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आर्ति प्रबंधं – २५

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २४

 

उपक्षेप

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि एक काल्पनिक प्रश्न उठाते हैं। उनका मानना हैं कि यह शायद श्री रामानुज के मन में होगा और इसका अब मणवाळ मामुनि, इस पासुरम में उत्तर देतें हैं। , श्री रामानुज, मणवाळ मामुनि से (काल्पनिक) प्रश्न करतें हैं , “ हे मणवाळ मामुनि! आपने अपने पापों के हिसाब न लेते हुए, कैंकर्य की प्रार्थना की हैं, इस विषय में, अब मैं क्या करूँ?कृपया उत्तर दीजिये।” मणवाळ मामुनि प्रस्ताव करते हैं , “हे! श्री रामानुज! आश्रय उपहार किये दिन से आज तक , आप मेरे पापो को सहते रहें। मेरे पास योग्यता न होने पर भी, आप  परमपद की आश्वासन दिए।  अब, और विलंब के बिना कृपया तुरंत मोक्ष उपहार कीजिये।”

पासुरम २५

एन्रु निरेतुगमाग एन्नै अभिमानित्तु
यानुम अदरिंदु उनक्केयायिरुक्कुम वगै सैदाई
अन्रू मुदल इन्रळवुम अनवरतम पिळैये
अडुतडुत्तु चेयवदु अनुतविप्पदु इनिच्चेय्येन
एन्रु उन्नै वंदु इरप्पदाम एन कोदूमैं कणडुम
इगळादे इरवुपगल अडिमै कोणडु पोंदाय
इन्रु तिरुनाडुम एनक्कु अरुळ एण्णुगिनराय
इनि कडूग चैदरुळवेणडुम एतिरासा !

शब्दार्थ

एतिरासा – हे ! एतिरासा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता !
एन्रु –  जिस दिन से
निरेतुगमाग – (जब आप ) बिना कारण के
एन्नै – मेरे प्रति यह सोच कर
अभिमानित्तु – कि “मैं (मणवाळ मामुनि) आपका हूँ”
यानुम  – मैं भी
अदरिंदु – समझकर
उनक्के – (और सेवा की ) केवल आपके प्रति
आयिरुक्कुम – (और मुझे बनाया ) केवल आपकी वस्तु
सैदाई – आपने यह किया, हैं न ?
वगै – (आपके प्रति) ऐसे (भाव होने केलिए )
अन्रू मुदल – उस दिन से
इन्रळवुम – अब तक
अनवरतम – (मैं) सदा
अडुतडुत्तु – लगातार
चेयवदु
कर रहा हूँ
पिळैये – केवल पाप
अनुतविप्पदु – और उन पापो केलिए  तुरंत  पछताता हूँ
इनि – आगे
चेय्येन एन्रु – (ये पाप) नहीं करनी चाहिए
उन्नै वंदु इरप्पदाम – और आपसे सहारा की प्रार्थना करता हूँ
एन कोडूमै कणडुम – आप, मेरे क्रूर पाप देखने पर भी
इगळादे – कभी अस्वीकार या द्वेष न करते हैं
अडिमै कोंडु पोंदाय – (बल्कि) आप के चरण कमलों के प्रति मेरे कैंकर्य स्वीकार करते हैं
इरवुपगल – दिन और रात
इन्रु – (और ) आज
एण्णुगिन्राय – आप विचार कर रहें हैं
अरुळ – आशीर्वाद करने
एनक्कु – मुझे
तिरुनाडुम – परमपद के सात
इनि कडुग – अतः, शीघ्र
चेयदु अरुळवेणडूम – यह उपहार करें

सरल अनुवाद

इस पासुरम में, मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से शीघ्र ही परमपद प्राप्ति उपहार करने की प्रार्थना करते हैं। वें कहते हैं कि “मणवाळ मामुनि मेरे हैं”, समझ कर जिस दिन श्री रामानुज आश्रय दिए, तब से , आज तक वे लगातार अनेक पाप करते रहें।  ये पाप करने के पश्चात तुरंत पछताने पर भी वें पाप करने से रूखे नहीं। लंबे समय से यही हो रहा है, किन्तु श्री रामानुज न ही उन पापो पर विचार किये न ही मणवाळ मामुनि के प्रति द्वेष बढ़ाये। मामुनि कहते हैं कि, बल्कि श्री रामानुज उन्को निश्चित रूप में अपने चरण कमलों के प्रति अविछिन्न कैंकर्य उपहार करते रहें। और आज परमपद उपहार करने पर भी विचार कर रहें हैं। मामुनि प्रश्न करतें हैं कि ऐसी स्थिति में विलंब क्यों ? और तुरंत आशीर्वाद करने केलिए प्रार्थना करते हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे ! यतियों के नेता ! “यह आत्मा मेरा हैं”, ऐसे विचार से आपने इस आत्मा पर कृपा किया हैं।  आपकी कृपा निर्हेतुक, बिना हेतु या कारण की हैं। इसकी मुझे जानकारी हैं और आपके कृपा या आशीर्वाद के कारण मैं केवल आपके उपयोग का वस्तु बना।  उस दिन से अब तक मैंने लगातार अविछिन्न रूप में पाप ही किये हैं।  उस्केलिये तुरंत पछतावे से आपसे ही सहारा की प्रार्थना करता हूँ।  मेरे इन पापो के कारण आपने मुझे अस्वीकार या मेरे प्रति द्वेष नहीं दिखाए।  बल्कि आपके चरण कमलों के प्रति अविछिन्न कैंकर्य की उपहार किये।  और इस से बढ़ कर, मुझे परमपद उपहार करने का भी सोचे, जिसकी मेरी योग्यता ही नहीं हैं।  यह निश्चय करने के पश्चात विलंब क्यों ? आप से ,शीघ्र ही आशीर्वाद करने की प्रार्थना करता हूँ।”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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Arththi prabandham – 56

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Introduction

In the previous pAsuram, mAmunigaL said “madhurakavi sorppadiyE nilayAgap peRROm”. In relation to that and as a logical next step to it, in this pAsuram, he requests for eternal service at the lotus feet of emperumAnAr.

pAsuram 56

undhan abhimAnamE uththArakam enRu
sindhai theLindhirukka cheydha nI
andhO yathirAsA! nOygaLal ennai nalakkAmal
sadhirAga nin thiruththAL thA

Word-by-Word Meanings

ethirAsA! – hey the leader of yathis (ascetics)!!!
undhan abhimAnamE uththArakam enRu – As piLLai lOkAchAryar says “AchArya abhimAnamE uththArakam (SrI vachana bhUshaNam 447), the devotion and care that you (emperumAnAr) have towards me is the sole determining factor for a soul’s upliftment.
sindhai theLindhirukka cheydha nI – This point has been etched in my mind forever. As they say, “theLivuRRa sindhaiyar (thiruvAimozhi 7.5.11)”, you (emperumAnAr) had blessed my heart to be pure (without any dirt) forever.
andhO – Alas!!!
thA – You have to bestow
ennai – me
sadhirAga – intelligently
nin thiruththAL – (with service) to your lotus feet
nalakkAmal – without being affected
nOygaLal – with sufferings

Simple Translation

mAmunigaL requests kainkaryam at the lotus feet of emperumAnAr. This is following to what he said in the previous pAsuram “madhurakavi sorppadiyE nilayAgap peRROm”. He says that it was emperumAnAr who bestowed him with the knowledge about “what AchAryan thinks about you and how much devotes he is about you is what matters”. Even this knowledge is able to live in my mind and heart through his grace. Alas! He requests all his sufferings to end and requests emperumAnAr to smartly make a move and take him unto his lotus feet.

Explanation

mAmunigaL says “hey! the leader of yathis. You are the person who preached and bestowed me with the knowledge of the phrase “AchArya abhimAnamE uththArakam (srivachanabhUshaNam 447). Based on that, your love and devotion towards me counts as everything for me. This philosophy has been so rooted in me as described in “theLivuRRa sindhaiyar (thiruvAimozhi 7.5.11)”. With your blessings, I am living by it. Alas! Please do not make me suffer more with pains in this world. As you said in SaraNAgathi gadhyam, “sukhEnEmAm prakruthim sthUla sUkshma rUpAm visrujya”, you should take me intelligently to your lotus feet and bless me with eternal service to them as per “un padha yugamAm yEr koNda vIdu (rAmAnusa nURRanthAdhi 83).

adiyEn santhAnam ramanuja dasan

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आर्ति प्रबंधं – २४

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २३

paramapadham

उपक्षेप

साँसारिक संबंध के हटने से, अत्यंत सौभाग्य स्तिथि जो हैं ,परम श्रेयसी आचार्यो के मध्य पहुँचने तक के घटनाओँ की विवरण इस पासुरम में मणवाळ मामुनि प्रस्तुत करते हैं।   

पासुरम

इंद उडल विटटु इरविमंडलत्तूडु येगी
इव्वणडम कळित्तु इडैयिल आवरणमेळ पोय
अन्दमिल पाळ कडन्दु अळगार  विरसैतनिल कुळित्तु अंगु
अमानवनाल ओळि कोण्ड सोदियुम पेट्रु अमरर
वंदु एदिरकोणडु अलंकरित्तु वाळ्त्ति वळिनडत्त
वैकुंतम पुक्कु मणिमण्डपत्तु चेन्रु
नम तिरुमालडियारगळ कुळाङ्गळुडन
नाळ एनक्कु कुरुगुम वगै नल्गु एन एतिरासा

शब्दार्थ

एन एतिरासा – हे! एतिरासा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता !
नल्गु – कृपया आशीर्वाद करें
एनक्कु – मुझे
कुरुगुम वगै – कि आज से उस भाग्यवान दिन की अंतर शीघ्र कम हो
कूडुम नाळ – वही सौभाग्य दिन हैं जब मैं मिलूँगा,
नम तिरुमालडियारगळ – हमारे स्वामियां (जो स्वयं श्री:पति श्रीमन नारायण के दास हैं ) जो हैं नित्यसुरियाँ
कुळाङ्गळुडन – और उन्के गण में एक हों
इंद उडल – दोषों से भरे इस अनित्य शरीर
विटटु – के छूटने पर
इरविमंडलत्तूडु येगी – सूर्य मंडल को पार कर
कळित्तु – पार करता हैं
इव्वणडम – यह सँसार
इडैयिल – जो बीच में है
आवरणमेळ पोय – (इसके पश्चात ) सात सागरों को पार करता है
पाळ कडन्दु – “मूल प्रकृति” को पार कर
अन्दमिल – जिस्को असीमित कहा जाता है
अळगार – अंत में जो अति सुन्दर हैं, वहाँ पहुँचता है
विरसैतनिल – “व्रजा” नामक नदि
कुळित्तु – पुण्य स्नान करता है
अंगु – वहाँ
अमानवनाल – “अमानवन” के स्पर्श से उठता है
ओळि कोण्ड सोदियुम पेट्रु – और इससे परिणामित, तेजोमय दिव्य शरीर प्राप्त होता है
अमरर वंदु एदिरकोणडु – इसके पश्चात नित्यसुरियाँ आकर स्वागत करतें हैं
अलंकरित्तु – श्रृंगार करते हैं
वाळ्ति – गुणगान करतें हैं
वळिनडत्त – और मुझें (नए शरीर में ) लेकर जाते हैं
वैकुंतम पुक्कु – श्रीवैकुंटम के पथ में
मणिमण्डपत्तु चेन्रु – और “तिरुमामणि मंडप” नामक वेदी पहुँचता है

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, अब के और नित्यसुरियों के संग रहने के, बीच के समय के अंतर को शीघ्र कम करने की प्रार्थना करते हैं। शरीर के घिरने के पश्चात, आने वाली यात्रा की विवरण कि यहाँ प्रस्ताव करते हैं। जीवात्मा, सूर्य मंडल, अण्ड, सात सागर जैसे अनेक जगहों को पार कर, अंत में , “व्रजा” नामक नदी को पहुँचती है।  उस नदी में पुण्य स्नान करने के पश्चात, अमानवन के स्पर्श से उठकर, नयी तेजोमय शरीर पाती हैं। नित्यसूरिया आकर, स्वागत कर, श्रृंगार कर, उसे तिरुमामणि मण्डप तक ले जातें हैं जहाँ श्री:पति श्रीमन नारायण विराजमान हैं।  मणवाळ मामुनि की प्रार्थना हैं कि वे अब और नित्यसुरियों के नित्य निवास तक पहुँचने के समय के अंतर को शीघ्र कम करें।  

स्पष्टीकरण 

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे! मेरे स्वामी ! यतियों (सन्यासियों ) के नेता ! (तिरुवाय्मोळि १०. ७. ३ ) “इम्मायवाक्कै” के अनुसार मेरा अनित्य शरीर दोषों से भरा है। इसमें इच्छा नहीं रखनी चाहिए और (तिरुवाय्मोळि १०. ७. ९) के “मंग ओटटु” के प्रकार नाश होनी चाहिए। इसके पश्चात जीवात्मा , (पेरिय तिरुमडल १६) के “मण्णुम कडुम कदिरोन मण्डलत्तिन नन्नडुवुळ” के प्रकार सूर्य मंडल से लेकर अनेकों लोकों को पार करता है। इसके बाद, “आदिवाहिकस” नामक लोगों के लोक को पर करता है। और (तिरुवाय्मोळि ४. ९. ८ ) के वचन “इमयोर्वाळ तनि मुटटै कोटटै” के अनुसार, एक करोड़ योजनों की देवों के लोक पार  करता है। इसके पश्चात, (तिरुवाय्मोळि १०. १०. १०) के “मुडिविल पेरुम पाळ” वचन से चित्रित असीमित मूल प्रकृति को सात समुंदरों को पार कर पहुँचता है। इस्के पश्चात अति सुंदर “व्रजा” नदी को जीवात्मा पहुँचता है।  यहाँ पुण्य  स्नान करने के बाद, “अमानवन” नामक व्यक्ति व्रजा नदी से बाहर आने केलिए अपने हात देते  हैं।

इस स्पर्श के पश्चात, “ओळी कोण्ड सोदियुमाइ(तिरुवाय्मोळि २. ३. १०) के अनुसार जीवात्मा को एक नई तेजोमय शरीर प्राप्त होता है। यह “पंचोपनिषद मय” कहलाता है।  अर्थात पञ्च दिव्य भूतों से बनाया हुआ। अब, “मुडियुडै वानवर मुरै मुरै एदिर्कोळ्ळ” (तिरुवाय्मोळि १०. ९. ८) के प्रकार (नवीन शरीर वाले) जीवात्मा को नित्यसुरियां आकर स्वागत करते हैं और उसकी श्रृंगार कर, गुणगान कर, “श्री वैकुंठ” नामक दिव्य स्थल लेकर जाते हैं।  “तिरुमामणि मंडप” नामक प्रसिद्द वेदी तक ले जाते हैं , जहाँ अनेक भक्त उपस्थित हैं। श्री रामानुज से मणवाळ मामुनि प्रश्न करते हैं , “ कहते हैं कि , “अडियारगळ कुळाङ्गळुडन कूडुवदु येनृकोलो (तिरुवाय्मोळि २. ३. १०) और “मतदेवतै: परिजनैस्तव संकिशूय:”, ऐसे भक्तों के समूह में रहने की अवसर कब आएगी ? वें श्री:पति श्रीमन नारायण के दास हैं और उन्के प्रति कैंकर्य को सहारा मानते हैं।  हे ! एतिरासा! कृपया आशीर्वाद करें कि आज और उल्लेखित विषयों के संभव दिन के अंतर के समय शीघ्र कम हो। 

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/09/arththi-prabandham-24/

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प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
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श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Arththi prabandham – 55

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Introduction

As a true Sishya and an ardent follower, one needs to be cognizant of two things viz.,

(a) thinking about all the benefits one’s AchAryan has done unto him and

(b) interest towards any deed that the AchAryan will do to him in the future.

This pAsuram specifically talks about the former. mAmunigAL celebrates the glorious qualities that emperumAnAr gave him. He lists them and eventually says that it is because of emperumAnAr’s grace that he was able to get these qualities.

pAsuram 55

thennarangar sIr aruLukku ilakkAgap peRROm
thiruvarangam thirupadhiyE iruppAgap peRROm
manniya sIr mARankalai uNavAgap peRROm
madhurakavi soRpadiyE nilaiyAgap peRROm
munnavarAm kuravar mozhigaLuLLap peRROm
muzhudhu namakkavai pozhudhupOkkAgap peRROm
pinnai onRu thanil nenju pErAmaRpeROm
piRar minukkam poRAmayillAp perumaiyum peRROmE!!!

Word-by-Word Meanings

ilakkAgap peRROm – (We) became the target of
sIr aruLukku – causeless mercy of
thennarangar – periya perumAL, who is reclining south facing in the direction of SrIlankA, in a place that is very pleasing to the eyes and is known by the name of “kOyil”, where HE captivated HIS devotees by blessing them (“aruL koduthittu adiyavarai AtkkoLvAn amarum Ur (periyAzhvAr thirumozhi 4.9.3))
iruppAgap peRROm – (We) got the glorious opportunity of being permanent residents of
thiruvarangam thirupadhiyE – SrIrangam that is described as “thennAdum vadanAdum thozha ninRa thiruvarangam thiruppadhi (periyAzhvAr thirumozhi 4.9.11)”, “ArAmam sUzhndha arangam (siRiya thirumadal 71)”, “thalaiyarangam (iraNdAm thiruvandhAdhi 70)”. It is the chief of all the 108 dhivyadhEsams.
uNavAgap peRROm – (We) Our food is
kalai – the nectarine pAsurams of (nectarine for devotees that serves as garland for the Lord)
mARan – nammAzhvAr
manniya sIr – who is full of auspicious qualities starting with parabhakti etc
nilaiyAgap peRROm – (We) attained the last frontier of “charama parva nishtai”, that is celebrated as “yathIndhramEva nIrandhram hishEvE dhaivathambaram” etc. Myself and my associates started to talk about it “unnayozhiya oru dheyvam maRRaRiyA mannupugazh sEr vaduganambi thannilaiyai (Arththi prabandham 11)”).
soRpadiyE – (This tenet of charama parva nishtai (regarding one’s AchAryan as everything) is derived from the) divine words of
madhurakavi – madhurakavi AzhvAr who said “thEvu maRRaRiyEn (kaNNinun chiRuth thAmbu 2)”. (We got to live and abide by the tenets of the great madhurakavi AzhvAr).
munnavarAm kuravar mozhigaLuLLap peRROm – We got to live, breathe and explore our ancestors’ works, their divine and esoteric purports. These are the works of AchAryas who lived by the way shown by AzhvArs.
muzhudhu namakkavai pozhudhupOkkAgap peRROm – (We) spent our times dwelling on that (works). Our minds does not go to anything that is not these divine works of our ancestors.
pinnai nenju pErAmaRpeROm – Our hearts and minds were so grounded to these works our ancestors that it never went behind
onRu thanil – any of the other works apart from our ancestors’ works.
piRar minukkam poRAmaiyillA – If the aforementioned qualities of ours that we got by the grace of emperumAnAr is placed on one side of a balance, then this one that am going to say would equal or weigh more than all of the above together. If such a rare SrIvaishnava is found with all of the aforementioned qualities, as described by “ippadi irukkum  SrIvaishNavargaL ERRam aRindhu ugandhu irukkaiyum (mumukshupadi dhvaya prakaNam 116)”, then we never become jealous seeing them. Such is our glory that was bestowed upon us by emperumAnAr.
perumaiyum peRROmE – We got this! Alas! What a great fortune to have gotten this , thanks to emperumAnAr’s causeless mercy.

Simple Translation

In this pAsuram, mAmunigaL celebrates the mercy of emperumAnAr. He adds that it is because of his (emperumAnAr’s) infinite mercy towards him that he got some treasured qualities in him. mAmunigaL starts by saying that they (himself and his SrIvaishNava associates) was chosen as the target of periya perumAL’s infinite blessings. They got the glorious opportunity of being in SrIrangam, the chief of all 108 dhivya dhESams. They got the rare blessings to eat, drink, breathe nammAzhvAr’s works day in and day out. They got the choicest blessings to live by the tenets propounded by madhurakavi Azhvar, i.e,. charama parva nishtai (regarding one’s AchAryan as everything). This happens to the rarest of the rarest cases. They got to explore and live by the words of their ancestors who in fact lived by the words of AzhvArs. They also did not go anywhere else apart from SrIvaishNava scriptures. They spent their lives living by it. Lastly, but most importantly, if they were to meet such a SrIvaishNava with all these aforementioned qualities, they would never get an iota of jealousy in them. They would be very happy about them. mAmunigaL says that all these fortunes that they got is solely due to the blessings of emperumAnAr.

Explanation

mAmunigaL says, “We became the target of the causeless mercy of periya perumAL, who is reclining south facing in the direction of Sri Lanka, in a place that is very pleasing to the eyes and is known by the name of “kOyil”, where HE captivated HIS devotees by blessing them (“aruL koduthittu adiyavarai AtkkoLvAn amarum Ur (periyAzhvAr thirumozhi 4.9.3). We got the glorious opportunity of being permanent residents of SrIrangam that is described as “thennAdum vadanAdum thozha ninRa thiruvarangam thiruppadhi (periyAzhvAr thirumozhi 4.9.11)”, “ArAmam sUzhndha arangam (siriya thirumadal 71)”, “thalaiyarangam (iraNdAm thiruvandhAdhi 70)”. It is the chief of all the 108 dhivyadhESams. Our food is the nectarine pAsurams of (nectarine for devotees that serves as garland for the Lord) nammAzhvAr, who is full of auspicious qualities starting with parabhakthi etc. We attained the last frontier of “charama parva nishtai”, that is celebrated as “yathIndhramEva nIrandhram hishEvE dhaivathambaram” etc. Myself and my associates started to talk about it “unnaiyozhiya oru dheyvam maRRaRiyA mannupugazh sEr vaduganambi thannilaiyai (Arththi prabandham 11”). This tenet of charama parva nishtai (regarding one’ AchAryan as everything) is derived from the) divine words of madhurakavi who said “thEvu maRRaRiyEn (kaNNinun chiruth thAmbu 2)”. We got to live and abide by the tenets of the great madhurakavi AzhvAr, who is described as “avargaLaich chiriththiruppAr oruvar uNdirE (SrIvachana bhUshaNam 409) referring to madhurakavi AzhvAr (He is a person who would laugh at the 10 AzhvArs because of lack of reliability in their approach towards reaching perumAL. Their approach is via perumAL himself whereas in the case of madhurakavi AzhvAr everything is nammAzhvAr for him). We got to live, breathe and explore our ancestors’s works, their divine and esoteric purports. These are the works of AchAryas who lived by the way shown by AzhvArs. We spent our times dwelling on those (works). Our minds do not go to anything that is not these divine works of our ancestors. Our hearts and minds were so grounded to these works of our ancestors that it never went behind any of the other works apart from our ancestors’ works.

If the aforementioned qualities of ours that we got by the grace of emperumAnAr is placed on one side of a balance, then this one that I am going to say would equal or weigh more than all of the above together. If such a rare SrIvaishnava is found with all of the aforementioned qualities thus far in this pAsuram, as described by “ippadi irukkum SrIvaishNavargaL ERRam aRindhu ugandhu irukkaiyum (mumukshupadi dwayaprakaNam 116)”, then we never get any jealous seeing them. Such is our glory that was bestowed upon us by emperumAnAr. We got this! Alas! What a great fortune to have gotten this, thanks to emperumAnAr’s causeless mercy.

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आर्ति प्रबंधं – २३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २२

उपक्षेप

पिछले दो पासुरों में, मणवाळ मामुनि, अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै और परमाचार्य एम्बेरुमानार के आशीर्वाद के विवरण किये। मणवाळ मामुनि के अभिप्राय हैं कि इन्के आशीर्वाद के बल पर वे निश्चित परमपद प्राप्त करेंगें और भगवान की अनुभव करेंगें।  शीघ्र “दिव्यस्थान मण्डप” में निवासित “दिव्य सिंहासन” पर विराजित भगवान की अनुभव  पाने केलिए मणवाळ मामुनि अपनी इच्छा प्रकट करते हैं।  

पासुरम

अडियारगळ कुळाङ्गळ अळगोलक्कम इरुक्क
अनंतमयमान मामणि मण्डपत्तु
पड़ियादूमिल पडुक्कयाय इरुक्कुम अनन्तन
पणमामणिगळ तम्मिन ओळी मंडलत्तिल इडैयिल
वडिवारुम मामलराळ वलवरुगु मट्रै
मण्मगळुम आय्मगळुम इडवरुगुम इरुक्क
नडुवाग वीट्रीरुक्कुम नारणनै कडुग
नान अनुभविक्कुम वगै नल्गु एन एतिरासा

शब्दार्थ 

एन एतिरासा – हे! यतिराजा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता!
कडुग – निश्चित ही आप शीघ्र
नल्गु – आशीर्वाद करें
नान – मैं
अनुभविक्कुम वगै – भोग  करें
नारणनै – श्रीवैकुंठनाथ
नडुवाग वीट्रीरुक्कुम – मध्य में विराजित, बिजली के बीच कमल की तरह, वर्षा की मेघ जैसे साँवले रंग के, दिव्य महिषियों के मध्य विराजित जो जग की राज करतें हैं।
वडिवारुम मामलराळ – प्रस्तावित दिव्य महिषियाँ हैं, दायें भाग में “ वडिवाय निन वलमारबिनिल वाळ्गिन्र मंगै” में प्रकटित  (तिरुपल्लाण्डु २)  अद्वितीय सौंदर्य और कोमल गुण संपन्न  पेरिय पिराट्टियार,
वलवरुगु – दायें भाग में
मट्रै मण्मगळुम आय्मगळुम – और भूमि पिराट्टि और नीळा देवी जो हैं
इडवरुगुम इरुक्क – बायें भाग में
अडियारगळ कुळाङ्गळ – इन्के संग, नित्यसुरियाँ (अनंत, गरुड़ विश्वक्सेन इत्यादि ) और मुक्तात्मायें (परांकुश और परकाल के जैसे ), यह मोतियों और रत्नों की सुन्दर संग्रहण की तरह दिखता हैं
अळगोलक्कम इरुक्क – सुंदर पंक्ति में
आनन्दमयमान मामणि मंडपत्तु – अत्यंत आनंदमय वेदी में , जो “तिरुमामणि मंडपम” जाना जाता हैं
पणमामणिगळ तम्मिन ओळी मंडलत्तिल इडैयिल – के सिरों से उत्पन्न प्रकाश के मध्य
पडियादुमिल – तुलना से पार
पडुक्कैयाय इरुक्कुम – अनंतन, जो दिव्य शय्या (श्रीमन नारायण के ) के रूप में सेवा करते हैं
अनंतन – “अनन्ताळ्वान” नाम से जाने जाते हैं

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, कोई विलंब के बिना शीघ्र श्रीवैकुंठनाथ की भोग करने के हेतु, आशीर्वाद करने को प्रार्थना करते हैं। मणवाळ मामुनि श्री वैकुंठनाथ की विवरण करते हैं कि वे अपने दिव्य महिषियाँ :पेरिय पिराट्टि, भूमि देवी तथा नीळा देवी के मध्य, अनन्त , गरुड़  विश्वक्सेन जैसे नित्यसुरियाँ एवं आळ्वारों और आचार्यो जैसे मुक्तात्माओं के श्रेयसी पंक्ति के मध्य, तिरुमामणि मण्डप में  विराजमान हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता! “अडियारगळ कुळाङ्गळ (तिरुवाय्मोळि २. ३. १० ) और “मामणि मण्टपत्तु अंतमिल पेरिन्बत्तडियार(तिरुवाय्मोळि १०. ९. ११ )” के जैसे सुंदर पंक्ति में हैं।  नित्यसूरियों में अनंत,गरुड़ ,विश्वक्सेन इत्यादि एवं मुक्तों में परांकुश, परकाल तथा यतिवरादि हैं। यें मोतियों और रत्नों के सुंदर संग्रहण की तरह दिखतीं हैं।  यह पंक्ति, “आनंदमयाय मंडप रत्नाय नमः” के अनुसार तेजोमय , अत्यंत आनंद से प्रकाशित “तिरुमामणि मंडप” के आगे हैं। अत्यंत कोमल तथा शीतल  “अनंतन” नामक सर्प  शैय्या, जो भगवान के नित्य कैंकर्य केलिए प्रसिद्द हैं, इस मंडप में हैं।  “आयिरम पैन्तलै अनंतन” (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४. ३. १० ), “सिरप्पुडैय पणनगळ मिसैचेळुमणिगळ विट्टेरिक्कुम (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४. ९. ७ ) तथा “दैवछुडर नडुवुळ (पेरिय तिरूमडल १) जैसे वचनों में अनंतन की वर्णन की गयी हैं। “वडिवाय निन वलमारबिनिल वाळ्गिन्र मंगै (तिरुप्पल्लाण्डु २ )” और “वडिक्कोल वाळ नेडुनकण (इरणडाम तिरुवन्दादि ८२ )” में जैसे वर्णन किया गया है, पेरिय पिराट्टि अपने सौंदर्य और कोमल गुण के  स्वरूप से पहचानी जातीं हैं। वें श्रीमन नारायण के दायें पक्ष में दर्शित हैं।  श्रीमन नारायण के बायें पक्ष में पेरिय पिराट्टि के छाया भूमि पिराट्टि एवं नीळा देवी हैं।  एक कमल तथा तीन बिजलियों के मध्य साँवले वर्षा के मेघ के समान दृश्य हैं, इन तीनों पिराट्टियों के मध्य, श्रीमन नारायण।  ये श्रीवैकुंठनाथ हैं जो (तिरुवाय्मोळि १०. ९. १ ) में “वाळपुगळ नारणन” से वर्णित हैं, जो वहाँ “वीट्रीरुंदु येळुलगम तनिक्कोल सेल्ल” (तिरुवाय्मोळि ४.५. १ ) के अनुसार लोकपरिपालन करने केलिए विराजित हैं। “ हे ! मेरे स्वामी एतिरासा ! कृपया मुझे आशीर्वाद कीजिये, जिससे मैं तुरंत इस श्रीवैकुंठनाथ को भोग कर सकूँ”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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आर्ति प्रबंधं – २२

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

<< पासुर २१

thirukkudanthai_aravamudhazhvar_divine_feet

उपक्षेप

पिछले पासुरम में मणवाळ मामुनि “एन्न भयं नमक्के”, कहते हैं , अर्थात उन्को अब कोई भय नहीं हैं। अब कहते हैं कि अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के निर्हेतुक आशीर्वाद के कारण श्री रामानुज उन पर गर्व करेंगें। यह इस सँसार के सागर को पार कर श्रीमन नारायण के चरण कमलों तक अवश्य पहुँचायेगा।

पासुरम २२

तीदट्र ज्ञानम् तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै सीररुळै
येदत्तै माट्रूम एतिरासर तन अभिमानमेन्नुम
पोदत्तै एट्री पवमाम पुणरिदनै कडन्दु
कोदट्र माधवन  पादक्करैयै कुरुगुवने

शब्दार्थ

तीदट्र – दोष हीन
ज्ञान – जीवात्मा के स्वरूप की सम्पूर्ण ज्ञान
तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै – तिरुवाय्मोळि के संबंध से ये “तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै” जाने जाते हैं।  श्रीमन नारायण के कवि नम्माळ्वार के दिव्य रचना हैं
सीररुळै – वे मुझे (निर्हेतुक) कृपा से आशीर्वाद करते हैं
येदत्तै माट्रूम – जिस्से मोह तथा इच्छा जैसे दोष नष्ट हों
एतिरासर तम – उन्की  (तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै की )  आशीर्वाद, श्री रामानुज के कृपा पात्र बने रहने की सहाय करेगी
पोदत्तै येट्री – “विष्णु पोत” यानी विष्णु की जलयान के जैसे अटल जहाज़ (जलयान ) जो ही
पवमाम पुणरिदनै कडन्दु – सँसार के सागर को पार करने केलिए सहाय करता हैं
कुरुगुवने – निश्चित प्राप्त होता है
कोदट्र माधवन पादक्करयै – श्रिय:पति श्रीमन नारायण के चरण कमल। यह चरण कमल, “विण्णोर पिरानार मासिल मलरडिकीळ”, “तुयररु सुडरडि” चित्रित किया गया हैं , अर्थात “दोषों से विरुद्ध एवं सदा रोशणमय

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि कहते हैं कि श्रीमन नारायण के चरण कमल प्राप्त होना निश्चित है क्योंकि “विष्णु पोत” की तरह एक जलयान की सहायता से वें साँसारिक बंधनों से विमुक्त होने वाले हैं। यह निश्चित हैं क्योंकि श्री रामानुज उस जहाज़ में चढ़ाएंगे। और श्री रामानुज के यह सहायता मणवाळ मामुनि के आचार्य निष्कलंक तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के आशीर्वाद से ही साध्य है।

स्पष्टीकरण  

विवरणकार अब तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै के श्रेय प्रस्ताव करते हैं।  “तत ज्ञानं अज्ञानमतोन्यधुक्तम” और “विद्यान्यासिलपनैपुणम” वचनों के अनुसार , श्रीमन नारायण से असम्बंधित या विरुद्ध किसी प्रकार के कार्यो से आने वाली दोषों से विमुक्त हैं। “तामरैयाळ केळ्वनये नोक्कुम उणर्वु” (मुदल तिरुवन्दादि ६७ ) की तरह श्री महालक्ष्मि के पति श्रीमन नारायण के प्रति ही सदा उन्की ध्यान हैं, अन्य विषयों में किंचित भी नहीं। श्रीमन नारायण के प्रति उन्की भक्ति ऐसी हैं कि श्रीमन नारायण के भक्तों को अपने स्वामी समझते हैं।  श्रीमन नारायण से संबंधित ग्रंथों के अलावा अन्य विषयों पर वें ध्यान नहीं देते हैं। विशेष रूप में तिरुवाय्मोळि के गेहरी दिव्य अर्थों में मग्न होने के कारण “तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै” जाने जाते हैं।  तिरुवाय्मोळि के प्रति उन्के प्रेम के कारण, तिरुवाय्मोळि उन्की पहचान बन गयी।  ऐसे श्रेयसी आचार्य के शिष्य हैं श्री मणवाळ मामुनि। मणवाळ मामुनि कहते हैं कि , उन्के आचार्य के आशीर्वाद से श्री रामानुज के छाये में अवश्य आएँगे, जो प्रेम भाव प्रकट करेंगें। श्री रामानुज “कामादिदोषहरं” (यतिराज विम्शति १ ) विवरित किये जाते हैं।  “विष्णु पोतं” का अर्थ है , “इदंहि वैष्णवं पोतं सम्यकास्ते भवार्णवे” याने, “बिना कोई संकट ,श्रीमन नारायण के दिव्य चरण कमलों तक पहुँचाने वाला”. मणवाळ मामुनि कहते हैं कि श्री रामानुज के संबंध, सँसार के सागर (साँसारिक बंधन ) से विमुक्त करने वाला श्री वैष्णव जलयान हैं। (जितन्ते स्तोत्र ४ ) के “संसार सागरं घोरं अनंत क्लेस भाजनं”, वचनानुसार, यह सँसार सागर हमारे ग्रंथों में भयानक सागर के रूप में चित्रित किया गया है। मणवाळ मामुनि कहते हैं कि यह जलयान उन्को श्रीमन नारायण के चरण कमलों तक ले जाएगा।  भगवान के चरण कमलों के विषय में बताया गया है , “विण्णोर्पिरानार मलरडिकीळ (तिरुविरुत्तम ५४ ) याने नित्यसूरियों से पूजनीय और “तुयररु सुडरडि (तिरुवाय्मोळि १.१. १ ) याने अज्ञान और पीड़ा से निवारण करने वालें। “हेय प्रत्यनीकं”, के अनुसार वें संपूर्ण रूप से दोषों से विमुक्त हैं। ये दिव्य चरण कमल अत्यंत तेजस्वी हैं और भक्त की ,किसी के या किसी विषय के आवश्यकता के बिना रक्षण करतें हैं। श्रीमन नारायण के  ऐसे निष्कलंक चरण कमल ही मेरे लक्ष्य हैं।  वे कहते हैं लक्ष्य प्राप्ति निश्चित हैं।  “कोदट्र” का अर्थ है निष्कलंक और यह चरण कमलों केलिए सही है। पूर्ण वचन है “कोदट्र माधवन” अर्थात  “निष्कलंक या दोषहीन माधवन” . यहाँ उल्लेखित दोष, श्रीमन नारायण के “पिराट्टि”, श्री महालक्ष्मि के संग न होने पर।  इसी  विषय की तिरुवडि (हनुमान) प्रस्ताव करते हैं, “रामस्यलोकत्रय नायकस्य श्रीपादकूलं मनसाजकाम” में और नम्माळ्वार, बताते हैं , “माने नोक्कि मडवाळै मार्बिल कोणडाइ माधवा” जो “उन तेने मलरूम तिरुपादम विनयेन सेरमारु अरुळाइ (तिरुवाय्मोळि १.५.५ )” में पूर्ण होता है।  अतः, “तिरुविललाद कोदु अट्रवन” अर्थात पिराट्टि महालक्ष्मि के संग के बिना श्रीमन नारायण के दर्शन में ही यह उल्लेखित दोष आएगा।  अतः पिराट्टि के संग श्रीमन नारायण ही लक्ष्य हैं क्योंकि वे ही निष्कलंक हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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Arththi prabandham – 54

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Introduction

mAmunigaL continued to plead with SrI rAmAnuja in the earlier pAsuram and request him to uplift from this world and get him liberated. mAmunigaL knew that SrI rAmAnuja would yield to his requests. However, that does not suffice for mAmunigaL. It is because, as they say “oru pagal Ayiram UzhiyAy (thiruvAimozhi 10.3.1)”, each passing moment for mAmunigaL in this world feels like eons. mAmunigaL requests SrI rAmAnuja, “You are my relative of all sorts. You should not let me go through this suffering with this body in this world. I do not know when will you liberate me from this place and transport me to the place where there is infinite bliss (paramapadham)”.

pAsuram 54

innam eththanai nAL ivvudambudan
irundhu nOvu padakkadavEn aiyO
ennai idhininRum viduviththu nIr
enRu thAn thirunAttinuL yERRuvIr
annaiyum aththanum allAdha suRRamum Agi
ennai aLiththaruL nAdhanE
en idhaththai irAppagal inRiyE
EgameNNum ethirAsa vaLLalE !!! 

Word-by-Word Meanings

nAdhanE – Hey!!! my master
aLiththaruL – (You) bless
ennai – me
Agi – by being my
annaiyum – mother who shows priyam,
aththanum – (by being) a father who does hitham and
allAdha suRRamum – (by being) all those desirable and closely knit relations.
ethirAsa vaLLalE – the magnanimous leader of all yathis (ascetics), one who is known as “emperumAnAr”!!!
irAppagal inRiyE EgameNNum – (One who) thinks day and night with undivided attention about
en – my
idhaththai – wish (only thost that  proves good for me)
(Even after falling at your lotus feet)
eththanai nAL – how much
innam – longer
nOvu padakkadavEn – I have to suffer
ivvudambudanE irundhu – in (with) this body?
aiyO – alas!!!
viduviththu – Please liberate
ennai – me
idhininRum – from this body that serves as the obstacle!!!
enRu thAn – when will
nIr – you
ERRuvIr – carry me to
thirunAttinuL – paramapadham?

Simple Translation

In this pAsuram, mAmunigaL says that emperumAnAr is his mother, father and his every kind of good relative. He always thinks about the well being of mAmunigaL. Hence, mAmunigaL asks him when he will be liberated from this bondage and grant him paramapadham, the place of infinite bliss? How long should he suffer with this body in this world.

Explanation

mAmunigaL says, “As madhurakavi AzhvAr said ‘annaiyAy aththanAy ennai ANdidum thanmaiyAn (kaNNinun chiruth thAmbu 4)’, emperumAnArE! You are my mother who showers a lot of love to her child. You are my father who wishes for all good things for his child. You are my closely knit relative who leads a life of high valued principles. You are the leader of the yathis! As they say, “en manamEgamennum irAppagalinRiyE (thiruvAimozhi 9.3.7)”, you think about my well being day and night with undivided attention. Even after surrendering unto your lotus feet as described in “unakkAtppattum adiyEn innum uzhalvEnO (thiruvAimozhi 5.8.10)”, how much longer am I supposed to suffer with this mortal coil of mine in this world? Alas!!! When will you liberate me from this obstacle called “body” and liberate me to paramapadham, the place of infinite bliss? That day will be one unparalleled day. vaLLal would mean – a magnanimous person to whom one cannot reciprocate anything for the good deeds he did.

adiyEn santhAnam ramanuja dasan

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sthOthra rathnam – 65

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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Introduction

ALavandhAr says “Even if you give up on your vow which is highlighted in SrI rAmAyaNam ayOdhyA kANdam 18.30 ‘rAmO dhvir nAbhibhAshathE‘ (SrI rAma will not speak in two different ways), mercifully seeing my relationship with periya mudhaliyAr (SrIman nAthamunigaL) in context with acquiring knowledge and birth [being born as his grandson], and disregarding my own virtues and vices, you should accept me” and ISvara replies “Since there is no shortcoming in that approach, I oblige to do that” and bestows that boon to ALavandhAr. Being satisfied, ALavandhAr concludes the sthOthram [prabandham].

akruthrima thvachcharaNAravindha
prEma prakarshAvadhim Athmavantham |
pithAmaham nAthamunim vilOkya
prasIdha mathvruththam achinthayithvA ||

Word by word meaning

math vruththam – my conduct
achinthayithvA – without considering
akruthrima thvath charaNa aravindha prEma prakasha avadhim – one who is the epitome of natural love towards your divine lotus feet
Athmavantham – one who is self realised
pithAmaham – one who is my grand father
nAthamunim – nAthamunigaL
vilOkya – seeing him
prasIdha – mercifully pardon (me)

Simple Translation

[Oh emperumAn!] Without considering my conduct, you should mercifully pardon me seeing nAthamunigaL who is the epitome of natural love towards your divine lotus feet, who is self realised and who is my grand father.

vyAkyAnam (Commentary)

  • akruthrima – “kriyayA nirvruththa: kruthrima:, thadhrahitha: akruthrima:, svAbhAvika ithyartha:” (kruthrima (artificial) means something which occurred due to another action; akruthrima means the opposite; that is, something which is natural [not an effect of another action]”. Since ALavandhAr belongs to yOgikulam (clan of those who are experts in yOga), this [love towards emperumAn’s divine feet] is in-born for him. Also explained as “true love towards emperumAn”.
  • thvath – You who are the apt lord; your.
  • charaNa aravindha – the enjoyable divine feet which are naturally approachable by devotees.
  • prEma prakarsha avadhim – Ultimate state of great love for bhagavAn. Whatever attachment we have in worldly matters, he has that in bhagavAn, who is the natural/apt recipient [of our love].
  • Athmavantham – As bhagavath SEshathvam (being a servitor of bhagavAn) is the svarUpam, nAthamunigaL is the one who has the knowledge about the ultimate nature of the self [which is being a servitor of bhagavAn’s devotees]. As said in “dhanavantham” (wealthy) [nAthamunigaL is very knowledgeable about the self].
  • pithAmaham nAthamunim – Having the physical relationship [as my grandfather], one who is the wealth of bhagavath gyAnam (knowledge about bhagavAn).
  • vilOkya – mercifully seeing (glancing) him.
  • prasIdha – Pardon my aparAdhams (faults/mistakes).
  • math vruththam achinthayithvAALavandhAr saying “Please disregard my vices” [this is general explanation]. [specific explanation now] “math vruththam” (my conduct) indicates virtuous activities. When we say some one as vruththAvAn, that means we only talk about his good activities. ALavandhAr requests emperumAn to disregard his own good qualities, and requests him to consider his relationship with periya mudhaliyAr (nAthamunigaL) as the refuge and concludes the sthOthram.

yath padhAmbhOruhadhyAna vidhvasthAsEsha kalmasha:
vasthuthAmupayAthOham yAmunEyam namAmitham

I worship yAmunAchAryar by whose mercy my defects have been removed and I have become an identifiable object, i.e., previously I was like asath (matter) and now I have realized that I am sath (soul) after meditating upon the lotus feet of yAmunAcharya.

—- by SrI rAmAnuja in glorification of yAmunAchArya

Thus ends the English translation for periyavAchchAn piLLai’s divine commentary for sthOthra rathnam.

AzhwAr thiruvadigaLE SaraNam
ALavandhAr thiruvadigaLE SaraNam
emperumAnAr thiruvadigaLE SaraNam
periyavAchchAn piLLai thiruvadigaLE SaraNam
jIyar thiruvadigaLE SaraNam

adiyen sarathy ramanuja dasan

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sthOthra rathnam – 64

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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Introduction

emperumAn asks “If I who am independent, uplift some persons [as special cases], can that be considered as my standard conduct?” and ALavAndhAr replies “At the seashore, when you vowed [to protect all who surrender unto you] in the assembly of your devotees, did that vow exclude me?”.

nanu prapannas sakrudhEva nAtha!
thavAhasmIthi cha yAchamAna: |
thavAnakampya: smaratha: prathigyAm
madhEkavarjam kimitham vratham thE ||

Word by word meaning

nAtha! – Oh my lord!
sakruth Eva prapanna: – saying “I have surrendered unto you once”
aham thava asmi ithi cha – and saying “I should exclusively serve you”
yAchamAna: (aham) – I who am praying
prathigyAm smaratha: thava – to you who are thinking about the vow (which you declared towards vibhIshaNa at the seashore [before the rAma – rAvaNa battle])
nanu anukampya: – deserve to receive your mercy;
thE itham vratham – this vow of your highness’
math Eka varjam kim – does it exclude just me?

Simple Translation

Oh my lord! I who am saying “I have surrendered unto you once” and “I should exclusively serve you” and praying to you, who are thinking about the vow (you declared to vibhIshaNa at the seashore [before the rAma – rAvaNa battle]), deserve to receive your mercy; does this vow of your highness’ exclude just me?

vyAkyAnam (Commentary)

  • nanu prapanna:ALavAndhAr recollects SrI rAma‘s words as in SrI rAmAyaNam yudhdha kANdam 18.33 “sakrudhEva prapannAya” (even if one surrenders once, I will never abandon him). kUraththAzhwAn explains sakrudhEva as sahasaiva (immediately, at once). embAr explains “This AthmA who is in samsAram since time immemorial, even if he mediates upon prapaththi (dhvaya mahA manthram), will that match [the greatness of emperumAn] saying “sakruth” (even once)?”. bhattar explains “If we look at the greatness of emperumAn, performing SaraNAgathi more than once is superfluous. [But] the prApya ruchi [i.e., taste in reciting dhvaya mahA manthram requesting for eternal kainkaryam] will go on until one reaches the final destination [of paramapadham]”.
  • nAtha – Surrendering just once is sufficient since emperumAn is the apt/natural lord. Just Abhimukhyam (friendly gesture) is required – [that is due to emperumAn having] eternal [motherly] relationship where he considers the loss/gain of AthmA as his own. In the case of a person who is not an apt refuge, even Artha prapaththi (desperate surrender) is doubtful in procuring the result. But in the case of emperumAn who is the apt refuge, even dhruptha prapaththi (surrender with patience to achieve the result) will lead to the ultimate result.
  • thavAsmIthi cha yAchamAna: – (aham thavAmsi) – AthmA is pleading with the thought that it should engage in minimal services to establish its own nature; praying for kainkaryam following the method in the latter half of dhvayam. Highlighting my empty-handedness I surrendered unto you saying “thvath pAdha mUlam SaraNam prapadhyE” (I firmly accept your divine lotus feet as the means). I also prayed for the goal saying “aikAnthika nithyakinkara: praharshayishyAmi” (when I will please you only as a confidential eternal servitor). Some explain that, with these two words [aham thavAsmi], the two types of qualified persons in bhakthi [bhakthi yOga] and prapaththi [SaraNAgathi] are spoken about.
  • prathigyAm smarathas thava anukampya: – I recollect your vow at the seashore as said in SrI rAmAyaNam yudhdha kANdam 18.33 “Ethath vratham mama” (This is my vow), remain a recipient of the mercy of your highness.
  • thE vratham idham madhEka varjam kim – Will this distinguished vow of your highness who is common to all, exclude me? Implies – it will not. I will only miss out if you specifically vowed “I will protect all except this one person”. Since your highness is a sathya sankalpa (one with fulfilled vows), you should mercifully protect me.

In the next article we will enjoy the concluding SlOkam of this wonderful prabandham.

adiyen sarathy ramanuja dasan

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Arththi Prabandham – 53

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Introduction

In the previous pAsuram, mAmunigaL described how periya perumAL would come unto him during his final moments of leaving his mortal coil in this world. He said that periya perumAL would in fact come on HIS transport viz periya thiruvadi. This raises the questions “OK. What will mAmunigaL do in the mean time until his final moments come where periya perumaL would be present?”. mAmunigaL says “for that ultimate moment to happen, this body of mine, that is the source of all sins and subsequent sufferings in this world, has to fall. I cannot forever be suffering the pains caused by the sins which is in turn triggered by the very existence of this physical body. So, hey SrI rAmAnuja!!!, You give me what is needed and best. You should liberate me from this world that is so filled with troubles and pain”.

pAsuram 53

idhaththAlE thennarangar seygiRadhu enRaRindhE
irundhAlum thaRkAla vEdhanaiyin kanaththAl
padhaiththu AvO ennum indhap pAva udambudanE
pala nOvum anubaviththu ippavaththu irukkappOmO?
madhaththAlE valvinaiyin vazhi uzhanRu thirindha
valvinaiyEn thannai unakku ALAkkik koNda
idhath thAyum thandhaiyumAm ethirAsA! Ennai
inik kaduga ippavaththininRu eduththaruLE!!!

Word-by-Word Meanings

idhaththAlE – Because of “hitham” (quality of always thinking and doing that which is good towards a person)
thennarangar – periya perumAL (SrI ranganAthan)
seygiRadhu enRaRindhE irundhAlum – out of his mercy, is letting me suffer the wrath of my karma. Though I know that HE is doing this for my good,
thaRkAla vEdhanaiyin kanaththAl – the sufferings that I had to undergo at that point in time (momentary pain), makes me
padhaiththu – writhed with pain and
AvO ennum – utter exclamations like “hA”, “Oh” that are clearly representative sounds of sufferings and pain.
irukkappOmO? – will I be able to live
ippavaththu – in this samsAram (mundane world)?
indhap pAva udambudanE – with this body that is a sin by itself
pala nOvum anubaviththu – and continue to suffer a multitude of sufferings?
madhaththAlE – Due to the association with this body
valvinaiyin vazhi uzhanRu thirindha – (I have) wandered in the path set by my karmAs and continued that endless journey.
valvinaiyEn thannai – Me, the most cruel sinner of all
ALAkkik koNda – was made your servant by you (emperumAnAr)
unakku – who is the base for all souls.
idhath thAyum – (You did this as) my mother who does “hitham” and also as my
thandhaiyumAm – father.
ethirAsA! – hey! emperumAnArE!!!
ini – here after
kaduga – quickly
eduththaruLE – uplift and liberate
ennai – me
ippavaththininRu – from this samsAram

Simple Meanings

mAmunigaL continues to plead to SrI rAmAnuja to get him liberated. He realizes that his sufferings are because periya perumAL, out of his good nature, wants the effects of his karma to be finished and so is letting him suffer. mAmunigaL says that though he is able to understand why periya perumAL is doing that, he says at the time of suffering the wrath of karma, it is unbearable. It is because of his association with the body that he is into this endless journey filled with thorns of pain. Hence, he requests SrI rAmAnuja, who is his  mother as well as the father, to get him liberated from this sinful world as quickly as possible.

Explanation

mAmunigaL says – As mentioned in the pAsuram “ArapperunthuyarE seydhidinum (gyAna sAram 21)” and similar pAsurams, I do understand that it is because of HIS “hitham” (the quality of always thinking and doing only what is good towards a person), and his blessing that I am suffering a lot (that is because the karmas need to be gone somehow and so one has to undergo the suffering). Even though I realize this and understand it, when it comes to that time of suffering, it pains me a lot. It pains me so much that I exclaim words like “hA” and “Oh” that clearly shows how frustrating it is. I am uttering these words with this body that is the verily the source of all sins. I am suffering like this in this world for a long time. Is it appropriate for me to be like this forever? As thirumangai AzhvAr says “pAvamE seydhu pAvi AnEn (periya thirumozhi 1.9.9)”, I am committing nothing but sins. I am doing that because of my association with this body. I am being pulled into the path in which my body pulls, which unfortunately is filled with sins. As a result, I am reaping the effects of my incessant sins and am writhing each and every moment of this journey. However emperumAnArE!!! You my father and mother who does things for me for my overall betterment out of your “hitham” quality, you have blessed me and approved me. Hence, I request you to uplift me from my incessant sufferings and get me liberated from the shackles of this samsAram.

adiyEn santhAnam ramanuja dasan

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