Category Archives: SaraNAgathi gadhyam

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 4

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 5 – भाग 3

namperumal2

आईये अब हम उन अष्ट गुणों और अन्य कल्याण गुणों के विषय में जानने का प्रयास करेंगे है, जिनका वर्णन भगवद श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान की शरणागति करने के पूर्व करते है।

सत्यकाम !सत्यसंकल्प ! परब्रह्मभूत ! पुरुषोत्तम ! महाविभूते ! श्रीमन् ! नारायण ! श्रीवैकुंठनाथ ! अपारकारुण्य सौशील्य वात्सल्य औदार्य ऐश्वर्य सौंदर्य महोदधे ! अनालोचित विशेष अशेषलोक शरण्य ! प्रणतार्तिहर ! आश्रित वात्सल्यैक जलधे ! अनवरत विधित निखिल भूत जात याथात्म्य ! अशेष चराचरभूत निखिल नियमन निरत ! अशेष चिदाचिदवस्तु शेषीभूत ! निखिल जगधाधार !अखिल जगत् स्वामिन् ! अस्मत् स्वामिन् ! सत्यकाम ! सत्यसंकल्प ! श्रीमन् ! नारायण ! अशरण्यशरण्य ! अनन्य शरण: त्वत् पादारविंद युगलं शरणं अहं प्रपद्ये II

आठ में से प्रथम चार गुण जिनका वर्णन आगे किया जायेगा, वे सभी जगत् की रचना करने की भगवान की योग्यता को दर्शाते है। अगले चार गुण शरणागति के मार्ग अर्थात् यह कि एक मात्र भगवान ही हमें मोक्ष  (श्रीवैकुंठ) प्रदान कर सकते है, इसे दर्शाते है। इसके अतिरिक्त सत्यकाम, सत्यसंकल्प और परब्रह्मभूत (जो अष्ट गुणों में से कुछ गुण है), वे चूर्णिका के लीला विभूति भाग (लौकिक जगत् / जिस संसार में हम रहते है) से संबंधित है। पुरुषोत्तम और नारायण उनके गुणों से संबंधित है। महाविभूते और श्रीवैकुंठनाथ  उनकी नित्य विभूति (श्रीवैकुंठ) से संबंधित है। श्रीमन्  दिव्य महिषियों (पट्टरानियाँ) से संबंधित चूर्णिका से संबध्द है। हमने इन आठ शब्दों का अर्थ पूर्व में भी देखा है।

सत्यकामकाम शब्द के बहुत से अर्थ है। इसका आशय उस से है, जो कुछ अभिलाषा करता है; इसका आशय अभिलाषा की वस्तु से भी है। इसके अतिरिक्त, काम अर्थात आकांक्षा भी है। पहले, श्रीरामानुज स्वामीजी ने काम  शब्द का प्रयोग नित्य विभूति (श्रीवैकुंठ) के संदर्भ में किया था। परंतु यहाँ वे इसका उपयोग भगवान के संदर्भ में करते है, जो प्रकृति, पुरुष और काल के स्वामी है और अपनी अभिलाषा की पूर्ति हेतु इनके साथ क्रीड़ा करते है (जैसा की हमने पूर्व कतिपय अनुच्छेदों में देखा), अर्थात् पूर्व में वह अभिलाषा के विषय में बताता है और यहाँ उसका संदर्भ स्वयं अभिलाषा से है। सत्य अर्थात् उनका नित्य स्वरुप। सृष्टि की वस्तुयें, आत्माएं, उसके आनंद-उपभोग की वस्तुयें, उपकरण जिनसे वह आनंद प्राप्त किया जाता है, समय – जो निर्धारित करता है कि वह आनंद का भोग कब और कैसे करेंगे – यह सब भगवान के लिए क्रीड़ा है। हम सोच सकते है कि जो वस्तु हमें इस संसार से बांधती है (लौकिक संसार), जो हमारे लिए मोक्ष प्राप्त करना दुष्कर बना देती है और जो भगवान को आवरित करके रखती है, वह वस्तु भगवान के आनंद के लिए कैसे है। परंतु यदि भगवान् इन सबकी रचना नहीं करते तब हम कल्पों (युगों) तक अचित्त पदार्थ के साथ उनके दिव्य विग्रह से सदा के लिए लिपटे रहते, उनके निवास, श्रीवैकुंठ तक पहुँचने की कोई आशा किये बिना। क्यूंकि वे संसारों को निर्मित करते रहते है, इसलिए ही वशिष्ट, शुक, वामदेव, आदि संत श्रीवैकुंठ पहुँचने में समर्थ हुए। हम भी यह आशा कर सकते है कि एक दिन इस लौकिक देह को त्यागकर और उनकी कृपा प्राप्त कर श्रीवैकुंठ पहुँच कर उनके श्रीचरणों में कैंकर्य प्राप्त करे। एक कृषक, अनेकों बार विभिन्न कारणों से हानि होने के पश्चाद भी अपनी भूमि पर कृषि करना नहीं छोड़ता। वह उसे इस आशा से करता रहता है कि किसी फसल से तो उसे लाभ प्राप्त होगा, उसी प्रकार जैसे पहले भी कभी हुआ था। भगवान द्वारा सृष्टि रचना/ पालन/ संहार का पुनरावृत्ति कार्य भी उसी समान है।

सत्यसंकल्प – अपने आश्रितों की अभिलाषा पूर्ति के लिए उनके आनंद हेतु अपने संकल्प मात्र से ही विषय की रचना करने की योग्यता। यहाँ सत्य  शब्द अपने आश्रितों को कभी निराश न करने की उनकी योग्यता को दर्शाता है। इस कार्य को करने के लिए उनके मार्ग में कोई बाधाएं नहीं है। जब ब्रह्मा (भगवान् की पहली रचना) ने सनक, सनतकुमार आदि की रचना की और उनसे सृष्टि रचना में सहायता मांगी, तब उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया। इसप्रकार ब्रह्मा की रचना व्यर्थ हो गयी। उसीप्रकार जब ब्रह्मा से लुप्त हुए सभी वेद असुरों को प्राप्त हुए, ब्रह्मा ने भगवान के चरणों में गिरकर वेदों की रक्षा और पुनः प्राप्ति के लिए प्रार्थना की। परंतु भगवान की रचना कभी व्यर्थ नहीं होती।

आईए अब हम 8 गुणों के विषय में देखते है।

सत्यकाम – इस शब्द से आशय, भगवान् का सभी नित्य वस्तुओं के स्वामित्व से है, वे वस्तुयें जो उस सृष्टि रचना में सहायक है या उसके पूरक है, जहाँ जीवात्मा भगवान् को प्राप्त करने के पूर्व विभिन्न रूप में जन्म लेती है।

सत्यसंकल्प – अपने संकल्प में दृढ़ रहना, जो कभी व्यर्थ नहीं होता। जब भगवान निश्चय करते है कि इस जीवात्मा को श्रीवैकुंठ प्रदान करना है, तब उनकी इच्छा पूर्ति में कोई बाधक नहीं हो सकता। जीवात्मा की इसमें एक भूमिका है, वह यह कि जीवात्मा को श्रीवैकुंठ प्राप्ति की त्वरित उत्कंठा होना चाहिए।

परब्रह्मभूत – भगवान् की विशालता कल्पना से परे है। वे कितने विशाल है? सम्पूर्ण ब्रह्मांड, अपनी समस्त आकाशगंगाओं सहित भगवान् के दिव्य विग्रह को सूचित करता है (उन्हें ब्रह्म  भी कहा जाता है; ब्रह्म  शब्द को ब्रह्मा  शब्द के साथ भ्रम नहीं करना चाहिए। ब्रह्मा, भगवान् के निर्देशानुसार सृष्टि की रचना करते है, परंतु ब्रह्म स्वयं भगवान् का संबोधन है)। वे इसप्रकार अत्यंत विशाल है। प्रलय के समय में, सभी चित और अचित को अपनी शरण लेते है। सृष्टि के समय वे यह संकल्प लेते है कि “मुझे बहुसंख्यक रूप प्राप्त हो” और इस प्रकार वे स्वयं विभिन्न विषय रूपों में विभाजित हो जाते है, जैसा की हम पहले देख चुके है (प्रकृति, पुरुष, काल, आदि)। यह सभी वस्तुयें उनके दिव्य विग्रह का अंश है। इससे हमें एक कल्पना प्राप्त होती है कि वे कितने विशाल है।

पुरुषोत्तम – पुरुषानाम उत्तम: अर्थात् पुरुषों (चित) में उत्तम। तीन प्रकार के पुरुष होते है – पुरुष:, उत्पुरुष:, उत्तर पुरुष:, और फिर भगवान जो उत्तम पुरुष: है। पुरुष: अर्थात बद्धात्मा, जो इस संसार में बंधे हुए है (लौकिक संसार)। उत्पुरुष: अर्थात मुक्तात्मा, जो इस संसार सागर से छूटकर श्रीवैकुंठ पहुंचे है। उत्तर पुरुष: अर्थात नित्यात्मा, वह जो संसार में कभी जन्मे नहीं और सदा ही श्रीवैकुंठ में निवास करते है (आदिशेषजी, विष्वक्सेनजी, गरुड़जी, आदि)। उत्तम पुरुष: अथवा पुरुषोत्तम, भगवान है, सभी पुरुषों में श्रेष्ठ। यद्यपि वे सभी तीन प्रकार के चित्त जीवों में निवास करते है (बद्ध, मुक्त, और नित्य जीवात्मा) और तीन प्रकार की अचित अवस्थाओं में भी (शुद्ध सत्व, मिश्र सत्व अर्थात सत्व, रज और तम का मिश्रण और काल तत्व अर्थात समय), इनकी अशुद्धता उन्हें प्रभावित नहीं करती। वे अपने आश्रितों की सभी अशुद्धताओं को दूर करते है। इसके अतिरिक्त वे हम सभी में व्याप्त है, वे हम सभी को संभालते है और वे सभी के स्वामी है। वे हमें वह सभी प्रदान करते है जिसकी हम चाहना करते है। वे ही पुरुषोत्तम है।

महाविभूते – सभी विभूतियों (संसारों) के स्वामी। हम पहले ही उनकी विभूतियों के विषय में चर्चा कर चुके है। तब फिर से उन्हें दोहराने का क्या उद्देश्य? पहले हमने देखा विभूतियों में क्या क्या सम्मिलित है। अब वे इस बात पर बल देते है कि भगवान अपनी सभी संपदा प्रदान करेंगे (हम यह गुण पहले औदार्य  में देख चुके है)। जब एक आश्रित उनकी चाहना करता है तब भगवान् उसे सब कुछ प्रदान करते है, यहाँ तक की स्वयं को भी प्रदान करते है। वे आश्रित के साथ, श्रीवैकुंठ में, सदा विराजमान रहते है, उसे कैंकर्य अनुभव प्रदान करते है (भगवान के कैंकर्य का उत्तम अनुभव)।

श्रीमन् – भगवान् और श्रीजी दोनों का ही कैंकर्य किया जाता है। जीवात्मा के श्रीवैकुंठ पहुँचने पर और मुक्तामा होने पर, वह भगवान और श्रीजी दोनों का ही कैंकर्य का आनंद प्राप्त करता है।

नारायण – असंख्य कल्याण गुणों के धारक, दोष रहित और इन गुणों को अपने आश्रितों को प्रदान करने वाले जिससे आश्रितों को आनंद और कैंकर्य की प्राप्ति हो। इसलिए, कैंकर्य सदा दिव्य दंपत्ति (भगवान् और श्रीजी) के लिए किया जाता है।

श्रीवैकुंठनाथ – श्रीवैकुंठ के स्वामी, जो कैंकर्य के लिए उपयुक्त स्थान।

उपरोक्त 8 गुणों में से, प्रथम 4 गुण (सत्यकाम, सत्यसंकल्प, परब्रह्मभूत, पुरुषोत्तम) भगवान् के सृष्टि रचना की योग्यता का गुणगान करते है और अगले 4 (महाविभूते, श्रीमन, नारायण, श्रीवैकुंठनाथ) यह महत्त्व बताते है कि भगवान् ही वह परमात्मा है, जिन्हें प्राप्त करना और कैंकर्य के द्वारा प्रसन्न करना ही जीवात्मा का धर्म है। इसप्रकार वे ही रचयिता और आनंद के विषय भी है । अब श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान की शरणागति के पहले उनके अन्य 24 गुणों का उल्लेख करते है। अन्य 24 गुणों के वर्णन की क्या आवश्यकता है, जब वे पहले ही इतने सारे गुणों का वर्णन कर चुके है? इसका उत्तर है कि हम उनकी ही शरणागति करते है, जो महान गुणों के धारक है। जिनके शरणागत होना है यदि वे गुण रहित है, तब हम कैसे शरणागति कर सकते है? इसलिए शरणागति से पहले ही उनके सभी गुणों की चर्चा करना प्रथागत है। यहाँ तक कि द्वय महामंत्र  में (रहस्य त्रय का एक भाग, जो हमारे आचार्यजन पीढ़ियों से हमें सिखाते है), हम कहते है कि हम श्रीमन्नारायण भगवान् की शरणागति करते है, जहाँनारायण  से आशय है वे जिनमें सभी महान गुण विद्यमान है। इसलिए भगवान के गुणों का बारम्बार गुणगान करना असंगत नहीं है।

अगले गुणों में (अपार कारुण्य, सौशील्य, वात्सल्य, औदार्य, ऐश्वर्य सौन्दर्य महोदधे), “अपार ” (महान / असीमित) शब्द का उपयोग सभी 6 गुणों के साथ किया गया है।

अपार कारुण्यकारुण्य अर्थात कृपालु – जो दूसरों की पीढ़ा को सहन न कर सके। यही अपार कारुण्य कहलाता है, जब भगवान् रावण जैसे राक्षस पर भी कृपा करते है (श्रीलंका में राक्षसों का राजा, जिसने सीताजी का हरण कर प्रभु श्रीराम और सीताजी को अलग किया)– यह दृष्टान्त श्री रामायण में वर्णित है कि जब विभीषण सिन्धु पार कर श्रीराम की शरणागति करने आते है, तब श्रीराम के मित्र वानरराज सुग्रीव कहते कि श्रीराम को विभीषण की मित्रता स्वीकार नहीं करनी चाहिए क्यूंकि विभीषण भी एक राक्षस है और रावण का भाई है। श्री राम उन्हें यह कहकर विश्वास दिलाते है कि यदि स्वयं रावण भी उनकी शरणागति करता, तब वे उसे भी स्वीकार करते। यहाँ पेरियावाच्चान पिल्लै, श्री आचार्य जिन्होंने गद्यत्रय के लिए व्याख्यान की रचना की, उल्लेख करते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी यहाँ ऐसा भाव प्रकट करते है कि भगवान् ने उन पर ऐसी कृपा वृष्टि की जिससे उन जैसे निम्न मनुष्य भी गद्यत्रय जैसे रत्न की रचना करने में योग्य हुए (यद्यपि यह पूर्णतः असत्य है, परंतु फिर भी हमारे गुरु आचार्यजन, बिना अपवाद के, स्वयं को निम्न जानते-मानते है, यह एक गुण है जिसे नैच्यानुसंधान कहा जाता है अर्थात् स्वयं को सबसे निम्न जानना-मानना, यद्यपि यह सत्य नहीं है)।

सौशील्य – ऐसी उदारता प्रकट करना जिसमें एक श्रेष्ठ व्यक्ति अपने से निम्न की मित्रता स्वीकार करता है। रामावतार में भगवान ने गुह, सुग्रीव और विभीषण से मित्रता की। यह “अपार सौशील्य “ कहलाता है जब भगवान् मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वराहावतार में मत्स्य, कूर्म, वराह क्रमशः आदि से मित्रवत होते है, स्वयं को उन के समान प्रकट करने के लिए।

वात्सल्य – भगवान् का वह गुण जिसमें वे अपने आश्रितों के दोषों को भी उनके सद्गुण जान कर उनसे प्रीति करते है। अपार वात्सल्य  से यहाँ संदर्भ है उस गुण से जिसके कारण भगवान् अपने शत्रुओं से भी वात्सल्य  से व्यवहार करते है। उदहारण के लिए, भगवान ने युद्ध में रावण का संहार किया जिससे वह और अपराध न कर सके ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक माता शीघ्रता से अपने बलाक के हाथ से छड़ी छुडा लेती है ताकि बालक स्वयं को चोट न लगा ले।

औदार्यभगवान अपने स्वरुप अनुसार ही अपने आश्रितों (जो उनके शरणागत है) को उनके सभी इच्छित प्रदान करते है। अपार औदार्य अर्थात् इतना सब इच्छित प्रदान करने के पश्चाद भी यह ग्लानी करना की वे अपने आश्रितों को कुछ भी प्रदान नहीं कर पाए। कृष्णावतार में भी उन्होंने यह गुण प्रकट किया और ग्लानिभाव से कहते है कि धृतराष्ट्र की सभा में वस्त्र हीन होने पर शरणागति करने वाली द्रौपदी के लिए कुछ न कर सके। भगवान् ने उनके पतियों (पांच पांडवों) का पक्ष लेकर उन्हें उनका राज्य लौटाया। परंतु फिर भी वे ग्लानी भाव से कहते है उसके रुदन के उपरान्त भी वे उसकी सहायता नहीं कर सके।

ऐश्वर्य – ऐसी संपत्ति जिससे वे अपने आश्रितों को उनके इच्छित प्रदान करते है। अपार ऐश्वर्य अर्थात् अपने आश्रितों को इतना अधिक प्रदान करना जिससे वे आश्रितजन अन्य की भी सहायता कर पायें।

सौंदर्यम् – सुंदरता। अपार सौन्दर्यं अर्थात् ऐसी सुंदरता की शत्रु भी मोहित हो जाये (जैसे रामावतार में सुर्पनखा, रावन की बहन)। जब श्रीराम विभिन्न ऋषियों से भेंट करने के लिए वन वन विचरण करते है (14 वर्ष के वनवास में) तब ऋषिजन उनके रूप पर मोहित हो जाते थे। ऐसा उनका सौंदर्य था। वे अपने रूप से सभी देखनेवालों के मन और विचारों को चुरा लेते थे।

महोदधे – महान सिन्धु। भगवान में ऐसे गुण है जो सबसे बड़े सिन्धु से भी अधिक बड़े है।

हिंदी अनुवाद- अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/12/saranagathi-gadhyam-5-part-4/

संग्रहण – http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 3

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 5 – भाग 2

paramapadhanathan

पिछले अंकों में हमने भगवान के स्वरुप (प्रकृति), रूप गुण (दिव्य विग्रह के गुण), आभूषणों, आयुधों, और महिषियों के विषय में किये गए वर्णन को देखा। अब हम श्रीवैकुण्ठ और लीला विभूति में उनके आश्रितों के विषय में जानेंगे।

आईए हम चूर्णिका के उस भाग को पुनः देखते हैं जिसमें इन द्वय विभूति में उनके आश्रितों के विषय में चर्चा की गयी है –

स्वच्छन्दानुवर्ती स्वरूपस्थिति प्रवृत्ति भेद अशेष शेषतैकरतिरूप नित्य निरवद्य निरतिशय ज्ञानक्रियैश्वर्याद्यनन्त कल्याण गुणगण शेष शेषासन गरुड़ प्रमुख नानाविधानन्त परिजन परिचारिका परिचरित चरणयुगल ! परमयोगी वाङ्गमनसा परिच्छेद्य स्वरूप स्वभाव स्वाभिमत विविध विचित्रानन्त भोग्य भोगोपकरण भोगस्थान समृद्ध अनन्ताश्चर्य अनन्त महाविभव अनन्त परिमाण नित्य निरवद्य निरतिशय वैकुण्ठनाथ ! स्वसंकल्प अनुविधायि स्वरुपस्थिति प्रवृत्ति स्वशेषतैक स्वभाव प्रकृति पुरुष कालात्मक विविध विचित्रानन्त भोग्य भोक्तृ वर्ग भोगोपकरण भोगस्थानरूप निखिल जगदुदय विभव लय लील !

वर्णन: 

स्वच्छन्दानुवर्ती – अब श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीवैकुण्ठ में निवास करने वाले जीवों के विषय में बताते है, जिनके जीवन का सार ही भगवान और श्रीजी के चरणों का कैंकर्य है। नित्यसुरिजन (सदा श्रीवैकुण्ठ में निवास करते है और जिन्होंने कभी लीला विभूति में जन्म नहीं लिया) मात्र भगवान के मुख को निहारते (भगवद्मुखोल्लास) हुए कैंकर्य करते है, यह जानते हुए कि भगवान की अभिलाषा क्या है, बद्धात्माओं के विपरीत जिन्हें भगवान द्वारा यह बताने की आवश्यकता होती है कि वे किस प्रकार का कैंकर्य करे।

स्वरुप स्थिति प्रवृत्ति भेदभगवान ऐसे अधिकारी का निर्णय करते है, जिन्हें वे कैंकर्य प्रदान करेंगे। उन अधिकारियों के स्वरुप, स्थिति और प्रवृत्ति के विषय में यहाँ चर्चा की गयी है। स्वरुप से आशय है उन अधिकारी का मूल स्वभाव, स्थिति से आशय है उनका आधार (जो उनके जीवन का आधार है) और प्रवृत्ति से आशय से है उनके कार्य। भेद अर्थात इन सभी में अंतर स्थापित करना।

नित्यसूरियों के संदर्भ में, भगवान की इच्छा अनुसार उनका कैंकर्य करना ही उनका स्वरुप है। उनकी स्थिति यह है कि भगवान का कैंकर्य करना ही उनका जीवन है (कैंकर्य ही उन्हें आधार प्रदान करता है) और प्रवृत्ति उस कैंकर्य में तत्परता से लीन होना । वे ये सभी कैंकर्य भगवान के मुखारविंद के भावों को ध्यान में रखकर, उनके प्रेम के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए और यही उस स्थान पर उनका धर्म है, ऐसा जानकार करते है। हमारी तरह उन्हें उनके कैंकर्य के लिए स्मरण नहीं कराना पड़ता।

अशेष शेषतैकर अतिरूप – अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से अभिभूत, सभी कैंकर्य करने वाले, कुछ न छोड़ने वाले अवतार के समान। जब भगवान चाहते है कि यह कैंकर्य हो, तब नित्यसूरी सम्पूर्णत: तन्मयता से उस कैंकर्य में रत हो जाते है, जिससे ज्ञात होता है कि वे उस निष्ठा के प्रतीक है, जिस निष्ठा से कैंकर्य किया जाना चाहिए।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी उन नित्यसूरियों के गुणों के विषय में बताते है जो ऐसे कैंकर्य करते है।

नित्य – मुक्तात्माओं से पृथक, (जो संसार से श्रीवैकुण्ठ जाते है), नित्यसूरियों को ज्ञान आदि जैसे गुण भगवान द्वारा नित्य के लिए प्रदान किये जाते है।

निरवद्य– बिना किसी दोष के। कैंकर्य भगवान की प्रसन्नता के लिए है, नित्यसूरियों के आनंद के लिए नहीं।

निरतिशय ज्ञान – नित्यसूरियों में शेष/ सेवक होने का ज्ञान है, वे कैंकर्य करने के लिए निर्मित है, वे अनुयायी है और भगवान ही एकमात्र स्वामी है; वे भगवान की संपत्ति है और भगवान ही उनके नाथ है; नित्यसुरियों में यह ज्ञान पुर्णतः उदित और प्रशस्त है।

क्रिया – अपने कार्यों द्वारा यह प्रकट करना कि वे वास्तव में भगवान के शेष/ सेवक है। इसमें प्रथम भाग यह ज्ञान है कि हम सेवक है। द्वितीय भाग है कैंकर्य के लिए भगवान से विनय करना और तृतीय भाग है कैंकर्य करना। तृतीय भाग से वह पूर्ण होता है।

ऐश्वर्य – अन्य नित्यसुरियों और मुक्तात्माओं को कैंकर्य के प्रति निर्देशित करना। यद्यपि श्रीवैकुण्ठ में सभी मुक्तात्मा यह भली प्रकार समझते है कि क्या कैंकर्य करना चाहिए, तथापि वे ऐसी अपेक्षा करते है कि उन्हें आज्ञा हो कि कैंकर्य कैसे किया जाना है। उन्हें ऐसा अनुभव होता है कि ऐसी आज्ञा प्राप्त करने के पश्चाद ही उनके स्वरुप की पुष्टि होती है।

आदि – बहुत से अन्य ऐसे गुण, जो इस शब्द द्वारा संकेतिक है, परंतु विशेषतः उनका वर्णन नहीं किया गया है।

अनंत – उनके द्वारा किये जाने वाले कैंकर्य की कोई गिनती नहीं है।

गुणगण – गुणों का भण्डार

शेष – तिरुवनन्ताल्वान। शेषनागजी – भगवान के आसन।

शेषासन – विष्वक्सेनजी। भगवान की सेना के सेनाधिपति।

गरुड़ – पक्षिराज। भगवान के वाहन।

प्रमुख – इन नित्यसूरियों से प्रारंभ करके

नानाविध – विभिन्न कैंकर्य करने पर आधारित विभिन्न प्रकार की श्रेणी के नित्यसूरीगण। इस शब्दावली में श्रीवैकुण्ठ की बाहरी और भीतरी परिधि के सभी संरक्षकगण, सेना के संरक्षक आदि निहित है।

अनंत परिजनश्रीवैकुण्ठ में अनंत कैंकर्यपरारगण है जैसे शेषजी, शेषासनजी, गरुडजी, आदि जिस प्रकार वहां अनंत गुण है।

परिचारक परिचरित चरणयुगल – उन दिव्य युगल चरणों के धारक (चरणयुगल) जिनका ऐसे नित्यसुरिजन, अपने सहचरियों सहित असीम अनंत कैंकर्य करते है।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान के निवास, श्रीवैकुण्ठ का वर्णन करते है।

परमयोगी – महान संत (जैसे सनक, सनातन, आदि)

वांगमानस – उनके वचन और मानस।

अपरिछेद्य – जिस तक पहुंचा नहीं जा सकता।

स्वरूप स्वभाव –  महान संत कहते है कि श्रीवैकुण्ठ पांच उपनिषदों, (पवित्र/ शुद्ध/ अध्यात्मिक तत्वों) अथवा पूर्ण शुद्धसत्व से निर्मित है। परंतु वे उसके स्वरुप अथवा स्वभाव का पूर्ण रूप से वर्णन नहीं कर सकते। श्रीवैकुण्ठ नित्य है परंतु भगवान अपने संकल्प मात्र से उसे परिवर्तित कर सकते है। वह पांच उपनिषदों से निर्मित है और उसे विशेष तत्व द्वारा निर्मित नहीं समझा जाना चाहिए। क्यूंकि यह विशेष तत्व से निर्मित नहीं है, इसे नित्य जानना चाहिए।

स्वाभिमत – भगवान द्वारा पसंद किया जाने वाला और उनके ह्रदय के अत्यंत समीप

विविध विचित्र – विभिन्न प्रकार के

अनंत – जिसका कोई अंत नहीं है

भोग्य भोगोपकरण भोगस्थान समृद्धभोग्य अर्थात वह तत्व जिसका आनंद लिया जाता है (जैसे दिव्य संगीत अथवा दिव्य भोजन अथवा पुष्पों से दिव्यसुगंध)। भोगोपकरण अर्थात वह उपकरण जिसके द्वारा किसी तत्व का आनंद प्राप्त किया जाता है (उपरोक्त उदहारणो में उल्लेखित दोषरहित वाणी, गलमाल)। भोगस्थान अर्थात वह स्थान जहाँ उस तत्व का भोग किया जाता है। वह कोई मण्डप हो सकता है अथवा कोई बागीचा। श्रीवैकुण्ठ इन सब तत्वों से परिपूर्ण है।

अनंत आश्चर्य – वहां ऐसी अगणित अद्भुत वस्तुएँ है। वे नयी प्रतीत होती है परंतु वे वहां अनंत समय से है।

अनंत महाविभव – अगणित संपत्ति (यहाँ संपत्ति का आशय श्रीवैकुण्ठ में विद्यमान नदियाँ, ताल, तलाब, बागीचे, आदि से भी है)

अनंत परिमाण – ऐसे परिमाणों से निर्मित जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता।

नित्य निरवद्य निरतिशय वैकुंठनाथभगवान जो इस स्थान (श्रीवैकुण्ठ) के स्वामी है, जो नित्य, दोषरहित और अद्भुत है।

श्रीरामानुज स्वामीजी अगले भाग में लीला विभूति में श्रीभगवान की संपत्ति के विषय में वर्णन करते है और फिर द्वय विभूतियों (श्रीवैकुण्ठ और लौकिक संसार) के नायक श्रीभगवान के चरणों में शरणागति करते है।

स्वसंकल्प– लीला विभूति में सभी कार्य भगवान के संकल्प के द्वारा होते है। इसके विपरीत श्रीवैकुण्ठ के लिए श्रीरामानुज स्वामीजी स्वछंदानुवर्ती शब्द का उपयोग करते है (उनके मनोभावों के अनुसार कार्य करते है), और हम यह जानते है इन दोनों विभूतियाँ, नित्य और लीला और यहाँ निवास करने वाले प्राणी एक दुसरे से अत्यंत भिन्न है। अन्य शब्दों में, हम लीला विभूति में मात्र भगवान के आदेशानुसार कार्य करते है, उनके मनोभाव के अनुसार नहीं। उनकी नित्य विभूति मात्र उनके आनंद और प्रसन्नता के लिए है और वहीँ लीला विभूति उनके आनंद के लिए है। इसीलिए वे लीला विभूति में रचना और संहार करते है (मध्य में रक्षण भी) यद्यपि नित्य विभूति सदा एक समान रहती है, जैसा की उसके संबोधन में नित्य कहा गया है।

अनुविधाई – उनके संकल्प का पालन करना।

स्वरुप स्थिति प्रवृत्ति – हम पहले भी देख चुके है कि स्वरुप मूलभूत प्रवृत्ति है; स्थिति वह है जिससे उनका आधार है और प्रवृत्ति उनकी क्रिया है।

श्रीरामानुज स्वामीजी अब (तीन स्थितियों) प्रकृति, पुरुष और काल तत्व के विषय में त्रय विशेषताओं का वर्णन करते है। प्रकृति मूलभूत अचित तत्व है। पुरुष से आशय सभी जीवात्माओं से है और काल अर्थात समय। हमें इन तीन स्थितियों के स्वरुप, स्थिति और प्रवृत्ति के विषय में आगे देखना चाहिए।

प्रकृति- सत्व, रज, और तमस से निर्मित है। उसकी परिमित असीमित है, अद्भुत है (वह निरंतर परिवर्तित होती रहती है– वह एक दिन विद्यमान रहती है और अगले ही दिन अदृश्य हो जाती है, वह कभी एक समय सत्य का दर्शन कराती है और वहीँ अन्य समय असत्य का भी)।

प्रकृति का स्वरुप अचित है, वह सत्व, रज, तम, तत्वों से निर्मित है।

प्रकृति की स्थिति – इस भौतिक संसार में जीवात्मा के आनंद उपभोग अथवा इस लौकिक जगत से मोक्ष प्राप्त कर आध्यात्मिक जगत (श्रीवैकुण्ठ) तक पहुँचने का साधन है। अन्य शब्दों में, प्रकृति जीवात्मा को ऐसी स्थिति प्रदान करती है जहाँ वह अपने पांच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से वह सब आनंद प्राप्त करता है जो वह चाहता है और निरंतर जन्म मरण के चक्र में चलता रहता है अथवा उस स्थान का सदा भगवान के ध्यान/ चिंतन में उपयोग करता है, उनके श्रीचरणों में शरणागति करता है और श्रीवैकुण्ठ को प्राप्त करता है।

प्रकृति की प्रवृत्ति – ऐसे स्थानों को प्रदान करना है जैसे दिव्य देश अथवा निदियाँ और ऐसे जीवात्माओं को प्रदान करना, जो अराधना करे अथवा भगवान का ध्यान मनन करे। यह जीवात्मा को सभी कार्य करने के लिए आवश्यक सामग्री प्रदान करती है।

जीवात्मा का स्वरुप, अचित तत्व से भिन्न है। अचित निरंतर परिवर्तनशील है यद्यपि जीवात्मा परिवर्तनशील नहीं है। अचित में कोई ज्ञान नहीं यद्यपि जीवात्मा में है। हालाँकि जीवात्मा सदा अचित से सम्बंधित है।

जीवात्मा की स्थिति – भोजन और जल है। जीवात्मा को अपने पोषण हेतु एक भौतिक देह की आवश्यकता है और उस देह के पोषण के लिए भोजन और जल की। देह के बिना जीवात्मा की स्थिति नहीं है।

जीवात्मा की प्रवृत्ति – उन कार्यों में रत होने की है जिनका परिणाम पाप या पुण्य है।

काल स्वरुप अचित है; वह ज्ञान रहित है। उसे सत्य शुन्य भी कहा जाता है

काल की स्थिति यह है कि वह चित और अचित दोनों को ही परिवर्तन हेतु दिशा और गति प्रदान करता है। इससे यह प्रतीत होता है कि एक जीवात्मा उस देह को त्यागती है और एक फूल उस पेड़ से गिरकर सुख जाता है।

काल की प्रवृत्ति – स्वयं को पल, क्षण, मुहूर्त, दिवस, पक्ष, मास, अयन, वर्ष आदि (समय के विभिन्न माप) के द्वारा प्रकट करना है

स्वशेषतैक स्वभाव – सदा भगवान के नियंत्रण में रहना और मात्र उनके ही सेवक बनकर रहना और किसी के नहीं।

प्रकृति पुरुष कालामक – जैसा की उपरोक्त उल्लेखित है, प्रकृति, जीवात्मा और काल, प्रत्येक अवस्था का अपना स्वरुप, स्थिति और प्रवृत्ति है।

विविध – विभिन्न प्रकार के

विचित्र – अद्भुत

अनंत – जिसका कोई अंत नहीं है

भोग्य – उपभोग के लिए उपयुक्त

भोकथ्रूवर्ग – उपभोग आनंद हेतु विभिन्न प्रकार की सामग्री की उपलब्धता

भोगोपकरण – विभिन्न उपकरण जिनके द्वारा इन्हें प्रयुक्त किया जाता है

भोगस्थान – स्थान जहाँ सामग्री का उपभोग किया जाता है

रूप – लीला विभूति का रूप उपरोक्त वर्णित सभी वस्तुओं से निर्मित है

निखिल जगत उदय विभव लय लीला – सभी जगत के रचयिता, पालक और संहारक है, यह सब उनकी लीला का अंश है

इसके साथ श्रीरामानुज स्वामीजी नारायण शब्द के अर्थ के वर्णन को पूर्ण करते है। संक्षेप में, वे प्रथम चूर्णिका में श्रीजी की शरणागति करते है। अगली चूर्णिका में वे परभक्ति, परज्ञान और परम भक्ति (भगवान के साथ होने पर उदित अवस्था में और भगवान से वियोग होने पर उदासीन, उनके साक्षात दर्शन करना और उनके साथ रहने पर ही जीवित रहना, क्रमशः) के साथ नित्य कैंकर्य की विनती करते है। तृतीय और चतुर्थ चूर्णिका के माध्यम से, श्रीजी उनकी विनती सुन उन्हें सभी कुछ प्रदान करती है। पंचम चूर्णिका में, वे उन परमात्मा का वर्णन करते है, जिनके चरणों में शरणागति की जानी चाहिए। जिसप्रकार वेद कहते है कि सृष्टि, पोषण और संहार के एक मात्र कारक, भगवान का निरंतर ध्यान करना चाहिए, श्रीरामानुज स्वामीजी भी देखते है कि उन सभी महान गुणों के धारक कौन है और इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि वह परमात्मा सिर्फ नारायण ही है, क्यूंकि सभी प्राणी जिन्हें “नारा:” शब्द से संबोधित किया जाता है: वे उनकी ही शरण लेते है (अयन)। फिर वे वर्णन करते है कि “नारा:” किन शब्दों के से निर्मित है और भगवान का स्वरूप, रूप और गुण क्या है। फिर हमने भगवान के गुणों को देखा, उनके दिव्य विग्रह, उनके गुण, उनके आभूषणों, उनके आयुधों आदि के विषय में वर्णन को देखा। फिर, श्रीरामानुज स्वामीजी उनकी दिव्य महिषियों के विषय में वर्णन करते है जो भगवान के सम्पूर्ण आभायमान गुण और स्वरुप का सदैव रस पान करती है। तद्पश्चाद वे श्रीवैकुण्ठ में निवास करने वाले सभी जीवों का वर्णन करते है (नित्यसुरीजन), श्रीवैकुण्ठ की विशेषताएं, उस जगत की विशेषताएं जिसकी रचना/ पालन/संहार भगवान ही करते है (इस भाग में अभी तक जो हमने देखा)। अब जो शेष है वह है शरणागति करना। शरणागति को सुगम बनाने हेतु वे “अपार कारुण्य” से प्रारंभ होने वाले गुणों का वर्णन करते है। इसके मध्य वे अष्ट गुणों को भी अंकित करते है। अब तक उन परम/ श्रेष्ठ गुणों और उस विशेष तत्व के स्वरुप को वे भली प्रकार से जान चुके है जिनकी शरण उन्हें प्राप्त करनी है, फिर वे इन गुणों का वर्णन किसलिए करते है? इसका कारण है कि यह अष्ट गुण उन गुणों के पूरक है, जो शरणागति करने के लिए आवश्यक है (“अपार कारुण्य “ से प्रारंभ करके)। इसके अतिरिक्त उन्होंने पहले भगवान के विभिन्न गुणों का वर्णन किया है (जैसे गांभीर्य, औधार्य, मार्धव, आदि)। आगे कहे जानेवाले आठ गुण इस उपरोक्त गुणों के परिष्कृत रूप का वर्णन करते है, सत्यकाम, सत्य संकल्प आदि से प्रारम्भ करते हुए। इसके अतिरिक्त जिनकी शरण हमें होना है, उनके प्रति पूर्ण श्रद्धा और गहरा विश्वास प्राप्त करने हेतु हमें यह जानना आवश्यक है कि वे इन सभी गुणों को धारण करने वाले है, जो इस कार्य में समर्थक होंगे। उस आठ गुण वह कार्य करते है, ऐसा श्रीरामानुज स्वामीजी समझाते है।

भगवान ने लीला विभूति की रचना की उस समय से लेकर जिस समय तक जीवात्मा कैंकर्य प्राप्त कर भगवान के चरणों तक नहीं पहुँच जाता, उस समय तक अष्ट गुणों के माध्यम से भगवान सभी नियंत्रित करते है। आईये अब चूर्णिका 5 के अगले भाग में हम इन अष्ट गुणों के वर्णन और श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा शरणागति करने के विषय में देखते है।

हिंदी अनुवाद- अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/12/saranagathi-gadhyam-5-part-3/

संग्रहण – http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 5 – भाग 1

अब हम उनके स्वरुप के गुणों के विषय में जानेंगे। जिस प्रकार उनके रूप (विग्रह) के गुण, रूप के सुंदर आभूषणों के समान है, उसी प्रकार उनके स्वरुप के गुण भी उनके स्वरुप के आभूषणों के समान है।

 vishnu-weapons-ornaments

स्वाभाविक – प्राकृतिक; जिस प्रकार जल का निमित्त स्वभाव ठंडा है, उसी प्रकार भगवान के विषय में भी उनके स्वरुप के सभी गुण प्राकृतिक, नैसर्गिक है।

अनवधिकातिशय – उनके गुण अपरिमित है, जिनकी कोई सीमा नहीं है और अद्भुत है। प्रारम्भ में श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के 6 मूलभूत गुणों के विषय में चर्चा करते है – ज्ञान, बल….

ज्ञान– भूत, भविष्य और वर्तमान के सभी घटनाक्रमों को एक ही समय देखने का सामर्थ्य, जैसे वे अभी उनके नेत्रों के सामने ही घटित हो रहे हो।

बल– अपने संकल्प मात्र से सभी प्राणियों का संधारण करना (प्रलय के पश्चाद)

ऐश्वर्य – सभी प्राणियों का अनुरक्षण करना, उन्हें नियंत्रित कर उनका मार्गदर्शन करना

वीर्य – यद्यपि प्रलय के समय सभी प्राणियों का संधारण करने में अथवा नए युग के आरंभ में समस्त सृष्टि की रचना करते हुए, वे कभी भी थकते नहीं, न ही उनके विग्रह से स्वेदजल प्रवाह होता है। उनकी मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता।

शक्ति – यह उनकी शक्ति है, जो जीवात्माओं से उनके कर्मों के अनुसार कार्य करवाती है। जिन्हें एक साथ बांधा नहीं जा सकता ऐसी वस्तुओं को जोड़ना भी शक्ति कहलाता है। वे इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना का मूल तत्व भी है और इसे भी शक्ति के रूप में संबोधित किया जाता है।

तेज – उनमें सभी को जीतने का सामर्थ्य है। इस गुण को तेज कहा जाता है।

अपने आश्रितों के हेतु (जो उनके चरणों में शरण लेते है) वे अनेकों गुणों का दर्शन प्रदान करते है। उनमें से कुछ श्रीरामानुज स्वामीजी ने यहाँ दर्शाये है।

सौशील्य – ऊँच- नीच का भेदभाव न देखना ही सौशील्य है। भगवान के संदर्भ में सौशील्य यह है कि वे कभी अपनी श्रेष्ठता के विषय में नहीं सोचते। जिस सुगमता के साथ वे निषादराज, केवट, वानरराज सुग्रीव अथवा राक्षस विभीषण आदि के साथ मित्रता किये (मात्र मित्रता नहीं, अपितु उन्हें भ्राता का पद भी प्रदान किया) या ग्वालों से घनिष्ट मित्रता किये, यह सभी उनके सौशील्य के उदहारण है।

वात्सल्य – वह स्नेह, जो एक गैय्या (गाय) अपने अभी जन्मे बछड़े को करती है और उसके शरीर की गंदगी को अपनी जीभ से चाट कर साफ़ करती है। भगवान के संदर्भ में वात्सल्य यह है कि वे अपने आश्रितों के दोषों को भी उनके सद्गुण समझ कर क्षमा करते है।

मार्दव – ह्रदय से अत्यंत कोमल। विग्रह की कोमलता को सौकुमार्य  कहते है जैसा की हमने पहले अंक में देखा । मार्दव अर्थात ह्रदय की कोमलता/ सरसता । उनके लिए अपने आश्रितों से एक क्षण का वियोग भी असहनीय है।

आर्जव – जब भगवान अपने आश्रितों के साथ होते है, उनके मन, वचन और कर्म एक समान हो जाते है और वह पुर्णतः स्वयं को आश्रितों को सौंप देते है। इस गुण का वर्णन करने लिए अन्य शब्द सत्यता है।

सौहार्द्र – ह्रदय से उत्तम/ श्रेष्ठ। वे सदा सभी की भलाई का सोचते है (शुभचिन्तक)।

साम्यजीवात्मा के जन्म या उसके गुणों से परे, सभी जीवात्माओं के समान होकर रहते है। उन्होंने केवट और शबरीजी से सदा समानता का व्यवहार किया, बिना किसी भेदभाव के।

कारुण्य – किसी को विपत्ति में देखकर, उसकी सहायता करना, स्वयं के लाभ का न सोचते हुए, यह कारुण्य है।

माधुर्य – यद्यपि कोई शस्त्र से भगवान को हानि पहुंचाने की सोचे, वह उनके नेत्रों के स्नेह और प्रेम को देखकर शस्त्र त्याग देगा।

गांभीर्य – अत्यंत गहरा; भगवान आश्रितों के लिए सदैव हितकारी करते है, परंतु आश्रितों को यह ज्ञात नहीं कि भगवान क्या करेंगे, कैसे करेंगे और कितना करेंगे। वे अपने देने के सामर्थ्य और प्राप्त करने वाले की दीनता का कभी विचार नहीं करते।

औदार्य – प्रदान करने का गुण, अत्यंत उदारता। वे अपने आश्रितों को बिना मांगे ही प्रदान करते है। और वे कभी विचार नहीं करते कि किसे कितना दिया। उनके इस गुण और उपरोक्त वर्णित गुण, गांभीर्य में एक सूक्ष्म अंतर है। औदार्य वह गुण है जिसमें उनके प्रदान करने के गुण को दर्शाया गया है और गांभीर्य  वह गुण है जिसमें यह बताया गया है कि प्राप्त करने वाले को यह ज्ञात नहीं होता कि भगवान उसे कितना, कब और कैसे प्रदान करेंगे।

चातुर्य – ऐसी चतुराई जिसके फलस्वरूप श्रीजी भी उनके आश्रितों के दोषों को नहीं जान पाती। वे आश्रितों के मानस से उनकी रक्षा की शंका को दूर कर, उनकी रक्षा करते है। उदाहरण के लिए, जब सुग्रीव को श्रीराम के बाली से युद्ध करने के सामर्थ्य पर संदेह हुआ, तब उसने अपनी संतुष्टि के लिए भगवान से शौर्य सिद्ध करने के लिए कहा, और भगवान ने उसका रक्षण किया।

स्थैर्य – एक बार अपने आश्रित के रक्षण का निर्णय लेने पर भगवान फिर कभी अपने वचनों से पीछे नहीं हटते, फिर चाहे लाखों शत्रु उस आश्रित से एक साथ युद्ध के लिए आ जाये। वे अपने निर्णय पर दृढ़ता से स्थिर रहते है।

धैर्य– अपने उपरोक्त वर्णित गुण के समर्थन हेतु ह्रदय का साहस।

शौर्य – अपने आश्रितों के सभी शत्रुओं का विनाश करने का सामर्थ्य।

पराक्रम – लाखों शत्रुओं का एकसाथ सामना करने पर भी किंचित थकान नहीं होना।

सत्यकाम – उन गुणों को धारण करना, जो उनके आश्रितजन उनमें देखना चाहते है। यह सब उनके दिव्य गुण है और असीमित संपत्ति है।

सत्यसंकल्प – अपने संकल्प के द्वारा ऐसी रचना करना, जो व्यर्थ न जाये। यह दोनों गुण, उनके रक्षत्व गुण है (वे रचयिता है, रक्षक है और संहारक है)।

कृतित्व – जब आश्रित अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करते है, तब भगवान को ऐसा अनुभव होता है जैसे वह उन्हें ही प्राप्त हुआ है। वह इतना प्रसन्न होते है।

कृतज्ञता – एक बार आश्रित द्वारा शरण में आने पर, वे उस आश्रित के सभी दोषों और अपराधों का विचार न करके, मात्र उसके द्वारा की गयी शरणागति के विषय में ही विचार करते है। यद्यपि आश्रितों को सभी कुछ प्रदान करने के पश्चाद भी, वे सदा उनके सत्कर्मों की और ही देखते है और यह विचार करते है कि उस आश्रित को और अधिक कैसे दिया जा सकता है। और कभी जब वे आश्रितों को इच्छित प्रदान नहीं कर पाते, तो वे सदैव इसी विषय में ही विचार किया करते है (जैसे रामावतार में उन्होंने वन से राज्य में वापस लौटने की भरत की प्रार्थना अस्वीकार की)।

आदि – उपरोक्त वर्णित गुणों के अतिरिक्त भी और अधिक गुण उनमें निहित है।

असंख्येय – ऐसे सभी गुण भगवान में अगणित/ असंख्य है।

कल्याण – उनमें निहित सभी गुण अत्यंत दिव्य/ मंगलकारी है।

गुण गणौघ – यह सभी गुण अनेकों है और विशाल समूहों में है। हमारे संदर्भ में क्रोध एक बुरा गुण है। परंतु भगवान के संदर्भ में जब वे अपने आश्रितों से क्रोधित होते है, उसे भी सद्गुण कहा जाता है क्यूंकि वह आश्रित के हित में है, उसके लिए उचित है।

महार्णव – यह सभी गुण विशाल साग़र के सिन्धु है। यद्यपि हमें ब्रह्मा के चार मुख भी प्राप्त हो जाये तब भी हम उनके अनंत दिव्य गुणों का सम्पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी उनके आभूषणों और उनके शस्त्रों के बारे में चर्चा करते है।

स्वोचित – उनके अनुरूप। जिनमें उपरोक्त सभी गुण विद्यमान है अर्थात भगवान। श्रीरामानुज स्वामीजी अब उनके आभूषणों का वर्णन करते है। जैसे ज्ञान, बल, ऐश्वर्य आदि गुण उनके स्वरुप की सुंदरता को बढाते है, उसी प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी उन आभूषणों के गुणों का वर्णन करते है, जो भगवान के दिव्य विग्रह की सुंदरता को बढाते है।

विविध – यह आभूषण विभिन्न प्रकार के है। मोती अथवा मूंगा अथवा अन्य रत्नों से निर्मित।

विचित्र – यह आभूषण अनेकों प्रकार के है, किरीट (मुकुट) से प्रारंभ होकर नुपुर (पायल) तक

अनंत आश्चर्य – जो हमें अनंत आश्चर्य में डाल दे। यद्यपि वे विभिन्न रत्नों से सुसज्जित आभूषणों को धारण करते है, परंतु हम उनमें से किसी की भी शोभा/ सुंदरता को पूर्णतः आत्मसात नहीं कर सकते। वे सभी अत्यंत अद्भुत है। यदि हम उनकी हीरे की माला को देखें, हमारे नेत्र उसे त्यागकर उनके कर्ण आभूषण की और देखने में समर्थ नहीं है। यद्यपि हम उनके कर्ण आभूषण की और देखे, हम माला या कर्णफूल दोनों में से किसी की भी शोभा को पुर्णतः आत्मसात नहीं कर पायेंगे।

नित्यय निर्वद्य – इन अभूषणों में कोई दोष नहीं है, ये न बढ़ते है न ही क्षीण होते है। यह आभूषण सदा निरंतर कांतिमय रहते है। और, क्यूंकि यह आभूषण स्वभाव/ प्रकृति से चित्त है (हमारे द्वारा पहने जाने वाले आभूषणों के विपरीत), वे स्वयं के लिए न होकर भगवान की सेवा और कैंकर्य के लिए है।

निरतिशय सुगंध – उनके आभूषण भी मधुर सुंगंध युक्त है। हमें यह अद्भुत प्रतीत हो सकता है कि आभूषणों किस प्रकार से सुगंध प्रदान करते है। क्यूंकि भगवान का दिव्य विग्रह स्वयं ही अति दिव्य मधुर सुगन्धित है, तो उनके आभूषण से भी उसी प्रकार मधुर सुगंध प्रवाहित होती है। पुष्पों द्वारा भगवान का श्रृंगार मधुर सुगंध हेतु नहीं अपितु उनके दिव्य स्वरुप की शोभा बढाने हेतु है।

निरतिशय सुकस्पर्श – यह आभूषण भगवान को कोई कष्ट नहीं देते अपितु यह आभूषण उनके दिव्य विग्रह पर अत्यंत कोमल है। शयन अवस्था में भी उन्हें आभूषण निकालने की आवश्यकता नहीं है।

निरतिशय औज्ज्वल्य – उनके दिव्य विग्रह से स्वतः ही कांति का प्रवाह होता है। इन आभूषणों से उनके दिव्य विग्रह की कांति को आवरण प्रदान करते है, ऐसी उनकी महिमा है।

अब तक श्रीरामानुज स्वामीजी आभूषणों के गुणों का वर्णन कर रहे थे। अब वे शीष पर धारण करने वाले किरीट से प्रारम्भ कर पैरों की नुपुर तक, इन आभूषणों की सूचि का वर्णन करते है।

किरीटकिरीट. वह आभूषण है जिसे शीष पर धारण किया जाता है, कपाल के थोडा उपर।

मकुट – मकुट, ताज है जिसे किरीट के उपर धारण किया जाता है।

चुडाचुडा, वह आभूषण है जिसे कपाल से लेकर केशों के मध्य भाग तक धारण किया जाता है।

अवतंस – वह आभूषण जिसे कानों के उपर, सम्पूर्ण कानों को आवरित करते हुए पहना जाता है।

मकर कुंडल – मत्स्य की आकृति वाले कर्ण आभूषण।

ग्रैवेयक – कंठ के चरों और पहना जाने वाला वृत्तिय आभूषण।

हार– वक्ष स्थल में धारण की गयी माला।

केयूर – कंधे पर धारण किया जाने वाला आभूषण।

कटक – भुजा पर धारण किया जाने वाला कंकण।

श्रीवत्स – यह विशेषतः कोई आभूषण नहीं नहीं, अपितु विग्रह के तिल पर केशों का समूह है। जब श्रीजी, भगवान के वक्ष स्थल में विराजती है. तब यह श्रीवत्स उनके आसन को भी संबोधित करता है। अन्य आभूषणों से विपरीत जिन्हें विग्रह से प्रथक किया जा सकता है, श्रीवत्स उनके दिव्य विग्रह का ऐसा भाग है जो विग्रह से अविभाज्य है।

कौस्तुभ – वक्ष स्थल के मध्य में धारण किया गया एक हार, जो पञ्च रत्न जडित है। यह सभी जीवात्माओं का प्रतीकात्मक है।

मुक्ताधाम – मोती की माला, तीन अथवा पांच तार वाली।

उदर बंधन – कमर और उदार के मध्य पहना जाने वाला आभूषण। प्रलय के समय भगवान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रक्षा हेतु उन्हें अपने उदार में स्थान प्रदान करते है। यह आभूषण उनके इस महान कार्य के लिए पुरस्कार स्वरुप है। यह पडोसी से माखन और दही चुराने के कृत्य का उपहार है। एक ही आभूषण उनके स्वामित्व (जगत के स्वामी) और उनके सौलाभ्यता (सुगमता से प्राप्त होने वाले) दोनों को प्रदर्शित करता है।

पीताम्बर – पीले रंग का वस्त्र, जिसे धारण करना उनके सर्वेश्वर (सभी चित और अचित प्राणियों के स्वामी) स्वरुप को प्रदर्शित करता है, और जो उनकी कमर की शोभा को बढाता है।

काञ्चीगुण – पीताम्बर को यथा स्थान रखने के लिए पर कमर में पहने जाने वाला सूत्र।

नुपुर – पायल। भगवान के दिव्य चरण कमलों में विभूषित जो उनके आश्रितों/ शरणागतों के लिए एकमात्र आश्रय है।

आदि – उपरोक्त वर्णित आभूषणों के समान ही और बहुत से आभूषण। श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान द्वारा धारण किये गए सभी आभूषणों का वर्णन करने में असमर्थ है इसलिए “आदि” कहते है।

अपरिमित – अगणित। उनके द्वारा धारण किये हुए आभूषणों की कोई गिनती नहीं है।

दिव्य भूषण – दिव्य आभूषण। उनके दिव्य अंगों और उन अंगों में धारण किये जाने वाले उनके आभूषणों के मध्य एक अनुरूपता है।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के दिव्य आयुधों का वर्णन करते है।

स्वानुरूप – उनके रूप (दिव्य विग्रह) के अनुरूप। उनके आयुध उनके आश्रितों को आभूषणों के समान प्रतीत होते है और उनके शत्रुओं को वह शस्त्रों के समान प्रतीत होते है।

अचिंत्य शक्ति – उनके आयुधो की शक्ति हमारी कल्पना के परे है।

शंख चक्र गदा सारंग – यह उनके पांच मुख्य आयुध है। शंख, चक्र, गदा और सारंग (धनुष)। यह उनके कृपाण का भी वर्णन करता है, जिसे असी  कहा जाता है।

आदि– और भी अनेकों इसी प्रकार के आयुध।

असंख्येय – अगणित। जिस प्रकार उनके आभूषण अगणित है, उसी प्रकार उनके आयुध भी। श्रीवेदान्ताचार्य स्वामीजी ने उनके 16 आयुधों पर एक श्लोक की रचना की है।

नित्य – स्थायी, जिसमें बढ़ने या क्षीण होने के लक्षण न हो।

निरवद्य – जिसमें कोई दोष न हो। आयुधों में किस प्रकार का दोष हो सकता है? सामान्य शस्त्रों के विपरीत यह दिव्य आयुध भगवान के दिव्य विग्रह में शोभायमान होते है जैसे ही भगवान उनका स्मरण करते है। जब यह आयुध किसी शत्रु का वध करते है, वे ऐसा विचार नहीं करते कि उन्होंने शत्रु का संहार किया, अपितु इस भाव से कार्य करते है कि वे भगवान का अंग है और भगवान की इच्छानुरूप उन्होंने अपना कर्तव्य निवाह किया। नित्य निरवद्य का एक अर्थ यह भी है कि समय के साथ कुंद न होकर, वे शत्रुओं के विनाश के लिए और प्रखर होते है।

निरतिशय कल्याण – भगवान के साथ रहते हुए यह आयुध स्वभाव से मंगलकारी हो जाते है। वे अद्भुत भी है क्यूंकि भगवान द्वारा आदेश देने के पहले ही वे शत्रुओं के संहार का अपना कार्य पूर्ण करते है। भगवान के संकल्प/ विचार मात्र से वे अपना कार्य पूर्ण करते है।

दिव्यायुध – वे उन पञ्च तत्वों से निर्मित नहीं है, जिनके विषय में हम जानते है, अपितु स्वभाव से अप्राकृत (प्राकृत वस्तुओं से निर्मित नहीं) है।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी उनकी महिषियों के विषय में वर्णन करते है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बताते है भगवान की अनंत लावण्य और सुंदरता के साथ उनके अनंत गुणों, आभूषणों और आयुधों के सौंदर्य का आनंद लेने के लिए किसी की आवश्यकता है। वे आगे बताते है कि यह उनकी दिव्य महिषियों है, जो नित्य निरंतर भगवान के सौंदर्य का आनंद प्राप्त करती है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीजी के गुणों का वर्णन प्रथम चुर्णिका में किया है। फिर वे उन्हीं गुणों का संबोधन दोबारा यहाँ क्यूँ कर रहे है? श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा ऐसा कहने से तात्पर्य मात्र हमें निर्देश देना नहीं है अपितु डंका घोष से यह प्रकट करना है कि वे भगवान और श्रीजी के स्वरुप (विशेषताएं) और रूप (दिव्य विग्रह) में क्या आनंद अनुभूति प्राप्त करते है। क्यूंकि उनके शब्द भगवान और श्रीजी के प्रति उनके प्रगाढ़ प्रेम के सूचक है, हमारा द्वारा इसे पुनरावृत्ति समझना उचित नहीं है। और, पहले (प्रथम चूर्णिका में), उन्होंने अपने द्वारा श्रीजी के चरणकमलों में की गयी शरणागति की भूमिका के रूप में श्रीजी के इन गुणों का वर्णन किया था और यहाँ वे यह देखकर आनंदित प्रसन्नचित हो रहे है कि भगवान और श्रीजी एक दुसरे के साथ किस प्रकार अति उत्तम दिखाई देते है। हम उन शब्दों के अर्थों को संक्षेप में देखेंगे जिन्हें हमने चूर्णिका 1 में देखा था:

स्वाभिमत – भगवान द्वारा पसंद किया जाना

नित्य निरवद्य – कसी भी समय, बिना किसी दोष के

अनुरूप – रूप सौंदर्य में भगवान के ही समान

स्वरुप–भगवान के समान ही विशेषताएं

गुण – अनेकों सदगुणों के साथ

विभव – अकल्पनीय धन संपत्ति के स्वामी

ऐश्वर्य – सभी चित और अचित जीवों को नियंत्रित और निर्देशित करने का सामर्थ्य

शील – अवर प्राणियों से भी समान व्यवहार करना

आदि– और बहुत से गुण

अनवधिक अतिशय – कभी न क्षीण होने वाला और अद्भुत

असंख्येय – अगणित

कल्याण – मंगलकारी

गुणगण – ऐसे कल्याण गुणों का समूह।

अब हम विस्तार से इस चूर्णिका के उन शब्दों का अर्थ जानेंगे जिनका उल्लेख पहले नहीं हुआ है।

श्रीवल्लभा – श्री देवी (श्रीमहालक्ष्मीजी) के प्रति प्रेम। श्रीजी से अत्यंत प्रगाढ़ प्रेमावास्था। श्रीजी के स्वामी जिनके ऐसे महान उच्च दिव्य गुणों का वर्णन उपर किया गया है। जिसप्रकार एक लम्बे समय से भूखा व्यक्ति तीव्र इच्छा से भोजन की और देखता है, उसी प्रकार भगवान भी श्रीजी के स्वरुप को प्रेम से निहारते है।

एवं भूता – उपरोक्त वर्णित श्रेष्ठ गुणों को समान रूप से धारण करनेवाली।

भूमि नीला नायक – भूमि देवी और नीला देवी; यद्यपि यहाँ उनका उल्लेख भिन्न किया गया है, परंतु स्वरुप और रूप के संदर्भ में वे श्रीमहालक्ष्मीजी के समरूप ही है। यहाँ, भगवान को नायक संबोधन किया गया है और श्रीजी को वल्लभानायक वह है जिसके अधिकार का मान हो और जो आचार और नियमों के अनुसार व्यवहार करता है, यद्यपि वल्लभा वह है जिनके सभी कार्य प्रेम और स्नेह जनित है। ऐसा कहा गया है कि भूमि देवी और नीला देवीजी ने भगवान और श्रीजी के दासत्व को स्वीकार किया है और वे उनके प्रति इस कैंकर्य से अत्यंत संतुष्ट और प्रसन्न है।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी आगे बढ़ते हुए श्रीवैकुंठ में नित्य सूरियों का वर्णन करते है। नित्यसूरी, वे है जो सदा श्रीवैकुण्ठ में निवास करते है और जिन्होंने कभी लीला विभूति में जन्म नहीं लिया। आदि शेषजी, विष्वक्सेनजी, गरुडजी, नित्यसूरियों के समूह के अंग है। पंचम चूर्णिका के अगले भाग में हम इसे देखेंगे।

हिंदी अनुवाद- अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/12/saranagathi-gadhyam-5-part-2/

संग्रहण – http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 2,3 और 4

namperumal-nachiar_serthi

अवतारिका (भूमिका)

5 चूर्णिका में श्रीरामानुज स्वामीजी उन परमात्मा को स्थापित करते है, जिनकी शरणागति सभी को करनी चाहिए। श्रीरामानुज स्वामीजी प्रभावी रूप से यह बताते है कि “नारायण” ही परमात्मा है। हम पहले देख चुके है कि “नारायण” शब्द दो खण्डों से निर्मित है, नारा: (विभिन्न प्रकार के चित और अचित तत्वों का संग्रह) और अयन  (निवास स्थान)। नारा: के विवरण को आगे के वाक्यांशों के लिए रखकर, इस भाग में वे परमात्मा के स्वरुप का विवरण करते है।

क्यूंकि यह चूर्णिका बहुत बड़ी है, हम इसके विवरण को पांच भागों में पूर्ण करेंगे – प्रथम भाग में हम श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा भगवान के स्वरुप के विवरण तक के खंड को देखेंगे।

पहले सम्पूर्ण चूर्णिका को यहाँ देखते है :

अखिलहेय प्रत्यनिक कल्याणैकथान स्वेतर समस्त वस्तु विलक्षण अनंत ज्ञानानंदैक स्वरुप ! स्वाभिमतानुरूप एकरूप अचिंत्य दिव्याद्भुत नित्य निरवद्य निरतिशय औज्ज्वल्य सौंदर्य सौगंध्य सौकुमार्य लावण्य यौवनाद्यनंत गुणनिधि दिव्यरूप ! स्वाभाविकानवधिकातिशय ज्ञानबलैश्वर्य वीर्यशक्तितेज: सौशील्य वात्सल्य मार्तधवार्जव सौहार्द साम्य कारुण्य माधुर्य गांभीर्य औधार्य चातुर्य स्थैर्य धैर्य शौर्य पराक्रम सत्यकाम सत्यसंकल्प कृतित्व कृतज्ञात्यसंख्येय कल्याणगुणागणौघ महार्णव ! स्वोचित विविध विचित्रानंदाश्चर्य नित्य निरवद्य निरतिशय सुगंध निरतिशयसुखस्पर्श निरतिशय औज्ज्वल्य किरीट मकुट चुडावतम्स मकरकुंडल ग्रैवेयक हार केयूर कटक श्रीवत्स कौस्तुभ मुक्ताधाम उदरबंधन पीताम्बर कांचीगुण नुपुराध्यपरिमिता दिव्य भूषण ! स्वानुरूपाचिंत्य शक्ति शंख चक्र गदा (असी) सारंगाध्यसंख्येय नित्य निरवद्य निरतिशय कल्याण दिव्यायुध ! स्वाभिमत नित्य निरवद्यानुरूप स्वरुप रूप गुण विभवैश्वर्य शीलाध्यनवधिकातिशय असंख्येय कल्याणगुणगण श्रीवल्लभ ! एवंभुत भूमि नीलानायक ! स्वच्छंदानुवर्ती स्वरुपस्थिति प्रवृत्ति भेद अशेष शेषतैकरतिरुप नित्य निरवद्य निरतिशय ज्ञानक्रियैश्वर्याध्यनंत कल्याण गुणगण शेष शेषासन गरुड़ प्रमुख नानाविधानंत परिजन परिचारिका परिचरित चरणयुगल ! परमयोगी वांगमनसा परिच्छेद्य स्वरुप स्वभाव स्वाभिमत विविध विचित्रानंत भोग्य भोगोपकरण भोगस्थान समृद्ध अनंताश्चर्य अनंत महाविभव अनंत परिमाण नित्य निरवद्य निरतिशय वैकुंठनाथ ! स्वसंकल्प अनुविधायी स्वरुपस्थिति प्रवृत्ति स्वशेषतैक स्वभाव प्रकृति पुरुष कलात्मक विविध विचित्रानंत भोग्य भोक्तरूवर्ग भोगोपकरण भोगस्थानरूप निखिल जगादुधय विभव लय लीला ! सत्यकाम ! सत्यसंकल्प ! परब्रह्मभूत ! पुरुषोत्तम ! महाविभुते ! श्रीमन ! नारायण ! श्रीवैकुंठनाथ ! अपारकारुण्य सौशील्य वात्सल्य औधार्य ऐश्वर्य सौंदर्य महोधधे ! अनालोचित विशेष अशेषलोक शरण्य ! प्रणतार्तिहर! आश्रित वात्सल्यैक जलधे ! अनवरत विदित निखिल भूत जात यातात्म्य ! अशेष चराचरभूत निखिल नियम निरत !अशेष चिदचिद्वस्तु शेषीभूत ! निखिल जगदाधार ! अखिल जगत स्वामिन् ! अस्मत स्वामिन् ! सत्यकाम ! सत्यसंकल्प ! सकलेतर विलक्षण ! अर्थिकल्पक ! आप्तसक ! श्रीमन् ! नारायण ! अशरण्यशरण्य ! अनन्य शरण: त्वत पादारविंद युगलं शरणं अहं प्रपद्ये I

शब्दार्थ:

अखिलहेय – वह सब जो दोषयुक्त है

प्रत्यनिक – बिलकुल विपरीत

कल्याणैकथान – केवल शुभ कल्याण गुणों से युक्त

स्वेतर – स्वयं के अलावा

समस्त – सभी

वस्तु – पदार्थ (प्राणी)

विलक्षण – श्रेष्ठ

अनंत – जिसका कोई अनंत न हो

ज्ञान – ज्ञान/ विद्या

आनंदैक – आनंद से पूर्ण

स्वरुप – मौलिक/ मूलभूत प्रकृति

स्वाभिमत – उपयुक्त

अनुरूप – आकर्षक बाह्य रूप

एकरूप – एक बाह्य रूप

अचिंत्य – जिसे विचार नहीं किया जा सकता

दिव्य – उत्कृष्ट

अद्भुत – चमत्कारिक

नित्य – स्थायी

निरवद्य – बिना दोष के/ त्रुटिहीन

निरतिशय – अतुलनीय

औज्ज्वल्य – अत्यंत उज्जवल

सौंदर्य – अंगों में सुंदरता

सौगंध्य – मधुर गंध

सौकुमार्य – कोमल

लावण्य – सम्पूर्ण सौंदर्य

यौवन – युवा

आदि – प्रारम्भ करके

अनंत – जिसका अंत न हो

गुण – विशिष्ट लक्षण

निधि – निधि

दिव्यरूप – उत्कृष्ट रूप

स्वाभाविक – प्राकृतिक

अनवधिक – असीम; बहुतेरे

अतिशय – अद्भुत

ज्ञान – ज्ञान/ विद्या

बल – शक्ति

ऐश्वर्य – नियंत्रित करने की क्षमता

वीर्य – कभी न शिथिल होने वाले

शक्ति – ऊर्जा/ ताकत

तेज – प्रभा/ कांति

सौशील्य – जो स्तरों (दूसरों की तुलना के संदर्भ से) में भेद का विचार नहीं करते; सभी को समान मानने वाले

वात्सल्य – माता के स्नेह- ममता सा (जिसप्रकार एक गोमाता अपने बछड़े के प्रति स्नेह प्रदर्शित करती है)

मार्ध्व – ह्रदय से कोमल

आर्जव – सच्चा, नेक, निष्कपट

सौहार्द – सत ह्रदय वाला

साम्य – समान

कारुण्य – दया

माधुर्य – सदय, कृपालु

गांभीर्य – गहरा, प्रगाढ़

औधार्य – उदार प्रकृति के

चातुर्य – चतुर

स्थैर्य – दृढ़

धैर्य – साहस

शौर्य – शत्रुओं को हराने वाले

पराक्रम – जो थके न

सत्यकाम – जिनमें आकर्षक, सुंदर गुण हो

सत्यसंकल्प – स्वयं की अभिलाषा अनुसार संरचना करने की क्षमता

कृतित्व – करते हुए

कृतज्ञात – कृतज्ञ

असंख्येय – अगणित

कल्याण – मंगलमय, शुभ

गुण – विशिष्ट लक्षण

गणौघ – संग्रह

महार्णव् – विशाल सागर

स्वोचित – स्वयं के लिए उचित

विविध – बहुत प्रकार से

विचित्र – एक विशेष प्ररूप में बहुत से प्रकार

अनंताश्चर्य – अद्भुत जिसका कोई अंत न हो

नित्य – सदा / नित्य

निरवद्य – त्रुटिहीन/ दोष विहीन

निरतिशय सुगंध – मधुर सुगंध उत्सर्जित करना

निरतिशय सुखस्पर्श – भगवान के विग्रह पर मोलायम/ कोमल

निरतिशय औज्ज्वल्य – कांति फैलाते हुए

किरीट –शीश का परिधि युक्त/ चक्र समान आभूषण

मकुट – किरीट पर मुकुट के समान पहना जाने वाला

चुडा – ललाट पर पहना जाने वाला

अवतम्स – कानों पर पहना जाने वाला

मकर – मत्स्य (मछली) के समान

कुंडल – कानों की बाली

ग्रैवेयक – गले का हार

हार – हार

केयूर – कन्धों पर पहना जाने वाला

कटक – बाहं पर धारण की जाने वाली चूड़ी/ भुजबंद

श्रीवत्स – तिल के समान

कौस्तुभ – मध्य/ केंद्र का मणि

मुक्ताधाम – मोती के आभूषण

उदरबंधन – कमर और उदार के मध्य पहना जाने वाला

पीताम्बर – पीले वस्त्र

कांचीगुण – कमर की कर्दानी

नुपुर – पायल

आदि – और ऐसे ही बहुत

अपरिमित – अगणित

दिव्यभूषण – दिव्य आभूषण

स्वानुरूप – अपने स्वरुप के अनुसार

अचिंत्य – सोच के परे

शक्ति – प्रबल

शंख – शंख

गदा – गदा

अशी – तलवार

सारंग – धनुष

आदि – इसी प्रकार के बहुत से शस्त्र

असंख्येय – अगणित

नित्य – स्थायी

निरवद्य – दोष रहित

निरतिशय – अद्भुत

कल्याण – मंगलमय

दिव्यायुध – दिव्य शस्त्र

स्वाभिमत – उनकी पसंद के अनुरूप

नित्य निरवद्य – स्थायी, दोष रहित

अनुरूप – उनके सौंदर्य के सदृश

स्वरुप – मूलभूत विशेषताएं

रूप – बाह्य रूप

गुण – विशेषता

विभव – संपत्ति

ऐश्वर्य – नियंत्रित/ निर्देशित करना

शील – श्रेष्ठ व्यक्ति, जो अवर व्यक्ति से भी बिना किसी भेदभाव के व्यवहार करते है

आदि – इसी प्रकार के बहुत से गुण

अनवधिक – कभी कम/ क्षीण न होने वाली

अधिशय – अद्भुत

असंख्येय – अगणित

कल्याण – मंगलमय

गुण गण – गुणों का भण्डार

श्री – महालक्ष्मीजी – श्रीजी

वल्लभ – स्नेही; प्रिया

एवं भूत – समान गुणों वाली

भूमि नीला नायक – श्रीभूदेवी और श्रीनीलादेवीजी के नाथ / स्वामी

क्यूंकि यह चूर्णिका बहुत ही बड़ी है, शेष चूर्णिका के शब्दशः अर्थों को हम अगले अंक में जानेंगे।

विस्तृत व्याख्यान

अखिलहेय– अयोग्यता/ दोष। सभी भिन्न प्राणियों में कुछ दोष निहित है। अचित के संदर्भ में, उसका निरंतर परिवर्तनिय स्वरुप ही उसकी अयोग्यता है। बद्धात्मा (संसार बंधन में बंधे) के संदर्भ में, दोष यह है कि देह धारण करने के पश्चाद वह अपने पूर्व पाप और पुण्यों के अनुसार सतत सुखों और दुखों का अनुभव करता है। मुक्तात्मा (संसार बंधन से मुक्ति प्राप्त कर श्रीवैकुंठ में पहुंचे जीव) के संदर्भ में दोष यह है कि मुक्त होने के पहले वे भी संसार में सुखों और दुखों को निरंतर अनुभव किया करते थे। नित्यात्मा (परमपद के नित्य निवासी जैसे अनंतजी, विष्वक्सेनजी, गरुड़जी, आदि) के संदर्भ में अयोग्यता यह है कि उनमें निहित सभी शुभ विशेषताएं उनकी स्वयं की नहीं, अपितु भगवान की निर्हेतुक कृपा द्वारा प्राप्त है, अर्थात वे स्वतंत्र नहीं है। सिर्फ परमात्मा के लिए ही कोई योग्यता/ दोष नहीं है, वे सभी में सक्षम है।

प्रत्यनिक – बिलकुल विपरीत; इसका आशय है कि भगवान उन सभी के विपरीत है, जो सभी दोषयुक्त है। अन्य शब्दों में, भगवान सभी दोषों/ अयोग्यताओं से मुक्त है।

कल्याणैकथान – सभी कल्याण गुणों को धारण करने वाले एकमात्र स्वामी। भगवान न केवल सभी दोषयुक्त के विपरीत है, अपितु सभी अच्छे के प्रतीक भी है।

स्वेतर समस्त वस्तु विलक्षण – सभी प्राणियों (चेतन और अचित) की तुलना में वे श्रेष्ठ/ सर्वोत्तम है। इसे इस बात के स्वाभाविक परिणाम के रूप में भी देखा जा सकता है कि वे सभी दिव्य गुणों के स्वामी है और सभी दोषपूर्ण से विहीन है।

अनंत – जिसका कोई अंत न हो। हम सभी प्राणी स्थान, समय और भौतिक व्यवस्था के द्वारा सिमित है; अर्थात हम केवल एक ही स्थान पर रहते है, एक विशिष्ट समय जैसे 100 वर्ष या 120 वर्ष तक जीवित रह सकते है परंतु सदा के लिए नहीं और हम एक ही देह को धारण करते है। परंतु भगवान इनमें से किसी से भी परिमित नहीं है। वे एक ही समय पर बहुत से स्थानों पर हो सकते है, नित्य है और एक से अधिक देह को धारण करते है। क्यूंकि हम सभी उन्हीं में निवास करते है, वे सर्वव्यापी है और सभी देहों में विद्यमान है। प्रलय के समय में भी, एक मात्र वे ही विद्यमान रहते है। इसलिए उन्हें अनंत कहा जाता है।

ज्ञान आनंदैक स्वरुप भगवान स्वयं प्रकाशित है, उन्हें अन्य किसी प्रकाश की आवश्यकता नहीं है। यह आत्मा के लिए भी सत्य है। इसे स्वयंप्रकाशत्व कहा जाता है। भगवान ज्ञान से परिपूर्ण है, उस ज्ञान से आनंद की उत्पत्ति होती है। इसलिए ज्ञान और आनंद उनके स्वरूप है। अब तक श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान के स्वरुप की महिमा का वर्णन कर रहे है। अब वे उनके रूप (तिरुमेणी/ विगृह) का वर्णन करते है। पांच तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) से बनी हमारी भौतिक देह के विपरीत, भगवान का विग्रह शक्ति और पांच उपनिषदों से बना है।

स्वाभिमत – उनके गुणों के अनुरूप/ उपयुक्त। उनका रूप उपरोक्त वर्णित उनके स्वरुप के गुणों से अधिक आभायमान है और उन्हें प्रिय है। इसलिए, उनके रूप के गुणों का वर्णन करने से पहले, वे उनके विग्रह/ शरीर (भगवान की तिरुमेणी) का वर्णन करते है। जैसा की महर्षि पराशर ने विष्णु पुराण (18 पुराणों में से एक) में उल्लेख किया, यह ऐसा विग्रह है जो वे स्वयं की इच्छानुरूप धारण करते है। उनका यह रूप उनका बहुत प्रिय है। जीवात्माओं को शुद्ध करने के उद्देश्य से, जब सभी अन्य उपाय विफल होते है, तब अंततः वे अपने विग्रह के दर्शन प्रदान कर उस जीवात्मा को अपने मार्ग पर लाते है।

अनुरूप – उनका दिव्य विग्रह बहुप्रकार से उनके स्वरुप के पूरक है (जैसा की हम पहले देख चुके है)। हमारे विषय में, हमारी आत्मा ज्ञान से ज्ञान और आनंद से पूर्ण है। यद्यपि हमारी देह, आत्मा के इस स्वरुप को आच्छादित कर देती है, परंतु भगवान के संदर्भ में उनके बाह्य रूप उनके स्वरुप के गुणों की शोभा और अधिक बढ़ाते है।

एकरूप – केवल एक रूप (बाह्य रूप)। हमारे जीवन में भी हमें एक ही शरीर प्राप्त होता है। तब फिर भगवान के एकरूप से क्या आशय है? जीवन चक्र में हमारा शरीर 6 विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों से गुजरता है– निर्माण होता है, जन्म होता है, परिवर्तन होता है, बढता है, क्षीण होता है और फिर एक दिन वह समाप्त हो जाता है। इसे शठ विधा भाव कहा जाता है (6 विभिन्न प्रकार के रूप)। भगवान के संदर्भ में, उनकी विग्रह में ऐसे कोई परिवर्तन नहीं होते। उनका एक ही विग्रह है और वह सदा एक समान रहता है।

अचिंत्य – उनके रूप का स्मरण रखना हमारे मानस के सामर्थ्य के परे है। मंदिर में रहते हुए उनके दिव्य विग्रह के घंटों दर्शन करने के बाद, जब हम घर पहुँच कर उनकी पोषक, माला के फूलों के रंग अथवा उनके द्वारा पहने हुए विभिन्न प्रकार के आभूषणों का स्मरण करते है, तो हम उसे पुर्णतः स्मरण नहीं कर पाते।

दिव्य – यद्यपि हम कितने भी प्रयास करले, हम उनके समान किसी को भी खोज नहीं पाएंगे। उन्हें अप्राकृत संबोधन किया जाता है जबकि हमारी देह प्राकृत है जो 5 विभिन्न तत्वों से निर्मित है और भगवान का रूप इन सामान्य तत्वों से निर्मित नहीं है।

अद्भुत – निरंतर परिवर्तित होने वाला। कुछ शब्दों पहले हमने देखा भगवान एकरूप है (अपरिवर्त्य) और उनका रूप सदा एकसमान रहता है और परिवर्तित नहीं होता है। परंतु अब ऐसा कैसे है कि हम कह रहे है वे परिवर्तित होते है? यहाँ अद्भुत से आशय है – जैसे हम प्रतिदिन भगवान के एक ही विग्रह के मंदिर में दर्शन करते है, फिर भी हम सदा उनके रूप में कुछ नया अनुभव करते है। उनके आभूषण, उनकी पोषकें और मालाएं, श्रृंगार आदि सदा परिवर्तित होते है। इसप्रकार वे कभी पिछले दिन या पिछले सप्ताह के समान प्रतीत नहीं होते। प्रत्येक क्षण वे भिन्न प्रकट होते है और इन सभी रूपों में वे अद्भुत नज़र आते है।

नित्य निरवद्यअवद्य से आशय है दोष/ अशुद्धि। निरवद्य अर्थात जिसमें कोई दोष अथवा अशुद्धि न हो। नित्य निरवद्य अर्थात किसी भी समय में कभी भी जिसमें कोई दोष न हो अर्थात जो नित्य ही दोषरहित हो। वे कभी यह नहीं सोचते कि उनका रूप, विग्रह उनके लिए है। उनका रूप उनके सभी भक्तों के हितार्थ है। यह निरवद्य का एक और अन्य अर्थ है।

निरतिशय औज्ज्वल्यऔज्ज्वल्य से आशय है पूर्ण चमक/ कांति। उनकी चमक ऐसी है कि ब्रह्माण्ड के सबसे अधिक चमकते सितारे भी उनके विग्रह के तुलना में अन्धकारमय नज़र आते है। अब तक श्रीरामानुज स्वामीजी उनके बाह्य सुंदर रूप के विषय में चर्चा कर रहे थे। अब वे भगवान के रूप की विशेषताओं का वर्णन प्रारंभ करते है।

सौंदर्य – दिव्य देह के सभी अंगों का सौंदर्य। जब किसी देह को दूर से देखा जाता है तब वह पूर्ण रूप से सुंदर नज़र आ सकती है परंतु पास आने पर उनमें से कुछ अंग उतने सुंदर नहीं है और वे और भी अधिक श्रेष्ठ हो सकते थे, ऐसा अनुभव होता हैl भगवान के संदर्भ में, शरीर के अंग संपुर्णतः सुंदर प्रतीत होते है।

सौगंध्य – मनभावन मधुर गंध। और अन्य वस्तुओं को भी सुगंध प्रदान करने का सामर्थ्य।

सौकुमार्य – अत्यंत सुकोमल। उनका विग्रह इतना सुकोमल है कि यदि श्रीजी उनकी और देख ले, तो वह अंग लाल रंग का हो जाता है, वह इतना सुकोमल है।

लावण्य – उनके रूप की सम्पूर्ण सुंदरता। इसकी तुलना सौंदर्य से करे, जिस गुण का वर्णन उपर किया गया है। यद्यपि सौंदर्य अंगों की सुंदरता के लिए प्रयोग किया गया है, लावण्य सम्पूर्ण रूप के सौंदर्य को दर्शाता है। हमारे नेत्र अपने जीवनकाल में उनके शरीर के प्रत्येक अंग को देखने और सराहने में समर्थ नहीं है; इसीलिए उनमें लावण्य का गुण भी विद्यमान है, जिसके द्वारा हमारे नेत्र उनके सम्पूर्ण रूप के सौंदर्य के दर्शन कर सके।

यौवन – उनकी युवा अवस्था को प्रदर्शित करता है। युगों युगांतर बीतने पर भी वे सदा ही इसी यौवन की अवस्था में ही रहते है। वे कभी वय नहीं होते।

आदि – उपरोक्त गुणों से प्रारम्भ होकर, ऐसे और बहुत से गुण है।

अनंत गुण निधि – ऐसी अनंत सद्गुणों के निधि।

दिव्य रूप – उनका रूप जो श्रीवैकुंठ में है, वह इस लीला विभूति (लौकिक जगत) में न रखने योग्य रूप में उपस्थित है।

अब तक हमने भगवान के स्वरुप, रूप और रूप के गुणों के विषय में देखा। अब चूर्णिका 5 के द्वितीय भाग में हम उनके स्वरुप के गुणों, उनकी दिव्य महिषियों, नित्यसुरियों, श्रीवैकुंठ, लीला विभूति आदि के विषय में चर्चा करेंगे, जो उनके नारायण संबोधन के “नारा” खंड को समझाती है।

हिंदी अनुवाद- अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/12/saranagathi-gadhyam-5-part-1/

संग्रहण – http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य – चूर्णिका 2 , 3 और 4

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 1

sriranganachiar-3श्रीरंगनाच्चियार (पेरिय पिराट्टीयार) – श्रीरंगम

ramanuja-srirangamश्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीरंगम

चूर्णिका 2:

अवतारिका (भूमिका)

प्रथम चूर्णिका में, श्रीरामानुज स्वामीजी ने सर्वप्रथम श्रीजी द्वारा आश्रय प्रदान करने के सामर्थ्य और कही और आश्रय न पाने की स्वयं की असमर्थता को दर्शाया; तदन्तर वे श्रीजी के चरण कमलों में शरणागति निवेदन करते हैं। श्रीजी उनसे उनकी अभिलाषा पूछती है तब वे निवेदन करते हैं कि वे कैंकर्य में सम्मिलित होना चाहते हैं (दिव्य दंपत्ति की सेवा) और शरणागति में सम्पूर्ण विश्वास रखना चाहते हैं (हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा इसे महाविश्वास कहा गया है)। जब कोई मनुष्य भगवान के चरण कमलों में शरणागति करता है, इसका अभिप्राय होता है कि वह कैंकर्य सेवा की प्राप्ति भी चाहता है। फिर भी, भगवान के चरण कमलों में शरणागति करने वाले शरणागत से यह अपेक्षित है कि उसे भगवत कैंकर्य की उत्कट अभिलाषा हो और शरणागति में अटूट विश्वास हो। क्या इसका आशय यह है कि पहले श्रीरामानुज स्वामीजी में यह दो गुण निहित नहीं थे (कैंकर्य की उत्कट चाहत और शरणागति में विश्वास)? (शरणागति करने के पश्चाद) परिणाम की तुलना में, अर्थात मोक्ष प्राप्त कर कैंकर्य करने में, हमें यही विचार करना चाहिए कि उस लक्ष्य तक पहुँचाने वाला कोई तत्व हमारे अंदर नहीं है। और यही सत्य भी है। और हमारे पूर्वाचार्यों ने भी नैच्यानुसंधान के फलस्वरूप सदा यही विचार किया है कि श्रीवैकुंठ पहुँचने के लिए उनमें कुछ भी सात्विक, सद्गुण नहीं है।

आईये अब हम द्वितीय चूर्णिका को देखते हैं:

चूर्णिका

पारमार्थिक भगवच्चरणारविंद युगल ऐकांतिकात्यन्तिक परभक्ति परज्ञान परमभक्तिकृत परिपूर्णानवरत नित्य विशदतम अनन्यप्रयोजन अनवाधिकातिशयप्रिय भगवदनुभवजनित अनवाधिकातिशय प्रीतिकारित अशेषावस्थोचित अशेषशेषतैकरीतिरुप नित्य कैंकर्य प्राप्त्यपेक्षया, पारमार्थिकी भगवच्चरणारविंद शरणागति: यथावस्तिथा अविरतास्तु मे II

शब्दार्थ

पारमार्थिक – सम्पूर्ण सत्य; वह जो परम पुरुषार्थ (सबसे उत्तम पुरुषार्थ) को अर्थ प्रदान करता है।

भगवान – 6 आवश्यक दिव्य गुणों को धारण करने वाले हैं (जिन्हें चूर्णिका 1 में देखा जा सकता है)

चरण – दिव्य चरण

अरविंद – कमल

युगल – दो

ऐकांतिक – इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं (एकं – एक; अन्तम – अंत); तिरुवड़ी (चरणों) के प्रति भक्ति और इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।

आत्यन्तिक – वह जिसका कोई अंत नहीं है (अन्तम – अंत; अत्यन्तं – अनंत)

परभक्ति – भगवान के साथ सदा रहने की बढती चाहत

परज्ञान – भगवान के दिव्य दर्शन करने की योग्यता

परमभक्ति – भगवान तक पहुँचना

कृत – वह जो किया गया है

परिपूर्ण – सम्पूर्ण

अनवरत – सतत/ निरंतर (बिना किसी बाधा के)

नित्य – स्थायी

विषदतम – परमभक्ति द्वारा अनुभव करना

अनन्य प्रयोजन – मात्र भगवान को ही अंतिम परिणाम मानना और कुछ नहीं

अनवधिक – कभी कम न होने वाला (और असीमित)

अतिशय – अद्भुत

प्रिय – प्रेमपूर्वक

भगवद – भगवान का

अनुभव – अनुभूति

जनित – द्वारा जन्मा

अनवधिक – कभी कम न होने वाला

अतिशय – अद्भुत

प्रीति – गहरा प्रेम

कारित – किया जाने वाला

अशेष – बिना त्यागे

अवस्थोचित – सभी स्थिति में प्रासंगिक

शेषतैकरतिरुप – अपने स्वामी के शेष (भृत्य) के रूप में प्रेमपूर्वक कैंकर्य का प्रतीक

नित्य कैंकर्य प्राप्ति – स्थायी कैंकर्य की प्राप्ति

अपेक्षय – अपेक्षित; इच्छित

पारमार्थिकी – सच्चा

भगवच् चरणारविन्द – भगवान के कमल के समान चरण

शरणागति – आश्रय

यथावस्थिता – जिस किसी स्थिति में जो हो

अविरत – बिना रुकावट या विराम के

अस्तु मे – मेरी नियति हो

विस्तृत व्याख्यान

पारमार्थिका – अर्थम् का अभिप्राय –प्रयोजन (परिणाम) और सत्य दोनों हैं। जब इसका उपयोग परभक्ति के विशेषण के रूप में होता है तब पारमार्थिक भक्ति, अकारणत्व (निर्हेतुकत्व) को दर्शाता है। अन्य शब्दों में, यदि भक्ति भगवान की कृपा से प्राप्त होती है, उसे सिद्ध भक्ति कहते हैं, अर्थात वह भक्ति जो स्वतः ही, हमारी ओर से बिना किसी प्रयास के ही हमें प्राप्त हुई है। वही दूसरी ओर जब हम भक्ति प्राप्त करने हेतु स्व-प्रयासों की सहायता लेते हैं, उसे साधन भक्ति कहते हैं, वह भक्ति जो हमारे प्रयासों से जनित है।

जब हम पारमार्थिका को चरणारविन्दम (चरण कमल) के विशेषण के रूप में देखते हैं (पारमार्थिका चरणारविंदम), इससे प्रयोजन तिरुवड़ी  अर्थात चरण कमलों को प्राप्त कर, उन चरणारविंदों के नित्य कैंकर्य करने का बोध प्राप्त होता है।

भगवच् चरण अरविंद – यहाँ भगवान शब्द का प्रयोग चरण कमलों की श्रेष्ठता को दर्शाने के लिए किया गया है। यह उस मधुरता का सूचक है, जो भगवान के दिव्य गुणों के कारण उनके चरण कमलों से जुडी है। क्यूंकि उनके गुण आनंददाई है, वे परमभक्ति की ओर अग्रसर करते हैं, जो इस आनंद की चाहत को और बढाती है। चरण अरविंद – चरण कमल भगवान के सम्पूर्ण दिव्य विग्रह के सूचक है और इसलिए आनंददाई है।

युगल – चरण कमलों से जनित आनंद/ प्रसन्नता

ऐकांतिक – केवल एक ही परिणाम/ प्रयोजन है; अन्य कोई प्रयोजन नहीं है अर्थात इसके अतिरिक्त और कुछ भी देखने के लिए नहीं है।

आत्यन्तिक – मात्र भगवान पर केन्द्रित; अन्य कही भक्ति नहीं होना।

परभक्तिभगवान से प्रेम ऐसा है कि उनके साथ होने पर सदा आनंद है और उनसे वियोग सदा ही दुःख जनित है।

परज्ञान – परभक्ति की अवस्था भगवान के दर्शनलाभ में पुष्पित होती है। इस प्रकार इसे दर्शन साक्षातकारं भी कहा जाता है अर्थात भगवान के सच्चे दर्शन की दृष्टि।

परमभक्ति – यह परभक्ति की अंतिम अवस्था है, जहाँ भगवान से एक क्षण भी दूर रहना असंभव है। वियोग होने पर जीवन समाप्त हो जाता है। श्रीरामानुज स्वामीजी सर्वप्रथम ज्ञान के लिए प्रार्थना करते है, तदन्तर भक्ति हेतु; इन दोनों के साथ, भगवान उन्हें उस अवस्था तक ले जाते हैं जो भक्ति योगि को प्राप्त होती है, जिससे वह परमभक्ति प्राप्त करता है, वो भी भक्ति योगी द्वारा किये जाने वाले प्रयासों के बिना ही। इसके अतिरिक्त, श्रीरामानुज स्वामीजी आगे बतायी गयी अवस्था की चाहत भी करते हैं।

कृत – परभक्ति, परज्ञान, परमभक्ति से जनित

परिपूर्ण – यहाँ इसका अभिप्राय है – भगवान के स्वरुप, रूप, गुण, विभव सभी का एक ही समय में, संपूर्णतः, बिना किसी रूकावट, के प्रत्यक्ष अनुभव दर्शन करने का सामर्थ्य। हमारे शरीर की सिमित ज्ञानेन्द्रियों द्वारा, इन अपरिमित स्वरुप वाले गुणों के आनंद के विषय के बारे में सोचना भी असंभव है। केवल परभक्ति, परज्ञान और परमभक्ति की प्राप्ति के पश्चाद ही, हम भगवान के इन गुणों का आनंद प्राप्त कर सकते हैं।

अनवरतभगवान के गुणों को सदा अनवरत, बिना रुकावट अनुभव करना और आनंद प्राप्त करना।

नित्य – स्थायी; उस समय तक जब तक आत्मा रहती है (क्यूंकि आत्मा अनित्य है, क्षीण नहीं होती, इसीलिए अनुभव भी सदा विद्यमान रहेगा)।

विषाद तम– अनुभव अथवा अनुभूति की तृतीय अवस्था। प्रथम अवस्था विषद है, जो परभक्ति द्वारा प्राप्त होती है। द्वितीय अवस्था विषदतर है, जो परज्ञान के द्वारा प्राप्त की जाती है और अंततः, परमभक्ति द्वारा।

अनन्य प्रयोजनभगवान के गुणों की अनुभूति और आनंद प्राप्त करना, बदले में कुछ भी चाहे बिना। यहाँ तक कि अनुभूति से जनित प्रीति अथवा प्रीति से जनित कैंकर्य भी नहीं। भगवान की अनुभूति केवल अनुभव योग्य ही होना चाहिए, इसमें और कोई प्रयोजन नहीं होना चाहिए।

अनवधिक अतिशय प्रिय – भगवान के प्रति प्रेम की अनुभूति जो अनवरत है, कभी कम नहीं होती, अद्भुत है

भगवदनुभव – वह अनुभव जो आत्मा को अपने अंतिम शरीर (जिसमें शरणागति निवेदन किया गया था) के त्यागने के पश्चाद, अर्चिरादीगति (वह मार्ग जो आत्मा को १२ विभिन्न संसारों से लेकर, विरजा नदी पार श्रीवैकुंठ तक पहुँचाता है) द्वारा परमपद (श्रीवैकुंठ) पहुँचने पर प्राप्त होती है। भगवदनुभव जो हम लीला विभूति में प्राप्त करते हैं, वह सीमित है यद्यपि नित्य विभूति में यह अनुभव असीमित है।

जनित अनवधिक अतिशय प्रीति कारित – भगवदनुभव से प्रीति उत्पन्न होती है, प्रीति – गहरा प्रेम जो सदा उमड़ता हुआ और अद्भुत है।

अशेष अवस्थोचित – किसी को भी त्यागे बिना, सभी अवस्थाओं में, वही कार्य करना जो वे चाहते हैं|

अशेषशेषतैकरतिरूप – जिस प्रकार अनंताल्वान (आदि शेषजी) बहुतेरे कैंकर्य किया करते थे, सभी कैंकर्य करना अपने आप में ही आत्मा के प्रेम का रूप हो जाता है|

नित्य – कैंकर्य एक या दो बार नहीं अपितु सदैव/ नित्य के लिए है; स्थायी। एक बार श्रीवैकुंठ पहुंचे के पश्चाद आत्मा दोबारा अगले जन्म के लिए पृथ्वी पर नहीं आती। इसलिए यह कैंकर्य सदा, नित्य ही वहां उपलब्ध है।

कैंकर्य प्राप्ति अपेक्षया – ऐसे कैंकर्य करने को सदा चाहना

पारमार्थिकी – ऐसे कैंकर्य में कुशलता और पूर्ण रूप से संयुक्त होना

भगवत – जो 6 गुणों को धारण करते हैं, अपने चरण कमलों में शरण/ आश्रय प्रदान करते हैं, बदले में कुछ भी अपेक्षा न करते हुए

चरण अरविन्द – शरणागति के साधन को प्रदर्शित करते हैं

शरणागति– उनके आश्रित होकर रहना इस प्रकार से की केवल वे ही इसके लिए सर्वोत्तम हैं

यथावस्थिता – यथा स्थिति अर्थात धारण न करने योग्य (लौकिक सुखों की चाहना) सभी को त्यागकर, आश्रित होने को जो सर्वोत्तम है अर्थात भगवान के चरण कमल को पकड़े। क्यूंकि यह रहस्य है, यहाँ यह प्रदर्शित नहीं करते कि शरणागति किस प्रकार की जाती है।

अविरस्तास्तु मे – यही मेरी नियति हो, बिना किसी विराम अथवा रूकावट के; अर्थात उनके चरण कमल प्राप्त कर, कैंकर्य सेवा का अवसर प्राप्त करना, यह सभी सदा के लिए बिना विराम के मुझे प्राप्त हो।

अब हम तृतीय और चतुर्थ चूर्णिका की और अग्रसर होंगे, जो बहुत ही छोटी है। यह दोनों ही श्रीरामानुज स्वामीजी की प्रथम दो चूर्णिकाओं के प्रत्युत्तर में श्रीजी द्वारा कही गयी है।

3 चूर्णिका:

चूर्णिका

अस्तु ते II

विस्तृत व्याख्यान

(आपके विषय में) ऐसा ही हो !

4 चूर्णिका:

चूर्णिका

थयैव सर्वं संपतस्यते II

विस्तृत व्याख्यान

आपने जो भी प्रार्थना की है, परमभक्ति से प्रारंभ कर, कैंकर्य सेवा करने पर्यंत, सभी बीच की अवस्थाओं जैसे परमज्ञान, परमभक्ति आदि सहित, सभी आपको प्राप्त हो!

इसके साथ हम शरणागति गद्य के प्रथम भाग को पूर्ण किया, जहाँ श्रीरामानुज स्वामीजी सर्वप्रथम भगवान के चरणों में शरणागति न करते हुए, श्रीजी के चरणों में शरणागति करते है क्यूंकि वे पुरुष्कार भूता रूप में भगवान से हमें अपनाने की सिफारिश करती है। अगले भाग में वे भगवान के चरणों में शरणागति निवेदन करेंगे। यह हम चूर्णिका-5 से देखेंगे।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/12/saranagathi-gadhyam-2-to-4/

संग्रहण – http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य- चूर्णिका 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

शरणागति गद्य

<<< परिचय खंड

namperumal-nachiar_serthi2

emperumanar

अवतारिका (भूमिका)

इस चूर्णिका को द्वयमंत्र के वर्णन के रूप में जाना जाता है। यह सर्वविदित है कि एकमात्र भगवान श्रीमन्नारायण ही सभी फल प्रदान करने वाले हैं, (“सकल फलप्रदो ही विष्णु” – विष्णु धर्म), तब सर्वप्रथम पिराट्टी (श्रीमहालक्ष्मीजी) के श्रीचरणों में शरणागति क्यों? जिस प्रकार बहुत वर्षों से बिछड़ा हुआ पुत्र घर लौटकर सर्वप्रथम माता के पास जाता है और उनसे भेंट करने के पश्चाद ही पिता से भेंट करता है, उसी प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी अनुभव करते हैं कि उन्हें पहले श्री जी के समक्ष जाकर अपनी व्यथा सुनानी चाहिए। और श्रीजी “सुहृदम् सर्वभूतानाम” (वह जो सभी प्राणियों के कल्याण के विषय में सोचती है- भगवत गीता ) भी है। उनके दोनों नेत्रों में, “चन्द्र” है (अर्थात वे केवल करुणापूर्ण/ दयालु है) यद्यपि भगवान के एक नेत्र में तेज/ ताप (“सूर्य”) और दुसरे में स्नेह/ करुणा (“चन्द्र”) है। श्रीरामानुज स्वामीजी विचार करते हैं कि भगवान नारायण के समक्ष जाने पर उनके पिछले कर्मों की ओर देखकर यदि भगवान उनकी ओर क्रोध से देखेंगे तब क्या? इसलिए वे विचार करते हैं कि सर्वप्रथम श्रीमहालक्ष्मीजी के चरण कमलों में शरणागत होना ही उपयुक्त और सुरक्षित है। श्रीमहालक्ष्मीजी की कृपा और आशीष से ही, उनमें भगवान श्रीमन्नारायण से स्वयं को क्षमा करने की प्रार्थना करने का साहस प्राप्त होगा।

चूर्णिका

ॐ भगवाननारायणाभीमतानुरुप स्वरुपगुणविभवैश्वर्य शीलाद्यनवधिकातिशय असंख्येय कल्याण गुणगणां, पद्मवनालयं, भगवतीम्, श्रियं देवीम्, नित्यानपायिनीम, निरवद्याम्, देवदेवदिव्यमहिषिम्, अखिल जगन्मातरम् अस्मन्मातरम् अशरण्य शरण्याम्,अनन्य शरण: शरणमहं प्रपध्ये ।

शब्दार्थ

भगवान – जिनमें आवश्यक छः गुण निहित है (ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेजस, जिन्हें आगे विस्तार में समझाया जायेगा)

नारायण – सभी प्राणी, चेतन और अचेतन दोनों के लिए आश्रय/ निवास

अभिमत – भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय

अनुरूप – भगवान श्रीमन्नारायण के समान ही रूप सौंदर्य

स्वरुप – प्राकृतिक विशेषताएं (जिन्हें बाद में समझाया गया है)

रूप – सौंदर्य

गुण – बहुत से विशिष्ट लक्षण

विभव – अकल्पनीय संपत्ति से युक्त

ऐश्वर्य – प्राणियों को नियंत्रित करने या निर्देशित करने का सामर्थ्य

शील – ऐसे गुण जिनके धारक अपने अनुयायियों के दोषों को नहीं देखते

आदि – और भी बहुत से गुणों से पूर्ण

अनवधिका – कभी कम न होने वाला/ अक्षय

अतिशय – अद्भुत

असंख्य – अगणित, जिनकी गिनती न की जा सके

कल्याण गुण गणं – अत्यंत दिव्य कल्याण गुणों की सेना से युक्त

पद्म वनालयाम – पद्म/ कमलों के वन का आसन, विराजने हेतु

भगवतीम् – भगवान के विषय में बताये गए, सभी 6 गुणों को धारण करनेवाली (अर्थात ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेज)

श्रियं – “श्री” (श्रीमहालक्ष्मीजी, आगे समझाया गया है)

देवीम् – दैदीप्यमान शक्ति से युक्त

नित्यानपायिनीम् – भगवान श्रीमन्नारायण से एक क्षण भी पृथक न होने वाली

निरवद्याम् – बिना किसी दोष के, इन गुणों को धारण करने वाली, स्वयं की प्रतिष्ठा के लिए नहीं, अपितु प्राणियों के कल्याण के लिए

देवदेव दिव्य महिषिम् – सभी देवों के स्वामी, भगवान नारायण की महारानी

अखिल जगन मातरम् – जगत के सभी प्राणियों की माता

अस्मन मातरम् – मेरी भी माता (विशेष गुण)

अशरण्य शरण्य: – जिनका और कोई आश्रय नहीं है, उनके लिए आश्रय

शरणं अहं प्रपद्ये – ऐसे ही दास आपके चरणों में आश्रय लेता है

विस्तृत व्याख्यान

भगवान नारायण– भगवान का अर्थ है वह जिनमें बिना किसी दोष के सभी विशिष्ट गुण निहित है। उन असंख्य गुणों में से, 6 महत्वपूर्ण गुणों को प्रदर्शित किया गया है – ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य/ वीरता, शक्ति, तेज/ कांति। भगवान श्रीमन्नारायण तीन मुख्य भूमिकाएं निभाते हैं – सृष्टि-कर्ता, रक्षक और संहारक। इन तीनों भूमिकाओं में, दो-दो गुण अत्यधिक महत्वपूर्ण है। संहारक की भूमिका में, उन्हें ज्ञान और बल की आवश्यकता होती है। ज्ञान की आवश्यकता यह सुनिश्चित करने के लिए है कि जब भी आत्मा पृथ्वी पर रहने वाली अपनी देह छोड़े तब वह अपने सभी कर्म और सूक्ष्म भूत (पञ्च इन्द्रियाँ) अपने साथ ले जाये और यह सुनिश्चित करने के लिए कि आत्माओं और उनके कर्मों में आपस में कोई उलझन न हो। प्रलय के समय समस्त सृष्टि को पुनः वापस लेने के लिए बल की आवश्यकता है (ब्रह्मा के एक दिन के अंत में सम्पूर्ण संहार)।

सृष्टि-कर्ता की भूमिका में, उन्हें ऐश्वर्य (नियंत्रण) और वीर्य (शक्ति) की आवश्यकता है –यहाँ ऐश्वर्य का बोध संपत्ति से नहीं है, अपितु मुख्यतः आत्मा की यात्रा में उसे नियुक्त, निर्देशित और संचालन करने की क्षमता से है। वीरता – भगवान द्वारा सृष्टि रचना के पश्चाद भी दुर्बल नहीं होने के सामर्थ्य को दर्शाता है। इतने विशाल परिश्रम के पश्चाद भी वे स्वेद से प्रभावित नहीं होते। यही वीरता है।

रक्षक की भूमिका में, उन्हें शक्ति और तेजस की आवश्यकता है – शक्ति, अपने भक्तों की शत्रुओं से रक्षा करने हेतु और तेज (कांति) यह सुनिश्चित करने के लिए कि भक्तों की रक्षा करते हुए, कोई भी शत्रु उनके समीप आकर उन्हें नुक्सान नहीं पहुंचाए।

“नारायण”, संबोधन सभी चेतन और अचेतन प्राणियों के आश्रय रूप में उनकी भूमिका को दर्शाता है। भगवान शब्द का उल्लेख कुछ अन्य लोगों को सम्मान प्रदान करने के लिए भी किया जाता है (उदाहरण के लिए व्यास भगवान, नारद भगवान आदी), परंतु “नारायण” शब्द सिर्फ उस परमात्मा को संबोधित करता है, दोनों ही रूपों से – शब्द के नैसर्गिक अर्थ के अनुसार और शब्द के अक्षरों के संयोजन के अर्थानुसार भी। नारा: शब्द का संदर्भ सभी चेतन (पशुओं, पौधे, मनुष्यों आदि की बहुत सी प्रजातियों से) प्राणियों के समूह से है और अयन अर्थात आश्रय। जब दोनों शब्दों की संधि की जाती है तब पाणिनि व्याकरण के अनुसार, संधि को “नारायण” अभिव्यक्त किया जाता है, जो सिर्फ श्रीमन्नारायण को ही संबोधित करता है। इस प्रकार शब्द “भगवान नारायण”, श्रेष्ठ गुणों को धारण करने वाले और लीला विभूति (संसार) और नित्य विभूति (श्रीवैकुंठ), दोनों विभूतियों के स्वामी के लिए संबोधित किया गया है।

इस संबंध में यह प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि श्रीजी के चरणों में शरणागति निवेदन करते हुए, श्रीरामानुज स्वामीजी ने भगवान नारायण के विषय में चर्चा क्यों की? जिस प्रकार खेत की सिंचाई के लिए जल की और झील के लिए बाँध की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार श्रीजी के अनंत दिव्य गुणों और उनकी दिव्य संपत्ति का वर्णन भी आवश्यक है। जिस प्रकार भगवान नारायण के लिए “श्रीमन” संबोधन किया जाता है, उसी प्रकार श्रीमहालक्ष्मीजी के लिए “विष्णु-पत्नी” संबोधन किया जाता है। श्रीजी के महात्म्य को समझने के लिए, हमें श्रीमन्नारायण के प्रभुत्व को जानना आवश्यक है।

अभिमत अनुरूप – श्रीलक्ष्मीजी सदा भगवान की प्रिया है और उनका सौंदर्य सदा ही भगवान के सौंदर्य के अनुरूप है। अपने सामान्य जीवन में हम उन दंपत्तिओं को देखते हैं, जहाँ दोनों ही सुंदर हो या दोनों ही सदगुणी हो। मात्र दिव्य दंपत्ति में ही हमें दोनों प्रकार के गुण दोनों में देखने को मिलते हैं, अर्थात अभिमत और अनुरूप। दोनों को परस्पर एक दुसरे में क्या प्रिय है और दोनों में परस्पर क्या अनुरूप, इसे आगे समझाया गया है।

स्वरुप रूप गुण विभव ऐश्वर्य शीलादी – अर्थात, श्रीजी का स्वरुप भगवान को प्रिय है और भगवान का स्वरुप श्रीजी को प्रिय है। ऐसा ही उनके सभी गुण विशेषताओं के साथ है। जब रावण सीताजी को श्रीराम का विक्षत शीश दिखाता है और उसी प्रकार जब इंद्रजीत सीताजी का विक्षत शीश श्रीराम को दिखाता है, सर्वप्रथम वे दोनों अचंभित होते हैं परंतु वे जानते थे की यह सत्य नहीं है। यह उस स्वरुप के कारण है, जो उन दोनों को एक दुसरे से प्रिय है। रूप के संदर्भ में भी, वे दोनों एक दूसरे के लिए उपयुक्त है। उनका दिव्य रूप सौंदर्य एक दूसरे को पूर्ण करता है।

यहाँ गुण का संदर्भ दिव्य विग्रह के सौन्दर्य से है– सौंदर्य (दिव्य विग्रह/ तिरुमेनी के संदर्भ में सुंदरता, लावण्य (रूप के सभी तत्वों में सुंदरता)) आदि गुण। इन गुणों के द्वारा श्रीजी भगवान से हमारी ओर दयादृष्टि करने और हमारे अपराधों को क्षमा करने की सिफारिश करती है और इसलिए उनके यह गुण भगवान को बहुत प्रिय है।

विभव अर्थात संपत्ति। यदि श्रीजी वचन हैं, तो भगवान उस वचन का अर्थ हैं। वे दोनों अवियोज्य है। वह सब जो पौरुष है, उस पर भगवान की मोहर है और वह सभी जो स्त्री-लिंग है उन पर श्रीजी की मोहर है। श्रीजी की संपत्ति भगवान को अति प्रिय है और वह संपत्ति उस प्रकार नहीं है जैसी भगवान धारण करते है (पुष्प की माला, चन्दन का लेप, तोता आदि)।

ऐश्वर्य – प्राणियों को नियंत्रित करने या निर्देशित करने का सामर्थ्य। वे तीन प्रकार के चेतनों, जैसे बद्धात्मा (हमारे समान), मुक्तात्मा (जो मोक्ष प्राप्त कर श्रीवैकुंठ में कैंकर्य कर रहे हैं) और नित्यात्मा (जो नित्य अनंत से श्रीवैकुंठ में हैं और हमारे समान संसार में जन्म नहीं लेते) को नियंत्रित करती है, बद्धात्मा को उनके कर्मों के माध्यम से और स्वरुपानुरूप (शेषभूत और पारतंत्रिय के द्वारा, मुक्तात्मा और नित्यात्मा को) नियंत्रित करती है। वे भगवान श्रीमन्नारायण को भी अपने प्रेम और स्नेह के द्वारा उनके पालक/ रक्षक स्वरुप का स्मरण कराती है और यह सुनिश्चित करती है कि वे बद्धात्मा द्वारा शरणागति करने पर उन्हें मोक्ष प्रदान करे। भगवान उनकी इस भूमिका को देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं, क्यूंकि उत्तम पुरुष के विषय में ऐसा कहा गया है कि उत्तम पुरुष अपनी पत्नी के विचारों का सम्मान करते हैं। ऐश्वर्य के विषय में बताई गयी सभी विशेषताएं अन्य गुणों जैसे ज्ञान, बल, वीर्य, शक्ति और तेज के लिए भी उपयुक्त है।

शील – ऐसा गुण जिसके धारक अपने अनुयायियों के दोषों को नहीं देखते; उच्च स्तर के चेतन अपने से नीचे वाले प्राणियों के साथ चलते हैं, उन्हें समान जानते हुए; श्रीजी अपने आचरण और व्यवहार से भगवान के सदृश ही है। श्रीराम अवतार में भगवान ने साधारण सामान्य जनों से प्रेम पूर्वक व्यवहार किया जैसे गुह (केवट), सुग्रीव (वानर राज) और विभीषण (एक राक्षस)। उसीप्रकार श्रीजी ने भी सीताजी के अवतार में उन राक्षसनियों से प्रेम पूर्वक व्यवहार किया जिन्होंने राक्षस रावण की बात मनवाने के लिए उनसे दुर्व्यवहार किया। उन्होंने रावण को भी सचेत किया कि जीवित रहने के लिए उसे श्रीराम से मित्रता कर लेना चाहिए। उन्होंने उसे परामर्श देने में संकोच नहीं किया यद्यपि वह अत्यंत नीच प्रवृत्ति का था। यह गुण भगवान को बहुत प्रिय है क्यूंकि यह भूमिका (पालनहार) भगवान भी प्रायः धारण करते हैं।

आदि – इसका अर्थ है की उपरोक्त वर्णित गुणों से प्रारंभ करते हुए, श्रीजी में ऐसे और भी बहुत से गुण निहित हैं। भगवान के गुणों की व्याख्या करना यद्यपि संभव है परंतु श्रीजी के गुणों के विषय में चर्चा करना असंभव है,- ऐसा व्याख्यानकर्ता श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै का कहना है।

अनवधिकातिशय – उपरोक्त वर्णित सभी गुण, विस्तार के संदर्भ में असीमित है और अद्भुत है।

असंख्य – अगणित गुण

कल्याण गुण गणाम् – यह सभी गुण भी दिव्य है। यह गुण जो भगवान में भी विद्यमान है, परस्पर एक दुसरे के पूरक है। यद्यपि कभी भगवान में दोष देखा जा सकता है– क्यूंकि वे पुर्णतः स्वतंत्र है, परंतु श्रीजी के गुणों में कोई भी दोष नहीं खोज सकता। भगवान का स्वातंत्रियम गुण, उन्हें हमारे द्वारा अपराध करने पर क्रोधित कर सकता है, परंतु श्रीजी हमारे अपराधों को भी सत्कर्मों में परिवर्तित कर देती है। और उनके सभी गुण अत्यंत प्रचुर मात्रा में है।

पद्मवनालयाम् –  इसका संदर्भ दिव्य कल्याण गुणों से है। वे स्वयं श्रीभगवान को दिव्य सुगंध प्रदान करती है, जिन्हें “सर्व गंध:” (सभी सुगंधों का प्रतीक) संबोधित किया जाता है। इसका संदर्भ इससे भी है कि वे भगवान से अत्यंत प्रेमपूर्वक व्यवहार करती है और उनके आनंद/ प्रसन्नता का स्त्रोत है।

भगवतिम् – इस व्याख्यान में उल्लेखित 6 गुण जिन्हें भगवान ने धारण किया है, उन्हें श्रीजी भी धारण करती है। उनकी पूजा करने में भगवान को भी प्रसन्नता होगी। पद्मवनालयां भगवतिम् एक साथ इन दोनों शब्दों का अर्थ है कि यदि शरणागत श्रीजी के द्वारा भगवान तक पहुँचता है, तब वह अपनी मधुरता से सुनिश्चित करती है कि भगवान उस शरणागत के समस्त दोषों पर ध्यान न दे और उन्हें इच्छानुसार मोक्ष प्रदान करेंगे।.

श्रियम् – यद्यपि इस संसार में सभी उनके श्रीचरणों में आश्रय प्राप्त करते हैं, और वे भगवान का आश्रय धारण करती है। वे सभी को नियंत्रित करती है और वे भगवान द्वारा नियंत्रित होती है। यद्यपि वे परस्पर एक दूसरे से अवियोज्य है, जिस प्रकार मणि और उसकी चमक अथवा पुष्प और उसकी सुगंध। श्रियं, “श्री:” शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है सभी में अग्रणी, जिनके नायक भगवान है; वे हमारे रुदन को सुनकर, उस विनती को भगवान के समक्ष पहुँचाती है; वे हमारे सभी पूर्व दुराचारों और अपराधों को क्षमा कर हमें भगवान तक पहुँचाती है।

देविम – संपूर्णतः कांतिमय/ आभायमान।

नित्यानपायिनीम् – सदा सर्वदा भगवान के साथ निवास करती है, और उनसे अविभाज्य है जैसे की विष्णु पुराण में कहा गया है “विष्णोर श्रीरनपायनिम”

निरवद्याम् –किसी दोष/ त्रुटी के बिना, अन्य शब्दों में यदि उपरोक्त उल्लेख किये सभी विशेष गुण उनके साथ स्वयं के आनंद के लिए होते, तब वह दोषयुक्त समझा जाता। परंतु यह सभी गुण उनके आश्रितों को राहत प्रदान करने के लिए है, इसलिए यह संपूर्णतः दोष रहित है।

देवदेव दिव्य महिषिम् –सभी देवताओं के स्वामी की महारानी अर्थात श्रीभगवान की महिषी।

अखिलजगन्मातरम् – सभी प्राणियों की माता (सभी तीन प्रकार की जीवात्माएं)। वे सभी प्राणियों के कल्याण के लिए सदा चिंतित रहती है।

असमान मातरम् – श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं को ऐसे ही प्राणी के रूप में बोध करते हैं, परंतु किंचित विशेष टिपण्णी में श्रीजी को अपनी माता के रूप में भी पृथक उल्लेख करते हैं।

अशरण्य शरण्याम् – उनके लिए अंतिम आश्रय, जिनका और कोई आश्रय नहीं है। यदि हम किंचित मात्र भी अच्छे गुण प्रदर्शित करते हैं, तो वे हमारे सभी दोषों और अपराधों को क्षमा करती है। और यद्यपि हममें किंचित मात्र भी अच्छे गुण नहीं है, तब भी वे हमारे दोषों की उपेक्षा करती है। साधारणतय भगवान श्रीमन्नारायण ही निराश्रितों के अंतिम आश्रय हैं। परंतु उन प्राणियों के लिए जिनके लिए भगवान को प्राप्त करना दुर्लभ है, श्रीजी ही अंतिम आश्रय है।

अनन्यशरण: अहं – श्रीजी पूछती है – क्या ऐसा कोई है जिसका और कोई आश्रय नहीं है? श्रीरामानुज स्वामीजी निवेदन करते हैं “अहं” (अर्थात मैं) ही वो किंचित व्यक्ति हूँ।

शरणं प्रपध्ये – “ऐसा मनुष्य जिसके पास कोई और आश्रय नहीं है और जो आपकी शरण में आया है, अब उपाय स्वरुप आपके श्रीचरण कमलों में शरणागति निवेदन करता है,” प्रथम चूर्णिका के इस अंतिम पद में श्रीरामानुज स्वामीजी यही अनुरोध करते हैं।

अब हम द्वितीय चूर्णिका की ओर अग्रसर होंगे।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/11/saranagathi-gadhyam-1/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य – प्रवेश (परिचय खंड)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

शरणागति गद्य

<< तनियन

namperumal-nachiar_serthiश्रीनम्पेरुमाल और श्रीरंगनाच्चियार – श्रीरंगम

श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान का मुख्य आकर्षण

श्रीरामानुज स्वामीजी ने अपने प्रबंध श्रीभाष्य में मोक्ष (संसार से मुक्ति) प्राप्ति के लिए भक्ति योग की व्याख्या की है। श्रीभाष्य की रचना, कुदृष्टियों (वह जो वेदों का गलत अर्थ करते हैं) के तर्क का विरोध करने के लिए की गयी थी, जिनका मत था कि केवल ज्ञान योग से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। श्रीरामानुज स्वामीजी इस बात से चिंतित थे कि श्रीभाष्य में वर्णित निर्णय से उनके अनुयायी और शिष्यजन यही विचार करेंगे कि मात्र भक्ति योग के द्वारा ही इस संसार से मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त किया जा सकता है और वे मोक्ष प्राप्ति के लिए उसका ही अनुसरण करेंगे।

शरणागति गद्य में उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए शरणागति (भगवान श्रीमन्नारायण के आश्रित होना) के मार्ग पर विशेष ज़ोर दिया है। यहाँ एक प्रश्न मन में उठ सकता है कि जब शरणागति ही मोक्ष का मार्ग है, तब कूदृष्टियों के विरोध में “श्रीभाष्य” ग्रंथ में उन्होंने इस मार्ग की व्याख्या क्यों नहीं की? इसका कारण यह है कि जिस प्रकार एक ब्राह्मण चतुर्थ वर्ण के मनुष्य को वेद नहीं सिखा सकता, उसी प्रकार शरणागति के पवित्र रहस्य अर्थों को सर्वसामान्य में इस प्रकार प्रकट नहीं किया जा सकता।

मोक्ष प्राप्ति के लिए शरणागति, भक्ति योग से किस प्रकार से श्रेष्ठ है?

  • भक्ति, त्रयवर्णिकाओं तक ही सीमित है (प्रथम तीन वर्णों के लिए अर्थात- ब्राहमण, क्षत्रिय और वैश्य और इन तीन वर्णों में भी मात्र पुरुषों के लिए) परंतु शरणागति बिना किसी भेद के किसी भी प्राणी द्वारा की जा सकती है।
  • भक्ति का मार्ग कठिन है यद्यपि शरणागति का मार्ग अत्यंत सुलभ और सुगम है।
  • भक्ति के परिणाम, भक्त को तब प्राप्त होता है, जब उसके सभी प्रारब्ध कर्मों की समाप्ति होती है (कर्म दो प्रकार के होते हैं, संचित और प्रारब्ध :-
  • संचित कर्म उन सभी कर्मों का योग है, जो जीवात्मा ने अगणित जन्मों में उपार्जित किया है।
  • प्रारब्ध कर्म – संचित कर्म की गठरी से एक हिस्से के रूप में बाहर लेकर जीवात्मा को अपने कर्म के अनुसार पाप और पूण्य के रूप में इस संसार में बिताने की सुविधा दिया जाता है।
  • परंतु शरणागति का परिणाम उसी जन्म में प्राप्त होता है, जिस जन्म में आत्मा द्वारा शरणागति की जाती है।
  • भक्ति के मार्ग का अनुसरण करते हुए, भक्त को यह सावधानी रखनी चाहिए कि वेदों में कहे गए निर्देशों का उल्लंघन न हो। यद्यपि शरणागति के मार्ग में ऐसा नहीं है, क्यूंकि शरणागति करना तो अत्यंत सुगम है। भक्ति करने के लिए बहुत से प्रयास करने पड़ते हैं परंतु शरणागति सदा ही अभ्यास हेतु सहज है।
  • भक्ति का मार्ग आत्मा के स्वरुप के अनुरूप नहीं है, यद्यपि शरणागति स्वरुप अनुरूप है। अन्य शब्दों में, आत्मा का स्वरुप श्रीमन्नारायण भगवान के सेवक/ दास (शेषभूत) और उनके आश्रित (परतंत्र) बनकर रहना है और यह सभी शरणागति के मार्ग के अनुसरण से ही पूर्ण हो सकता है, जबकि भक्ति आत्मा द्वारा स्व-प्रयासों से की जाती है, जो आत्मा के स्वरुप के विपरीत है।
  • भक्ति मार्ग के माध्यम से जो परिणाम प्राप्त होता है ( मोक्ष अथवा भगवान के चरण कमल ) वो माध्यम इस परिणाम का लायक नहीं है किन्तु शरणागति माध्यम इस उच्च और श्रेष्ट परिणाम का यथोचित माध्यम है |

वेदांत में भी शरणागति का उल्लेख प्राप्त होता है। याग्निकीय उपनिषद् में, जीवात्मा के लिए द्वादश (१२) विशेष गुणों का उल्लेख किया गया है और उन सभी द्वादश गुणों में सबसे उंचा स्थान शरणागति को दिया गया है। शरणागति पूर्वाचार्यों द्वारा अनुसरण की गयी है और भगवान श्रीमन्नारायण को सबसे प्रिय है। इसलिए, वेदांत द्वारा स्वीकृत, जीवात्मा के स्वरुप के अनुरूप, आलवारों और पूर्वाचार्यों द्वारा अनुसरण की जाने वाली और भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय, शरणागति के इन गुणों को जानकार, श्रीरामानुज स्वामीजी ने शरणागति के विषय पर व्याख्या की, जिससे उनके अनुयायी भी शरणागति का लाभ ले सकें।

उन्होंने शरणागति के लिए उत्तर फाल्गुनी के दिन का चयन किया, जिस दिन श्रीनम्पेरुमाल और श्रीरंगनाच्चियार संग में विराजमान होकर दासों को दर्शन देते हैं। उनके मानस में संसार की सभी बाधाओं का सतत विचार चल रहा था और उनसे मुक्ति प्राप्त करने के लिए, उन्होंने दिव्य दंपत्ति के चरणों में शरणागति की। अपने आचार्य श्रीमहापूर्ण स्वामीजी द्वारा समाश्रयण प्राप्त करते हुए भी श्रीरामानुज स्वामीजी ने भगवान के चरणों में शरणागति की थी। जब शरणागति एक ही बार की जाती है, तब श्रीरामानुज स्वामीजी ने पुनः दिव्य दंपत्ति के चरणों में शरणागति क्यों की? संसार के भयानक रूप को जानकार और भगवान से शीघ्रातिशीघ्र मिलने की उत्कट चाहते हुए उन्होंने पुनः शरणागति की। यहाँ तक की आलवारों ने भी बारम्बार शरणागति की है (श्रीशठकोप स्वामीजी ने 5 बार और श्रीपरकाल स्वामीजी ने, 10 बार)। यही आचार्यों ने भी किया है। इसलिए इस संसार से मुक्ति प्राप्त करने के लिए और श्रीवैकुंठ में दिव्य दंपत्ति के कैंकर्य प्राप्ति हेतु, उन्होंने शरणागति की।

अब हम इस प्रबंध की प्रथम चूर्णिका की ओर अग्रसर होते हैं।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/11/saranagathi-gadhyam-introduction/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य- तनियन

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

शरणागति गद्य
ramanujar-periyavachanpillai

श्रीरामानुज स्वामीजीश्रीपेरियवाच्चान पिल्लै

श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै की तनियन (उनके अद्भुत व्याख्यान के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिए यह तनियन प्रस्तुत की गयी है) –

श्रीमत कृष्ण समाह्वाय नमो यामुन शूनवे|
यत कटाक्षैक लक्ष्याणम् सुलभ: श्रीधरस्सदा ||

अर्थात: मैं श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै स्वामीजी के चरणों की आराधना करता हूँ, जो श्रीयामुन के सुपुत्र है और जिनकी कृपाकटाक्ष से अत्यंत ही सुलभता से भगवान श्रीमन्नारायण की कृपा प्राप्त होती है।

शरणागति गद्य की तनियन –

वन्दे वेदांत कर्पूर चामीकर करंडकम
रामनुजार्यमार्याणाम चूड़ामणिमहर्निषम्

अर्थात: मैं, दिन-रात श्रीरामानुज स्वामीजी की आराधना करता हूँ, जो सभी आचार्यों के मुकुटमणि के समान है, और जो उस स्वर्णिम कोष के समान है- जो कपूर जैसी सुगंध वाले वेदांत की रक्षा करते है।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/11/saranagathi-gadyam-thaniyans/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

शरणागति गद्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

भगवद श्रीरामानुज स्वामीजी ने नौ उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की– श्रीभाष्य, वेदांत सारम, वेदांत दीपम, वेदार्थ संग्रहम, गीता भाष्यम, नित्य ग्रंथ, शरणागति गद्यम, श्रीरंग गद्यम और श्रीवैकुंठ गद्यम।

प्रथम तीन ग्रंथ, ब्रह्म सूत्र से सम्बंधित है, चतुर्थ ग्रंथ, वेदांत के कुछ विशिष्ट छंदों से संबंधित है, पंचम ग्रंथ, भगवद गीता पर रचित व्याख्यान है और नित्य ग्रंथ, श्रीवैष्णवों द्वारा किये जाने वाले दैनिक अनुष्ठानों (विशेषतः तिरुवाराधन) से संबंधित है।

अंतिम तीन ग्रंथ हमारे सिद्धांत की जीवनरेखा हैं– यह शरणागति के स्वरुप और उसे कैसे अनुसरण किया जाता है, उस विषय में अत्यंत सुंदर वर्णन प्रदान करता है। गद्य अर्थात छंदरहित और त्रय अर्थात तीन। क्यूंकि इस श्रृंखला में त्रय/ तीन गद्य हैं, इसलिए एक रूप में इसे गद्य त्रय भी कहा जाता है। हमारे पूर्वाचार्यों ने इन गद्य त्रय को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया है। यही कारण है कि जिनमें अन्य दिव्य संप्रदाय ग्रंथों के सार को आत्मसात करने का सामर्थ्य नहीं है, वे भी अपने आचार्य की कृपा से इन तीन ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आज की अत्यंत तेज जीवनशैली में, कभी-कभी आचार्य के लिए अपने अनुयायियों को इनके समस्त अर्थों का ज्ञान प्रदान करना कठिन हो जाता है। इसलिए इन तीन गद्यों की विशेषता को लेखों की श्रृंखला द्वारा समझाने का यह एक छोटा सा प्रयास है।

namperumal-nachiyar-serthiश्रीरंगनाच्चियार और श्रीरंगनाथ भगवान– श्रीरंगमramanuja-srirangam श्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीरंगम

श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीरंगम में पेरिय पिराट्टियार के तिरुनक्षत्र दिवस, उत्तर-फाल्गुन का चयन कर, उस दिन दिव्य दंपत्ति के श्रीचरणों में शरणागति की और अपने अनुयायियों को भी अनुकरणीय मार्ग दर्शाया। इस दिन श्रीरंगम में श्रीरंगनाथ भगवान और श्रीरंगनाच्चियार दोनों एक ही सिंहासन पर विराजमान होकर अपने दासों पर कृपा करते हैं। यह वर्ष का एकमात्र दिवस है, जब दिव्य दंपत्ति एक साथ विराजते हैं। श्रीरंगनाच्चियार के साथ विराजे भगवान श्रीरंगनाथ अपना सख्त स्वरुप त्यागकर, अपने दासों पर दया करते हैं। इसलिए श्रीरामानुज स्वामीजी ने इस दिन का चयन किया।

सर्वप्रथम उन्होंने पेरिय पिराट्टीयार के श्रीचरणों में शरणागति की, और तद्पश्चात नम्पेरुमाल के श्रीचरणों में। शरणागति गद्य में इसी की व्याख्या की गयी है। फिर उन्होंने श्रीरंग गद्य की रचना की, जो विशेषतः श्रीरंगम में विराजे नम्पेरुमाल के प्रति समर्पित है। तृतीय गद्य (श्रीवैकुंठ गद्य) में श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीवैकुंठ की विशेषताओं का वर्णन करते हैं, जिससे प्रपन्न (वह प्राणी जो प्रपत्ति अथवा शरणागति करता है) उस स्थान के महत्त्व को समझ सके जहाँ मोक्ष (लौकिक संसार से, जन्म मरण के चक्र से मुक्ति) प्राप्ति पर उन्हें जाना है।

periyavachan-pillaiश्रीपेरियवाच्चान पिल्लै

इस गद्य के अर्थों का प्रयास, परमकरुणाकर श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान पर आधारित है। शरणागति गद्य में 23 चूर्णिकायें हैं (एक चूर्णिका लगभग एक परिच्छेद के समान है)। सर्वप्रथम प्रत्येक चूर्णिका के शब्दों का अर्थ समझाया गया है और फिर श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान के माध्यम से श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा प्रकट किये गए सार को समझाया गया है। हम श्रीवेलुक्कुड़ी श्री उ.वे. कृष्णन स्वामीजी के आभारी हैं, जिनके कालक्षेप के द्वारा श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै के अद्भुत व्याख्यान को समझने में सहायता प्राप्त हुई।

अब हम इस अद्भुत ग्रंथ के हिंदी अनुवाद को प्रारंभ करेंगे।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

अंग्रेजी संस्करण – http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/11/saranagathi-gadhyam/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

SrIvaikuNta gadhyam – pravESam

SrI: SrImathE SatakOpAya nama: SrImathE rAmAnujAya nama: SrImath varavaramunayE nama:

Full Series

<< Previous

paramapadhanathan

Let us now look at SrI periyavAchchAn piLLai‘s pravESam (introduction) for SrIvaikuNta gadhyam.

bhAshyakArar (another name of SrI rAmAnuja which means the author of SrI bhAshyam which is a detailed commentary for vEdha vyAsa’s brahma sUthram) feels that the meanings that sprang from his heart should not remain as the shadow of a palm tree (the shadow of a palm tree would give shelter only to the palm trunk and not to anyone else) but should be useful to humanity-at-large like the shadow of a kalpakatharu (a type of tree whose shadow covers a wide area and fulfills the wishes of those who pray under it). Hence, he acts as a pravarthakar (one who engages in doing something) to show the path as well as the fruit of attaining the path in SrIvaikuNta gadhyam. In SaraNAgathi gadhyam he prays to bhagavAn in general (not to any particular form of bhagavAn) about his wishes. In SrIranga gadhyam, he prays to SrIrangam periya perumAL who is the epitome of saulabhyam (easy to approach and attain) about his wishes. In SrIvaikuNta gadhyam, he discourses about SrIvaikuNtanAthan (lord of SrIvaikuNtam) to others.

periyavAchchAn piLLai digresses a bit at this stage to explain why SrI rAmAnuja emphasised on bhakthi mArgam (path of devotion) to attain bhagavAn in his SrIbhAshyam whereas he emphasises on SaraNagathi (surrendering) in gadhya thrayam. When bhagavadh rAmAnuja wrote SrIbhAshyam, there were many branches of sanAthana dharmam (traditional customs), each with its own followers. There was a sect which said that there is nothing called as vEdha (the four vEdhas, rig, yajur, sAma and atharvaNa) and not practicing any dharmam is the path to attain liberation (this sect is called as chAruvAka matham, a belief of smart talking). There was another sect which said that dhEvathAntharOpAsanam (worshipping other demi-Gods such as indhra, chandra, brahmA, Siva et al) is the path to attain liberation. Yet another sect preached that doing karma (following all the activities mentioned in vEdha), forgetting about God and demi-Gods, would liberate us (this sect was called as mImAmsaka matham). Another said that gyAna (knowledge) is the path to liberation. Another said that the combination of karma and gyAna is the path. All these people twisted the teachings of vEdha to suit their own ends. They were called as vEdha bhAhyA (not accepting vEdha) and vEdha kudhushti (twisting meanings of vEdha). SrI rAmAnuja had to counter these sects and he said that whatever they were saying was not correct and that bhakthi, aided by karma and gyAna (devotion supported by deed and knowledge) was the path to attain mOksham (liberation). He cited reasons and various pramANams (proofs) to support his arguments. SaraNAgathi has always been  cited in vEdha to attain mOksham. Yet SrI rAmAnuja cited bhakthi yOgam as the path. Why did he do this and not cite SaraNAgathi itself? We should consider the time (period) when all these were happening.  That was the age when people believed that they had to do something on their own to attain mOksham. If he had to say that there was no need to do anything and all that one had to do was to surrender to bhagavAn, no one would have taken his words since this did not involve doing something which was physical in nature. Hence he had to point out to one of the two paths mentioned in vEdha (bhakthi and prapaththi or SaraNAgathi). Once they were convinced that bhakthi would set them free, they started understanding it better. And, they also found that it was not easy to practice as it had several conditions (karma and gyAna should be attained in full prior to practicing bhakthi; all hurdles in the path of bhakthi had to be removed). Also, it would take many, many births before one could start practicing bhakthi. And at the last moment, one had to think of bhagavAn.  All these posed great difficulties. It was then that he told them that there was another path available and mentioned about prapaththi (or SaraNAgathi) in SaraNAgathi gadhyam. This is called as charama upAyam (ultimate path) and is suited for practicing bhakthi, not as a means for attaining mOksham but for enjoying various qualities of bhagavAn) and for attaining bhagavAn’s exalted feet and carrying out kainkaryam to him. He mentioned in SrIranga gadhyam that prapaththi is the prerequisite for carrying out bhakthi; but at the same time prapaththi does not expect anything else for yielding fruit, it is our svarUpam (aligns with our nature) and it is easy to perform. Now that clarity has been obtained on the path to be taken for getting liberated he mentions about the place that one would reach on getting liberated; the lord, bhagavAn, of the place (SrIvaikuNtanAthan), experiencing that bhagavAn; and carrying out kainkaryam, born out of that experience. He does all these so that those who hear this would get interested in carrying out all these and in the end he also blesses them. He mentions very briefly about the path (prapaththi) but mentions more expansively about the place (SrIvaikuNtam).

There are 6 chUrNais in SrivaikuNta gadhyam. In the 1st chUrNai, he describes the svarUpam (basic nature), rUpam (form) and vibhUthi (wealth) of bhagavAn as well as chEthnan‘s (sentient entity) faults; for such a chEthanan, prapaththi is the only path to reach bhagavAn who is the repository of all auspicious qualities such as souSeelya (simplicity personified) etc. In the 2nd chUrNai, he affirms that while reciting dhvayam once is sufficient to reach bhagavAn, the chEthanan will recite it everyday to ward off worries and to pass time purposefully. In the 3rd chUrNai, he mentions about the path that the chEthanan will take on getting liberated (archirAdhi mArgam or the path of radiance) including crossing the prakruthi boundary (materialistic realm); the greatness of nithya vibhUthi (SrIvaikuNtam) that he enters; its qualities; the decorations in that place; the resplendence with which bhagavAn gives dharSan (audience) there with his consorts (SrIdhEvi, bhUdhEvi and neeLAdhEvi); the elegance of bhagavAn with all exalted bodily features which are experienced by his consorts; the beauty of various decorative jewels that adorn bhagavAn, fitting to a nicety; the weaponry that protect all these; the nithyaSuris and mukthAthmAs who experience all these, taking various forms, and carrying out kainkaryam born out of love from that experience; the exalted seating of bhagavAn who is being served by these nithyAthmAs and mukthAthmAs without any break; the thought of chEthanan on seeing all these, wondering when he would get an opportunity to serve bhagavAn like this, and on attaining SrIvaikuNtam, praying to bhagavAn for granting him kainkaryam and offering himself to bhagavAn. In the 4th chUrNai, he mentions that bhagavAn grants chEthanan his wish and chEthanan starts carrying out kainkaryam. In the 5th chUrNai, he mentions about the chEthanan constantly having dharshan (vision) of bhagavAn, without batting an eyelid, to compensate for what he had lost all these years that he had missed. The 6th chUrNai describes how bhagavAn welcomes him, inquires him and blesses him by placing his exalted feet on the head of chEthanan who exults as a servitor in SrIvaikuNtam.

Let us next see the first chUrNai.

<< Previous

Translation by krishNa rAmAnuja dhAsan.

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org