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यतिराज विंशति – श्लोक – १३

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति

श्लोक  १२                                                                                                            श्लोक  १४

श्लोक  १३

तापत्रयीजनित दु:खनिपातिनोऽपि देहस्थितौ मम रूचिस्तु न तन्नीवृत्तौ |
एतस्य कारणमहो मम पापमेव नाथ त्वमेव हर तध्यतिराज शीघ्रम् | १३ |

यतिराज!                                          : रामानुज
तापत्रयीजनित दु:खनि पातिन: अपि   : तापत्रयों से जनित दु:खों में गिर कर भोगने पर भी
मम रूचि: तु                                     : मेरी इच्छा तो
देहस्थितौ                                         : इस शरीर की रक्षा में ही है
तत् निवृत्तौ न                                  : उसको दूर करने में नहीं
एतस्य कारणं मम पापम् एव              : उसको कारण मेरा पाप ही है
अहो नाथ                                         : हाय, मेरे रक्षक स्वामिन्!
तत् त्वम् एव                                    : उस पाप को आप ही
शीघ्रं हर                                           : बहुत जल्दी दूर कीजिए

यध्यपि सब वस्तुओं के भीतर व बाहर रहने वाले ईश्वर को तुम देख नहीं पाये, आँखों से दीख पड़ने वाली नफरत करने लायक वस्तुओं के दोषों को तो ठीक ठीक देखते हो| उन्हें देखते हो तो क्या उन्हें त्यागने की इच्छा नहीं होती? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैम – मेरी दशा ऐसी है कि दु:खों को भी मैं सुख समझता हूँ| इसका कारण मेरे प्रबल पाप ही हैं| उन्हें आप ही को दूर करना चाहिए|

तापत्रयी तीन प्रकार के पाप, पहला आध्यात्मिक ताप जो हाथ-पावँ आदि शरीर के अंगों से उत्पन्न होता हैं, शरीर तथा मानस भेद से वह दो तरह का है| शरीर ताप व्याधि कहलाता है और मानस ताप आधि| इस प्रकार आधि-व्याधि ही आध्यात्मिक ताप हैं |

पशु पक्षी मनुष्याध्यै: पिशाचोरग राक्षसै: | सरीसृपाध्यैश्र्च नृणां जायते चाधिभौतिक: ||”

अर्थात् जानवर और चिड़िया, मनुष्य और पिशाच, उरग और राक्षस तथा साँप आदि जीवों से मनुष्यों को जो ताप उत्पन्न होता है वह आधिभौतिक कहलाता है |

शीत वातोष्ण वर्षाम्बू वैध्युतादिसमुद्भव: | तापो द्विजवरश्रे ष्ठै: कथ्यते चाधिदैविकः ||

अर्थात् ठण्ड और गरमी, वायु और वर्षा और बिजली आदि से उत्पन्न होने वाले ताप ही श्रेष्ठों से आधिदैविक कहे जाते हैं| ये तीन स्वयं दु:ख रूप और असह्य हैं|

 जब शरीर इतने दु:खों का कारण है, मुझे उसके नाश की प्रतीक्षा में रहना चाहिए| किन्तु मेरी रूचि इसी में है कि यह कैसे और भी चिरस्थायी होगी| इसलिए प्रार्थना कराते हैं कि इसमें अरूचि उत्पन्न करके इसे दूर करने का उपाय करना आप ही का काम है || १३ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १२

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
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यतिराज विंशति

श्लोक  ११                                                                                                                                            श्लोक  १३

श्लोक  १२

अन्तर्बहि: सकलवस्तुषु संन्तमीशं अन् : पुर: स्थितमिवाहमवीक्षमाण: |
कन्दर्पवश्यहृदय: सततं भवामि हन्त त्वदग्रगमनस्य यतीन्द्र नार्ह: || १२ ||

यतीन्द्र सकलवस्तुषु     : रामानुज! सब वस्तुओं में
अन्त: बहि:                  : भीतर और बाहर
सन्तम् ईशं                  : व्याप्त करके स्थित भगवान को
अन्ध: पुर: स्थितम् इव : जैसे एक अन्धा अपने सामने की वस्तु को नहीं देख सकता वैसे
अवीक्षमाण:                : अहं सततं   नहीं देख कर, मैं हमेशा
कन्दर्पवश्यहृदय:         : काम के अधीन हो कर
भवामि हन्त                : रहता हूँ | हाय !
त्वदग्र गमनस्य न अर्ह:: तुम्हारे सामने आने तक के लिये मैं योग्य नहीं |

पिछले श्लोक में ‘अघं कुर्वे’ | अगर कोई पूछे कि जब सर्वेश्वर सब स्थानों में व्याप्त होकर तुम्हारे कर्म देख रहा है, तुम उससे छिप कर कैसे पाप कर सकते हो, इसका उत्तर इस श्लोक से देते हैं| मैंने तो ईश्वर को नहीं देखा है, तुम कहते हो कि सब वस्तुओं में भीतर और बाहर व्याप्त है| यदि अंधा अपने सामने वाली वस्तु को नहीं देख पाता तो इसमें आश्चर्य का क्या विषय है? मैं उस अन्धे की तरह ही हूँ|

 ईशमवीक्षमाण: कन्दर्पवश्यहृदय: सततं भवामिईश्वर को आँखों से देखता तो क्या उसी में मुग्ध हो कर नहीं रहता? उसका दर्शन न होने से ही मैं मनमाना काम कर रहा हूँ और क्षुद्र विषयों का यह दर्शन और भाग तो हमेशा करता रहता हूँ| ऐसा नहीं कि किसी एक समय पर ही, किन्तु ‘सततं’ सर्वदा ही|

त्वदग्रगमनस्य नार्ह: – मैं ऐसा पापी हूँ कि आपके सामने खड़े होने योग्य भी नहीं| जब यह मेरी योग्यता है, तब आपसे पास कैसे आ सकूँगा? || १२ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – ११

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
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यतिराज विंशति

श्लोक  १०                                                                                                                   श्लोक  १२

श्लोक  ११

पापे कृते यदि भवन्ति भयानुताप लज्जा: पुन: करणमस्य कथं घटेत |
मोहेन मे न भवतीय भयादिलेश: तस्मात् पुन: पुनरघं यतिराज कुर्वे |११|

यतिराज                          : श्रीरामानुज!
पापे कृते                          : जब पाप किया जाता है, तब
यदि भयानुताप लज्जा:     : यदि भय अनुताप और लज्जा हों तो
अस्य पुन: करणं              : इस पाप का फिर भी करना
कथं घटेत मे                    : कैसे घटेगा ? मुझे तो
मोहेन इह                        : अज्ञान के कारण पाप करने में
भयादि लेश:                    : भय आदि का थोड़ा सा अंश भी
न भवति तस्मात् अघं      : नहीं होता इसलिये पाप को
पुन: पुन: कुर्वे                  : बार-बार करता हूँ |

अज्ञान से भरे इस संसार में पाप करना कोई अद्भुत विषय नहीं, इसलिए पाप हो जाने की चिन्ता तो मुझे नहीं| ‘हाय! मैंने पाप कर लिया| इससे इस लोक तथा परलोक में मेरी क्या दशा होगी?’ इस तरह का भय, अनुताप और लज्जा हो तो यह किये हुए पाप का कुछ प्रायश्चित होगा, बाद में जान बूझ कर पाप करने से हमें रोकेगा| लेकिन मुझको पापों के विषय में जरा भी न भय है, न अनुताप है और न लज्जा| इसका कारण है विवेक का अनुभव| पाप से रोकने वाले अनुताप आदि के अभाव से बार-बार पाप करता ही रहता हूँ| अपने पापों की अधिकता को उपरोक्त शब्दों में श्रीरामानुज की सेवा में निवेदन कराते हैम की मुझे ऐसे पापी को आपकी कृपा के सिवाय दूसरी कोई गति नहीं|

श्रीवत्साङ्कमिश्र ने पिल्लै-पिल्लै आल्वान् से जो कहा था वह इस श्लोक के पूर्वार्ध से मेल खाता है| वह ऐतिह्य यों है; श्रीवत्साङ्कमिश्र (कूरत्ताल्वान्) के कई शिष्यों में पिल्लै-पिल्लै आल्वान् एक थे| आभिजात्य आदि गुणों से कुछ ऊँचे होने के कारण वे भागवतों से विनयहीन होकर बरताव करते थे| इसे देख कूरेशजी ने सोचा; हाय! इसका यह भागवतापचार बहुत ही हानिकारक है| वह तो इसके ज्ञान अनुष्ठान सबको नष्ट करके स्वयं बलवान होकर अन्त में इसका ही सर्वनाश कर डालेगा| इसलिए इसे पाप से बचना चाहिए| एक दिन पुण्यकाल में स्नान करने के बाद कूरेशजी ने उससे पूछा, “क्या तुम मुझे कोई दान नहीं दोगे जब कि इस पुण्यकाल में सभी कुछ न कुछ दान कराते हैं?” उसने उत्तर दिया, “स्वामिन्! मैं दान क्या दे सकता हूँ जब मेरा सब कुछ आप ही का है|” तब कूरेशजी ने कहा, “अच्छा, तब मेरे हाथ में उदकदान कर दो कि मैं आगे मनो वाक् काय तीनों से भागवतों के प्रति अपचार किये बिना सावधानी से रहूँगा|” उसने भी वैसा ही कर दिया| आगे चल कर एक दिन पूर्व वासना से भागवत का अपचार हो गया| उससे भी भयभीत हो और कूरेशजी के सामने जाने में लज्जित होकर अपने ही घर में ठहर गया| हमेशा की तरह जब यह कूरेशजी के यहाँ नहीं आया तब कूरेशजी ने स्वयं उसके घर जाकर पूछा, क्या बात है? उसने कहा, ” आज मेरे से एक भागवत के प्रति अपचार हो गया| मालूम होता है कि इस शरीर के साथ जब तक रहता हूँ तीनों करणों से अपचार के बिना जीवन बिताना असंभव है| मैं क्या करुँ?” यह कह कर दु:ख से भूमि में गिरकर कूरेशजी के चरणों से लिपट गया| इसका पश्चात्ताप देखकर कूरेशजी खुश हुए और बोले, “मन से अपचार होने पर यदि अनुताप होता है तो ईश्वर उसको क्षमा कर देते है| इस डर से कि खुले त्पोर पर किसी का अपचार करने से राजा का दण्ड मिलेगा तुम शरीर से किसी को नहीं सताओगे| अब वाक् एक ही रह गया है| उसे वश में रख कर सावधानी से रहो” || ११ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – १०

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यतिराज विंशति     

श्लोक ९                                                                                                                           श्लोक  ११

श्लोक  १०

हा हन्त हन्त मनसा क्रियया च वाचा योऽहं चरमि सततं त्रिविधापचारान् |
सोऽहं तवाप्रियकर: प्रियकृद्वदेवं कालं नयामि यतिराज! ततोऽस्मि मूर्ख: | १० |

यतिराज! य: सततं              : है यतिराज! जो (मैं) हमेशा
मानसा वाचा क्रियया च       : मन, वाक्, शरीर तीनों करणों से
त्रिविध-अपचारान्               : तीन तरह के अपचारों को
चरामि स: अहं                    : कर रहा हूँ वह मैं
तव अप्रियकर:                   : आपका अप्रिय कराते हुए
एवं कालं नयामि                : ऐसे समय बिता रहा हूँ
प्रियकृद्वत्                       : मानों आपके प्रिय ही को करने
तत: मूर्ख: अस्मि               : वाला हूँ इसलिये मैं मूर्ख हूँ
हा हन्त हन्त                     : हाय हाय! कैसी वंचना है!

स्वामिन् श्रीरामानुज! यध्यपि मन, वाक्, काय तीनों करण आपकी सेवा में लगाने ही के लिए बनाये गये हैं, तथापि अभागा मैं उनसे भगवदपचार, भागवतापचार एवं असह्यापचार तीन तरह के अपचारों को कराते हुए जीता था| आपके हृदय को दु:ख पहुँचाते हुए यध्यपि मैं रहता था, फिर भी मैं ऐसा ढोंगी बन कर समय बिताता था, मानो आपकी प्रीति के कारण ही काम कर रहा हूँ| यह था मेरी मूर्खता|

त्रिविधपचारान् तीन प्रकार के अपचारों में;

भगवदपचार – सर्वेश्वर को भी देवतान्तरों के समान मानना, रामकृष्ण आदि अवतारों को यह समझना की वे भी हमारे जैसे मनुष्य ही हैं, अर्चावतार में मूर्ति के उपादान द्रव्य का विचार करना आदि|

 भागवतापचार – अहंकार से तथा अर्थ और काम से प्रेरित होकर श्रीवैष्णवों के प्रति किये जाने वाले अपराध|

 असह्यापचार – पूर्वोक्त प्रकार से अर्थ कामों से प्रेरित न होकर, हिरण्यकशिपु की तरह भागवद्विषय एवं आचार्यापचार भी असह्यापचार कहलाता है || १० ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – ९

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यतिराज विंशति     

श्लोक  ८                                                                                                                              श्लोक  १०

श्लोक ९

नित्यम् त्वहं परिभवामि गुरुं च मन्त्रं तद्देवतामपि न किन्चिदहो बिभेमि ।
इत्थं शठोSप्यशठवद्भवदीयसङ्घे ह्रुष्टश्चरामि यतिराज! ततोSस्मि मूर्खः || (९)||

पदार्थ:-
यतिराज!                            :  हे यतिराज!
नित्यम् तु                           : कभी भी
गुरुं च मन्त्रं तद देवतां अपि  : आचार्य , उनसे शिक्षित मंत्र और उस मंत्र के सार होनेवाले भगवान् को
अहं परिभवामि                    :  मैं अनादर् कर्ता हूँ
किन्चित् न बिभेमि             : (इस प्रकार अनादर् करते हुए भी ) एक पल के लिए भी चिंतित नहीं
अहो                                   :  अरे (आश्चर्य और शोक से)
इत्थम् शठः अपि अशठवत्  : इस प्रकार पापिष्ट होते हुए भी एक् सज्जन्/ धार्मिक की तरह्
भवदीय  संघे                      : आपके पादचरणों में निर्वासित भक्तजनों के मिलन में
ह्रुष्टश्चरामि                       : आनंद से (ये सोचके कि  इनको मेरा पापों का जानकारी नहीं)
ततः अस्मि मूर्खः               : इसलिए मैं एक मूर्ख हूँ |

चौथाई श्लोक में प्रार्थना किये थे कि अपना मुंह से निकल्ते हुए हरेक् शब्द आपके सतगुणों का आराधन करते रहे | लेकिन अपना मुंह उसके सीधे प्रतिमुख करने वाला बन गया जो गुरु, मंत्र और देवता का अपप्रयोग करता रहता है | इस दुर्गुण को और उसके मूलकारण होनेवाला मूर्खता को हटाने के लिए प्रार्थना करते हैं |

गुरु का अपप्रयोग करना उन्के उपदेश के विरुध त्याग करने लायक विषयों में लगाते रहना और पालन करने लायक विषयों में अचेत रहना | या उनके उपदेशित मंत्र को अपने प्रसिद्धि के लिए या धन लाभ के लिए कोई अनुपयुक्त व्यक्तियों को सिखाना | मंत्र का अपप्रयोग होता है  – मंत्र का न्यायसंगत व्याख्या को छिपाना या उसको अप्रमाणिक अर्थ सिखाना |मंत्र के देवता का अपप्रयोग करना – श्रीमन नारायण से दिया गया इस देह , मन  आधी इन्द्रियोंको उनके प्रयोजन के बिना सिर्फ अपने प्रयोजन के लिए अनात्मिक विषयों में लगाना |इनका विस्तारपूर्वक व्याख्यान श्रीवचनभूषण में प्रस्तुत है |

अहो – आश्चर्य | वे विनम्रता से कहते हैं कि इस लोक में अपने सदृश दोषी और उस दोष से निर्लज्जित व्यक्ति और कोई नहीं मिलने से आश्चर्य होता है|

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यतिराज विंशति – श्लोक – ८

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श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
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यतिराज विंशति     

श्लोक  ७                                                                                                                              श्लोक  ९

श्लोक  ८

दु:खावहोऽहमनिशं तव दुष्टचेष्ट: शब्दादि भोगनिरत: शरणागताख्य: |
त्वत्पादभक्त इव शिष्टजनौघमध्ये मिथ्या चरमि यतिराज ततोऽस्मि मूर्ख: || ८ ||

यतिराज! अहं                       : हे रामानुज! मैं
दुष्ट चेष्ट:                            : बुरे आचरण वाला हूँ;
शब्दादि भोग निरत:              : शब्दादि विषय भोग में रत हूँ;
शरणागताख्य: अनिशं तव     : ‘शरणागत’ अर्थात् ‘प्रपन्न’ नाम धर कर भी सदा आप (के हृदय)
को
दु:खवह:                               : दु:ख पहुँचाता रहता हूँ ;
शिष्ट-जन-ओघ-मध्ये           : शिष्ट लोगों के समूह के मध्य में
त्वत्पाद भक्त इव                 : आपके चरणों के भक्त की तरह
मिथ्या चरमि                       : झूठमूठ घूमता फिरता रहता हूँ
तत: मूर्ख अस्मि                   : इसलिये मैं एक मूर्ख ही हूँ|

हे स्वामीन्! मैं आपका दास हूँ तो भी मैं बुरा चाल चलन रखता हूँ और शब्दादि विषयों के अनुभव करने में लगा हूँ| नाम मात्र के लिए मैं शरणागत हूँ| अपनी इस करनी से मैं सर्वदा मन को दु:ख पहुँचा रहा हूँ| इस प्रकार रहने के कारण यध्यापि आपके भक्त समूह की और झाँकने तक की योग्यता नहीं, तो भी ऐसा ढोंग रचता हूँ मानो मैं आपके चरणों में पारमार्थीक प्रेम रखता हूँ और विलक्षण महापुरूषों की गोष्टी में ढोंगी बनकर ही फिरा करता हूँ| लीजिए, यह मेरी मूर्खता है|

दु:खावहोऽहं आपकी दया के योग्य हूँ| मेरा दु:ख देख कर आप खुद पसीज कर मुझ पर दया कीजिए || ८ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – ७

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यतिराज विंशति     

श्लोक  ६                                                                                                                               श्लोक  ८

श्लोक  ७

वृत्त्या पशुर्नवपुस्तवहमीद्वशोऽपि श्रुत्यादि सिध्द निखिलात्मगुणा श्रयोऽयम् |
इत्यादरेण कृतिनोऽपि मिथप्रवक्तुमध्यापिवंचनपरोऽत्र यतीन्द्र वर्ते || ७ ||

यतीन्द्र अहं तु                    : हे श्रीरामानुज! मैं तो
नर वपु:                             : मनुष्य शरीर वाला हूँ तो भी
वृत्त्या पशु:                        : अपनी करनी से जानवर ही हूँ
ईद्वश: अपि                      : यध्यपि मैं ऐसा हूँ; तो भी
अत्र अध्य एपीआई             : इस संसार में आज भी
वञ्चनपर: वर्ते                   : इतना वञ्चक ठग हूँ कि
कृतिन: अपि                      : अभिज्ञों महानुभावों को भी
आदरेण                             : आदर के साथ
मिथ: प्रवक्तुम् अयं            : परस्पर यह बोलने को बाध्य करता हूँ कि यह
श्रुति- आदि- सिद्ध-              : श्रुत्यादि में सिद्ध
निखिलात्मगुणाश्रय: इति    : सभी आत्मगुणों का आश्रय है |

पिछले श्लोक में स्वनिकर्ष का अनुसन्धान जो आरब्ध हुआ वह अनुवृत्त होता है| यध्यपि मैं मनुष्य योनि में पैदा होकर मनुष्य शरीर के साथ दिखाई देता हूँ, मेरा आचरण इतना गया बीता है कि उसमें और पशुओं की वृत्ति में कोई भेद नहीं| “ज्ञानेन हीन: पशुभि: समान:” ज्ञान के अनुभव तथा अनुष्ठान के वैकल्य से मैं जानवरों के समान हूँ| यध्यपि वास्तव में यही मेरी स्थिति है, मैं इस तरह का ढोंगी भक्त बना फिरता हूँ कि अभिज्ञ लोग भी मुझे देख कर बोलते हैं कि वेद-वेदान्त-वेदाड्गों में प्रतिपादित सभी आत्मगुणों की ये खान हैं| यह है इनका नैच्यानुसन्धान|

वृत्त्या पशु: – आहार निद्रा आदि में भी कोई नियम मैं नहीं रखता|

कृतिनोऽपि मिथ: प्रवाक्तुम् – यह प्रथमा विभक्ति का बहुवचन नहीं| क्योंकि उसका अन्वय ‘वर्ते’ क्रिया से नहीं हो सकता| इसको कर्म कारक बहुवचन मान कर, ‘प्रवक्तुं’ को (अन्तर्भावित-णिच्) प्रेरणार्थक समझा जा सकता है| ‘प्रवक्तु:’ ऐसा भी पाठ कोई कोई कहते हैं || ७ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – ६

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यतिराज विंशति     

 श्लोक  ५                                                                                                                                   श्लोक  ७

श्लोक  ६

अल्पापि मे न भवदीयपदाब्जभक्तिः शब्दादिभोगरुचिरन्वहमेधते हा।
मत्पापमेव हि निदानममुष्य नान्यत् तद्वारयार्य यतिराज दयैकसिन्धो ॥ ()

दया एक सिंधो यतिराज  :  सागर जैसा अनंत होते हुए भी अतुलनीय दया रखनेवाले यतिराज
आर्य:                            :  आचार्य
मे                                 : मुझे
भवदीयपदाब्जभक्तिः    :  आपके चरणों में भक्ति
अल्पापि मे न                : लेश मात्र नहीं
शब्दादिभोगरुचि            : रूप , रस, स्पर्श, गन्द जैसे अल्पतर वासनाओं से पीड़ित
अंनवहम  एधते             : प्रतिदिन बढ़ता जाता है
हा                                : हाय (शोक और आश्चर्य से)
अमुष्य निदान              :  धार्मिक चिन्तनों से वियुक्तः अल्पतर विषयों से आकर्षित होने वाले इस स्थिति का मूल कारण
मत्पापमेव                   :  मेरा स्वयं अर्जित पापों ही
अन्यत न                    : और कुछ / कोई भी नहीं
तद वारय                    : उस पापों से विमोचन दीजिये

चौथाई श्लोक में प्रार्थना किये थे कि प्रतिदिन अपने मन श्री रामानुजाचार्य के दिव्य स्वरुप में ही लगाते रहेँ | लेकिन इस श्लोक में अपना मन अभी भी उसके विरुद्ध अन्यत्र विषयों में भटकते रहने को इंगित करते हैं | इस विपरीत स्थिति को हटाने के लिए इस श्लोक में उसका मूल कारण होने वाले अपने असंख्य पापों को हटाने की प्रार्थना करते हैं |

दया माने – अन्यों का कष्ट देख्कर निस्स्वार्थ उससे दुखी होना | श्री रामानुजाचार्य उस दया स्वभाव का सागर होते हैं | “अतुलनीय” का गोपनीय अर्थ होता है कि भगवान श्रीमन नारायण का दया को भी कोई सीमा होगा लेकिन श्री यतिराज के दया का कोई सीमा नहीं |

आर्य माने –

  1. आचार्य शब्ध के समानार्थक मानकर तत्व, हित , पुरुषार्थ को स्पष्टीकरण करनेवाले यानि मोक्षप्राप्ति कारणात्मक श्री रामानुजाचार्य !
  2. “आराध याति इति आर्य” – इस व्युत्पत्ति से वेद में नियमित धर्मी पथ के पास और उससे विरुद्ध अधर्मी पथ से दूर लेनेवाले श्री रामानुजाचार्य!
  3. अरयते – प्राप्यते – सर्व जनों से पुरुषार्थ स्वरूप में प्राप्य लायक श्री रामानुजाचार्य !

हा (शोक और आश्चर्य) माने –

  • शोक का कारण – धार्मिक चिन्तनों से वियुक्तः अल्पतर विषयों से आकर्षित होने वाले स्थिति
  • आश्चर्य का कारण – सीमित सुख देनेवाले शब्दादि विषयों में प्रीति और असीमित सुख देनेवाले यतिराज से अप्रीति करना

मत्पापमेव ही  निदान माने – जो कोई लोग भक्तिमान बन जाते हैं, उनका मोक्षप्राप्ति के लिए भगवान उनका पाप को उनके विरोधियों से लदवाते हैं | मामुनिजी कहते हैं कि उनका पाप ऐसे वाले पाप नहीं जो भगवान अपने स्वतंत्रा से या मुझसे खेलने के लिए लाद लिया गया है, मगर वो सब स्वयं अर्जित किया पाप है | इसका कारण और कोई व्यक्ति या भगवान नहीं |

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यतिराज विंशति – श्लोक – ५

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

श्लोक  ४                                                                                                                श्लोक  ६

श्लोक  ५

अष्टाक्षराख्वय मनुराजपदत्रयार्थ निष्ठां ममात्र वितराध्य यतीन्द्र नाथ !
शिष्टाग्रगण्य जन सेव्यभवत्पदाब्जे हृष्टाऽस्तु नित्यमनुभूय ममास्य बुद्धि: ||

नाथ यतीन्द्र !                    : हे यतिराज
अष्टाक्षराख्य मनुराज        : अष्टाक्षर नामक मूल मन्त्र के
पद त्रयार्थ निष्ठां                : तीन पदों में क्रमश: संगृहीत अनन्यार्हशेषत्व, अनन्यशरणत्व तथा अनन्यभोग्यत्व की निष्ठा को
ममात्र अध्य वितर             : आज यहाँ मुझे प्रदान कीजिये |
असि मम बुद्धि:                 : इस मुझे नीच की बुद्धि
शिष्टाग्रगण्य जनसेव्य      : शिष्टाग्रणी लोगों के द्वारा सेवित आपके चरण कमालों का
भवत्पदाब्जे
नित्यं अनुभूय हृष्टा अस्तु  : नित्य अनुभव कराते हुए प्रसन्न हो |

पिछले श्लोक में कैंकर्य करने की जो प्रार्थना की गई थी उसी की पुष्टि में अष्टाक्षर मन्त्र का स्मरण इस श्लोक में किया गया है| इस श्लोक में यह प्रार्थना के गई है कि अष्टाक्षर मन्त्र में जिन निष्ठाओं का उल्लेख है, वे प्राप्त हों|

मनु मन्त्र का पर्यायवाचक शब्द है| अत: मनुराज से मन्त्रराज अर्थ प्रकट होता है | सम्प्रदाय में अष्टाक्षर को मन्त्रराज और द्वय को मन्त्ररत्न कहने की परिपाटी है| मन्त्रराज में प्रणव, नम: और नारायणाय ये तीन पद हैं | यध्यापि प्रणव का विश्लेषण करने पर आ, उ और म भी तीनों अलग अलग तीन पदों का रूप ग्रहण कराते हैं तथापि यहाँ पर प्रणव को उक्त पद के रूप में ही ग्रहण किया गया है| ‘नाम:’ को भी विभक्त कर दो पद कहे जा सकते हैं किन्तु यहाँ पर एक ही पद है| नारायण तो एक पद है ही| इन तीन पदों में क्रमश: अनन्यार्हशेषत्व, अनन्यशरणत्व और अनन्यभोग्यत्व के भाव प्राप्त होते हैं| ये मुमुक्षु के लिए परम ज्ञातव्य हैं| मुमुक्षुप्पडि आदि रहस्य ग्रन्थों में इनका वर्णन है| इन निष्ठाओं के लिए ही यहाँ पर यतिराज से प्रार्थना की गई है| अनन्यशेषत्व, उपायान्तरप्रवृत्ति एवं भोग्यांतरप्रावण्य की संभावना भी न हों यही प्रार्थना है|

अर्थ और अध्य अर्थात् यहाँ व आज के लिए इन निष्ठाओं को सीमित कर आँय देश काल में देने का विचार दूर किया हैं| आँय देश काल में ये होंगी ऐसा कह कर प्रार्थना को टाला नहीं जा सकता|

श्रीपरकाल ने मन्त्रराज की व्याख्या कराते हुए बताया है कि इसमें भागवतशेषत्व की भावना प्रधान प्रमेय है| श्लोक के उत्तरार्ध में उसको अपनाने के लिए अभिलाषा प्रकट की गई है| आचार्य सार्वभौम भागवतोत्तम हैं| उनके शेषत्व के लिए प्रार्थना, इस श्लोक का लक्ष्य है| अंत में कहा गया है कि शिष्टाग्रणी अनन्त आल्वान् आदि महानुभावों के द्वारा यतिराज के चरणों की सेवा होती है| उन चरण कमलों के नित्यानुभव की प्रार्थना यहाँ पर की गई है| उक्त श्लोक में यतिराज से यह भी प्राथना की गई है कि अष्टाक्षर में निहित तीनों प्रकार की निष्ठायें भगवान श्रीमन्नारायण के अलावा आपके प्रति भी स्थिर हों || ५ ||

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यतिराज विंशति – श्लोक – ४

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श्रीः
श्रीमते शटकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनय् नमः

यतिराज विंशति     

श्लोक  ३                                                                                                                           श्लोक  ५

श्लोक  ४

नित्यं यतीन्द्र! तव दिव्यवपुस्स्मृतौ मे सक्तं मानो भवतु वाग्गुण कीर्तनेऽसौ |
कृत्यं छ दास्यकरणं तु करद्वयस्य वृत्तयंतरेऽस्तु विमुखं करणत्रयं च ||

यतीन्द्र! में मन: नित्यं          : हे यतिराज! मेरा मन सदा
सक्त दिव्यवपु:स्मृतौ           : आपके दिवि रूप के चिन्तन में
तव गुणकीर्तन सक्ता भवतु  : आपके गुणानुवाद के गाँ करने में लगी रहे
कर द्वययस्य कृत्यं             : दो हाथो का कार्य
तव दास्य करणं भवतु         : आपकी सेवा करना हो,
करणत्रयञ्च                       : इस प्रकार मन, वाणी और शरीर
वृत्त्यन्तरे विमुख अस्तु      : आँय व्यापार से विमुख हों |

इस श्लोक में आचार्य ने यह इच्छा प्रकट की है की मन, वाणी और शरीर यतिराज की सेवा में लगे रहें| मन यतिराज के दिव्य रूप के चिन्तन में लग जाय| वाणी उनके गुणानुवाद में अनुरक्त हो जाय| हाथ उनकी सेवा में लग जायँ| और किसी कार्य में मन वाणी तथा शरीर न लगें यह अभिलाषा आचार्य ने श्लोक के अंतिम चरण में व्यक्त की है|

श्री एम्बार के एक पध्य से भी प्रथम पाद का भाव प्रकट होता है| आचार्य ने भी “आर्तिप्रबंध” में ऐसा ही भाव वर्णन किया है| अन्य स्थलों पर भी ऐसी उक्तियाँ मिलती हैं| दूसरे पाद में आत्मसम्बन्धी गुणों का कीर्तन करने की बात काही गई है| ये गुण हैं दया, क्षांति, उदारता आदि| इनमें दया की प्रधानता है| आँय सारे गुण इसी में सामाविष्ट हो जाते हैं| इसके साथ-साथ वात्सल्य, सौशील्य आदि गुणों का कीर्तन भी यहाँ पर अभीष्ट है| तृतीय पाद में कोई कोई ‘दास्य करण’ के स्थान पर दास्यकरणे पाठ करते हैं| वास्तव में शुद्ध पाठ दास्यकरणं ही है| ‘दास्यकरणं कृत्यं भवतु’; इस तरह समानाधिकरण से अन्वय ही ठीक होगा|

यहाँ पर यह शङ्का हो सकती है कि यतिराज के रूप एवं गुणों का चिंतन – कीर्तन आज किया जा सकता है किन्तु यतिराज की सेवा प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि उनके वैकुण्ठधाम वापिस गए इतना समय व्यतीत हो गया| इसका समाधान यही है कि यहाँ पर यतिराज की मूर्तियों की सेवा करने का भाव ग्रहण करना होगा| श्लोक के पहिले तीन पादों मेम जो कुक अन्वय रूप से कहा गया है वही चतुर्थ पाद में व्यतिरेक रूप से कहा गया है || ४ ||

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