शरणागति गद्य – प्रवेश (परिचय खंड)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

शरणागति गद्य

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namperumal-nachiar_serthiश्रीनम्पेरुमाल और श्रीरंगनाच्चियार – श्रीरंगम

श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान का मुख्य आकर्षण

श्रीरामानुज स्वामीजी ने अपने प्रबंध श्रीभाष्य में मोक्ष (संसार से मुक्ति) प्राप्ति के लिए भक्ति योग की व्याख्या की है। श्रीभाष्य की रचना, कुदृष्टियों (वह जो वेदों का गलत अर्थ करते हैं) के तर्क का विरोध करने के लिए की गयी थी, जिनका मत था कि केवल ज्ञान योग से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। श्रीरामानुज स्वामीजी इस बात से चिंतित थे कि श्रीभाष्य में वर्णित निर्णय से उनके अनुयायी और शिष्यजन यही विचार करेंगे कि मात्र भक्ति योग के द्वारा ही इस संसार से मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त किया जा सकता है और वे मोक्ष प्राप्ति के लिए उसका ही अनुसरण करेंगे।

शरणागति गद्य में उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए शरणागति (भगवान श्रीमन्नारायण के आश्रित होना) के मार्ग पर विशेष ज़ोर दिया है। यहाँ एक प्रश्न मन में उठ सकता है कि जब शरणागति ही मोक्ष का मार्ग है, तब कूदृष्टियों के विरोध में “श्रीभाष्य” ग्रंथ में उन्होंने इस मार्ग की व्याख्या क्यों नहीं की? इसका कारण यह है कि जिस प्रकार एक ब्राह्मण चतुर्थ वर्ण के मनुष्य को वेद नहीं सिखा सकता, उसी प्रकार शरणागति के पवित्र रहस्य अर्थों को सर्वसामान्य में इस प्रकार प्रकट नहीं किया जा सकता।

मोक्ष प्राप्ति के लिए शरणागति, भक्ति योग से किस प्रकार से श्रेष्ठ है?

  • भक्ति, त्रयवर्णिकाओं तक ही सीमित है (प्रथम तीन वर्णों के लिए अर्थात- ब्राहमण, क्षत्रिय और वैश्य और इन तीन वर्णों में भी मात्र पुरुषों के लिए) परंतु शरणागति बिना किसी भेद के किसी भी प्राणी द्वारा की जा सकती है।
  • भक्ति का मार्ग कठिन है यद्यपि शरणागति का मार्ग अत्यंत सुलभ और सुगम है।
  • भक्ति के परिणाम, भक्त को तब प्राप्त होता है, जब उसके सभी प्रारब्ध कर्मों की समाप्ति होती है (कर्म दो प्रकार के होते हैं, संचित और प्रारब्ध :-
  • संचित कर्म उन सभी कर्मों का योग है, जो जीवात्मा ने अगणित जन्मों में उपार्जित किया है।
  • प्रारब्ध कर्म – संचित कर्म की गठरी से एक हिस्से के रूप में बाहर लेकर जीवात्मा को अपने कर्म के अनुसार पाप और पूण्य के रूप में इस संसार में बिताने की सुविधा दिया जाता है।
  • परंतु शरणागति का परिणाम उसी जन्म में प्राप्त होता है, जिस जन्म में आत्मा द्वारा शरणागति की जाती है।
  • भक्ति के मार्ग का अनुसरण करते हुए, भक्त को यह सावधानी रखनी चाहिए कि वेदों में कहे गए निर्देशों का उल्लंघन न हो। यद्यपि शरणागति के मार्ग में ऐसा नहीं है, क्यूंकि शरणागति करना तो अत्यंत सुगम है। भक्ति करने के लिए बहुत से प्रयास करने पड़ते हैं परंतु शरणागति सदा ही अभ्यास हेतु सहज है।
  • भक्ति का मार्ग आत्मा के स्वरुप के अनुरूप नहीं है, यद्यपि शरणागति स्वरुप अनुरूप है। अन्य शब्दों में, आत्मा का स्वरुप श्रीमन्नारायण भगवान के सेवक/ दास (शेषभूत) और उनके आश्रित (परतंत्र) बनकर रहना है और यह सभी शरणागति के मार्ग के अनुसरण से ही पूर्ण हो सकता है, जबकि भक्ति आत्मा द्वारा स्व-प्रयासों से की जाती है, जो आत्मा के स्वरुप के विपरीत है।
  • भक्ति मार्ग के माध्यम से जो परिणाम प्राप्त होता है ( मोक्ष अथवा भगवान के चरण कमल ) वो माध्यम इस परिणाम का लायक नहीं है किन्तु शरणागति माध्यम इस उच्च और श्रेष्ट परिणाम का यथोचित माध्यम है |

वेदांत में भी शरणागति का उल्लेख प्राप्त होता है। याग्निकीय उपनिषद् में, जीवात्मा के लिए द्वादश (१२) विशेष गुणों का उल्लेख किया गया है और उन सभी द्वादश गुणों में सबसे उंचा स्थान शरणागति को दिया गया है। शरणागति पूर्वाचार्यों द्वारा अनुसरण की गयी है और भगवान श्रीमन्नारायण को सबसे प्रिय है। इसलिए, वेदांत द्वारा स्वीकृत, जीवात्मा के स्वरुप के अनुरूप, आलवारों और पूर्वाचार्यों द्वारा अनुसरण की जाने वाली और भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय, शरणागति के इन गुणों को जानकार, श्रीरामानुज स्वामीजी ने शरणागति के विषय पर व्याख्या की, जिससे उनके अनुयायी भी शरणागति का लाभ ले सकें।

उन्होंने शरणागति के लिए उत्तर फाल्गुनी के दिन का चयन किया, जिस दिन श्रीनम्पेरुमाल और श्रीरंगनाच्चियार संग में विराजमान होकर दासों को दर्शन देते हैं। उनके मानस में संसार की सभी बाधाओं का सतत विचार चल रहा था और उनसे मुक्ति प्राप्त करने के लिए, उन्होंने दिव्य दंपत्ति के चरणों में शरणागति की। अपने आचार्य श्रीमहापूर्ण स्वामीजी द्वारा समाश्रयण प्राप्त करते हुए भी श्रीरामानुज स्वामीजी ने भगवान के चरणों में शरणागति की थी। जब शरणागति एक ही बार की जाती है, तब श्रीरामानुज स्वामीजी ने पुनः दिव्य दंपत्ति के चरणों में शरणागति क्यों की? संसार के भयानक रूप को जानकार और भगवान से शीघ्रातिशीघ्र मिलने की उत्कट चाहते हुए उन्होंने पुनः शरणागति की। यहाँ तक की आलवारों ने भी बारम्बार शरणागति की है (श्रीशठकोप स्वामीजी ने 5 बार और श्रीपरकाल स्वामीजी ने, 10 बार)। यही आचार्यों ने भी किया है। इसलिए इस संसार से मुक्ति प्राप्त करने के लिए और श्रीवैकुंठ में दिव्य दंपत्ति के कैंकर्य प्राप्ति हेतु, उन्होंने शरणागति की।

अब हम इस प्रबंध की प्रथम चूर्णिका की ओर अग्रसर होते हैं।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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