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यतिराज विंशति – श्लोक – ३

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

श्लोक २                                                                                                                         श्लोक ४

श्लोक  ३

वाचा यतीन्द्र! मनसा वपुषा च यष्मत्पादारविंदयुगलं भजतां गुरूणाम्
कूराधिनाथ कुरूकेश मुखाध्यपुंसां पादानुचिंतन परस्सततं भवेयम् ||

हे यतीन्द्र !                                      : हे यतिराज
मनसा वाचा वपुषा च                       : मन, वाणी एवएं कर्म से
युष्मत् पादारविन्द युगलं                 : आपके दो चरणकमलों की
भजताम् गुरूणाम्                            : सेवा करने वाले गुरूओं के
कूराधिनाथ कुरूकेश मुखाध्यपुंसाम्   : जिनसे कूराधीश, कुरूकेश आदि प्रधान हैं
पादानुचिंतनपर:                              : चरणों का चिन्तन  करने वाला
सततं भवेयम्                                 : निरंतर होऊँ |

श्रीरामानुजनूत्तंदादी के एक पध्य को जिसका भाव ऐसा ही है, ध्यान में रखकर आचार्य ने इस श्लोक की रचना की है| श्रीरामानुज के चरणकमलों की स्तुति करने की अपेक्षा उनके भक्तों के चरणकमलों की स्तुति करना बढ़ कर है, यही उक्त गाथा का सारांश है| इस श्लोक से भी यही प्रकट होता है| भगवान को प्रसन्न करने के लिए सीधे भगवान की स्तुति न कर भगवद्भक्तों की स्तुति करना शास्त्रीय मार्ग है| उसी प्रकार यहॉँ भी समझ लेना होगा|

मनसा वाचा वपुषा भजताम् – यतिराज की मन, वाणी एवं अनुष्ठान के द्वारा भक्ति करने वाले थे श्रीकूरेश, श्रीकुरूकेश्वर आदि महानुभाव, मन से वे यतिराज के दिव्य गुणों का चिन्तन कराते थे तथा उनके दिव्यमंगलविग्रह का ध्यान करते थे| वाणी से वे यतिराज की स्तुति करते थे| अपनी देह के द्वारा वे यतिराज की सेवा करते थे| ऐसे महानुभावों का चिन्तन करने से वैसी ही भावना का आविर्भाव होगा जैसी कि उनके हृदय में थी| इस श्लोक में वैयाकरण ऐसी शंका कर सकते हैं कि ‘युष्मत्पादारविंद’ के स्थान पर त्वत्पादारविंद होना चाहिए था किन्तु आचार्य श्रीपराशरभट्ट ने अपने श्रीगुणरत्नकोश के अन्तिम श्लोक में ऐसा ही शब्द प्रयोग उपस्थित कर आचार्य को मार्ग प्रदर्शित किया था| “युष्मत्पादसरोरूहांतररज: स्याम त्वमम्बा पिता|” अत: ऐसे शब्द प्रयोग में आचार्य अपने पूर्वाचार्यों के ही अनुगामी थे ||३||

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यतिराज विंशति – श्लोक – २

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

श्लोक १                                                                                                                                         श्लोक  ३

श्लोक 

श्री रङ्गराज चरणाम्बुज राजहंसं श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम् ।
श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रं श्री वत्सचिह्नशरणं यतिराजमीड़े ॥ २ ॥

श्री रङ्गराज चरणाम्बुज राजहंसं    : श्री रङ्गनाथ भगवान के चरणकमलों  के राजहंस
श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम्  : श्रीशठकोपमुनि के चरणकमलोंके भ्रमर
श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रं    : श्री विष्णुचित्त श्री परकाल आदि आल्वारोंके मुख कमल खिलानेवाले सूर्य
श्री वत्सचिह्नशरणं                      : श्रीवत्सचिह्नमिश्र के आश्रयभूत
यतिराजम्                                   : श्री रामानुज मुनि की
ईडे                                              : स्तुति करता हूँ

पिछले श्लोक में नतमस्तक होकर प्रणाम करने की बात कही गई। इस श्लोक में वाणी को सफल करने के लिए स्तुति करने की बात कही गई है। श्रीरामानुज मुनि की उपमा राजहंस एवं भ्रमर को संदेशवाहक बताया है। यहाँ पर आचार्य श्रीरामानुज को वही उपमा दी गई है।

श्रीरंगराज चरणाम्बुज राजहंसम् – जैसा कि जीवनवृत से ज्ञात होता है आचार्य श्रीरामानुज का श्रीरंगनाथ भगवान के प्रति विशेष अनुराग था। साथ ही श्रीरंगनाथ ने भी शरीर रहते तक श्रीरंगनगर में निवास करने का आदेश दे कर अपना विशेष अनुग्रह प्रदर्शित किया था। जिस प्रकार राजहंस कमल के समीप निवास करता है उसी प्रकार यतिराज श्रीरंगनाथ भगवान के चरणों में निवास करते थे। राजहंस के सारे गुण यतिराज में मिलते है। जिस प्रकार हंस दूध और जल को अलग – अलग करने की शक्ति रखता है , उसी प्रकार यतिराज में सार एवं असार को पृथक़् –पृथक़् करने की शक्ति है। हंसावतार भगवान ने वेदों का उपदेश दिया , यतिराज भी शिष्यों को उपदेश देते थे। राजहंस कीचड़ से प्रेम नहीं करता , उसी प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीरामानुज का संसार से प्रेम नहीं था। हंस स्त्रियों का अनुकरण करता है। यतिराज ने चेतन जीवों के पुरषकार भी अपेक्षित है। श्रीवेदान्तदेशिक स्वामीजी ने ‘दते रंगी निजमपि पदं देशिकादेशकांक्षी’  कहकर इसको बतलाया है।

श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम् – पिछले श्लोक में ‘ परांकुशपादभक्त ’ कहकर स्वरूपयुक्त दास्य का निर्देश किया गया था। इस श्लोक में गुणप्रयुक्त दास्य का उल्लेख किया गया था। कमल की मधुरिमा से भ्रमर आकर्षित होता है। उसी प्रकार आलवार श्रीशठकोप के चरणों को अमृतप्रापकत्व समझ कर यतिराज उधर आकर्षित हुए। भ्रमर चंचरीक है। वह एक स्थान पर ही सीमित नहीं रहता। उसी प्रकार यतिराज भी विभिन्न दिव्यदेशों में उपस्थित हो कर भगवान का अनुभव किया करते थे। श्री शठकोप के पद्यों को भी परांकुश पद कहा जा सकता है। अतः पद से सहस्त्रगीति का संकेत मानने पर यह अर्थ निकलता है कि श्रीशठकोप की सूक्तियों में भगवत्सम्बन्धी जो माधुर्य है उसको यतिराज भ्रमर की तरह ग्रहण करते हैं।

श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रम् – आलवार श्रीविष्णुचित एवं आलवार श्रीपरकाल के मुख कमल को विकसित करनेवाले सूर्य कहने का तात्पर्य यह है की जिस प्रकार श्रीविष्णुचित ने श्रीमन्नारायण का परत्व स्थापित किया उसी प्रकार उसी मार्ग से श्रीरामानुज ने परतत्व की सिद्धि की। श्रीपरकाल स्वामीजी ने मन्दिर, गोपुर, मण्डप आदि निर्माण कर दिव्यादेशों की सेवा की। श्रीरामानुज भी वही करते हैं जिससे परकाल संतुष्ट होते हैं। यहाँ पर ‘मुख’ शब्द से यह भाव भी निकलता है कि श्रीविष्णुचित्त एवं श्रीपरकाल स्वामीजी जिन आलवारों में प्रमुख हैं उन सभी आलवार रूपी कमलों को विकसित करने वाले सूर्य श्रीरामानुज हैं।

श्रीवत्सचिह्न शरणम् – श्रीभाष्यकार की शिष्य मण्डली में श्रीवत्सचिह्नमिश्र के सम्बन्ध में विशेष रुप से इस विशेषण का वर्णन क्यों किया गया है ? वस्तुतः उनमें यतिराज के प्रति विशेष प्रेम था जिसके फलस्वरूप उनको यतिराज का चरण स्थानीय माना जाता है। शिष्य दाशरथि में भी यह विशेषता थी। श्रीमद्वरवरमुनि ने यहाँ पर उनका उल्लेख किया है। ‘चरणं’ यह भी पाठ है ॥ २ ॥

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यतिराज विंशति – श्लोक – १

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

तनियन्                                                                                              श्लोक  २

 

श्लोक १                                                      

श्रीमाधवाङ्घ्रि जलजद्वयनित्यसेवा प्रेमाविलाशयपरांकुश पादभक्तम् ।
कामादि दोषहरमात्म पदाश्रितानां रामानुजं यतिपतिं प्रणमामि मूर्ध्ना ॥ १ ॥

श्रीमाधवाङ्घ्रि जलजद्वय                : भगवान के कमल रूपी चरणों की
जलजद्वयनित्यसेवा प्रेमाविलाशय  : नित्य सेवामें प्रेम से जो व्याकूलित हैं
परांकुश पादभक्तम्                        : ऐसे श्री शठकोप मुनि के चरणोंके भक्त
आत्म पदाश्रितानाम्                       : अपने चरणोंका आश्रय लेने वालों के
कामादि दोषहरं                              : काम आदि दोषोंकों नष्ट करने वाले
यतिपतिं रामानुजं                          : यतिराज श्री रामानुज मुनि को
मूर्ध्ना प्राणमामि                            : सिर से प्रणाम करता हूँ ।

श्रीशठकोप मुनि के चरणों के अनुरागी, अपने चरणानुरागियों के दोषों का निवारण करने वाले श्री रामानुज मुनि को प्रणाम करता हूँ। यद्यपि श्री रामानुज मुनि में उनकी महत्ता को व्यक्त करनेवाली अनेकों विशेषतायें मिलती हैं तथापि उन सब में उनका श्रीशठकोप मुनि के चरणों का रसिक होना बढ़ कर है। श्रीरग़ांमृत कवि एवं आचार्य हृदयकार ने इसका उल्लेख किया है। श्रीमद्वरवरमुनी ने  परांकुशपादभक्तम् कह कर इसी का निर्देश किया है।

श्री शठकोप मुनि कैसे थे ? इस प्रश्न का उत्तर श्लोक के पूर्वार्ध में मिलता है। भगवान के चरण कमलों को ही वे अपना परम प्राप्तव्य समझते थे। उनमें उनकी सतत प्रेमव्याकुलता थी। कर्म जनित व्याकुलता हेय होती है। चरणों की उपादेयता का संकेत यहाँ पर हैं। श्रीवचनभूषण और उसकी व्याख्या में बताये गये सिद्धोपाय का यहाँ पर स्मरण किया जा सकता है।

इस श्लोक में ‘ परांकुश ’ नाम से श्री शठकोप मुनि का उल्लेख किया गया है। ‘ परांकुश ’ शब्द की व्युत्पति दो प्रकार की होती है। पर अर्थात दूसरे लोगों के अंकुश तथा पर अर्थात परमतत्व के अंकुश। दूसरे लोगों से तात्पर्य उन लोगों का है जो परमात्मा परमतत्व को निर्गुण, निराकार एवं विभूतिहीन समझते हैं। श्री शठकोप अपनी दिव्य सूक्तियों के द्वारा उन पर अंकुश के रूप में स्थित हैं और उनकी प्रतिगामिता को रोकते हैं। परात्पर भगवान के अंकुश होने का तात्पर्य यह है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान स्वयं उनके वशीभूत हैं। यह श्रीशठकोप मुनि ने सहस्त्रगीति में स्वयं स्वीकार किया है।

श्लोक के उत्तरार्ध का आरम्भ कामादि दोषहर  से हुआ है। ‘आदि’ से क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, अज्ञान, असूया अभिप्रेत है। ‘कामादि हरम्’ न कह कर ‘कामादि दोष हरं’ कहने का तात्पर्य यह है कि नियमित कामना दोष नहीं। नियमानुकूल विहित कामना का प्रवेश गुणों कि कोटी में होता है। भगवान के सम्बन्ध में कामना, भगवान एवं भागवतों के विरोधी के प्रति क्रोध, मात्सर्य आदि गुण हैं, दोष नहीं। काम आदि दोषों के निवारण का सामर्थ्य होने के कारण ‘दोष हरं’ कहा गया है। नतमस्तक होकर प्रणाम करने कि बात ‘मुर्ध्ना प्रणमामि’ से व्यक्त होती है। मस्तक झुकाने के प्रयोजन आलवार – सूक्तियों में वर्णित हैं ॥ १ ॥

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यतिराज विंशति – तनियन (ध्यान श्लोक)

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति                                                                                         श्लोक १

 yathirajarइस प्रकार श्री देवराज स्वामीजी ने पूर्व दिनचर्या में अपने आचार्य श्री वरवरमुनि स्वामीजी के दिनचर्या में अभिगमनम्, उपादानम्, एज्ज्याई का अनुभव किया।

अब वें श्री वरवरमुनि स्वामीजी की चौथी दिनचर्या स्वाध्याय का अनुभव करते हैं। अनेक स्वाध्यायोंमेसे एक प्रकार है जिसमें पूर्वाचार्योंके ग्रंथोंके आधारपर शिष्योंकों कालक्षेप दिया जाता है। इसका उल्लेख उत्तर दिनचर्या श्लोक क्रमांक १ में किया गया है, “वाक्यालंकृति वाक्यनं व्याक्यादरम्”। परंतु यतिराज विंशति (जो श्री रामानुजाचार्य के प्रति के समर्पण भाव को दर्शाता है) के संबंधमें सोचते हुये श्री देवराज स्वामीजी यह स्तोत्र दोहराते हैं।

श्री शठकोप स्वामीजी “प्रपन्नजनकुटस्थ” कहलाते हैं, जिसका अर्थ है श्री शठकोप स्वामीजी प्रपत्ति के अवलंब में मूल पुरुष हैं, जो यह प्रतिपादन कराते हैं की मोक्ष का भगवान ही एकमात्र उपाय हैं। श्री वरवरमुनी स्वामीजी, जो सबके आराध्य हैं, उन्हे श्री शठकोप स्वामीजीसे प्रारम्भ कर अपने आचार्य श्री शैलेश स्वामीजी तक के गुरूपरंपरा का ज्ञानपूर्वक उपदेश प्राप्त हुवा।

तीन रहस्य जैसे मूलमंत्र, द्वयमंत्र, और चरममंत्र का मूल आशय है की भगवद रामानुज ही उपाय और उपेय हैं। इस प्रकार के अविरत भक्ति से श्री वरवरमुनी स्वामीजी ने लोगोंकों जन्म मरण के चक्र से छुड़ानेकी प्रबल इच्छा से यतिराज विंशति नामक स्तोत्र की रचना की। स्तोत्र लिखते समय कोई रुकावट ना आए इसलिए उन्होने श्री यतिराज के प्रति प्रथम २ श्लोक निवेदन किए।

यह रचना रहस्यत्रय के सार को प्रगट करती है। व्याख्यानकर्ता श्री अन्नाप्पंगार स्वामीजी के अनुसार हम देख सकते हैं की यतिराज विंशति स्तोत्र में २० शब्द हैं – ३ शब्द मूलमंत्र के लिए, ६ शब्द द्वयमंत्र के लिए, और ११ शब्द चरमश्लोक के लिए। विंशति का अर्थ है २०।

तनियन्

य: स्तुतिं यतिपति प्रसादनीं व्याजहार यतिराज विंशतिम्।
तं प्रपन्नजन चातकांबुजं नौमी सौम्य वरयोगी पुंगवम्॥

य:  – जो भी, यतिपति प्रसादनीं  – यतिराज से कृपा की प्रार्थना करता है, यतिराज विंशतिम्  – यतिराज के बारेमें रचित २० श्लोक,  स्तुतिं – स्तुति, व्याजहाररचना की, प्रपन्नजन चातकांबुजं  – चातक के समान प्रपन्न जन, तं वरयोगी पुंगवम्  – वरवरमुनी स्वामीजी, नौमी  – आराधना करते हैं

इस तनियन की रचना श्री देवराज स्वामीजी ने की है। “यतिपति प्रसादनीं” का अर्थ है, जो भी इस स्तोत्र का अनुसंधान करेगा उसे श्री रामानुज स्वामीजी की कृपा प्राप्त होगी। “प्रपन्नजन चातकांबुजं” का अर्थ है श्री रामानुज स्वामीजी उस घन की तरह हैं जो चातक पक्षी के लिए जल वर्षा करते हैं। श्री रामानुज स्वामीजी शरणागतोंकी सहायता करते हैं। “वरयोगी पुंगवम्” श्री वरवरमुनी स्वामीजी को दर्शाता है।

devaraja swami

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यतिराज विंशति

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
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श्रीमद् वरवरमुनये नम:

ramanujar-alwaiश्री रामानुजाचार्य – भविष्यदाचार्य पवित्र स्थान – आळ्वार् तिरुनगरि

mamunigal-srirangam

श्री वरवरमुनि स्वामिजि – श्री रंगम

e-book – https://1drv.ms/b/s!AiNzc-LF3uwygxBRX_jwTgbDzknD

परिचय

मन्नुयिर्गाळिङे मणवाळ मामुनिवन्
पोन्नडियाम् चेण्गमलप् पोदुगलै – उन्नि
चिरत्ताले तीण्डिल् अमानुवनुम् नम्मै
करत्ताले तीण्डल् कडन्.

बहुत् सारे महाचार्यों के अवतार से पवित्र हुए इस् भूमि में पूर्वाचार्यों के नाम से आज तक बुलाये गए धर्मसत्ता, श्री वरवरमुनि स्वामीजी से पूर्ण होता है | उन्के बाद् भी कई महाचार्यों का अवतार् हुआ | लेकिन स्वयं श्री रंगनाथजी एक शिष्य का स्थिति लेकर वरवरमुनि से ईदू का व्याख्यान सुन लिए | इसी  कारण से, महानों मानते हैं  कि  पूर्वाचार्य गुरु परम्परा श्री वरवरमुनि  से  पूर्ण  हो  जाता है |

आलवार तिरुनगरी में तिरु नावीरुडय दासर नामक एक महाचार्या के पुत्र होकर श्री वरवरमुनि अवतार किये | उनका नाम था अलगिय मणवाल पेरुमाळ नायनार |  उनका जनम साधारण वर्ष, आश्वयुज मास, मूल नक्षत्र में हुआ | उनका आचार्य  तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै थे |

एक दिन तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै श्री रामानुजाचार्य के गुणानुभव करते रहे | उन्होंने “मारन (श्री शठगोपजी) के चरण दण्डवत करके सुगति प्राप्त किये रामानुजन” जैसे बहुत सारे श्लोकों ध्यान किये और श्री शठगोपजी से रामानुजाचार्य के अनुराग को अनुभव किये | इससे उत्प्रेरित होकर श्री रामानुजाचार्य को आलवार तिरुनगरी में एक अलग मंदिर बनाने के लिए अपने शिष्योंको नियमित किये |

श्री वरवरमुनि जी भी उस रामानुजाचार्य के चरणों में बहुत सारे सेवा करते रहे | अपने आचार्य के नियमन से उस रामानुजाचार्य के चरणों में यतिराज विंशति नामक स्तोत्र समर्पित किये | कोइल अण्णन् स्वामीजी अपने वरवरमुनि शतकम में इस यतिराज विंशति का माधुर्यम् जैसे बहुत सारे गुणों को प्रकाशित किये |

भूमिका – पेरुमाळ कोइल श्री उभय वेदांत प्र.भ. अण्णण्गराचार्य स्वामी (श्री रामानुज पत्रिका – ३-११-१९७० – http://acharya.org/d.html )

मूल तमिल व्याख्यान: श्री उ. वे. T. A. कृष्णाचार्य स्वामी, तिरुपति

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யதிராஜ விம்சதி – ச்லோகம் – 20

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ஸ்ரீ:
ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம:
ஸ்ரீமதே ராமாநுஜாய நம:
ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

திராஜ விம்சதி        

 ச்லோகம் 19

ச்லோகம்  20

विज्न्यपनं यदिदमद्द्य तु मामकीनम् अङ्गिकुरुष्व यतिराज! दयाम्बुराशे! ।
अग्न्योSयमात्मगुणलेशविवर्जितश्च तमादन्नयशरणो भवतीति मत्वा ॥ (20)

விஜ்ஞாபநம் யதிதமத்ய து மாமகீநம் அங்கீகுருஷ்வ யதிராஜ! தயாம்புராஸே |
அஜ்ஞோSயமாத்மகுணலேஸவிவர்ஜிதஸ்ச தஸ்மாதநந்ய ஸரணோ பவதீதி மத்வா || (20)

பதவுரை:- தயா அம்புராஸே – பிறர்துன்பம் கண்டு பொறாமையென்னும் தயைக்குக் கடல்போன்ற, யதிராஜ – யதிராஜரே, அத்ய – இப்போது, மாமகீநம் – அடியேனுடையதான, யத் விஜ்ஞாபநம் – ‘வாசாயதீந்த்ர’ (3) என்று தொடங்கி முன் ஸ்லோகம் வரையில் செய்யப்பட்ட விண்ணப்பம் யாதொன்றுண்டோ, இதம் – இந்த விண்ணப்பத்தை, அஜ்ஞ அயம் – நல்லறிவு இல்லாதவன் இவன், ஆத்மகுணலேஸ விவர்ஜிதஸ் – மேலும் மனவடக்கம், பொறியடக்கம் முதலிய ஆத்மகுணங்கள் சிறிதுமில்லாதவன், தஸ்மாத் – ஆகையால், அநந்ய ஸரண: பவதி – நம்மைத்தவிர வேறோரு உபாயமில்லாதவனாக இருக்கிறான், இதி மத்வா – என்று நினைத்தருளி, அங்கீகுருஷ்வ – ஏற்றுக்கொண்டருளவேணும்.

இதுவரையில் தாம் செய்த விண்ணப்பத்தையேற்றுக் கொள்ளுதற்குக் காரணமாகத் தம்மிடமுள்ள யதிராஜரைத் தவிர வேறொறு உபாயமில்லாமையாகிற அநந்ய ஸரணத்வத்தைச் சொல்லி முடிக்கிறார். இதனால் தயாம்புராஸே – தயையாகிற நீர் வற்றாத கடலே என்றபடி. இதனால் யதிராஜருடைய தயை ஒரு காரணத்தினால் உண்டாகாமல் நிர்ஹேதுகமாய் நித்யமானது என்று கொள்ளத்தக்கது. ‘தயைகஸிந்தோ’ (6), ‘ராமாநுஜார்ய கருணைவ து’ (14), ‘யதீந்த்ர கருணைவ து’ (15), ‘பவத்தயயா’ (16), ‘கருணாபரிணாம’ (19), ‘தயாம்புராஸே’ (20) என்று தயையை அடுத்தடுத்துப் பலதடவைகள் ப்ரஸ்தாவித்த படியினால், ராமாநுஜர் ‘க்ருபாமாத்ர ப்ரஸந்நாசார்யர்’ (பிறகாரணங்களிலனாலன்றி, இயற்கையாகத் தமக்கேற்பட்டுள்ள தயைமாத்ரத்தாலே மனம் தெளிந்து உபதேஸித்து உய்வு பெறுவிக்கும் ஆசார்யர்) என்பது சொல்லப்பட்டதாயிற்று.

இந்த யதிராஜ விம்ஸதியின் முதல் ஸ்லோகத்திலுள்ள ‘ஸ்ரீமாதவாங்க்ரிஜலஜத்வய நித்யஸேவா ப்ரேமாவிலாஸய பராங்குஸபாதபக்தம்’ என்பதனால், இராமாநுச நூற்றந்தாதியில் முதற்பாட்டிலுள்ள ‘பூமன்னுமாதுபொருந்தியமார்பன் புகழ்மலிந்த பாமன்னுமாறனடிபணிந்துய்ந்தவன்… இராமாநுசன்’ என்ற பகுதி நினைவு படுத்தப் பெற்றதும், இங்கு இக்கடைசியான ஸ்லோகத்திற்கு முன்புள்ள ஸ்லோகத்தில் உள்ள ‘ஸ்ரீமந் யதீந்த்ர தவ திவ்ய பதாப்ஜஸேவாம் விவர்த்தய’ (ராமாநுஜமுனிவரே! தேவரீர் திருவடித்தாமரைகளில் அடியேன் செய்யும் கைங்கர்யத்தை தேவரீரடியார்களின் கைங்கர்ய பர்யந்தமாக வளர்த்தருளவேணும்) என்பதனால், இராமாநுசநூற்றந்தாதியில் கடைசியான பாசுரத்திற்கு முன் பாசுரத்திலுள்ள ‘இராமாநுச! உன்தொண்டர்க்கே அன்புற்றிருக்கும்படி என்னையாக்கி அங்காட்படுத்து’ என்ற பகுதி நினைவுபடுத்தப்பட்டதும் கவனிக்கத்தக்கது. ஆக, யதிராஜர் இராமாநுச நூற்றந்தாதியை நேரே கேட்டு ஆனந்தமடைந்தாப்போலே இந்த யதிராஜவிம்ஸதியையும் நாம் சொல்லக்கேட்டு, ஆநந்தப்படுவரென்பதில் ஐயமில்லை என்றதாயிற்று.

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யதிராஜ விம்சதி – ச்லோகம் – 19

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ஸ்ரீ:
ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம:
ஸ்ரீமதே ராமாநுஜாய நம:
ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

திராஜ விம்சதி        

 ச்லோகம் 18                                                                                                                         ச்லோகம் 20

ச்லோகம் 19

श्रीमन्यतीन्द्र! तव दिव्यपदाब्जसेवां श्रीशैलनाथकरुणापरिणामदत्ताम् ।
तामन्वहं मम विवर्धय नाथ! तस्याः कामं विरुद्धमखिलञ्च निवर्तय त्वम् ॥ (19)

ஸ்ரீமந்யதீந்த்ர! தவ திவ்யபதாப்ஜஸேவாம் ஸ்ரீஸைலநாதகருணாபரிணாமதத்தாம் |
தாமந்வஹம் மம விவர்த்தயநாத!தஸ்யா: காமம் விருத்தமகிலஞ்ச நிவர்த்தயத்வம் (19)

பதவுரை:- ஸ்ரீமந்யதீந்த்ர – தம்முடைய ஆசார்யர்களோடு தம்முடைய ஸிஷ்யர்களோடு வாசியற மோக்ஷமளிக்கையாகிற என்றுமழியாத செல்வமுடைய யதிராஜரே, த்வம் – தேவரீர், மே – அடியேனுக்கு, ஸ்ரீஸைலநாத கருணாபரிணாமதத்தாம் – அடியேனுடைய ஆசார்யராகிய திருமலையாழ்வாரென்னும் திருவாய்மொழிப்பிள்ளையின் மிக்க கருணையினாலே தரப்பட்ட, தாம் – மிகச்சிறந்த, தவ திவ்யபதாப்ஜஸேவாம் – தேவரீருடைய திருவடித்தாமரைகளில் பண்ணும் கைங்கர்யத்தை, அந்வஹம் – நாடோறும், விவர்த்தய – விஸேஷமாக வளர்த்தருளவேணும், (அதாவது தேவரீரடியார் பரம்பரையில் கடைசிவரையில் அக்கைங்கர்யம் அடியேன் செய்யும்படி அதை வ்ருத்திசெய்விக்க வேணுமென்றபடி) நாத – ஸ்வாமியான யதிராஜரே, தஸ்யா: – அத்தகைய கைங்கர்யத்துக்கு, விருத்தம் – தடையாகிய, அகிலம் – எல்லாவற்றையும், காமம் நிவர்த்தய – அடியோடு போக்கியருளவேணும்.

கருத்துரை:- கீழ் ‘வாசா யதீந்த்ர’ (3) என்ற ஸ்லோகத்திலும், ‘நித்யம் யதீந்த்ர’ (4) என்ற ஸ்லோகத்திலும் தொடங்கிய – முறையே யதிராஜருடைய அடியார்களுக்குச் செய்யும் கைங்கர்யத்தையும் யதிராஜருக்குச் செய்யும் கைங்கர்யத்தையும் இதில் ப்ரார்த்தித்துமுடிக்கிறார். ‘ஸேவாம் வர்த்தய’ – என்றதனால் யதிராஜ ஸேவையின் வளர்ச்சியையும் , ‘விவர்த்தய’ என்றவிடத்தில் ‘வி’ என்னும் உபஸர்க்கத்தாலே யதிராஜருடைய அடியார் ஸேவையின் வளர்ச்சியையும் ப்ரார்த்தித்தாரென்றபடி. இதனால் தாம் செய்யும் கைங்கர்யத்தை ஏற்றுக்கொள்ளுதலால் யதிராஜரே ப்ராப்யர் என்பதும், அக்கைங்கர்யத்துக்குத் தடையைப் போக்கி அதனைத் தந்து வளர்த்தலால் அவரே ப்ராபகர் என்றும் பெறப்பட்டதாயிற்று. திருவாய்மொழிப்பிள்ளைக்கு யதிராஜரோடு ஸம்பந்தத்தை உண்டாக்கிக் கொடுத்த உபகாரத்வமாத்ரமேயாகும். யதிராஜ கைங்கர்யத்துக்குத் தடையாவன – இஹலோக பரலோக ஸுகாநுபவமும், ஆத்மாநுபவமாகிய கைவல்யமும், யதிராஜருடைய உகப்புக்காக வல்லாமல் தன்னுகப்புக்காகச் செய்யும் பகவத்கைங்கர்யமும் முதலியனவாகும்.

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யதிராஜ விம்சதி – ச்லோகம் – 18

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 ச்லோகம் 17                                                                                                                        ச்லோகம் 19

ச்லோகம் 18

कालत्रयेSपि करणत्रयनिर्मितातिपापक्र्यस्य शरणं भगवत्क्षमैव ।
सा च त्वयैव कमलारमणेSर्थिता यत् क्षेमस्स एव हि यतीन्द्र! भवच्छ्रितानाम् ॥ (18)

காலத்ரயேSபி கரணத்ரயநிர்மிதாதிபாப்க்ரியஸ்ய ஸரணம் பகவத்க்ஷமைவ |
ஸா ச த்வயைவ கமலாரமணேSர்த்திதாயத் க்ஷேமஸ் ஸ ஏவ ஹி யதீந்த்ர! பவச்ச்ரிதாநாம் || (18)

பதவுரை:- யே யதீந்த்ர – வாரீர் யதிராஜரே, காலத்ரயே அபி – கழிந்த காலம், நிகழும் காலம், வருங்காலமாகிய முக்காலங்களிலும், கரணத்ரயநிர்மித – மனம்மொழி மெய்களென்கிற மூன்று கருவிகளாலும் செய்யப்பட்ட, அதிபாபக்ரியஸ்ய – (எல்லாவற்றையும் பொறுக்கும் தன்மையையுடைய பகவானாலும் பொறுக்கமுடியாதவளவுக்கு) மிகவும் விஞ்சின பாவச்செயல்களைச் செய்யும் ஜீவாத்மாவுக்கு, ஸரணம் – பாவங்களைப்போக்கும் உபாயமானது, பகவத்க்ஷமைவ – குற்றம் போக்குமவனாய் குணங்களுக்கு இருப்பிடமான பகவானுடைய பொறுமையே ஆகும். அந்தப் பொறுமையோ எனில், த்வயா ஏவ – பகவானையும் ஆணையிடும் ஆற்றல்படைத்த தேவரீராலேயே, கமலா ரமணே – கருணையே வடிவெடுத்தவளாய் பகவானுடைய தயை பொறுமை முதலிய குணங்களை வெளிக்கிளப்புகிற ஸ்ரீரங்கநாச்சியாருடைய அழகியமணவாளனாகிய ஸ்ரீரங்கநாதனிடத்தில் அர்த்திதா இதி யத் – (ஸரணாகதி கத்யத்தில்) ப்ரார்த்திக்கப்பட்டதென்பது யாதொன்று உண்டோ, ஏவ – அந்த ப்ரார்த்தனையே, பவச்ச்ரிதாநாம் – (தேவரீருடைய அபிமானத்திற்கு இலக்காக) தேவரீரால் கைக்கொள்ளப்பட்ட அடியார்களுக்கு, க்ஷேம:ஹி – உய்யும் உபாயமல்லவா?

கருத்துரை:- கீழ்ஸ்லோகத்தில் ஸ்ரீரங்கநாதன் யதிராஜருக்கு வஸப்பட்டவனென்றார். இந்த ஸ்லோகத்தில் அந்த ஸ்ரீரங்கநாதனை இன்று புதிதாக, அடியேனுடைய பாவத்தைப் போக்கும்படி தேவரீர் ப்ரார்த்திக்கவேண்டாம். முன்பே கத்யம் விண்ணப்பிக்கும்போது ‘மநோவாக்காயை:’ என்று தொடங்கும் சூர்ணையாலே, ‘க்ருதாந் க்ரியமாணாந் கரிஷ்யமாணாந் ச ஸர்வாந் அஷேஷத: க்ஷமஸ்வ’ (முன்பு செய்யப்பட்டவையும், இப்போது செய்யப்படு மவையும், இனிமேல் செய்யப்போமவையுமான எல்லாவிதமான அபசாரங்களையும் (பாவங்களையும்) ஒன்றையும் விடாமல் பொறுத்தருளவேணும்) என்று. அடியோங்களுடைய பாபங்களையும் பொறுத்தருளும்படி ப்ரார்த்தித்தாய்விட்டதே. அந்த ப்ரார்த்தனையே போதாதோ அடியோங்களுக்கு உஜ்ஜீவநோபாயம் என்கிறார்.

(முன்பு எடுத்த கத்யவாக்யத்தில் தம்மைச் சேர்ந்தவர்களுடைய பாவத்தைப் பொறுக்கும்படி ப்ரார்த்தித்தாரென்பது ஸ்பஷ்டமாக இல்லாவிட்டாலும், ‘இமையோர் தலைவா! இந்நின்ற நீர்மை இனி யாமுறாமை, அடியேன் செய்யும் விண்ணப்பம் கேட்டருளாய்’ என்று தாமும் தம்மைச் சேர்ந்தவர்களும், அறியாமையும், தீவினையும் பிறப்புமாய் ஓயாமல் நடந்து செல்கிற ஸம்ஸார ஸம்பந்தத்தை இனிமேல் அடையாமலிருப்பதற்காக, எல்லாருக்குமாகத் தாமொருவரே எம்பெருமானிடம் விண்ணப்பம் செய்த மாறனாம் நம்மாழ்வாருடைய திருவடிகளைப் பணிந்து உய்ந்தவராகையாலும், உண்மையில் – பிறர்துன்பங்கண்டு பொறாமயென்னும் தயையை எம்பெருமானைக் காட்டிலும் அதிகமாக பெற்றுள்ளவராகையாலே, திருகோட்டியூர் நம்பிகள் தம்மைப் பதினெட்டுத் தடவைகள் நடக்கவைத்து மிகவும் வருத்தி உபதேஸித்த சரமஸ்லோகார்த்தத்தை எந்த வருத்தத்தையும் கொடாமல் தம்மிடம் ஆசையோடு கேட்டவர்களுக்கு உபதேஸித்த பெருமையை உடையவராகையாலும் யதிராஜர் தம்மைச் சேர்ந்தவர்களுடைய பாபத்தையும் பொறுக்கும்படி நிஸ்சயமாக ப்ரார்த்தித்திருப்பரென்று நம்பியே ‘க்ஷேமஸ்ஸ ஏவஹி யதீந்த்ர! பவச்ச்ரிதாநாம்’ (தேவரீர் ப்ரார்த்தித்த ப்ரார்த்தனையே, தேவரீரை ஆஸ்ரயித்த அடியோங்களுக்கும் உஜ்ஜீவநோபாயமாகும்) என்று மணவாளமாமுனிகள் அருளிச்செய்தார் என்று கொள்ளல்தகும். இக்கத்யவாக்யத்தில் “மம (அபசாராந்)” என்று இல்லாததனாலும், எல்லாருடைய அபசாரங்களையும் பொறுக்கும்படி ப்ரார்த்தித்ததாகக் கொள்ளுதல் பொருந்தும்.)

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யதிராஜ விம்சதி – ச்லோகம் – 17

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 ச்லோகம் 16                                                                                                                        ச்லோகம் 18

ச்லோகம் 17

श्रुत्यग्रवेध्यनिजदिव्यगुणस्वरूपः प्रतयक्षतामुपगतस्त्विह रङ्गराजः ।
वश्यस्सदा भवति ते यतिराज तस्माच्छक्तः स्वकीयजनपापविमोचने त्वम् ॥ (17)

ஸ்ருத்யக்ரவேத்யநிஜதிவ்யகுணஸ்வரூப: ப்ரத்யக்ஷதாமுபகதஸ்த்விஹ ரங்கராஜ: |
வஸ்யஸ்ஸதா பவதி தே யதிராஜ தஸ்மாச்சக்த: ஸ்வகீயஜநபாபவிமோசநே த்வம் || (17)

பதவுரை:- யே யதிராஜ – வாரீர் யதிராஜரே, ஸ்ருத்யக்ரவேத்ய – வேதாந்தங்களின் வாயிலாக (ஆசார்யர்களிடமிருந்து) கேட்டுத் தெரிந்துக் கொள்வதற்குத் தக்கவைகளாகிய, நிஜதிவ்யகுணஸ்வரூப: – தனக்கேயுரியவைகளாய், அநுபவிக்கத்தக்க ஜ்ஞானம், ஸக்தி முதலிய குணங்களென்ன, எல்லாரையும் உட்புகுந்து நியமிக்கும் தன்மை அல்லது தன்னை ஆஸ்ரயித்தவர்களுக்குப் பரதந்த்ரனாயிருக்கும் தன்மையாகிய ஸ்வரூபமென்ன இவற்றையுடையவனாய், இஹ து – இப்பூமண்டலத்திலோ என்னில், ப்ரத்யக்ஷதாம் உபகத: – எல்லாருடைய கண்களுக்கும் இலக்காயிருக்குந் தன்மையை அடைந்த, ரங்கராஜ: – ஸ்ரீரங்கநாதன், தே – தேவரீருக்கு, ஸதா – எப்போதும், வஸ்ய: – சொன்ன காரியத்தைத் தவறாமல் செய்யுமளவுக்கு வஸப்பட்டவனாய், பவதி – தான் ஸத்தைபெற்றவனாகிறான்.(தேவரீர் சொன்ன காரியத்தை நிறைவேற்றுவதனால் தான் தானிருப்பது பயனுடையதாகிறதென்று நினைக்கிறான்.) தஸ்மாத் – அவன் அப்படி வஸப்பட்டவனாக இருப்பதனால், ஸ்வகீய – தேவரீருடைய அடியவர்களின், ஜந – தாஸஜநங்களினுடைய, பாபவிமோசநே – பாவத்தை விடுவிப்பதில், த்வம் – தேவரீர், ஸக்த: பவஸி – ஆற்றல் படைத்தவராக ஆகிறீர்.

கருத்துரை:- ஸப்தாதி விஷயாநுபவத்தில் ஆசையைப் போக்கடிப்பதும், இராமாநுசரடியார்களில் எல்லை நிலத்திலேயிருக்கிற அடியவர்க்கு அடிமை செய்வதொன்றிலேயே ஆசையைப் பிறப்பிப்பதுமாகிய முன் ஸ்லோகத்தில் கூறிய தமது காரியத்தைச் செய்வதற்கு உறுப்பாக இராமாநுசரிடமுள்ள தயையை அதற்கு முன்புள்ள இரண்டு ஸ்லோகங்களால் குறிப்பிட்டு, இந்த ஸ்லோகத்தினால் தமது காரியம் செய்வதற்குத் தக்க ஆற்றல் (ஸக்தி) அவரிடம் இருப்பதை மூதலிக்கிறார். அர்ச்சாவதாரமான ஸ்ரீரங்கநாதன் இப்பூமியில் எல்லார் கண்களுக்கும் தென்பட்டுக்கொண்டிருக்கும் தன்மையின் வைலக்ஷண்யத்தை (சிறப்பை) ‘உபகதஸ்து இஹ’ என்றவிடத்திலுள்ள ‘து’ என்பதனால் காட்டுகிறார். பரத்வமும், வ்யூஹமும் (பரமபதநாதனும், க்ஷீராப்திநாதனும்) மிகவும் தூரதேஸத்திலுள்ளவர்களாகையாலே இங்குள்ள நம் கண்களுக்கு இலக்காகார். இராமபிரான் கண்ணபிரான் முதலிய விபவாவதார மூர்த்திகள் முன்யுகங்களில் (காலாந்தரத்தில்) இருந்தவர்களாகையால் பிற்காலத்தவரான நம்மால் காணமுடியாதவர்களாகிறார். அந்தர்யாமியான எம்பெருமானோ யோகாப்யாஸம் செய்யும் யோகிகளுக்கு மட்டுமே மனத்திற்கு விஷயமாகி நம் ஊனக்கண்களுக்கு இலக்காகமாட்டான். அர்ச்சாவதாரமான ஸ்ரீரங்கநாதன் இந்த தேஸத்தில், இந்தக்காலத்தில், யோகம் செய்து ஸ்ரமப்படாமலேயே எல்லார்க்கும் ஊனக்கண்களுக்கு இலக்காகிறான் என்பதே அர்ச்சாவதாரத்தின் வைலக்ஷண்யமாகும். இப்படிப்பட்ட ஸ்ரீரங்கநாதன் ராமாநுஜமுனிவரிட்டவழக்காக இருப்பதனால் அவனிடம் பரிந்துரைத்து அவனைக்கொண்டு நம்கார்யம் செய்து தலைக்கட்டுவரென்பது இந்த ஸ்லோகத்தின் கருத்து. கர்மயோகம், ஜ்ஞானயோகம், பக்தியோகம், ப்ரபத்தியோகம் என்ற மோக்ஷோபாயங்களைக் காட்டிலும் வேறுபட்டு ஐந்தாம் உபாயமான ஆசார்யனாகிய எம்பெருமானாருடைய உபாயத்வமானது – புருஷகாரத்வத்தின் எல்லைநிலமாந்தன்மையே என்பது நிஸ்சயிக்கப்பட்டதாகிறது. இந்த ஸ்லோகத்தினால் – என்று வ்யாக்யாதா அருளிச்செய்கிறார். பாபவிமோசநம் ஏற்படுமாகில் பரமபதத்தில் பகவதநுபவகைங்கர்யங்கள் கிடைப்பது உறுதியாகையால் பாபவிமோசநம் மட்டுமே சொல்லப்பட்டது என்க.

 

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யதிராஜ விம்சதி – ச்லோகம் – 16

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 ச்லோகம் 15                                                                                                                      ச்லோகம் 17

ச்லோகம் 16

शब्दादिभोगविषया रुचिरस्मदीया नष्टा भवत्विह भवद्द्यया यतीन्द्र ! ।
त्वद्दासदासगणनाचरमावधौ यः तद्दासतैकरसताSविरता ममास्तु ॥ (16)

ஸப்தாதி போகவிஷயா ருசிரஸ்மதீயா
நஷ்டா பவத்விஹ பவத்தயயா யதீந்த்ர ! |
த்வத்தாஸதாஸகணநாசரமாவதௌ ய:
தத்தாஸதைகரஸதாSவிரதா மமாஸ்து || (16)

பதவுரை:- ஹே யதீந்த்ர – வாரீர் யதிராஜரே, இஹ – இந்த ஸரீரம் இருக்கும் நிலையிலேயே, அஸ்மதீயா – அடியேனுடையதான, ஸப்தாதி போக விஷயா – நீசங்களான ஸப்தம் முதலியவற்றாலுண்டான அநுபவத்தைப்பற்றிய ருசி: – ஆசையானது, பவத்தயயா – தேவரீருடையதாய் அதிகமான துக்கத்தையே பற்றுக்கோடாகக்கொண்ட தயையினால், நஷ்டா பவது – உருத்தெரியாதபடி காணாமல்போகுக, (மேலும்) : – எந்த பாக்யஸாலியானவன், த்வத்தாஸ – விற்கவும் வாங்கவும் உரியவனாய் தேவரீர் இட்ட வழக்காயிருக்கும் அடியேனுடைய, தாஸகணநா – அடியவர்களை எண்ணும்போது, சரமாவதௌ – அவ்வெண்ணிக்கையின் கடைசியான எல்லையில், பவதி – இருக்கிறானோ, தத்தாஸதா – அவனைக் குறித்துச்செய்யும் அடிமையில், ஏக ரஸதா – (மற்றவற்றில் ஆசையோடு கலசாமல்) ஒன்றுபட்ட ஆசையானது, அவிரதா – நித்யமாக , பவத்தயயா – தேவரீருடைய தயையினால், மம அஸ்து – அடியேனுக்கு உண்டாயிடுக.

கருத்துரை:- இதற்கு முன்புள்ள இரண்டு ஸ்லோகங்களாலே யதிராஜருடைய தயைக்குத் தாமொருவரே இலக்கென்பது திடப்படுத்தப்பட்டது. இனித் தமக்கு அவ்வெதிராஜர் தந்தருளவேண்டிய பயன்களைக் குறிப்பிடுகிறார் இந்த ஸ்லோகத்தினால். இதரமான நீச ஸப்தாதி விஷயங்களை அநுபவிக்கவேணுமென்னும் ஆசை மாயவேணுமென்பதும், யதிராஜருடைய தொண்டர் தொண்டர் தொண்டரென்று தொண்டர் வரிசையில் யார் கடைசியில் இருக்கிறாரோ அவருக்குத் தொண்டு செய்யவேணுமென்ற ஒரே ஒரு ஆசை எப்போதும் உண்டாக வேணுமென்பதுமாகிய இவ்விரண்டு பலன்களையும் முறையே இச்லோகத்தின் இரண்டு பகுதிகளாலும் வேண்டிக்கொண்டாராயிற்று. எம்பெருமானுடைய க்ருபை – யார் மிக அதிகமாகப் பாபம் செய்து அதனால் அதிகமான துக்கத்தை அநுபவித்துப் பரிதபிக்கிறார்களோ அவர்களிடம் செல்லாது. எம்பெருமானாருடைய க்ருபையோவெனில் அவர்களிடமே சென்று அவர்களைக் கரையேற்றும். அதனாலன்றோ பகவான் எம்பெருமானானதும் ராமானுஜர் எம்பெருமானாரானதும். எம்பெருமானைவிட உயர்ந்தவரென்பதனாலன்றோ மருமமறிந்த மஹாநுபவராகிய திருக்கோட்டியூர்நம்பிகள் தமது ஸிஷ்யராகிய ராமானுஜரை எம்பெருமானார் என்றழைத்தருளியது. இவ்விருவகைப்பட்ட க்ருபைகளுக்கும் உள்ள வாசி ‘பவத்தயயா’ (தேவரீருடைய க்ருபையாலே) என்றதனால் கருதப்பட்டது. பகவானுடைய தயை அடியேனிடம் வேலைசெய்யாது. தேவரீருடைய தயையே அடியேனுக்கு உதவுவது என்பது இங்கு சாரம்.

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