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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १८

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  १७                                                                                                               श्लोक  १९

श्लोक  १८

ततस्तत्सन्निधिस्तम्भमूलभूतलभूषणम् ।
प्राड्ःमुखं सुखमासिनं प्रसादमधुरस्मितम् ॥ १८ ॥

तत                                                      –  अरगंनगरप्प के तिरुवाराधन समाप्ति के पश्च्यात ,
ततस्तत्सन्निधिस्तम्भमूलभूतलभूषणम्    सन्निधि के स्तम्भों के नजदीक बैठकर उस स्थान को अलंकृत करना,
प्राड्ःमुखं                                                पूर्वाभिमुख होकर विराजमान है ,
सुख                                                    –  उपयुक्त रूप से ( शांतमन का प्रतिक )
आसीनम                                               वरवरमुनि स्वामीजी जो विराजमान है ,
प्रसाद मधुरस्मितम्                              –  साफ मन से बाहर निकली हुई सौम्य मुस्कुराहट के साथ ।

पहले श्लोक में बताये अनुसार तिरुवाराधान समापन करके स्वामीजी द्वयानुसन्धान में निरत रहते है, जो की दैनिक अनुष्ठान का एक भाग है । पराशर मुनि कहते है दिन में तीन बार तिरुवाराधान के पश्च्यात द्वय मंत्र जिसे मंत्र रत्न भी कहा जाता है उसका १००८ बार या १०८ बार संभव नहीं है तो कम से कम २८ बार जरूर करना चाहिये । वरवरमुनि स्वामीजी इस मंत्र का अनुसन्धान करते समय श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीचरणारविन्दों का ध्यान करते है ।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी का मन निर्मल और स्पष्ट रूप से प्रफुल्लित है और मुखारविन्द अत्यन्त सुन्दर और सौम्य मुस्कुराहट के साथ संयुक्त है । शास्त्र कहता है कोई भी सत्कार्य करते समय पूर्वाभिमुख या उतराभिमुख होकर करना चाहिये । इसलिये देवराज स्वामीजी “ प्राड्ःमुखं सुखमासिनं ” कहते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १७

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श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  १६                                                                                                                 श्लोक  १८

श्लोक  १७

अथ रंगनिधिं सम्यगभिगम्य निजं प्रभूम् ।
श्रीनिधानं शनैस्तस्य शोधयित्वा पदव्दयम् ॥ १७ ॥

अथ                   –   सुबह के कार्यों को सम्पन्न करके मठ में पहुँचे ,
निजं                  –   तिरुवाराधन करने की वजह से ,
प्रभुं                    –   भगवान ,
रंगनिधिं             –   अरगंनगरप्प, जो श्रीरंगम के निधि है, वे मठ में विराजमान है,
सम्यगभिगम्य   –   निष्ठा के साथ व्यवस्थित रीति से साष्ठांग करना ,
तस्य पदद्वयम  –   पवित्र श्रीचरण ,
शोधयित्वा         –   तिरुमंजन करके तिरुवाराधान करना ।

शाण्डील्य स्मृति में कहा गया है की स्नान करने के पश्च्यात भगवत सन्निधि में जाना चाहिये । शाण्डील्य ऋषी कहते है भगवत सन्निधि में जाते समय शुद्ध स्नान करके, ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना, मंदिर में प्रवेश करते समय अपने पैरों को सफाई करना, पानी से आचमन करना, मन और शरीर को नियंत्रित करना, सुबह सूर्योदय के समय और शाम में तारों  के उदय के समय मंत्रानुसन्धान करना, ऐसे करते हुये भगवान के सन्निधि में पहुँचना । यहाँ पर रंगनाथ भगवान के श्रीचरणों की सेवा का उल्लेख किया गया है, जो कि पूर्ण तिरुवाराधन को दर्शाता है । वरवरमुनि स्वामीजी अरगंनगरप्प कि सेवा करते है जो कि रामानुज स्वामीजी को अत्यन्त प्रिय है, यहाँ पर रामानुज स्वामीजी के श्रीचरणों कि निष्ठा को भी हम अनुभव कर सकते है । जैसे शत्रुघ्नजी सदैव भरतजी की मुखोल्लास के लिये श्रीरामजी के बारे में स्मरण करते रहते थे ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १६

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परिचय

श्लोक  १५                                                                                                                   श्लोक  १७

श्लोक  १६

ततः प्रत्युषसि स्नात्वा कृत्वा पौर्याह्रिकीः क्रियाः ।
यतीन्द्रचरणद्वन्द्वप्रवणेनैव चेतसा ॥ १६ ॥

ततः                                      – तब,
प्रत्युषसि                               – सूर्योदय के पहीले ( अरुणोदय ),
स्नात्वा                                 – स्नान करने के बाद,
पौर्याह्रिकीः                            – प्रातः किये जानेवाले कार्य,
क्रियाः                                  – शुद्ध कपड़े धारण करना, संध्यावन्दन करना,
यतीन्द्रचरणद्वन्द्वप्रवणेनैव  – श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीचरणों में विशेष अनुराग,
चेतसा                                  – जागृत होकर,
कृत्वा                                  – पूर्ण करना ।

प्रत्युषसि – उषाकाल, सूर्योदय के ठीक एक घंटे ३६ मिनिट पहीले । पहले वर्णन किये गये अनुसार यह मध्य रात्रि के चौथे भाग को दर्शाता है ( जो कि तीन घंटे १२ मिनिट है ) जिसमे १ घंटा ३६ मिनिट शेष रहता है । शरीर और दांत कि सफाई, स्नान, गुरूपरम्परा का अनुसन्धान और भगवान के छःस्वरूपों का ध्यान वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा किया जाता है । स्वामीजी द्वारा कषाय वस्त्र, तिलक और तुलसी का माला धारण किया जाता है जिसका वर्णन ६,७,८ श्लोक में किया गया है । शास्त्र बताता है कि आचार्य भगवान श्रीमन्नारायण का साक्षात अवतार है और शिष्य पूर्ण रूप से आचार्य में निष्ठा रखते हुये भगवान के रूप में आये हुये आचार्य के मुखोल्लास के लिये दैनिक अनुष्ठान करते है । वरवरमुनि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी में अनुराग के साथ अपने दैनिक अनुष्ठानों को करते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १५

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परिचय

श्लोक  १४                                                                                                                     श्लोक  १६

श्लोक  १५

ध्यात्वा रहस्यत्रितयं तत्वयाथात्म्यदर्पणम् ।
परव्यूहादिकान् पत्युः प्रकारान् प्रणिधाय च ॥ १५ ॥

तत्वयाथात्म्यदर्पणम्   – आत्मा का वास्तविक स्वरूप दर्पण के रूप में प्रतिबिम्बित होता है ,
रहस्यत्रितयं                   तीन रहस्य मूल मंत्र, द्वय मंत्र और चरम मंत्र ,
ध्यात्वा                        अर्थानुसन्धान ,
परव्यूहादिकान्            – पर, व्यूह इत्यादि,
पत्युः                          – पूर्ण ब्रम्हाण्ड के नायक श्रीमन्नारायण भगवान,
प्रकारान्                      – पाँच चरण,
प्रणिधाय च                 – मनन द्वारा ।

एक आत्मा का वास्तविक स्वरूप तीन रूपों द्वारा बताया गया है । यह आत्मा सिर्फ भगवान की दासता को स्वीकार किया है ( अनन्यार्हशेषत्व ), सिर्फ भगवान को उपाय के रूप में स्वीकार किया है ( अनन्यशरणत्व ) और सिर्फ भगवान का ही अनुभव किया है ( अनन्यभोग्यत्व )। मूलमंत्र “ ॐ नमो नारायणाय ” में तीन पद है क्रमशः जो इन चरणों को दर्शाता है । नमः शब्द मोक्ष का उपाय भगवान श्रीमन्नारायण को संबोधित करता है । द्वय मंत्र के पहीले वाक्य के तीन शब्द “ श्रीमन्नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये ” में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है । भगवत गीता के चरम श्लोक की प्रथम पंक्ति में “सर्वधर्मान परीत्यज मामेकं शरणं ब्रज” आता है जिसमें मोक्ष पाने के लिये एक मात्र भगवान श्रीमन्नारायण को उपाय के रूप में स्वीकार किया गया है । इसलिये ये तीन रहस्य आत्मा के वास्तविक रूप को दर्शाते है ।

भगवान के पाँच स्वरूप है, पर, व्यूह, विभव, अंतर्यामी और अर्चावतार ।

  • पर – परमपद में नित्यसुरी और मुक्तामा भगवान श्रीमन्नारायण का अनुभव करते है ।
  • व्यूह – ब्रम्हादि देवताओं की मदद करने के लिये क्षीरसागर में विराजमान है ।
  • विभवम – राक्षस और असुरों का संहार करने के लिये राम, कृष्ण आदि अवतारों को लिया ।
  • अंतर्यामी – चेतन और अचेतनों में, सभी प्राणियों में सर्वव्यापी है और दिव्य मंगल विग्रह का ध्यान करनेवालों के हृदय में विराजमान है ।
  • अर्चा – उपरोक्त चारो प्रकारों से भी अत्यन्त सुलभ रूप धारण करके सेवा ग्रहण करते हुये मंदिरों में, घरों में विराजमान है ।

इसके अलावा छठवाँ चरण बताया गया है , जिसमें आचार्य वैभव का वर्णन है । विष्णुचितसूरी पेरीयालवार तिरुमोली ५.२.८ में कहते है “ पीठक वडै पीरनर पीरम गुरुवगी वन्धु ” याने जो रेशम के कपड़े को धारण करते हुये आचार्य के रूप में विराजमान होकर भगवत विषय के बारे में उपदेश देते है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १४

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  १२-१३                                                                                                                       श्लोक  १५

श्लोक  १४

परेद्युः पश्चिमे यामे यामिन्यास्समुपस्थिते ।
प्रबुद्धय शरणं गत्वा परां गुरूपरम्पराम् ॥ १४ ॥

परेद्युः          – वरवरमुनि स्वामीजी के अनेपक्षित संबंध के अगले दिन,
पश्चिमे यामे  – रात्री के अंतिम भाग में,
समुपस्थिते   – जब संपर्क किया गया,
प्रबुद्धय          – वरवरमुनि स्वामीजी शयन से जागृत हुये,
परां                भव्य,
गुरूपरम्पराम् – श्रीमन्नारायण भगवान से लेकर वरवरमुनि स्वामीजी के आचार्य श्री शैलपूर्ण स्वामीजी तक                                           गुरू परम्परा,
गत्वा             – मनन करते हुये प्रार्थना करना ।

यहाँ पर देवराजमुनि पहीले वर्णन किये हुये कुछ संदर्भों को संक्षेप में बता रहे है ।  वरवरमुनि स्वामीजी के दैनिक कार्यों को वर्णन कर रहे है । भगवतगीता में कृष्ण भगवान चरम श्लोक में कहते है मोक्ष प्राप्त करने के लिये सभी धर्मों का त्यागकर मुझे एक मात्र साधन के रूप में स्वीकार करो । फिर भी हमारे पूर्वज दैनिक अनुष्ठान को भगवत कैंकर्य समझकर करते है ताकि आगे आनेवाली पीढ़ी इसका पालन करे । वरवरमुनि स्वामीजी इसका पालन करते हुये दिन के पाँच भागों को जैसे उपादानम, अभिगमनम, याग, स्वाध्याय, योग को भगवत कैंकर्य मानकर करते है । शिष्य को आचार्य निष्ठा दृढ़ करने के लिये आचार्य के दैनिक अनुष्ठानों का पालन करना शास्त्र में बताया गया है । इन बातों को ध्यान में रखते हुये देवराजमुनि ने वरवरमुनि स्वामीजी की दिनचर्या का निवेदन किया । पहले जैसे वरवरमुनि स्वामीजी को पंक्तिपावन कर्ता बताया गया है, उसके अनुसार स्वामीजी के इस स्तोत्र के पठन से तदियाराधन के समय श्रीवैष्णव और श्रीवैष्णवों की गोष्ठी को पवित्र कर देता है ।

अगले श्लोक में रहस्यानुसन्धान का वर्णन किया गया है, उसके एक भाग याने गुरुपरम्परानुसन्धान का वर्णन यहाँ पर किया गया है ।  गुरूपरम्परा अनुसन्धान के बिना  रहस्यानुसन्धान नहीं करना चाहीये । आचार्यों की परम्परा को गुरुपरम्परा कहते है, गुरुपरम्परा के द्वारा मोक्ष पाने के लिये भगवान को उपाय के रूप में स्वीकार करने के लिये और भगवत कैंकर्य करते हुये अनुभव करने का उल्लेख किया जाता है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १२-१३

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  ११                                                                                                                         श्लोक  १४

श्लोक  १२-१३

भवन्तमेव नीरन्ध्रम पश्यन्वश्येन चेतसा ।
मुने ! वरवर ! स्वामिन् ! मुहुस्त्वामेव कीर्तयन् ॥१२॥

त्वदन्यविषयस्पर्शविमुखैरखिलेन्द्रीयैः ।
भवेयं भवदुःखानामसहानामनास्पदम् ॥१३॥

स्वामीन वरवर                 – मै तुम्हारी संपति के रूप में हूँ ,
मामुनिगल ! मूने              – एक प्रमुख संत जो महान आत्मा है, दयालुता के साथ मुझे स्वीकार करने के लिये सोच रहे है,
भवन्तमेव                        – आपका दिव्य मंगल विग्रह सादगी के निहित गुणवता के सौन्दर्य की  विशेषताओं से परीपूर्ण                                          हो गया है,
नीरन्ध्रम                         – निर्विघ्न रूप से,
पश्यन                             – एक दृष्टि,
वश्येन चेतसा                   – आपकी कृपा के लिये मेरा मन नियंत्रित है,
तमेव                              – आपकी प्रशंसा करने के लिये,
मुहुहु                               – लगातार,
कीर्तयन                          – प्रशंसा ( अहं – अपने आप को )
त्वदन्यविषयस्पर्शविमुखै  – आपके अलावा अन्य सांसारीक विषयों में ध्यान ही नहीं देते ,
अखिलेन्द्रीयैः                   – ज्ञानेन्द्रिय जैसे त्वचा, जीभ, आँख, कान, नाख और कर्मेन्द्रिय जैसे मुह
असह्यनं                         – इसके साथ सहने योग्य नहीं,
भवदुःखानाम                   – जन्म की वजह से जो पश्चाताप होता है,
अनस्पदम                       – अधीन नहीं,
भावेयम                           – जा रहा है ।

इस श्लोक में देवराजमुनि वरवरमुनि स्वामीजी की प्रार्थना करते हुये कहते है, ज्ञानेन्द्रीयों के अधीन होकर जन्म के भय से ग्रस्त थे, अब निरन्तर आचार्य की सेवा करते हुये गुणगान कर रहे है और पूर्ण रूप से ज्ञानेन्द्रीयों को कैंकर्य में लगाकर मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी हो गये हैं ।

‘पश्यन’ और ‘कीर्तयन’ यह दो शब्द प्रत्यय के रूप में है, जो देखना और प्रार्थना को संबोधित करते है । इन शब्दों के साथ ‘भवदुःखानाम अनास्पदम् भवेयं अगले श्लोक का शब्द भी जोड़ा जा रहा है । यहाँ पर ‘भवेयं’ का अर्थ होता है ‘प्रार्थना’, देवराजमुनि कहते है वरवरमुनि स्वामीजी के दर्शन करने से, स्तुति करने से और सभी इन्द्रीयों को स्वामीजी की सेवा में लगाने से मोक्ष के अधिकारी बन गये है और संसार के दुःख से मुक्त करने के लिये प्रार्थना करते है । यह देखा जाता है की आचार्य के दर्शन और स्तुति करने से शिष्य के सभी सांसारीक दुःख मिटा दिये जाते है, वह सदैव आचार्य के बारे में ही ध्यान करता रहता है जिस कारण से भगवान के मन में अनुराग उत्पन्न होकर उस शिष्य को मोक्ष दे देते है ।

सभी इन्द्रीयाँ, सांसारीक पदार्थ / सुःख – दुःख से विमुख हो रहे है , इससे जाना जाता है की वे सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को प्रार्थना करना चाहते है । इन्द्रीयाँ किसी कारण वश सदैव अन्य विषयों में लिप्त रहती है । इसलिये देवराजमुनि प्रार्थना करते है की सदैव उनकी इन्द्रीयाँ वरवरमुनि स्वामीजी के सेवा में लगी रहे । जिससे वे मोक्ष के अधिकारी बन जायेगें, दुनिया के मामलों में निर्देशित नहीं होगें और पश्च्याताप भी नकार दिया जायेगा । शाण्डील्य स्मृति, भारद्वाज परीशीस्तम और अन्य धर्म शास्त्र बताता है की त्वचा, जीभ, आँख, कान, नाक जैसे सभी इन्द्रीयों को भगवान के कैंकर्य में लगाना चाहीये ।

अभी तक इस स्तोत्र के प्रस्तावना को बताया गया है । आगे अभिगमनम, उपादानम, यागम, स्वाध्याय और योगं ऐसे पाँच कार्यों को बताया गया है, जिसमे यागम को छोड़कर सभी का विवरण दिया गया है । अभिगमनम याने अपने प्रातः काल के कार्यों को करके भगवान की सेवा के लिये तैयार होना । दूसरे श्लोक में इसका विवरण दिया गया है, जहाँ पर वरवरमुनि स्वामीजी भगवान की सेवा करने के लिये मंदिर की ओर जा रहे है । उपादानम याने भगवान की सेवा के लिये आवश्यक सामग्रियों को संग्रहीत करना । ११वें श्लोक में इसका वर्णन किया गया है, जहाँ पर बताया गया है की आत्मा भगवान की शेषी है, उसको प्राप्त करना ही इसका उदेश्य है, वरवरमुनि स्वामीजी देवराजमुनि को शिष्य के रूप में स्वीकार किया है, जिससे देवराजमुनि को भगवान कैंकर्य करने के लिये अपना लेगें है । स्वाध्याय का अर्थ वेद, दिव्य प्रबन्ध आदि का अध्ययन करना, जिसे ९ वें श्लोक में बताया गया है जहाँ पर वरवरमुनि स्वामीजी द्वय मंत्र का अनुसन्धान कर रहे है जो की मंत्रो मे मुकुटमणि है । योगं याने भगवान पर केंद्रीकृत करना, जिसे ९ वें श्लोक में बताया गया है । द्वय मंत्र भगवान और अम्माजी को दर्शाता है अथवा रामानुज स्वामीजी को दर्शाता है जिन्हे वरवरमुनि स्वामीजी सदैव ध्यान करते रहते है । भारद्वाज मुनि बताते है की भगवान की सेवा करने के लिये मंदिर जाना, सेवा के लिये सामग्री संग्रहीत करना, वेद और दिव्यप्रबन्ध का अध्ययन करना, भगवान पर अपना ध्यान केन्द्रीकृत करना , यह सभी कार्य अपने जीवन में कालक्षेप करने के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ११

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परिचय

श्लोक  १०                                                                                                                     श्लोक  १२-१३

श्लोक  ११

आत्मलाभात्परं किच्चिदन्यन्नास्तीती निश्चयात् ।
अंगीकर्तुमिव प्राप्तमकिज्चनमिमं जनम् ॥११॥

आत्मलाभात्      – भगवान जीवात्माओं को सेवक के रूप में प्राप्त करने के लिये अधिक से अधिक दिलचस्पी रखते है,
अन्यत किंचित   – उसके अलावा,
परम नस्ती        – अधिक लाभ नहीं,
इति निश्चित     – लगातार विचार करना,
अकिंचनम         – स्वीकार करने के लिये कोई अच्छे गुण नहीं है,
इमं जनम्          – मै बुरे गुणों से भरा हूँ, उन्हे मिटाना चाहीये ,
अंगीकर्तु            – अपनी गलतियों को सुधारकर भगवान श्रीमन्नारायण का दास बनकर रहूँगा,
प्राप्तम इव        – यह उम्मीद नहीं थी की आप स्वयं दौरा करेगें ।

मुस्कुराहट, मधुरवचन और सौम्य नजर का वर्णन पिछले श्लोक में करते है, और यहाँ पर देवराज मुनि बता रहे है की जब में मंदिर जाता हूँ तब मेरे लिये स्वामीजी मन्दिर आते है । स्वामीजी के साथ मेरा सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं है । जन शब्द का अर्थ होता है उसका जन्म हुआ था, अकिचंन का अर्थ है वह चरीत्र हीन है । इमं का अर्थ होता है सभी गलतियों के स्वामी । इमं शब्द का अर्थ संगीत की ध्वनि पर आधारीत है । इस प्रकार देवराज मुनि अपने आप को कहते है की अन्न खाकर पृथ्वी के लिये एक अतिरीक्त भार के रूप में हूँ और अपने जन्म को व्यर्थ बता रहे है क्योंकि अपने चरीत्र को सुधारने का प्रयास भी नहीं किये । वे इतने दिन – हिन होने के बावजूद भी वरवरमुनि स्वामीजी ने कृपा करके उन्हे अपनाया, इसलिये “ प्राप्तमिव ” शब्द में ‘इव’ शब्द उपमा को नहीं, अनुमान को संबोधीत करता है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – १०

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परिचय

श्लोक  ९                                                                                                                         श्लोक  ११

श्लोक  १०

स्मयमान मुखाम्भोजं दयमानदृगंचलम् ।
मयि प्रसादप्रवणं मधुरोदारभाषणम् ॥१०॥

स्मयमान मुखाम्भोजंवरवरमुनि स्वामीजी का मुखारविन्द कमल की तरह है जो सदैव मुस्कुराता हुआ रहता है ,
दयमानदृगंचलम्        – दया के साथ एक उत्तेजित सौम्य रूप में ,
मयि                          – इन दिनों में मै वरवरमुनि स्वामीजी को देखने में असफल रहा हूँ ,
प्रसादप्रवणं                – अनुग्रह ( कृपा ) करने के लिये जो स्वीकार करते है ,
मधुरोदारभाषणम्       – जिनके वचनो में गहरा अर्थ है और सुनने में आनन्द दायक है ।

इस श्लोक में देवराजमुनि वरवरमुनि स्वामीजी की कृपा उनपर कैसे बरस रही है, इसका वर्णन करते हुये स्वामीजी के ओष्ठों की मुस्कुराहट, सौम्यरूप और मधुर वचनों का अनुभव कर रहे है । इसके साथ देवराजमुनि अनुभव करते है की वरवरमुनि स्वामीजी सदैव मुस्कुराते हुये रहते है, उनको मालूम है की निरन्तर द्वयानुसन्धान से उनका मोक्ष अत्यन्त सरल हो जायेगा, इसके अलावा उनकी मुस्कुराहट उनके मधुर शब्दों को दर्शाते है । महान व्यक्ति उनकी प्रसन्नता को मुस्कुराहट के द्वारा दर्शाते हुये बोलते है । “दया” शब्द का अर्थ होता है की दूसरों के दर्द को महसूस करना । वरवरमुनि स्वामीजी अत्यन्त दुःखी होते है, वे स्वयं द्वय मंत्र के अनुसन्धान करते हुये आनन्द का अनुभव कर रहे है और दुनिया के लोग ऐसा न करते हुये इस संसार के चक्र में पड़े हुये है । इनके वचन भी अत्यन्त मधुर है और आचार्य अपने शिष्यों के साथ मधुर वचनों में संभाषण करते है । भारद्वाज मुनि कहते है सत्य, पवित्रता, दयालुता, धैर्य और खुशी इत्यादि महत्वपूर्ण धर्म है, इन्हे सभी लोगों को अपने आचरण में लाना चाहिये । “ मयि प्रसादप्रवणं ” का अर्थ है, पहिले जान बुजकर वरवरमुनि स्वामीजी के पास ध्यान नहीं देते हुये दोषी है और अभी वरवरमुनि स्वामीजी का वैभव जानकर उनकी भक्ति कर रहे है । मेधथीथी मनुस्मृति के टिकाकार है वे कहते है सुनने के लिये आनन्द दायक शब्दों को बोलना चाहीये । शाण्डील्य मुनि कहते है वार्तालाप करते समय गहरे अर्थ के शब्दों से वार्तालाप करना चाहीये । यहाँ पर गहरे अर्थ का मतलब होता है वार्तालाप करते समय द्वय मंत्र के अर्थ को ध्यान में रखना चाहीये ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ९

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक  ८                                                                                                                           श्लोक  १०

श्लोक  ९

मन्त्ररत्नानुसन्धान सन्ततस्पूरिताधरम् ।
तदर्थतत्वनिध्यान सन्नध्दपुल कोद्गमम् ॥ ९ ॥

मन्त्ररत्नानुसन्धान सन्ततस्पूरिताधरम्  – सदैव ओष्ठो द्वारा द्वयानुसन्धान करते रहते है,
जो की मंत्रों का मुकुटमणि है ।
तदर्थतत्वनिध्यान सन्नध्दपुल कोद्गमम् द्वय मंत्र का अर्थानुसन्धान करते हुये सदैव ध्यान करते रहते है ।

इस श्लोक में स्वामीजी के ओष्ठो की सुन्दरता का वर्णन कर रहे है । द्वय मंत्र का वैभव मूल मंत्र से भी बढ़कर है । मूल मंत्र को मंत्र राज कहते है और द्वय मंत्र को मंत्र रत्न कहते है । मंत्र रत्न मंत्रों में सर्वोच्च है याने मुकुटमणि की तरह है ।

पराशर मुनी बताते है की मंत्रों में यह मंत्र सर्वोच्च है । रहस्य में यह सर्वोच्च रहस्य है । यह मंत्र जल्दी ही हम लोगों को संसार सागर से पार करा देगा । मूलमंत्र में जो शंका उत्पन्न होती है उसका समाधान यहा हो जाता है । सभी पापों को नाश करके , समृद्धि और कल्याण की झलक भी लाता है । इसलिये इसे मंत्र रत्न कहा जाता है । अनुसन्धान याने धीरे – धीरे उच्चारण करना । वरवरमुनी स्वामीजी सदैव द्वयानुसन्धान करते रहते है जिससे उनके ओष्ठ धीरे – धीरे कंपित होते हुये दिखाई देते है । पराशरमुनी कहते है शरीर छूटने पर्यन्त द्वयानुसन्धान करते रहना चाहीये । मंत्र का उच्चारण धीरे – धीरे किया जाता है , क्योंकी शास्त्र में कहा गया है की मंत्र किसीको सुनाई नहीं देना चाहीये । वरवरमुनी स्वामीजी इस शास्त्र की मर्यादा का ख्याल रखते है ।

मंत्र अनुसन्धान करनेवाले अधिकारी को मंत्र का अर्थ जानना आवश्यक है, वरवरमुनी स्वामीजी मंत्र के अर्थ का अनुसन्धान करते हुये मंत्र का जप करते थे । द्वय का अर्थ है अम्माजी समेत भगवान की शरण ग्रहण करना । श्रीस्वामीजी के पुरुषकार के कारण और श्रीभगवान के वात्सल्य आदि गुणों द्वारा भगवान के दिव्य मंगल विग्रह और श्रीचरणों के पवित्र संयोजन का गठन होता है । भगवान के शरणागत उपर बताये गये सत्य को बिना रुकावट के मनन करेगें वे सदैव आनन्द में रहेगें । वरवरमुनी स्वामीजी ने इसका अनुभव किया है ।

द्वयानुसन्धान करना याने प्रपत्ति करना और प्रपत्ति एक ही बार की जाती है दोहराने की जरूरत नहीं है । इस संसार से मुक्त होने के लिये प्रपत्ति एक ही बार की जाती है , परन्तु कालक्षेप करने के लिये दोहराया जा सकता है । इसलिये वरवरमुनी स्वामीजी निरन्तर अनुसन्धान करते रहते है ।

“तदर्थ तत्व निध्यानम् ” को अलग तरह से अर्थ लगाया जाता है । पेरियावाचन पील्लै कहते है , भगवान विष्णु प्रमुख है, जो भक्तों के द्वारा कैंकर्य को स्वीकार करते है । उनका दिव्य मंगल विग्रह अनेक विशेष गुणों से युक्त है , श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान के श्रीचरणों के रूप में है और श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीशठकोप स्वामीजी के श्रीचरणों के रूप में विराजमान है । गुरु शब्द केवल श्रीरामानुज स्वामीजी को संबोधित करता है ओर किसीको नहीं । इस उपर के व्याख्यानुसार द्वय मंत्र में चरण शब्द श्रीरामानुज स्वामीजी को संबोधित करता है, यही “तदर्थ तत्व” का अर्थ है । इस विशेषार्थ से मालूम होता है कि भगवान के श्रीचरण श्रीमन्नारायण के नहीं बल्की श्री रामानुज स्वामीजी के है , जो कि श्री द्वय मंत्र का विशेषार्थ है ।

श्रीवरवरमुनी स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी के भक्त रहे और उनके श्रीचरणों का सदैव स्मरण करते रहते थे । द्वय मंत्र के पीछले अर्थ के मुक़ाबले अभी बताया हुआ अर्थ अत्यन्त विशेष है । १२ वें श्लोक में देवराज गुरुजी कहते है कि श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को द्वयानुसन्धान करते हुये दर्शन करना चाहता हूँ ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ८

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परिचय

श्लोक  ७                                                                                                                             श्लोक  ९

श्लोक  ८

काश्मीरकेसरस्तोमकड़ारस्निग्धरोचिषा ।
कौशेयेन समिन्धानं  स्कन्धमुलावलम्बिना ॥ ८ ॥

काश्मीरकेसरस्तोमकड़ारस्निग्धरोचिषा  – चम चमाती रोशनी के साथ केसरीया और लाल रंग का संयोजन ,
स्कन्धमुलावलम्बिना                           –  बाहों में सजी ,
कौशेयेन                                              – रेशमी वस्त्र से ,
समिन्धानं                                           – अधिक चमकीले दिखाई देता है ।

वरवरमुनी स्वामीजी ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक और रेशमी वस्त्र को धारण किए हुये है इसे पुनः देवराज गुरु इस श्लोक में बता रहे है । यहाँ पर बता रहे है कि रेशमी वस्त्र उन्होने उत्तरीये के रूप में धारण किया है । चारों आश्रमों में (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और सन्यास) ब्राह्मण रेशमी वस्त्र को धारण कर सकते हैं । पराशर मुनी कहते है ब्राम्हणों को तिलक, यज्ञोपवीत, कमलाक्षमाला और रेशमी वस्त्रों को धारण करना चाहिये । यहाँ पर जानना आवश्यक है कि उत्तरीय वस्त्र अवैष्णव सन्यासियों के लिये निषेध है, श्रीवैष्णवों के लिये नहीं । इसलिये वरवरमुनी स्वामीजी उत्तरीय वस्त्र को धारण किये है । शाण्डील्य मुनी कहते है उत्तरीय वस्त्र को भगवान की परीक्रमा करते वक्त, भगवान की सेवा करते समय, होम के समय और भगवान आचार्यों की सन्निधि में धारण नहीं करना चाहीये । उत्तरीय वस्त्र लाल रंग में रहने के कारण सन्यासियों के धारण करने योग्य है ।

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