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आर्ति प्रबंधं – ५७

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श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

मामुनिगळ इस पासुरम में श्री रामानुज के एक काल्पनिक  प्रश्न कि उत्तर प्रस्तुत करतें हैं। श्री रामानुज के प्रश्न:” हे मामुनि! हम आपके विनम्र प्रार्थनाओं को सुनें। आप किस आधार पर , किसके सिफ़ारिश पर मुझें ये प्रार्थना कर रहें हैं ?” मामुनि उत्तर में कहतें हैं, “मेरे आचार्य तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै के दिव्य शरण कमलों में शरणागति करने के बाद खुद को एक उचित वस्तु ही समझा। मेरे पास वही एकमात्र योग्यता और रत्न हैं। “यतीश्वर श्रुणु श्रीमन कृपया परया तव” के प्रकार कृपया मेरे इन नीच शब्दों को सुनें।    

 

पासुरम ५७

देसिगरगळ पोठ्रुम तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै

वासमलर ताळ अड़ैंद वत्तुवेन्नुम

नेसत्ताल एन पिळैगळ काणा एतिरासरे

अडियेन पुनपगरवै केळुम पोरुत्तु

 

शब्दार्थ:

वासमलर ताळ अड़ैंद वत्तुवेन्नुम – मैं एक वस्तु हूँ जिसने शरणागति किया , सुंगंधित और कोमल दिव्य चरण कमलों में

देसिगरगळ पोट्रुम तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै – तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के।  उन्हें हमारें पूर्वज, “सेंतमिळ वेद तिरुमलैयाळवार वाळि” से प्रशंसा करतें हैं।  वें नम्माळ्वार के प्रति गहरे और अटल सेवा भाव के संग थे और अपने जीवन आळ्वार के पासुरमो के सहारे ही बिताते थे।  

नेसत्ताल  – इस संबंध के कारण

एतिरासरे  – एम्पेरुमानारे

केळुम – कृपया सुनिए

अडियेन – मेरे

पुनपगरवै  – नीच शब्द

एन पिळैगळ काणा – मेरे दोषों को देखे बिना

पोरुत्तु – गुस्से के बिना

 

सरल अनुवाद

मामुनि श्री रामानुज को (मामुनि के आचार्य)तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के संग उपस्थित अपने संबंध को देखने केलिए विनति करतें हैं।वे गुस्से के बिना अपने दोषों को उपेक्षा कर अपनी नीच शब्दों को सुन्ने केलिए श्री रामानुज से विनती करतें हैं।    

 

स्पष्टीकरण

श्री रामानुज मामुनिगळ से कहतें हैं, “ सेंतमिळ वेद तिरुमलैयाळवार वाळि” से प्रशंसाा  किये जाने वाले तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै के सुगंधित कोमल दिव्य चरण कमलों में शरणागति अनुसंधान किये वस्तु हूँ मैं। तिरुवाईमोळिप्पिळ्ळै ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने नम्माळ्वार और उन्के ग्रंथों के प्रति गहरे और अटल सेवा भाव प्रकट किया था।  वे नम्माळ्वार के अमृत समान पासुरमो के स्मरण में ही अपना जीवन बिताएं।

हे एम्पेरुमानार! आपसे यह विनती हैं की मेरे आचार्य तिरुवाईमोळिपिळ्ळै के संबंध के कारण आप मेरे दोषों को उपेक्षा करें और बिना क्रोध के मेरे नीच शब्दों को सुनें।  

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/03/arththi-prabandham-57/

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