Daily Archives: July 25, 2015

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३७

Published by:

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३८

पाशुर-३७

images

पोरूलुम उयिरूम उडम्बुम पुगलुम
तेरूलुम गुणमुम सेयलुम अरुल पुरिन्द
तन आरियन पोरूट्टाच सङ्गर पम सेय्बवर नेञ्जु
एन्नालुम मालुक्किडम

प्रस्तावना: इस पाशुर में श्री देवराजमुनि स्वामीजी यह कहते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण उन लोगों के हृदय में विराजमान रहते हैं जो अपने आचार्य को हीं धन, आत्मा, शरीर आदि समझते हैं।

अर्थ: मालुक्किडम – भगवान श्रीमन्नारायण, एन्नालुम – हमेशा, डम– विराजमान , नेञ्जु – हृदय में , सङ्गर पम सेय्बवर – जो कृपा, पोरूलुम – अपना धन , उयिरूम – अपनी जिन्दगी (हर एक कि आत्मा) , उडम्बुम – उनका शरीर , पुगलुम – ध्यान लगाने का स्थान , तेरूलुम – उनका ज्ञान , गुणमुम – उनके अच्छे गुण और ,

सेयलुम – उनके कर्म , तन आरियन पोरूट्टाच – उनके आचार्य के सिवाय और कोई नहीं जिन्होंने , अरुल पुरिन्द – इस शिष्य को अपनाया हैं अपने पूर्ण दया से,

स्पष्टीकरण:

पोरूलुम: एक शिष्य के सभी सांसारिक धन
उयिरूम: एक शिष्य का जीवन
उडम्बुम: एक शिष्य का शरीर
पुगलुम: एक शिष्य के ध्यान करने का स्थान (घर आदि,)
तेरूलुम: एक शिष्य का ज्ञान
गुणमुम: एक शिष्य के अच्छे गुण जैसे नम्रता।
सेयलुम: एक शिष्य के सभी कार्य का स्वर

अरुल पुरिन्द तन आरियन पोरूट्टाच: यहाँ आचार्य के गुणों को दर्शाया गया हैं। वह एक व्यक्ति हैं जो हमसे अपने कार्य के बदले में कुछ नहीं माँगते और यह भी नहीं देखते कि वह शिष्य उनके जरूरत का कार्य करेगा या नहीं। कुछ भी मांग नहीं कर के , पूर्ण दया रखकर वह अपनी निर्हेतुक कृपा अपने शिष्य पर बरसाते हैं।

सङ्गर पम सेय्बवर नेञ्जु: ऐसे आचार्य के प्रति सम्मान रखकर अगर एक शिष्य अपना सब कुछ जैसे धन, शरीर, घर, ज्ञान, अच्छे गुण और कार्यों का आदर करता हैं तो ऐसे व्यक्ति का हृदय भगवान के लिए निवास स्थान हो जाता हैं।

एन्नालुम मालुक्किडम: भगवान उपर बताये हुए लोगों के हृदय में निवास करते हैं। वह थोड़े समय के लिये नहीं बल्कि हमेशा के लिये निवास करते हैं। अगर शिष्य अपने आचार्य का पूर्ण आदर करता हैं तो भगवान को इस पवित्र विचार से अत्यन्त आनन्द होता हैं और वह हमेशा के लिये वहाँ निवास करते हैं। श्री मधुरकवि आल्वार ऐसे आल्वार थे जिन्हे अपने आचार्य जो कि श्री शठकोप स्वामीजी हैं उनको छोड़ और कोई ज्ञात नहीं

होता था। यह उनके हीं पद से देखा जा सकता हैं “तेवु मर्ररियेन” जिसका अर्थ हैं कि वह सिवाय अपने आचार्य के और कोई दूसरे भगवान को नहीं जानते । उनके हीं एक पद से “अन्नैयाई अत्तानै एन्नै आंदिदुम तन्मयान शठकोपन एन नंबिए” उन्होंने श्री शठकोप स्वामीजी को अपना सब कुछ माना और ऐसा ही सम्मान दिया। श्री कृष्ण ऐसे भक्तों के हृदय में रहना पसन्द करते हैं जिसका हृदय शुद्ध और निर्मल हैं। ऐसे आल्वार का हृदय जो भगवान श्रीमन्नारायण के सिवाय और कोई भगवान को नहीं जानते हैं ऐसा स्थान श्री कृष्ण के लिये हमेशा के लिये वास स्थान बन जाता हैं। श्री देवराज मुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ जो कि ज्ञान सारम हैं उसे “तेरुलारूं मधुरकवि निलय तेलिन्धोन   वाझिये” यह कहकर उत्सव मनाते हैं। अत: हम उनका उनके आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के प्रति प्रेम और आदर देख सकते हैं। श्रीगोदम्बाजी भी इसी श्रेणी में आती हैं। यह हम उनके नाच्चियार तिरुमोलि के पाशुर मे देख सकते हैं “विल्लिपुदुवै विट्टुशित्तर तङ्गल तेवरै वल्ल परिशु वरूविप्परेल अदु काण्डुमे” (नाच्चियार तिरुमोलि १०-१०) |

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source:  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/03/gyana-saram-37-porulum-uyirum/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६

Published by:

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३५                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३७

पाशुर-३६

nammalwar-final

विल्लार मणि कोलिक्कुम वेंकटा पोर कुंरु मुदल
सोल्लार पोलिल सूल तिरुप्पदिगल एल्लाम
मरुलाम इरूलोड मत्तगत्तुत तन ताल
अरूलालै वैत्त अवर

प्रस्तावना: एक शिष्य जो अपने आचार्य के शरण हो गया उसके लिये उसके आचार्य के चरण कमल ही १०८ दिव्य देश हैं। यह बात इस पाशुर में बताई गयी हैं।

अर्थ: अवर – आचार्य अपने, अरूलालै – दया से, वैत्त – रखते हैं, तन ताल – अपने पवित्र चरण कमल, मत्तगत्तुत – शिष्य के मस्तक के उपर रखते हैं, लोड – नाश करते हैं, मरुलाम इरू – अज्ञानता के कारण अंधेरा; इसलिये यह शिष्य को जाना नहीं पड़ेगा, तिरुप्पदिगल एल्लाम – कौन से भी १०८ दिव्य देश (भगवान श्रीमन्नारायण के इस धरती पर विराजमान करने वाले पवित्र स्थान), पोर कुंरु मुदल – तिरुमला जैसे सुन्दर पर्वत भी शामील हैं, वेंकटा – तिरुपति में जो, कोलिक्कुम – बहता हैं, विल्लार – चमकीला, प्रकाशमान और , मणि – अधिक मूल्यवान मणि और वह एक , सोल्लार – जगह हैं जहां बादल मिलते हैं , सूल – और घिरे हुए हैं , पोलिल – सुन्दर बागों से

स्पष्टीकरण:

विल्लार मणि कोलिक्कुम: “विल” का अर्थ चमकीला हैं और “आर” अधिक का प्रतिनिधित्व करता हैं। इसलिये “विल्लार” का एकसाथ में अधिक चमकीला ऐसा अर्थ हैं। “अधिक चमकीला” विशेषण को मणियों के जैसे इस्तेमाल किया गया हैं।

नंमणि वण्णन ऊर अलियुम कोलरियुम
पोन मणियुम मुत्तमुम पू मरमुम पंमणि नी –
रोडु पोरूदुरुलुम कानमुम वानरमुम
वेडुमुडै वेंगडम

श्री भक्तिसार आल्वार के इस पाशुर में हम तिरुवेंकट का वर्णन देख सकते हैं। यह वह स्थान हैं जहाँ याझिस (शेर और हाथी के बीच में प्रजाती), शेर, मणि, अनमोल धातु अधिक मात्र में प्राप्त हो सकते हैं। इसके अलावा पाणि के झरने इस जगह में बहुत प्रमाण में मणि और फूलों के पेड़ लेकर आते हैं। झरने जंगल में हैं जहाँ अधिक संख्या में जंगली जानवर और शिकारी हैं। यह दोनों पाशुर के बीच में जो तिरुवेंकट का वर्णन है उसकी समानता को लिख लेना चाहिये।

वेंकटा पोर कुंरु मुदल: जैसे तिरुवेंकट दिव्यदेश जो सुन्दर तिरुमला के पहाड़ो में हैं और जो शोभायमान प्रकृति से घिरा है।

सोल्लार पोलिल सूल: यह स्थान “तिरुवेंकट” कहा गया है जो बगीचों से घिरा है और बादल उस पर मंडराते हैं। अर्थात यह पहाड़ इतने ऊँचे हैं कि बादलों को आसानी से स्पर्श कर सकते हैं।

तिरुप्पदिगल एल्लाम: भगवान के सभी १०८ दिव्यदेश वह स्थान हैं जहाँ भगवान स्वयं स्पष्ट रूप से आनन्दित हैं।

मरुलाम इरूलोड मत्तगत्तुत तन ताल: इसका अर्थ है कि अंधकार के कारण जो गुणों की अज्ञानता है, वह चली जाती हैं।

अरूलालै वैत्त अवर: आचार्य वह है जो अपने दया के कारण अपने शिष्य पर अपने चरण कमलों को रखते हैं। “अरूलालै” शब्द का अर्थ यह है कि आचार्य अपने चरण कमल को शिष्य पर किसी निमित्त के कारण नहीं रखा हैं। कोई यह प्रश्न कर सकता हैं कि शिष्य द्वारा जो अच्छा कार्य किया गया है उसके इस लक्षणों को देखकर आचार्य उनके चरण कमल उसके मस्तक पर रखते है। हालकि ऐसी कोई बात नहीं क्योंकि वह हम से कुछ भी अपेक्षा नही करते हैं। वह अपने नांमुगन तिरुवंदादि # ४८ चरण कमल केवल दया के कारण रखते हैं और इसलिये उन्हें शिष्य से कुछ भी अपेक्षा नहीं होती हैं। वह उसकी रक्षा के लिये करते हैं। “तिरुवेंकटं” को इस पाशुर में प्रतिनिधी के तौर पर इस्तेमाल किया गया हैं और इसलिये परमपद, तिरुपार्कदल आदि। वह भगवान के विभव अवतार जैसे राम, कृष्ण और अन्तर्यामी आदि को शामील किया हैं जहाँ वह सब के अन्दर विराजमान रहते हैं। इसलिये शिष्य को सभी पाँच स्थान जहाँ भगवान स्वयं को स्पष्ट करते हैं (पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चा) वह ओर कुछ नहीं आचार्य के चरण कमल हीं हैं। यही वह बात हैं जिसे श्री वचनभूषण में समझाया गया हैं जो शिष्य के गुण के बारें में चर्चा करता हैं। चूर्निका का भाव यह हैं “पाट्टु केत्कुम इदमुम, कूपिदु केत्कुम इदमुम, कुधिता इदमुम, वलैता इदमुम, ऊतुं इदमुम एल्लां वगुता इदमे एनृ इरुक्का कदवन” (चूर्निकाई #४५०)। इसका अर्थ इस प्रकार हैं: पाट्टु केत्कुम इदमुम = परमपद, कूपिदु केत्कुम इदमुम = तिरुपार्कदल, कुधिता इदमुम = अवतार जैसे राम, कृष्ण आदि जैसे शामील; वलैता इदमुम = अंतर्यामित्वम (वह गुण जिससे भगवान हम सब के अंदर स्पष्ट रहते हैं); ऊतुं इदमुम = मन्दिर जहां भगवान स्वयं को अर्चा रूप में प्रत्यक्ष करते हैं; एल्लां एनृ इरुक्का कदवन = यह पाँचो के साथ इस तरह व्यवहार करना; वगुता इदमे = आचार्य के चरण कमल || एक अच्छे शिष्य के यही लक्षण हैं कि वह उपर बताये हुए पाँच भगवान के स्वरूप को पकड़कर अपने आचार्य को हीं उपाय समझे । इसलिये हम सब को अपने आचार्य को भगवान का हीं स्थान देना चाहिये। यह बात श्रीरामानुजनूत्तंदादि के पाशुर #१०५ में देखा जा सकता हैं।

इरुप्पिडम वैहुंदम वेंगडम मालिरूम शोलैयेन्नुम
पोरुप्पिडम मायनुक्केंबर नल्लोर अवैतन्नोडुमवन्दु
इरुप्पिडम माय निरामानुजन मनत्तु इन्न्वन वन्दु
इरुप्पिडम एनतनिदयत्तुल्ले तनक्किंबुरवे

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source:  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/03/gyana-saram-36-villar-manikozhikkum/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

thiruvAimozhi – 1.4.8 – nIyalaiyE siRupUvAy

Published by:

srI:
srImathE satakOpAya nama:
srImathE rAmAnujAya nama:
srImath varavaramunayE nama:

Full series >> First Centum >> Fourth decad

Previous pAsuram

rama-and-bharatha

Introduction for this pAsuram

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s introduction

No specific introduction.

Highlights from nanjIyar‘s introduction

In the eighth pAsuram – looking at a pUvai (myna) bird, parAngusa nAyagi tells about her great fatigue (exhaustion) that was caused due to separation from emperumAn.

Highlights from vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s introduction

Subsequently, parAngusa nAyagi tells her young pet myna which was raised by her, “Go and tell the one who has endless vAthsalyam (motherly forbearance) about my disease (in separation)”.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s introduction

In the Eighth pAsuram, parAngusa nAyagi tells about her disease to her pet myna which is exhausted seeing her state of fatigue.

Highlights from nampiLLai‘s introduction as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

Eighth pAsuram – Previously when parAngusa nAyagi was discussing and sharing her emotion, the pUvai (myna) also sustained itself – but when she was exhausted, it also became exhausted. Looking at that myna, parAngusa nAyagi says “‘Previously I told you to inform my state to him’ – you ignored my requests out of pride, now I am going to die soon. So, you find some one who can take care of you”. pUvai – nAgaNavAippuL – a type of bird [resembling our myna].

pAsuram

நீயலையே சிறுபூவாய் நெடுமாலார்க்கு என் தூதாய்
நோய் எனது நுவலென்ன நுவலாதே இருந்தொழிந்தாய்
சாயலோடு மணிமாமை தளர்ந்தேன் நான் இனி உனது
வாய் அலகில் இன்னடிசில் வைப்பாரை நாடாயே

nIyalaiyE siRupUvAy nedumAlArkku en thUdhAy
nOy enadhu nuvalenna nuvalAdhE irundhozhindhAy
sAyalodu maNimAmai thaLarndhEn nAn ini unadhu
vAy alagil innadisil vaippArai nAdAyE

Word-by-Word meanings (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

siRu pUvAy – Oh bird that is small due to your tender age!
nedumAlArkku – One who is greatly mad (Out of unbounded vAthsalyam towards his devotees)
en thUdhAy – going as my messenger
enadhu – my
nOy –  disease of separation
nuval enna – having requested you to tell
nuvalAdhE – not telling him
irundhu ozhindhAy – ignored me out out of pride (of not desiring to go on my behalf)
nIyalaiyE – isn’t that you?
nAn – I
sAyalodu – radiance
maNi – worthy of praise
mAmai – color
thaLarndhEn – lost
ini – after being engrossed in him like this
unathu – your
vAy alagil – inside your beak
in – sweet
adisil – rice/food
vaippArai – one who would feed
nAdAy – search for them outside

Simple transalation (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

Oh myna that is small due to your tender age! Having requested you to go as my messenger and tell emperumAn who is greatly mad (Out of unbounded vAthsalyam towards his devotees) about my disease in separation, you ignored my request out of pride despite your being raised by me. I have lost my radiant lustre and colour from my body. After this, you have to search for someone who can comfortably feed you sweet food that fits your beak/mouth.

From this, it can be understood that not performing small kainkaryams to gataka (AchArya) is a loss to oneself (sishya). Also, “siRu pUvAy” (small myna) – gatakas (AchAryas) even while young, are to be respected/cherished, is understood.

vyAkyAnams (commentaries)

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s vyAkyAnam

Similar to vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s translation.

Highlights from nanjIyar‘s vyAkyAnam

Similar to piLLAn‘s vyAkyAnam.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s vyAkyAnam

Similar to nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from nampiLLai‘s vyAkyAnam as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

  • nIyalaiyE – Isn’t this you? I requested you to inform my state to him – but you have ignored my request. So, we have come to this situation because of your inaction. If you informed him and he did not turn up, it is his fault – but now we cannot say that it is his fault since you have not gone and informed him. parAngusa nAyagi establishes that bhagavallAbam (achieving emperumAn) is by the efforts of gataka (AchArya). Even though one has eternal relationship with bhagavAn, AchArya is cherished due to the favour (of reminding about that eternal relationship) done by him. As explained in “AdhadhItha yathO gyAnam tham pUrvam abivAdhayEth” – one shall first offer obeisances to AchArya from whom one grasps different types of knowledge.
  • sIRu pUvAy – youthful myna – your immaturity caused this difficulty for us.
  • nedumAlArkku – you don’t need to create vyAmOha (bewilderment) in him (he is already greatly mad about his devotees). In thamizh, mAl means mad.
  • en thUdhAy – if both were equally longing for each other, there is no need for the messenger.
  • nOy enadhu – my disease. It is like the disease of bharathAzhwAn – this is explained as something which lasts for long time unlike chAthurthikam (a type of fever which is considered fatal) – this is not a real disease but it is the disease of separation. nampiLLai beautifully quotes srI rAmAyaNam ayOdhyA kANdam 100.1 “jatilam chiravasanam prAnjalim pathitham bhuvi| dhadharSa rAmO dhurdharSam yugAnthE bhAskaram yathA ||” (Having matted hair, wearing tree-bark-robes, having joined palms, lying flat on the earth. srI rAma  is unable to bear that vision that is like the radiant sun during dissolution). This slOkam explains the state of parAngusa nAyagi and nampiLLai explains the slOkam word-by-word:
    • jatilam – When dhaSaratha sees beautiful garlands, he immediately says “this will be nice for bharatha’s hair” – such hair is matted now
    • chiravasanam – When dhaSaratha sees beautiful clothes, he says “this is for our son” – such bharatha is wearing tree-bark-robes.
    • prAnjalim – one who always performs charity to those who join their palms towards him – he now has joined palms.
    • pathitham bhuvi – the bharatha who is said as “ankE bharatham Aropya” (srI rAma placing bharatha on his lap), one who sleeps on lap since he is so tender that even sleeping on bed could be irritating – he is now lying on the ground.
    • dhadharSa rAmO dhurdharSam – srI rAma never takes his eyes off his younger brother bharatha – now srI rAma is incapable of seeing him due to his state
    • yugAnthE bhAskaram yathA – Not only that, it seemed like ultimate dissolution was dawning on him.
  • sAyalodu maNimAmai thaLarndhEn nAn – What is the result of your not informing my state to him? I lost both my lustre and colour. The myna said “I will inform him at once”; but what is the use of building a dam after the floods had drained? Similarly, what is the use of informing now after my losing everything?
  • ini unadhu vAyalagil innadisil vaippArai nAdAyE – Even if he comes now, the lost lustre and colour will not be back. You go and seek out your caretaker now. periya thirumalai nambi had a small archchA vigraham (idol) of krishNa named “veNNeykkAdum piLLai” (one who dances for butter) in his thiruvArAdhanam. In his last moments, he asked to remove the screen in front of the thiruvArAdhana perumAL and said to the emperumAnsAyalodu maNimAmai thaLarndhEn nAn, ini unadhu vAyalagil innadisil vaippArai nAdAyE” (My time is up here, you have to find someone who will worship you in this world).

In the next article we will enjoy the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३५

Published by:

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३४                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३६

पाशुर-३५:

lord-vishnu-wallpapers

एन्रुम अनैत्तुयिर्क्कुम ईरञ्सेय नारणनुम
अन्रुम तन आरियन पाल अन्बोलियिल – निन्र
पुनल पिरिन्द पङ्गयत्तैप पोङ्गु सुडर वेय्योन
अनल उमिलन्दु तान उलर्त्तियट्रु

प्रस्तावना:

आखरि दो पाशुर में स्वामीजी श्री देवराज मुनि लोगों के मूर्ख कार्य को समझाते हैं वह जो अपने आचार्य का अनादर करते हैं और खुद हीं जिसे उन्होंने देखा भी नहीं हैं, दूर रहते हैं ऐसे भगवान कि हमें उनकी शरण मिलेगी इस आशा के साथ उनको प्राप्त करने कि कोशिश करते हैं। ३३वें और ३४वें पाशुर (पट्रु गुरूवैप और एट्ट इरुन्द) विशेष समानताओं के साथ उपाय किया हैं। इस पाशुर में स्वामीजी श्री देवराज मुनि इस तथ्य को समझाते हैं कि जिस मनुष्य को अपने आचार्य में प्रेम न हो ऐसे मनुष्य की भगवान भी कोई मदद नहीं करेंगे बल्कि उसके मूर्ख कार्यों के लिये उसे दण्ड ही देंगे।

अर्थ:

पङ्गयत्तैप – एक कमल का पुष्प अगर वों | पिरिन्द –बिछड़ जाता हैं उसके | निन्र पुनल – घर के पानी से जो कि उसके लिए पोषक हैं तब | वेय्योन – सूर्य उसके | पोङ्गु सुडर – तेज जलती किरणों से | तान – वहीं सूर्य जो एक समय उस कमल को खिलने में मदद किया था वह अब | अनल उमिलन्दु – अग्नि के गेंद उस पर फेंकेगा | उलर्त्तियट्रु – और उस कमल का अस्तित्व तबाह कर देगा। उसी तरह वह जो | एन्रुम – हमेशा | ईरञ्सेय – वह जो अनगिनत दया दिखाता हैं | अनैत्तुयिर्क्कुम – जीवन के प्रति | नारणनुम – और वह जिसे श्रीमन्नारायण भी कहते हैं | तन आरियन पाल – अगर भगवान यह देखते हैं कि उस व्यक्ति को अपने आचार्य के प्रति कोई लगाव / मेल नहीं हैं | अन्बोलियिल – और अपने आचार्य के प्रति पूर्ण भक्ति खो देता हैं | अन्रुम – तब उन्हें (श्रीमन्नारायण) क्रोध आता हैं और उस व्यक्ति को नष्ट कर देता हैं।

स्पष्टीकरण:

एन्रुम: इस पद का अर्थ “नित्य” / “सदैव” हैं जिसमे भूत, वर्तमान और भविष्य शामिल हैं।

अनैत्तुयिर्क्कुम: सभी जीवात्माओं

ईरञ्सेय नारणनुम: भगवान नारायण हर समय सभी जीवात्माओं पर कृपालु हैं। “नारायण” शब्द भगवान और जीवात्मा के बिचमें न टुटने वाला स्वभाव को वर्णन करता हैं। “नार” शब्द में सभी जीवित और निर्जीव दोनों जीवात्मा शामील हैं। “अयणम” शब्द नारायण में भगवान श्रीमन्नारायण सभी जीवात्माओं के जीवन को दर्शाता हैं। इनके बिना किसी के भी अस्तित्व होने का कोई सवाल हीं नहीं होता। भगवान मे हीं सब के पीछे पालन पोषण करने का और सब के जीवन को चलाने का बल हैं। यह मतलब “नारायण” शब्द में बताया हुआ एक मुख्य मतलब हैं जिसे “नार” और “आयण” में अलग किया गया हैं। यह बात श्रीआण्डाल ने तिरुप्पावै के २८वें पाशुर में कहा हैं “उन्तन्नोडु उरवेल् नमक्कु इङ्गोलिक्कवोलियादु”। श्रीभक्तिसार स्वामीजी भी अपने पाशुर में यह समझाये हैं “नां उन्नै अंरी इलेन कंडाई नारणने!!! न्ल एन्नै अंरी इलै”। अत: हम यह देख सकते हैं की वह श्रीमन्नारायण हीं हैं दोनों शुद्ध और अशुद्ध स्थिति में और वहीं यह हम सब कि ताकत हैं जो हमारे पिछे ड़ी हैं। इसलिये क्योंकि भगवान हर छोटे काम में भी प्रवेश करते हैं वह उनके अनगिनत गलतियाँ जो वह करते हैं उसे देखते हैं परंतु वह उन्हें दोष न देखकर उसे आशीर्वाद मानते हैं। यह गुण को वात्सल्य कहते हैं जो की “नारायण” शब्द का अत्यंत प्रचलित और अंतिम निर्णय है। इसलिये वह भगवान हैं जो अपनी अनगिनत दया और करुणा सभी जीवित और निर्जीव वस्तु पर हमेशा के लिये और हर वक्त बरसाते हैं ।

एन्रुम: “एन्रुम” क्रिया का अर्थ क्रोधित होना हैं। इस प्रसङ्ग इसका यह मतलब हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण गुस्सा होंगे। भगवान का गुस्सा होना हीं दण्ड हैं और उनका खुश होना आशीर्वाद हैं। यह समान शब्द पेरिया तिरुमोझि के पाशुर के पद में देखा जा सकता हैं “अंरिया वाणं” जिसका भी वही अर्थ हैं। इस पाशुर के दूसरे भाग में यह समझाया गया हैं कि किस परिस्थिति में दयालु श्रीमन्नारायण गुस्सा होते हैं।

तन आरियन पाल अन्बोलियिल: जो पिछले खंड में परिस्थिति बताई गई हैं वह तब हैं जब किसी व्यक्ति को अपने आचार्य के प्रति बिल्कुल भी भक्ति नहीं होती हैं। पिछले दो पाशुर में जो समझाया गया हैं (“एट्टा इरुन्धा गुरूवै और पट्रु गुरूवै”) कि अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य को एक इन्सान समझता हैं और उनका अनादर करता हैं जैसे कि वह नश्वर हैं ऐसे अनादर करके और यह सोचकर कि वह भगवान नहीं हैं तो वह कार्य सबसे बड़ी मूर्खता हैं। इस खयाल पर आगे बढ़ते हुए अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य का एक मनुष्य के तरह निरादर और तिरस्कार करता हैं और उनके प्रति थोडी भी भक्ति न हो तो भगवान श्रीमन्नारायण भी उस व्यक्ति पर क्रोधित होंगे। इस बात को एक विशेष समानता के साथ समझाया गया हैं जिसे आगे देखेंगे।

निन्र पुनल पिरिन्द पङ्गयत्तैप: यह समानता एक सुन्दर कमल पुष्प कि दि गयी हैं जो तालाब, झील आदि में बसता हैं। अगर ऐसा कमल पुष्प जल के बाहर रहता हैं तब उसके पिछे होने वाली घटना को समझाया गया हैं।

पोङ्गु सुडर वेय्योन: सूर्य जैसे कि हम सब जानते हैं कि बहुत तत्प, चमकीला और अपने चमक से सबको चकित करता हैं। जैसे श्री कुलशेखर आल्वार यह बताते हैं “सेंगमलं अंधरं सेर वेंगधिरोर्क्कू अल्लाल”, एक कमल पुष्प सूर्य के सिवाय किसीसे भी नहीं खिलता। अगर कोई अप्राकृतिक तरिके से रोशनी उत्पन्न करके उस कमल पुष्प को खिलाना चाहता हैं तो वह बुरी तरह नाकाम हो जायेगी क्योंकि कमल पुष्प केवल प्राकृतिक सूर्य कि रोशनी से हीं खिलता हैं। जब वह कमल जल के अन्दर हैं तो सूर्य उसकी हमेशा खिलाने में मदद करता हैं।

अनल उमिलन्दु तान उलर्त्तियट्रु: अगर कमल पुष्प जल से बाहर हैं और सूर्य आग के गोले उगलेगा तो वह उस कमल का जीवन खत्म कर देगा । अत: हम यह देख सकते हैं कि वह सूर्य जो एक कमल पुष्प जो जल में हैं उसके खिलाने में सहायक हैं वहीं सूर्य उस कमल पुष्प अगर वह जल के बाहर हैं तो उसका विनाश कर देगा । उसी तरह अगर एक व्यक्ति में आचार्य भक्ति, प्रेम और अच्छा अनुभव हैं तो भगवान श्रीमन्नारायण उस पर कृपा / आशीर्वाद देंगे। परन्तु अगर वहीं व्यक्ति अपने आचार्य का “कोई नहीं” ऐसा अनादर करता हैं तो भगवान उसे अपने गुस्से से तबाह कर देंगे। इस प्रसङ्ग में हमें यह समझना हैं कि “कृपा” और “संहार” क्या हैं। आशीर्वाद का अर्थ हैं कि श्रीमन्नारायण उस व्यक्ति जिसे आचार्य भक्ति हैं उसके ज्ञान को यशस्वी बनायेंगे। वह यह ध्यान रखेंगे कि उस व्यक्ति का ज्ञान सहीं दिशा कि ओर बढ़ रहा हैं की नहीं। विपरीत में, दण्ड / संहार इस प्रसङ्ग में उस व्यक्ति के ज्ञान को घटा देगा और उसे अज्ञानी (मूर्ख) बना देगा। इसलिये अगर कोई व्यक्ति अपने आचार्य का अनादर करता हैं जिन्होंने उसे “मंत्रं” का ध्यान कराया तो भगवान श्रीमन्नारायण जो कि सबसे बड़े दयावान हैं उन्हें भी क्रोध आयेगा और वह विरोध करेंगे। यह उसी तरह हैं जैसे सूर्य जो कमल पुष्प जल में रहने से उसको खिलाता हैं और अगर वहीं पुष्प जल के बाहर आगया तो उसे नष्ट कर देता हैं। खुद भगवान श्रीमन्नारायण हीं हर व्यक्ति के जीवन के तत्व विचार समझाने के जिम्मेदार हैं परन्तु अगर उस व्यक्ति जिसकी आचार्य भक्ति खत्म होने लग गयी है उनका नाश कर देंगे । वह उस व्यक्ति के ज्ञान के अंधेरे को मिटा देंगे जो उसे उसके अंतिम प्रारब्ध कि और ले जायेगा। इसका अर्थ हैं उस व्यक्ति के पास ज्ञान हैं परन्तु वह ज्ञान दीप्तिमान नहीं अदृश्य हैं। जैसे श्री तिरुवल्लूवरजी कहते “उलरेनिनुं इल्लारोड़ोप्पर” वह यह कहते हैं कि हमें अपने आचार्य का अनादर नहीं करना चाहिये। यह विचार श्रीवचन भूषण कि चूर्णिकै में समझाया गया हैं “तामरैयै अलर्था कड़वा आदित्यन ताने, न्ल्रईप पिरिंधाल अथतै उलर्थुमापोले स्वरूप विकासतै पण्णूं ईश्वरं ताने संबंधं कुलैंधाल अथथै वादप पण्णूं”। (श्रीवचन भूषण चूर्णिकै #४३९)

हिन्दी अनुवादक – केशव रामानुज दासन्

Source:  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-35-enrum-anaithuyirkum/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org