Daily Archives: May 17, 2016

अष्ट श्लोकी – श्लोक 7 – 8- चरम श्लोक

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श्री:
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अष्ट श्लोकी

<< श्लोक 5 – 6 – द्वयमंत्र

githai-karappangadu-wrapperअंतिम 2 श्लोक, चरम श्लोक का वर्णन करते है, जो भगवान द्वारा कहा गया है ।

श्लोक 7

मत्प्राप्यर्थतया मयोक्तमखिलम संत्यज्य धर्मं पुन :
मामेकं मदवाप्तये शरनमित्यार्तोवसायम कुरु ।
त्वामेवम व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णोह्यहं
मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितम कुर्यां शुचं मा कृतः ।।

अर्थ

मेरी प्राप्ति हेतु, मेरे कहे अनुसार अन्य सभी उपाय (कर्म, भक्ति ,ज्ञान योग) को छोड़कर, केवल मेरी शरण को ही अपना उपाय मानकर, निश्चिन्त होकर, दृढ़ विश्वासित रहो। इस दृढ़ विश्वास के रहने पर, मैं, अपने ज्ञान एवं कल्याण गुणों के द्वारा, इस मार्ग में उत्पन्न होने वाले सभी विरोधि तत्वों से तुम्हें मुक्त करूँगा और मोक्ष प्रदान करूँगा।

श्लोक 8

निश्चित्य त्वदधीनतां मयी सदा कर्माध्युपायान् हरे
कर्तुमं त्यक्तुमपि प्रपत्तुमनलम सिद्धामी दुःखाकुल:।
एतज्ज्ञानमुपेयुषो मम् पुनस्सर्वापराधक्षयम्
कर्तासीति दृदोस्मि ते तु चरमं वाक्यं स्मरन् सारथे: ।।

अर्थ

हे प्रभु! मैं अपने कर्मों को न उत्तम प्रकार से निभा पाने में समर्थ हूँ, न ही उन्हें त्यागकर आपकी शुद्ध शरणागति करने में समर्थ हूँ। मैं इस शोक से अत्यंत दुखी हूँ। क्यूंकि आपने अपनी कृपा से मुझे यह भाव और ज्ञान प्रदान किया है तों में आश्वस्त हूँ कि आप चरम श्लोक में कहे अनुसार ही आप मेरे अज्ञान, दोष और अन्य बाधाओं को हटाकर मेरी रक्षा करेंगे और मुझे अपनाएंगे।

अष्ट श्लोकी यहाँ संपन्न होती है।

श्रीआलवारों के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीआलवन्दार के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ
श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – श्लोक 5 – 6 – द्वयमंत्र

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अष्टश्लोकी

<< श्लोक 1- 4 – तिरुमंत्र

vishnu-lakshmi

श्लोक 5

नेतृत्वं नित्ययोगं समुचितगुणजातं तनुख्यापनम् च उपायं
कर्तव्यभागं त्वत् मिथुनपरम् प्राप्यमेवम् प्रसिद्धं ।
स्वामित्वं प्रार्थनां च प्रबलतरविरोधिप्रहाणम दशैतान
मंतारम त्रायते चेत्यधिगति निगम: षट्पदोयम् द्विखण्ड: ।।

अर्थ

यह श्लोक, मंत्रो में रत्न, द्वय महामंत्र का विवरण प्रदान करता है। द्वय के दो अंग और छः शब्द है। इसमें दस अर्थ निहित हैं। १) जीवात्मा को भगवान द्वारा निर्धारित मार्ग में प्रशस्त करना २) भगवान और श्रीमहालक्ष्मी से नित्य मिलन की स्थिति ३) दिव्य गुण समूह, जो केवल परमात्मा के ही अनुकूल है ४) ईश्वर का अत्यन्त सुन्दर स्वरूप ५) उपाय स्वरुप अर्थात परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग ६) चेतन/ जीवात्मा के कर्त्तव्य ७) श्रीमहालक्ष्मी संग उपस्थित भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति कैंकर्य ८) अत्यंत सुंदर संबंध, जो सत्य है ९) उनके कैंकर्य की प्रार्थना १०) कैंकर्य के विघ्न, बाधाओं से मुक्ति। वैदिक शास्त्र में निपुण लोगों का मानना है कि द्वय मन्त्र के इन अर्थो का निरंतर ध्यान करने से प्रपन्न की रक्षा होती है।

श्लोक 6

इशानाम् जगथामधीशदयिताम नित्यानपायां श्रियं
संश्रित्ठयाश्रयणोचित अखिलगुणस्याङ्ग्रि हरेराश्रये ।
इष्टोपायतया श्रियाच सहितायात्मेश्वरायार्थये
कर्तुं दास्यमसेशमप्रतिहतम नित्यं त्वहं निर्मम: ।।

अर्थ

इस श्लोक में, श्री लक्ष्मीजी के माध्यम से भगवान का कैंकर्य प्राप्त करने की प्रार्थना की गयी है। मैं इस ब्रह्माण के स्वामी के चरणों में श्रीमहालक्ष्मीजी के माध्यम से आश्रय लेता हूँ, जो उन स्वामी से सम्पूर्ण रूप से प्रीति करती है। मेरे आश्रय को स्वीकार करने के वाले वे सभी गुणों से संपन्न है और मेरे मोक्ष, जो उनके द्वारा ही प्रदत्त है, के लिए मेरे एकमात्र साधन है।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – श्लोक 1 – 4 – तिरुमंत्र

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अष्टश्लोकी

<< तनियन

nara-narayananनारायण ऋषि , नर ऋषि को तिरुमंत्र का उपदेश प्रदान करते हुए (दोनों ही श्रीमन्नारायण भगवान के अवतार है)

श्लोक 1

अकारार्थो विष्णुः जगदुध्यरक्षा प्रळयकृत
मकारार्थो जीव: तदुपकरणम् वैष्णवमिदम ।
उकारो अनन्यार्हम नियमयति संबंधमनयो:
त्रयी सारस्त्रयात्मा प्रणव इमामर्थम् समधिष्ठ ।।

अर्थ

सृष्टी, स्थिति एवं संहार, तीनों करने वाले साक्षात भगवान विष्णु ही तिरुमंत्र में “अ” अक्षर का अर्थ है। “म” अक्षर चेतनो को,जीवों को दर्शाता है, जिनके अनुभव के लिए सारी सृष्टि उपकरण हैं। अक्षर “उ”, इन दोनों के मध्य के विशेष संबंध को प्रस्तुत करता है, जो किसी भी अन्य के समान नहीं है। इसप्रकार, ॐ शब्द, जो प्रणव है, सभी वेदों के सार को स्थापित करता है।

श्लोक 2

मन्त्रब्रह्मणि मध्यमेन नमसा पुंस स्वरूपं गति:
गम्यम् शिक्षितमीक्षितेन परत: पश्चादपि स्थानत:।
स्वातंत्र्यम् निजरक्षणम् च समुचिता वृत्तिश्च नांयोचित
तस्यैवेति हरेर्विवीच्य कथितं स्वस्यापि नारहं तत : ।।

अर्थ

तिरुमंत्र के मध्य में उपस्थित “नम:” शब्द द्वारा जीव की गति, उस गति का साधन तथा जीव का स्वरूप, इन त्रय विषयों को दर्शाया गया है। स्वतंत्रता, स्वरक्षण, और भगवान के अलावा अन्यों से अनुकूलता न रखना, उपरोक्त बताये स्वरुप गुणों को प्रकट करते हुए जोर देता है कि भगवान के शेषभूत होते हुए भी, जीवात्मा को इस आनंद अनुभव का कोई भान नहीं है।

श्लोक 3

अकारार्थायैव सवमहमथ मह्यं न निवहा:
नराणाम् नित्यानामयनमिति नारायणपदम् ।
यमाहास्मै कालम सकलमपि सर्वत्र सकलासु
अवस्थास्वावि:स्युः मम् सहज कैंकर्यविधय: ।।

अर्थ

मैं भगवान का हूँ, अपना नहीं हूँ। “नारायण” शब्द दर्शाता है कि जीवात्माओं एवं क्षर विषय सारों के लिए मात्र भगवान ही परम गति है। भगवान के प्रति कैंकर्य जीवात्मा का नैसर्गिक स्वभाव है। वह यह भी समझाता है कि हर काल, हर अवस्था में उनका कैंकर्य करना ही स्वभाव है।

श्लोक 4

देहासक्तात्मबुद्धिर्यदि भवति पदम् साधु विद्यात्तृतीयं  
स्वातंत्र्यान्धो यदिस्यात् प्रथममित्रश्शेषत्वधिश्चेत द्वितीयं ।
आत्मत्रहाणोन्मुखस्चेन्नम इति च पदम् बांधवाभासलोल:
शब्दं नारायणाख्यम् विषयचपलधीश्चेत चतुर्थीम प्रपन्न: ।।

अर्थ

इस श्लोक में प्रपत्ति मार्ग को अपनाने वाले, भगवान के शरणागत मुमुक्षुओं, जिन्होंने अपने मोक्ष के उपाय स्वरुप भगवान को अपना सम्पूर्ण आश्रय स्वीकार किया है, उनकी शंकाओं के निवारण के लिए कुछ स्पष्टीकरण प्रदान किये गए है। जब भी देह और आत्मा के भेद के विषय में शंका उत्पन्न हो, तब तृतीय अक्षर “म” की ओर देखकर उस शंका का निवारण करना चाहिए। उसके द्वारा यह समझा जा सकता है कि निंद्रा अथवा म्रत्यु के समय देह का बोध नहीं रहता है, देह आत्मा से भिन्न है। इसलिए वह ज्ञान का आधार नहीं है। एक बार यह ज्ञात होने पर कि देह नहीं अपितु आत्मा ही ज्ञान का आधार है, वह इस तत्व को भी जान सकता है कि आत्मा स्वयं स्वतंत्र नहीं है अपितु भगवान द्वारा पोषित है, जैसा “अ” अक्षर द्वारा प्रकटित है। एक बार यह ज्ञात होने पर कि आत्मा, भगवान नारायण की संपत्ति है, वह यह भी जान जायेगा की द्वितीय अक्षर “उ” भी यही दर्शाता है कि जीवात्मा मात्र उनकी ही दास है। जब स्वयं के रक्षण की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, तब “नमः” पद के अर्थों को देखना चाहिए, जिसका अर्थ है “मेरा नहीं”। लौकिक संबंधों के प्रति उत्पन्न भ्रम की स्थिति में उसके द्वारा समझा जा सकता है कि यह सभी संबंध क्षणिक और अनित्य है और केवल भगवान के साथ संबंध ही नित्य है। जब सांसारिक मोह उत्पन्न हो, तब वह चतुर्थ अक्षर “आय” का ध्यान कर, भगवान के प्रति कैंकर्य ही जीवात्मा का स्वरुप है, उसका स्मरण करके सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी – तनियन

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अष्टश्लोकी

azhwan-bhattar-srirangamश्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीपराशर भट्टर – श्रीरंगम

श्री पराशर भट्टार्य श्रीरंगेश पुरोहित: ।
श्रीवत्सांग सुत : श्रीमान् श्रेयसे मेस्तु भुयसे ।।

श्री रंगनाथ भगवान के पुरोहित और श्रीवत्सांग (श्रीकुरेश स्वामीजी) के पुत्र, श्रीपराशर भट्टर जो दिव्य गुण संपत्ति से परिपूर्ण है, वे मुझे श्रेय प्रदान करे।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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अष्ट श्लोकी

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parasara-bhattarश्रीपराशर भट्टर

रहस्य त्रय के गहरे अर्थों को प्रकाशित करने के लिए श्री पराशर भट्टर ने अत्यंत कृपापूर्वक अष्ट श्लोकी नामक स्तोत्रमाला की संस्कृत में रचना की। यह रहस्य त्रय को विस्तृत रूप से प्रस्तुत करने वाला पहला प्रबंध है।

न्याय वेदांत विद्वान् दामल वंकीपुरम श्री उ. वे. पार्थसारथि स्वामी ने सरल तमिळ में इस प्रबंध का अनुवाद किया है। हम उस के हिन्दी अनुवाद को यहाँ देखते है।

इन आठ श्लोकों के अलावा इस पबंध के रचयिता श्रीपराशर भट्टर के यश को स्थापित करती वंदन तनियन भी प्रस्तुत है।

इस प्रबंध को आगे निम्न अनुच्छेदों में देखेंगे।

– अडियेन प्रीती रामानुज दासि

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