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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ८

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श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ७                                                                                                                   श्लोक ९

श्लोक ८

अग्रे पश्चादुपरि परितो भूतलं पार्श्च्वतो मे
मौलौ वक्त्रे वपुषि सकले मानसाम्भोरूहे च ।
दर्शंदर्शं वरवरमुने दिव्यमङ्गिद्वयं ते
नित्यं मज्जन्नमृतजलधौ निस्तरेयं भवाब्धिं || ८ ||

शब्दश: अर्थ 

हे वरवरमुने!               : ओ श्रीवरवर मुनि स्वामीजी!
ते                              : आपके
दिव्यं                         : भव्य
अङ्गि द्वयं               : चरणों कि जोड़ी
अग्रे                           : (मैं देखना चाहता हूँ) मेरे सामने
पश्चात                      : मेरे पिछे
भू तलं परितो:            : भूमी के चारों दिशा में
मे पार्श्च्वतो:              : मेरे दोनों तरफ
मौलौ                        : मेरे मस्तक पर
वक्त्रे                         : मेरे मुख पर
वपुषि                        : मेरे शरीर के सभी अंगो में
मानसा म्भोरूहे च      : मेरे हृदय में
पस्यं पस्यं (दर्शं दर्शं)  : हमेशा देखना
अमृत जलधौ             : मरते हुए व्यक्ति को जीवन देनेवाला अमृत का समुंदर देना
मज्जन्न                   : डुबता हुआ
भवाब्धिं निस्तरेयं      : मैं इस जन्म रूपी समुंदर को पार करना चाहता हूँ।

अर्थ

गुरु पादाम्बुयं ध्यायेत गुरोरण्यम न भवयेत ….(प्रपंचसाराम)

यह प्रमाण बताता है कि हमे गुरु चरणों के मार्ग पर चलना चाहिये और कुछ भी विचार नहीं करना चाहिये। यह विस्मय है कि एक समुंदर से तैर कर दूसरे से निकलना। परन्तु आचार्य के भव्य चरण इसे होने योग्य बनाते है।

श्री रामानुज स्वामीजी श्री वैकुण्ठ गध्य में कहते है “भगवता आत्मीयं श्रीमद पादारविन्द युगलम शिरसि कृतं ध्यात्वा अमृत सागरान्तर र्निमग्न सर्वावयव: सुखमासीत” अर्थात भगवान के बारें में जो कहा गया है यहाँ वें अपने आचार्य के बारें में कहते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ७

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श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ६                                                                                                                     श्लोक ८

श्लोक ७

त्वम् मे बन्धुस्त्वमसि जनकस्त्वं सखा देशिकस्त्वं
विध्या वृत्तं सुकृतमतुलं वित्तमप्युत्तमं त्वं ।
आत्मा शेषी भवसि भगवन्नांतरश्शासिता
त्वं यद्व सर्वं वरवरमुने ! यध्यदात्मानुरुपं ।। ७

शब्दश: अर्थ

हे वरवर मुने                       : ओ श्रीवरवर मुनि स्वामीजी!
त्वम                                  : हालाकि
मे                                      : मुझको कला
बन्धु असि                          : एक सम्बन्धी जिसका त्याग किया नहीं जा सकता
त्वम जनक असि                 : मेरे पिता, क्योंकि मेरे अच्छे संस्कारों के लिये आपने मुझे शिक्षा प्रदान की।
त्वम सखा असि                  : मेरा मित्र, (१) मेरे संकट में मेरी सहायता करता है (२) और मेरे खुशी में शामिल होता है
त्वम देशिक असि                : आचार्य, वह सिखाते है जिसका मुझे ज्ञान नहीं है
त्वम विद्या असि                : आचार्य जिन्होने ज्ञान प्रदान किया, जो माँ कि तरह रक्षा करते है
त्वम व्र्त्तम असि                : अच्छे शिक्षा से अच्छा आचरण उत्पन्न होता है और फायदा भी होता है
त्वम अतुलम सुक्र्तम असि  : अद्वितीय अच्छे काम जो मुझे लाभ प्राप्त कराते है जैसे अच्छे सम्बन्धी, धन आदि
त्वम उत्तमम वित्तम असि : स्थिर, नहीं बदलनेवाला भव्य (आध्यात्मिक) धन
त्वम आत्मा असि               : मेरी स्वयं कि आत्मा जो यह सब लेती है
त्वम सेशि भवसि                : वह शासक जो मेरी आत्मा को उसके कल्याण के लिये स्वीकार करता है
हे भगवन                           : ओ महामुनि ज्ञान और क्षमता से भरा हुआ
त्वम आन्तरस शसिता असि : हालाकि कला (१) मेरी श्रेष्ठ आत्मा मुझे आज्ञा दे (२) ज्ञानी भी उसमे ही श्रेष्ठ आत्मा को                                                 आज्ञा दे
यद्वा                                 : क्या अगर में ऐसा ही चलता रहूँ ऐसे जोड़ लिजीये?
आत्मा नु रुपम                    : मुझे भगवान और उनके सेवको कि सेवा दि
यद यद भवति                     : कृपया मुझे उन सभी लाभों का अनुदान कीजिये

व्याख्या

बध्नानी इति बन्धु = वह सम्बन्धी जो हमारे दु:ख और सुख में हर समय साथ रहे। सखा = साथी। वह जो हमारे साथ विपत्तिजनक स्थिति में हो और दूसरे अवसर जैसे बोधयंतप परस्परम (गीता, X-१०) दिव्य अनुभवों को बांटना, स्वयं कि आत्मा। वह जो यह सब उपयोग करता है और तत्पश्चात विस्तार से वस्तु

“तंजमाकिया तंतै तायोडु तानुमाइ” (श्रीसहस्त्रगिती ३-६-९) = पिता रक्षक, माता और स्वयं भी, यहाँ श्रीशठकोप स्वामीजी स्वयं शब्द का उपयोग करते है।

इसलिये त्वम आत्मा असि का अर्थ मेरे कला मे। और सेशि भवसि, आन्तरस शसिता भवसि = दो अर्थ देता है उपर शब्दश: में समझाया है। मुझे अपने सेवक के तरह स्वीकार कर लो, आरपार कर लो और मुझे आज्ञा दे।

यहाँ आंतरा = अंतर भाव (१) वह सर्वाश्रेष्ठ आत्मा जो मन में विराजती है। (२) आतमना: अंतरा: (ब्रहदारण्यक उपनिषद ५-७-२२) जहाँ शब्द को परमात्मा आत्मा में बसता है ऐसा समझाया गया है। अंतरस्य अयं आंतरा: = ज्ञानी जो परमात्मा में विराजता और आज्ञा देता है। ज्ञानीतु आत्मैव मे मतम (गीता ७-१८) भगवान का घोषणा करना कि ज्ञानी जो अन्दर बसता है भगवान पर भी आज्ञा करता है।

यद्वा = इसमे वह सब बाहर है जो पहिले विस्तार से अलग अलग कहा गया है। ऐसे विस्तार से सबकुछ अलग अलग कहना एक ग्रन्थ तैयार हो जाता है। यहाँ उनका कहना त्वम आत्मा असि का अर्थ सभी आत्मा को समान करना नहीं है। परन्तु कृपा से बाहर शेष / शेषी भाव और निर्यन्तु / नियाम्य भाव हीं।

सेशि भवसि, आन्तरस शसिता भवति आदि इस उत्साह को सिद्ध करते है।

यह भगवान के साथ समानता शास्त्र का तत्त्व है। और जैसे श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कहते है पीटकवादैप पिरानार पिरमा गुरूवाकि वन्तु (पेरियाल्वार तिरुमोली ५-२-९) क्योंकि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी भगवान के अवतार है और वह उनको भगवान के बराबर मानते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ६

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ४-५                                                                                                                         श्लोक ७

श्लोक ६

उन्मॆल्य पद्मगर्भ ध्युतित्लमुपरि क्शॆर सङ्घात गौरम
रा का चन्द्र प्र्काश प्र्चुर नखमनि ध्योत विध्योत मा नम
अङ्गुल्यग्रेशु किचिन्नतमति म्र्दुलम रम्य जामात्रुयोगि
दिव्यम ततपादयुग्मम दिशतु शिरसि मे देशिकेन्द्रो दयालु:   

शब्दश: अर्थ

दयालु:                                : वह जो दया का पहलू है
देशिकेन्द्रो                           : आचार्य मे सर्वश्रेष्ठ है
रम्य जामात्रुयोगि                : श्रीवरवरमुनि स्वामीजी
उन्मॆल्य पद्मगर्भ ध्युतित्लम : तेजस्वी श्रीचरण जैसे कमल पुष्प के अन्दर कि पुष्प कि पंखुड़ी
उपरी                                  : उपरी भाग में
क्शॆर सङ्घात गौरम             : सफेद जैसे मिठा दूध
रा का चन्द्र प्र्काश प्र्चुर नखमनि ध्योत विध्योत मा नम : चमकिले नाख़ुन जैसे पूर्ण चन्द्रमा कि सफेदी
अङ्गुल्यग्रेशु                       : नाखूनों का अन्तिम भाग
किचिन्नत                          : थोड़ा सा झुकता हुआ
मति म्र्दुलम                        : बहुत कोमल
दिव्यम                               : इस संसार का नहीं
तत                                    : अत्यंत महान
पादयुग्मम                         : उनके दो श्रीचरण
मे शिरसि                           : मेरे मस्तक पर कृपा करना

व्याख्या

इस गाथा से अगले ६ श्लोक उनके शिष्यों से लिखित स्तोत्र के रूप में है। पहिले श्लोक में एक शिष्य श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से उनके श्रीचरण को उनके मस्तक पर भूषण के जैसे रखने कि प्रार्थना करते है। दयालु = वह एक जिसमे दया प्रकृतिक रूप से है। श्रीरामानुज स्वामीजी के जैसे श्रीवरवर मुनि स्वामीजी भी अपने शिष्यों के प्रति दयालु है परंतु दूसरे आचार्य कि तरह सेवा किये नहीं बल्कि उनके स्वभाव से। दिशति उपदिशति इति देशिक: = वह जो शास्त्र का अर्थ सिखाते है वह देशिक है। देशिकानाम इंद्र:= देशिकेन्द्र; आचार्य के प्रधान जो देशिक है। आचार्य के प्रधान यानि ज्ञान को प्राप्त करना, ज्ञान के समनुरूप अभ्यास करना, सभी के ऊपर अनुकम्पा रखना। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के श्रीचरण कमल कि तरह गुलाबी, श्रीनाखून चंद्रमा कि तरह सफेद और सामान्यत: पूर्ण श्रीचरण सुन्दर, चिकना और कोमल है। क्योंकि श्रीवरवर मुनि स्वामीजी श्री आदिशेष के अवतार है उनके श्रीचरण को आप्राकृत है ऐसा समझाया गया है यानि इस दुनिया की नहीं परन्तु परमपद कि कोई श्रेष्ठ वस्तु है। वह इस संसार के ससारियों के जैसे नीचा और सस्ता नहीं है। पहिले का वर्णन “उन्मॆल्य पद्मगर्भ” यह सभी सुन्दरता के पहलु है जो एक व्यक्ति को उत्तम पुरुष के योग्य करता है। यह शिष्य श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से यह निवेदन करता है कि उस पर उन चरण कमलों कि कृपा करें जिसके लिये वह प्राकृतिक रूप से शिष्य के रूप में योग्य है। जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में प्रार्थना करते है “निन सें मा पाड़ा पर्पु (पद्मम) थलै सेर्त्तु” यहाँ एक शिष्य श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से प्रार्थना करता है उसे उनके चरण कमलों से कृपा करें क्यों कि वह ही उनके आचार्य है “पाड़ा युग्म शिरसी दिशतु मे” हालाकि यह तीसरे व्यक्ति के लिये कुछ पंक्ति जैसे दिखता है, यह सम्भव है की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी मुझ पर कृपा करे, परंतु एक शिष्य की व्यक्तिगत प्रार्थना से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से यही सच्चा इरादा है। यह अगले श्लोक में स्पष्ट हो जायेगा।

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ४-५

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ३                                                                                                                               श्लोक ६

श्लोक ४-५

तत: कनकपर्यङके तरुणाध्युमणिध्युतौ |
विशालविमलश्र्लक्षणतुंगतूलासनोज्ज्वले ||  

समग्रसौरभोदारनिरंतरदिगंतरे |
सोपधाने सुखासीनं सुकुमारे वरासने ||        

शब्दश: अर्थ

तत:                                                      : उसके पश्चात
तरुणाध्युमणिध्युतौ                               : चमक के साथ जैसे सूर्य कि सुबह कि किरणे
विशालविमलश्र्लक्षणतुंगतूलासनोज्ज्वले  : चौड़ा, दागरहित, चिकना और रुई के गद्दे के जैसे मोटा समग्रसौरभोदारनिरंतरदिगंतरे                 : भगवान को बहुत पुष्प अर्पण करना और उसकी सुगंध चारों दिशावों में                                                                          फैलाना
सोपधाने                                                : उस पर सोने के लिये तकिये
कनकपर्यङके                                          : सुवर्ण गद्दा
सुकुमारे                                                 : बहुत चिकना
वरासने                                                  : शुद्ध घास, हिरण के चमड़े और कपड़ो से बना आसन
सुखासीनं                                               : आराम से विराजमान होना
तम                                                       : उन् मणवाल मामुनि को
चिंतयामि                                              : मे हमेशा ध्यान करता हूँ।

व्याख्या

इस श्लोक में अप्पा श्रीवरवर मुनि स्वामीजी कि प्रशंसा करते है जो बड़े लालित्य होकर सुवर्ण पलंग पर श्रीरामानुज स्वामीजी का ध्यान करते बैठे है जो पञ्चोमपाय निष्ठा के लक्ष है और जो सभी विषयों के उनके सरल, पाडित्यपूर्ण वार्ता से उनके शिष्यों को आनंदित करता है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी जो इधर विराजमान है उनकी सुंदरता और लालित्य को दर्शाता है। हालाकि सन्यासियों को सुवर्ण पलंग पर बैठना निषेध है परन्तु शिष्यों के अनुरोध करने से उन्हें मना भी नहीं किया जा सकता। सन्त सोने, चांदी, ताम्बे, bell metal, पाषाण आदि से बने हुए पात्र में प्रसाद लेना पाप मानते है। मेधति कहते अगर सन्त अपने शिष्य से ऐसी वस्तुए मांगते भी हैं तो उन्हें दु:ख होता है और यहाँ यह कहा गया है कि स्वयं अपने उपयोग के लिये पलंग नहीं मांगना परन्तु शिष्य के आग्रह करने पर उपयोग करना गलत नहीं है। कोई अपने लिये सोने चांदी कि चाह ठुकरा सकता है परन्तु अगर शिष्य कि इच्छा हो तो उपयोग करने से इनकार नहीं कर सकता है। इसलिये श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के लिये सोने कि पलंग का उपयोग करना गलत नहीं है।

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ३

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श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २                                                                                                                                 श्लोक ४-५

श्लोक  ३

सायन्तनम तत: क्र्त्वा सम्यगरधनम हरे:
स्वैरालापै: सुभै स्रोत्रुन नन्दयन्तम न्मा मि तम ||  ()

शब्दश: अर्थ

तत:                 : सायंकाल में संध्या वन्दन करने के पश्चात
सायन्तनम       : सायंकाल के अनुकूल
हरे: आराधनम  : अरंगनगर अप्पन कि तिरुआराधनम में उनके व्यक्तिगत अर्चा भगवान
सम्यग            : पूरे विवरण और गहरी भक्ति के साथ
क्र्त्वा               : पालन करते है
सुभै                : शुभ
स्वैरालापै:       : उनका खुदका साधा मधुर इच्छित उच्चारण
स्रोत्रुन             : दर्शक, सुननेवाले
नन्दयन्तम     : रमणीय
तम                : जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी
न्मा मि          : मैं  पूजा करता हूँ

व्याख्या

उपदेश रत्नमाला के ५५ छन्द के अनुसार “आर वचनभूषणत्ति नाल पोरुलेल्लामरिवार? आरदु शोन्नेरिलनुष्ठिप्पार?”…श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने शिष्य को कितनी भी सरल भाषा में तत्त्वों को समझाये लेकिन श्रीवचन भूषण के विचार को निभाना कठिन है और उससे ज्यादा कठिन उसे पालन करना है; क्योंकि अर्थों में उलझन होने के कारण शिष्यों को शिक्षा देना भी उतना ही कठिन दिखायी पड़ता है। स्वामीजी उपदेश के पश्चात सायंकाल संध्यावंधन और आरती को सरल भाषा में कहते है। यह वह स्वैरालापै: है जिसके उपदेश में सब शास्त्र है और वह स्वैरालापै: सरल तरिके में है । श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने शिष्यों को बहुत स्पष्ट और सरल उपदेशों से प्रसन्न करते है। यहाँ हरी अरंगनगराप्पन जो पूर्व दिनचर्या का १७वां श्लोक “रंगनिधि” है उसको दर्शाता है । ‘हरी’ यानि वह जो भक्तों के बाधाओं को मिटाता है और वह जो दूसरे सभी देवताओ को नियुक्त और नियंत्रण करता है । पूर्व दिनचर्या के १७वें श्लोक में ‘अथ रंगनिधि’ सुबह कि आराधना, २९वें श्लोक में ‘आराध्य श्रीनिधीम’ भगवद आराधना और इस श्लोक में सायंकाल आराधना बताया गया है इससे हमें यह समझना चाहिये कि यह बताता हैं कि स्वामीजी भगवान की तीनों तिरु आराधना करते थे।

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – २

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श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १                                                                                                                                 श्लोक ३

श्लोक 

अथ गोष्ठिम्  गरिष्ठानाम् अधिष्ठाय सुमे धसाम् |
वाक्यालङ्क्रुति वाक्यानि व्याख्यातारम  नमामि म्  ||

शब्दश: अर्थ

अथ                                : यतिराज विंशति को रचने के पश्चात
गरिष्ठानाम्                    : एक जो अपनी रचनायें तैयार करने मे और आचार्य के दर्जे को संभालने के लिए सक्षम है
सुमेध्साम्                       : वास्तव में बुद्धिमान और धार्मिक
गोष्ठिम्                         : सभा
अधिष्ठाय                      : यह प्राप्त करना
वाक्यलङ्क्रुति वाक्यानि   : श्रीवचन भूषण के वाक्यों में
व्याख्यातारम                 : समझता हूँ
तम                               : उन श्रीवरवर मुनि स्वामीजी कि
नमामि                          : आराधना करता हूँ

व्याख्या

ग्रन्थ कि रचना के लिए अब तक स्वाध्याय विस्तृत तरिके से किया गया इसलिये अब वें आचार्य के महान कार्य की व्याख्या को समझाने के लिए दूसरे स्वाध्याय को पहिले के जैसे विस्तृत कर रहे है। करिश्थ = अध्यंतम कुरवक करिश्थ = श्रेष्ठ आचार्य।“सुमेधस:” उनके लिये पदवी है। अर्थो को एक ही बार सुनकर पहचानना, सिखे हुए विचारों को याद करने को मेधा कहते है। सुमेधस: जिसके पार अत्युतम मेधा है। इधर सुमेधा कौन है? कोइल कांतादै अन्नन, वानमामलाई जीयर और अन्य अष्ठ दिग्गज। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी जो अब तक योगा में स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी कि पूजा करते थे अब सब कुछ त्याग कर शिष्यों के साथ बैठकर श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र को समझा रहे है। श्री देवराज स्वामीजी कहते है मैं ऐसे संत कि पूजा करत हूँ। श्रीवचन भूषण = एक आभूषण जो मणि और हीरा से बना है वह है रत्न भूषण। श्रीपिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित जिसमे उनके स्वयं के थोड़े ही शब्द है परन्तु दूसरे आचार्य की उच्च शब्द रचना है जो पाठक को प्रकाश दिखाता है वह है श्रीवचन भूषण। क्योंकि यह ग्रन्थ बहुत व्यवस्थित है उसके विषय सूची और शैली में श्रीवरवर मुनि स्वामीजी उसे बहुत सम्मानित तरिके से समझाते है उसके अर्थ को समझे जैसे बनाते है। वह जिनका अर्थ मालूम न था ऐसे शब्दों और पंक्तियों को तोड़कर समझाते है, ताकि वह विषय आसानी से समझ सके और जहाँ शंका हो वहाँ प्रश्न उठाकर उसका उत्तर दे सके। सुमेधस: करिश्था…..ऐसा कहकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी जो बड़े ज्ञानि जैसे कोइल अन्नन को भी जानना मुश्किल हैं ऐसे श्रीवचन भूषण के कठिन विचार समझाते है और यह कार्य का विचार बहुत गहरा है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कि मेधा हमें उसे पालन करने में आसान करती है।

क्योंकि श्रीवचन भूषण में वेद, स्मृति, इतिहास, पुराण, दिव्य प्रबन्ध आदि का सारा सार है इस एक ग्रन्थ को समझाना बाकी सब पुराने ग्रन्थ को समझाने के बराबर है और इसलिये श्रीवरवर मुनि स्वामीजी ने इस अनोखी ग्रन्थ को समझाते हुए स्वाध्याय का हीं पालन किया।

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १

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परिचय                                                                                                                                   श्लोक २

श्लोक १

इति यति कुल धुर्य मेध मानै श्रुति मधुरैउदितै प्रहर्षयन्तं |
वरवर मुनिमेव चिन्ययन्ति मतिरियमेति निरत्ययम प्रसादं ||

शब्दार्थ:

इति                  : “श्रीमाधवांघ्रि” से “विज्ञापनम” तक व्यक्त किये अनुसार
मेध मानै           : नित्य अधिक विकसित होना
श्रुति मधुरै         : सुनने के लिये सुहावना
उदितै                : अभिव्यक्ति
यतिकुल धुर्य     : सन्यासियों में श्रेष्ठ श्रीरामानुज स्वामीजी
प्रहर्शयन्तम      : उनको सुखद करने के समय
वरवर मुनिमेव  : श्रीवरवर मुनि स्वामीजी मे स्थिर करते समय
मतिरियमेति    : मेरा मन चित
निरत्ययम       : स्थायी रूप से
प्रसादम यति    : स्पष्टता प्राप्त करता है

व्याख्या

श्री देवराज स्वामीजी (श्री एरुम्बियप्पा) दिलासा दिये और आनंदित हुए कि उनका मन प्राप्त हो और जो न प्राप्त हो ऐसे विषयों में अभी तक कष्ट में डुबा हुआ था वह अब केवल श्री वरवर मुनि स्वामीजी के बारें में हीं सोचता है जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी में खुशी से गोता लगाया और श्री यतिराज विंशति भेंट दि और उनके अशांति से मुक्त हुए और शांति प्राप्त कि। “वरवरमुनि एव” वर्णन करके वह यह कहते हैं यह खुशी उन्हें यतिराज के बारें में विचार करके नहीं बल्कि श्री वरवरमुनि स्वामीजी के बारें में सोचकर हुई है जिन्होंने श्रीयतिराज को अपने स्तोत्र सुनाकर आनंदित किया। भगवान या भागवतों या आचार्यों के विचारों से उपर उठकर श्री वरवरमुनि स्वामीजी जो आचार्य के प्रति भक्ति रखते है की जो श्रेष्ठ और स्थिर है उनके बारे मे सोचकर मानसिक स्पष्टता प्राप्त कर सकते है। हालाकि यह पद्य छोटा हैं केवल २० पदों के साथ यह संपूर्णता “मेध मानै” शब्द से दर्शाया गया है जो अधिक जैसे लगता है परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा से जो यह श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के हरेक पद को हजार पध्य के समान समझते है।

महात्मा जन हमारा छोटे चीज के लिये भी उनके प्रति प्यार बहुत बड़ा और अमूल्य समझते है।  “प्रहर्शयन्तम” शब्द में हर्ष प्रगट होता है, “हर्ष” शब्द के पिछे “प्र” लगाया गया है जो श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के प्रति प्रसन्नता को दर्शाता हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी की  प्रसन्नता श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के प्रति केवल श्रद्धा है और श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने आचार्य के प्रसन्नता से कोई सांसारिक लाभ लेनेका सोच भी नहीं सकते। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी “चिन्ययन्ति” शब्द से हमेशा श्रीरामानुज स्वामीजी के बारें में विचार करते है और अनूठे रूप से चिन्ययन्ति जो गोपी है उनके साथ तुलना करते है जो हमेशा भगवान श्रीकृष्ण या श्रीशठकोप स्वामीजी के बारें में सोचती रहती है ज्यो की उनके भगवान के प्रति अगाध प्रेम के कारण दीर्घ चिन्ययन्ति से जाना जाता है । यहाँ शब्दों को तीन भागों में बाँटा गया है… स्रुति मधुरै उदितै। यह स्रुतिमधुरै और उदितै ऐसा भी बाँटा जा सकता हैं जब की रुदीतै का अर्थ रोना है। “अल्पापी मे” छन्द से श्रीवरवर मुनि स्वामीजी ज्यादातर अपनी अज्ञानता, निष्ठा में कमी के बारे में बात कर रहे है और “हा हंत हंत” कहकर रोते है अपना दर्द समझाते है और जैसे रोना हमेशा स्वदीप्तिमान कि तरफ ले जाता है हम “रुदितै” शब्द का इस्तेमाल कर सकते है। मोक्ष के लिये रोना सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी प्रसन्न होंगे यह कहना क्या अवश्यक है? इसलिये श्रीवरवर मुनि स्वामीजी “रुदितै” शब्द का उपयोग करते है। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी संस्कृत में जो कहे है उसे यतिराज विंशति और तमिल में आर्ति प्रबन्ध कहते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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uththara dhinacharyA – conclusion

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Concluding section

The word Dinacharya, though refers to the daily practices, observances etc, by import refers to the Supreme Lord who is the subject matter of such offerings, and Sri Manavala Mamunikal. A devotee is to recite these stanzas with total devotion. The result of such devotional observance is the perennial world for him which is beyond the Mahat, beyond the so called super worlds praised in texts, and that is Sri Vaikuntha. Prapnoti prakarshena aapnoti=he gets it surely, and firmly. The ultimate idea is he attains the supreme position of service to the Acharya with great pleasure and privilege, as the Lord grants him the position that is there for the three types of beings, viz, nitya, mukta and baddha.

Lakshmi Tantra says, “Those who observe these bhagavad aaraadhana five times a day as a direct way for obtaining salvation, one after another at appropriate times in all their capabilities attain paramapada soon after  they complete hundred years of life”.

Shandilya Smriti says. “Those who give up all other means for liberation and abide by this five fold aaraadhana, leaving karma/gnana/bhakti methods, attain Salvation” . Yet, as Bharadwaja and other elders have stated accepting the Lord as the readily available means (siddhopaya) when a prapanna observes the way with abigamana, upaadaana, ijyaa, swaadhyaaya, dhyaana(remembering the things for bhagavad aaraadhana=abhigamana;gathering the things for aaraadhana=upaadaana;bhagavad aaraadhana=ijyaa; reading great texts=swaadhyaaya; meditating on the Lord=yoga) he does all these five activities not as Upaayam/means but as phala, the result. All the five have to be treated not as means but the end as the very activities put him in a state of exquisite bliss affirming he shall spend his time happily in this state. These five timed observances are for the happiness of the Lord and so they result in his exaltation.

Thus ends the explanations for the Sri Varavaramuni Dinacharya of Sri Devaraja Guru, based on the Samskrit commentary by Sri Tirumazhisai Annavappaiyangar, done in Tamizh by Tirumalai ananthaanpillai Krishnamaacharya dasa.

Conclusion

Sri Varavaramuni Dinacharya has three parts…..Poorva Dinacharya, Mamuni’s Yatiraja Vimsati and Uttara Dinacharya. For the two Dinacharyas only Annavappaiengar’s Samskrit commentary is available in print.. For Yatiraja Vimsati, however, all the three commentaries by Annavappaiengar swami in Samskrit and the manipravala commentaries by Pillai Lokam Jeeyar swami and Suddha sattvam Doddaacharya swami as well as the samskrit commentary are in print. I have omitted the two manipravaala commentaries and based my explanations on the Samskrit text of sri Annavappa iyengar swami, even there leaving some great details for fear of length. All errors, omissions due to my ignorance and carelessness should please be pardoned. This is my request to the educated erudite elite.

Translation by vangIpuram sadagOpa rAmAnuja dAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/09/உத்தர-திநசர்யை-முடிவுர/

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uththara dhinacharyA – 14

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Dinacharyaam imaam divyaam Ramya Jaamaatru Yogina: |
Bhaktyaa nityamanudhyaayan praapnoti paramam padam ||

Word to word meaning

imaam -this text from “Patertyu paschime yaame”(Poorva dinacharya 14) to “Sayaanam samsmaraami tam”
Divyaam Ramyajaamatru Yogina: Dinacharyaam -detailing the daily divine auspicious routines of Sri Ramyajaamaatru Yogi swami
Nityam -everyday (day and night) -when a person recites with devotion
PraapnotiParamam padam-attains that supreme Abode of Sri Vaikuntha beyond which there is none to reach.

Purport

Finally he concludes by stating the gain of reciting this Dinacharya grantha. We already saw that upto  stanza 13 in Poorva Dinacharya is Prologue, Upodhgaatam. From stanza 14 there upto 13 in Uttara Dinacharya is only the Varavara Muni Dinacharya. We can take “Divyaam” to mean the great practices mentioned in Sastras like Paancharaatra or the the activities in the Sri Vaikuntha which are unlike those of this world five times a day(pancha kaalika anushthaana). These practices Anushthaanaas are too difficult to and tough for routine and were in full swing during Krta yuga at the hands of Paramaikaantis, and get reduced slowly by Treta Dwaapara yugas and become almost extinct in Kali yuga as stated in Bharadwaaja Parisishta. Men who have multifarious desires and worship multiple demigods in Kali can’t and won’t follow these edicts. They chase cheap things with passion and only a few shall seize the Lord and so the other religionists will try to covet them also.

Translation by vangIpuram sadagOpa rAmAnuja dAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/09/உத்தர-திநசர்யை-14/

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uththara dhinacharyA – 13

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atha: brthyaan anugnaapya krtvaa cheta: subhaasraye |
sayaneeyam parishkrtya sayaanam samsmaraami tam ||

Word to word meaning

atha: – as stated earlier after two jaamaas in the night subsequent to personal teachings to disciples,
brthyaan -the disciples
anuugnaapya -having been seen off
subhaasraye -keeping the eye and mind captivating auspicious form of the Lord  
cheta: krtvaa -in the mind meditating on it
sayaneeyam -on the bed
parishkrtya -decorating it by lying on it
sayaanam -sleeps
tham -that Swami Manavaala Mahamuni
samsmaraami – is in my deep meditation

Purport

By “krtvaa cheta subhaasraye” the meditation on the Supreme Lord in the night was mentioned. Maamunikal leaves the venerable seat for Bhagavad dhyana as indicated by “tatha: kanaka paryanke” and after looking benevelontly at the disciples who were in the devotional chorus he goes to the bed to sleep with deep meditation on the Lord. Erumbiyappa meditates on this Mahamuni who being the incarnation of Adisesha shall have his physique naturally expanded twice in slumber and this graceful sight is a feast for Appa without any obstacle while the Acharya rests. For Mahamuni the focus of meditation is the auspicious form of the Lord while for Appa it is the graceful appearance of the Acharya.We can presume Mahamuni meditates on the Lord for the pleasure of Sri Ramanuja while Appa does so for the pleasure of Sri Rama who made Mamuni to compel Appa to worship Him. Sri Rama’s such a command to Appa is mentioned in Yatindrapravana Prabhavam and also Appa’s own Varavaramuni Satakam.

Translation by vangIpuram sadagOpa rAmAnuja dAsan

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/09/உத்தர-திநசர்யை-13/

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