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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 101 से 108

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

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पाशुर १०१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं श्रीरामानुज स्वामीजी की मिठास उनके पवित्रता से भी उच्च हैं। 

मयक्कुम् इरु विनै वल्लियिल् पूण्डु मदि मयन्गित्
तुयक्कुम् पिऱवियिल् तोन्ऱिय एन्नै तुयर् अगऱ्ऱि
उयक्कोण्डु नल्गुम् इरामानुस एन्ऱदु उन्नै उन्नि
नयक्कुम् अवर्क्कु इदु इळुक्कु एन्बर् नल्लवर् एन्ऱु नैन्दे

अब मैं आपकी यह स्तुति कर रहा हूं कि “अज्ञानप्रद पुण्यपाप नामक दो प्रकारके कर्म रूपी बेडीमें फंसाकर, (उससे) विवेक को नाशकर भ्रम पैदा करनेवाले संसार में जन्म लेनेवाले मेरे दुःख दूरकर, कृपया मेरा उद्धार करनेवाले हे श्रीरामानुज स्वामिन्।” परंतु सत्पुरुष कहते हैं कि यों स्तुति करना, प्रेमपूर्वक आपका ही नित्यध्यान करनेवाले द्रुतहृदयों के लिए अनुचित है। श्रीरामानुज स्वामीजी के पावनत्व व भोग्यत्व नामक दो धर्म होते हैं। पावनत्व माने भक्तों के पाप मिटाकर उनको पवित्र बनाना, और भोग्यत्व माने नित्य अनुभव करने योग्य मधुर रहना। रसिक लोगों का यह मंतव्य है कि इन दोनों में पावनात्व की अपेक्षा भोग्यत्व का अनुसंधान करना ही श्रेष्ठ है। क्योंकि पावनत्व का अनुसंधान करने वाला कुछ स्वार्थका ख्याल करता है, अर्थात् अपने पाप मिटाने की इच्छा करता है; भोग्यत्व के अनुसंधान में यह स्वार्थभावना नहीं रहती। अतः हाल में अमुदनार कह रहे हैं कि मैंने श्रीस्वामीजी के पावनत्व का ही जो बहुत अनुसंधान किया यह कुछ अनुचित- सा लगेगा। इसका यह तात्पर्य नहीं कि पावनत्व का अनुसंधान सर्वथा अनुचित है। क्योंकि श्रीस्वामीजी के सभी गुणों का चिन्तन करना आवश्यक है ही। और गुरुजी ने जो हमारे पापों को समूल मिटा दिया, उसका अनुसंधान नहीं करने पर हम कृतघ्न भी बनेंगे। अतः एक दृष्टि से यह काम करना पड़ता है और दूसरी दृष्टि से इस पर जोर डालना कुछ अनुचित सा प्रतीत होता है।

पाशुर १०२: श्रीरंगामृत स्वामीजी स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी से उनके उदार गुण का कारण पूछते हैं ताकि वें इस संसार में उनके ओर बढ़ सके।

नैयुम् मनम् उन् गुणन्गळै उन्नि एन् ना इरुन्दु एम्
ऐयन् इरामानुसन् एन्ऱु अळैक्कुम् अरु विनैयेन्
कैयुम् तोळुम् कण् करुदिडुम् काणक् कडल् पुडै सूळ्
वैयम् इदनिल् उन् वण्मै एन् पाल् एन् वळर्न्ददुवे

(हे गुरुजी!) मेरा मन आपके गुणों का ही ध्यान करता हुआ पिघल जा रहा है; मेरी वाणी सुदृढ़ अध्यवसाय के साथ यों पुकार रही है कि, “हे हमारे नाथ श्री रामानुज स्वामिन् !” मुझ महापापी के हाथ भी (आपके लिए) अंजलि कर रहे हैं; आँख(आपके) दर्शन पाना चाहती हैं । समुद्र-परिवृत इस विशाल पृथ्वीतल पर मुझ पर ही आपकी दया जो इस प्रकार फैल रही है, इसका कारण क्या होगा ?

पाशुर १०३: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि उनकी इंद्रीया श्रीरामानुज स्वामीजी की ओर शामिल हो गई क्योंकि वें बड़ी कृपा से अपने कर्मों से मुक्त हो गये और उन्होंने उन्हें बहुर अमूल्य ज्ञान प्रदान किया।

वळर्न्द वेम् कोबम् मडन्गल् ओन्ऱाय् अन्ऱु वाळ् अवुणन्
किळर्न्द पोन् आगम् किळित्तवन् कीर्त्तिप् पयिर् एळुन्दु
विळैन्दिडुम् सिन्दै इरामानुसन् एन्दन् मेय् विनै नोय्
कळैन्दु नल् ज्ञानम् अळित्तनन् कैयिल् कनि एन्नवे

पूर्वकाल में कठोर कोपवाले एक नरसिंगरूप को धारण कर, खङ्गधारी (हिरण्य) असुर का मत्त व दृढ़ वक्ष चीर डालने वाले भगवान का दिव्य यशरूपी सत्य जिसमें खूब उत्पन्न होता है, ऐसे (सुक्षेत्र) मनवाले श्रीरामानुज स्वामीजीने, मेरे शरीर में व्याप्त समस्त पाप मिटा कर, मुझ करतलामलक की तरह अतिस्पष्ट ज्ञान को भी प्रदान किया। श्रीरामानुज स्वामीजी के मनरूपी अच्छे क्षेत्र में भगवान के दिव्ययशरूपी सस्य खूब उपजते हैं; कहनेका यह तात्पर्य है कि श्री स्वामीजी के मन में सदा भगवान के दिव्य यश के सिवा दूसरी किसी वस्तु की चिंता नहीं रहती। ऐसे उन्होने अमुदनार के समस्त पाप मिटाकर उन्हें अतिविशद ज्ञान को प्रदान किया।

पाशुर १०४:  श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा हीं एक काल्पनिक प्रश्न का उत्तर देते हुए “अगर आप भगवान को देखेंगे तो क्या करेंगे?” श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि अगर भगवान स्वयं के विषय में भी प्रगट होते हैं तो भी वें कहते हैं कि वें श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुणों को छोड़ और कुछ नहीं मांगेंगे जो उनके दिव्य स्वरूप में दीप्तिमान हैं।

कैयिल् कनि अन्न कण्णनैक् काट्टित् तरिलुम् उन्दन्
मेय्यिल् पिऱन्गिय सीर् अन्ऱि वेण्डिलन् यान् निरयत्
तोय्यिल् किडक्किलुम् सोदि विण् सेरिलुम् इव्वरुळ् नी
सेय्यिल् तरिप्पन् इरामानुस एन् सेळुम् कोण्डले

(औदार्य के विषय में) विलक्षण मेघ के समान विराजमान हे श्रीरामानुज स्वामिन्! यदि आप मुझे साक्षात् भगवान के ही हस्तामलक की भांति अतिविशद दर्शन करा दें, तो भी मैं (उनकी परवाह न करता हुआ) आपके दिव्यमंगलविग्रह के (सौन्दर्यादि) शुभगुणों के सिवा दूसरी किसी वस्तू पर अपनी नजर नहीं डालूंगा; मैं बेशक संसाररूपी इस नरक में ही पड़ा रहूंगा; अथवा ज्योतिर्मय परमधाम पहुँचूंगा, इसकी चिंता नहीं। परंतु आप यही कृपा करें (कि मैं उक्त प्रकार आपके श्रीविग्रह के ही दर्शन करता रहूं); यह कृपा पाकर ही मैं (संसार में ही अथवा मोक्षमें हो) शांति पा सकूंगा।

पाशुर १०५: जबकी सभी जन कहते हैं संसार को छोड़ना हैं और परमपद को प्राप्त करना हैं और उस परमपद को पाने की इच्छा के लिए दोनों को समान समझना चाहिए। आपका इच्छुक स्थान कौनसा हैं? वें इस पाशुर के जरिए बताते हैं।

सेळुम् तिरैप् पाऱ्कडल् कण् तुयिल् मायन् तिरुवडिक्कीळ्
विळुन्दिरुप्पार् नेन्जिल् मेवु नल् ज्ञानि नल् वेदियर्गळ्
तोळुम् तिरुप् पादन् इरामानुसनैत् तोळुम् पेरियोर्
एळुन्दु इरैत्तु आडुम् इडम् अडियेनुक्कु इरुप्पिडमे

सुंदर लहरों से समावृत क्षीरसागर में शयन करनेवाले अत्याश्चर्यचेष्टित भगवान के श्री पादों के आश्रय में रहनेवाले महात्माओं के हृदय में नित्यनिवास करनेवाले, श्रेष्ठ ज्ञानियों तथा परमवैदिकों से प्रणम्य श्रीपादवाले श्री रामानुज स्वामीजी के भक्त महात्मा लोग जिस स्थल में, आनंद के मारे उठकर नाचते, कूदते और कोलाहल मचाते हुए निवास करते हैं, वही स्थान मेरा भी निवासस्थान होगा। कितने ही महात्मा लोग क्षीराब्धिनाथ भगवान के भक्त होते हुए भी, उनकी उपेक्षा कर, श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीपादों का निरंतर ध्यान करते हैं, और उस आनंद से मस्त होकर नाचते कूदते और कोलाहल मचाते रहते हैं। ऐसे महात्मा श्रीरामानुज-भक्त लोग जहा विराजते हैं, मैं भी वहीं निवास करना चाहता हूं।

पाशुर १०६: श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगामृत स्वामीजी का उनके प्रति स्नेह को देखकर बड़ी कृपा से श्रीरंगामृत स्वामीजी के मन की इच्छा करते हैं। यह देखकर श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्नता से और शुक्र से यह पाशुर का पाठ करते हैं। 

इरुप्पिडम् वैगुन्दम् वेन्गडम् मालिरुन्जोलै एन्नुम्
पोरुप्पिडम् मायनक्कु एन्बर् नल्लोर् अवै तम्मोडुम् वन्दु
इरुप्पिडम् मायन् इरामानुसन् मनत्तु इन्ऱु अवन् वन्दु
इरुप्पिडम् एन्दन् इदयत्तुळ्ळे तनक्कु इन्बुऱवे

साधु पुरुष कहते हैं कि अत्याश्चर्य दिव्य चेष्टितवाले भगवान जिनके अद्भुत गतिविधियों के वासस्थान, श्रीवैकुंठ धाम, श्रीवेंकटाचल और श्रीवनगिरी (तिरुमालिरुन्जोलै) नामक पर्वत हैं; ऐसे भगवान उक्त समस्त स्थानों के साथ पधारकर श्रीरामानुज स्वामीजी के हृदय में निवास करते हैं; एवं वे गुरुजी हाल में यहां पधार कर मेरे हृदय में सानंद विराज रहे हैं।

पाशुर १०७:  श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य मुखारविंद को देखकर जिन्होंने श्रीरंगामृत स्वामीजी के प्रति स्नेह प्रगट किया हैं, श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कुछ हैं जो वें उन्हें प्रदान करना चाहते हैं और अपनी इच्छा को प्रगट करते हैं।

इन्बुऱ्ऱ सीलत्तु इरामानुस एन्ऱुम् एव्विडत्तुम्
एन्बुऱ्ऱ नोय् उडल् तोऱुम् पिऱन्दु इऱन्दु एण् अरिय
तुन्बुऱ्ऱु वीयिनुम् सोल्लुवदु ओन्ऱु उण्डु उन् तोण्डर्गट्के
अन्बुऱ्ऱु इरुक्कुम्बडि एन्नै आक्कि अन्गु आट्पडुत्ते

हे आनंदपूर्ण व सौशील्यगुणविभूषित श्रीरामानुज स्वामिन्। आपसे मेरी यह एक विनती है कि, हड्डी में घुसकर दुःख देने वाले रोगों के आस्पद अनेक शरीरों में जन्म लेना, फिर मरना, इस प्रकार अनंत दुःख पाते रहने पर भी, मुझे सर्वदेशों व सर्वकालों में आप अपने भक्तों का ही भक्त बनाकर उन्हीकी सेवा में लगा दीजिए, यही मेरी प्रार्थना है। (मैं जन्म व्याधि जरा मरण रूप अनंत दुःखपूर्ण इस संसार से डरता हुआ, इससे मुक्ति नहीं माँगूंगा। यह कैसा भी हो, इसकी चिंता नहीं; किंतु मैं आपके भक्तों का ही भक्त और नित्यसेवक हो जाऊं, यह एक ही मेरी प्रार्थना है।)

पाशुर १०८:  इस प्रबन्ध के प्रारम्भ में श्रीरंगामृत स्वामीजी ने “रामानुजन् चरणारविन्दम् नाम्मन्निवाळ नेञ्जे” के लाभ की प्रार्थना किए हैं (हमें श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों में उपयुक्त होकर रहना चाहिए), श्रीमहालक्ष्मीजी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी इच्छा पूर्ण करने की पुरूषकार करे। अंतिम पाशुर में भी वें श्रीमहालक्ष्मीजी को पाने को पूछते हैं जो हमें कैंकर्य रूपी धन प्रदान करेंगे।

म् कयल् पाय् वयल् तेन्नरन्गन् अणि आगम् मन्नुम्
पन्गय मामलर्प् पावयैप् पोऱ्ऱुदुम् पत्ति एल्लाम्
तन्गियदु एन्नत् तळैत्तु नेन्जे नम् तलै मिसैये
पोन्गिय कीर्त्ति इरामानुसन् अडिप् पू मन्नवे

हे मन! मानों सारी भक्ति हमारें यहां ही स्थिर प्रतिष्ठित हुई होगी, ऐसा विलक्षण भाग्य पाने के लिए, और विशाल यशवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणारविन्दों को अपने शिरोभूषण के रूप में नित्य धारण करने के लिए, सुंदर मिनभरित खेतों से परिवृत श्रीरंगक्षेत्र में विराजमान भगवान के अतिमनोहर श्रीवक्ष में नित्यनिवास करनेवाली, श्रेष्ठ कमल पुष्प में अवतीर्ण, प्रतिमासदृश सुंदरी श्री महालक्ष्मीजी की हम स्तुति करेंगे। इस प्रार्थना के साथ यह दिव्यप्रबन्ध समाप्त किया गया। इसके आदि तथा अंत में श्री महालक्ष्मीजी का नामस्मरण मंगलार्थ किया गया है। इसमें कविनामांकन और फलश्रुति नहीं हैं। इसका गान स्वयंपुरुषार्थ है; अतः इसके लिए दूसरा फल ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। और अत्यंत विनयपूर्ण होने से अमुदनार ने इसमें अपना नाम नहीं बताया।

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 91 से 100

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रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

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पाशुर ९१: हालांकि संसारी जन भागीदारी नहीं थे श्रीरंगामृत स्वामीजी यह स्मरण कराते हैं कि कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें इस संसार से ऊपर उठाया और उनकी प्रशंसा किये।

मरुळ् सुरन्दु आगम वादियर् कूऱुम् अवप् पोरुळाम्
इरुळ् सुरन्दु एय्त्त उलगु इरुळ् नीन्गत् तन् ईण्डिय सीर्
अरुळ् सुरन्दु एल्ला उयिर्गट्कुम् नादन् अरन्गन् एन्नुम्
पोरुळ् सुरन्दान् एम् इरामानुसन् मिक्क पुण्णियने

विवेकशून्य शुष्कतर्कानुसारी शैवागमियों से प्रतिपादित शिवपारम्यरूप अपार्थ से मोहित अज्ञानसमावृत, अज्ञान मिटानेवाले, इस भूमंडल में अवतार लेकर, इस परमार्थ को प्रकाशित करते हुए कि, “भगवान श्रीरंगनाथ ही सकल जगत के स्वामी हैं”, परमदयालु श्री रामानुजस्वामीजी परमधार्मिक हैं।

पाशुर ९२:  जब यह अहसास हुआ कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें बिना कोई कारण से स्वीकार कर लिया हैं और उनके आंतरीक और बाह्य इंद्रीयों पर कृपा किये हैं, वें प्रसन्न होकर श्रीरामानुज स्वामीजी से पूछते हैं कि इसका क्या कारण हैं।

पुण्णियनोन्बु पुरिन्दुम् इलेन् अडि पोऱ्ऱि सेय्युम्
नुण् अरुम् केळ्वि नुवन्ऱुम् इलेन् सेम्मै नूल् पुलवर्क्कु
एण् अरुम् कीर्त्ति इरामानुस इन्ऱु नी पुगुन्दु एन्
कण्णुळ्ळुम् नेन्जुळ्ळुम् निन्ऱ इक्कारणम् कट्टुरैये

हे सकलशास्त्रवेत्ता कवियों के भी नापने की अशक्य दिव्य कीर्तिवाले श्रीरामानुज स्वामिन्! मैंने किसी पवित्र व्रतका अनुष्ठान नहीं किया; और आपके पादारविन्दों की स्तुति करने में अपेक्षित सूक्ष्म व श्रेष्ठ अर्थ सुने भी नहीं। तो भी आप मेरे नेत्र व हॄदय में प्रवेश कर जो विराजमान हैं, इसका कारण बता दीजिए। और क्या? आपकी निर्हेतुक कृपा ही इसका कारण हैं।

 पाशुर ९३:  हालांकि श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें कुछ नहीं कहते हैं परन्तु श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह स्पष्ट हो जाता हैं कि जैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने बिना किसी के कहे कुदृष्टि तत्त्वों का नाश किये हैं वैसे ही श्रीरंगामृत स्वामीजी के कहे बिना उनके कर्म अनुसार किया और कहे कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने कृपा कर यह किया हैं।

कट्टप् पोरुळै मऱैप्पोरुळ् एन्ऱु कयवर् सोल्लुम्
पेट्टैक् केडुक्कुम् पिरान् अल्लने एन् पेरु विनैयैक्
किट्टिक् किळन्गोडु तन् अरुळ् एन्नुम् ओळ् वाळ् उरुवि
वेट्टिक् कळैन्द इरामानुसन् एन्नुम् मेय्त् तवने

मेरे पास पधारकर अपनी कृपारूपी सुंदर खड्ग को मियान से निकाल कर, उससे मेरे घोर पापों को जड़ से उखाड़ देनेवाले महातपस्वी श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदों के अपार्थ करनेवाले कुदृष्टियों के दुर्वाद दूर किये।

पाशुर ९४:  श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं हालांकि श्रीरामानुज स्वामीजी बड़ी कृपा से शरणागति से श्रीवैकुण्ठ तक उन सभी को लाभ देंगे, जो उनके शरण हुए हैं, परन्तु श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुणों को छोड़ और किसी का भी अनुभव नहीं करना चाहते हैं।

तवम् तरुम् सेल्वुम् तगवुम् तरुम् सरियाप् पिऱविप्
पवम् तरुम् तीविनै पाऱ्ऱीत् तरुम् परन्दामम् एन्नुम्
तिवम् तरुम् तीदिल् इरामानुसन् तन्नैच् चार्न्दवर्गट्कु
उवन्दु अरुन्देन् अवन् सीर् अन्ऱि यान् ओन्ऱुम् उळ् मगिळ्न्दे

किसी प्रकार के दोष से विरहित श्रीरामानुज स्वामीजी अपने आश्रितों को शरणागति नामक तपस्या देते हैं; भक्तिसंपद देते हैं; अपनी कृपा भी देते हैं; मिटाने के अशक्य जन्म परम्परा के हेतु भूत उनके पाप मिटा देते हैं; और परमधाम नामक दिव्यस्थान (श्रीवैकुंठ) भी देते हैं। अतः मैं उनके कल्याणगुणों के सिवा दूसरी किसी वस्तु का सप्रेम अनुभव नहीं करूंगा।

पाशुर ९५: श्रीरामानुज स्वामीजी के ज्ञान, शक्ति, आदि बारें सोचते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी बड़ी करुणा से कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी इस संसार से नहीं हैं बल्कि नित्यसूरी है जिनका इस संसार से कोई सम्बन्ध नहीं हैं, परन्तु इस संसार में अवतार लिया हैं।

उळ् निन्ऱु उयिर्गळुक्कु उऱ्ऱनवे सेय्दु अवर्क्कु उयवे
पण्णुम् परनुम् परिविलनाम्बडि पल् उयिर्क्कुम्
विण्णिन् तलै निन्ऱु वीडु अळिप्पान् एम् इरामानुसन्
मण्णिन् तलत्तु उदित्तु उय्मऱै नालुम् वळर्त्तनने

समस्त आत्माओं को मोक्षप्रदान करने के लिए श्रीवैकुंठ से भूतल पर अवतार लेकर श्री रामानुज स्वामीजी ने इस प्रकार सबके उज्जीवनहेतु चारों वेदों का पोषण किया, जिसे देख कर कहना पड़ता है कि समस्त आत्माओं के अंतर्यामी रह कर, सदा उनके उद्धार के ही प्रयत्न करनेवाले भगवान की कृपा भी (श्री स्वामीजी की कृपा की अपेक्षा) कम है।

पाशुर ९६: श्रीरामानुज स्वामीजी ने कृपा कर वेदान्त के अनुसार दो राह दिखाये हैं एक भक्ति और दूसरी प्रपत्ती। इन दोनों में क्या प्रपत्ती हीं सरल हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी के स्नेह में शरण ली हैं। 

वळरुम् पिणि कोण्ड वल्विनैयाल् मिक्क नल्विनैयिल्
किळरुम् तुणिवु किडैत्तऱियादु मुडैत्तलै ऊन्
तळरुम् अळवुम् तरित्तुम् विळुन्दुम् तनि तिरिवेऱ्कु
उळर् एम् इऱैवर् इरामानुसन् तन्नै उऱ्ऱवरे

अत्यधिक दुःख देनेवाले पापों के निमित्त, शरणागति नामक श्रेष्ठधर्म के आवश्यक दृढविश्वास से विरहित होकर, फलतया दुर्गंध युक्त शरीर छूटने तक नानाविध क्षुद्र सुखदुख भोगते हुए इसी में असहाय पडे रहनेवाले मेरे लिए श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्त ही स्वामी होते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी से उपदिष्ट भक्ति या प्रपत्ति में मेरा कोई संबंध नहीं; मैं संसार में ही पडा रहा हूँ ; तथापि मैं उनके पादभक्तों का कृपापात्र हूँ और इसीसे मेरा उद्धार होगा।

पाशुर ९७: क्या कारण हैं कि न केवल श्रीरामानुज स्वामीजी परन्तु उनके शिष्य के भी हम इच्छुक हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं यह केवल श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा के कारण हुआ हैं।

 तन्नै उऱ्ऱु आट्चेय्युम् तन्मैयिनोर् मन्नु तामरैत्ताळ्
तन्नै उऱ्ऱु आट्चेय्य एन्नै उऱ्ऱान् इन्ऱु तन् तगवाल्
तन्नै उऱ्ऱार् अन्ऱित् तन्मै उऱ्ऱार् इल्लै एन्ऱु अरिन्दु
तन्नै उऱ्ऱारै इरामानुसन् गुणम् साऱ्ऱिडुमे

“मेरे भक्त तो मिलते हैं, परंतु उन भक्तों के गुणकीर्तन करने के स्वभाववाले मिलते नहीं”; यों विचार करते हुए श्रीरामानुज स्वामीजी ने आज अपनी विशेष कृपा से मुझे, अपना (श्री स्वामीजी का) आश्रय लेकर सेवा करने के स्वभाववाले (अर्थात् अपने भक्तों के) सुंदर उभय पादारविन्दों का सेवक बना दिया। जैसे भगवद्भक्ति की अपेक्षा भगवद्भक्तभक्ति (अथवा आचार्यभक्ति) श्रेष्ठ मानी जाती है, ठीक इसी प्रकार उस आचार्यभक्ति से भी बढ़कर आचार्यभक्तभक्ति श्रेष्ठ है। अब श्रीरामानुज स्वामीजी ने सोचा कि, “सभी लोग मेरे भक्त बनना चाहते हैं; कोई मेरे भक्तों का भक्त बनता नहीं। इस अमुदानार को यह भाग्य दूं ।” अतः उन्होंने परमकृपा से मुझे (अमुदानार को) अपने भक्त श्री कूरेशस्वामीजी का भक्त बना दिया ।

पाशुर ९८: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने दिव्य मन में यह कल्पना करते हैं कि भगवान उन्हें उनके कर्मानुसार स्वर्ग या नरक में भेजेंगे और श्रीरामानुज स्वामीजी से पूछते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें यह आश्वासन देते हैं कि भगवान ऐसे नहीं करेंगे जो उनके शरण हुए हैं और उन्हें कहते हैं कि इस बात से परेशान मत होईए। 

इडुमे इनिय सुवर्क्कत्तिल् इन्नम् नरगिलिट्टुच्
चुडुमेअवऱ्ऱैत् तोडर् तरु तोल्लै सुज़्हल् पिऱप्पिल्
नडुमे इनि नम् इरामानुसन् नम्मै नम् वसत्ते
विडुमे सरणम् एन्ऱाल् मनमे नैयल् मेवुदऱ्के

हमारे यह अनुसंधान करने के बाद, कि “श्रीरामानुज स्वामीजी ही हमारे लिए गति हैं”, क्या वे हमें (अत्यल्प व नश्वर) सुखदायक स्वर्ग भेजेंगे ? अथवा नरक भेज कर दुःख भुगावेंगे ? अथवा उन स्वर्गनरकों के संबंधित अनादि जन्मचक्र में फ़सावेंगे ? अथवा अपने रास्ते पर छोड़कर उपेक्षा कर देंगे? कुछ नहीं। अतः हे मन। तुम अपने स्वरूपानुरूप पुरुषार्थ पाने के विषय में चिंता मत करो ।श्री रामानुज स्वामीजी की शरण में जाने मात्र से वे हमें स्वर्ग नरक व संसार रूप दुर्गति पाने से रोककर स्वरूपानुरूप सद्गति पहुंचा देंगे। अतः इस विषय में हमें चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहती।

 पाशुर ९९: क्योंकि हम इस संसार में रहते हैं जहाँ बाह्य और कुदृष्टि जन की संख्या अधिक हैं, क्या यहाँ हमें भूलने कि संभावना अधिक नहीं हैं? श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं ,श्रीरामानुज स्वामीजी के अवतार लेने के पश्चात इन जनों ने अपना आजीविका खो दिया। 

तऱ्कच् चमणरुम् साक्कियप् पेय्गळुम् ताळ् सडैयोन्
सोल् कऱ्ऱ सोम्बरुम् सूनिय वादरुम् नान्मऱैयुम्
निऱ्कक् कुऱुम्बु सेय् नीसरुम् माण्डनर् नीळ् निलत्ते
पोऱ्कऱ्पगम् एम् इरामानुस मुनि पोन्द पिन्ने

समणास जो बड़ी चालाकी से अपने तत्त्वों को बहस द्वारा आचारण किया, बौद्ध अपने तत्त्वों को चकमा देने के समान पकड़ते थे, शैव में तामस गुण है जिन्होंने शैवागमन सीखे, माध्यामिक जन सून्य सिद्धान्त का पालन करते थे, कुदृष्टि जन जो ऊपर कहे अनुसार नहीं रहते थे, वेदों का पालन करते थे परंतु उसका गलत अर्थ बताते थे ,यह सब , कल्पवृक्ष के समान उदार और हमे यह जन दिखाये ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी जब इस संसार मे अवतार लिए, नष्ट हो गए। (इस विशाल पृथ्वीतल पर श्रेष्ठ कल्पवृक्ष के सदृश परमोदार श्री रामानुज स्वामीजी का अवतार होने के बाद, शुष्कतर्क करने वाले क्षपणक, मूर्ख शाक्य, शैवागम के अभ्यासी राजस शैव, शून्यवादी और वेदों का अपार्थ करनेवाले, ये सभी नष्ट हो गये।)

 पाशुर १००: यह देखकर की उनके दिव्य मन श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों मे निरत हैं, श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी से कहते हैं कि उन्हें कुछ और दिखाकर भूलना नहीं। 

पोन्ददु एन् नेन्जु एन्नुम् पोन्वण्डु उनदु अडिप् पोदिल् ओण् सीर्
आम् तेळि तेन् उण्डु अमर्न्दिड वेण्डिल् निन् पाल् अदुवे
ईन्दिड वेण्डुम् इरामानुस इदु अन्ऱि ओन्ऱुम्
मान्द किल्लादु इनि मऱ्ऱु ओन्ऱु काट्टि मयक्किडले

हे रामानुज स्वामिन! मेरे मनोरूपी सुन्दर भ्रमर ने, आपके पादारविन्दों में मनोहर दिव्यगुणरूपी मधु पाता हुआ वहीं नित्यवास करने के उद्देश्य से उन्हें प्राप्त किया; अतः आप भी उसे उन गुणों को ही प्रदान कीजीएगा; वह दूसरे किसी पदार्थ को नहीं पाएगा; इस कारण से आप दूसरी किसी (सांसारिक)  वस्तु बताकर उसे भ्रम में मत डालें।

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 81 से 90

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रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 71 से 80 

पाशुर ८१: वों स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी को समर्पण करते हैं कि वों कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा संशोधित किए गये हैं और कहते हैं उनके कृपा के समान ओर कुछ नहीं हैं।

सोर्वु इन्ऱि उन्दन् तुणै अडिक्कीळ्त् तोण्डुपट्टवर् पाल्
सार्वु इन्ऱि निन्ऱ एनक्कु अरन्गन् सेय्य ताळ् इणैगळ्
पेर्वु इन्ऱि इन्ऱु पेऱुत्तुम् इरामानुस इनि उन्
सीर् ओन्ऱिय करुणैक्कु इल्लै माऱु तेरिवुऱिले

मैं उन जनों से जूड़ा हुआ नहीं था जो आपके चरण कमलों के दास हैं और जो अपने मन को और कहीं नहीं लगाते थे। हे श्रीरामानुज ! जिन्होने आज मुझे श्रीरंगनाथ भगवान के लाल दिव्य चरण कमल दिये जो एक दूसरे को पूरक हैं और जो उनके दिव्य काले रूप के रंग से पूर्ण भिन्न हैं। इस बात का विवेचन करने पर यही सिद्ध होता है कि आपकी कृपा सर्वथा उपमानरहित है ।

पाशुर ८२: श्रीरंगामृत स्वामीजी बड़े प्रसन्नता से कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी, जिन्होंने उन्हें ,श्रीरंगनाथ भगवान से जुड़ जानेकी निर्देश दिया, वे  धर्मनिष्ठ मानव हैं।

तेरिवु उऱ्ऱ ज्ञानम् सेऱियप् पेऱादु वेम् ती विनैयाल्
उरु अऱ्ऱ ज्ञानत्तु उळल्गिन्ऱ एन्नै ओरु पोळुदिल्
पोरु अऱ्ऱ केळ्वियनाक्कि निन्ऱान् एन्न पुण्णीयनो
तेरिवु उऱ्ऱ कीर्त्ति इरामानुसन् एन्नुम् सीर् मुगिले

सुप्रसन्न विवेक से विरहित होकर अतिक्रूरपापों के फलतया कृत्याकृत्यविवेक खोकर दुःख पानेवाले मुझको एक क्षण भर में अन्यादृश बहुश्रुत (माने बहुत उपदेश सुनकर ज्ञानी बननेवाला) बनानेवाले, सुप्रसिद्ध कीर्तियुत और कालमेघसदृश परमोदार श्री रामानुज स्वामीजी अनुपम परम धार्मिक हैं। सर्वथा पापी व अज्ञानी मुझको एक क्षण में विलक्षण ज्ञानी बनानेवाले श्री स्वामीजी का यश,औदार्य और धार्मिकत्व दूसरे व्यक्ति में नहीं देखे जा सकते।

 पाशुर ८३: श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें पूछते हैं कि “क्या शरणागति करना सामान्य नहीं हैं?” श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि वें उन जनों में नहीं हैं जो भगवान के शरण हुए हैं और श्रीवैकुंठ प्राप्त करतें  हैं । परन्तु वें आपके उदारता से आपके दिव्य चरण कमलों में शरण होकर मोक्ष प्राप्त करता हैं।

सीर् कोण्डु पेर् अऱम् सेय्दु नल् वीडु सेऱिदु एन्नुम्
पार् कोण्ड मेन्मैयर् कूट्टन् अल्लेन् उन् पदयुगमाम्
एर् कोण्ड वीट्टै एळिदिनिल् एय्दुवन् उन्नुडैय
कार् कोण्ड वण्मै इरामानुस इदु कण्डु कोळ्ळे

हे श्रीरामानुज स्वामिन्! शमदम इत्यादि आत्मगुणोपेत होकर, शरणागतिरुप श्रेष्ठ धर्म का अनुष्ठान कर, फलतया मोक्षरूप परमपुरुषार्थ पानेके दृढ़ निश्चयवाले, प्रसिद्ध प्रभाववाले महात्माओं की गोष्ठी में मैं नहीं मिलूंगा; किंतु बडी सरलता से आपके उभयपादारविंदरूप परमविलक्षण मोक्ष पाऊंगा। मेरा यह अध्यवसाय भी आपके सीमातीत औदार्य का फल है; यह तो आप ही स्वयं जानते हैं।

 पाशुर ८४: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं उन्हें भविष्य में और भी लाभ प्राप्त करना हैं परन्तु अभी तक जो लाभ प्राप्त हुये हैं उसका कोई अन्त हीं नहीं हैं।

कण्डु कोण्डेन् एम् इरामानुसन् तन्नै काण्डलुमे
तोण्डु कोण्डेन् अवन् तोण्डर् पोन् ताळिल् एन् तोल्लै वेम् नोय्
विण्डु कोण्डेन् अवन् सीर् वेळ्ळ वारियै वाय् मडुत्तु इन्ऱु
उण्डु कोण्डेन् इन्नम् उऱ्ऱन ओदिल् उलप्पु इल्लैये

मैंने आज श्री रामानुज स्वामीजी के दर्शन किये; (अर्थात् उनके स्वरूप स्वभावादियों को ठीक जान लिया;) दर्शन के समय ही उनके भक्तों के मनोहर श्रीपादों की भक्ति पायी; और (उससे) अपने समस्त पाप खो लिए; उन आचार्य-सार्वभौम के कल्याण गुणामृतसागर का आस्वादन भी किया। इस प्रकार मेरे उपलब्ध-कल्याण परंपरा सत्य ही वर्णनातीत है।

 पाशुर ८५: “आपने कहा कि आपने श्रीरामानुज स्वामीजी को जैसे हैं वैसे देखा हैं। आपने यह भी कहा कि आप उनके दासों के श्रीचरण  कमलों में दास हैं। आप इन दोनों में किसमे अधिक शामिल हैं?” वें कहते हैं उनके आत्मा का श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों को छोड़कर और कोई शरण नहीं हैं। 

ओदिय वेदत्तिन् उट्पोरुळाय् अदन् उच्चि मिक्क
सोदियै नादन् एन अऱियादु उळल्गिन्ऱ तोण्डर्
पेदैमै तीर्त्त इरामानुसनैत् तोळुम् पेरियोर्
पादम् अल्लाल् एन्दन् आरुयिर्क्कु यादु ओन्ऱुम् पऱ्ऱिल्लैये

पठ्यमान वेदों के परम तत्पर्यभूत और वेदों के शिरोभूत उपनिषदों से प्रतिपाद्य परंज्योतिस्वरूप (अथवा उपनिषदों में स्पष्टतया प्रतिपाद्य) श्रीमन्नारायण को सर्वशेषि जानने में अशक्त, और अत एव देवतान्तरभजन करनेवाले पामरों का अज्ञान मिटानेवाले श्री रामानुज स्वामीजी के भक्तों के सिवाय मेरी दूसरी कोई गति नहीं है। परंतु यह अर्थ समझने में अशक्त मुर्खलोग देवतान्तरों की सेवा करने लगे। श्री रामानुज स्वामीजी ने इनकी यह मूर्खता मिटा दी।

 पाशुर ८६: यह स्मरण करना कि वें उन लोगों से प्रीतिमय थे जो सांसारिक सुखों की ओर शामिल थे, वें कहते हैं कि अब वें ऐसे नहीं करेंगे और जो श्रीरामानुज स्वामीजी का ध्यान करेंगे वें उन पर राज्य करने योग्य हैं।

पऱ्ऱा मनिसरैप् पऱ्ऱी अप्पऱ्ऱु विडादवरे
उऱ्ऱार् एन उळन्ऱु ओडि नैयेण् इनि ओळ्ळिय नूल्
कऱ्ऱार् परवुम् इरामानसनैक् करुदुम् उळ्ळम्
पेऱ्ऱार् यवर् अवर् एम्मै निन्ऱु आळुम् पेरियवरे

क्षुद्र मानवों का आश्रयण करके, एक क्षण भर के लिए भी उनका संग नहीं छोड़ते हुए, उनको ही परमबांधव मान कर, उनके पीछे पीछे ही दौडते हुए, उनकी सेवा कर मैंने अब तक जो दुःख पाया ऐसा दुःख अबसे नहीं पाऊंगा । श्रेष्ठ शास्त्रों के वेत्ता महात्माओं से संस्तुत श्रीरामानुज स्वामीजी का ही अपने मन से ध्यान करनेवाले महात्मा लोग ही अब सदा के लिए हमारे शेषी हैं।

 पाशुर ८७: जब स्मरण किया गया कि यह कलियुग हैं और वह उन्हें स्थिर नहीं रहने देगा वें कहते हैं कि कली उन्हीं  पर प्रहार करेगा जो श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा प्रदान किए गये ज्ञान में निरत नहीं रहते हैं।

पेरियवर् पेसिलुम् पेदैयर् पेसिलुम् तन् गुणन्गट्कु
उरिय सोल् एन्ऱुम् उडैयवन् एन्ऱु एन्ऱु उणर्विल् मिक्कोर्
तेरियुम् वण् कीर्त्ति इरामानुसन् मऱै तेर्न्दु उलगिल्
पुरियुम् नल् ज्ञानम् पोरुन्दादवरैप् पोरुम् कलिये

“ज्ञानी लोग स्तुति करें, अथवा अल्पज्ञ स्तुति करें”, गुरुजी के शुभगुण उनकी वाणी के अनुगुण ही होते हैं, यों कहते हुए महात्मा लोग जिनका यशोगान करते हैं, ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी से वेदों का विवेचनपूर्वक इस धरातल पर उपदिष्ट श्रेष्ठ ज्ञान नहीं पानेवाले भाग्यहीन मानव कलिपुरुष से पीड़ित होते हैं। श्री रामानुज स्वामीजी का यशोगान करने के विषय में अज्ञप्राज्ञविभाग होता ही नहीं। दोनों की स्तुति एक समान ही प्रतीत होगी; क्योंकि उनकी महिमा सागर की भांति अथाह रहती है और कोई भी उसको पार नहीं कर सकता। फिर अज्ञकृत स्तुति की अपेक्षा विशेषज्ञ कृत स्तुति में कौनसी विशेषता रह सकेगी? कुछ नहीं। ऐसे महावैभववाले उन्होंने समस्त वेदों का ठीक विवेचन करके सबके योग्य श्रेष्ठ उपदेश दिया। परंतु कोई कोई, कलिपुरुष के भक्त उस उपदेश से लाभ नहीं लेना चाहते। अहो उनकी भाग्यहीनता!

पाशुर ८८: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं, वें श्रीरामानुज स्वामीजी की प्रशंसा करेंगे, जो सिंह के समान हैं, जो इस संसार में कुदृष्टिवालों (जो वेदों को गलत तरीके से व्याख्या करते हैं) जो बाघ के समान हैं, उनका नाश करने हेतु अवतार लिए हैं ।

कलि मिक्क सेन्नेल् कळनिक् कुऱैयल् कलैप् पेरुमान्
ओलि मिक्क पाडलै उण्डु तन् उळ्ळम् तडित्तु अदनाल्
वलि मिक्क सीयम् इरामानुसन् मऱै वादियराम्
पुलि मिक्कदु एन्ऱु इप् पुवनत्तिल् वन्दमै पोऱ्ऱुवने

अत्यधिक धान उपजनेवाले “कुरैयल” नामक स्थल में अवतीर्ण अप्रतिमविद्वान कलिवैरीसूरी( श्री परकालसूरी) से अनुगृहीत दिव्यश्रीसूक्तियों का अनुभव करके उससे पोषितचित्त एवं सम्प्राप्तज्ञानवाले श्रीरामानुजस्वामीजी नामक सिंहराज, यों कहते हुए कि,” इस धरातल पर वेदों का अपार्थ करनेवाले दुर्वादी रूप बाघ बहुत बढ़ गये”, (उन्हें दंड देने के लिए) यहां अवतीर्ण हुए। आपके इस यशका कीर्तन करूँगा। लोक में बहुत बढे हुए दुर्मतों का विनाश करने के लिए श्रीरामानुज नामक सिंह का अवतार हुआ। उन्होंने, “तिरुक्कुरैयलूर” नाम से प्रसिद्ध दिव्यक्षेत्र में अवतीर्ण, अप्रतिम विद्वत्सार्वभौम, श्री परकालसूरी से अनुगृहीत छे दिव्यप्रबंधों का ठीक अध्ययन कर उससे ज्ञान-वैशद्य प्राप्त किया।

 पाशुर ८९: पिछले पाशूर में श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं, वें श्रीरामानुज स्वामीजी कि प्रशंसा करेंगे। वें श्रीरामानुज स्वामीजी को उनके प्रशंसा के संभन्ध में अपने भय के विषय को बताते हैं।

पोऱ्ऱु अरुम् सीलत्तु इरामानुस निन् पुगळ् तेरिन्दु
साऱ्ऱुवनेल् अदु ताळ्वु अदु तीरिल् उन् सीर् तन्नक्कु ओर्
एऱ्ऱम् एन्ऱे कोण्डु इरुक्किलुम् एन् मनम् एत्ति अन्ऱि
आऱ्ऱगिल्लादु इदऱ्केन् निनैवाय् एन्ऱिट्टन्जुवने

यथार्थ स्तुति करने को अशक्य शीलगुण-परिपूर्ण, हे श्रीरामानुज स्वामिन्! मैं तो यह अर्थ ठीक समझ सकता हूं कि यदि मैं आपके दिव्यगुण जान कर उनकी स्तुति करूं तो (मुझ नीच से कीर्तित होने के कारण) आपको दोष लगेगा, और यदि मैं स्तुति न करूं, तो ही आपके गुणों की महिमा बढ़ेगी। तथापि मेरा मन (आपके गुणों की) स्तुति किये विना शांत न हो सकता है। यह सोचता हुए  कि इस विषय में आपका अभिप्राय कौन-सा होगा, मैं बहुत भयभीत हो रहा हूं।

 पाशुर ९०: श्रीरंगामृत स्वामीजी को भय से मुक्त करने हेतु श्रीरामनुज स्वामीजी उन्हें बहुत करुणा भरी नेत्रों से देखते हैं। भय मुक्त होने के पश्चात उन्हें खेद होता हैं कि जिनके पास अच्छा ज्ञान हैं वें स्वयं को श्रीरामानुज स्वामीजी कि मन, वाखी और शरीर से प्रशंसा कर ऊपर नहीं उठाते हैं और इस संसार के जन्म मरण के चक्कर में फंसे हुए रहते हैं।

निनैयार् पिऱवियै नीक्कुम् पिरानै इन्नीळ् निलत्ते
एनै आळवन्द इरामानुसनै इरुन्गविगळ्
पुनैयार् पुनैयुम् पेरियवर् ताळ्गळिल् पून्दोडैयल्
वनैयार् पिऱप्पिल् वरुन्दुवर् मान्दर् मरुळ् सुरन्दे

जो मानव, संसार दुःख मिटानेवाले परमोपकारक, और मेरा उद्धार करने के लिए ही इस भूतल पर अवतीर्ण, श्रीरामानुज स्वामीजी का ध्यान नहीं करते, उनकी स्तुति नहीं करते और ऐसी स्तुति करनेवाले सज्जनों की पुष्पमालाओं से अर्चना नहीं करते, ऐसे भाग्यहीन जन अत्यधिक अज्ञान से समावृत होकर, संसार में ही पडे रहकर दुःख भोगेंगे।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 71 से 80

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 61 से 70 

पाशुर ७१: श्रीरामानुज स्वामीजी ने भी उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें उत्कृष्ट झलक देखा और इस तरह श्रीरंगामृत स्वामीजी के ज्ञान को बढ़ाया ताकि वें उनके संग बड़ी दृड़ता से निरत रहे। श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने भविष्य को उज्ज्वल माना और संतोष का एहसास  किया। 

सार्न्ददु एन् सिन्दै उन् ताळिणैक्कीळ् अन्बु तान् मिगवुम्
कूर्न्ददु अत्तामरैत् ताळ्गळुक्कु उन् तन् गुणन्गलुक्के
तीर्न्ददु एन् सेय्गै मुन् सेय्विनै नी सेय्विनै अदनाल्
पेर्न्ददु वण्मै इरामानुस एम् पेरुम् तगैये

हे औदार्य गुणवाले, हमारे स्वामिन्, महात्मन् श्री रामानुज स्वामीजी! मेरा मन आपके उभय पादारविन्दों में लग्न हुआ; उन्हीं पादारविन्दों के विषय में भक्ति भी बढ़ गयी; मेरा काम भी आपके कल्याण गुण समूह का ध्यान बन गया, और मेरे जन्मांतर कृत सभी पाप आपके कटाक्षवीक्षण से नष्ट हो गये ।

पाशुर ७२: श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्न होते हैं यह सोचकर कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने एक और महान लाभ उनपर बरसाया हैं।

कैत्तनन् तीय समयक् कलगरै कासिनिक्के
उय्त्तनन् तूय मऱै नेऱि तन्नै एन्ऱु उन्नि उळ्ळम्
नेय्त्त अन्बोडु इरुन्दु एत्तुम् निऱै पुगळोरुडने
वैत्तनन् एन्नै इरामानुसन् मिक्क वण्मै सेय्दे

श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझको भी उन कीर्तिमान महात्माओं की गोष्ठी में मिला दिया जो यह अनुसंधान करते हुए, परमप्रीति के परवश होकर उनकी स्तुति कर रहे हैं कि, “श्रीस्वामीजी ने अपने विशेष औदार्य गुण से कलह करने में निरत दुर्मतवादियों का नाश कराया; और इस धरतालपर परमपवित्र वेदमार्ग को प्रतिष्ठापित किया ।”

 पाशुर ७३: जब श्रीरंगामृत स्वामीजी से यह कहा गया कि वें श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा उन्हें जो ज्ञान और प्रेम प्रदान किया गया हैं उससे वें पोषण कर सकते हैं तब श्रीरंगामृत स्वामीजी यह कहते हैं कि वें बिना श्रीरामानुज स्वामीजी का चिंतन कराते हुए स्वयं से किसी भी उपाय से नहीं रह सकते हैं। 

वण्मैयिनालुम् तन् मादगवालुम् मदि पुरैयुम्
तण्मैयिनालुम् इत् तारणियोर्गट्कुत् तान् सरणाय्
उण्मै नल् ज्ञानम् उरैत्त इरामानुसनै उन्नुम्
तिण्मै अल्लाल् एनक्कु इल्लै मऱ्ऱु ओर् निलै तेर्न्दिडिले

अपने औदार्यगुण, परम कृपा और चंद्रमा के समान मन की शीतलता से, स्वयं इस धरतालनिवासी सभी लोगों के रक्षक बनकर, उन्हें सत्य व विलक्षण ज्ञान का उपदेश देनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी का ही अनवरतध्यान करने के सिवाय मेरा दूसरा कोई अध्यवसाय नहीं है। सुगाढ विमर्श करने के बाद यह बात कर रहा हूँ ।

 पाशुर ७४:  श्रीरंगामृत स्वामीजी यह सोचकर आनन्द होते हैं कि भगवान के तुलना में कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी अन्य तत्त्वों पर विजय प्राप्त करते हैं।

 तेरार् मऱैयिन् तिऱम् एन्ऱु मायवन् तीयवरैक्
कूर् आळि कोण्डु कुऱैप्पदु कोण्डल् अनैय वण्मै
एर् आर् गुणत्तु एम् इरामानुसन् अव्वेळिल् मऱैयिल्
सेरादवरैच् चिदैप्पदु अप्पोदु ओरु सिन्दै सेय्दे

भगवान ठीक वेदमार्ग के समझने में अशक्त पापियों को अपने तेज चक्रायुध से दंड देते हैं; मेघके सदृश परमौदार्यवान एवं अनेक शुभगुणों से परिपूर्ण हमारे श्री रामानुज स्वामीजी तो उस श्रेष्ठ वेदमार्ग में संबंध न पानेवालों (बाह्यों व कुदृष्टियों) को, तभी चिंतित अपूर्व शास्त्रीय युक्तिबल से अपने वश कर लेते हैं। भगवान लोगों को वेदोपदिष्ट सन्मार्ग में लाने के लिए सर्वदा नानाप्रकार के प्रयत्न करते ही रहते हैं; परंतु कभी कभी किसी प्रबल पापी चेतन के विषय में उनके ये सभी प्रयत्न व्यर्थ हो जाते हैं; अर्थात् कंस, रावण जैसे वे पापीलोग अपना दुर्मार्ग छोड़ सन्मार्ग में नहीं आते। तब भगवान रुष्ट होकर चक्रायुध से उनके सिर काट डालते हैं। परंतु श्री रामानुज स्वामीजी कभी किसीको ऐसे दंड नहीं देते; किंतु तत्कालचिंतित किसी अपूर्वयुक्तिसे उन्हें सन्मार्ग में लाते हैं।

.पाशुर ७५: यह कल्पना करना कि श्रीरामानुज स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने गुणों में तभी निरत रहेंगे जब वें भगवान कि महानता को देखेंगे। श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं अगर भगवान स्वयं प्रगट होकर अपनी सुन्दरता को दिखाते हैं और कहते हैं मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा, केवल श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुण हीं उन्हें बाँध सकते हैं।

सेय्त्तलैच् चन्गम् सेळु मुत्तम् ईनुम् तिरु अरन्गर्
कैत्तलत्तु आळियुम् सन्गमुम् एन्दि नम् कण् मुगप्पे
मोय्त्तु अलैत्तु उन्नै विडेन् एन्ऱु इरुक्किलुम् निन् पुगळे
मोय्त्तु अलैक्कुम् वन्दु इरामानुस एन्नै मुऱ्ऱुम् निन्ऱे

श्लाध्य मोतियों को जन्म देनेवाले शंखों से युक्त खेतों से परिवृत श्रीरंगक्षेत्र में विराजमान श्रीरंगनाथ भगवान अपनी हथेलियों में शंखचक्र लेकर, हमारे सामने पधारकर,दबाते और लुभाते हुए भले ही यों कहें कि मैं तुझे नही छोडूंगा; तो भी हे श्रीरामानुज स्वामिन्! (मैं उनकी ओर न देखूंगा); आपके शुभगुण ही मुझे घेर कर अपनी ओर खींच लेते हैं। मधुरकवि स्वामीजी जैसे आचार्य निष्ठावालों का यह स्वभाव है कि वे भगवान की भी उपेक्षा करते हुए अपने गुरु का ही ध्यान,सेवन इत्यादि करते हैं। यही निष्ठा इस गाथा में भी उपवर्णित है।

 पाशुर ७६: श्रीरंगामृत स्वामीजी से यह सुनकर आनंदित होकर श्रीरामानुज स्वामीजी बड़ी कृपा से सोचते हैं कि वें उनके लिए क्या कर सकते हैं। श्रीरंगामृत स्वामीजी अपनी इच्छा को बड़ी दृढ़ता से प्रगट करते हैं।

निन्ऱ वण् कीर्त्तियुम् नीळ् पुनलुम् निऱै वेन्गडप् पोऱ्
कुन्ऱमुम् वैगुन्द नाडुम् कुलविय पाऱ्कडलुम्
उन् तनक्कु एत्तनै इन्बम् तरुम् उन् इणै मलर्त्ताळ्
एन् तनक्कुम् अदु इरामानुस इवै ईन्दु अरुळे

हे श्रीरामानुज स्वामिन्! शाश्वत विपुल यशवाला व नाना तीर्थभरित श्रीवेंकटाद्रि नामक दिव्य पर्वत, श्रीवैकुंठ दिव्यधाम, और श्लाध्य क्षीरसागर, ये सभी आपको जैसा आनंद देते हैं; आपके उभय पादारविन्द मुझे ठीक वैसा ही आनंद दे रहे हैं। अतः आप कृपया मुझे इन्हींको प्रदान करें।

 पाशुर ७७: श्रीरामानुज स्वामीजी अपने चरण कमल को श्रीरंगामृत स्वामीजी को प्रदान करने के पश्चात वें संतोष प्रगट करते हैं कि उन्हें जो इच्छा हैं वह प्राप्त हो गई हैं आप श्रीमान और मुझ पर क्या कृपा करेंगे।

ईन्दनन् ईयाद इन्नरुळ् एण्णिल् मऱैक् कुऱुम्बैप्
पाय्न्दनन् अम् मऱैप् पल् पोरुळाल् इप्पडि अनैत्तुम्
एय्न्दनन् कीर्त्तियिनाल् एन् विनैगळै वेर् पऱियक्
काय्न्दनन् वण्मै इरामानुसर्क्कु एन् करुत्तु इनिये

मुझ पर ऐसा विलक्षण कृपा करनेवाले, जो कि दूसरे किसी पर नहीं की गयी हो, वेदों के सच्चे अर्थों का प्रकाशन करते हुए असंख्य वेदविरुद्ध मतों का निरास करनेवाले, भूमंडलव्यापी दिव्यकीर्तिवाले, मेरे पापों को सजड मिटा देनेवाले और औदार्य के अपरावतार श्री रामानुज स्वामीजी, न जाने और भी क्या क्या कल्याण करने वाले हैं। श्री रामानुजस्वामीजी का औदार्य इतना विलक्षण है कि वे नाना प्रकार के लोककल्याण करने पर भी तृप्त न होते; किंतु और भी कुछ न कुछ उपकार करने की चिंता में ही मग्न रहते हैं।  

 पाशुर ७८: श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीरंगामृत स्वामीजी को सही मार्ग पर लाने के लिए, लिये गये कष्टों के विषय में बोलते हैं और आगे कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें सही किया हैं और उनका हृदय कोई गलत कार्य के बारें में नही विचारेगा।

करुत्तिल् पुगुन्दु उळ्ळिल् कळ्ळम् कळऱ्ऱि करुदरिय
वरुत्तत्तिनाल् मिग वन्जित्तु नी इन्द मण्णगत्ते
तिरुत्तित् तिरुमगळ् केळ्वनुक्कु आक्कियपिन् एन् नेन्जिल्
पोरुत्तप्पडादु एम् इरामानुस! मऱ्ऱोर् पोय्प्पोरुले

हे श्रीरामानुज स्वामीजी! आपने वाचामगोचर परिश्रम उठाकर, छलसे मेरे हृदय में घुसकर, तत्रत्य आत्मापहार-नामक दोष मिटाकर, उसे सुधारकर लक्ष्मीपति का दास बना दिया। अतः इसके (आपके उपकार के) सिवाय दूसरी कोई चिंता मेरे मनमें प्रवेश नहीं कर सकेगी। मैं तो किसी प्रकार से भगवान का दास बनने अथवा श्रीरामानुज स्वामीजी की चिंता करने को तैयार नहीं था; परंतु श्री स्वामीजी ने बहुत प्रयास से और विविध उपायों से, और अंततः छलसे मेरे हृदय  में घुसकर उसे पापशून्य व परिशुद्ध बनाया और मुझको भगवान का दास बना दिया। इसलिए मैं आपके इस महोपकार के सिवाय दूसरे कौनसे विषयकी चिंता कर सकूं ? कुछ नहीं।

 पाशुर ७९:  सांसारियों के लिए श्रीरंगामृत स्वमीजी को बहुत दुख होता हैं, हालाकि संसार से मुक्त होने कि इच्छा हैं परन्तु बहुत दीन परिस्थिती में रहते हैं और ज्ञान प्राप्त करने कि क्षमता खो बैठे हैं। 

पोय्यैच् चुरक्कुम् पोरुळैत् तुरन्दु इन्दप् पूदलत्ते
मेय्यैप् पुरक्कुम् इरामानुसन् निऱ्क वेऱु नम्मै
उय्यक् कोळ्ळ वल्ल देय्वम् इन्गु यादु एन्ऱु उलर्न्दु अवमे
ऐय्यप् पडा निऱ्पर् वैय्यत्तुळ्ळोर् नल्ल अऱिवु इळन्दे

इस भूतल पर असत्य अर्थों का ही प्रचार करनेवाले दुर्मतों का खंडन कर सत्य अर्थों की रक्षा करनेवाले भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी के विराजमान रहते हुए ही, इनकी परवाह नहीं करते हुए पृथ्वी तल निवासी (भाग्यहीन) मानव यह चिंता करते हैं कि, ” हमारा उद्धार करने में समर्थ देव कौन हैं।” और दुःखी होकर, विवेक शून्य बनकर हाय ! व्यर्थ ही शंका कर रहे हैं।

 पाशुर ८०: जब श्रीरामानुज स्वामीजी ने अन्यों के विषय में भूलने को और उनकी क्या धारणा हैं कहने को कहा तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने कहा कि वें जनों की  निरंतर सेवा करते रहेंगे जो सभी जनों के विषय में प्रेम से हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी के विषय में अंतग्रस्त हैं।

नल्लार् परवुम् इरामानुसन् तिरुनामम् नम्ब
वल्लार् तिऱत्तै मऱवादवर्गळ् यवर् अवर्क्के
एल्ला इडत्तिलुम् एन्ऱुम् एप्पोदिलुम् एत्तोळुम्बुम्
सोल्लाल् मनत्ताल् करुमत्तिनाल् सेय्वन् सोर्वु इन्ऱिये

सत्पुरुषों से सेवित श्रीरामानुजस्वामीजी के शुभ नामों का ही संकीर्तन करनेवालों के प्रभाव का, जो भूले बिना, सदा ध्यान करते हैं, ऐसे श्रीरामानुजभक्त – भक्तों का ही, मैं आलस्य छोड़कर सर्वदेश, सर्वावस्था और सर्वकालों में भी, वाचा मनसा और कर्मणा सकलविध कैंकर्य करूं।

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 61 से 70

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 51 से 60 

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पाशुर ६१: जब श्रीरामानुज स्वामीजी के महानता के विषय में पूछताछ किया गया तो श्रीरंगामृत स्वामीजी ने बड़ी दया से उन्हें समझाया। 

कोळुन्दु विट्टु ओडिप् पडरुम् वेम् कोळ् विनैयाल् निरयत्तु
अळुन्दियिट्टेनै वन्दु आट्कोण्ड पिन्नुम् अरु मुनिवर्
तोळुम् तवत्तोन् एम् इरामानुसन् तोल् पुगळ् सुडर् मिक्कु
एळुन्ददु अत्ताल् नल् अदिसयम् कण्डदु इरुनिलमे

ऐसे संत आचार्य हैं, जो निरन्तर भगवान का स्मरण करते हैं और भगवान के लिए भी उनको पाना मुश्किल हैं। हमारे स्वामीजी श्रीरामानुजाचार्य में यह महानता हैं की ऐसे आचार्य उनके दिव्य चरणकमलों में नतमस्तक होते हैं और उन्होंने इस तपस्या को भगवान के शरण किया। मैं मेरे अनगिनत पापों के दु:ख से इस नरक रूपी संसार में डूबा हूँ। श्रीरामानुज स्वामीजी मुझे स्वीकार करके भी उनके दिव्य गुण चमक रही थी, शीघ्रता से सब स्थानों में फैल रही थी और कई अन्य जनों को भी डूबने से उठा रहे थे। यह देख कर यह विशाल भूमंडल आश्चर्यमग्न हुआ।

पाशुर ६२: वें बड़ी दया से अपनी संतुष्टी को प्रगट करते हैं कि उनके पापों से संपर्क को हटाया गया। 

इरुन्देन् इरुविनैप् पासम् कळऱ्ऱि इन्ऱु यान् इऱैयुम्
वरुन्देन् इनि एम् इरामानुसन् मन्नु मा मलर्त्ताळ्
पोरुन्दा निलै उडैप् पुन्मैयिनोर्क्कु ओन्ऱुम् नन्मै सेय्याप्
पेरुम् देवरैप् परवुम् पेरियोर् तम् कळल् पिडित्ते

हमारे नाथ श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रेष्ठ पादारविन्दों का आश्रयण नहीं करनेवाले नीचों के प्रति कभी किसी प्रकार का उपकार नहीं करनेवाले श्रीरंगनाथ भगवान की स्तुति करनेवाले महात्मा श्रीकूरेश स्वामीजी के पादारविन्दों की सेवा कर पाने के बाद,अब मैं पुण्यपापरूप कर्मबन्धन से मुक्त हुआ; अब से मैं सांसारिक क्लेशों से सर्वथा दूर हो गया। इस गाथा में यह सुंदर अर्थ बताया गया है कि श्रीरामानुज स्वामीजी के पादारविन्दों के आश्रित भाग्यवान ही भगवत्कृपा के पात्र होते हैं। और इस भाग्य से वंचित लोग तो ज्ञानभक्त्यादि- विभूषित होने पर भी भगवत्कृपा नहीं पा सकते। 

पाशुर ६३: श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी से उनके चरण कमलों की  सेवा कैंकर्य करने हेतु इच्छा का निवेदन करते हैं, क्योंकि अब वें अनावश्यक अस्तित्व से छुटकारा पाये हैं। 

पिडियैत् तोडरुम् कळिऱेन्न यान् उन् पिऱन्गिय सीर्
अडियैत् तोडरुम्पडि नल्ग वेण्डुम् अऱु समयच्
चेडियैत् तोडरुम् मरुळ् सेऱिन्दोर् सिदैन्दु ओड वन्दु इप्
पडियैत् तोडरुम् इरामानुस मिक्क पण्डिदने

बाह्य व कुदृष्टियों के षड्दर्शन रूप क्षुद्रगुल्मों में प्रवेश करनेवाले अविवेकी लोगों को पराजित व पलायमान बनाने के लिए इस भूतल पर अवतीर्ण, एवं (जनता का उद्धार करने के लिए) उसके पीछे पड़नेवाले हे श्रीरामानुज स्वामिन्! अपनी स्त्रीके पीछे पीछे ही चलनेवाले हाथी की भांति मैं भी आपकी कृपा से, सौन्दर्यादि शुभगुणविभूषित आपके पादारविन्दों का ही अनुसरण करूं। श्रेष्ठ उपवन में प्रवेश कर आनंद पानेवालों की भांति श्रेष्ठ श्रीवैष्णव मत के अनुयायी बन कर आनंदित होने के बदले में, कई लोग इस कारण से बाह्य व कुदृष्टि मतरूप क्षुद्र कंटकवाले गुल्मों में प्रवेश कर दुख भोग रहे हैं कि उनका पाप उन्हें ऐसी प्रेरणा दे रहा है। श्री रामानुज स्वामीजी का अवतार होने के बाद, ये सभी पापी जन वाद में पराजित होकर पलायमान हो गये।

पाशुर ६४: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि ,बाह्य (जो वेदों का पालन नहीं करते हैं) एवं कुदृष्टि (जो वेदों को गलत तरीके से पेश करते हैं) तत्ववाले जो तर्क वितर्क में शामिल होना चाहते हैं, इस संसार में उनका विरोध करने हेतु श्रीरामानुज स्वामीजी जो गजराज समान हैं, अवतार लिये हैं और उन जनों का बहुत शीघ्र अन्त भी होगा। 

पण् तरु माऱन् पसुम् तमिळ् आनन्दम् पाय् मदमाय्
विण्डिड एन्गळ् इरामानुस मुनि वेळम् मेय्म्मै
कोण्ड नल् वेदक् कोळुम् दण्डम् एन्दि कुवलयत्ते
मण्डि वन्दु एन्ऱदु वादियर्गाळ् उन्गळ् वाळ्वु अऱ्ऱदे

हमारे श्रीरामानुजमुनि मत्तगज श्रीशठकोपसूरी के अनुगृहीत मधुररागयुत सहस्रगीति के अनुभव से समुत्पन्न आनंदरूपी मदजलवाला होकर, सत्यार्थ प्रकाशक वेदरूपी डंडा लेकर इस भूमंडल पर संचार कर रहे है; अतः हे दुर्वादियों! तुम्हारा आयुष्य समाप्त हो गया। जब श्रीरामानुज स्वामीजी दिव्यप्रबंधों का ठीक अध्ययन का सत्य (नतु दूसरों की भांति मिथ्या) भूत वेदों के यथावस्थित अर्थों का वर्णन करने लगेंगे तब दुर्वादियों को इस भूतल पर रहने का स्थान कैसे मिलेगा ?

पाशुर ६५: श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा ज्ञान प्रदान  करने से श्रीरंगामृत स्वामीजी आनंदित होते हैं ताकि अब वे बाह्य और कुदृष्टि तत्ववालों पर विजय प्राप्त कर सके। 

वाळ्वु अऱ्ऱदु तोल्लै वादियऱ्कु एन्ऱुम् मऱैयवर् तम्
ताळ्वु अऱ्ऱदु तवम् तारणि पेऱ्ऱदु तत्तुव नूल्
कूळ् अऱ्ऱदु कुऱ्ऱमेल्लाम् पदित्त गुणत्तिनर्क्कु अन्
नाळ् अऱ्ऱदु नम् इरामानुसन् तन्द ग्यानत्तिले

हमारे श्रीरामानुज स्वामीजी से अनुगृहीत उपदेश से, इतने प्रकार के कल्याण हुए कि दुर्वादि नष्ट हो गये; वैदिकों का संकट परिहृत हुआ; भूतल भी भाग्यवान बना; तत्वशास्त्रों में सब की शंकाएं एवं भ्रम दूर हो गये; उनका निश्चित व वास्तविक अर्थ समझने में आया; और लोगों का पाप भी विनष्ट हो गया। कितने महान  बुद्धिमत्ता !!

पाशुर ६६: श्रीरंगामृत स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी का मोक्ष प्रदान करने के गुण का आनन्द लेते हैं। 

ज्ञानम् कनिन्द नलम् कोण्डु नाळ् तोरुम् नैबवर्क्कु
वानम् कोडुप्पदु मादवन् वल्विनैयेन् मनत्तिल्
ईनम् कडिन्द इरामानुसन् तन्नै एय्दिनर्क्कु अत्
तानम् कोडुप्पदु तन् तगवु एन्नुम् सरण् कोडुत्ते

साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान भी भक्तिरूप से परिणत ज्ञान से नित्य अपनी उपासना करने वालों को ही मोक्ष देते हैं। मुझ महापापी के हृद्गत समस्त कालुष्य मिटानेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी तो अपने आश्रितों को स्वयं अपनी कृपा रूप साधन देकर उस मोक्ष को प्रदान करते हैं। मोक्षप्रदान भगवान का प्रसिद्ध व मुख्य काम है। परंतु उनसे मोक्ष लेना बहुत कठीन हैं; क्योंकि अपने पास किसी साधन के विना खाली हाथ रहनेवालों को वे मोक्ष नहीं देंगे। वह साधन भी बहुत दुर्लभ है। तथाहि जिसे पहले ज्ञान उत्पन्न हो, और बाद में वह धीरे धीरे बढ़कर परभक्ति परज्ञान इत्यादि परमभक्ति तक की अवस्थाएं प्राप्त करें, और उसके फलतया निरंतर भजन भी सिद्ध हो, ऐसे भाग्यवान ही भगवान के श्रीहस्त से मोक्ष पा सकेगा। श्रीरामानुजस्वामीजी भी मोक्षप्रदान करते हैं; परंतु वे ऐसे साधन की प्रतीक्षा नहीं करते; किंतु अपने पादाश्रितों को अपनी कृपा ही साधन बनाकर, उनमें और किसी प्रकार की योग्यता के विना ही उन्हें मोक्ष देते हैं। अतः भगवतसन्निधि जाने की अपेक्षा श्रीस्वामीजी का आश्रयण करना ही मुमुक्षुओं के लिए श्रेयस्कर है।

पाशुर ६७: श्रीरंगामृत स्वामीजी यह स्मरण कर आनंदित होते हैं की कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने उनकी रक्षा की यह निर्देश देते हुए कि  भगवान द्वारा उनके पूजा हेतु दिये हुए इंद्रियाँ का प्रयोग सांसारिक विषयोंमें न करें और यह कहते हैं की अगर श्रीरामानुज स्वामीजी ने यह नहीं किया होता तो, और कोई भी उनकी रक्षा नहीं करता। 

सरणम् अडैन्द दरुमनुक्काप् पण्डु नूऱ्ऱुवरै
मरणम् अडैवित्त मायवन् तन्नै वणन्ग वैत्त
करणम् इवै उमक्कु अन्ऱु एन्ऱु इरामानुसन् उयिर्गट्कु
अरण् अन्गु अमैत्तिलनेल् अरणार् मऱ्ऱु इव्वारुयिर्क्के

“अपनी शरण में आये हुए युधिष्ठिर के लिए पूर्वकाल में दुर्योधनादि एक सौ कौरवों का विनाश करनेवाले भगवान ने अपनी सेवा करने के साधनताया ही तुम्हें ये इन्द्रियाँ दी हैं; अतः ये तुम्हारे अपने भोगके लिए नहीं।” यदि श्रीरामानुज स्वामीजी यह उपदेश देते हुए आत्माओं की रक्षा नहीं करते; तो दूसरा कौन इनका रक्षक होता? (कोई नहीं ।) श्रीरामानुज स्वामीजी ने सबको यह उपदेश दिया की यह अत्यद्भूत मानवशरीर भगवान की सेवा करने के लिए ही मिला है, न तु भोग भोगने के लिए। भगवत्सेवा करने से ही आत्मा का उद्धार होगा; विषयोपभोग करने से अधोगति मिलेगी।

पाशुर ६८: इस संसार में रहते हुए मेरा मन और आत्मा श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्यों के गुणों में निरत रहता हैं। इसके पश्चात मेरे समान और कोई नहीं हैं। 

आर् एनक्कु इन्ऱु निगर् सोल्लिल् मायन् अन्ऱु ऐवर् देय्वत्
तेरिनिल् सेप्पिय गीतैयिन् सेम्मैप् पोरुळ् तेरिय
पारिनिल् सोन्न इरामानुसनैप् पणियुम् नल्लोर्
सीरिनिल् सेन्ऱु पणिन्ददु एन् आवियुम् सिन्दैयुमे

पूर्वकाल में पांडवों के दिव्य रथ पर (अर्जुन के सारथि के रूप में) विराजमान अत्याश्चर्यमय दिव्यचेष्ठितवाले श्रीकृष्णभगवान से अनुगृहीत भगवद्गीता के असली अर्थों को सबको सरलता से समझाते हुए गीताभाष्य रचनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी का भजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषों के कल्याणगुणों में मेरी आत्मा और मन मग्न हो गये। अब मेरे सदृश धन्य दूसरा कौन होगा? श्री रामानुज-भाष्य पढ़कर ही हम सरलता से भगवद्गीता के सच्चे अर्थ जान सकते हैं।

पाशुर ६९: भगवान से भी अधीक श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीरंगामृत स्वामीजी के उपर अनेक महान लाभार्थ को स्मरण करते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी बहुत आनंदित होते हैं।  

सिन्दैयिनोडु करणन्गळ् यावुम् सिदैन्दु मुन्नाळ्
अन्दम् उऱ्ऱु आळ्न्ददु कण्डु अवै एन् तनक्कु अन्ऱु अरुळाल्
तन्द अरन्गनुम् तन् चरण् तन्दिलन् तान् अदु तन्दु
एन्दै इरामानुसन् वन्दु एडुत्तनन् इन्ऱु एन्नैये

सृष्टि से पहले (अर्थात् प्रलयकाल में) जब मन और दूसरा इंद्रियां (और शरीर) स्थूल रूप छोड़कर उपसंहृत हुए थे और आत्मा अचेतन-सा रह गया, तब (ऐसे अचेतनप्राय प्राणियों में एक) मुझको अपनी कृपा से फिर शरीर व इंद्रियों का प्रदान करनेवाले श्रीरंगनाथ भगवान ने अपने पादारविन्द नहीं दिखाये( माने पादारविन्दों के दर्शन देकर मेरे उज्जीवित होने का मार्ग नहीं बताया )। हमारे नाथ श्री रामानुज स्वामीजी ने तो अपने आप ही उसे दिखाकर अब मेरा उद्धार किया ।

पाशुर ७०: श्रीरामानुज स्वामीजी को देखते हुए जिन्होंने इतना महान लाभ प्रदान किया हैं श्रीरंगामृत स्वामीजी पूछते हैं अब उनको और क्या प्रदान करेंगे जब कि  इतना कुछ अभी तक दे चुके हैं। 

एन्नैयुम् पार्त्तु एन् इयल्वैयुम् पार्त्तु एण्णिल् पल् गुणत्त
उन्नैयुम् पार्क्किल् अरुळ् सेय्वदे नलम् अन्ऱि एन् पाल्
पिन्नैयुम् पार्क्किल् नलम् उळद्E उन् पेरुम् करुणै
तन्नै एन् पार्प्पर् इरामानुसा उन्नैच् चार्न्दवरे

हे रामानुज स्वामिन्। (गुणलेश से भी दरिद्र और अनवधिक दोषों से पूर्ण) मुझको देखकर, आकिंचन्य व अनन्यगतित्वरूप मेरा स्वभाव देखकर और असंख्येय कल्याणगुणभरित अपने को भी देखने पर, मुझ पर कृपा करना ही आपके लिए उचित होगा। यह छोडकर, फिर भी यदि आप मुझमें किंचित् गुण ढूंढने का ही प्रयत्न करेंगे, (और यह निश्चय कर डालेंगे कि विना किंचितमात्र गुण के, इसका स्वीकार नहीं करना चाहिए) तो आपके आश्रित भक्त जन आपकी महती कृपा के बारे में क्या सोचेंगे? (उसे बहुत अल्प ही मानेंगे; अतः इस अपयश का अवकाश मत दीजिए ।) यह तो साधारण शास्त्र की मर्यादा है कि पुण्यवान मानव ही गुरुकृपा का पात्र होगा। परंतु जरा विचार करने पर कहना पड़ता है कि पुण्यवान के प्रति की जानेवाली कृपा अत्यल्प कृपा है, अथवा कृपा कहलाने योग्य ही नहीं। श्रेष्ठ, अथवा सच्ची कृपा तो वही होगी, जो कि सर्वथा गुणशून्य व पापपूर्ण व्यक्ति पर की जायगी। अतः आप मेरे पाप देखकर दया करने में प्रोत्साहित हो जाइए; इसके बदले में यदि आप संकोच पायेंगे, तो आपके पादाश्रित महात्मालोग आपकी कृपा को अत्यल्प समझ लेंगे। 

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-61-70-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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ರಾಮಾನುಜ ನೂಱ್ಱಂದಾದಿ – ಸರಳ ವಿವರಣೆ – 101 ರಿಂದ 108ನೆ ಪಾಸುರಗಳು

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ಶ್ರೀಃ ಶ್ರೀಮತೆ ಶಠಗೋಪಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತೆ ರಾಮಾನುಜಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತ್ ವರವರಮುನಯೆ ನಮಃ

ಪೂರ್ಣ ಸರಣಿ

ಹಿಂದಿನ ಶೀರ್ಷಿಕೆ << 91-100 ಪಾಸುರಗಳು

ನೂರ ಒಂದನೆಯ ಪಾಸುರಂ: ಎಂಪೆರುಮಾನಾರರ ಮಾಧುರ್ಯವು ಅವರ ಪವಿತ್ರತೆಗಿಂತ ಶ್ರೇಷ್ಠವಾದುದು ಎಂದು ಅಮುದನಾರರು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಮಯಕ್ಕುಂ ಇರು ವಿನೈ ವಲ್ಲಿಯಿಲ್ ಪೂಣ್ಡು ಮದಿ ಮಯಂಗಿತ್

ತುಯಕ್ಕುಂ ಪಿಱವಿಯಿಲ್ ತೋನ್ಱಿಯ ಎನ್ನೈ ತುಯರ್  ಅಗಱ್ಱಿ

ಉಯಕ್ಕೊಣ್ಡು ನಲ್ಗುಂ ಇರಾಮಾನುಶ ಎನ್ಱದು ಉನ್ನೈ ಉನ್ನಿ

ನಯಕ್ಕುಂ ಅವರ್ಕ್ಕು ಇದು ಇೞುಕ್ಕು ಎನ್ಬರ್ ನಲ್ಲವರ್ ಎನ್ಱು ನೈನ್ದೇ

ಅಜ್ಞಾನವನ್ನು ಉಂಟುಮಾಡುವ ಪಾಪ  ಮತ್ತು ಪುಣ್ಯ  ಎಂಬ ಎರಡು ವಿಧದ ಕರ್ಮಗಳ ಸರಪಳಿಯಿಂದ ಬಂಧಿತವಾಗಿರುವ, ಮನಸ್ಸನ್ನು ಗೊಂದಲಗೊಳಿಸುವ, ಜ್ಞಾನವನ್ನು ವಿಸ್ಮಯಗೊಳಿಸುವ ಜನ್ಮದಲ್ಲಿ ನಾನು ಹುಟ್ಟಿದ್ದೇನೆ. ಆ ಕರ್ಮಗಳ ಫಲವಾದ ಆಳವಾದ ದುಃಖಗಳನ್ನು ತೊಡೆದುಹಾಕುವಂತೆ ಮಾಡಿ, ರಾಮಾನುಜರು ನನ್ನನ್ನು ಉನ್ನತೀಕರಿಸಲು ನನ್ನನ್ನು ಸ್ವೀಕರಿಸಿದರು.  “ಓ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನನ್ನ ಕಡೆಗೆ ವಾತ್ಸಲ್ಯವನ್ನು ತೋರಿದವರು!” ಎಂಬ ನನ್ನ ಮಾತುಗಳನ್ನು ಮಹಾನ್ ವ್ಯಕ್ತಿಗಳು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. [ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನನ್ನನ್ನು ಮೇಲೆ ಎತ್ತಿದ್ದರಿಂದ] ನಿರಂತರವಾಗಿ ನಿಮ್ಮ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸುವ ಮತ್ತು ಕರಗುವವರಿಗೆ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಸಮಯದಲ್ಲೂ ನಿಮ್ಮ ಬಗ್ಗೆ ಪ್ರೀತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿರುವವರಿಗೆ ಅವಮಾನವಾಗುತ್ತದೆ.  ಮಾಧುರ್ಯವನ್ನು ಅನುಭವಿಸಿದವರಿಗೆ ಅವರ ಮನಸ್ಸು ಪರಿಶುದ್ಧತೆಯ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸುವುದಿಲ್ಲ ಎಂಬುದು ಇಲ್ಲಿನ ತಾತ್ಪರ್ಯವಾಗಿದೆ [ಇದುವರೆಗೂ , ಅಮುದನಾರ್ ಅವರು ವಿನಾಕಾರಣವಾಗಿ (ಅವರ ಶುದ್ಧತೆಯ ಪರಿಣಾಮ) ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ಚಟುವಟಿಕೆಗಳನ್ನು ವಿವರಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಆದರೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಿಗೆ ದಾಸ್ಯವನ್ನು ಮಾಡುವ ಆನಂದಕ್ಕೆ ಯಾವುದೇ ಸಾಟಿಯಿಲ್ಲ. ಆದ್ದರಿಂದ ಅಮುದನಾರರು ಈ ಮಾತುಗಳನ್ನು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ].

ನೂರ ಎರಡನೇ ಪಾಸುರಂ. ಈ ವಿಸ್ತಾರವಾದ ಪ್ರಪಂಚದಲ್ಲಿ ನಿಮ್ಮ ಉದಾತ್ತತೆಯ ಗುಣವು ತನ್ನ ಕಡೆಗೆ ಹೆಚ್ಚಲು ಕಾರಣವೇನು ಎಂದು ಅಮುಧನಾರ್  ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನೇ ಕೇಳುತ್ತಾರೆ.

ನೈಯುಂ ಮನಂ ಉನ್ ಗುಣಂಗಳೈ ಉನ್ನಿ ಎನ್ ನಾ ಇರುಂದು ಎಮ್

ಐಯನ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಎನ್ಱು ಅೞೈಕ್ಕುಂ ಅರು ವಿನೈಯೇನ್

ಕೈಯುಂ ತೊೞುಂ ಕಣ್ ಕರುದಿಡುಂ ಕಣಕ್ ಕಡಲ್ ಪುಡೈ ಸೂೞ್

ವೈಯಂ ಇದನಿಲ್ ಉನ್ ವಣ್ಮೈ  ಎನ್ ಪಾಲ್ ಎನ್ ವಳರ್ನ್ದದುವೇ  

ನಿನ್ನ ಶುಭ ಗುಣಗಳ ಕುರಿತು ಯೋಚಿಸುತ್ತಾ ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ದುರ್ಬಲವಾಗುತ್ತದೆ. ನನ್ನ ನಾಲಿಗೆ, ನನ್ನ ಪಕ್ಕದಲ್ಲಿ ದೃಢವಾಗಿ ಉಳಿದಿದೆ, ನಿಮ್ಮ ದೈವಿಕ ನಾಮಗಳನ್ನು ಮತ್ತು ನಿಮ್ಮ ನೈಸರ್ಗಿಕ ಸಂಬಂಧವನ್ನು [ನನ್ನೊಂದಿಗೆ] ಪಠಿಸುತ್ತದೆ. ಅನಾದಿಕಾಲದಿಂದಲೂ ಲೌಕಿಕ ಸಾಧನೆಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿದ್ದ ನನ್ನ ಪಾಪಿಷ್ಠ ಕೈಗಳೂ ನಿನಗೆ ನಮಸ್ಕಾರ ಮಾಡುತ್ತವೆ. ನನ್ನ ಕಣ್ಣುಗಳು ಯಾವಾಗಲೂ ನಿನ್ನನ್ನು ನೋಡಲು ಬಯಸುತ್ತವೆ. ಸಾಗರಗಳಿಂದ ಸುತ್ತುವರಿದಿರುವ ಈ ಭೂಮಿಯ ಮೇಲೆ ಯಾವ ಕಾರಣಕ್ಕಾಗಿ ನಿನ್ನ ಮಹಾನುಭಾವತೆ  ನನ್ನೆಡೆಗೆ ಬೆಳೆಯಿತು?

ನೂರ ಮೂರನೇ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರು ತನ್ನ ಕರ್ಮಗಳನ್ನು ಕರುಣೆಯಿಂದ ತೊಡೆದುಹಾಕಲು ಮತ್ತು ತನಗೆ ವಿಸ್ತಾರವಾದ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ನೀಡಿದ್ದರಿಂದ ತನ್ನ ಇಂದ್ರಿಯಗಳು ಅವರ ಕಡೆಗೆ ತೊಡಗಿಕೊಂಡವು ಎಂದು ಅಮುಧನಾರರು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ವಳರ್ ನ್ ದ ವೆಂ ಕೋಬಮ್  ಮಡಂಗಲ್  ಒನ್ಱಾಯ್ ಅನ್ಱು ವಾಳ್ ಅವುಣನ್

ಕಿಳರ್ನ್ದಪೊನ್  ಆಗಮ್ ಕಿೞಿತ್ತವನ್ ಕೀರ್ತಿಪ್ ಪಯಿರ್ ಎೞುಂದು

ವಿಳೈನ್ದಿಡುಂ ಸಿಂದೈ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಎಂದನ್ ಮೆಯ್ ವಿನೈ ನೋಯ್

ಕಳೈನ್ದು ನಲ್ ಜ್ಞಾನಮ್ ಅಳಿತ್ತನನ್ ಕೈಯಿಲ್ ಕನಿ ಎನ್ನವೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ತನ್ನ ಮಗನಾದ ಪ್ರಹ್ಲಾದಾಳ್ವಾನ್‌ಗೆ ದುಃಖವನ್ನುಂಟುಮಾಡಿದಾಗ ಕತ್ತಿಯನ್ನು ಹಿಡಿದು ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ನ ಬಳಿಗೆ ಬಂದ ಹಿರಣ್ಯ ಕಶ್ಯಪ ಎಂಬ ರಾಕ್ಷಸ , ಬೆಳೆಯುತ್ತಿರುವ ಮತ್ತು ವಿಶಿಷ್ಟವಾದ ಕ್ರೂರ ಕೋಪದಿಂದ, ದುರಭಿಮಾನದಿಂದ ಉಬ್ಬಿಕೊಂಡಿದ್ದ, ಚೆನ್ನಾಗಿ ಬೆಳೆದ, ಚಿನ್ನದ ಎದೆಯನ್ನು ಹರಿದು ಹಾಕಿದನು. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರವರು ಆ ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ ಸೃಷ್ಟಿಸಿದ ಬೆಳೆಗಳ ದಿವ್ಯ ಕೀರ್ತಿಯಿಂದ ಬೆಳೆದ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸಿನವರು. ಅಂತಹ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನನ್ನ ದೇಹದಿಂದ ನನ್ನನ್ನು ಬಂಧಿಸಿದ ಕರ್ಮಗಳ ಫಲವಾದ ದುಃಖವನ್ನು ಕರುಣೆಯಿಂದ ನನಗೆ ಕರುಣೆಯಿಂದ ಅಂಗೈಯಲ್ಲಿ ನೆಲ್ಲಿಕಾಯಿಯಂತೆ ಸ್ಪಷ್ಟವಾದ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ನೀಡಿದರು [ಅಂಗೈಯಲ್ಲಿ ನೆಲ್ಲಿಕಾಯಿ ಎಂಬುದು ಒಂದು ತಮಿಳು ಗಾದೆ, ಅದು ಯಾವುದೋ ಬಹಳ ಸ್ಪಷ್ಟವಾಗಿದೆ ಎಂದು ಸೂಚಿಸುತ್ತದೆ. ಮತ್ತು ತಪ್ಪಾಗಲಾರದು].

ನೂರ ನಾಲ್ಕನೇ ಪಾಸುರಂ. ಸ್ವತಃ ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ರವರೇ ಕೇಳಿದ ಕಾಲ್ಪನಿಕ ಪ್ರಶ್ನೆಗೆ ಉತ್ತರಿಸುತ್ತಾ “ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ನನ್ನು ಕಂಡರೆ ಏನು ಮಾಡುತ್ತೀರಿ?” ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ತನಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ವಿಷಯಗಳನ್ನು ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸಿದರೂ, ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಅವರ ದೈವಿಕ ರೂಪದಲ್ಲಿ ಪ್ರಕಾಶಿಸುವ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳನ್ನು ಹೊರತುಪಡಿಸಿ ಬೇರೇನನ್ನೂ ಕೇಳುವುದಿಲ್ಲ ಎಂದು ಅಮುದನಾರ್ ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. 

ಕೈ ಯಿಲ್ ಕನಿ ಅನ್ನ ಕಣ್ಣನೈಕ್ ಕಾಟ್ಟಿತ್ ತರಿಲುಮ್ ಉಂದನ್

ಮೆಯ್ಯಿಲ್ ಪಿಱಂಗಿಯ ಶೀರ್ ಅನ್ಱಿ ವೇಣ್ಡಿಲನ್ ಯಾನ್ ನಿರಯತ್

ತೊಯ್ಯಿಲ್ ಕಿಡಕ್ಕಿಲುಮ್ ಸೋದಿ ವಿಣ್ ಸೇರಿಲುಮ್ ಇವ್ವರುಳ್ ನೀ

ಸೆಯ್ಯಿಲ್ ದರಿಪ್ಪನ್ ಇರಾಮಾನುಶ ಎನ್ ಶೆೞುಂ ಕೊಣ್ಡಲೇ

ಮೇಘದಂತಹ ಮಹಾನುಭಾವನಾದ ಮತ್ತು ಆ ಮಹಾನತೆಯನ್ನು ನಮಗೆ ತೋರಿದ ರಾಮಾನುಜ! ಅಂಗೈಯ ಮೇಲಿರುವ ನೆಲ್ಲಿಕಾಯಿಯಂತೆ ನೀನು ನಮಗೆ ಕಣ್ಣನ್‌(ಕೃಷ್ಣ) ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ ಅನ್ನು ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸಿದರೂ, ನಿನ್ನ ದಿವ್ಯರೂಪದ ಮೇಲೆ ಅಮೋಘವಾಗಿರುವ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳನ್ನು ಬಿಟ್ಟು ಬೇರೇನನ್ನೂ ನಾನು ಪ್ರಾರ್ಥಿಸುವುದಿಲ್ಲ. ನಾನು ಅತ್ಯಂತ ಪ್ರಕಾಶಮಾನವಾಗಿರುವ ಪರಮಪದವನ್ನು ಪಡೆಯಬಹುದು ಅಥವಾ ನಾನು ಸಂಸಾರದಲ್ಲಿ ಸಿಕ್ಕಿಹಾಕಿಕೊಳ್ಳಬಹುದು. ನಿನ್ನ ಕೃಪೆಯಿಂದ ಎರಡರಲ್ಲಿ ಯಾವುದನ್ನಾದರೂ ದಯೆಯಿಂದ ನನಗೆ ದಯಪಾಲಿಸಿದರೆ, ನಾನು ಅದರಲ್ಲಿ ನನ್ನನ್ನು ಉಳಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತೇನೆ.

ನೂರ ಐದನೇ ಪಾಸುರಂ. ಸಂಸಾರವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸಬೇಕು ಮತ್ತು ಪರಮಪದವನ್ನು ಪಡೆಯಬೇಕು ಎಂದು ಎಲ್ಲರೂ ಹೇಳುತ್ತಿರುವಾಗ ಮತ್ತು ಆ ಪರಮಪದವನ್ನು ಪಡೆಯಲು ಬಯಸುತ್ತಿರುವಾಗ, ನೀವು ಎರಡನ್ನೂ ಸಮಾನವೆಂದು ಪರಿಗಣಿಸುತ್ತೀರಿ. ನೀವು ಬಯಸಿದ ಸ್ಥಳ ಯಾವುದು? ಅವರು ಈ ಪಾಸುರಂ ಮೂಲಕ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯಿಸುತ್ತಾರೆ.

 ಶೆೞುಂ ತಿರೈಪ್ ಪಾಱ್ಕಡಲ್ ಕಣ್ ತುಯಿಲ್ ಮಾಯನ್ ತಿರುವಡಿಕ್ಕೀೞ್

ವಿೞುನ್ದಿರುಪ್ಪಾರ್ ನೆಂಜಿಲ್ ಮೇವು ನಲ್ ಜ್ಞಾನಿ ನಲ್ ವೇದಿಯರ್ಗಳ್

ತೊೞುಂ ತಿರುಪ್ ಪಾದನ್ ಇರಾಮಾನುಶನೈತ್ ತೊೞುಂ ಪೆರಿಯೋರ್

ಎೞುಂದು ಇರೈತ್ತು ಆಡುಂ ಇಡಂ ಅಡಿಯೇನುಕ್ಕು ಇರುಪ್ಪಿಡಮೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಸುಂದರ ಅಲೆಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ತಿರುಪ್ಪಾರ್ಕಡಲ್ ಮೇಲೆ ಒರಗಿಕೊಂಡು ಮಲಗಿರುವಂತೆ ನಟಿಸುತ್ತಾ ಧ್ಯಾನಿಸುತ್ತಿದ್ದಾರೆ. ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಮಹಾನ್ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ, ಪ್ರಖ್ಯಾತ ವೈಧಿಕರಿಂದ (ವೇದಗಳನ್ನು ಅನುಸರಿಸುವವರು) ಪೂಜಿಸಲ್ಪಡುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರರ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳೊಂದಿಗೆ ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಂಡಿರುವ ಮತ್ತು ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಲ್ಲಿ ಬಿದ್ದವರ ಹೃದಯದಲ್ಲಿ ಸೂಕ್ತವಾಗಿ ಹೊಂದಿಕೊಳ್ಳುತ್ತವೆ. ಆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ನಿರಂತರವಾಗಿ ಆನಂದಿಸುವ ಮತ್ತು ಕೋಲಾಹಲದ ಸಾಗರದಂತೆ ನರ್ತಿಸುವ ಮಹಾನ್ ವ್ಯಕ್ತಿಗಳು ಅಂತಹ ಜನರ ಸೇವಕನಾದ ನಾನು ವಾಸಿಸಲು ಬಯಸುವ ಸ್ಥಳವಾಗಿದೆ.

ನೂರ ಆರನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್, ಅಮುದನಾರ್ ಅವರ ಬಗ್ಗೆ ಹೊಂದಿರುವ ಅಪಾರ ಪ್ರೀತಿಯನ್ನು ನೋಡುತ್ತಾ, ಕರುಣೆಯಿಂದ ಅಮುದನಾರರ ಮನಸ್ಸನ್ನು ಬಯಸುತ್ತಾರೆ. ಇದನ್ನು ನೋಡಿದ ಅಮುದನಾರರು ಸಂತೋಷದಿಂದ ಮತ್ತು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಈ ಪಾಸುರಂ ಪಠಿಸುತ್ತಾರೆ.

ಇರುಪ್ಪಿಡಮ್ ವೈಗುಂಡಂ ವೇಂಗಡಂ ಮಾಳಿರುಂಜೋಲೈ ಎನ್ನುಂ

ಪೊರುಪ್ಪಿಡಮ್ ಮಾಯನುಕ್ಕು ಎನ್ಬರ್ ನಲ್ಲೋರ್ ಅವೈ ತಮ್ಮೊಡುಂ ವಂದು

ಇರುಪ್ಪಿಡಮ್ ಮಾಯನ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಮನತ್ತು ಇನ್ಱು ಅವನ್ ವಂದು

 ಇರುಪ್ಪಿಡಮ್ ಎಂದನ್ ಇದಯತ್ತುಳ್ಳೇ ತನಕ್ಕು ಇನ್ಬುರವೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ನನ್ನು ಸತ್ಯವಾಗಿ ತಿಳಿದಿರುವ ಮಹಾನ್ ವ್ಯಕ್ತಿಗಳು, ಅವರ ಸ್ವರೂಪ (ಮೂಲ ಸ್ವಭಾವ), ರೂಪ (ಭೌತಿಕ ರೂಪಗಳು), ಗುಣಗಳು (ಶುಭಕರ ಗುಣಗಳು) ಮತ್ತು ವಿಭೂತಿ (ಸಂಪತ್ತು) ಗಳಲ್ಲಿ ಅದ್ಭುತವಾದ ಚಟುವಟಿಕೆಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಸರ್ವೇಶ್ವರನಿಗೆ ವಾಸಸ್ಥಾನಗಳು ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. ಇದನ್ನು ತಿರುಮಲೈ ಎಂದೂ ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ತಿರುಮಲಿರುಂಜೋಲೈನ ಪ್ರಸಿದ್ಧ ದೈವಿಕ ಪರ್ವತ. ಆ ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಕರುಣಾಪೂರ್ವಕವಾಗಿ ಆ ಎಲ್ಲಾ ದಿವ್ಯ ನಿವಾಸಗಳೊಂದಿಗೆ [ಮೇಲೆ ಉಲ್ಲೇಖಿಸಿರುವ] ಪ್ರವೇಶಿಸಿದ ಸ್ಥಳವು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸು. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಕರುಣಾಮಯಿಯಾಗಿ ಪ್ರವೇಶಿಸಿದ ಸ್ಥಳವನ್ನು ಶ್ರೇಷ್ಠ ಸ್ಥಳವೆಂದು ಪರಿಗಣಿಸಿದ್ದು , ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು.  

ನೂರ ಏಳನೇ ಪಾಸುರಂ. ತನ್ನ ಕಡೆಗೆ ವಾತ್ಸಲ್ಯವನ್ನು ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸಿದ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ದಿವ್ಯ ಮುಖವನ್ನು ನೋಡುತ್ತಾ, ಅಮುದನಾರ್ ಅವರು ಅವರಿಗೆ ಸಲ್ಲಿಸಲು ಬಯಸುತ್ತಿರುವ ಏನಾದರೂ ಇದೆಯೆ ಎಂದು ಕೇಳಿದರು ಮತ್ತು ಅವರ ಬಯಕೆಯನ್ನು ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸುತ್ತಾರೆ.

ಇನ್ಬುಱ್ಱ ಶೀಲತ್ತು ಇರಾಮಾನುಶ ಎನ್ಱುಂ ಎವ್ವಿಡತ್ತುಂ

ಎನ್ಬುಱ್ಱ ನೋಯ್ ಉಡಲ್ ತೋರುಮ್ ಪಿಱನ್ದು ಇಱಂದು ಎನ್ ಅರಿಯ

ತುಂಬುಱ್ಱು ವೀಯಿನುಂ ಸೊಲ್ಲುವದು ಒನ್ಱು ಉಂಡು ಉನ್ ತೊಂಡರ್ಗಟ್ಕೇ  

ಅಂಬುಱ್ಱು ಇರುಕ್ಕುಂಬಡಿ ಎನ್ನೈ ಆಕ್ಕಿ ಅಂಗು ಆಟ್ಪಡುತ್ತೇ

ಸರಳತೆಯ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಗುಣವನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಮತ್ತು ಕರುಣಾಮಯವಾಗಿ ಅತ್ಯಂತ ಸಂತೋಷದಿಂದ ಬಂದಿರುವ ಓ ರಾಮಾನುಜಾ! ನಾನು ನಿಮಗೆ ಮಾಡಲು ಬಯಸುವ ಒಂದು ಸಲ್ಲಿಕೆ ಇದೆ. ಮೂಳೆಗಳಿಗೆ ರೋಗಗಳು ಹರಡುವ ದೇಹಗಳಲ್ಲಿ ನಾನು ಪುನರಾವರ್ತಿತ ಜನನ-ಮರಣಗಳನ್ನು ಮಾಡುವುದನ್ನು ಮುಂದುವರೆಸಿದರೂ ಮತ್ತು ನಾನು ಅಸಂಖ್ಯಾತ ದುಃಖಗಳನ್ನು ಅನುಭವಿಸಿದರೂ, ನಿನಗಾಗಿಯೇ, ಎಲ್ಲಾ ಸಮಯದಲ್ಲೂ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಸ್ಥಳಗಳಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ನಿನಗಾಗಿಯೇ ಇರುವವರ ಬಗ್ಗೆ ಆಳವಾದ ಪ್ರೀತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಲು ನೀವು ನನ್ನನ್ನು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಸಕ್ರಿಯಗೊಳಿಸಬೇಕು. ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಿಗೆ ಸೇವಕರಾಗಿರಬೇಕು. ಇದೊಂದೇ ನಿಮ್ಮಲ್ಲಿ ನನ್ನ ಕೋರಿಕೆ.  

ನೂರ ಎಂಟನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಈ ಪ್ರಬಂಧದ ಆರಂಭದಲ್ಲಿ, ಅಮುದನಾರ್ ಅವರು “ಇರಾಮಾನುಸನ್ ಚರಣಾರವಿಂಧಂ ನಾಮ್ ಮನ್ನಿ ವಾೞ” (ನಾವು ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಲ್ಲಿ ಯೋಗ್ಯವಾಗಿ ಬದುಕಬೇಕು) ಪ್ರಯೋಜನಕ್ಕಾಗಿ ಪ್ರಾರ್ಥಿಸಿದರು, ಅವರ ಸಂಪೂರ್ಣ ಭಕ್ತಿಯ ಬಯಕೆಯನ್ನು ಪೂರೈಸಲು ಪೆರಿಯ ಪಿರಾಟ್ಟಿಯಾರ್ ಅವರ ಶಿಫಾರಸು ಪಾತ್ರವನ್ನು ಕೋರಿದರು. ಈ ಕೊನೆಯ ಪಾಸುರಂನಲ್ಲಿಯೂ ನಮಗೆ ಕೈಂಕರ್ಯ ಸಂಪತ್ತನ್ನು ದಯಪಾಲಿಸಬಲ್ಲ ಪೆರಿಯ ಪಿರಾಟ್ಟಿಯಾರನ್ನು ಪಡೆಯಬೇಕೆಂದು ಕೇಳಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾನೆ.

ಅಂ ಕಯಲ್ ಪಾಯ್ ವಯಲ್ ತೆನ್ನರಂಗನ್ ಅಣಿ ಆಗಮ್ ಮನ್ನುಂ

ಪಂಗಯ ಮಾಮಲರ್ಪ್ ಪಾವಯೈಪ್ ಪೋಱ್ಱುದುಂ ಪತ್ತಿ ಎಲ್ಲಾಮ್

ತಂಗಿಯದು ಎನ್ನತ್ ತೞೈತ್ತು ನೆಂಜೇ ನಂ ತಲೈ ಮಿಶೈಯೇ

ಪೊಂಗಿಯ ಕೀರ್ತಿ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಅಡಿಪ್ ಪೂ ಮನ್ನವೇ

ಓ ಮನಸೇ ! ರಾಮಾನುಜರು ವ್ಯಾಪಕವಾದ ಖ್ಯಾತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ. ತಾಜಾ ಹೂವುಗಳಂತಿರುವ ಅಂತಹ ರಾಮಾನುಜರ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳು ನಮ್ಮ ತಲೆಯ ಮೇಲೆ ಸರಿಯಾಗಿ ಹೊಂದಿಕೊಳ್ಳಬೇಕು, ಇದರಿಂದ ಭಕ್ತಿಯ ಅಸ್ತಿತ್ವವು ಯಾವುದೇ ಕೊರತೆಯಿಲ್ಲದೆ ನಮ್ಮೊಳಗೆ ಬರುತ್ತದೆ ಎಂದು ನಾವು ಭಾವಿಸುತ್ತೇವೆ. ಅದು ಆಗಬೇಕಾದರೆ,ಅವನ ಗುರುತಾಗಿ, ತಾವರೆ ಹೂವಿನ ಮೇಲೆ ಹುಟ್ಟಿ, ಪೆರಿಯ ಪೆರುಮಾಳ್‌ನ ಸುಂದರ ದಿವ್ಯವಾದ ಎದೆಯ ಮೇಲೆ ಶಾಶ್ವತವಾಗಿ ನೆಲೆಸಿರುವ, ಸ್ವಾಭಾವಿಕ ಸ್ತ್ರೀತ್ವವನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ, ಮೀನುಗಳು ತಮಾಷೆಯಾಗಿ ಜಿಗಿಯುವ ಗದ್ದೆಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ತಿರುವರಂಗಂನಲ್ಲಿ ದೇವಾಲಯವನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಶ್ರೀರಂಗ ನಾಚ್ಚಿಯಾರ್ ಅವರನ್ನು ಪಡೆಯೋಣ. .     

ಅನುವಾದ : ಅಡಿಯೇನ್ ರಂಗನಾಯಕಿ ರಾಮಾನುಜ ದಾಸಿ

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 51 से 60

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 41 से 50 

पाशूर ५१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी का इस संसार में अवतार लेने का एक मात्र उद्देश उन्हें (श्रीरंगामृत स्वामीजी) श्रीरामानुज स्वामीजी का दास बनाना हैं।

अडियैत् तोडर्न्दु एळुम् ऐवर्गट्काय् अन्ऱु बारतप् पोर्
मुडियप् परि नेडुम् तेर् विडुम् कोनै मुळुदुणर्न्द
अडियर्क्कु अमुदम् इरामानुसन् एन्नै आळ वन्दु इप्
पडियिल् पिऱन्ददु मऱ्ऱिल्लै कारणम् पार्त्तिडिले

पूर्वकाल में अपने पादारविन्दों का आश्रयण कर धन्य बनने वाले पंचपांडवों के लिए (अर्जुन का सारथी बनकर) घोड़े जुड़ा हुआ बडा रथ हांक कर दुर्योधनादियों का संहार करनेवाले, भगवान को (अर्थात् भगवान के स्वरूप रूप गुण विभूति इत्यादियों, अथवा सौशिल्य आश्रित पारतंत्र्य इत्यादि शुभगुणों को) पूर्णरूप से समझनेवाले भक्तों के अमृतवत् परमभोग्य रहनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझ पर अनुग्रह करने के लिए ही इस भूतल पर अवतार लिया; विचार करने पर दूसरा कोई कारण नहीं दिखता।

पाशूर ५२: जब पूछा गया कि क्या श्रीरामानुज स्वामीजी में उन्हें नियंत्रण करने में क्षमता हैं तब वें श्रीरामानुज स्वामीजी के अनगिनत क्षमताओं को समझाते हैं।

पार्त्तान् अऱु समयन्गळ् पदैप्प इप्पार् मुळुदुम्
पोर्त्तान् पुगळ्कोण्डु पुन्मैयिनेन् इडैत् तान् पुगुन्दु
तीर्त्तान् इरु विनै तीर्त्तु अरन्गन् सेय्य ताळ् इणैयोडु
आर्त्तण् इवै एम् इरामानुसन् सेय्युम् अऱ्पुदमे

हमारे गुरु श्री रामानुज स्वामीजी के ये सभी अद्भुत चेष्टित हैं कि उन्होंने अपनी दृष्टि डालने मात्र से (दुष्ट) षड्दर्शनों को शिथिल बना दिया; अपने यश से समग्र भूमंडल ढांक दिया; अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ नीच के हृदय में प्रवेश कर मेरे प्रबल पाप मिटा दिये; और मिटाने के बाद मेरे सिर को श्रीरंगनाथ भगवान के सुंदर पादारविन्दों के साथ मिला दिया ।

पाशूर ५३:  जब पूछा गया कि अन्य तत्वों का नाश कर श्रीरामानुज स्वामीजी ने क्या स्थापित किया तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने कहा कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने महान सत्य को स्थापित किया कि सभी चेतन और अचेतन भगवान पर हीं निर्भर हैं।  

अऱ्पुदन् सेम्मै इरामानुसन् एन्नै आळ वन्द
कऱ्पगम् कऱ्ऱवर् कामुऱु सीलन् करुदरिय
पऱ्पल्लुयिर्गळुम् पल्लुलगु यावुम् परनदु एन्नुम्
नऱ्पोरुळ् तन्नै इन्नानिलत्ते वन्दु नाट्टिनने

श्रीरामानुज स्वामीजी अपने शरण में मुझे लेने के लिये अवतार लिए , वें बहुत उदार हैं, उनमें बहुत साधारण गुण हैं जो ज्ञानियों को अभिलषित हैं, |उनके अद्भुत कार्य, उनमें सच्चाई हैं  अपने शिष्यों के लिये स्वयं को उचित बताने के लिये। मेरे उज्जीवन के लिए ही अवतीर्ण, परमोदार, ज्ञानियों के वांछनीयशीलगुणवाले, अत्याश्चर्य मय दिव्य चेष्टितवाले और आर्जव (सीधापन) गुणवाले श्री रामानुज स्वामीजी ने इस भूतल पर अवतार लेकर इस महार्थ की स्थापना की कि ये असंख्य आत्मवर्ग और (इनके निवासस्थान) ये सभी लोक भगवान की मिल्कियत हैं। (इससे अद्वैत मत का निरास सूचित किया जाता है।)

पाशूर ५४:  श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के श्रेष्ठता को स्थापित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप आगे श्रीरंगामृत स्वामीजी भाह्य तत्त्वों, वेदों और श्रीसहस्त्रगीति के स्थान को बताते हैं।

नाट्टिय नीसच् चमयन्गळ् माण्डन नारणनैक्
काट्टिय वेदम् कळिप्पुऱ्ऱदु तेन् कुरुगै वळ्ळल्
वाट्टमिला वण्डमिज़्ह् मऱै वाळ्न्ददु मण्णुलगिल्
ईट्टिय सीलत्तु इरामानुसन् तन् इयल्वु कण्डे

श्रीरामानुज स्वामीजी के स्वभाव को देखते हुए जो इस संसार में अपने गुणों को और  आगे बढ़ाते हैं, भाह्य अधम तत्त्व, जो अधम जनों द्वारा उनके स्वयं के परिश्रम से स्थापित किया गया हैं, ऐसे देह को त्याग दिया जैसे अंधेरा सूर्य के उगम से लुप्त हो जाता हैं। श्रीमन्नारायण का प्रतिपादन करनेवाले वेद आनंदित हुए; और सुंदर कुरुकापुरी में अवतीर्ण परमोदार श्रीशठकोपसूरी से अनुगृहीत, दोषरहित, द्राविड़वेद संजीवित हुआ । श्री रामानुज स्वामीजी ने श्रेष्ठ प्रमाण व युक्तियों के आधार से संस्कृत व द्राविड वेदों के सदर्थों का वर्णन किया; इससे उन वेदोंका दुःख दूर हुआ और दूसरे कुमत नष्ट हो गये ।

 पाशूर ५५:  वेदों को लाभ देनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के गुणोंको  स्मरण कराते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, वह कुल जो श्रीरामानुज स्वामीजी के उदारता में निरत हैं और उनके शरण हुए हैं, वें उन पर शासन करना उचित हैं।

कण्डवर् सिन्दै कवरुम् कडि पोळिल् तेन्नरन्गन्
तोण्डर् कुलावुम् इरामानुसनै तोगै इऱन्द
पण् तरु वेदन्गळ् पार् मेल् निलविडप् पार्त्तरुळुम्
कोण्डलै मेवित् तोळुम् कुडियाम् एन्गळ् कोक्कुडिये

स्वरप्रधान अनंत वेदों को इस धरातल पर सुप्रतिष्ठित कराने वाले, परमोदार और सर्वजनमनोहर सुगंधि उपवनों से परिवृत एवं दक्षिणदिशा के अलंकारभूत श्रीरंगम दिव्यधाम के स्वामी श्रीरंगनाथ भगवान के परमभक्तों की प्रशंसा के पात्र श्री रामानुज स्वामीजी का सादर आश्रयण करनेवालों का कुल ही हमारे प्रणाम करने योग्य महात्माओं का कुल है। अर्थात् श्रीरामानुजभक्तों का कुल ही सत्कुल कहलाता है और उस कुलमें अवतीर्ण महात्माओं को हम अपने स्वामी मानते हैं।

पाशूर ५६:  जब श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह स्मरण कराया गया कि वों यही वे सांसारिक विषयोंमें कहते थे, तब श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, श्रीरामानुज स्वामीजी के शरण होने के पश्चात उनके शब्द और मन और किसी को पहचान नहीं सकते हैं।

 कोक्कुल मन्नरै मूवेळुगाल् ओरु कूर् मळुवाल्
पोक्किय द्Eवनैप् पोऱ्ऱुम् पुनिदन् बुवनमेन्गुम्
आक्किय कीर्त्ति इरामानुसनै अडैन्दपिन् एन्
वाक्कुरैयादु एन् मनम् निनैयादु इनि मऱ्ऱोन्ऱैये

क्षत्रियकुलोत्पन्न दुष्टराजाओं का तीक्ष्णकुठार से इक्कीस वार विनाश करनेवाले परशुराम भगवान की स्तुति करनेवाले, परमपवित्र एवं भूतलव्यापी यशवाले श्री रामानुजस्वामीजी का आश्रय लेनेपर, अब से मेरी वाणी दूसरे किसीका नाम नहीं लेगी; मेरा मन चिंतन नहीं करेगा। आचार्यों का सिद्धांत है कि परशुराम हमें उपासना करने योग्य नहीं; क्योंकि वह तो दुष्टक्षत्रिय निरासरूप विशेष कार्य सिद्धि के लिए अहंकारयुत किसी जीव में भगवान की शक्ति का आवेशमात्र है। अत एव उसे आवेशावतार कहते हैं; नतु श्रीरामकृष्णादिवत् पूर्णावतार। प्रकृतगाथा में इतना ही कहा गया है कि श्री रामानुजस्वामीजी उनकी स्तुति करते हैं, नतु उपासना। विरोधिनिरासरूप महोपकार का स्मरण करते हुए उनकी स्तुति करने में कोई आपत्ति नहीं हैं; क्योंकि यह उपासना नहीं हो सकती।

पाशूर ५७:  श्रीरंगामृत स्वामीजी से पूछा गया कि “आप कैसे कह सकते हैं कि आपके शब्द गुण नहीं गायेंगे और आपका मन किसी के बारें सोचेगा नहीं क्योंकि यह संसार हैं?” वें कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी को प्राप्त करने के पश्चात उनमे कोई नादानी नहीं हैं कुछ प्राप्त करने कि, सही और गलत में भेद करने की।  

 मऱ्ऱु ओरु पेऱु मदियादु अरन्गन् मलर् अडिक्कु आळ्
उऱ्ऱवरे तनक्कु उऱ्ऱवराय्क् कोळ्ळुम् उत्तमनै
नल् तवर् पोऱ्ऱुम् इरामानुसनै इन् नानिलत्ते
पेऱ्ऱनन् पेऱ्ऱपिन् मऱ्ऱु अऱियेन् ओरु पेदमैये

प्रयोजनान्तरों से विमुख होकर, श्रीरंगनाथ भगवान के पादारविन्दों में प्रवण महात्माओं को ही अपने आत्मबन्धु मानने वाले, अत्युत्तम कल्याण गुणवाले, और महातपस्वियों से संस्तुत श्रीरामानुजस्वामीजी को मैंने इस भूतल पर ही पाया; ऐसे पाने के बाद मैं विषयान्तर की इच्छा इत्यादि के हेतु किसी प्रकार का अज्ञान नहीं पाऊंगा।

 पाशूर ५८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्न होते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने ऐसे जनों के तत्त्वों को नष्ट किया जिन्होने वेदों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया हैं।

पेदैयर् वेदप् पोरुळ् इदु एन्ऱु उन्नि पिरमम् नन्ऱु एन्ऱु
ओदि मऱ्ऱु एल्ला उयिरुम् अह्दु एन्ऱु उयिर्गळ् मेय् विट्टु
आदिप् परनोडु ओन्ऱु आम् एन्ऱु सोल्लुम् अव्वल्लल् एल्लाम्
वादिल् वेन्ऱान् एम् इरामानुसन् मेय्म् मदिक् कडले

कितने अविवेकी जन यों कहते थे कि, ” ब्रह्म एक ही सत्य है; दूसरे सभी जीव उससे अभिन्न हैं, और शरीर छूटने के बाद ब्रह्म के साथ उनका ऐक्य पाना ही मोक्ष है; यही सकल वेदों का तात्पर्य है।” यथार्थज्ञाननिधि हमारे आचार्य श्रीरामानुजस्वामीजी ने इन सभी कोलाहलों को वाद में जीत लिया।

पाशूर ५९:  उनमें प्रसन्नता देखकर कुछ लोगों नें कहा कि आत्मा को शास्त्र के जरिये जाना जा सकता हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं श्रेष्ठ हैं। वें उत्तर देते हैं कि अगर श्रीरामानुज स्वामीजी कलियुग का अज्ञानता को नष्ट नहीं करते तो किसी को भी यह ज्ञान नहीं प्राप्त होता कि आत्मा के भगवान श्रीमन्नारायण हैं।

कडल् अळवाय तिसै एट्टिनुळ्ळुम् कलि इरुळे
मिडै तरु कालत्तु इरामानुसन् मिक्क नान्मऱैयिन्
सुडर् ओळियाल् अव्विरुळैत् तुरन्दिलनेल् उयिरै
उडैयवन् नारणन् एन्ऱु अऱीवार् इल्लै उऱ्ऱु उणर्न्दे

चतुस्सागर्पर्यंत आठों दिशाओं में जब कलि-अंधकार ही व्याप्त हुआ था, तब श्रीरामानुज स्वामीजी ने अवतार लेकर,चारों वेदों के उज्वल ज्योति से उस अंधकार को यदि नहीं मिटा दिया होता, तो कोई भी मानव यह अर्थ नहीं समझ सकता कि श्रीमन्नारायण समस्त जीवों के प्रभु हैं।

 पाशूर ६०: जब उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्ति के विषय में पूछा गया तो उन्होंने इसमे समझाया।

उणर्न्द मेइग्यानिअर् योगम् तोऱुम् तिरुवाइमोळियिन्
मणम् तरुम् इन्निसै मन्नुम् इडम् तोऱुम् मामलराळ्
पुणर्न्द पोन् मार्बन् पोरुन्दुम् पदि तोऱुम् पुक्कु निऱ्कुम्
गुणम् तिगळ् कोण्डल् इरामानुसन् एम् कुलक् कोळुन्दे

आत्मगुणों से परिपूर्ण व उज्वल, कालमेघ के समान परमोदार, हमारे कुलकूटस्थ श्रीरामानुज स्वामीजी तत्वज्ञानियों की प्रत्येक गोष्ठी में, सहस्रगीति (प्रभुति दिव्यप्रबंधों) की दिव्य सूक्ति की सुगंध से वासित प्रत्येक स्थल में एवं लक्ष्मीजी से आलिंगित श्रीवक्षवाले भगवान के एकैक दिव्यदेशमें विराजते हैं।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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ರಾಮಾನುಜ ನೂಱ್ಱಂದಾದಿ – ಸರಳ ವಿವರಣೆ – 91 ರಿಂದ 100ನೆ ಪಾಸುರಗಳು

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ಶ್ರೀಃ ಶ್ರೀಮತೆ ಶಠಗೋಪಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತೆ ರಾಮಾನುಜಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತ್ ವರವರಮುನಯೆ ನಮಃ

ಪೂರ್ಣ ಸರಣಿ

ಹಿಂದಿನ ಶೀರ್ಷಿಕೆ << 81-90 ಪಾಸುರಗಳು

ತೊಂಬತ್ತೊಂದನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಸಂಸಾರಿಗಳು ಯಾವುದೇ ವಿಷಯಗಳಲ್ಲಿ ಒಳಗೊಳ್ಳದಿದ್ದರೂ ಸಹ, ಅಮುದನಾರರು ಅವರನ್ನು  ಉನ್ನತಿಗೆ ತರಲು ರಾಮಾನುಜರು ಮಾಡಿದ ಪ್ರಯತ್ನಗಳನ್ನು ನೆನಪಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರನ್ನು ಶ್ಲಾಘಿಸುತ್ತಾರೆ.

ಮರುಳ್ ಸುರಂದು ಆಗಮ ವಾದಿಯರ್ ಕೂಱುಂ ಅವಪ್ ಪೊರುಳಾಮ್

ಇರುಳ್ ಸುರಂದು ಎಯ್ತ ಉಲಗು ಇರುಳ್ ನೀಂಗತ್ ತನ್ ಈಣ್ಡಿಯ ಶೀರ್

ಅರುಳ್ ಸುರಂದು ಎಲ್ಲಾ ಉಯಿರ್ಗಟ್ಕುಂ ನಾದನಂ ಅರಂಗನ್ ಎನ್ನುಂ

ಪೊರುಳ್ ಸುರಂದಾನ್ ಎನ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಮಿಕ್ಕ ಪುಣ್ಣಿಯನೇ

ಸಂಪೂರ್ಣ ಅಜ್ಞಾನದಿಂದ ಶೈವ ಆಗಮವನ್ನು (ಶಿವನಿಂದ ನೀಡಿದ ಗ್ರಂಥ) ಆಧರಿಸಿ ತಮ್ಮ ವಾದವನ್ನು ಮಂಡಿಸುವವರು ಪಾಸುಪಥರು. ಅವರ ಕೀಳು ಅರ್ಥಗಳಿಂದ ಜಗತ್ತು ಕತ್ತಲೆಯಲ್ಲಿ ಮುಳುಗಿತು. ಲೌಕಿಕ ಜನರ ಅಂಧಕಾರದ ಅಜ್ಞಾನವನ್ನು ಹೋಗಲಾಡಿಸಲು, ರಾಮಾನುಜರು ತಮ್ಮ ವಿಶಿಷ್ಟವಾದ ಕರುಣೆಯನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸಿದರು ಮತ್ತು ಶ್ರೀರಂಗನಾಥರು ಎಲ್ಲಾ ಆತ್ಮಗಳಿಗೆ ಅಧಿಪತಿ ಎಂದು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸಿದರು. ಅವರು ಮಹಾನ್, ಧರ್ಮನಿಷ್ಠ ವ್ಯಕ್ತಿ

ತೊಂಬತ್ತೆರಡನೇ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಯಾವುದೇ ಕಾರಣವಿಲ್ಲದೆ ಸ್ವೀಕರಿಸಿದ್ದಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರು ಕರುಣೆಯಿಂದ ತನ್ನ ಆಂತರಿಕ ಮತ್ತು ಬಾಹ್ಯ ಇಂದ್ರಿಯಗಳೆರಡಕ್ಕೂ ವಿಷಯವಾಗಿ ನಿಂತಿದ್ದಾರೆ ಎಂದು ಅರಿತುಕೊಂಡು, ಅವರು ಸಂತೋಷವನ್ನು ಅನುಭವಿಸುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಇದಕ್ಕೆ ಕಾರಣವೇನು ಎಂದು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಕೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಪುಣ್ಣಿಯನೋನ್ಬು ಪುರಿಂದುಂ ಇಲೇನ್ ಅಡಿ ಪೋಱ್ಱಿ ಶೆಯ್ಯುಂ

ನುಣ್ ಅರುಮ್ ಕೇಳ್ವಿ ನುವನ್ಱುಂ ಇಲೇನ್ ಸೆಮ್ಮೈ ನೂಲ್ ಪುಲವರ್ಕ್ಕು

ಎನ್ ಅರುಮ್ ಕೀರ್ತಿ ಇರಾಮಾನುಶ ಇನ್ಱು ನೀ ಪುಗುಂದು ಎನ್

ಕಣ್ಣುಳ್ಳುಂ  ನೆಂಜುಳ್ಳುಂ ನಿನ್ಱ ಇಕ್ಕಾರಣಂ ಕಟ್ಟುರಯೇ

 ಈ ಪ್ರಯೋಜನವನ್ನು ಪಡೆಯಲು ನಾನು ಯಾವುದೇ ಪುಣ್ಯ ಕಾರ್ಯವನ್ನು ಮಾಡಿಲ್ಲ. ನಿನ್ನ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳನ್ನು ಪಡೆಯಲು ನಾನು ಯಾವುದೇ ತಪಸ್ಸನ್ನು [ಶಾಸ್ತ್ರಗಳನ್ನು ಕೇಳಲು] ಮಾಡಲು ಬಯಸಲಿಲ್ಲ. ಯಾವುದೇ ನಿರೀಕ್ಷೆಗಳಿಲ್ಲದ ಮತ್ತು ಶಾಸ್ತ್ರಗಳಿಗೆ ಸಮಾನವಾದ ಕವಿತೆಗಳನ್ನು ಹಾಡುವ ಪರಿಣಿತರೂ ಗ್ರಹಿಸಲು ಕಷ್ಟಕರವಾದ ಖ್ಯಾತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ರಾಮಾನುಜ! ನನ್ನ ಬಾಹ್ಯ ಕಣ್ಣು ಮತ್ತು ಆಂತರಿಕ ಕಣ್ಣಿಗೆ (ಮನಸ್ಸಿಗೆ) ನೀವು ವಸ್ತುವಾಗಿರುವ ಕಾರಣವನ್ನು ನೀವು ಮಾತ್ರ ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸಬೇಕು.

ತೊಂಬತ್ತಮೂರನೇ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ತನ್ನ ಸಲ್ಲಿಕೆಗೆ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯಿಸದ ಕಾರಣ, ರಾಮಾನುಜನು ಯಾರೂ ಕೇಳದೆ ಕುದ್ರುಷ್ಟಿ ತತ್ತ್ವಗಳನ್ನು ನಾಶಪಡಿಸಿದಂತೆಯೇ, ಅಮುಧನಾರರು ಕೇಳದೆಯೇ ಅವರು ತಮ್ಮ ಬಲವಾದ ಕರ್ಮಗಳನ್ನು (ಹಿಂದಿನ ಕರ್ಮಗಳನ್ನು) ಕಡಿದುಹಾಕಿದ್ದಾರೆ ಎಂದು ಸ್ವತಃ ಸ್ಪಷ್ಟೀಕರಣವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾರೆ.  ಮತ್ತು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರು ಏನೂ ಕಾರಣವಿಲ್ಲದೆ ಈ ಮೇಲಿನ ಕೆಲಸಗಳನ್ನು ಮಾಡುವವರು ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಕಟ್ಟಪ್ ಪೊರುಳೈ ಮಱೈಪ್ಪೊರುಳ್ ಎನ್ಱು ಕಯವರ್ ಸೊಲ್ಲುಮ್

ಪೆಟ್ಟೈಕ್ ಕೆಡುಕ್ಕುಂ ಪಿರಾನ್ ಅಲ್ಲನೇ ಎನ್ ಪೆರು ವಿನೈಯಕ್

ಕಿಟ್ಟಿಕ್ ಕಿೞನ್ಗೋಡು ತನ್ ಅರುಳ್ ಎನ್ನುಂ ಒಳ್ ವಾಳ್ ಉರುವಿ

ವೆಟ್ಟಿಕ್ ಕಳೈಂದ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಎನ್ನುಂ ಮೆಯ್ತ್ ತವನೇ

ಶರಣಾದವರಲ್ಲಿ ನಾಯಕನಾದ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನನ್ನ ಬಳಿಗೆ ಬಂದು ನಾಶವಾಗದ ನನ್ನ ದೊಡ್ಡ ಪಾಪಗಳನ್ನು ಕಿತ್ತುಹಾಕಿದನು. ವೇಧಗಳ ಕೀಳು [ತಪ್ಪಾದ] ಅರ್ಥಗಳನ್ನು ನಿಜವಾದ ಅರ್ಥಗಳೆಂದು   ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸಿದಾಗ ಕುದ್ರುಷ್ಟಿಗಳ ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳಿಸುವ ಹೇಳಿಕೆಗಳನ್ನು ನಿರ್ಣಾಮ  ಮಾಡಿದ ಮಹಾನ್ ದಾನವನು ಅಲ್ಲವೇ!     

ತೊಂಬತ್ತನಾಲ್ಕನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್  ಕರುಣೆಯಿಂದ ಶರಣಾಗತಿಯಲ್ಲಿ ದೃಢವಾದ ಲಂಗರು ಹಾಕುವಿಕೆಯಿಂದ ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿ ಮತ್ತು ಶ್ರೀವೈಕುಂಠದೊದಿಗೆ ಕೊನೆಗೊಳ್ಳುವ ಮೂಲಕ ತನ್ನನ್ನು ಸಾಧಿಸುವ ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಕರುಣೆಯಿಂದ ಪ್ರಯೋಜನಗಳನ್ನು ನೀಡಿದರೂ, ಅಮುಧಾನಾರ್ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್  ಅವರ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳನ್ನು ಹೊರತುಪಡಿಸಿ ಬೇರೇನನ್ನೂ ಅಪೇಕ್ಷಿಸುವುದಿಲ್ಲ ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ತವಮ್ ತರುಂ ಸೆಲ್ವಂ ತಗವುಂ ತರುಂ ಸಲಿಯಾಪ್ ಪಿಱವಿಪ್

ಪವಂ ತರುಂ ತೀವಿನೈ ಪಾಱ್ಱಿತ್ ತರುಂ ಪರಂದಾಮಂ ಎನ್ನುಂ

ತಿವಮ್  ತರುಂ ತೀದಿಲ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ತನ್ನೈಚ್ ಚಾರ್ನ್ದವರ್ಗಟ್ಕು

ಉವಂದು ಅರುಂದೇನ್ ಅವನ್ ಶೀರ್ ಅನ್ಱಿ ಯಾನ್ ಒನ್ಱುಂ ಉಳ್ ಮಗಿೞ್ನ್ದೇ

  ತನ್ನನ್ನು ಸಾಧಿಸುವವರಿಗೆ ಪ್ರಯೋಜನವನ್ನು ನೀಡದಿರುವ ಕೊರತೆಯನ್ನು ಹೊಂದಿರದ ಎಂಪೆರುಮಾನರ್, ತನ್ನನ್ನು ಸಾಧಿಸುವವರಿಗೆ ಶರಣಾಗುವ ಕ್ರಿಯೆಯಲ್ಲಿ ದೃಢವಾದ ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ನೀಡುತ್ತಾನೆ. ಅವನು ಭಕ್ತಿಯ ಸಂಪತ್ತನ್ನು ನೀಡುತ್ತಾನೆ, ಅದು ಪ್ರಾಪ್ತ್ಯಂ (ಪ್ರಯೋಜನ) ಅದರ ಅಂತಿಮ ಫಲಿತಾಂಶಕ್ಕೆ ಸೂಕ್ತವಾಗಿದೆ. ಅವರು ಸಂಸಾರದಲ್ಲಿ ಜನ್ಮಗಳನ್ನು ಸೃಷ್ಟಿಸುವ ಕೆಟ್ಟ ಕಾರ್ಯಗಳನ್ನು ಹೊಡೆದುರುಳಿಸುತ್ತಾರೆ, ಇದು ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಹೊರತುಪಡಿಸಿ ಬೇರೆ ಯಾರಿಂದಲೂ ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ. ಅವರು ಪರಂಧಾಮಂ ಎಂದೂ ಕರೆಯಲ್ಪಡುವ ಶ್ರೀವೈಕುಂಠವನ್ನು ಕೊಡುತ್ತಾರೆ. ಇವನ್ನೆಲ್ಲ ಕೊಟ್ಟರೂ ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು  ಅವನ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳನ್ನು ಬಿಟ್ಟು ಬೇರೇನನ್ನೂ ಆನಂದಿಸುವುದಿಲ್ಲ.

ತೊಂಬತ್ತೈದನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ಜ್ಞಾನ, ಶಕ್ತಿ ಇತ್ಯಾದಿಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸಿ ಅವರು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಈ ಪ್ರಪಂಚದವರಲ್ಲ ಮತ್ತು ಸಂಸಾರದೊಂದಿಗೆ ಯಾವುದೇ ಸಂಬಂಧವನ್ನು ಹೊಂದಿರದ ನಿತ್ಯಸೂರಿಗಳಲ್ಲಿ ಒಬ್ಬರು ಈ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಅವತರಿಸಿದ್ದಾರೆ ಎಂದು ಅವರು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಉಳ್ ನಿನ್ಱು ಉಯಿರ್ಗಳುಕ್ಕು ಉಱ್ಱವನೇ ಸೆಯ್ದು ಅವರ್ಕ್ಕು ಉಯವೇ

ಪಣ್ಣುಂ ಪರನುಮ್ ಪರಿವಿಲನಾಮ್ಬಡಿ ಪಲ್ ಉಯಿರ್ಕ್ಕುಂ   

ವಿಣ್ಣಿನ್ ತಲೈ ನಿನ್ಱು ವೀಡು ಅಳಿಪ್ಪಾನ್ ಎಮ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್

ಮಣ್ಣಿನ್ ತಲತ್ತು ಉದಿತ್ತು ಉಯ್ಮಱೈ ನಾಲುಮ್ ವಳರ್ತ್ತನನೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಆತ್ಮಗಳನ್ನು ಪ್ರವೇಶಿಸುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ಅವುಗಳನ್ನು ಮೇಲಕ್ಕೆತ್ತಲು ಕ್ರಮಗಳನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುತ್ತಾನೆ. ಆದರೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರನ್ನು  ನೋಡಿದರೆ ಎಂಪೆರುಮಾನರಿಗೂ ಸಹ ಆತ್ಮಾಭಿಮಾನದ ಬಗ್ಗೆ ಅಷ್ಟೊಂದು ಪ್ರೀತಿ ಇಲ್ಲ ಎಂದು ಹೇಳಬಹುದು. ಏಕೆಂದರೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ , ನಮ್ಮ ನಾಥನ್ (ಪ್ರಭು) ಅಲೌಕಿಕ ಪ್ರದೇಶದಲ್ಲಿ ಶ್ರೀವೈಕುಂಠಂನ ಶ್ರೇಷ್ಠ ನಿವಾಸದಿಂದ, ಎಲ್ಲಾ ಆತ್ಮಗಳನ್ನು ಉದ್ಧರಿಸಲು ಮತ್ತು ಮೋಕ್ಷವನ್ನು ನೀಡುವುದಕ್ಕಾಗಿ ಬಂದವರು. ಇಲ್ಲಿರುವ ಯಾವ ದೋಷವೂ ತಟ್ಟದೆ ಭೂಮಿಯ ಮೇಲೆ ಅವತರಿಸಿದನು. ಎಲ್ಲರನ್ನು ಉದ್ಧಾರ ಮಾಡುವ ನಾಲ್ಕು ವೇದಗಳನ್ನು ಯಾವುದೇ ಕೊರತೆಯಿಲ್ಲದೆ ಎಲ್ಲರೂ ಉನ್ನತಿ ಹೊಂದುವಂತೆ ಪೋಷಿಸಿದರು.

ತೊಂಬತ್ತಾರನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್  ಕರುಣೆಯಿಂದ ವೇದಾಂತಗಳಿಗೆ (ಉಪನಿಷತ್‌ಗಳಿಗೆ) ಅನುಗುಣವಾಗಿ ಎರಡು ಮಾರ್ಗಗಳನ್ನು ತೋರಿಸಿದ್ದಾರೆ, ಅವುಗಳೆಂದರೆ ಭಕ್ತಿ  ಮತ್ತು ಪ್ರಪತ್ತಿ (ಶರಣಾಗತಿಯ ಕ್ರಿಯೆ). ಈ ಎರಡರಲ್ಲಿ, ನಿಮ್ಮ ಮಾರ್ಗವು ಸುಲಭವಾಗಿ ಸಾಗಿಸುವ ಪ್ರಪತ್ತಿಯೇ? ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ವಾತ್ಸಲ್ಯದಲ್ಲಿ ಆಶ್ರಯ ಪಡೆದಿದ್ದೇನೆ ಎಂದು ಅಮುದನಾರ್  ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ವಳರುಂ ಪಿಣಿ ಕೊಣ್ಡ ವಲ್ವಿನೈಯಾಲ್ ಮಿಕ್ಕ ನಲ್ವಿನೈಯಿಲ್

ಕಿಳರುಂ ತುಣಿವು ಕಿಡೈತ್ತಱಿಯಾದು ಮುಡೈತ್ತಲೈ ಊನ್

ತಳರುಂ ಅಳವುಂ ದರಿತ್ತುಂ ವಿೞುಂದುಂ ತನಿ ತಿರಿವೇಱ್ಕು

ಉಳರ್ ಎಮ್ ಇರೈಯವರ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ತನ್ನೈ ಉಱ್ಱವರೇ

  ಅನಿಯಮಿತ ದುಃಖಗಳನ್ನು ನೀಡುವ ಎದ್ದುಕಾಣುವ ಕರ್ಮಗಳಿಂದ (ಹಿಂದಿನ ಕರ್ಮಗಳು) ಶರಣಾಗತಿಯ ಅತ್ಯಂತ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಮಾರ್ಗದಲ್ಲಿ ಒಬ್ಬರು ಸುಲಭವಾಗಿ ಸಂಪೂರ್ಣ ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುವುದಿಲ್ಲ. ದುರ್ಗಂಧದ ಭಂಡಾರವಾಗಿರುವ ಮತ್ತು ಮಾಂಸ ಇತ್ಯಾದಿಗಳಿಂದ ಕೂಡಿದ ಈ ದೇಹವು ಸನ್ನಿಹಿತವಾದ ಛಿದ್ರವಾಗುವ  ಮರಣದ ಸಮಯದಲ್ಲಿ , ಉತ್ತಮ ಸೂಚನೆಗಳ ಮೂಲಕ, ಪ್ರಾಪಂಚಿಕ ಅನ್ವೇಷಣೆಗಳಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಂಡಿದ್ದ ಮತ್ತು ಯಾವುದೇ ಆಧಾರವಿಲ್ಲದೆ ತಿರುಗಾಡುತ್ತಿದ್ದ ನನಗೆ , ಯಾರಿಗೆ ನಮ್ಮ ಸ್ವಾಮಿ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಆಶ್ರಯವಾಗಿದ್ದಾರೋ  ಅವರೇ  ನನಗೆ  ಬೆಂಬಲ.

ತೊಂಬತ್ತೇಳನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್‌ಗೆ ಮಾತ್ರವಲ್ಲದೆ ಅವರ ಅನುಯಾಯಿಗಳಿಗೂ ಅಪೇಕ್ಷಿಸಲು ಕಾರಣವೇನು? ಅದೂ ಕೂಡ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ಕರುಣೆಯಿಂದ ಬಂದಿದೆ ಎಂದು ಅಮುದನಾರ್  ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ತನ್ನೈ ಉಱ್ಱು ಆಟ್ಚೆಯ್ಯುಂ ತನ್ಮೈಯಿನೋರ್  ಮನ್ನು ತಾಮರೈತ್ತಾಳ್

ತನ್ನೈ   ಉಱ್ಱು ಆಟ್ಚೆಯ್ಯ ಎನ್ನೈ ಉಱ್ಱಾನ್ ಇನ್ಱು ತನ್ ತಗವಲ್

ತನ್ನೈ ಉಱ್ಱಾರ್ ಅನ್ಱಿತ್ ತನ್ಮೈ ಉಱ್ಱಾರ್ ಇಲ್ಲೈ ಎನ್ಱು ಅರಿಂದು

ತನ್ನೈ ಉಱ್ಱಾರೈ ಇರಾಮುನಸನ್ ಗುಣಂ ಸಾಱ್ಱಿಡುಮೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರು ತಮ್ಮ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಯೋಚಿಸಿದರು, ಬಂದು ತನ್ನನ್ನು ಸಾಧಿಸುವ ಜನರಿದ್ದರೂ, ತನ್ನನ್ನು ಪಡೆದವರನ್ನು ಸಾಧಿಸುವ ಮತ್ತು ಹೊಗಳುವವರು ಯಾರೂ ಇಲ್ಲ. ಹೀಗಾಗಿ, ಅವನು ನನ್ನನ್ನು ಅವನೊಂದಿಗೆ ಮಾತ್ರ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಳ್ಳುವಂತೆ ಮಾಡಿದನು ಮತ್ತು ಇತರ ಎಲ್ಲ ಲೌಕಿಕ ಅನ್ವೇಷಣೆಗಳನ್ನು ಮರೆತುಬಿಡುತ್ತಾನೆ; ಆತನು ತನ್ನ ಸೇವಕರಾದವರ ಮಧುರವಾದ, ಪೂರಕವಾದ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳ ಹೊರತಾಗಿ ನನಗೆ ಬೇರೇನೂ ತಿಳಿಯದಂತೆ ಮಾಡಿದನು. ಅವರ ಕರುಣೆಯಿಂದಾಗಿ, ಅವರು ಇಂದು ನನ್ನನ್ನು ತಮ್ಮ  ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ಸ್ವೀಕರಿಸಿದರು.

ತೊಂಬತ್ತೆಂಟನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ತನ್ನ ಕರ್ಮಗಳ ಆಧಾರದ ಮೇಲೆ ತನ್ನನ್ನು ಸ್ವರ್ಗ ಅಥವಾ ನರಕಕ್ಕೆ ಕಳುಹಿಸಬಹುದೆಂದು ಅಮುಧನಾರನು ತನ್ನ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಭಾವಿಸಿದನು ಮತ್ತು ಅದರ ಬಗ್ಗೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರನ್ನು   ಕೇಳಿದನು. ತನಗೆ ಶರಣಾದವರಿಗೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಹಾಗೆ ಮಾಡುವುದಿಲ್ಲ ಎಂದು ರಾಮಾನುಜರು ಭರವಸೆ ನೀಡುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಕಾತುರ ಬಿಡಲು  ಕೇಳಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ.

ಇಡುಮೇ ಇನಿಯ ಶುವರ್ಕ್ಕತ್ತಿಲ್ ಇನ್ನಂ ನರಗಲಿತ್ತುಚ್

ಚುಡುಮೇ ಅವಱ್ಱೈತ್ ತೊಡರ್ ತರು ತೊಲ್ಲೈ ಶುೞಲ್ ಪಿಱಪ್ಪಿಲ್

ನಡುಮೇ ಇನಿ ನ್ಂ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ನಮ್ಮೈ  ನಮ್  ವಶತ್ತೇ

ವಿಡುಮೇ ಶರಣಂ  ಎನ್ಱಾಲ್ ಮನಮೇ ನೈಯಲ್ ಮೇವುದರ್ಕೇ

  ನಮ್ಮನ್ನು ಉದ್ಧಾರ ಮಾಡಲು ಬಂದಿರುವ ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ಗೆ “ನೀನು ನಮ್ಮ ಆಶ್ರಯ” ಎಂದು ಹೇಳಿದಾಗ, ಅವನು ನಮ್ಮನ್ನು ಲೌಕಿಕ ಅನ್ವೇಷಣೆಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿರುವವರಿಗೆ ಮಧುರವಾಗಿ ತೋರುವ ಸ್ವರ್ಗದಲ್ಲಿ ಬಿಡುವನೇ? ಅವನ ಪಾದಗಳನ್ನು ಪಡೆದ ನಂತರವೂ ನರಕದಲ್ಲಿ ಹಿಂಸಿಸಲ್ಪಡಲು ನಮಗೆ ಅವಕಾಶ ನೀಡಬಹುದೇ? ಸ್ವರ್ಗ ಮತ್ತು ನರಕವನ್ನು ಅನುಸರಿಸುವ ಜನನ ಮತ್ತು ಮರಣಗಳ ಪುನರಾವರ್ತಿತ ಚಕ್ರದಲ್ಲಿ ಸಿಕ್ಕಿಹಾಕಿಕೊಳ್ಳುವಂತೆ ಅವನು ನಮ್ಮನ್ನು ಬಿಡುತ್ತಾನೆಯೇ? ಅಥವಾ, ನಮ್ಮ ಇಚ್ಛೆಯಂತೆ ಬದುಕಲು ಆತನು ಅನುಮತಿಸುವನೇ? ಓ ಮನಸೇ! ನಾವು ಪಡೆಯುವ ಅಂತಿಮ ಪ್ರಯೋಜನದ ಬಗ್ಗೆ ದುಃಖಿಸಬೇಡಿ.

ತೊಂಬತ್ತೊಂಬತ್ತನೇ ಪಾಸುರಂ. ನಾವು ಬಾಹ್ಯರು (ವೇದಗಳನ್ನು ನಂಬದವರು) ಮತ್ತು ಕುದ್ರುಷ್ಟಿಗಳು (ವೇದಗಳನ್ನು ತಪ್ಪಾಗಿ ಅರ್ಥೈಸುವವರು) ಹೇರಳವಾಗಿ ಕಂಡುಬರುವ ಸ್ಥಳದಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುವುದರಿಂದ, ನಾವು ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳ್ಳುವ ಸಾಧ್ಯತೆ ಹೆಚ್ಚು ಇಲ್ಲವೇ? ರಾಮಾನುಜ ಬಂದ ನಂತರ ಈ ಜನರು ತಮ್ಮ ಜೀವನೋಪಾಯವನ್ನು ಕಳೆದುಕೊಂಡರು ಎಂದು ಅಮುಧನಾರ್  ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ತರ್ಕಚ್ ಚಮಣರುಂ ಸಾಕ್ಕಿಯಪ್ ಪೇಯ್ಗಳುಂ ತಾೞ್ ಸಡೈಯೋನ್

ಸೊಲ್ ಕಱ್ಱ ಸೋಂಬರುಂ ಸೂನಿಯ ವಾದರುಂ ನಾನ್ಮರೈಯುಂ

ನಿಱ್ಕಕ್ ಕುಱುಂಬು ಸೆಯ್ ನೀಶರುಂ ಮಾಣ್ದನರ್ ನೀಳ್ ನಿಲತ್ತೇ

ಪೊಱ್ಕಱ್ಪಗಂ ಎಮ್ ಇರಾಮಾನುಶ ಮುನಿ ಪೋಂದ  ಪಿನ್ನೇ

ವಾಗ್ವಾದಗಳ ಮೂಲಕ ತಮ್ಮ ತತ್ತ್ವಜ್ಞಾನವನ್ನು ಜಾಣ್ಮೆಯಿಂದ ನಡೆಸುವ ಶಮಣರು, ತಮ್ಮ ತತ್ತ್ವವನ್ನು ನೆಪಮಾತ್ರದಂತೆ ಹಿಡಿದಿಟ್ಟುಕೊಳ್ಳುವ ಬೌದ್ಧರು, ಜಟಾಧಾರಿ ರುದ್ರರು ಹೇಳಿದ ಶೈವಾಗಮವನ್ನು ಕಲಿತು ತಪಸ್ಸು ಮಾಡುವ ಕೀಳು ತಾಮಸ (ಅಜ್ಞಾನ ಮತ್ತು ಸೋಮಾರಿತನ) ಹೊಂದಿರುವ ಶೈವರು.   ಮತ್ತು ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಅವರ ಅನುಮತಿಯೊಂದಿಗೆ, ಮೋಹಶಾಸ್ತ್ರಗಳನ್ನು (ಇತರರನ್ನು ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳಿಸುವ ಕೀಳು ಗ್ರಂಥ), ಮಾಧ್ಯಮಿಕರು (ಬೌದ್ಧಗಳ ಒಂದು ಉಪಪಂಗಡ) ಶೂನ್ಯಮ್ (ಶೂನ್ಯತೆಯ) ಸಿದ್ಧಾಂತವನ್ನು ಪ್ರತಿಪಾದಿಸುತ್ತಾರೆ, ಕುದೃಷ್ಟಿಗಳು, ಮೇಲಿನವುಗಳಿಗಿಂತ ಭಿನ್ನವಾಗಿ, ಆದರೆ ವೇದಗಳನ್ನು ಸ್ವೀಕರಿಸುತ್ತಾರೆ. ವೇದಗಳ ಅರ್ಥಗಳಿಗೆ ತಪ್ಪಾದ ವ್ಯಾಖ್ಯಾನ, ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನಂತರ ನಾಶವಾಯಿತು, ಅವರು ಕಲ್ಪ  ವೃಕ್ಷದಂತಹ (ಇಷ್ಟವನ್ನು ಪೂರೈಸುವ ವೃಕ್ಷ) ಮತ್ತು ಈ ಜನರನ್ನು ನಮಗೆ ತೋರಿಸಿಕೊಟ್ಟವರು, ಈ ವಿಸ್ತಾರವಾದ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಅವತರಿಸಿದ್ದಾರೆ.

ನೂರನೇ ಪಾಸುರಂ. ಅವರ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್  ಅವರ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳ ಮಧುರವಾದ ಅನುಭವಕ್ಕೆ ಅಪೇಕ್ಷೆಯಿಂದ ತೊಡಗಿರುವುದನ್ನು ನೋಡಿದ ಅಮುದನಾರರು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್‌ ತನಗೆ ಬೇರೆ ಯಾವುದನ್ನಾದರೂ ತೋರಿಸಿ ತನ್ನನ್ನು ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳಿಸಬೇಡಿ ಎಂದು ಕೇಳಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ.

ಪೋಂದದು ಎನ ನೆಂಜು ಎನ್ನುಂ ಪೊನ್ವಂದು ಉನದು ಅಡಿಪ್ ಪೋದಿಲ್ ಒಣ್ ಶೀರ್       

ಆಂ ತೆಳಿ ತೇನ್ ಉಂಡು ಅಮರ್ನ್ದಿಡ ವೇಣ್ಡಿಲ್ ನಿಂ ಪಾಲ್ ಅದುವೇ

ಇಂದಿಡ ವೇಣ್ಡುಂ ಇರಾಮಾನುಶ ಇದು ಅನ್ಱಿ ಒನ್ಱುಂ

ಮಾನ್ದ ಕಿಲ್ಲಾದು ಇನಿ ಮಱ್ಱು ಒನ್ಱು ಕಾಟ್ಟಿ ಮಯಕ್ಕಿಡಲೇ

  ಸುಂದರವಾದ ಜೀರುಂಡೆಯಂತಿರುವ ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು, ಹೂವಿನಂತಿರುವ ನಿನ್ನ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳ ತಂಪು ಮತ್ತು ಮೃದುತ್ವದ ದೋಷರಹಿತ ಮಧುವನ್ನು ಕುಡಿದು ಅಲ್ಲಿಯೇ ಶಾಶ್ವತವಾಗಿ ವಾಸಿಸಲು ನಿನ್ನ ಬಳಿಗೆ ಬಂದಿತು. ನೀವು ಅದನ್ನು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಕೊಡಬೇಕು. ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು ಬೇರೆ ಯಾವುದನ್ನೂ ಆನಂದಿಸುವುದಿಲ್ಲ. ನೀನು ನನಗೆ ಬೇರೇನನ್ನೂ ತೋರಿಸಿ ನನ್ನನ್ನು ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳಿಸಬೇಡ.

ಅನುವಾದ : ಅಡಿಯೇನ್ ರಂಗನಾಯಕಿ ರಾಮಾನುಜ ದಾಸಿ

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 41 से 50

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 31 से 40 

पाशूर ४१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं इस संसार को  जिसे भगवान नहीं सुधार सके, उसे श्रीरामानुज स्वामीजी के अवतार ने सुधार दिया। 

मण्मिसै योनिगळ् तोऱुम् पिऱन्दु एन्गळ् मादवने
कण् उऱ निऱ्किलुम् काणगिल्ला उलगोर्गळ् एल्लाम्
अण्णल् इरामानुसन् वन्दु तोन्ऱिय अप्पोळुदे
नण्णरुम् ग्यानम् तलैक्कोण्डु नारणऱ्कु आयिनरे

हमारे स्वामी लक्ष्मीपति श्रीमन्नारायण ही इस भूतल पर अलग अलग रूपों में  अवतार लेकर सबके नयनगोचर होकर विराजमान हुए थे। तो भी इस भूमंडलनिवासी लोग उनको अपने नाथ नहीं समझ सके। ऐसे रहनेवाले ये लोग, सर्वस्वामी श्रीरामानुज स्वामीजी के यहां पर अवतार लेने के बाद ही दुर्लभ ज्ञान प्राप्त कर श्रीमन्नारायण के शेष बन गये।

पाशूर ४२: श्रीरंगामृत स्वामीजी आनंदित है यह कहकर कि श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रेष्ठ कृपा से उनकी रक्षा किये जब वें सांसारिक कार्यों में निरत थे। 

आयिळियार् कोन्गै तन्गुम् अक्कादल् अळऱ्ऱु अळुन्दि
मायुम् एन् आवियै वन्दु एडुत्तान् इन्ऱु मामलराळ्
नायगन् एल्ला उयिर्गट्कुम् नादन् अरन्गन् एन्नुम्
तूयवन् तीदु इल् इरामानुसन् तोल् अरुळ् सुरन्दे

‘लक्ष्मीपति श्रीरंगनाथ भगवान ही सब के स्वामी हैं,’  यह उपदेश सबको देनेवाले, परमपवित्र और  सकलविध दोषरहित  श्री रामानुज स्वामीजी ने अपनी निर्हेतुक कृपासे, सुंदर आभूषण पहनने वाली स्त्रियों के स्तनों पर की जानेवाली आशारूपी कीचड़ में पड़कर विनाश पानेवाली मेरी आत्मा का, उद्धार किया ।

पाशूर ४३: जिस प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें अपने छत्र में लिया, उससे बहुत खुश होकर और इस संसार के लोगों को देखकर वें उन्हें कहते हैं कि, श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का संकीर्तन करें और उन्हें इसका पूर्ण लाभ प्राप्त होगा । 

सुरक्कुम् तिरुवुम् उणर्वुम् सोलप्पुगिल् वाय् अमुदम्
परक्कुम् इरु विनै पऱ्ऱु अऱ ओडुम् पडियिल् उळ्ळीर्
उरैक्किन्ऱनन् उमक्कु यान् अऱम् सीऱुम् उऱु कलैयैत्
तुरक्कुम् पेरुमै इरामानुसन् एन्ऱु सोल्लुमिने

हे भूतल निवासी जनों! मैं तुमसे एक हित बचन कहूंगा; सुनो। धर्ममार्ग पर नाराज होनेवाले प्रबल कलिपुरुष का ध्वंस करने वाले श्रीरामानुज स्वामीजी के शुभ नामों का संकीर्तन करो। उससे भक्तिसंपत् और ज्ञान बढ़ेंगे; नामसंकीर्तन करने के प्रारंभ में ही जीभ में अमृतरस बहेगा और महापाप समूल नष्ट हो जायेंगे।

पाशूर ४४: यह देखते हुए श्रीरामानुज स्वामीजी के महानता का दिशा निर्देश देते हुए उनसे सम्बंधीत विषयों में निरत नहीं हैं, उनके इस स्वभाव को देखकर उन्हें दुख हुआ। 

सोल् आर् तमिळ् ओरु मून्ऱुम् सुरुदिगळ् नान्गुम् एल्लै
इल्ला अऱनेऱि यावुम् तेरिन्दवन् एण्णरुम् सीर्
नल्लार् परवुम् इरामानुसन् तिरुनामम् नम्बिक्
कल्लार् अगल् इडत्तोर् एदु पेऱु एन्ऱु कामिप्परे

समस्त सज्जनों से संस्तुत श्रीरामानुज स्वामीजी तीन प्रकार के द्राविड़शास्त्रों (गद्य,पद्य व नाटक), चार वेदों (ऋग, यजुर, साम, अथर्व) और अपरिमित धर्मशास्त्रों के वेत्ता हैं। संसारी लोग तो (ऐसे सकल शास्त्रवेत्ता एवं) असंख्येय कल्याण गुण विभूषित इनके नामसंकीर्तन नहीं करते; और (यह अर्थ भी नहीं जानते हुए कि यह नामसंकीर्तन ही परम पुरुषार्थ है) यों चिंता करते करते दुःख पाते हैं कि हमारे योग्य पुरुषार्थ कौनसा है। 

पाशूर ४५: यह स्मरण करना कि कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीरंगामृत स्वामीजी को अकारण हीं सही किया जब वें इस संसार के लोगों जैसे थे  जो श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति अनिच्छुक थे। वें कहते हैं कि वों यह कह नहीं सकते कि कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन पर कृपा कर लाभ दिया हैं। 

पेऱु ओन्ऱु मऱ्ऱु इल्लै निन् चरण् इन्ऱि अप्पेऱु अळित्तऱ्कु
आऱु ओन्ऱुम् इल्लै मऱ्ऱु अच्चरण् अन्ऱि एन्ऱु इप्पोरुळैत्
तेऱुम् अवर्क्कुम् एनक्कुम् उनैत् तन्द सेम्मै सोल्लाल्
कूऱुम् परम् अन्ऱु इरामानुस मेय्म्मै कूऱिडिले

हे रामानुज स्वामिन्। सत्य कहूंगा। आपके चरणारविन्दों के सिवा दूसरी कोई प्राप्य वस्तु नहीं होगी; और उसका साधन भी आपके वे ही श्रीचरण हैं। यह तत्वार्थ ठीक जाननेवाले महात्मालोगों, और इस निश्चय से विरहित मुझको एकसम ही आपने जो अपनी कृपा का पात्र बना दिया, यह आपका आर्जवगुण वाचामगोचर वैभववाला है। 

पाशूर ४६: श्रीरंगामृत स्वामीजी पर श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा लाभ पहुँचाने को 
स्मरण करते  उनके गुणों को गाते हुए, वें श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों कि पूजा करते हैं। 

कूऱुम् समयन्गळ् आरुम् कुलैय कुवलयत्ते
माऱन् पणित्त मऱै उणर्न्दोनै मदियिलेन्
तेऱुम्पडि एन् मनम् पुगुन्दानै तिसै अनैत्तुम्
एऱुम् गुणनै इरामानुसनै इऱैन्जिनमे

श्रीशठकोप स्वामीजी ,इस संसार पर कृपा कर श्रीसहस्त्रगीति को दिया हैं जो  द्राविड वेदम के नाम से सुप्रसिद्ध हैं और ६ बाह्य धर्मों  को पूर्णत: नष्ट कर दिया। श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने यह श्रीसहस्त्रगीति को पढ़ा और यह जाना कि यह पूर्णत: मेरे हृदय कृपा कर प्रवेश किया ताकि मैं जिसे इसके बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं हैं स्पष्टता प्राप्त कर सकू। हम ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी के नत मस्तक होते हैं जिनके पास ऐसे दिव्य गुण हैं जो सभी दिशा में फैल  रही हैं। 

पाशूर ४७: श्रीरामानुज स्वामीजी सभी को भगवान के प्रति रुचि उत्तपन्न करते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा प्रदान किए गए लाभ को स्मरण करते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि उनके समान (बरा बर) कोई नहीं हैं। 

इऱैन्जप्पडुम् परन् ईसन् अरन्गन् एन्ऱु इव्वुलगत्तु
अऱम् सेप्पुम् अण्णल् इरामानुसन् एन् अरुविनैयिन्
तिऱम् सेऱ्ऱु इरवुम् पगलुम् विडादु एन्दन् सिन्दैयुळ्ळे
निऱैन्दु ओप्पु अऱ इरुन्दान् एनक्कु आरुम् निगर् इल्लैये

इस भूमंडल पर इस साक्षात् परमधर्म, “सब के प्रणम्य परदेवता साक्षात् श्रीरंगनाथ भगवान ही हैं” का उपदेश करनेवाले सर्वस्वामी श्री रामानुजस्वामीजी मेरा प्रबल पापसमूह मिटा कर, मेरे हृदय में ही ऐसे दिनरात अविच्छिन्न विराजमान हैं कि मानों आप और कहीं रहते ही नहीं। अतः दूसरा कोई मेरे सदृश (भाग्यवान) नहीं है। 

पाशूर ४८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी के शब्दों को सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी कहते हैं कि उनकी खुशी उनके साथ नहीं रहेगी अगर श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को या इसके विपरीत हो जाये। इसको बताते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि उनका आश्रय की  दीनता श्रीरामानुज स्वामीजी की  कृपा हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा का लक्ष्य उनको शरण देने का उनकी दीनता है। दोनों को अलग करने का कोई कारण हीं नहीं हैं। 

निगर् इन्ऱि निन्ऱ एन् नीसदैक्कु निन् अरुळिन् कण् अन्ऱिप्
पुगल् ओन्ऱुम् इल्लै अरुट्कुम् अह्दे पुगल् पुन्मैयिलोर्
पगरुम् पेरुमाइ इरामानुस इनि नाम् पळुदे
अगलुम् पोरुळ् एन् पयन् इरुवोमुक्कुम् आन पिन्ने

हे महात्माओं की स्तुती पाने योग्य वैभववाले श्री रामानुज स्वामिन् ! मेरी असदृश नीचता की शरण, आपकी कृपा के सिवा दूसरी कोई नहीं होगी; और आपकी उस कृपा की भी मेरी नीचता ही शरण है। इस प्रकार, जब यह अर्थ सिद्ध हुआ कि आपसे मेरा लाभ, और मेरे से आपका लाभ है, फिर, अब से हम दोनों क्यों  व्यर्थ ही एक दूसरे को छोडेंगे ? 

पाशूर ४९: श्रीरामानुज स्वामीजी के अवतार के पश्चात जो आधिक्य प्राप्त हुआ उसे स्मरण कर वें खुश हुए। 

आनदु सेम्मै अऱनेऱि पोय्म्मै अऱु समयम्
पोनदु पोन्ऱि इऱन्ददु वेम् कलि पून्गमलत्
तेन् नदि पाय् वयल् तेन् अरन्गन् कळल् सेन्नि वैत्तुत्
तान् अदिल् मन्नुम् इरामानुसन् इत् तलत्तु उदित्ते

कमलपुष्पों से बहनेवाले मधु के प्रवाह से परिपूर्ण खेतों से परिवृत श्रीरंगक्षेत्र के स्वामी श्रीरंगनाथ भगवान के श्रीचरणों को अपने सिर पर धारण करते हुए, उन पर ही भक्ति करनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी के इस धरातल पर अवतरित होने से, सीधा धर्ममार्ग प्रतिष्ठित हुआ; असत्यार्थ का वर्णन करनेवाले ६ मत नष्ट हो गये और क्रूर कलियुगने भी विनाश पाया।

पाशूर ५०: श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरणों के प्रति गहरा प्रेम देखकर आनंदित होते हैं। 

उदिप्पन उत्तमर् सिन्दैयुळ् ओन्नलर् नेन्जम् अन्जिक्
कोदित्तिड माऱि नडप्पन कोळ्ळै वन् कुऱ्ऱम् एल्लाम्
पदित्त एन् पुन् कविप् पा इनम् पूण्डन पावु तोल् सीर्
एदित् तलै नादन् इरामानुसन् तन् इणै अडिये

सारे भूतल पर विस्तृत यशवाले यतिराज श्री रामानुज स्वामीजी के उभय श्रीपाद उत्तम पुरुषों के हृदयों में चमकते हैं, प्रतिपक्षियों के लिए भयंकर संचार करते हैं; और अपार व असह्य दोषों से परिपूर्ण मेरी इस स्तोत्ररूपी क्षुद्र कविता को स्वीकार करते हैं ।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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ರಾಮಾನುಜ ನೂಱ್ಱಂದಾದಿ – ಸರಳ ವಿವರಣೆ – 81 ರಿಂದ 90ನೆ ಪಾಸುರಗಳು

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ಶ್ರೀಃ ಶ್ರೀಮತೆ ಶಠಗೋಪಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತೆ ರಾಮಾನುಜಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತ್ ವರವರಮುನಯೆ ನಮಃ

ಪೂರ್ಣ ಸರಣಿ

ಹಿಂದಿನ ಶೀರ್ಷಿಕೆ << 71-80 ಪಾಸುರಗಳು

ಎಂಬತ್ತನೇ ಪಾಸುರಂ. ಅವರು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರಿಂದ ಹೇಗೆ ಸರಿಪಡಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದ್ದಾರೆಂದು ಸ್ವತಃ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರಿಗೆ ಶರಣಾಗುತ್ತಾರೆ  ಮತ್ತು ಅವರ ಕೃಪೆಗೆ ಸಮಾನವಾದದ್ದು ಯಾವುದೂ ಇಲ್ಲ ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಶೋರ್ವು ಇನ್ಱಿ ಉಂದನ್ ತುಣೈ ಅಡಿಕ್ಕೀೞ್ ತೊಣ್ಡುಪಟ್ಟವರ್ ಪಾಲ್

ಶಾರ್ವು ಇನ್ಱಿ ಎನಕ್ಕು ಅರಂಗನ್ ಸೆಯ್ಯ ತಾಳ್ ಇಣೈಗಳ್

ಪೇರ್ವು  ಇನ್ಱಿ  ಇನ್ಱು ಪಱುತ್ತುಂ ಇರಾಮಾನುಶ ಇನಿ ಉನ್

ಶೀರ್ ಒನ್ಱಿಯ ಕರುಣೈಕ್ಕು ಇಲ್ಲೈ ಮಱು ತೆರಿವುಱಿಲೇ

ನಿಮ್ಮ ಪೂರಕವಾದ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳಿಗೆ ಸೇವಕರಾಗಿದ್ದವರು ಮತ್ತು ಇತರ ವಿಷಯಗಳಲ್ಲಿ ತಮ್ಮ ಮನಸ್ಸನ್ನು ತೊಡಗಿಸಿಕೊಳ್ಳದವರೊಂದಿಗೆ ನಾನು ಸಂಬಂಧ ಬಯಸುವುದಿಲ್ಲ. ಇಂದು ನನಗೆ ಪೆರಿಯ ಪೆರುಮಾಳ್ ಅವರ ಕೆಂಪು ಬಣ್ಣದ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳನ್ನು ನೀಡಿದ ರಾಮಾನುಜಾ ಅವರು ಪರಸ್ಪರ ಪೂರಕವಾಗಿರುವ ಮತ್ತು ಅವರ ದಿವ್ಯವಾದ ಕಪ್ಪು ರೂಪಕ್ಕೆ ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ವ್ಯತಿರಿಕ್ತವಾಗಿದೆ! ಇದು ಸಂಭವಿಸಿದ ನಂತರ,  ವಿಶ್ಲೇಷಿಸಿದರೆ, ನಿಮ್ಮ ಗೌರವಾನ್ವಿತ ಕರುಣೆಗೆ ಸಮಾನವಾದದ್ದು ಯಾವುದೂ ಇಲ್ಲ.

ಎಂಬತ್ತೆರಡನೇ ಪಾಸುರಂ. ಪೆರಿಯ ಪೆರುಮಾಳ್ ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಿಗೆ ಲಗತ್ತಿಸುವಂತೆ ತನಗೆ ಉಪದೇಶ ನೀಡಿದ ರಾಮಾನುಜರು ಪುಣ್ಯಾತ್ಮರು ಎಂದು ಅಮುಧನಾರರು ಸಂತೋಷದಿಂದ ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ತೆರಿವು ಉಱ್ಱ ಜ್ಞಾನಮ್ ಸೆಱಿಯಪ್ ಪೆಱಾದು ವೆಂ ತೀ ವಿನೈಯಾಲ್

ಉರು ಅಱ್ಱ ಜ್ಞಾನತ್ತು ಉೞಲ್ಗಿನ್ಱ ಎನ್ನೈ ಒರು ಪೊೞುದಿಲ್

ಪೊರು ಅಱ್ಱ ಕೇಳ್ವಿಯನಾಕ್ಕಿ ನಿನ್ಱಾನ್ ಎನ್ನ ಪುಣ್ಣಿಯನೋ

ತೆರಿವು ಉಱ್ಱ ಕೀರ್ತಿ ಇರಾಮಾನುಸನ್ ಎನ್ನುಂ ಶೀರ್ ಮುಗಿಲೇ

 ನಾನು ಸತ್ (ಸತ್ಯವಾದದ್ದು) ಮತ್ತು ಅಸತ್ (ಸುಳ್ಳು) ವಿಷಯಗಳಿಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ವಿಷಯಗಳಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಂಡಿರುವ ಸ್ಪಷ್ಟ ಜ್ಞಾನವಿಲ್ಲದೆ ಇದ್ದೆ. ಕ್ರೂರ ಕರ್ಮದಿಂದ (ಹಿಂದಿನ ಕರ್ಮಗಳು) ನಾನು ಯಾವುದರಲ್ಲೂ ಆಸರೆಯಾಗದೆ, ಯಾವುದೇ ಉಪಯುಕ್ತ ಜ್ಞಾನವಿಲ್ಲದೆ ಅಲೆದಾಡುತ್ತಿದ್ದೆ. ಮಳೆಯನ್ನು ಹೊರುವ ಮೋಡಗಳಂತಹ ಸುಪ್ರಸಿದ್ಧ ಕೀರ್ತಿ ಮತ್ತು ಉದಾತ್ತತೆಯನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ರಾಮಾನುಜರು ನನ್ನನ್ನು ಕ್ಷಣಮಾತ್ರದಲ್ಲಿ ಅಪ್ರತಿಮ ಜ್ಞಾನದ ವ್ಯಕ್ತಿಯನ್ನಾಗಿ ಮಾಡಿದರು. ಎಂತಹ ಪುಣ್ಯಾತ್ಮ!

ಎಂಬತ್ತಮೂರನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಕೇಳಿದರು, “ಶರಣಾಗತ ಕ್ರಿಯೆಯು ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಸಾಮಾನ್ಯವಲ್ಲವೇ?” ಅವರು ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ಗೆ ಶರಣಾದವರ ಮತ್ತು ಶ್ರೀವೈಕುಂಠಂ ತಲುಪಿದವರ ಕೂಟದಲ್ಲಿಲ್ಲ ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ ಆದರೆ ಅವರು ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ನ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳನ್ನು ತಮ್ಮ ಉದಾತ್ತತೆಯಿಂದ ಸಾಧಿಸುವ ಮುಕ್ತಿಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾರೆ ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಶೀರ್ ಕೊಣ್ಡು ಪೇರ್ ಅಱಂ ಸೆಯ್ಡು ನಲ್ ವೀಡು ಸೆಱಿದು  ಎನ್ನುಂ

ಪಾರ್ ಕೊಣ್ಡ ಮೇನ್ಮೈಯರ್ ಕೂಟ್ಟನ್ ಅಲ್ಲೇನ್ ಉನ್ ಪದಯುಗಮಾಂ

ಏರ್ ಕೊಣ್ಡ ವೀಟ್ಟೈ ಎಳಿದಿನಿಲ್ ಎಯ್ದುವನ್ ಉಣ್ಣುಡೈಯ  

ಕಾರ್ ಕೊಣ್ಡ ವಣ್ಮೈ ಇರಾಮಾನುಶ ಇದು ಕಣ್ಡು ಕೊಳ್ಳೇ

ಓ ರಾಮಾನುಜಾ! ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ಗೆ ಶರಣಾಗುವ ಪರಮ ಧರ್ಮವನ್ನು ಮಾಡಿದವರು ಮತ್ತು ಪ್ರಪಂಚದಾದ್ಯಂತ ಹರಡಿರುವವರು, ತಮ್ಮ ಆಂತರಿಕ ಮತ್ತು ಬಾಹ್ಯ ಇಂದ್ರಿಯಗಳ ಮೇಲೆ ಹಿಡಿತ ಹೊಂದಿರುವವರು, ಸ್ವಂತವಾಗಿ ಏನನ್ನೂ ಮಾಡದಿರುವ [ಅತ್ಯುನ್ನತ ಲಾಭವನ್ನು ಸಾಧಿಸಲು ]ಗುಣಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವವರ ಸಭೆಯಲ್ಲಿ ನಾನು ಇಲ್ಲ,  ಮತ್ತು ಬೇರೆ ಯಾವುದೇ ಆಶ್ರಯವನ್ನು ಹೊಂದಿಲ್ಲ, ಮತ್ತು ಯಾರು ಮೋಕ್ಷವನ್ನು ತಲುಪುತ್ತಾರೆ (ಶ್ರೀವೈಕುಂಠಂ ) ಇದು ಶರಣಾದವರಿಗೆ ಅತ್ಯಂತ ವಿಶಿಷ್ಟವಾದ ಪ್ರಯೋಜನವಾಗಿದೆ. ನಿಮ್ಮ ಎರಡು ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಲ್ಲಿ ಅತ್ಯಂತ ಶ್ರೇಷ್ಠವಾದ ಮೋಕ್ಷವನ್ನು ನಾನು ಸುಲಭವಾಗಿ ಪಡೆಯುತ್ತೇನೆ. ಅದಕ್ಕೆ ಕಾರಣ ನಿಮ್ಮಲ್ಲಿರುವ ಉದಾತ್ತತೆಯ ಗುಣ ಮತ್ತು ಅದು ಮಳೆಯನ್ನು ಹೊರುವ ಮೋಡದಂತಿದೆ. ಇದನ್ನು ನೀವೇ ನೋಡಬಹುದಿತ್ತು.

ಎಂಬತ್ತನಾಲ್ಕನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಭವಿಷ್ಯದಲ್ಲಿ ಅವನು ಸಾಧಿಸಬೇಕಾದ ಪ್ರಯೋಜನಗಳು ಇನ್ನೂ ಇದ್ದರೂ, ಅವನು ಈಗಾಗಲೇ ಸಾಧಿಸಿದ ಪ್ರಯೋಜನಗಳಿಗೆ ಮಿತಿಯಿಲ್ಲ ಎಂದು ಅವರು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಕಣ್ಡು ಕೋಣ್ಡೇನ್ ಎಮ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ತನ್ನೈ ಕಾಣ್ಡಲುಮೇ

ತೊಣ್ಡು ಕೋಣ್ಡೇನ್ ಅವನ ತೊಣ್ಡರ್ ಪೋನ್ ತಾಳಿಲ್ ಎನ್ ತೊಲ್ಲೈ ವೆಂ ನೋಯ್

ವೀಣ್ಡು ಕೋಣ್ಡೇನ್ ಅವನ ಶೀರ್ ವೆಳ್ಳ  ವಾರಿಯೈ ವಾಯ್ ಮಡುತ್ತು ಇನ್ಱು

ಉಂಡು ಕೋಣ್ಡೇನ್ ಇನ್ನಂ ಉಱ್ಱನ ಓದಿಲ್ ಉಲಪ್ಪು ಇಲ್ಲೈಯೇ

ನನ್ನನ್ನು ರಕ್ಷಿಸಲು ಬಂದ ನನ್ನ ಒಡೆಯ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ನಾನು ನೋಡಿದೆ. ಆತನನ್ನು ಕಂಡ ನಾನು ಅವನಿಗಾಗಿಯೇ ಬದುಕುವವರ ಸುಂದರ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳಿಗೆ ಸೇವಕನಾದೆ. ಅನಾದಿ ಕಾಲದಿಂದಲೂ ನನ್ನ ಬಳಿಯಿರುವ ನನ್ನ ಅತ್ಯಂತ ಕ್ರೂರ ಕರ್ಮಗಳನ್ನು (ಹಿಂದಿನ ಕರ್ಮಗಳನ್ನು) ನಾನು ತೆಗೆದುಹಾಕಿದೆ. ನಾನು ಅವನ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳ ಸಾಗರವನ್ನು ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಆನಂದಿಸಿದೆ. ಅವರಿಂದ ನಾನು ಪಡೆದ ಪ್ರಯೋಜನಗಳಿಗೆ ಕೊನೆಯಿಲ್ಲ.

ಎಂಬತ್ತೈದನೆಯ ಪಾಸುರಂ. “ನೀವು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಸಾಕ್ಷಾತ್  ನೋಡಿದ್ದೀರಿ ಎಂದು ಹೇಳಿದ್ದೀರಿ. ನೀವು ಅವರ ಅನುಯಾಯಿಗಳ ಸುಂದರ ಪಾದಗಳಲ್ಲಿ ಸೇವಕ ಎಂದು ಹೇಳಿದ್ದೀರಿ. ಈ ಎರಡರಲ್ಲಿ ನೀವು ಯಾವುದರಲ್ಲಿ ಹೆಚ್ಚು ತೊಡಗಿಸಿಕೊಂಡಿದ್ದೀರಿ? ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್‌ಗೆ ಪ್ರತ್ಯೇಕವಾಗಿ ಇರುವವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳ ಹೊರತಾಗಿ ಅವರ ಆತ್ಮಕ್ಕೆ ಯಾವುದೇ ಆಶ್ರಯವಿಲ್ಲ ಎಂದು ಅವರು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಓದಿಯ ವೇದತ್ತಿನ್ ಉಟ್ಪೊರಳಾಯ್ ಅದನ್ ಉಚ್ಚಿ ಮಿಕ್ಕ

ಸೋದಿಯೈ ನಾದನ್ ಎನ ಅಱಿಯಾದು ಉೞಲ್ಗಿನ್ಱ ತೊಣ್ಡರ್

ಪೇದಮೈ ತೀರ್ತ ಇರಾಮಾನುಶನೈ ತೊೞುಂ ಪೆರಿಯೋರ್

ಪಾದಂ ಅಲ್ಲಾಲ್ ಎಂದನ್ ಆರುಯಿರ್ಕ್ಕು ಯಾದು ಒನ್ಱುಂ ಪಱ್ಱಿಲ್ಲೆಯೇ

ತಾವು  ಕಲಿತ ವೇದಗಳ (ಪವಿತ್ರ ಗ್ರಂಥಗಳ)  ಅಥವಾ ವೇದಾಂತಂಗಳಲ್ಲಿ (ವೇದಗಳ ಕೊನೆಯ ಭಾಗಗಳು) ಉಲ್ಲೇಖಿಸಿರುವಂತೆ ಆಂತರಿಕ ಅರ್ಥ ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಅವರು ಅನಂತ ಪ್ರಕಾಶಮಾನರಾಗಿದ್ದಾರೆಂದು ತಿಳಿದಿಲ್ಲದ ಜನರಿದ್ದಾರೆ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರು ಇತರ ಪ್ರಾಪಂಚಿಕ ವಿಷಯಗಳಲ್ಲಿ ಗುಲಾಮಗಿರಿಯನ್ನು ನಡೆಸುತ್ತಿರುವ ಇಂತಹ ಜನರ ಅಜ್ಞಾನವನ್ನು ಹೋಗಲಾಡಿಸಿದರು. ಅಂತಹ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳನ್ನು ಪೂಜಿಸುವ ಮಹತ್ತರವಾದ ಗುರುತನ್ನು ಹೊಂದಿರುವವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳನ್ನು ಹೊರತುಪಡಿಸಿ ನನ್ನ ಆತ್ಮಕ್ಕೆ ಬೇರೆ ಆಶ್ರಯವಿಲ್ಲ.

ಎಂಬತ್ತಾರನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಲೌಕಿಕ ಸಾಧನೆಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿರುವವರ ಬಗ್ಗೆ ತನಗೆ ವಾತ್ಸಲ್ಯವಿತ್ತು ಎಂಬುದನ್ನು ಸ್ಮರಿಸುತ್ತಾ, ಇನ್ನು ಮುಂದೆ  ತಾನು ಹಾಗೆ ಮಾಡುವುದಿಲ್ಲ ಮತ್ತು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಧ್ಯಾನಿಸುವವರು ತನ್ನನ್ನು ಆಳಲು ಯೋಗ್ಯರು ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಪಱ್ಱಾ ಮನಿಸರೈಪ್ ಪಱ್ಱಿ ಅಪ್ಪಱ್ಱು ವಿಡಾದವರೇ

ಉಱ್ಱಾರ್ ಎನ ಉೞನ್ಱು ಓಡಿ ನೈಯೇನ್  ಇನಿ ಒಳ್ಳಿಯ ನೂಲ್

ಕಱ್ಱಾರ್ ಪರವುಂ ಇರಾಮಾನುಶನೈ ಕರುದುಂ ಉಳ್ಳಂ

ಪೆಱ್ಱಾರ್ ಯವರ್ ಅವರ್ ಎಮ್ಮೈ ನಿನ್ಱು ಆಳುಮ್ ಪೆರಿಯವರೇ

ಗೌರವವಿಲ್ಲದ ಕೆಳವರ್ಗದವರನ್ನು ಗಳಿಸಿ, ಆ ಬಾಂಧವ್ಯವನ್ನು ತೊಲಗಿಸದೆ, ಅವರೇ ನನ್ನ ಬಂಧುಗಳೆಂದು ಭಾವಿಸಿ, ಅವರ ಹಿಂದೆ ಓಡಿಹೋಗಿ ಅವರನ್ನು ಮೆಚ್ಚಿಸಲು ಪ್ರಯತ್ನಿಸುತ್ತಾ ಅವರ ವಿಷಯದಲ್ಲಿ ಮನಸೋತಿದ್ದೆ. ಅಂತಹವರಿಗೆ ನಾನು ಇನ್ನು ಮುಂದೆ ಮಣಿಯುವುದಿಲ್ಲ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಶಾಸ್ತ್ರಗಳಲ್ಲಿ ಕಲಿತವರು ತಮ್ಮ ಕಲಿಕೆಯ ಪ್ರಯೋಜನವೆಂದು ಪರಿಗಣಿಸುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರಿಂದ ಪ್ರೀತಿಯಿಂದ ಹೊಗಳುತ್ತಾರೆ. ಆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್‌ನ ಕುರಿತು ನಿರಂತರವಾಗಿ ಯೋಚಿಸುವ ಮನಸ್ಸನ್ನು ಹೊಂದಿರುವವರು ತಮ್ಮ ಜನ್ಮ ಕುಲ ಅಥವಾ ಅವರ ವಂಶಾವಳಿಯನ್ನು ಲೆಕ್ಕಿಸದೆ ಎಂದೆಂದಿಗೂ ನನ್ನನ್ನು ಆಳಲು ಅರ್ಹರು.

ಎಂಬತ್ತೇಳನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಇದು ಕಲಿಯ ಸಮಯ ಮತ್ತು ಅದು ಅವನ ದೃಢತೆಯನ್ನು ಅಲುಗಾಡಿಸುತ್ತದೆ ಎಂದು ನೆನಪಿಸಿದಾಗ, ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಒದಗಿಸಿದ ಜ್ಞಾನದಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಲ್ಲದವರ ಮೇಲೆ ಮಾತ್ರ ಕಲಿ  ಆಕ್ರಮಣ ಮಾಡುತ್ತಾನೆ ಎಂದು ಅವರು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಪೆರಿಯವರ್ ಪೇಸಿಲುಂ ಪೇದೈಯರ್ ಪೇಸಿಲುಂ ತನ್ ಗುಣನ್ಗಟ್ಕು  

ಉರಿಯ ಸೊಲ್ ಎನ್ಱುಂ ಉಡೈಯವನ್  ಎನ್ಱು ಎನ್ಱು ಉಣರ್ವಿಲ್ ಮಿಕ್ಕೋರ್ 

ತೇರಿಯುಂ ವಣ್ ಕೀರ್ತಿ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಮಱೈ ತೇರ್ನ್ದು  ಉಲಗಿಲ್

ಪುರಿಯುಂ ನಲ್ ಜ್ಞಾನಮ್ ಪೊರುಂದಾದವರೈಪ್ ಪೊರುಂ ಕಲಿಯೇ   

ತಮ್ಮ ಜ್ಞಾನ ಮತ್ತು ಸಾಮರ್ಥ್ಯದಲ್ಲಿ ಸಂಪೂರ್ಣವಾದವರು (ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಮಾತನಾಡಲು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲದ ಕಾರಣ) ರಾಮಾನುಜರನ್ನು ಮಾತನಾಡಲಾಗುವುದಿಲ್ಲ ಮತ್ತು ಅಜ್ಞಾನ ಮತ್ತು ಅಸಾಮರ್ಥ್ಯದ ಗಡಿಯಾಗಿರುವ (ಅವರು ಹಿಂದೆ ಸರಿಯಲು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲದ ಕಾರಣ) ಜ್ಞಾನವಿಲ್ಲದವರು ಮಾತನಾಡಲು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ. ಅವನ ಬಗ್ಗೆ ಮಾತನಾಡುವುದರಿಂದ). ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರು ತಮ್ಮ ಸ್ವರೂಪ (ಮೂಲ ಸ್ವಭಾವ), ರೂಪ (ರೂಪ) ಮತ್ತು ಗುಣ (ಶುಭಕರ ಗುಣಗಳು) ಗಳಿಗೆ ಸೂಕ್ತವಾದ ಪದಗಳನ್ನು ಮಾತನಾಡಬಲ್ಲವರು ಎಂದು ಮಹಾನ್ ಜ್ಞಾನಿಗಳಿಂದ ಪ್ರಶಂಸಿಸಲ್ಪಟ್ಟ ಖ್ಯಾತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ. ರಾಮಾನುಜರು ವೇದಾಧ್ಯಯನದಿಂದ ಪಡೆದ ಮಹಾನ್ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ಉಪದೇಶಿಸಿದ ಜನರ ಭಾಗವಲ್ಲದವರನ್ನು ಮಾತ್ರ ಕಲಿಯು  ಹಿಂಸಿಸುತ್ತಾನೆ.

ಎಂಭತ್ತೆಂಟನೇ ಪಾಸುರಂ. ಹುಲಿಗಳಂತಿರುವ ಕುದ್ರುಷ್ಟಿಗಳನ್ನು (ವೇದಗಳನ್ನು ತಪ್ಪಾಗಿ ಅರ್ಥೈಸುವವರು) ನಾಶಮಾಡಲು ಸಿಂಹದಂತಿರುವ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಈ ಪ್ರಪಂಚದಲ್ಲಿ ಅವತರಿಸಿದ ರೀತಿಯನ್ನು ಹೊಗಳುವುದಾಗಿ ಹೇಳುತ್ತಾನೆ.

ಕಲಿ ಮಿಕ್ಕ ಸೆನ್ನೆಲ್ ಕೞನಿಕ್ ಕುಱೈಯಲ್ ಕಲೈಪ್ ಪೆರುಮಾನ್

ಒಲಿ ಮಿಕ್ಕ ಪಾಡಲೈ ಉಂಡು ತನ್ ಉಳ್ಳಂ ತಡಿತ್ತು ಅದನಾಲ್

ವಲಿ ಮಿಕ್ಕ ಸೀಯಮ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಮಱೈ ವಾದಿಯರಾಮ್

ಪುಲಿ  ಮಿಕ್ಕದು ಎನ್ಱು ಇಪ್ ಪುವನತ್ತಿಲ್ ವಂದಮೈ ಪೋಱ್ಱುವನೇ

ತಿರುಮಂಗೈ ಆಳ್ವಾರರು ತಿರುಕ್ಕುರೈಯಲೂರಿನ ಮುಖ್ಯಸ್ಥರಾಗಿದ್ದು, ಅದರಲ್ಲಿ ಹೇರಳವಾಗಿ ಕೆಂಪಾದ ಭತ್ತವನ್ನು ಕೃಷಿ ಕಾರ್ಯಗಳ ಸಡಗರದಿಂದ ಬೆಳೆಯಲಾಗಿದ್ದು  ಮತ್ತು ಶಾಸ್ತ್ರಗಳ ಅರ್ಥಗಳನ್ನು ಪ್ರತಿಬಿಂಬಿಸುವ ದೈವಿಕ ಪ್ರಬಂಧಗಳನ್ನು (ಸ್ತೋತ್ರಗಳು) ರಚಿಸುವ ಹಿರಿಮೆಯನ್ನು ಹೊಂದಿದೆ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರು ತಿರುಮಂಗೈ ಆಳ್ವಾರರ ತಿರುಮೊಳಿಯನ್ನು (ದೈವಿಕ ಶ್ಲೋಕಗಳು) ಸಂಗೀತದ ಸ್ವರಗಳೊಂದಿಗೆ ಆನಂದಿಸಿದರು ಮತ್ತು ಅವರ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸನ್ನು [ಹೆಮ್ಮೆಯಿಂದ] ಉಬ್ಬಿಸಿಕೊಂಡ ಪ್ರಬಲ ಸಿಂಹವಾಗಿದ್ದರು. ಹುಲಿಗಳಂತಿರುವ ಮತ್ತು ಜಗತ್ತನ್ನು ನಾಶಮಾಡುವ ವೇದಗಳ ತಪ್ಪಾದ ವ್ಯಾಖ್ಯಾನವನ್ನು ನೀಡಿದ ಬಹುಸಂಖ್ಯೆಯ ಕುದ್ರುಷ್ಟಿಗಳನ್ನು ಶಿಕ್ಷಿಸಲು ಅವನು ಈ ಭೂಮಿಯಲ್ಲಿ ಅವತರಿಸಿದ ರೀತಿಯನ್ನು ನಾನು ಪ್ರಶಂಸಿಸುತ್ತೇನೆ.    

ಎಂಬತ್ತೊಂಬತ್ತನೇ ಪಾಸುರಂ. ಅವರು ಹಿಂದಿನ ಪಾಸುರಂನಲ್ಲಿ [ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್] ಅನ್ನು ಸ್ತುತಿಸುವುದಾಗಿ ಹೇಳಿದರು. ಅವರು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಹೊಗಳುವುದಕ್ಕೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದಂತೆ ಅವರ ಭಯದ ಬಗ್ಗೆ ತಿಳಿಸುತ್ತಾರೆ.

ಪೋಱ್ಱು ಅರುಮ್ ಶೀಲತ್ತು ಇರಾಮಾನುಸ ನಿನ್ ಪುಗೞ್ ತೆರಿಂದು

ಸಾಱ್ಱುವನೇಲ್ ಅದು ತಾೞ್ವು ಅದು ತೀರಿಲ್ ಉನ್ ಶೀರ್ ತನಕ್ಕು ಓರ್

ಏಱ್ಱಂ ಎನ್ಱೇ ಕೊಣ್ಡು ಇರುಕ್ಕಿಲುಮ್ ಎನ್ ಮನಂ ಏತ್ತಿ ಅನ್ಱಿ

ಆಱ್ಱಗಿಲ್ಲಾದು ಇದಱ್ಕೆನ್ ನಿನೈವಾಯ್ ಎನ್ಱಿಟ್ಟಂಜುವನೇ

ಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಸ್ತುತಿಸಲಾಗದ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಗುಣಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ರಾಮಾನುಜಾ! ನಿಮ್ಮ ಶುಭ ಗುಣಗಳನ್ನು ಗ್ರಹಿಸಿದ ನಂತರ ನಾನು ಅದರ ಬಗ್ಗೆ ಮಾತನಾಡಲು ಪ್ರಯತ್ನಿಸಿದರೆ, ಅದು ನಿಮಗೆ ಅವಮಾನವಾಗಿ ಪರಿಣಮಿಸುತ್ತದೆ. ನಿನ್ನ ಗುಣಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಮಾತನಾಡುವುದನ್ನು ಬಿಟ್ಟರೆ ಮಾತ್ರ ಅವು ಶ್ರೇಷ್ಠತೆಯನ್ನು ಹೊಂದುತ್ತವೆ ಎಂದು ನನಗೆ ತಿಳಿದಿದ್ದರೂ, ನಿನ್ನ ದೈವಿಕ ಗುಣಗಳನ್ನು ಹೊಗಳದೆ ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು ತನ್ನನ್ನು ತಾನೇ ಉಳಿಸಿಕೊಳ್ಳಲು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ. ನೀವು ಇದನ್ನು ಹೇಗೆ ಪರಿಗಣಿಸುತ್ತೀರಿ ಎಂದು ನನಗೆ ಭಯವಾಗಿದೆ.

ತೊಂಬತ್ತನೇ ಪಾಸುರಂ. ಅವನ ಭಯವನ್ನು ಹೋಗಲಾಡಿಸುವ ಸಲುವಾಗಿ, ರಾಮಾನುಜರು ಕರುಣಾಜನಕ ಕಣ್ಣುಗಳಿಂದ ಅವನನ್ನು ನೋಡಿದರು. ಹೀಗೆ ತನ್ನ ಭಯವನ್ನು ಹೋಗಲಾಡಿಸಿ, ಉತ್ತಮ ಜ್ಞಾನವುಳ್ಳವರು ತಮ್ಮ ಮನಸ್ಸು, ವಾಕ್ ಮತ್ತು ದೇಹ ಎಂಬ ಮೂರರಲ್ಲಿ ಒಂದಾದ ರಾಮಾನುಜರನ್ನು ಸ್ತುತಿಸಿ ತಮ್ಮನ್ನು ತಾವು ಉನ್ನತಿಗೊಳಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಿಲ್ಲವೆಂದು ಮತ್ತು ಜನ್ಮಾಂತರಗಳ ದುಃಖದ ಚಕ್ರದಲ್ಲಿ ಸಿಲುಕಿದ್ದಾರೆ ಎಂದು  ಪಶ್ಚಾತ್ತಾಪ ಪಡುತ್ತಾರೆ .

ನಿನೈಯಾರ ಪಿಱವಿಯೈ ನೀಕ್ಕುಂ ಪಿರಾನೈ ಇನ್ನೀಳ್ ನಿಲತ್ತೇ

ಎನೈ ಆಳವಂದ ಇರಾಮಾನುಶನೈ ಇರುಂಗವಿಗಳ್

ಪುನೈಯಾರ್  ಪುನೈಯುಂ ಪೆರಿಯವರ್ ತಾಳ್ಗಳಿಲ್ ಪೂನ್ದೊಡೈಯಲ್

ವನೈಯಾರ್ ಪಿಱಪ್ಪಿಲ್ ವರುಂದುವರ್  ಮಾಂದರ್ ಮರುಳ್ ಸುರಂದೇ

ರಾಮಾನುಜರನ್ನು ಕುರಿತು ಯೋಚಿಸುವವರ ಜನ್ಮ ಚಕ್ರವನ್ನು ಹೋಗಲಾಡಿಸುವವರು ಯಾರೂ ಇಲ್ಲ. ವಿಸ್ತಾರವಾದ ಭೂಮಿಯು ಅವನಿಗಾಗಿ ಇದ್ದಾಗ ನಾನಿದ್ದ ಜಾಗಕ್ಕೆ ನನ್ನನ್ನು ಹುಡುಕಿಕೊಂಡು ಬಂದ ಆ ರಾಮಾನುಜರ ಮಹಾನ್ ಗುಣಗಳ ಮೇಲೆ ಕವಿತೆ ಕಟ್ಟಲು ಯಾರಿಂದಲೂ ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ. ಅಂತಹ ಶ್ಲೋಕಗಳ ಮಾಲೆಯನ್ನು ಕಟ್ಟುವವರು ಯಾರೂ ಇಲ್ಲದಿದ್ದರೂ, ರಾಮಾನುಜರ ಗುಣಗಳ ಮೇಲೆ ಶ್ಲೋಕಗಳ ಮಾಲೆಗಳನ್ನು ಕಟ್ಟುವ ಆ ಮಹಾಪುರುಷರ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳಿಗೆ ಮಾಲೆಯನ್ನು ಸಲ್ಲಿಸುವವರು ಯಾರೂ ಇಲ್ಲ. ಮನುಷ್ಯರಾಗಿ ಹುಟ್ಟಿ ಇವುಗಳನ್ನು ಮಾಡಲು ಬಲ್ಲದವರು ತಮ್ಮ ಅಜ್ಞಾನದಿಂದ ಜನ್ಮಾಂತರಗಳ ಚಕ್ರದಲ್ಲಿ ಮುಳುಗಿರುತ್ತಾರೆ.   

ಅನುವಾದ : ಅಡಿಯೇನ್ ರಂಗನಾಯಕಿ ರಾಮಾನುಜ ದಾಸಿ

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