर्क्कुम – जीवन के प्रति | नारणनुम – और वह जिसे श्रीमन्नारायण भी कहते हैं | तन आरियन पाल – अगर भगवान यह देखते हैं कि उस व्यक्ति को अपने आचार्य के प्रति कोई लगाव / मेल नहीं हैं | अन्बोलियिल – और अपने आचार्य के प्रति पूर्ण भक्ति खो देता हैं | अन्रुम – तब उन्हें (श्रीमन्नारायण) क्रोध आता हैं और उस व्यक्ति को नष्ट कर देता हैं।

स्पष्टीकरण:

एन्रुम: इस पद का अर्थ “नित्य” / “सदैव” हैं जिसमे भूत, वर्तमान और भविष्य शामिल हैं।

अनैत्तुयिर्क्कुम: सभी जीवात्माओं

ईरञ्सेय नारणनुम: भगवान नारायण हर समय सभी जीवात्माओं पर कृपालु हैं। “नारायण” शब्द भगवान और जीवात्मा के बिचमें न टुटने वाला स्वभाव को वर्णन करता हैं। “नार” शब्द में सभी जीवित और निर्जीव दोनों जीवात्मा शामील हैं। “अयणम” शब्द नारायण में भगवान श्रीमन्नारायण सभी जीवात्माओं के जीवन को दर्शाता हैं। इनके बिना किसी के भी अस्तित्व होने का कोई सवाल हीं नहीं होता। भगवान मे हीं सब के पीछे पालन पोषण करने का और सब के जीवन को चलाने का बल हैं। यह मतलब “नारायण” शब्द में बताया हुआ एक मुख्य मतलब हैं जिसे “नार” और “आयण” में अलग किया गया हैं। यह बात श्रीआण्डाल ने तिरुप्पावै के २८वें पाशुर में कहा हैं “उन्तन्नोडु उरवेल् नमक्कु इङ्गोलिक्कवोलियादु”। श्रीभक्तिसार स्वामीजी भी अपने पाशुर में यह समझाये हैं “नां उन्नै अंरी इलेन कंडाई नारणने!!! न्ल एन्नै अंरी इलै”। अत: हम यह देख सकते हैं की वह श्रीमन्नारायण हीं हैं दोनों शुद्ध और अशुद्ध स्थिति में और वहीं यह हम सब कि ताकत हैं जो हमारे पिछे ड़ी हैं। इसलिये क्योंकि भगवान हर छोटे काम में भी प्रवेश करते हैं वह उनके अनगिनत गलतियाँ जो वह करते हैं उसे देखते हैं परंतु वह उन्हें दोष न देखकर उसे आशीर्वाद मानते हैं। यह गुण को वात्सल्य कहते हैं जो की “नारायण” शब्द का अत्यंत प्रचलित और अंतिम निर्णय है। इसलिये वह भगवान हैं जो अपनी अनगिनत दया और करुणा सभी जीवित और निर्जीव वस्तु पर हमेशा के लिये और हर वक्त बरसाते हैं ।

एन्रुम: “एन्रुम” क्रिया का अर्थ क्रोधित होना हैं। इस प्रसङ्ग इसका यह मतलब हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण गुस्सा होंगे। भगवान का गुस्सा होना हीं दण्ड हैं और उनका खुश होना आशीर्वाद हैं। यह समान शब्द पेरिया तिरुमोझि के पाशुर के पद में देखा जा सकता हैं “अंरिया वाणं” जिसका भी वही अर्थ हैं। इस पाशुर के दूसरे भाग में यह समझाया गया हैं कि किस परिस्थिति में दयालु श्रीमन्नारायण गुस्सा होते हैं।

तन आरियन पाल अन्बोलियिल: जो पिछले खंड में परिस्थिति बताई गई हैं वह तब हैं जब किसी व्यक्ति को अपने आचार्य के प्रति बिल्कुल भी भक्ति नहीं होती हैं। पिछले दो पाशुर में जो समझाया गया हैं (“एट्टा इरुन्धा गुरूवै और पट्रु गुरूवै”) कि अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य को एक इन्सान समझता हैं और उनका अनादर करता हैं जैसे कि वह नश्वर हैं ऐसे अनादर करके और यह सोचकर कि वह भगवान नहीं हैं तो वह कार्य सबसे बड़ी मूर्खता हैं। इस खयाल पर आगे बढ़ते हुए अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य का एक मनुष्य के तरह निरादर और तिरस्कार करता हैं और उनके प्रति थोडी भी भक्ति न हो तो भगवान श्रीमन्नारायण भी उस व्यक्ति पर क्रोधित होंगे। इस बात को एक विशेष समानता के साथ समझाया गया हैं जिसे आगे देखेंगे।

निन्र पुनल पिरिन्द पङ्गयत्तैप: यह समानता एक सुन्दर कमल पुष्प कि दि गयी हैं जो तालाब, झील आदि में बसता हैं। अगर ऐसा कमल पुष्प जल के बाहर रहता हैं तब उसके पिछे होने वाली घटना को समझाया गया हैं।

पोङ्गु सुडर वेय्योन: सूर्य जैसे कि हम सब जानते हैं कि बहुत तत्प, चमकीला और अपने चमक से सबको चकित करता हैं। जैसे श्री कुलशेखर आल्वार यह बताते हैं “सेंगमलं अंधरं सेर वेंगधिरोर्क्कू अल्लाल”, एक कमल पुष्प सूर्य के सिवाय किसीसे भी नहीं खिलता। अगर कोई अप्राकृतिक तरिके से रोशनी उत्पन्न करके उस कमल पुष्प को खिलाना चाहता हैं तो वह बुरी तरह नाकाम हो जायेगी क्योंकि कमल पुष्प केवल प्राकृतिक सूर्य कि रोशनी से हीं खिलता हैं। जब वह कमल जल के अन्दर हैं तो सूर्य उसकी हमेशा खिलाने में मदद करता हैं।

अनल उमिलन्दु तान उलर्त्तियट्रु: अगर कमल पुष्प जल से बाहर हैं और सूर्य आग के गोले उगलेगा तो वह उस कमल का जीवन खत्म कर देगा । अत: हम यह देख सकते हैं कि वह सूर्य जो एक कमल पुष्प जो जल में हैं उसके खिलाने में सहायक हैं वहीं सूर्य उस कमल पुष्प अगर वह जल के बाहर हैं तो उसका विनाश कर देगा । उसी तरह अगर एक व्यक्ति में आचार्य भक्ति, प्रेम और अच्छा अनुभव हैं तो भगवान श्रीमन्नारायण उस पर कृपा / आशीर्वाद देंगे। परन्तु अगर वहीं व्यक्ति अपने आचार्य का “कोई नहीं” ऐसा अनादर करता हैं तो भगवान उसे अपने गुस्से से तबाह कर देंगे। इस प्रसङ्ग में हमें यह समझना हैं कि “कृपा” और “संहार” क्या हैं। आशीर्वाद का अर्थ हैं कि श्रीमन्नारायण उस व्यक्ति जिसे आचार्य भक्ति हैं उसके ज्ञान को यशस्वी बनायेंगे। वह यह ध्यान रखेंगे कि उस व्यक्ति का ज्ञान सहीं दिशा कि ओर बढ़ रहा हैं की नहीं। विपरीत में, दण्ड / संहार इस प्रसङ्ग में उस व्यक्ति के ज्ञान को घटा देगा और उसे अज्ञानी (मूर्ख) बना देगा। इसलिये अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य का अनादर करता हैं जिन्होंने उसे “मंत्रं” का ध्यान कराया तो भगवान श्रीमन्नारायण जो कि सबसे बड़े दयावान हैं उन्हें भी क्रोध आयेगा और वह विरोध करेंगे। यह उसी तरह हैं जैसे सूर्य जो कमल पुष्प जल में रहने से उसको खिलाता हैं और अगर वहीं पुष्प जल के बाहर आगया तो उसे नष्ट कर देता हैं। खुद भगवान श्रीमन्नारायण हीं हर व्यक्ति के जीवन के तत्व विचार समझाने के जिम्मेदार हैं परन्तु अगर उस व्यक्ति जिसकी आचार्य भक्ति खत्म होने लग गयी है उनका नाश कर देंगे । वह उस व्यक्ति के ज्ञान के अंधेरे को मिटा देंगे जो उसे उसके अंतिम प्रारब्ध कि और ले जायेगा। इसका अर्थ हैं उस व्यक्ति के पास ज्ञान हैं परन्तु वह ज्ञान दीप्तिमान नहीं अदृश्य हैं। जैसे श्री तिरुवल्लूवरजी कहते “उलरेनिनुं इल्लारोड़ोप्पर” वह यह कहते हैं कि हमें अपने आचार्य का अनादर नहीं करना चाहिये। यह विचार श्रीवचन भूषण कि चूर्णिकै में समझाया गया हैं “तामरैयै अलर्था कड़वा आदित्यन ताने, न्ल्रईप पिरिंधाल अथतै उलर्थुमापोले स्वरूप विकासतै पण्णूं ईश्वरं ताने संबंधं कुलैंधाल अथथै वादप पण्णूं”। (श्रीवचन भूषण चूर्णिकै #४३९)

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३४

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३३                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३५

पाशुर-३४

पट्रु गुरूवैप परन अन्रेन इगलन्दु
मट्रोर परनै वलिप्पडुदल एट्रे तन
कैप्पोरूल विट्टारे नुम आसिनियिल ताम पुदैत्त
अप्पोरूल तेडित तिरिवानट्रू

प्रस्तावना:

हर शिष्य को उसके आचार्य उसके लिये बहुत ही सुलभता से प्राप्त होते हैं और उसके पहुँच में भी होते हैं। हालाकि अगर शिष्य वह मनुष्य हैं इस भाव के साथ आचार्य का अनादर करता है और एक कदम आगे बढ़कर यह सोचकर कि हमारे बुरे वक्त में भगवान ही काम आयेंगे तथा भगवान को देखने के लिये योगं आदि जैसे बहुत कठिन कार्य करता हैं, यह कार्य और कुछ नहीं बल्कि नादानी हैं। यह साधारण बात इस पाशुर में उदाहरण के साथ दरशाई गयी है।

अर्थ:

पट्रु गुरूवैप – अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य का जिनके शरण में जाना हैं उनका अनादर करता हैं| परन अन्रेन – व्यक्ति के जैसे जो भगवान नहीं हैं | इगलन्दु – और अपने आचार्य का अनादर करता हैं | मट्रोर परनै– आगे बढ़कर एक और भगवान के पास जाता हैं (जो और कोई नहीं स्वयं भगवान हैं) | वलिप्पडुदल – और भगवान को हीं केवल अपना उपाय समझते हैं। यह कार्य वैसे हीं हैं जैसे कि कोई व्यक्ति जो अस्वीकार करता हैं | तन कैप्पोरूल – हाथ में पैसा | विट्टारे – जिसकी किमत कम हैं और | आरेनुम ताम – जाकर देखता हैं अगर कोई| पुदैत्त – उस “धन” को दफनाया / रखा | आसिनियिल – भूमी में | अप्पोरूल – और धन के पीछे पागलों कि तरह जाता हैं (यह जाने बिना कि वह धन पहिले स्थान पर कहाँ हैं और हैं भी या नहीं) | तेडित तिरिवानट्रू – ऐसा इन दोनों व्यक्तियों का कार्य हैं जो समान हैं | एट्रे – कैसा मूर्ख / अनजान कार्य हैं!!!

स्पष्टीकरण:

पट्रु गुरूवैप: यह एक आचार्य के गुणों को समझाता हैं जिनके चरण कमलों में एक व्यक्ति शरण लिया हैं। आचार्य वह हैं जिनके पास आसानी से पहुँचा जा सकता हैं, वह जो हम सब के साथ मित्रता पूर्वक हिल मिल जाते हैं, वह जो बात करने के लिये मनोहर हैं और जो हमारी रक्षा करते हैं।

परन अन्रेन इगलन्दु: आचार्य और कोई नहीं भगवान रूप में स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण ही हैं। अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य को अस्वीकार कर एक इन्सान समझता हैं और भगवान का स्वरूप नहीं हैं ऐसे अनादर करता हैं इस मूर्खता का प्रभाव इस पाशुर में विस्तृत रूप से बताया गया हैं।

मट्रोर परनै वलिप्पडुदल: अपने आचार्य को छोड़ दूसरे कि पूजा करना। यहाँ दूसरे का अर्थ हैं स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण। उनको खुद के परिश्रम से पाना बहुत मुश्किल है। वह अपने नेत्रों से दिखाई नहीं देते। वह योगं आदि से भी आसानी से प्राप्त नहीं होते। स्वामीजी श्री देवराज मुनि कहते हैं कि यह मूर्खता है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे भगवान के पीछे जाता हैं और अपने आचार्य का अनादर करता हैं जो उसकी सदैव रक्षा करेगा, जो उसके साथ बात करने के लिये मनोहर हैं ।

एट्रे!: यह एक विस्मय करने वाला वाक्य हैं। आचार्य जिनका उस व्यक्ति ने बहिष्कार किया और भगवान इन दोनों कि तुलना स्वामीजी श्री देवराज मुनि करते हैं और एक गहरी श्वास लेते हैं और इस व्यक्ति कि मूर्ख परिस्थिती देखते हैं जिसने अपने आचार्य का अनादर किया हैं। वह “एट्रे” उस व्यक्ति कि ओर बहुत दर्द और निराशा के साथ कहते हैं। वह आगे बढ़कर इस परिस्थिती को एक समानता देते हैं।

तन कैप्पोरूल विट्टारे: एक व्यक्ति अपने जेब में जो धन हैं उसे फेंख देता हैं। जब की वह उसे अपने जेब में बचाकर रखा था ताकि जब उसकी जरूरत होगी तो इस्तेमाल करेगा।

नुम आसिनियिल ताम पुदैत्त: यह व्यक्ति आगे बढ़कर उस धन कि तलाश करता हैं जो वह सोचता हैं कि उसने धन को जमीन में रखा है। वह यह विश्वास करता हैं कि कोई किसी समय पहिले उस धन को जमीन के अंदर गाढा हैं और इसलिये वह गड्डा खोदता हैं ताकि उस प्राप्त धन से वह अपनी रोजमर्रा कि जिन्दगी में इस्तेमाल कर सके।

अप्पोरूल तेडित तिरिवानट्रू: अत: उस व्यक्ति का कार्य जो “धन” के उदाहरण में दिया गया हैं उसे उस व्यक्ति के कार्य से तुलना किया हैं जिसने अपने आचार्य का अनादर किया हैं और आगे बढ़कर भगवान श्रीमन्नारायण कहीं ढूँढता हैं। “तिरिवान” का अर्थ कठोरता से इन्सान हैं परन्तु इस प्रसङ्ग में वह उस व्यक्ति का कार्य का दर्जा बताता हैं नाकि वह स्वयं व्यक्ति को। तमिल व्याकरण में इसे “तोझिल उवमां” कहते हैं। अत: हम यह देख सकते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य का निरादर करता है और भगवान श्रीमन्नारायण को अपने स्वयं के कोशिश से प्राप्त करना चाहता है, यह उसी तरह मूर्खता है जैसे कि धन प्राप्त करने के लिये जमीन खोदना जब कि सच्चाई यह हैं कि अपने जरूरत के समय धन अपने हाथ में तैयार होता हैं। यह हम श्रीवचन भूषण में देख सकते हैं, “कैपट्टा पोरुलै कैविट्टु कणिसिक्का कदवन अल्लन” (#४४८)

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३३

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३२                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३४

पाशुर-३३

एट्ट इरुन्द गुरुवै इवै अन्रेन्रु
विट्टोर परनै विरुप्पुरुदल – पोट्टनेत्तन
कण सेम्पलित्तिरुन्दु कैत्तुरुत्ति नीर तूवि
अम्पुदत्तैप पार्त्तिरुप्पानट्रु

प्रस्तावना: इस पाशुर में यह समझाया गया है की कैसे एक व्यक्ति बुद्धिहीन है जो अपने आचार्य में मनुष्य भाव रखता है। इसके अलावा वह एक कदम आगे बढ़कर और भगवान श्रीमन्नारायण जो बहुत दूर हैं उनके पास पहुँचने की इच्छा करता है और यह सोचता है कि भगवान उसकी जरूरत के समय आकर उसकी मदद करेंगे। यह व्यक्ति मुर्खता कर रहा है और इसे एक समानता से दर्शाया गया है।

अर्थ:

एट्ट इरुन्द: (अगर कोई व्यक्ति अनादर करता है) जो बहुत करीब है | गुरुवै : यानि आचार्य | इवै अन्रेन्रु: और यह सोचता है कि वह उसका गुरू नहीं है | विट्टो: और उन्हें अस्वीकार करता है | र परनै: और उसके पास बाहर जाता हैं जो बहुत दूर है और आसानी से प्राप्त नहीं होता है (श्रीमन्नारायण) | विरुप्पुरुदल: और उसके पास पहुँचने कि इच्छा करता हो। यह कार्य उस व्यक्ति के कार्य के समान हैं जो | पोट्टनेत्तन: तुरन्त | सेम्पलित्तिरुन्दु: बन्द करता हैं (कि जल्द क्या होने वाला हैं यह जाने बिना) | तन कण: अपनी आँखे | तूवि: और जमीन पर रो पड़ता हैं | कैत्तुरुत्ति नीर: वह जल जो कि एक हाथ के घड़े में जमा कर लेते हैं और | अम्पुदत्तैप: बादल में जो जल हैं उसे ढुँढते हैं | पार्त्तिरुप्पानट्रु: और उसके पास पहुँचने का तरीका तलाश करते हैं (यह उसी के तरह मूर्खता हैं जैसे)
 

स्पष्टीकरण:

एट्ट इरुन्द गुरुवै: “एत्तुधल” शब्द का अर्थ पकड़ना है और इसलिये भाव “नजदिक” या “निकटवर्ती” से बतलाया गया हैं । इस प्रसङ्ग मे एक आचार्य जो एक व्यक्ति के इतना नजदिक हैं उसे समझाया गया हैं। भौगोलिक निकटता के अलावा आचार्य से निकटता कुछ इस तरह भी वर्णन करेंगे कि, वह जिसे हम अपने खुले नेत्र से भी देख सकेंगे (असमान भगवान), वह जो जब हमें रक्षा कि जरूरत हैं हमारी रक्षा करेंगे, वह जो बहुत प्रिय हैं, वह जो हमेशा हम जीव के कल्याण हेतु मदद करते रहते हैं और अन्त में वह जिससे हम बात कर सकते हैं और मिल सकते हैं। वह सब जीवों के बहुत नजदिक हैं।

इवै अन्रेन्रु विट्टो: यह अपने आचार्य को दूसरा इन्सान समझना यह त्याग करना या अस्वीकार करना। श्री देवराज मुनिजी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में वर्णन करते है जो अपने आचार्य को अस्वीकार करते है और उन्हे अपने गुरु के रूप मे स्वीकार नहीं करते। उस पर दृढ़ रहने के अलावा “शरणागति तन्द तन इरै वन ताले (३१वें पाशुर में), इसका मतलब आचार्य के चरण कमलों को एकबार सबकुछ मानना, या उस व्यक्ति द्वारा उनके आचार्य का पूर्णत: अनादर करना और उनको जो उन्हे रोज मिलते है ऐसे अनेक अनगिनत व्यक्तियों मे से एक ही समझना। इसी वजह से वह उन्हें अपने आचार्य की तरह नहीं समझता।

र परनै विरुप्पुरुदल: वह व्यक्ति जो अपने आचार्य का अनादर करता हैं वह भगवान श्रीमन्नारायण को पाने को देखता हैं जो किसी के भी पहुँच के कही बाहर हैं। वह भगवान जिन्हे कोई भी याने शास्त्र भी पूर्णत: नहीं समझा है थोड़ी तो दूरी है, और किसी के भी पहोच से दूर है। वह व्यक्ति ऐसे भगवान से मिलने की इच्छा करता है, इसी सोच के साथ की वही रक्षक है और उससे बहोत नर्म है। श्री देवराज मुनिजी इसी कार्य की तुलना एक सुंदर उपमा से करते हैं।

पोट्टनेत्तन: इसका अर्थ हैं “तुरन्त” यानि बिना परिणाम के बारें में सोचे वह कार्य करना

तन कण सेम्पलित्तिरुन्दु: इसका मतलब हैं आँखे बन्ध करना जैसे कि एक व्यक्ति आराम कर रहा है बिना यह जाने उसका परिणाम क्या होगा।

कैत्तुरुत्ति नीर तूवि: जब कोई प्यासा हो तो वह व्यक्ति अपने पास जो कटोरा उससे पानी पी लेगा। वह उसे पहिले हीं भर कर रख लेगा। परन्तु अगर वह व्यक्ति प्यासा हैं तो वह पानी जमीन पर फेंख देगा।

अम्पुदत्तैप पार्त्तिरुप्पानट्रु: कटोरे से पानी बाहर फेकने के बाद वह व्यक्ति ऊपर आसमान में बादलों कि तरफ देखेगा और यह ईच्छा करेगा कि बादलों में जो जल है उसे बारिश के रूप में मिल जायें। वह यह सोचता हैं कि बादलों में जो बारीश का पानी हैं वह सबसे आसानी से उसे प्राप्त हो जायेगा और जो प्यास का अनुभव अभी वह कर रहा है उसे मिटा देगा। यह उसी के समान हैं जब एक व्यक्ति यह सोचता है कि भगवान श्रीमन्नारायण उसे आसानी से प्राप्त हो जाते हैं और जो इतने आसानी से हमारे लिये तत्पर हैं ऐसे अपने आचार्य कि तरफ वह ध्यान नहीं देता है। यह सादृश्य के कार्य को “तोझिल उवमं” (सादृश्य से कार्य करना) कहते हैं। इस पाशुर के तथ्य को श्रीवचन भूषण के चूर्निकै में समझाया गया हैं “विदाइ पिरंधपोधु करस्थमाना उधगतै उपेक्षितु ज्ल्मूत जलतयुं, सागरा सलिलतयुं, सरित सलिलतयुं वापि कूपा पयसुकलयुं वंजीक्का कदवन अल्लन (श्रीवचन भूषण #४४९)

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३२

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३१                                                            ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३३

पाशुर-३२

मानिडवन एन्रुम गुरुवै मलर मगल कोन
तान उगन्द कोलम उलोगम एन्रुम – ईनमदा
एण्णुगिन्रु नीसर इरुवरुमे एक्कालुम
नण्णिडुवर कीलाम नरगु

३०वें पाशुर में (माडुम मनैयुम), श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी उस विधी विधान शास्त्र के बारें में बात करते हैं जो यह कहता है कि हमें उन लोगों के साथ सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये जो अपने उस आचार्य को सन्मान नहीं देते हैं जिन्होंने हमें आठ अक्षरों वाला तिरुमन्त्रं समझाया है। ३१वें पाशुर में (वेदमोरू नान्किन) यह बताया गया है कि हमारे आचार्य जिन्होंने हमें द्वय महामन्त्रं कहा है जिसमे शरणागति शास्त्र भी है उनके चरण कमल हीं किसी व्यक्ति के लिये उपाय हैं। इन दो पाशुरों में इस तरह आचार्य कि बढाई की गयी है। ऐसे आचार्य को भगवान के अन्य अवतार जैसे रामावतार, कृष्णावतार आदि के जैसे समझना चाहिये। हमें आचार्य अवतार को भगवान श्रीमन्नारायण के विशेष अवतार समझकर आनंदित होना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य को भगवान श्रीमन्नारायण का अवतार न समझता हो और उनको वह दूसरे इन्सानों के जैसे ही समझता है तो ऐसे विचारों के परिणाम को इस पाशुर में समझाया गया है। इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति भगवान के दिव्य मंगल विग्रह (भगवान का अर्चा रूप जिसमें भगवान मंदिरों में विराजमान हैं) किस धातु या उस तरीके से बने हैं इसके खोज या तलाश में लगा हो तो उसके परिणाम को भी इस पाशुर में समझाया गया है।

 गुरुवै – अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य के बारें जिन्होंने हमें मन्त्रं सिखाया और समझाया हैं यह सोचता है कि | मानिडवन एन्रुम – वह हमारे जैसे दूसरे इन्सान हैं | मलर मगल कोन – अगर कोई व्यक्ति भगवान श्रीमन्नारायण के बारें में यह सोचते हैं कि | तान उगन्द कोलम – मूर्ति समझते हैं जिसमें वह स्पष्ट रूप से प्रसन्न हैं | उलोगम एन्रुम – एक मूर्ति जो एक धातु जैसे “पञ्चलोकं” आदि से बना हैं | ईनमदा – और उनके (आचार्य और भगवान के श्रीविग्रह) साथ व्यवहार करना / निकाल देना जैसे अल्पमूल्य / अयोग्य | एण्णुगिन्रु – ऐसे लोग जो ऐसा विचार करते हैं | नीसर – वे नीचे से भी नीचे लोग हटे हैं | एक्कालुम – यह दो प्रकार के लोग (एक जो अपने आचार्य का निरादार करते हैं और एक जो भगवान का निरादार करते हैं) | एक्कालुम – वह सदैव के लिये | नण्णिडुवर – पहुँचेंगे | कीलाम नरगु – नरक में और हमेशा के लिये वहीं रहेंगे।

स्पष्टीकरण:

मानिडवन एन्रुम गुरुवै: हर एक को यह विश्वास करना चाहिये कि भगवान श्रीमन्नारायण ने इस सन्सार में जो निरन्तर जन्म मरण के चक्कर में फँसे हैं ऐसे लोगों का दु:ख दूर करने के लिये “आचार्य” के रूप में अवतार ग्रहण किया है। बहुत से ग्रन्थों में विस्तृत रूप से भगवान नारायण के बारें में कहा गया हैं जिन्होंने मनुष्य रूप में जन्म लिया (जो आचार्य हीं हैं)। अत: आचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण हीं हैं। हमारे शास्त्र यह कहते हैं अगर कोई अपने आचार्य को दूसरे मनुष्य के जैसे हीं व्यवहार करता हैं तो जो कुछ भी ज्ञान उसने अपने आचार्य से प्राप्त किया है वह सम्पूर्ण निष्फल है। मलर मगल कोन तान उगन्द कोलम उलोगम एन्रुम: पेरिया पिरट्टी के स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण खुशी से अर्चा रूप में मन्दिर में वास करते हैं। वह हमेशा हम सब में रहते हैं। परन्तु अगर कोई व्यक्ति इस बात कि खोज करना शुरु करता है वह मूर्ति किस संयोजन और धातु जैसे पञ्चलोकं, लकड़ी आदि से बनी है वहीं अपने आप में एक अपचार है। श्री शठकोप स्वामीजी अपने सहस्त्रगीति ८-१-४ “उमर उगन्धा उरुवं निनुरुवं” में भगवान श्रीमन्नारायण के इस अर्चा रूप के बारें में समझाया हैं। इसका यह अर्थ हैं कि अगर भक्त कौनसे भी रूप में भगवान श्रीमन्नारायण की आराधना करता है तो भगवान उसे उसी रूप में खुशी से उसकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं और विराजमान होते हैं। उस अर्चा रूप में भगवान अपने आप को स्पष्टता से अपने दूसरे श्रेष्ठ रूप के जैसे परमपदधाम, तिरुपार्कदल आदि में दर्शन देते हैं। यह रूप और कुछ नहीं वह रूप है जो उनके भक्त जन उनसे अपेक्षा करते हैं और इसलिये यह उनका रूप श्रेष्ठ हो जाता है। ऐसे अर्चा रूप में जिनसे उनके भक्त जन उनसे अपेक्षा करते हैं वह खुशी से आकर उनके पास अपने श्रेष्ठ गुणों के साथ रहते हैं। इसलिये वह अर्चा रूप तुरन्त हीं श्रेष्ठ हो जाते हैं। इसके अलावा जो भी शृंगार आभूषण भगवान ने उनके इस अर्चा रूप में धारण किये हो वह भी भगवान के समान दिव्य हो जाते हैं न कि इसके प्रतिकुल जो सांसारिक विचार और सम्बन्ध होने से। शास्त्र के अनुसार इसको “अप्राकृतं” कहते है। वहीं शास्त्र उनका पूरे कठोरता से विरोध करते हैं जो भगवान के अर्चा रूप का बाह्य दर्शन करते हैं और उस मूर्ति के बारें में खोज शुरू कर देते हैं कि वह किस धातु से बनी हैं और उसका संयोजन क्या हैं। वह उसको केवल एक धातु / लकड़ी समझते हैं और यह विश्वास नहीं करते कि वह सच में वहाँ विराजमान हैं। यह एक बहुत निर्दयी अपचार हैं। इसके लिए एक उदाहरण देते हुए शास्त्र कहते हैं कि यह पाप उसी तरह हैं कि जिस तरह उस कि खोज करना कि एक शिशु अपने माँ के गर्भ से पहिली बार कहाँ से बाहर आया था।

ईनमदा एण्णुगिन्रु नीसर: – यह आदर करना कि वह नीच / तुच्छ है। यह दोनों प्रकार के लोगों को शामिल करता है वह जो अपने आचार्य को मनुष्य समझता है और वह जो भगवान के विग्रह को धातु जो पञ्चलोकं आदि से बना है ऐसा समझता है। “नीसर” शब्द यह समझाता है कि वह लोग जिनके नीचे और कोई व्यक्ति कहीं भी नहीं हैं। यहाँ दोनों को तीक्ष्ण अपराधी कहा गया है और इसलिये योग्यता अनुसार उन्हें “कर्म चांडालर्गल” कहते हैं क्योंकि उन्होंने अपने आचार्य को मनुष्य और भगवान के अर्चा विग्रह को एक धातु के जैसे देखा हैं। इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों को उनके अत्यन्त नीच विचार के कारण (नीसर) सबसे नीच ऐसा देखा है। तमील पद “उल्लुवधेल्लां उयर वल्लाल” को फिर से यहाँ एकत्रित करना उचित होगा। अगर कोई बढाई के बारें में सोचता हैं और अगर उसके विपरित सोचता हैं तो वह अपचार हैं।

इरुवरुमे: उपर बताये गये दोनों प्रकार के लोगों को एक साथ जोड़कर उनके दोष के कारण उन्हें एक वर्ग “अपराधी” में रखा गया हैं। जबकि एक अपने आचार्य को मनुष्य मानकर अपमान करता है और दूसरा केवल यह प्रश्न करता है और खोज करता है कि भगवान का अर्चा विग्रह किस धातु से बना है और यह ध्यान नहीं देता है कि उस अर्चा रूप में कौन विराजमान हैं। यह दोनों अपराधी को एक ही परिणाम भोगना पड़ेगा जिसकी आगे चर्चा करेंगे।

एक्कालुम नण्णिडुवर कीलाम नरगु: यह दोनों अपराधी नरक हीं जायेंगे और हमेशा के लिये वहाँ हीं रहेंगे। यहाँ हमेशा के लिये का अर्थ है जब भी समय का विचार होगा। जिस प्रकार का नरक यहाँ बताया गया हैं वह बहुत निर्दयी है। वह इतना निर्दयी हैं कि इससे निर्दयी नरक और कौनसा भी हो हीं नहीं सकता। नरक वह जगह है जहां केवल दु:ख ही है यानि यहाँ कण मात्र भी खुशी नहीं हैं जो एक व्यक्ति अनुभव कर सकता हैं न हीं एक पल भी दु:ख से बाहर आ सकता है। नरक वह जगह हैं जहां एक व्यक्ति बिना रुके दु:खों को भोगता हैं। ये अपराधी इस नरक में कोई नियमित समय के लिये नहीं बल्कि आजीवन वहीं रहते हैं। वे उस नरक में हीं पैदा होते हैं, वहीं रहते हैं और वहीं मर जाते हैं। यह जीवन का चक्र ऐसे ही चलता जाता है। इस चक्र का कोई अन्त नहीं है। यह वह लोग हैं जो संसार सागर के चक्र से कभी बाहर नहीं आते हैं और सागर के दूसरे किनारे में नहीं पहुँचते। यह ऐसे मुर्ख हैं जो सन्सार सागर के दु:खों में ही रहते हैं। अत: इन दोनों अपराधियों को बचने के लिये और कोई रास्ता हीं नहीं है। यह दोनों अपराधियों को जोड़ने का विचार यानि अपने आचार्य को मनुष्य समझना और भगवान के अर्चा रूप को धातु कहना तमील व्याकरण “उड़ान नवीर्चि पोरुल” मे बताया गया हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३१

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ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३०                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३२

पाशुर-३१

Ramanujar-Melkote

वेदमोरू नान्किन उट्पोदिन्द मेय्प्पोरूलुम
कोदिल मनु मुदल नूल कूरूवदुम तीदिल
सरणागति तन्द तन इरै वन ताले
अरणागुम एन्नुम अदु

प्रस्तावना:

यह पाशुर यह समझाता हैं कि हमारे आचार्य हीं हमारे लिये सबकुछ हैं। सभी तत्त्वों का अर्थ जो सभी वेदों और अन्य ग्रंथों में बताया गया हैं वह और कुछ नहीं पूर्ण समर्पण कि राह हैं (शरणागति)। शरणागति का यह अर्थ किसी व्यक्ति को उसके आचार्य हीं समझाते हैं। अत: अपने आचार्य के चरण कमलों को हीं हमें सबकुछ समझना चाहिये। इसे इस पाशुर में समझाया गया हैं।

अर्थ:

तीदिल: – निर्दोष को | सरणागति – भगवान श्रीमन्नारायण के पूर्ण शरण होना | तन्द – वह जिसने यह दिखाया हैं वह और कोई नहीं | तन इरै वन – उसके आचार्य हीं हैं, जिन्होंने उसे शरणागति कि राह बतायी। वह उसके भगवान हैं। ऐसे आचार्य के | ताले: चरण कमल |अरणागुम: किसी व्यक्ति के शरण या उपाय हैं। एन्नुम अदु: शरणागति शास्त्र जो यह कहता हैं और | ओरुणाङ्गुवेधं: अनोखे और अद्भुत वेद जिसमे ऋग, यजुर, साम और अथर्व शामील हैं | ट्पोदिन्द: वह वस्तु जो वेदों से भरा हैं | मेय्प्पोरूलुम: सच्चा और भितरी मतलब | कोदिल: निर्दोष का | मनु मुदल नूल: शास्त्र जैसे “मनुशास्त्र” आदि। कूरू वदुम: वह विचार जो “मनुशास्त्र” जैसे शास्त्रों में कहा गया हैं | अधुवे: वह और कुछ नहीं बल्कि अपने आचार्य के चरण कमलों के शरण होना।

स्पष्टीकरण:

वेदमोरू नान्किन उट्पोदिन्द मेय्प्पोरूलुम: “ओरु” पद यहाँ वेदों के अद्भुत गुणों को समझाता हैं, यानि उन्हें इंसान ने नहीं बनाया। उन्हें किसी ने लिखा नहीं हैं और बिना शंका, संदेह और उलझन के हैं। उनमें बेचने के हीसाब से भी कोई फेरबदल नहीं किया गया हैं।

उपर के पद में “नांगु” यानि चार हैं इसलिये वह चार वेदों को यानि ऋग, यजुर, साम और अथर्व वेदों को संभोधीत” करता हैं। किसी भी वस्तु को सुरक्षित और दृढ़, कसा हुआ रखने के लिये उसे आठ छोटे धागे वाले रस्सी से बाँधते हैं। उसी तरह तिरुमन्त्रं जिसमें आठ अक्षर हैं वह भगवान श्रीमन्नारायण को अपने में सुरक्षित और दृढ़ बाँध कर रखता हैं। यह “अष्टाक्षर मन्त्रं” सभी वेदों में अंतर्निहित हो गया हैं और अदृश्य हैं (यह देखने को बहुत अच्छा हैं कि तिरुचंधविरुत्तं कहते हैं “एट्टीनोदुमिरण्देनुंकैरिनालनंथनैकट्टि”)। वेद (जो सब को नापता हैं) के शब्द सभी ग्रन्थों से उच्च हैं और उसका कार्य है की जो अंतिम भगवान श्रीमन्नारायण के बारें में ही बात करता हैं उसे “गुप्त” रखते हैं। क्योंकि वेदों को “चार” भागों में बांटा गया हैं वह यह प्रमाण करता हैं कि यह कुछ और नहीं जो कि वेद के एक कोने में एक साथ रखा गया हैं। वह यह बताता हैं कि वेद जिसे अनगिनत भागों में बांटा गया हैं उसका अभिप्राय और कुछ नहीं बल्कि अष्टाक्षर मन्त्रं हैं। और इस मंत्र का अर्थ सभी को बटोरने के लिये ऊपर नहीं रख्खा गया हैं। उसको धन कि तरह संभालकर रखा गया हैं क्योंकि वहीं अंतिम भगवान श्रीमन्नारायण हैं। “मेय्प्पोरूलुम” पद का अर्थ “सच्चा भितरी”। वह एक कदम आगे बढ़कर कहता हैं कि वेद उस अंतिम वस्तु कि केवल बढ़ाई नहीं करते परन्तु भगवान श्रीमन्नारायण के सच्चे गुण को कहते हैं।

कोदिल मनु मुदल नूल कूरूवदुम: “कोदु” दोष हैं और इसलिये “कोदिल” का अर्थ हैं वह जो दोषरहित हैं। यहा जो दोष दर्शाया गया हैं वह वों दोष हैं जब एक विशेष वस्तु को उसके मूल से दूसरे तरीखें से बताया गया हो और उसके मूल से तरंगे और मनोगतियों को पहचान कर उसे उभारा गया हो। उदाहरण के तौर पर अगर किसिको सागर में शंख दिखा है तो उसे यह कहना पड़ेगा कि उसने शंख देखा हैं। परन्तु अगर वह केवल आकर्षण के लिये यह कहता हैं कि उसने चांदी देखी हैं तो वह बयान एक झूठा बयान होगा। मनु शास्त्र एक ऐसा शास्त्र हैं जो दोष रहित हैं। “कोदिल” विशेषण “मनुशास्त्र” के लिये हीं इस्तेमाल किया गया हैं जिसका यह समझना हैं कि जो मनु जो भी कहता हैं वह औषधि हैं। ऐसा मनुशास्त्र कि बढाई का परिणाम हैं। इसलिए किसी को भी मनुशास्त्र में कोई भी अनुसंधान करने कि जरूरत नहीं हैं चाहे हम उसका शब्दशः ले और या फिर अपने जीवन में उतारे। यह विशेषण “कोदिल” जब दुसरें ग्रन्थों को योग्य करने के लिये इस्तेमाल किया जाता हैं तब उन ग्रन्थों में जो सम्बन्ध हैं उनकि बढाई का पता चलता हैं और अन्त में उसकी प्रतिष्ठा को सहारा देता हैं। वह यह कहने के लिये कि यह ग्रन्थ हमें कोई भ्रम या उपाय आचरण के बारें में नहीं कहता हैं। ऐसे ग्रन्थ में इतिहास जैसे सात्विकस्मृति, श्रीविष्णुपुराण, श्रीमदभागवत, महाभारत और आगमास जैसे पञ्चतन्त्रं आदि शामील हैं। उपर बताये हुए ग्रन्थों में हमें यह मतलब समझाता हैं जो “अष्टाक्षर मन्त्रं” के खजाने में हैं जो वेदों का हृदय हीं बनाता हैं। वह धन जिसे खजाने के जैसे रखा हैं वह और कुछ नहीं शरणागति कि राह हैं और मनु जैसे ग्रन्थों का यह कर्तव्य हैं कि इस अर्थ को स्पष्ट रूप से और निर्मलता से कहें। इसका तात्पर्य यह हैं कि शरणागति कि राह वेदों कि कठिन बातों से और मनुशास्त्र जैसे ग्रन्थों से आती हैं।

तीदिल सरणागति तन्द:- “तीदु” का अर्थ दोष हैं और इसलिये “तीदिल” का अर्थ हैं दोषरहित। शरणागति कि राह तो दोषरहित हैं। जिन ग्रन्थों में हमें शरणागति क्या हैं यह बताया हैं उन्हीं ग्रन्थों के अन्य अध्याय में शरणागति के अलावा अन्य राह के न्यूनता बताता हैं जैसे कर्म योगं, ज्ञान योगं, भक्ति योगं आदि। यह अन्य राह हर कोई नहीं कर सकता हैं। कुछ हीं लोग इसे करने के लिये योग्य हैं। जो योग्य हैं वह भी सभी इन अन्य राह को कर नहीं पाते जो यहाँ बताया गया हैं। अगर कोई इन इतर राह में बाताये के अनुसार नहीं रहता हैं तो उसे वह कहीं नहीं ले चलता हैं। क्योंकि हमारे पास सबसे सुलभ मार्ग हैं “शरणागति” इसलिये हमें कोई अन्य राह पर चलाने कि कोई जरूरत नहीं हैं। इस शरणागति के राह में कोई दोष नहीं देख सकता हैं जहां भगवान श्रीमन्नारायण से सीधा सम्पर्क हैं। यह उसकी सबसे उच्च योग्यता हैं जैसे कि भगवद्विशयमं के अनुसार “प्रपत्ति” शब्द खुद बताता हैं कि वह “ईश्वर” (श्रीमन्नारायण) हैं। यह सुलभ मार्ग हमें हमारे आचार्य ने दिया हैं जैसे कि एक गरीब को हमेशा के लिये जीवन का आनंद लेने के लिये बहुत सा धन दिया गया हो। ऐसी शरणागति का राह हमको हमारे आचार्य ने दि हैं।

तन इरै वन: ३०वें पाशुर में, जिन्होंने हमें अष्टाक्षर महामन्त्रं समझाया (एत्तेझुतुंथंधवने) हैं उन्हें हीं हमारे आचार्य बताया गया हैं। इस पाशुर में उन्हें हमें जिसने शरणागति (शरणागतिथंधवं) दिया हैं ऐसा बताया हैं। इससे हम यह समझ सकते हैं अष्टाक्षर महामन्त्रं के अर्थ और शरणागति के अर्थ में भेद हैं। इस पाशुर में इसे गुप्तानिय रूप से “शरणागति” ऐसा समझाया गया हैं और पिछले पाशुर में इसे स्पष्ट रूप से “आठ अक्षरों” वाला मन्त्र बताया गया हैं। तीन मुख्य मन्त्रं हैं वह तिरुमन्त्र, द्वयमन्त्र और चरमश्लोक। तिरुमन्त्र और चरमश्लोक में हमारे पूर्वजो कि यह प्रथा रही हैं कि मन्त्र के अर्थ को गुप्तनिय रखना और मन्त्र को स्पष्ट रूप से कहे। और द्वयमन्त्र के सम्बन्ध में जो शरणागति कि बात करता हैं वें नाहीं उसके अर्थ को छिपाते थे बल्कि उस मन्त्र को भी सब के सामने न बोलकर वह केवल उसे अपने हृदय में हीं बोलते थे। इससे हम यह जान सकते हैं कि उस मन्त्र जिसे द्वयमन्त्र कहते हैं उसमें कोई विशेष बहुमूल्य बात हैं। इसके बारें में कहते हुए श्रीवेदान्तदेशिक स्वामीजी द्वयमन्त्र के बारें में यह कहते हैं कि हर कोई भगवान के सुन्दर और पवित्र विग्रह, पवित्र गुणों, परमात्मा के गुणधर्म, उनके अनगिनत लक्षण,हमेशा खुश रहने वाले नित्यात्मा, मुक्तामा आदि के बारें में सीख सकता हैं। फिर भी अगर कोई व्यक्ति शरणागति कि राह का पालन करता हो और अगर वह भगवान श्रीमान्नारायण के परम धाम जाना चाहता हो तो द्वयमन्त्रं अपने आप को स्पष्ट बनाता हैं जैसे सुन्दर रूप और वह उस व्यक्ति को आनंददायक करता हैं। यह सब सीधे रूप से शरणागति मन्त्र के परम बढाई कि तरफ नोक करता हैं जो द्वयमहामन्त्रं के अन्दर हैं। ऐसा द्वयमहामन्त्रं वह हैं जो एक शिष्य को उसके आचार्य ने पढाया हैं। अत: आचार्य जिन्होंने किसी शिष्य को द्वयमहामन्त्रं कि शिक्षा दि हैं वह उस व्यक्ति के लिए सर्वोत्तम भगवान हैं। “इरै वन” के पहिले “तन” का प्रयोग करने का अर्थ हैं कि जैसे भगवान श्रीमन्नारायण हीं सब के लिये भगवान हैं हमारे लिये “आचार्य” हीं भगवान हैं। वह एक व्यक्ति के लिये या फिर कुछ व्यक्तियों के लिये भगवान हैं। भगवान कि बात “तन” के प्रयोग में छिपा हैं।

ताले: आचार्य के चरण कमल जो एक व्यक्ति के लिये भगवान हैं। अगर केवल हम “ताले” शब्द को देखें तो हम यह समझ सकते हैं कि जिन्होंने भगवान को पकड़ रखा हैं और जिन्होंने आचार्य को पकड़ रखा हैं उनके लिये उनके चरण कमल हीं शरण / उपाय हैं। “ताले” शब्द में “एकाराम” शब्द हैं जिसका यह मतलब हैं कि आचार्य के चरण कमलों को और किसी कि मदद कि जरूरत नहीं हैं। वह अपना काम खुद हीं कर लेंगे।

अरणागुम एन्नुम अदु: “अरण” यानि शरण; केवल आचार्य के चरण कमल हीं किसी व्यक्ति के लिये उपाय हैं। “इरैवन” शब्द के लिये तीन साधारण / जातिगत अर्थ हैं वह हैं नेतृत्व, राह और लाभ। “इरैवन” वह हैं जिसमें यह तीन हैं। परन्तु “तन इरैवन” में आचार्य के चरण कमल हीं किसी व्यक्ति के लिये मार्गदर्शक हैं। वहीं चरण कमल किसी के लिये राह हैं और वहीं चरण कमल किसी व्यक्ति के लाभ का कार्य करती हैं।

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-31-vedham-oru-nangin/

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