Category Archives: hindi

रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 51 से 60

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 41 से 50 

पाशूर ५१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी का इस संसार में अवतार लेने का एक मात्र उद्देश उन्हें (श्रीरंगामृत स्वामीजी) श्रीरामानुज स्वामीजी का दास बनाना हैं।

अडियैत् तोडर्न्दु एळुम् ऐवर्गट्काय् अन्ऱु बारतप् पोर्
मुडियप् परि नेडुम् तेर् विडुम् कोनै मुळुदुणर्न्द
अडियर्क्कु अमुदम् इरामानुसन् एन्नै आळ वन्दु इप्
पडियिल् पिऱन्ददु मऱ्ऱिल्लै कारणम् पार्त्तिडिले

पूर्वकाल में अपने पादारविन्दों का आश्रयण कर धन्य बनने वाले पंचपांडवों के लिए (अर्जुन का सारथी बनकर) घोड़े जुड़ा हुआ बडा रथ हांक कर दुर्योधनादियों का संहार करनेवाले, भगवान को (अर्थात् भगवान के स्वरूप रूप गुण विभूति इत्यादियों, अथवा सौशिल्य आश्रित पारतंत्र्य इत्यादि शुभगुणों को) पूर्णरूप से समझनेवाले भक्तों के अमृतवत् परमभोग्य रहनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझ पर अनुग्रह करने के लिए ही इस भूतल पर अवतार लिया; विचार करने पर दूसरा कोई कारण नहीं दिखता।

पाशूर ५२: जब पूछा गया कि क्या श्रीरामानुज स्वामीजी में उन्हें नियंत्रण करने में क्षमता हैं तब वें श्रीरामानुज स्वामीजी के अनगिनत क्षमताओं को समझाते हैं।

पार्त्तान् अऱु समयन्गळ् पदैप्प इप्पार् मुळुदुम्
पोर्त्तान् पुगळ्कोण्डु पुन्मैयिनेन् इडैत् तान् पुगुन्दु
तीर्त्तान् इरु विनै तीर्त्तु अरन्गन् सेय्य ताळ् इणैयोडु
आर्त्तण् इवै एम् इरामानुसन् सेय्युम् अऱ्पुदमे

हमारे गुरु श्री रामानुज स्वामीजी के ये सभी अद्भुत चेष्टित हैं कि उन्होंने अपनी दृष्टि डालने मात्र से (दुष्ट) षड्दर्शनों को शिथिल बना दिया; अपने यश से समग्र भूमंडल ढांक दिया; अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ नीच के हृदय में प्रवेश कर मेरे प्रबल पाप मिटा दिये; और मिटाने के बाद मेरे सिर को श्रीरंगनाथ भगवान के सुंदर पादारविन्दों के साथ मिला दिया ।

पाशूर ५३:  जब पूछा गया कि अन्य तत्वों का नाश कर श्रीरामानुज स्वामीजी ने क्या स्थापित किया तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने कहा कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने महान सत्य को स्थापित किया कि सभी चेतन और अचेतन भगवान पर हीं निर्भर हैं।  

अऱ्पुदन् सेम्मै इरामानुसन् एन्नै आळ वन्द
कऱ्पगम् कऱ्ऱवर् कामुऱु सीलन् करुदरिय
पऱ्पल्लुयिर्गळुम् पल्लुलगु यावुम् परनदु एन्नुम्
नऱ्पोरुळ् तन्नै इन्नानिलत्ते वन्दु नाट्टिनने

श्रीरामानुज स्वामीजी अपने शरण में मुझे लेने के लिये अवतार लिए , वें बहुत उदार हैं, उनमें बहुत साधारण गुण हैं जो ज्ञानियों को अभिलषित हैं, |उनके अद्भुत कार्य, उनमें सच्चाई हैं  अपने शिष्यों के लिये स्वयं को उचित बताने के लिये। मेरे उज्जीवन के लिए ही अवतीर्ण, परमोदार, ज्ञानियों के वांछनीयशीलगुणवाले, अत्याश्चर्य मय दिव्य चेष्टितवाले और आर्जव (सीधापन) गुणवाले श्री रामानुज स्वामीजी ने इस भूतल पर अवतार लेकर इस महार्थ की स्थापना की कि ये असंख्य आत्मवर्ग और (इनके निवासस्थान) ये सभी लोक भगवान की मिल्कियत हैं। (इससे अद्वैत मत का निरास सूचित किया जाता है।)

पाशूर ५४:  श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के श्रेष्ठता को स्थापित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप आगे श्रीरंगामृत स्वामीजी भाह्य तत्त्वों, वेदों और श्रीसहस्त्रगीति के स्थान को बताते हैं।

नाट्टिय नीसच् चमयन्गळ् माण्डन नारणनैक्
काट्टिय वेदम् कळिप्पुऱ्ऱदु तेन् कुरुगै वळ्ळल्
वाट्टमिला वण्डमिज़्ह् मऱै वाळ्न्ददु मण्णुलगिल्
ईट्टिय सीलत्तु इरामानुसन् तन् इयल्वु कण्डे

श्रीरामानुज स्वामीजी के स्वभाव को देखते हुए जो इस संसार में अपने गुणों को और  आगे बढ़ाते हैं, भाह्य अधम तत्त्व, जो अधम जनों द्वारा उनके स्वयं के परिश्रम से स्थापित किया गया हैं, ऐसे देह को त्याग दिया जैसे अंधेरा सूर्य के उगम से लुप्त हो जाता हैं। श्रीमन्नारायण का प्रतिपादन करनेवाले वेद आनंदित हुए; और सुंदर कुरुकापुरी में अवतीर्ण परमोदार श्रीशठकोपसूरी से अनुगृहीत, दोषरहित, द्राविड़वेद संजीवित हुआ । श्री रामानुज स्वामीजी ने श्रेष्ठ प्रमाण व युक्तियों के आधार से संस्कृत व द्राविड वेदों के सदर्थों का वर्णन किया; इससे उन वेदोंका दुःख दूर हुआ और दूसरे कुमत नष्ट हो गये ।

 पाशूर ५५:  वेदों को लाभ देनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के गुणोंको  स्मरण कराते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, वह कुल जो श्रीरामानुज स्वामीजी के उदारता में निरत हैं और उनके शरण हुए हैं, वें उन पर शासन करना उचित हैं।

कण्डवर् सिन्दै कवरुम् कडि पोळिल् तेन्नरन्गन्
तोण्डर् कुलावुम् इरामानुसनै तोगै इऱन्द
पण् तरु वेदन्गळ् पार् मेल् निलविडप् पार्त्तरुळुम्
कोण्डलै मेवित् तोळुम् कुडियाम् एन्गळ् कोक्कुडिये

स्वरप्रधान अनंत वेदों को इस धरातल पर सुप्रतिष्ठित कराने वाले, परमोदार और सर्वजनमनोहर सुगंधि उपवनों से परिवृत एवं दक्षिणदिशा के अलंकारभूत श्रीरंगम दिव्यधाम के स्वामी श्रीरंगनाथ भगवान के परमभक्तों की प्रशंसा के पात्र श्री रामानुज स्वामीजी का सादर आश्रयण करनेवालों का कुल ही हमारे प्रणाम करने योग्य महात्माओं का कुल है। अर्थात् श्रीरामानुजभक्तों का कुल ही सत्कुल कहलाता है और उस कुलमें अवतीर्ण महात्माओं को हम अपने स्वामी मानते हैं।

पाशूर ५६:  जब श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह स्मरण कराया गया कि वों यही वे सांसारिक विषयोंमें कहते थे, तब श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, श्रीरामानुज स्वामीजी के शरण होने के पश्चात उनके शब्द और मन और किसी को पहचान नहीं सकते हैं।

 कोक्कुल मन्नरै मूवेळुगाल् ओरु कूर् मळुवाल्
पोक्किय द्Eवनैप् पोऱ्ऱुम् पुनिदन् बुवनमेन्गुम्
आक्किय कीर्त्ति इरामानुसनै अडैन्दपिन् एन्
वाक्कुरैयादु एन् मनम् निनैयादु इनि मऱ्ऱोन्ऱैये

क्षत्रियकुलोत्पन्न दुष्टराजाओं का तीक्ष्णकुठार से इक्कीस वार विनाश करनेवाले परशुराम भगवान की स्तुति करनेवाले, परमपवित्र एवं भूतलव्यापी यशवाले श्री रामानुजस्वामीजी का आश्रय लेनेपर, अब से मेरी वाणी दूसरे किसीका नाम नहीं लेगी; मेरा मन चिंतन नहीं करेगा। आचार्यों का सिद्धांत है कि परशुराम हमें उपासना करने योग्य नहीं; क्योंकि वह तो दुष्टक्षत्रिय निरासरूप विशेष कार्य सिद्धि के लिए अहंकारयुत किसी जीव में भगवान की शक्ति का आवेशमात्र है। अत एव उसे आवेशावतार कहते हैं; नतु श्रीरामकृष्णादिवत् पूर्णावतार। प्रकृतगाथा में इतना ही कहा गया है कि श्री रामानुजस्वामीजी उनकी स्तुति करते हैं, नतु उपासना। विरोधिनिरासरूप महोपकार का स्मरण करते हुए उनकी स्तुति करने में कोई आपत्ति नहीं हैं; क्योंकि यह उपासना नहीं हो सकती।

पाशूर ५७:  श्रीरंगामृत स्वामीजी से पूछा गया कि “आप कैसे कह सकते हैं कि आपके शब्द गुण नहीं गायेंगे और आपका मन किसी के बारें सोचेगा नहीं क्योंकि यह संसार हैं?” वें कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी को प्राप्त करने के पश्चात उनमे कोई नादानी नहीं हैं कुछ प्राप्त करने कि, सही और गलत में भेद करने की।  

 मऱ्ऱु ओरु पेऱु मदियादु अरन्गन् मलर् अडिक्कु आळ्
उऱ्ऱवरे तनक्कु उऱ्ऱवराय्क् कोळ्ळुम् उत्तमनै
नल् तवर् पोऱ्ऱुम् इरामानुसनै इन् नानिलत्ते
पेऱ्ऱनन् पेऱ्ऱपिन् मऱ्ऱु अऱियेन् ओरु पेदमैये

प्रयोजनान्तरों से विमुख होकर, श्रीरंगनाथ भगवान के पादारविन्दों में प्रवण महात्माओं को ही अपने आत्मबन्धु मानने वाले, अत्युत्तम कल्याण गुणवाले, और महातपस्वियों से संस्तुत श्रीरामानुजस्वामीजी को मैंने इस भूतल पर ही पाया; ऐसे पाने के बाद मैं विषयान्तर की इच्छा इत्यादि के हेतु किसी प्रकार का अज्ञान नहीं पाऊंगा।

 पाशूर ५८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्न होते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने ऐसे जनों के तत्त्वों को नष्ट किया जिन्होने वेदों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया हैं।

पेदैयर् वेदप् पोरुळ् इदु एन्ऱु उन्नि पिरमम् नन्ऱु एन्ऱु
ओदि मऱ्ऱु एल्ला उयिरुम् अह्दु एन्ऱु उयिर्गळ् मेय् विट्टु
आदिप् परनोडु ओन्ऱु आम् एन्ऱु सोल्लुम् अव्वल्लल् एल्लाम्
वादिल् वेन्ऱान् एम् इरामानुसन् मेय्म् मदिक् कडले

कितने अविवेकी जन यों कहते थे कि, ” ब्रह्म एक ही सत्य है; दूसरे सभी जीव उससे अभिन्न हैं, और शरीर छूटने के बाद ब्रह्म के साथ उनका ऐक्य पाना ही मोक्ष है; यही सकल वेदों का तात्पर्य है।” यथार्थज्ञाननिधि हमारे आचार्य श्रीरामानुजस्वामीजी ने इन सभी कोलाहलों को वाद में जीत लिया।

पाशूर ५९:  उनमें प्रसन्नता देखकर कुछ लोगों नें कहा कि आत्मा को शास्त्र के जरिये जाना जा सकता हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं श्रेष्ठ हैं। वें उत्तर देते हैं कि अगर श्रीरामानुज स्वामीजी कलियुग का अज्ञानता को नष्ट नहीं करते तो किसी को भी यह ज्ञान नहीं प्राप्त होता कि आत्मा के भगवान श्रीमन्नारायण हैं।

कडल् अळवाय तिसै एट्टिनुळ्ळुम् कलि इरुळे
मिडै तरु कालत्तु इरामानुसन् मिक्क नान्मऱैयिन्
सुडर् ओळियाल् अव्विरुळैत् तुरन्दिलनेल् उयिरै
उडैयवन् नारणन् एन्ऱु अऱीवार् इल्लै उऱ्ऱु उणर्न्दे

चतुस्सागर्पर्यंत आठों दिशाओं में जब कलि-अंधकार ही व्याप्त हुआ था, तब श्रीरामानुज स्वामीजी ने अवतार लेकर,चारों वेदों के उज्वल ज्योति से उस अंधकार को यदि नहीं मिटा दिया होता, तो कोई भी मानव यह अर्थ नहीं समझ सकता कि श्रीमन्नारायण समस्त जीवों के प्रभु हैं।

 पाशूर ६०: जब उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्ति के विषय में पूछा गया तो उन्होंने इसमे समझाया।

उणर्न्द मेइग्यानिअर् योगम् तोऱुम् तिरुवाइमोळियिन्
मणम् तरुम् इन्निसै मन्नुम् इडम् तोऱुम् मामलराळ्
पुणर्न्द पोन् मार्बन् पोरुन्दुम् पदि तोऱुम् पुक्कु निऱ्कुम्
गुणम् तिगळ् कोण्डल् इरामानुसन् एम् कुलक् कोळुन्दे

आत्मगुणों से परिपूर्ण व उज्वल, कालमेघ के समान परमोदार, हमारे कुलकूटस्थ श्रीरामानुज स्वामीजी तत्वज्ञानियों की प्रत्येक गोष्ठी में, सहस्रगीति (प्रभुति दिव्यप्रबंधों) की दिव्य सूक्ति की सुगंध से वासित प्रत्येक स्थल में एवं लक्ष्मीजी से आलिंगित श्रीवक्षवाले भगवान के एकैक दिव्यदेशमें विराजते हैं।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-51-60-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 41 से 50

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 31 से 40 

पाशूर ४१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं इस संसार को  जिसे भगवान नहीं सुधार सके, उसे श्रीरामानुज स्वामीजी के अवतार ने सुधार दिया। 

मण्मिसै योनिगळ् तोऱुम् पिऱन्दु एन्गळ् मादवने
कण् उऱ निऱ्किलुम् काणगिल्ला उलगोर्गळ् एल्लाम्
अण्णल् इरामानुसन् वन्दु तोन्ऱिय अप्पोळुदे
नण्णरुम् ग्यानम् तलैक्कोण्डु नारणऱ्कु आयिनरे

हमारे स्वामी लक्ष्मीपति श्रीमन्नारायण ही इस भूतल पर अलग अलग रूपों में  अवतार लेकर सबके नयनगोचर होकर विराजमान हुए थे। तो भी इस भूमंडलनिवासी लोग उनको अपने नाथ नहीं समझ सके। ऐसे रहनेवाले ये लोग, सर्वस्वामी श्रीरामानुज स्वामीजी के यहां पर अवतार लेने के बाद ही दुर्लभ ज्ञान प्राप्त कर श्रीमन्नारायण के शेष बन गये।

पाशूर ४२: श्रीरंगामृत स्वामीजी आनंदित है यह कहकर कि श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रेष्ठ कृपा से उनकी रक्षा किये जब वें सांसारिक कार्यों में निरत थे। 

आयिळियार् कोन्गै तन्गुम् अक्कादल् अळऱ्ऱु अळुन्दि
मायुम् एन् आवियै वन्दु एडुत्तान् इन्ऱु मामलराळ्
नायगन् एल्ला उयिर्गट्कुम् नादन् अरन्गन् एन्नुम्
तूयवन् तीदु इल् इरामानुसन् तोल् अरुळ् सुरन्दे

‘लक्ष्मीपति श्रीरंगनाथ भगवान ही सब के स्वामी हैं,’  यह उपदेश सबको देनेवाले, परमपवित्र और  सकलविध दोषरहित  श्री रामानुज स्वामीजी ने अपनी निर्हेतुक कृपासे, सुंदर आभूषण पहनने वाली स्त्रियों के स्तनों पर की जानेवाली आशारूपी कीचड़ में पड़कर विनाश पानेवाली मेरी आत्मा का, उद्धार किया ।

पाशूर ४३: जिस प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें अपने छत्र में लिया, उससे बहुत खुश होकर और इस संसार के लोगों को देखकर वें उन्हें कहते हैं कि, श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का संकीर्तन करें और उन्हें इसका पूर्ण लाभ प्राप्त होगा । 

सुरक्कुम् तिरुवुम् उणर्वुम् सोलप्पुगिल् वाय् अमुदम्
परक्कुम् इरु विनै पऱ्ऱु अऱ ओडुम् पडियिल् उळ्ळीर्
उरैक्किन्ऱनन् उमक्कु यान् अऱम् सीऱुम् उऱु कलैयैत्
तुरक्कुम् पेरुमै इरामानुसन् एन्ऱु सोल्लुमिने

हे भूतल निवासी जनों! मैं तुमसे एक हित बचन कहूंगा; सुनो। धर्ममार्ग पर नाराज होनेवाले प्रबल कलिपुरुष का ध्वंस करने वाले श्रीरामानुज स्वामीजी के शुभ नामों का संकीर्तन करो। उससे भक्तिसंपत् और ज्ञान बढ़ेंगे; नामसंकीर्तन करने के प्रारंभ में ही जीभ में अमृतरस बहेगा और महापाप समूल नष्ट हो जायेंगे।

पाशूर ४४: यह देखते हुए श्रीरामानुज स्वामीजी के महानता का दिशा निर्देश देते हुए उनसे सम्बंधीत विषयों में निरत नहीं हैं, उनके इस स्वभाव को देखकर उन्हें दुख हुआ। 

सोल् आर् तमिळ् ओरु मून्ऱुम् सुरुदिगळ् नान्गुम् एल्लै
इल्ला अऱनेऱि यावुम् तेरिन्दवन् एण्णरुम् सीर्
नल्लार् परवुम् इरामानुसन् तिरुनामम् नम्बिक्
कल्लार् अगल् इडत्तोर् एदु पेऱु एन्ऱु कामिप्परे

समस्त सज्जनों से संस्तुत श्रीरामानुज स्वामीजी तीन प्रकार के द्राविड़शास्त्रों (गद्य,पद्य व नाटक), चार वेदों (ऋग, यजुर, साम, अथर्व) और अपरिमित धर्मशास्त्रों के वेत्ता हैं। संसारी लोग तो (ऐसे सकल शास्त्रवेत्ता एवं) असंख्येय कल्याण गुण विभूषित इनके नामसंकीर्तन नहीं करते; और (यह अर्थ भी नहीं जानते हुए कि यह नामसंकीर्तन ही परम पुरुषार्थ है) यों चिंता करते करते दुःख पाते हैं कि हमारे योग्य पुरुषार्थ कौनसा है। 

पाशूर ४५: यह स्मरण करना कि कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीरंगामृत स्वामीजी को अकारण हीं सही किया जब वें इस संसार के लोगों जैसे थे  जो श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति अनिच्छुक थे। वें कहते हैं कि वों यह कह नहीं सकते कि कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन पर कृपा कर लाभ दिया हैं। 

पेऱु ओन्ऱु मऱ्ऱु इल्लै निन् चरण् इन्ऱि अप्पेऱु अळित्तऱ्कु
आऱु ओन्ऱुम् इल्लै मऱ्ऱु अच्चरण् अन्ऱि एन्ऱु इप्पोरुळैत्
तेऱुम् अवर्क्कुम् एनक्कुम् उनैत् तन्द सेम्मै सोल्लाल्
कूऱुम् परम् अन्ऱु इरामानुस मेय्म्मै कूऱिडिले

हे रामानुज स्वामिन्। सत्य कहूंगा। आपके चरणारविन्दों के सिवा दूसरी कोई प्राप्य वस्तु नहीं होगी; और उसका साधन भी आपके वे ही श्रीचरण हैं। यह तत्वार्थ ठीक जाननेवाले महात्मालोगों, और इस निश्चय से विरहित मुझको एकसम ही आपने जो अपनी कृपा का पात्र बना दिया, यह आपका आर्जवगुण वाचामगोचर वैभववाला है। 

पाशूर ४६: श्रीरंगामृत स्वामीजी पर श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा लाभ पहुँचाने को 
स्मरण करते  उनके गुणों को गाते हुए, वें श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों कि पूजा करते हैं। 

कूऱुम् समयन्गळ् आरुम् कुलैय कुवलयत्ते
माऱन् पणित्त मऱै उणर्न्दोनै मदियिलेन्
तेऱुम्पडि एन् मनम् पुगुन्दानै तिसै अनैत्तुम्
एऱुम् गुणनै इरामानुसनै इऱैन्जिनमे

श्रीशठकोप स्वामीजी ,इस संसार पर कृपा कर श्रीसहस्त्रगीति को दिया हैं जो  द्राविड वेदम के नाम से सुप्रसिद्ध हैं और ६ बाह्य धर्मों  को पूर्णत: नष्ट कर दिया। श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने यह श्रीसहस्त्रगीति को पढ़ा और यह जाना कि यह पूर्णत: मेरे हृदय कृपा कर प्रवेश किया ताकि मैं जिसे इसके बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं हैं स्पष्टता प्राप्त कर सकू। हम ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी के नत मस्तक होते हैं जिनके पास ऐसे दिव्य गुण हैं जो सभी दिशा में फैल  रही हैं। 

पाशूर ४७: श्रीरामानुज स्वामीजी सभी को भगवान के प्रति रुचि उत्तपन्न करते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा प्रदान किए गए लाभ को स्मरण करते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि उनके समान (बरा बर) कोई नहीं हैं। 

इऱैन्जप्पडुम् परन् ईसन् अरन्गन् एन्ऱु इव्वुलगत्तु
अऱम् सेप्पुम् अण्णल् इरामानुसन् एन् अरुविनैयिन्
तिऱम् सेऱ्ऱु इरवुम् पगलुम् विडादु एन्दन् सिन्दैयुळ्ळे
निऱैन्दु ओप्पु अऱ इरुन्दान् एनक्कु आरुम् निगर् इल्लैये

इस भूमंडल पर इस साक्षात् परमधर्म, “सब के प्रणम्य परदेवता साक्षात् श्रीरंगनाथ भगवान ही हैं” का उपदेश करनेवाले सर्वस्वामी श्री रामानुजस्वामीजी मेरा प्रबल पापसमूह मिटा कर, मेरे हृदय में ही ऐसे दिनरात अविच्छिन्न विराजमान हैं कि मानों आप और कहीं रहते ही नहीं। अतः दूसरा कोई मेरे सदृश (भाग्यवान) नहीं है। 

पाशूर ४८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी के शब्दों को सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी कहते हैं कि उनकी खुशी उनके साथ नहीं रहेगी अगर श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को या इसके विपरीत हो जाये। इसको बताते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि उनका आश्रय की  दीनता श्रीरामानुज स्वामीजी की  कृपा हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा का लक्ष्य उनको शरण देने का उनकी दीनता है। दोनों को अलग करने का कोई कारण हीं नहीं हैं। 

निगर् इन्ऱि निन्ऱ एन् नीसदैक्कु निन् अरुळिन् कण् अन्ऱिप्
पुगल् ओन्ऱुम् इल्लै अरुट्कुम् अह्दे पुगल् पुन्मैयिलोर्
पगरुम् पेरुमाइ इरामानुस इनि नाम् पळुदे
अगलुम् पोरुळ् एन् पयन् इरुवोमुक्कुम् आन पिन्ने

हे महात्माओं की स्तुती पाने योग्य वैभववाले श्री रामानुज स्वामिन् ! मेरी असदृश नीचता की शरण, आपकी कृपा के सिवा दूसरी कोई नहीं होगी; और आपकी उस कृपा की भी मेरी नीचता ही शरण है। इस प्रकार, जब यह अर्थ सिद्ध हुआ कि आपसे मेरा लाभ, और मेरे से आपका लाभ है, फिर, अब से हम दोनों क्यों  व्यर्थ ही एक दूसरे को छोडेंगे ? 

पाशूर ४९: श्रीरामानुज स्वामीजी के अवतार के पश्चात जो आधिक्य प्राप्त हुआ उसे स्मरण कर वें खुश हुए। 

आनदु सेम्मै अऱनेऱि पोय्म्मै अऱु समयम्
पोनदु पोन्ऱि इऱन्ददु वेम् कलि पून्गमलत्
तेन् नदि पाय् वयल् तेन् अरन्गन् कळल् सेन्नि वैत्तुत्
तान् अदिल् मन्नुम् इरामानुसन् इत् तलत्तु उदित्ते

कमलपुष्पों से बहनेवाले मधु के प्रवाह से परिपूर्ण खेतों से परिवृत श्रीरंगक्षेत्र के स्वामी श्रीरंगनाथ भगवान के श्रीचरणों को अपने सिर पर धारण करते हुए, उन पर ही भक्ति करनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी के इस धरातल पर अवतरित होने से, सीधा धर्ममार्ग प्रतिष्ठित हुआ; असत्यार्थ का वर्णन करनेवाले ६ मत नष्ट हो गये और क्रूर कलियुगने भी विनाश पाया।

पाशूर ५०: श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरणों के प्रति गहरा प्रेम देखकर आनंदित होते हैं। 

उदिप्पन उत्तमर् सिन्दैयुळ् ओन्नलर् नेन्जम् अन्जिक्
कोदित्तिड माऱि नडप्पन कोळ्ळै वन् कुऱ्ऱम् एल्लाम्
पदित्त एन् पुन् कविप् पा इनम् पूण्डन पावु तोल् सीर्
एदित् तलै नादन् इरामानुसन् तन् इणै अडिये

सारे भूतल पर विस्तृत यशवाले यतिराज श्री रामानुज स्वामीजी के उभय श्रीपाद उत्तम पुरुषों के हृदयों में चमकते हैं, प्रतिपक्षियों के लिए भयंकर संचार करते हैं; और अपार व असह्य दोषों से परिपूर्ण मेरी इस स्तोत्ररूपी क्षुद्र कविता को स्वीकार करते हैं ।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-41-50-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 31 से 40

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 21 से 30 

पाशूर ३१: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय को आनन्द से कहते हैं कि वों जो अन्गिनत  जन्मों से कष्ट भोग रहे हैं श्रीरामानुज स्वामीजी कि कृपा से उनके शरण प्राप्त् हो गये हैं।

आण्डुगळ् नाळ् तिन्गळाय् निगळ् कालमेल्लाम् मनमे

ईण्डु पल् योनिगळ् तोऱु उळल्वोम् इन्ऱु ओर् एण् इन्ऱिये

काण् तगु तोळ् अण्णल् तेन् अत्तियूरर् कळल् इणैक् कीळ्

पूण्ड अन्बाळन् इरामानुसनैप् पोरुन्दिनमे

हे मन! दिनों, मासों और वर्षों के रूप से बीते हुये सारे भूतकाल में नाना प्रकार की योनियों में जन्म लेकर नानाविद  क्लेशों का अनुभव किये हुए हमने, आज एकाएक ही सुंदर भुजवाले श्रीहस्तिगिरिनाथ श्रीवरदराज भगवान के पादभक्त, श्रीरामानुज  स्वामीजी का आश्रय लिया। ओह! हमारा भाग्य अचिंतनीय है!

पाशूर ३२: कुछ जन, जिन्होंने श्रीरंगामृत स्वामीजी को आनन्द में देखा, श्रीरामनुज स्वामीजी को प्राप्त किया और उन्हें कहा, “हम भी श्रीरामानुज स्वामीजी को प्राप्त करना चाहते हैं पर हममें आत्मगुण नहीं हैं जो आप में हैं”। वें कहते हैं “जो श्रीरामानुज स्वामीजी को प्राप्त करते हैं उनमें आत्मगुण स्वयं से आजायेगा”।

पोरुन्दिय तेसुम् पोऱैयुम् तिऱलुम् पुगळुम् नल्ल

तिरुन्दिय ग्यानमुम् सेल्वमुम् सेरुम् सेऱु कलियाल्

वरुन्दिय ग्यालत्तै वण्मैयिनाल् वन्दु एडुत्तु अळित्त

अरुन्दवन् एन्गळ् इरामासुनै अडैबवर्क्के

धर्ममार्ग का तिरस्कार करनेवाले कलि से पीड़ित भूमि की अपनी निर्हेतुक कृपा से उद्धार पूर्वक रक्षा करनेवाले, (शरणागति नामक) श्रेष्ठतपस्या से विभूषित और हमारे नाथ श्री रामानुज स्वामीजी का आश्रयण करनेवालों को स्वरूपानुरूप तेज, क्षमागुण, जितेंद्रियत्व रूप बल, यश, परमविलक्षण सदासद्विवेक और (भक्तिरूप) ऐश्वर्य अपने आप मिल जायेंगे।

 पाशूर ३३: इस गाथा का दो प्रकारों से अर्थ हो सकता है – श्रीरामानुज स्वामीजी में पंचायुधों की भी शक्ति पूर्ण है; अथवा आप साक्षात पंचायोधों के अपरावतार हैं। यद्यपि श्री स्वामीजी को शेषावतार मानना ही प्रमाण- सम्मत है। तथापि आपके प्रभावों का अनुसंधान करने वाले महान लोग आपके विषय में ऐसे नानाप्रकार के उल्लेख करते हैं कि आप कदाचित् विष्वकसेनजी का अथवा भगवान के पांचों आयुधों का अवतार होंगे इत्यादि। इस विषय की विस्तृत चर्चा “शेषावतारच्चिरप्पु” नामक द्राविडीग्रंथ में की गयी है

अडै आर् कमलत्तु अलर् मगळ् केळ्वन् कै आळि एन्नुम्

पडैयोडु नाण्दगमुम् पडर् तणुडुम् ओण् सार्न्ग विल्लुम्

पुडैयार् पुरि सन्गमुम् इन्दप् पूदलम् काप्पदऱ्कु एन्ऱु

इडैये इरामानुस मुनि आयिन इन्निलत्ते

सुंदर दल परिपूर्ण कमलपुष्प में अवतीर्ण श्री महालक्ष्मी के वल्लभ भगवान के श्री हस्त में विराजमान श्रीसुदर्शन चक्र, नाण्दग (तलवार )खड्ग, रक्षण करने में निरत गदा, सुंदर शांर्गधनुष, और मनोहर श्री पांचजन्य शंख, ये सब (पंचायुध) इस भूतलकी रक्षा करने के लिए श्री रामानुज स्वामीजी में आविष्ट हो गये; ( अथवा श्री रामानुज स्वामीजी के रूप में अवतीर्ण हो गये)।

पाशूर ३४: श्रीरामानुज स्वामीजी का कलिपुरुष पर विजय पाना कोई बड़ी बात नहीं है; और इससे आपको कोई विशेष ख्याति भी नहीं मिलेगी। परंतु मेरे अनुष्ठित उस कलिसे भी प्रबल पापों का विनाश करना उससे कई गुना अधिक कठिन काम है; जिसके पूरा होने से आपका यश विशेषतः उज्वल बना। समझना चाहिए कि नैच्यानुसंधान का यह एक विलक्षण प्रकार है।

निलत्तैच् चेऱुत्तु उण्णुम् नीसक् कलियय् निनैप्पु अरिय

पलत्तैच् चेऱुत्तुम् पिऱन्गियदु इल्लै एन् पेय्विनै तेन्

पुलत्तिल् पोऱित्त अप्पुत्तगच् चुम्मै पोऱुक्कियपिन्

नलत्तैप् पोऱुत्तदु इरामानुसन् तन् नयप् पुगळे

श्रीरामानुज स्वामीजी के कल्यानगुण, इस भूतल की पीडा करनेवाले नीच कलिपुरुष के कल्पनातीत बल का ध्वंस करने से प्रकाशमान नहीं हुए; किंतु मेरे अनुष्ठित प्रबल पापों का लेख, यमलोक गत (चित्रगुप्त के पास रहने वाली) पुस्तकों की गठरी जला देने के बाद ही वे बहुत प्रकाशमान होने लगे।

पाशूर ३५: पूर्वगाथोक्त प्रकार मेरे पूर्वकाल के सभी पाप नष्ठ हो गये; और भविष्यत् में भी पाप न लगेंगे; क्यों कि मैं ने देवतान्तरप्रावण्य, क्षुद्रमानवस्तुति इत्यादि अकार्यों से दूर होकर श्रीरामानुज स्वामीजी के पादारविन्दो का आश्रय लिया।

नयवेन् ओरु देय्वम् नानिलत्ते सिल मानिडत्तैप्

पुयले एनक् कवि पोऱ्ऱि सेय्येन् पोन् अरन्गम् एन्निल्

मयले पेरुगुम् इरामानुसन् मन्नु मा मलर्त्ताळ्

अयरेन् अरुविनै एन्नै एव्वाऱु इन्ऱु अडर्प्पदुवे

मैं  तो दूसरे किसी देव का भक्त न बनूंगा; क्षुद्र मानवों की, ‘हे मेघ के सदृश वर्षण करने वाले!’ इत्यादि मिथ्यास्तुति नहीं करूंगा; और ‘श्रीरंग’ शब्द सुननेमात्र से उस पर व्यामोहित होनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी के सुंदर पादारविन्दों को नहीं भूलूंगा। अतः प्रबल पाप मुझको कैसे घेर सकेंगे?

पाशूर ३६: श्रीरंगामृत स्वामीजी से कहा गया था कि “आप कहते हैं आप उनको भूल नहीं पायेंगे। कृपया आप उनके स्वभाव के विषय में हमें बताये ताकि हम भी उन्हें प्राप्त कर सके”। वें बड़ी नम्रता से बताते हैं।

अडल् कोण्ड नेमियन् आरुयिर् नादन् अन्ऱु आरणच् चोल्

कडल् कोण्ड ओण्पोरुळ् कण्डु अळिप्प पिन्नुम् कासिनियोर्

इडरिन् कण् वीळ्न्दिडत् तानुम् अव्वोण् पोरुळ् कोण्डु अवर्

पिन् पडरुम् गुणन् एम् इरामानुसन् तन् पडि इदुवे

भक्तजनविरोधियों का निरसन करने में समर्थ चक्रराज से अलंकृत ,समस्त चेतनों के ईश्वर भगवान ने पहले एक समय, जब  वे अर्जुन के सारथि बने थे, वेदसागर में निगूढ़ श्रेष्ठ अर्थों का विवेचन कर गीताजी के द्वारा उनको प्रकाशित किया; उसके बाद भी इस भूतलवासी जन संसार सागर में ही मग्न रहे। यह देखकर दयाविष्ट श्री रामानुज स्वामीजी स्वयं उस गीता के श्रेष्ठ अर्थ लेकर उन संसारियों के अनुसरण कर, उनकी रक्षा करने लगे । यह है हमारे आचार्य सार्वभौम की कृपाका प्रकार।

 पाशूर ३७: श्रीरंगामृत स्वामीजी से यह पूछा गया कि कैसे उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों को प्राप्त किया, जो ऐसे हैं। वें कहते हैं वें पूर्ण ज्ञान  के साथ नहीं प्राप्त किया। जो यह समझते हैं कि जो श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों से जुड़े हैं , वे  इच्छित हैं ,मुझे भी श्रीरामानुज स्वामीजी का दास बना दिया।

पडि कोण्ड कीर्त्ति इरामायणम् एन्नुम् भक्ति वेळ्ळम्

कुडि कोण्ड कोयिल् इरामानुसन् गुणम् कूऱुम् अन्बर्

कडि कोण्ड मामलर्त् ताळ् कलन्दु उळ्ळम् कनियुम् नल्लोर्

अडि कण्डु कोण्डु उगन्दु एन्नैयुम् आळ् अवर्क्कु आक्किनरे

सारे संसार में विस्तृत यशवाले श्रीरामायण नामक भक्तिसमुद्र के नित्यनिवासस्थान श्रीरामानुज स्वामीजी के कल्यानगुणों का ही कीर्तन करनेवाले भक्तों के सुगंधि व श्रेष्ठ पादारविन्दों में दृढ़ भक्तिवाले महात्मा लोगों ने वस्तुस्थिति समझ कर (अर्थात् यह समझकर की यह आत्मवस्तु श्रीरामानुजस्वामीजी का ही शेषभूत है) श्रीरंगामृत स्वामीजी को भी सादर उनका (श्री रामानुजस्वामीजी का) दास बना दिया ।

 पाशूर ३८: श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रेष्ठ मानकर श्रीरंगामृत स्वामीजी उनसे पूछते कि क्यों उन्होंने रंगामृत को इतने दिनों तक उनके शरण में नहीं लिया। 

आक्कि अडिमै निलैप्पित्तनै एन्नै इन्ऱु अवमे

पोक्किप् पुऱत्तिट्टदु एन् पोरुळा मुन्बु पुण्णियर् तम्

वाक्किल् पिरिय इरामानुस निन् अरुळिन् वण्णम्

नोक्किल् तेरिवरिदाल् उरैयाय् इन्द नुण् पोरुळे

हे भाग्यवानों की वाणी में नित्यनिवास करनेवाले श्री रामानुज स्वामिन्! (अनादिकाल से अहंकारी रहे हुए) मुझको आपने आज ही अपना शेष बना दिया। (इस प्रकार हाल में मुझपर कृपा बरसानेवाले) आप क्यों  इतने दिनों तक मुझको विषयान्तरसंग में ही छोड रखा ? विचार करके देखने पर आपकी कृपा का प्रकार सत्य ही समझने में अशक्य है। आप ही कृपा करके इसका रहस्य समझाइए।

 पाशूर ३९: पुत्रदारगृहक्षेत्रादि सांसारिक क्षुद्रविषयों के मोह में ही फँस कर श्रेय का मार्ग नहीं जाननेवाले मेरे अज्ञान व उसका भी मूल कर्म मिटाकर, मुझको अपना भक्त बनाने की कृपा श्रीरामानुज स्वामीजी के सिवा, दूसरे किसी में क्या कभी रह सकती है? एवं ऐसी विलक्षण कृपा का पात्र क्या मेरे सिवाय दूसरा कोई हुआ है ? ।

पोरुळुम् पुदल्वरुम् भूमियुम् पून्गुळरारुम् एन्ऱे

मरुळ् कोण्डु इळैक्कुम् नमक्कु नेन्जे मऱ्ऱु उळार् तरमो

इरुळ् कोण्ड वेम् तुयर् माऱ्ऱि तन् ईऱु इल् पेरुम् पुगळे

तेरुळुम् तेरुळ् तन्दु इरामानुसन् सेय्युम् सेमन्गळे

यों रटते हुए कि, यह मेरा धन है, ये मेरे पुत्र है, यह मेरा खेत हैं, ये मेरी पुष्पालंकृत सुकेशिनी स्त्रियाँ हैं , इत्यादि, उन्हींमें आशा लगा कर, अपना विवेक खोकर, दुःख पाते रहनेवाले हमारे अज्ञान एवं क्रूर दुःख मिटाकर, हमें अपने अनंत कल्याण गुणों का ही ध्यान करने योग्य ज्ञान भी देकर, श्री रामानुज स्वामीजी जो हमारी रक्षा कर रहे हैं, यह, हे मन ! क्या दूसरों के योग्य है ?

 पाशूर ४०: श्रीरामानुज स्वामीजी के महान  कार्यों को स्मरण कर श्रीरंगामृत स्वामीजी आनंदमय हो जाते हैं।

सेम नल् वीडुम् पोरुळुम् दरुममुम् सीरिय नल्

काममुम् एन्ऱु इवै नान्गु एन्बर् नान्गिनुम् कण्णनुक्के

आम् अदु कामम् अऱम् पोरुळ् वीडु इदऱ्कु एन्ऱु उरैत्तान्

वामनन् सीलन् इरामानुसन् इन्द मण्मिसैये

श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीवामन भगवान समान हैं बिना कुछ आशा कर दूसरों की सहायत हैं। सब के क्षेमदायक मोक्ष (संसार से मुक्ती) जो आराम देता है, धर्म, अर्थ (धन) और श्रेष्ठ काम (प्रेम),  ये चार (वैदिकों से) चतुर्विध पुरुषार्थ कहे जाते है।  इन चारों में से भगवद्विषयक काम (अथवा प्रेम) ही काम शब्द का अर्थ है। श्रीरामानुज स्वामीजी बड़ी दया से कहे कि धर्म हीं हमारे पापों को मिटायेगा; अर्थ कार्यों, जैसे दान, आदि  धर्म को आगे बढ़ायेगा; मोक्ष भी इसे आगे बढ़ाएगा और यह सब भगवद काम (भगवान के प्रति प्रेम) के अंतर्गत होगा।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-31-40-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

स्तोत्र रत्नम – सरल् व्याख्या – तनियन्

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

alavandhar

तनियन्
स्वादयन्निह सर्वेषां त्रययंतार्थं सुदुर्ग्रुहम ।
स्तोत्रयामास योगींद्र: तं वंदे यामुनाव्हयं ॥

मैं उन श्री आळवन्दार् स्वामीजी के चरणों में नमन करता हूँ, जो योगियों में उत्तम है, जिन्होने वेदान्त के अत्यन्त कठिन सिद्धांतों को जन सामान्य के समझने योग्य स्तोत्र प्रारूप में प्रस्तुत किया है।

नमो नमो यामुनाय यामुनाय नमो नमः ।
नमो नमो यामुनाय यामुनाय नमो नमः ।।

मैं श्री आळवन्दार् स्वामीजी के चरणों में बारंबार नमन करता हूँ। मैं उनके चरणों में नमस्कार करने से रुक नहीं सकता।

अगले भाग में हम अवतरिका देखेंगे .

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2016/12/sthothra-rathnam-invocation/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

स्तोत्र रत्नम – सरल् व्याख्या

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

vishnu-lakshmi
alavandhar-nathamunigal
आळवन्दार् और् नातमुनिगळ् – काट्टु मन्नार् कोयिल्

श्री आळवन्दार्, जो विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त और श्रीवैष्णव संप्रदाय के महान विचारक और परम आदरणीय श्रीनाथमुनी स्वामीजी के पौत्र है, ने अति आवश्यक सिद्धान्त अर्थात प्राप्य और प्रापकम को दिव्य द्वयमहा मंत्र के विस्तृत व्याख्यान द्वारा अपने स्तोत्र रत्न में दर्शाया है। हमारे पूर्वचार्यों से प्राप्त संस्कृत ग्रन्थों में यह सबसे पुराना ग्रंथ है जो आज हमारे पास उपलब्ध है।

श्री महापूर्ण स्वामीजी, (श्री पेरिय नम्बि )श्री रामानुज स्वामीजी को श्रीआळवन्दार् के शिष्य के रूप में प्रवर्त करने की इच्छा से श्री काँचीपुरम को जाते है। श्री रामानुज स्वामीजी श्री कांचिपूर्ण स्वामीजी के मार्गदर्शन में श्री देवप् पेरुमाळ् के कैंकर्य स्वरूप एक शालकूप से तीर्थ (जल) लाकर सेवा कर रहे थे। श्री महापूर्ण स्वामीजी स्तोत्र रत्न से कुछ श्लोकों का पाठ करते है जो श्री रामानुज स्वामीजी को बहुत प्रभावित करता है और उन्हें संप्रदाय में लेकर आता है। श्री रामानुज स्वामीजी का इस प्रबंध के प्रति अत्यंत लगाव था और इसी प्रबंध के बहुत से श्लोकों का उपयोग उन्होने अपने श्रीवैकुंठ गद्य में भी किया है।

पेरियवाच्चान पिल्लै ने इस दिव्य प्रबंध के लिए विस्तृत व्याख्यान की रचना की है। पेरियवाच्चान पिल्लै ने अपने व्याख्यान में इस स्तोत्र के विशेष अर्थों को वाक्चातुर्यपूर्वक समझाया है। उनके व्याख्यान के आधार पर हम यहाँ श्लोकों के सरल अर्थों को देखेंगे।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/10/sthothra-rathnam-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 21 से 30

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 11 से 20

पाशूर २१: श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीमत् यामुनाचार्य स्वामीजी के उभयपादों को उपाय मानकर प्राप्त कर, मेरा रक्षण कर दिया। अत: अब मैं उन नीच जनों की स्तुति नहीं करूंगा।  

निदियैप् पोळियुम् मुगिल् एन्ऱु नीसर् तम् वासल् पऱ्ऱि

तुदि कऱ्ऱु उलगिल् तुवळ्गिन्ऱिलॅ इनि तूय् नेऱि सेर्

एदिगट्कु इऱैवन् यमुनैत् तुऱैवन् इणै अडियाम्

गदि पेऱ्ऱुडैय इरामानुसन् एन्नैक् कात्तनने

श्रीमद्यामुनाचार्य स्वामीजी जिनके दिव्य चरण एक दूसरे के सहायक हैं वें सभी यतियों के अधिनायक है। मैं अब से इस भूमितल पर रहनेवाले नीच जनों की, ‘यह निधि  वरसनेवाला कालमेघ हैं’ इत्यादि मिथ्यास्तुति करता उनके द्वार पर बैठकर दुःख नहीं पाऊंगा; क्योंकि परिशुद्ध आचारवाले सन्यासियों के स्वामी श्रीमद्यामुनाचार्य स्वामीजी के उभयपादों को प्राप्त कर उससे सारे संसार के ही स्वामी बननेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी ने मेरा रक्षण कर दिया।

पाशूर २२: जब देवता, भगवान का उल्लंघन कर, बाणासुर का पक्ष लेते हैं तब भगवान उनके उल्लंघन को सहते हैं जब वे भगवान की महिमा को जानते हैं और्वें भगवान कि प्रशंसा करने  (क्षमा मांगने ) लगते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी  जो भगवान की प्रशंसा करते हैं , वह धन हैं जो मुझे मेरे बुरे समय में मदद करेगा।

कार्त्तिगैयानुम् करि मुगत्तानुम् कनलुम् मुक्कण्

मूर्त्तियुम् मोडियुम् वेप्पुम् मुदुगिट्टु मूवुलगुम्

पूत्तवने एन्ऱु पोऱ्ऱिड वाणन् पिळै पोऱुत्त

तीर्त्तनै एत्तुम् इरामानुसन् एन्दन् सेम वैप्पे

(बाणासुरयुद्ध-प्रसंग में) कार्तिकेय, गजमुख, अग्निदेव, त्रिलोचन शिव, दुर्गा देवी और ज्वरदेवता, इन सब के पराजित और पलायमान होने के बाद, जब बाणासुर ने (अथवा शिव ने) यों स्तुति की कि, “हे अपने नाभीकमल से तीनों लोकों की सृष्ठि करनेवाले! (मेरी रक्षा करो)”, तब उसके अपराध की क्षमा करनेवाले परमपावन श्रीकृष्ण भगवान की स्तुति करनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी मेरा आपद्धन हैं।

 पाशूर २३: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं ,  “अगर मैं जो पूर्ण रूप से दोषवाला हूँ , श्रीरामानुज स्वामीजी की प्रशंसा करता हूँ जिनकी प्रशंसा बिना दोषवाले करते हैं,  तो उनके दिव्य गुणों का क्या होगा?” 

वैप्पाय वान् पोरुळ् एन्ऱु नल् अन्बर् मनत्तगत्ते

एप्पोदुम् वैक्कुम् इरामानुसनै इरु निलत्तिल्

ओप्पार् इलाद उऱु विनैयेन् वन्ज नेन्जिल् वैत्तु

मुप्पोदुम् वाज़्ह्त्तुवन् एन्नाम् इदु अवन् मोय् पुगळ्क्के

 विलक्षण भक्तिवाले महात्मा लोग अपने आपद्रक्षक निधि मानते हुए, जिनका नित्य-ध्यान करते हैं, ऐसे श्रीरामानुजस्वामीजी को इस विशाल प्रपंच में ,असदृश महापापी मैं, अपने कपटपूर्ण मन में रख कर स्तुति कर रहा हूँ। अब मुझे यह डर लगता है कि इससे उन आचार्यसार्वभौम के यश की हानि पहुंचेगी।  इस प्रबंध की इतनी गाथाओं में श्री रामानुज स्वामीजी की अप्रतिम स्तुति करने के बाद, अब अमुदनार् का ध्यान अपनी ओर फिरा और उनके मन में ऐसा एक विलक्षण भय उत्पन्न हुआ कि परमभक्तिसम्पन्न महापुरुषों के स्तुत्य आचार्य-सार्वभौम की स्तुति को यदि महापापी मैं करूँ, तो इससे अवश्य ही उनकी महिमा घट जायेगी। समझना चाहिए कि नैच्यानुसन्धान करने का यह भी एक प्रकार है।

 पाशूर २४: जब यह पूछताछ हुआ  कि  कैसे वें एक निचले स्थिति से आज के वर्तमान स्थिति में आये,  तो श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने पहिले स्थिति के विषय में चर्चा करते हैं और कैसे वें आज के वर्तमान स्थिति में आते हैं।

मोय्त्त वेम् ती विनैयाल् पल् उडल् तोऱुम् मूत्तु अदनाल्

एय्त्तु ओळिन्दॅ मुन नाळ्गळ् एल्लाम् इन्ऱु कण्डु उयर्न्दॅ

पोय्त् तवम् पोऱ्ऱुम् पुलैच् चमयन्गळ् निलत्तु अवियक्

कैत्त मेइग्यानत्तु इरामानुसन् एन्नुम् कार् तन्नैये

जैसे मधुमक्खी अपने छत्ते के पास झुण्ड बनाकर घूमती हैं वैसे हीं पुरातन काल से बुरे कर्म आत्मा के आगे पीचे घूमती हैं जिसके कारण मैं अनेक प्रकार के जन्म अनेक बार लिया हूँ। वेद यह बताता हैं कि, संसार के सुख से कैसे दूर रहे, कैसे दूसरों को कष्ट न देना और कैसे अपने आचार्य की  सेवा करना। निचले तत्त्वज्ञान, वेदों में कहे अनुसार कार्य नहीं करते हैं, परंतु स्वयं अनुसार अनुचित तरीके से कार्य करते हैं । श्रीरामानुज स्वामीजी, ऐसे निचले तत्त्वज्ञान और उनके तरीकों कों पूर्णत: नष्ट कर दिये। ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी जो अत्यधिक उदार शख्स हैं स्वयं को ऐसे दिखाते कि वो मेरे लिए हीं हैं जिसके कारण मैं आज मेरे इस वर्तमान प्रसिद्ध स्थिति में पहुंचा हूँ।

पाशूर २५:. श्रीरामानुज स्वामीजी ने जो उनके ऊपर कृपा किये वह स्मरण कर श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य मुखारविंद को देखकर उन्हें पूछते “इस संसार में कौन आपकी कृपा को जान सकता हैं?”

कार् एय् करुणै इरामानुस इक्कडल् इडत्तिल्

आरे अऱिबवर् निन् अरुळिन् तन्मै अल्ललुक्कु

नेरेउऱैविडम् नान् वन्दु नी एन्नै उय्त्तपिन् उन्

सीरेउयिर्क्कुयिराय् अडियेऱ्कु इन्ऱु तित्तिक्कुमे

हे मेघ के सदृश कृपामूर्ते श्रीरामानुज स्वामीन्! मैं तो समस्त सांसारिक क्लेशों का नित्यनिवास स्थान हूँ । ऐसे मुझको आपने अपनी निर्हेतुक कृपा से स्वीकार कर लिया। अतः अब आपके कल्याणगुण ही मेरी आत्मा के धारक होकर मुझे अत्यंत प्रिय लग रहे हैं। समुद्रपरिवृत इस भूतल पर कौन आप की कृपा का प्रभाव जान सकता? (कोई भी नहीं।) जैसे मेघ, श्रेष्ठ-नीच विभाग का ख्याल किये बिना सर्वत्र बरस कर सबका ताप मिटाता है, ठीक उसी प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी भी किसीकी योग्यता या अयोग्यता का ख्याल न करते हुए सबके ऊपर अपनी सीमातीत दया बरसाते हुए उनके तापत्रय मिटा देते हैं। ऐसी आपकी विशेष कृपा का वैभव कौन समझ सकता है?

पाशूर २६:. श्रीवैष्णव वह है जिनके पास श्रीरामानुज स्वामीजीके श्रीचरण कमलों में पूर्णत: अन्तर्भूत होने का एक महान वैभव हैं। श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि श्रीवैष्णवों के पहले की  स्थिति के ऐसे गुण में मुझे दास बना रहा हैं।

तिक्कुऱ्ऱ कीर्त्ति इरामानुसनै एन् सेय् विनैयाम्

मेय्क्कुऱ्ऱम् नीक्कि विळन्गिय मेगत्तै मेवुम् नल्लोर्

एक्कुऱ्ऱवाळर् एदु पिऱप्पु एदु इयल्वु आग निन्ऱोर्

अक्कुऱ्ऱम् अप्पिऱप्पु अव्वियल्वे नम्मै आट्कोळ्ळुमे

मेरे असंख्य पापों को दूर कर उससे संतोष पानेवाले, परमोदार और दिगंतविश्रांत यशवाले श्री रामानुज स्वामीजी की शरण में रहनेवाले जन, उससे पहले जैसे अपराधवाले रहे, जैसे कुल में उत्पन्न हुए थे और जैसे आचरण करते रहे, उनके वे ही अपराध, वे ही कुल और वे ही आचरण हमारे लिए पूज्य हैं। श्री भगवद्रामानुज स्वामीजी के भक्तों में उनके पूर्वकृत पुण्यपाप, दुराचार, उच्चनीच कुल इत्यादियों का ख्याल नहीं किया जा सकता।

 पाशूर २७:. अभी जब वें श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्यों की ओर प्रिय हो रहे थे, श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं को श्रीरंगामृत स्वामीजी के हृदय के ओर अनुरूप किया। श्रीरंगामृत स्वामीजी उद्विगन हो गये कि यह श्रीरामानुज स्वामीजी कीओर दोष लायेगा।  

कोळ्ळक् कुऱैवु अऱ्ऱु इलन्गि कोज़्हुन्दु विट्टु ओन्गिय उन्

वळ्ळल् तनत्तिनाल् वल्विनैयेन् मनम् नी पुगुन्दाय्

वेळ्ळैच् चुड्डर् विडुम् उन् पेरु मेन्मैक्कु इळुक्कु इदु एन्ऱु

तळ्ळुऱ्ऱु इरन्गुम् इरामानुसा एन् तनि नेन्जमे

हे उड़यवर! (जिनके वश में दोनों लीला और नित्य विभूति हैं) प्रतिक्षण बढते रहनेवाले अपने सौशिल्यगुण की वजह से ही (अपनी महिमा का ख्याल नहीं करते हुए) आपने मुझ घोरपापी के मन में प्रवेश किया। यह सोचता हुआ कि (वसिष्ठ के चंडालगृहप्रवेश की भांति) आपका यह कृत्य, परम परिशुद्ध व जाज्वल्यमान आपके प्रभाव में शायद कलंक डालता होगा, मेरा यह विचित्र मन चिंतित हो रहा है।

पाशूर २८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी के विषय की भाषा यह इच्छा देखकर खुश हो जाते हैं।   

नेन्जिल् कऱै कोण्ड कन्जनैक् काय्न्द निमलन् नन्गळ्

पन्जित् तिरुवडिप् पिन्नै तन् कादलन् पादम् नण्णा

वन्जर्क्कु अरिय इरामानुसन् पुगज़्ह् अन्ऱि एन् वाय्

कोन्जिप् परवगिल्लादु एन्न वाळ्वु इन्ऱु कूडियदे

कल्मषचित्त कंस का संहार करनेवाले, अखिल हेयप्रत्यनीक (माने समस्थविद दोषों के विरोधी) और सुकुमार पादवाली हमारी नीलादेवी के वल्लभ भगवान के पादारविन्दों का आश्रय नहीं लेते हुए, आत्मापहार नामक चोरी करनेवाले को सर्वथा दुर्लभ श्रीरामानुज स्वामीजी की दिव्यकीर्ति के सिवा दूसरे किसीका यशोगान करना मेरा जी नहीं चाहता। ओह ! आज मुझे कैसा सुंदर भाग्य मिला है ?

 पाशूर २९: श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह भाग्य हाल में मिल ही चुका था। अतः यहां पर इतना भाग्य माँगा जा रहा है कि, श्रीरामानुज भक्त मंडली के दर्शन मुझे नित्य ही मिलते रहें। 

कूट्टुम् विदि एन्ऱु कूडुन्गोलो तेन् कुरुगैप्पिरान्

पाट्टेन्नुम् वेदप् पसुम् तमिळ् तन्नै तन् पत्ति एन्नुम्

वीट्टिन् कण् वैत्त इरामानुसन् पुगळ् मेय् उणर्न्दोर्

ईट्टन्गळ् तन्नै एन् नाट्टन्गळ् कण्डु इन्बम् एय्दिडवे

श्रीशठकोपसूरी की श्रीसूक्ति के रूप में प्रसिद्ध द्राविडवेदरूप सहस्रगीति का अपने भक्त रूप प्रसाद में स्थापित करनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी के कल्याणगुणों का ठीक ध्यान करनेवालों की गोष्ठी के दर्शन कर मेरी आँखे कब आनंदित होंगी। न जाने ऐसा भाग्य (उनकी कृपा) मुझे कब मिलेगी। 

पाशूर ३०:  जब यह पूछा गया कि क्या आपने श्रीरामानुज स्वामीजी से संसार से मोक्ष प्राप्ति को मांगा तब श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि अब श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझे अपना दास मान लिया हैं, अब मुझे मोक्ष मिले या नरक कोई विषय नहीं रहता हैं।  

 इन्बम् तरु पेरु वीडु वन्दु एय्दिल् एन् एण्णिऱन्द

तुन्बम् तरु निरयम् पल सूळिल् एन् तोल् उलगैल्

मन् पल् उयिर्गट्कु इऱैयवन् मायन् एन मोळिन्द

अन्बन् अनगन् इरामानुसन् एन्नै आण्डनने

सर्वेशवर अपने स्वरूप, रूप और गुण में अद्भुत हैं| वें कई समय से अनगिनत आत्माओं के स्वामी हैं।अपने श्रीभाष्यादिग्रंथों द्वारा इस अर्थका उपदेश देनेवाले कि, “भगवान अनादि से इस प्रपंच में रहनेवाले सभी चेतनों के शेषी हैं,” परमकारुणिक व दोषशून्य श्री रामानुज स्वामीजी ने मुझे अपना दास बना दिया। फिर परमानंद-दायक मोक्ष ही मिले, अथवा अपरिमित दुःख देनेवाला नरक ही क्यों न मिले, मुझे इस बात की चिंता ही कौनसी है? दोनों ही मेरे लिए समान हैं  |

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-21-30-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 11 से 20

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 1 से 10

पाशूर ११: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी (जो श्रीयोगीवाहन

स्वामीजी के दिव्य चरणों को अपने सरपर पहनते थे) की  शरण लिए हैं वें उनके महानता की 

विषय पर अधिक नहीं कह सकते हैं।

सीरिय नान्मऱैच् चेम्पोरुळ् सेन्दमिळाल् अळित्त

पार् इयलुम् पुगळ्प् पाण् पेरुमाळ् चरणाम् पडुमत्

तार् इयल् सेन्नि इरामानुसन् तन्नैच् चार्न्दवर् तम्

कारिय वण्मै एन्नाल् सोल्लोणादु इक्कडल् इडत्ते

चारों वेदों के श्रेष्ठ अर्थों का सुंदर द्राविड़ी गाथाओं से विवरण करनेवाले और सारे भूमंडल पर

फैले हुए यशवाले श्रीयोगीवाहन स्वामीजी के चरणारविन्दों से अलंकृत मस्तकवाले श्रीरामानुज

स्वामीजी के आश्रय में रहनेवाले महात्माओं के विलक्षण अनुष्ठान का वर्णन, सागरपरिवृत इस

भूमंडल में मुझसे नहीं किया जा सकता। अर्थात् श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्तों का आचरण इतना

श्रेष्ठ रहता है कि इस विशाल भूतलपर ऐसा दूसरा कोई नहीं मिल सकता और उसका पूरा वर्णन

भी कोई नहीं कर सकता |

पाशूर १२: श्रीरंगामृत स्वामीजी यह प्रश्न करते हैं कि जो श्रीरामानुज स्वामीजी (जो श्रीभक्तिसार

स्वामीजी के चरण कमलों में निवास करते थे) कि पूजा करते हैं क्या वें उनके प्रति स्नेह कर

सकते हैं।

इडम् कोण्ड कीर्त्ति मळिसैक्कु इऱैवन् इणै अडिप्पोदु

अडन्गुम् इदयत्तु इरामानुसन् अम् पोऱ्पादम् एन्ऱुम्

कडम् कोण्डु इरैन्जुम् तिरु मुनिवर्क्कु अन्ऱि कादल् सेय्यात्

तिडम् कोण्ड ग्यानियर्क्के अडियेन् अन्बु सेय्वदुवे 

सारे भूमंडल पर व्याप्त यशवाले श्री भक्तिसार आळ्वार् के उभय पादारविन्दों का, अपने मन में

सुदृढ़ ध्यान करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के मनोहर श्रीपादों को ही जो लोग अपने स्वरूपानुसुप

भाग्य मानकर उनका आश्रय लेते हैं, ऐसे उनको छोड़कर दूसरे में भक्ति न करनेवाले दृढ

अध्यवसाययुक्त ज्ञानियों का ही मैं भक्त रहूंगा।

पाशूर १३: हमारा एक मात्र लक्ष्य श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमल हीं हैं जिनकी

श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों को छोड़ और कुछ भी अभिलाषा नहीं हैं।

सेय्युम् पसुम् तुळबत् तोळिल् मालैयुम् सेन्दमिळिल्

पेय्युम् मऱैत् तमिळ् मालैयुम् पेराद सीर् अरन्गत्तु

ऐयन् कळऱ्कु अणियुम् परन् ताळ् अन्ऱि आदरिया

मेय्यन् इरामानुसन् चरणे गदि वेऱु एनक्के

अपने से विरचित हरी तुलसी की अतिविलक्षण मालाओं तथा द्राविड़वेद कहलानेवाले (तिरुमालै व

तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि नामक दो दिव्यप्रबंधरूपी) गाथामाला को नित्यसिद्ध कल्याणगुणवाले

श्रीरंगनाथ भगवान के पादारविन्दों में अर्पण करनेवाले भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी के चरणारविन्द के

सिवा दूसरी वस्तु का आदर न करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के पादारविन्द ही मेरी श्रेष्ठ गति

हैं। श्री भक्तांघ्रिरेणु नामक दिव्यसूरी ने श्रीरंगदिव्यधाम में नित्यनिवास करते हुए श्रीरंगनाथ

भगवन के पादारविन्दों में दो मालाओं को अर्पण किया; एक थी ताजी तुलसी व पुष्पों से बनी हुई

रमणीय माला; दूसरी दो विलक्षण द्राविड़ी गाथाओं से विरचित दिव्यप्रबंधमाला।

पाशूर १४: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि वों अन्य माध्यम से श्रेष्ठ लाभ प्राप्त करने स्वभाव से मुक्त हो गये क्योंकि वें श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीकुलशेखर आळ्वार् के प्रबन्धों कि स्तुति करनेवालों से अलग नहीं कर पाये।

कदिक्कुप् पदऱि वेम् कानमुम् कल्लुम् कडलुम् एल्लाम्

कोदिक्कत् तवम् सेय्युम् कोळ्गै अऱ्ऱेन् कोल्लि कावलन् सोल्

पदिक्कुम् कलैक् कवि पाडुम् पेरियवर् पादन्गळे

तुदिक्कुम् परमन् इरामानुसन् एन्नैच् चोर्विलने

श्री कुलशेखर आळ्वार्  से अनुगृहीत, शास्त्रवचनों से भरित (पेरुमाल् तिरुमोळि नामक) दिव्यप्रबंध

का गान करने मे निरत महात्माओं के पादों की ही स्तुति करनेवाले भगवान श्रीरामानुज

स्वामीजी मुझको कभी न छोड़ेंगे। अतः मैं सद्गति पाने की तीव्र इच्छा से अत्युष्ण वनों, पर्वतों

और् सागरों में खडा होकर तीक्ष्ण तपस्या करने की इच्छा नहीं करूंगा।

पाशूर १५: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं वें ऐसे जनों का सहवास नहीं करेंगे जो श्रीरामानुज

स्वामीजी के गुणों का अनुभव नहीं करते हैं,| जिन्होंने अपना मन श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के

चरणारविंद में लगाया हैं। वें कहते हैं अब उनके लिए कोई दीनता नही हैं।

सोराद कादल् पेरुम् सुळिप्पाल् तोल्लै मालै ओन्ऱुम्

पारादु अवनैप् पल्लाण्डु एन्ऱु काप्पिडुम् पान्मैयन् ताळ्

पेराद उळ्ळत्तु इरामानुसन् तन् पिऱन्गिय सीर्

सारा मनिसरैच् चेरेन् एनक्कु एन्न ताज़्ह्वु इनिये

क्षण क्षण बढ़नेवाले प्रेम-प्रवाह के परवश होने के कारण, भगवान के शाश्वत (समस्त दोष

विरोधित्व) स्वरूप का किंचित् भी ख्याल न करते हुए, उनका मंगळाशासन करने में निरत श्री

भट्टनाथ सूरी के श्रीपादों का ही निरन्तर ध्यान करनेवाले भगवान श्री रामानुज स्वामीजी के

दिव्यगुणों का जो अनुभव करना नहीं चाहते, ऐसे जनों का मैं सहवास नहीं करूंगा। यह है मेरा

दृढ़ अध्यवसाय। फिर मेरी कौन सी न्यूनता होगी?

पाशूर १६: श्रीरंगामृत स्वामीजी दयापूर्वक इस लोक के लिए जो लाभ श्रीरामानुज स्वामीजी ने

किया उसे लिखते हैं जो श्रीगोदाम्बाजी के दया के पात्र हैं और जो उन्को प्रिय हैं।

ताळ्वु ओन्ऱु इल्ला मऱै ताळ्न्दु तल मुळुदुम् कलिये

आळ्गिन्ऱ नाळ् वन्दु अळित्तवन् काण्मिन् अरन्गर् मौलि

सूळ्गिन्ऱ मालैयैच् चूडिक् कोडुत्तवळ् तोल् अरुळाल्

वाळ्गिन्ऱ वळ्ळल् इरामानुसन् एन्नुम् मा मुनिये

श्रीरंगनाथ भगवान के दिव्य सिरपर धारण करने योग्य पुष्प माला को, पहले अपने सिर पर

धारण कर सुगंधित बना देनेवाली श्रीगोदादेवी की निर्हेतुक कृपा से वृद्धि पानेवाले, परमोदार

भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी ने, किसी प्रकार की न्यूनता से विरहित वेद जब क्षीण होने लगे

और कलि का अंधकार ही भूतल पर सर्वत्र खूब फैल गया, ऐसी अवस्था में यहां अवतार लेकर(

उन वेदों का उद्धार पूर्वक) लोकों का रक्षण किया।

पाशूर १७: जो हमारे भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों के शरण हो जाते हैं जो

श्रीपरकाल स्वामीजी को समर्पित हैं, घबराने पर भी कभी कोई बाधा में नहीं फसेंगें ।

मुनियार् तुयरन्गळ् मुन्दिलुम् इन्बन्गळ् मोय्त्तिडिनुम्

कनियार् मनम् कण्णमन्गै निन्रानै कलै परवुम्

तनि आनैयैत् तण् तमिळ् सेय्द नीलन् तनक्कु उलगिल्

इनियानै एन्गळ् इरामानुसनै वन्दु एय्दिनरे

सकल शास्त्र प्रतिपाद्य और विलक्षण मत्तगज के सदृक्ष, तिरुक्कण्णमङ्गै इत्यादि दिव्यदेशों में

विराजमान भगवान को लक्ष्यकर, संसार तापहर व परमभोग्य द्राविड दिव्यप्रबंध रचनेवाले श्री

(नीलन् नामक) परकाल स्वामीजी के भक्त हमारे नायक श्रीरामानुज स्वामीजी के आश्रय में

रहनेवाले महात्मालोग तापत्रयों से पीड़ित होते हुए भी दुःखी न होंगे और सुखसाधन मिलने पर

भी आनंद से मस्त न होंगे।

पाशूर १८: श्रीमधुरकवि स्वामीजी के दिव्य हृदय में श्रीशठकोप स्वामीजी वास करते हैं। श्रीरंगामृत

स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी बड़ी दयापूर्वक श्रीमधुरकवि स्वामीजी के गुणों को

समझाते हैं ताकि उनके संग में सभी जीवात्मा (चेतन) का उद्दार हो सके।

एय्दऱ्कु अरिय मऱैगळै आयिरम् इन्तमिळाल्

सेय्दऱ्कु उलगिल् वरुम् सडगोपनैच् चिन्दै उळ्ळे

पेय्दऱ्कु इसैयुम् पेरियवर् सीरै उयिर्गळ् एल्लाम्

उय्दऱ्कु उदवुम् इरामानुसन् एम् उऱुतुणैये

श्रीनम्माळ्वार् का अवतार बड़ी कृपा से वेदों का अर्थ कहने हेतु, जो समझने के लिये बहुत

कठिन हैं, हजार पाशूरों (सहस्रगीति के द्वारा) के माध्यम से ,ताकि बच्चे और महिलाओं को भी

सीखने हेतु हुआ। उन्हें शठकोपन भी कहते थे और वों जो वेदों का गलत अर्थ बतलाते थे उनके

दुश्मन थे। श्रीशठकोप स्वामीजी का अपने हृदय में ध्यान करनेवाले महात्मा मधुरकवि स्वामीजी

के (आचार्यनिष्ठा इत्यादि) शुभगुणों का प्रवचन करके समस्त संसारियों का उद्धार करनेवाले श्री

रामानुज स्वामीजी हमारे योग्य आश्रयदाता हैं।

पाशूर १९: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते कि श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने कहा कि श्रीशठकोप

स्वामीजी हीं मेरे लिये सब कुछ हैं, मेरे लिए परमभोग्य हैं।

उऱु पेरुम् सेल्वमुम् तन्दैयुम् तायुम् उयर् गुरुवुम्

वेऱि तरु पूमगळ् नादनुम् माऱन् विळन्गिय सीर्

नेऱि तरुम् सेन्दमिळ् आरणमे एन्ऱु इन् नीळ् निलत्तोर्

अऱिदर निन्ऱ इरामानुसन् एनक्कु आरमुदे

“अतिश्रेष्ठ महान धन, माता, पिता, सदाचार्य, और सुगंधि कमल पुष्प में अवतीर्ण श्री महालक्ष्मीजी

के साथ भगवान, ये सभी मेरे लिए श्रीशठकोप स्वामीजी से अनुगृहीत, भगवद्गुणों का प्रकाशक

श्रेष्ठद्राविड वेद ही है” सारे भूमंडल निवासियों को ऐसे अपना सुदृढ़ अध्यवसाय बतानेवाले

श्रीरामानुज स्वामीजी मेरे लिए परमभोग्य होते हैं।

पाशूर २०: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते कि श्रीरामानुज स्वामीजी, जो श्रीमन् नाथमुनि स्वामीजी का

ध्यान करते हैं, मेरे परम धन हैं।

आरप्पोळिल् तैन्कुरुहै प्पिरान्, अमुद त्तिरुवाय्

ईरत् तमिळिन् इसै उणर्न्दोर्गट्कु इनियवर् तम्

सीरैप् पयिन्ऱु उय्युम् सीलम् कोळ् नादमुनियै नेन्जाल्

वारिप् परुगुम् इरामानुसन् एन्दन् मानिदिये

चंदन वृक्षों के उपवनों से परिवृत सुंदर कुरुकापुरी में अवतीर्ण महोपकारक श्री शठकोप स्वामीजी

के अतिभोग्य मुखारविंद से भावावेशपूर्ण एवं अतिमधुर द्राविड़ श्री सूक्ति (तिरुवाय्मोळि) अवतीर्ण

हुआ| नाथमुनिगल में संगीत के साथ इस तिरुवाय्मोळि  को जानने वालों को ( गहरी भक्ति के साथ) समृद्ध बनाने का गुण था |  ऐसे श्रीमन् नाथमुनिका बड़ी इच्छा से  निरंतर ध्यान करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी मेरे अक्षय निधि हैं।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-11-20-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 1 से 10

Published by:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

तनियन्

पाशूर १: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय को आमंत्रित करते हैं “हम सब श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का स्मरण करें ताकि हम उनके दिव्य पादारविन्दों में कुशलतापूर्वक रह सके।”

पू मन्नु मादु पोरुन्दिय मार्बन् पुगळ् मलिन्द

पा मन्नु माऱन् अडि पणिन्दु उय्न्दवन् पल् कलैयोर्

ताम् मन्न वन्द इरामानुसन् चरणारविन्दम्

नाम् मन्नि वाळ नेञ्जे सोल्लुवोम् अवन्  नामङ्गळे

हे मन! श्रीमहालक्ष्मीजी जो कमल पुष्प पर निवास करती है, भगवान के दिव्य वक्षस्थल का अनुभव कर, कमल पुष्प का त्याग कर , उस दिव्य वक्षस्थल पर निवास करने लगी। श्रीशठकोप स्वामीजी ,भगवान के दिव्य गुणों से पूर्ण तिरुवाय्मोळि में लीन हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य पादारविन्दों में समर्पण कर स्वयंको उद्धार किये। अनेक शास्त्रोंको सीखनेके बावज़ूत्, बहुत से विद्वान, जो श्रीरामानुज स्वामीजी के पहले थे, उनके अंतरिय अर्थों को समझ न सके। श्रीरामानुज स्वामीजी को उन अंतरिय अर्थों का पता था और उसे अच्छी तरह स्थापित किया। हम सब (श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय से कहते हैं) श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों को अपना लक्ष्य बनाकर श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का संकीर्तन करते रहे ताकि हम एक उद्देश से जीवन व्यतीत कर सके।

पाशूर २: पिछले पाशुर में श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय को श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का संकीर्तन करने के पश्चात कहते हैं सब कैंकर्य भूलकर उनका हृदय श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों का आनन्द ले रहा है । यह देख श्रीरंगामृत स्वामीजी आश्चर्य हो जाते हैं।

कळ् आर् पोळिल् तेन्नरङ्गन् कमलप् पदङ्गळ् नेञ्जिल्

कोळ्ळा मनिसरै नीन्गि कुऱैयल् पिरान् अडिक्कीळ्

विळ्ळादअन्बन् इरामानुसन् मिक्क सीलम् अल्लाल्

उळ्ळादु एन् नेंजु ओन्ऱु अरियेन् एनक्कुऱ्ऱ पेरियिल्वे

मधुस्यंदि उध्यानवनों से परिवृत श्रीरंगम दिव्यधाम में विराजमान भगवान के पादारविंदों का ध्यान न करनेवाले मानवों को छोड़कर, (तिरुमंगै आळ्वार )श्रीपरकाल स्वामीजी (जिन्होने तिरुक्कूरैयलूर में अवतार लिया और जिन्हें दिव्य प्रबन्ध रचने का लाभ मिला) के पादों में अविच्छिन्न भक्ति करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के शीलगुण के सिवा, मेरा मन, दूसरी किसी वस्तु का स्मरण नहीं करता; मैं अपने इस श्रेष्ठ स्वभाव का कोई कारण भी नही जान सकता।

पाशूर ३: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपने हृदय को कहते है “मैं आपके नत मस्तक होता हूँ कि, जो संसार में लगे हुए हैं  उन जनों से मेरा सम्बन्ध तोड़कर जो श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों कि सेवा करते हैं उनमें संलिप्त होने के लिये  मुझपर इतना कृपा  किये ।

पेर् इयल नेञ्जे! अडि पणिन्देन् उन्नै पेय्प्पिरविप्

पूरियरोड़ु  उळ्ळ​ सुऱ्ऱम् पुलर्त्ति  पोरुवु अरुम् सीर्

आरियन् सेम्मै इरामानुस मुनिक्कु अन्बु सेय्युम्

सीऱिय पेरु उडैयार् अडिक्कीळ् एन्नैच् चेर्त्तदऱ्के

हे हृदय जिसका बहुत उत्तम गुण हैं! मुझे बहुत लाभ देने के लिये मैं आपके नतमस्तक होता हूँ – क्योंकि आसुरी जन्मवाले नीचों के साथ लगा हुआ मेरा सम्बन्ध तोड़ डालकर, अद्वितीय कल्याणगुणवाले, श्रेष्ठ अनुष्ठानवाले एवं निष्कपट स्वभावले श्रीरामानुज स्वामीजी के विषय में की जानेवाली भक्ति को ही परमपुरुषार्थ माननेवाले आर्य जनों के पादारविंदो के नीचे मुझको लगा दिया।   

पाशूर ४:  वह कहते हैं श्रीरामानुज स्वामीजी की निर्हेतुक कृपा से उनका अपने पहले का नैच्यानुसंधान कि स्थिति पर पहूंचने की संभावना नहीं हैं और उनमें कोई दोष भी नहीं है।  

एन्नैप् पुवियिल् ओरु पोरुळाक्कि मरुळ् सुरन्द

मुन्नैप् पळविनै वेर् अऱुत्तु  ऊळि मुदल्वनैये

पन्नप् पणित्त इरामानुसन् परम् पादमुम् एन्

सेन्नित् तरिक्क वैत्तान् एनक्कु एदुम् सिदैवु इल्लैये

एम्पेरुमानार ने सभी को उस  परमात्मा का एहसास और जो सभी तत्वों ( चेतनों  औरअचेतनों) का कारण है, उसपर  ध्यान करने के लिए प्रेरित किये  उन्होंने यह श्रीभाष्य (उनके द्वारा रचित एक ग्रन्थ) द्वारा प्राप्त किया। श्रीरामानुज स्वामीजी जो सभी से श्रेष्ठ हैं मुझे जो अचेतन जैसा था को चेतन बनाया। श्रीरामानुज स्वामीजी ने अपने पादों को भी मेरे सिरपर स्थापित किया। ऐसे महा प्रसाद के पात्र बननेवाले मुझको अब किसी प्रकार की हानि न होगी।

पाशूर ५: श्रीरंगामृत स्वामीजी जिन्होंने यह प्रबन्धम श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य नामों का संकीर्तन करते हुए प्रारम्भ किया और अब यही कर रहे हैं। यह कहते हुए कि कुदृष्टिवाले (जो गलत तरीके से वेदों की व्याख्या करते हैं) इनकी निंदा कर सकते हैं , वह हिचकिचाते हैं और तत्पश्चात  स्वयं को आश्वासन देकर जिस कार्य को उन्हें करना हैं उसमे निरत हो जाते हैं।

एनक्कु उऱ्ऱ सेल्वम् इरामानुसन् एन्ऱु इसैयगिल्ला

मनक् कुऱ्ऱ मान्दर् पळिक्किल् पुगळ् अवन् मन्निय सीर्

तनक्कु उऱ्ऱ अन्बर् अवन् तिरुनामन्गळ् साऱ्ऱुम् एन् पा

इनक् कुऱ्ऱम् काणगिल्लार् पत्ति एय्न्द इयल्वु इदु एन्ऱे

कुदृष्टिवाले यदि मेरे इस ग्रन्थ की निंदा करेंगे तो यह निंदा ही वास्तव में इसकी प्रशंसा होगी और श्रीरामानुज स्वामीजी हीं हमारे स्वरूप का धन है, मेरे इस प्रयास को उपहास बनायेंगे। परंतु जो महात्मा लोग श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य शुभगुणों के अनुरूप, उन पर प्रेम करते हैं, वें उन आचार्य के श्रीनामों से विभूषित इन मेरी गाथाओं में विध्यमान दोषों पर भी नजर नहीं डालेंगे। 

पाशूर ६: पिछले पाशूर में श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि यह उनका श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति भक्ति का प्रचार हैं। अब वें स्वयं को दोष देकर कहते हैं कि उनका श्रीरामानुज स्वामीजी के महानता के साथ समान भक्ति नहीं हैं।

इयलुम् पोरुळुम् इसैयत् तोडुत्तु ईन् कविगळ् अन्बाल्

मयल् कोण्डु वाळ्त्तुम् इरामानुसनै मदि इन्मैयाल्

पयिलुम् कविगळिल् पत्ति इल्लाद एन् पावि नेन्जाल्

मुयल्गिन्ऱनन् अवन् तन् पेरुम् कीर्त्ति मोळिन्दिडवे

अतिविलक्षण सामार्थ्यवाले कविलोग, प्रेमके मारे पागल बनकर, परस्पर अनुरूप शब्द व अर्थ मिलाकर जिन काव्यों से श्रीरामानुज स्वामीजी की स्तुति करते हैं, उन काव्यों में सर्वथा भक्तिशून्य और बुद्धिशून्य मैं अपने पापिष्ठ मन से उन आचार्य सार्वभौम के असीम यश की स्तुति करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

पाशूर ७: श्रीरंगामृत स्वामीजी अपनी दीनता को देखकर पीछे हठते हैं, श्रीकूरेश स्वामीजी (श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रमुख शिष्यों में से एक) के दिव्य चरण कमलों को स्मरण करते हैं और यह तय करते हैं कि यह कठिन कार्य नहीं हैं और उसे प्रारम्भ करते हैं।

मोळियैक् कडक्कुम् पेरुम् पुगळान् वन्ज मुक्कुऱुम्बाम्

कुळियैक् कडक्कुम् नम् कूरत्ताळ्वान् चरण् कूडिय पिन्

पळियैक् कडत्तुम् इरामानुसन् पुगळ् पाडि अल्ला

वळियैक् कडत्तल् एनक्कु इनि यादुम् वरुत्तम् अन्ऱे

वाचामगोचर, महायशवाले एवं कुलमद-धनमद-विध्यामद नामक तीन प्रकार के मदरूपी गड्ढों का पार करनेवाले, हमारे नाथ श्रीकूरेश स्वामीजी के श्रीपादों का आश्रय लेने के बाद, सर्वपापनिवार्तक श्री रामानुज स्वामीजी के दिव्य यशोगान करके, स्वरूपविरुद्ध दुष्ट मार्गों से बचना अब मेरे लिए बिलकुल कठिन नहीं हैं।

पाशूर ८: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीसरोयोगी (पोय्गै आळ्वार्) स्वामीजी द्वारा बड़ी कृपा से रचित प्रबन्धम को ध्यानमग्न होकर संकीर्तन करते थे, वें उनके भगवान हैं।

वरुत्तुम् पुऱ इरुळ् माऱ्ऱ एम् पोय्गैप्पिरान् मऱैयिन्

कुरुत्तिन् पोरुळैयुम् सेन्दमिळ् तन्नियुम् कूट्टि ओन्ऱत्

तिरित्तु अन्ऱु एरित्त तिरुविळक्कैत् तन् तिरु उळ्ळत्ते

इरुत्त्म् परमन् इरामानुसन् एम् इऱैयवने

नानाप्रकार के दु:ख देनेवाले सांसारिक क्षुद्र पदार्थ विषयक अज्ञानरूपी अंधकार मिटाने के लिए हमारे प्रपन्न कुल (वह कुल जो पूर्ण रूप से भगवान के शरण हो गये हैं) के नाथ श्रीसरोयोगी (पोय्गै आळ्वार्)  स्वामीजी ने पूर्वकाल में, वेदांतों के निगूढ़ अर्थों तथा द्राविड  भाषा को मिलाकर, बत्ती बनाकर (मुदल तिरुवंदादि नामक प्रबन्धम) जो दीप जलाया, इसका अपने हृदय से ठीक धारण करनेवाले भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी हमारे नाथ हैं। 

पाशूर ९: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं जो श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य गुणों का संकीर्तन करते हैं, जो श्रीभूतयोगी स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों को अपने दिव्य मन में स्मरण करते हैं, वें इस संसार में वेदों की रक्षा कर उसे स्थापित करेंगें ।  

इऱैवनैक् काणुम् इदयत्तु इरुळ् केड ज्ञानं  एन्नुम्

निऱैविळक्कु एट्रिय भूदत् तिरुवडि ताळ्गळ् नेन्जत्तु

उऱैय वैत्तु आळुम् इरामानुसन् पुगळ् ओदुम् नल्लोर्

मऱैयिनैक् कात्तु इन्द मण्णगत्ते मन्नवैप्पवरे

सर्वस्वामी भगवान का साक्षात्कार पाने के उपकरण हृदय के अंधकार मिटाने के लिए (‘इरण्डाम् तिरुवंदादि’ नामक प्रबन्ध) पूर्ण दीप जलानेवाले श्री भूतयोगी स्वामीजी के श्रीपादों को अपने मन में सुदृढ़ प्रतिष्ठापित करके, उन्हींका अनुभव करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्यगुणों का ही नित्य अनुसंधान करनेवाले विलक्षण महात्मालोग वेदों की रक्षा भाह्योऔर कुदृष्टिवालो से कर उनको शाश्वत प्रतिष्ठापित भी करनेवाले हैं। 

पाशूर १०: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं जो श्रीमहामहिम श्रीमहद्योगी स्वामीजी के भक्त श्रीरामानुज स्वामीजी के परमभक्तों के पादभक्त हैं वास्तव में हीं नित्यश्रीमान है।

मन्निय पेरिरुळ् माण्डपिन् कोवलुळ् मामलराळ्

तन्नोडुम् आयनैक् कण्डमै काट्टुम् तमिळ्त् तलैवन्

पोन् अडि पोऱ्ऱुम् इरामानुसर्कु अन्बु पूण्डवर् ताळ्

सेन्नियिल् सूडुम् तिरुवुडैयार् एन्ऱुम् सीरियरे

पहले दो आळ्वारों ने दीप जलाकर (अपने प्रबन्ध से) विशाल और अविचलनिय अज्ञान को दूर किया। मिटाने अशक्त महान अंधकार के निवृत्त हो जानेपर तिरुक्कोंवलूर नामक दिव्यदेश के अधिपति ‘आयनार’ नामक भगवान को महालक्ष्मी के साथ दर्शनकर, उस दर्शन प्रकार का वर्णन करनेवाले द्राविड भाषा के सार्वभौम श्रीमहाद्योगी स्वामीजी के सुंदर श्रीपादों की स्तुति करनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के बारे में भक्ति करनेवालों के श्रीपादों को अपने सिरपर धारण करनेवाले भाग्यवान नित्यश्री-विभूषित हैं।

अगले अनुच्छेद में इस प्रबन्धम के अगले भाग पर चर्चा करेंगे।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/04/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-1-10-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – तनियन

Published by:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

http://divyaprabandham.koyil.org/wp-content/uploads/2018/11/thiruvarangathu-amudhanar.emperumAnAr-at-heart.jpg

मुन्नै विनैयगल  मूंगिल्  कुडियमुदन्
पोन्नम् कळर्क्कमलप्  पोदिरण्डुम्
एन्नुडैय सेन्निक्कणियागच् चेर्तिनेन् तेन्पुलत्तार्क्कु
एन्नुक् कडवुडैयेन् यान्

दास कहते हैं, मैंने श्रीरंगामृत स्वामीजी (जिन्होंने मूंगिल कुड़ी  {श्रेष्ठ कुल} वंश में जन्म लिया) के स्वर्ण जैसे दिव्य और  वांछनीय चरण कमलों को अपने मस्तक पर सजावटी आभूषण जैसे रखा ताकि समय समय पर जितने भी पाप मैंने इकट्ठा किये हैं वह लुप्त हो जायेँ। यह करने के पश्चात यमराज और उनके अनुयायी से किसी भी तरह मेरा सम्बन्ध न रहेगा। 

नयन्तरु पेरिन्बम् एल्लाम् पळुतु एन्रु नण्णिनर् पाल्

सयम् तरु  कीर्ति इरामानुस मुनि ताळिणै मेल्
उयर्न्द​ गुणत्तुत् तिरुवरंगत्तु अमुदु ओन्गुम् अन्बाल्
इयम्बुम् कलित्तुरैयन्दादि योद विशै नेञ्जमे 

श्रीरामानुज स्वामीजी वह हैं जो अपना आशिर्वादसे , जो यह समझने के पश्चात कि, इस संसार का सुख तुच्छ है, उनके शरण में आता है, उन्हें संसार पर विजय प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करतें हैं । हे हृदय! इस प्रबन्धम को गाने को स्वीकारों जो बड़ी कृपा और उबरते प्रेम से श्रीरंगामृत स्वामीजी जिनमें बड़े गुण हैं, द्वारा श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरणों पर प्रेम से रचा गया है। यह प्रबंध तमिल के “कलित्तुरै अंधादि” (तमिल पध्य जिसका पिछले पाशूर का अंतिम शब्द अगले पाशूर का प्रथम शब्द होता है।) शैली में है।   

सोल्लिन् तोहै कोण्डु उनदु अडिप्पोदुक्कुत् तोन्डु सेय्युम्
नल्लन्बर् एत्तुम् उन् नामम् एल्लाम् एन्तन् नाविनुळ्ळे

अल्लुम्  पहलुम् अमरुम्पडि नल्गु अऱुसमयम् 

वेल्लुम्  परम इरामानुस !  इदु एन् विण्णप्पमे

आपके भक्त वह है जो यह निश्चित करते हैं कि वें कुछ विशेष पाशुरों का हीं उच्चारण करेंगे और आपके श्रीचरणों में वाचीका कैंकर्य (प्राध्यापक की भाषा से सेवा) कर और उससे लाभ लेंगे। आप अपनी कृपा मुझ (पर बरसाते रहना ताकि सभी दिव्य नाम जो वें आपकी ओर बड़े प्रेम से ,दिन और रात में भेद देखे बिना सुनाते हैं वह मेरे जिव्हा पर नित्य वास करें। ६ भिन्न भिन्न दर्शनशास्त्र का अभ्यास रखनेवाले, जिसमे, वें जो वेदों में विश्वास नहीं करते थे और वें जो वेदों के विषय में गलत स्पष्टीकरण देते थे, ऐसे दोनों पर विजय प्राप्त करनेवाले आप श्रीरामानुज हैं। यही मेरी आपसे प्रार्थना हैं।   
अगले लेख में इस प्रबन्धम के अगले भाग पर चर्चा करेंगे।

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/04/iramanusa-nurrandhadhi-thaniyans-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

तिरुप्पावै – सरल व्याख्या – पाशुर २१-३०

Published by:

।।श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः।।

तिरुप्पावै

<< पाशुर १६ – २०

इस पाशुर से देवी यह अनुभव करवा रही है कि , भगवान् कृष्ण के प्रेम में मग्नता के, आनंद का अनुभव प्राप्त करने, नप्पिन्नै  पिराट्टी भी देवी के व्रतनुष्ठान में सम्मिलित हो जाती है ।

इक्कीसवाँ पाशुर :

इस पाशुर में देवी नन्द गोप के यहाँ, गोप कुल में भगवान् कृष्ण के जन्म का उत्सव मना रही है ।

वेदों के माध्यम से उनकी सर्वोच्चता और उनकी गुणवत्ता को महसूस कर रही है ।

एऱ्ऱ कलन्गळ् एदिर् पोन्गि मीदळिप्प
  माऱ्ऱादे पाल् सोरियुम् वळ्ळल् पेरुम् पसुक्कळ्
आऱ्ऱप् पडैत्तान् मगने अऱिवुऱाय्
  ऊऱ्ऱम् उडैयाय् पेरियाय् उलगिनिल्
तोऱ्ऱमाय् निन्ऱ सुडरे तुयिल् एळाय्
  माऱ्ऱार् उनक्कु वलि तोलैन्दु उन् वासल् कण्
आऱ्ऱादु वन्दु उन् अडि पणियुमा पोले
  पोऱ्ऱि याम् वन्दोम् पुगळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

उदार प्रवर्ति वाली, सदा लगातार दूध देने में सक्षम, जिससे दुग्ध के भंडारण के लिये रखे , सभी बर्तन दूध से भर भर कर बह जाता है, ऐसी गायें के अपार समूह के धनि, नन्द गोप के सूत अपनी गहरी दिव्य निद्रा से जागो ।

हे ! सर्वोच्च प्रामाणिक वेदों में वर्णित अपार शक्तियों के धनि । 

हे! ,वह जो महान है !  

हे , वह जो वैभवशाली है,

हे! वह जो इस दुनिया में सबके सामने खड़े है ।  

उठो ,  हम सब आपका गुणानुवाद करते, आपके द्वार पहुँच गये हैं  ।

वैसे ही जैसे आपके शत्रु परास्त होने के बाद, और कोई सहारा न देख , आपके दिव्य चरणों की शरण में आ जाते है ।

बावीसवाँ पाशुर:

इस पाशुर में आण्डाळ्  भगवान् से कहती है की, मझे और मेरी सखियों को आपके सिवाय और कोई सहारा नहीं है ।

हम आपके सामने विभीषण की तरह ही आयी हैं, जो शरणागत होकर रामजी के पास आया था ।

वह यह भी कहती है की, वह सब सारी इच्छायें का त्याग कर सिर्फ तुमको (कृष्ण) को पाने की ही इच्छा  रखते हैं ।

अन्गण् मा ग्यालत्तु अरसर् अभिमान
  बन्घमाय् वन्दु निन् पळ्ळिक् कट्टिल् कीळे
सन्गम् इरुप्पार् पोल् वन्दु तलैप्पेय्दोम्
  किण्किणि वाय्च् चेय्द तामरैप् पूप् पोले
सेम् कण् सिऱुच् चिऱिदे एम् मेल् विळियावो
  तिन्गळुम् आदित्तियनुम् एळुन्दाऱ् पोल्
अम् कण् इरण्डुम् कोण्डु एन्गळ् मेल् नोक्कुदियेल्
  एन्गळ् मेल् साबम् इळिन्दु एलोर् एम्बावाय्

हम सुन्दर और विशाल वसुधा के भूभाग पर शासन करने वाले राजाओं की तरह अपना अभिमान त्याग कर आपके छत्र के निचे एकत्र हुये है ।

क्या आप हम पर कृपा कटाक्ष नहीं डालोगे ?  आपके मुख कमल की चमक. झिलमिलाते आभूषणों की तरह है, अर्ध- खिले कमल के फूल के समान  हैं |

हे ! कमलनयन अपने सूर्य और चंद्र जैसे नेत्रों से हमें देखभर लोगे, तो हमारे सारे दुःख दूर हो जायेंगे ।

तेवीसवाँ पाशुर:`

इस पाशुर में भगवान् कृष्ण, देवी आण्डाळ्  के इतने दिनों के व्रत को देख, उन्हें इतने दिनों तक इंतज़ार करवाने के बाद पूछ रहे है, क्या इच्छायें है?

आण्डाळ कहती है आप अपनी शैया से उठिये, राजदरबार में, राजसी शान से सिंहासन पर विराजमान हो सभी दरबारियों के सम्मुख मेरी इच्छा पूछिये ।

मारि मलै मुळैन्जिल् मन्निक् किडन्दु उऱन्गुम्
  सीरिय सिन्गम् अऱिवुऱ्ऱुत् ती विळित्तु
वेरि मयिर् पोन्ग एप्पाडुम् पेर्न्दु उदऱि
  मूरि निमिर्न्दु मुळन्गिप् पुऱप्पट्टु
प्Oदरुमा पोले नी पूवैप् पूवण्णा
  उन् कोयिल् निन्ऱु इन्गने पोन्दु अरुळिक् कोप्पु उडैय
सीरिय सिन्गासनत्तु इरुन्दु याम् वन्द
  कारियम् आराय्न्दु अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

वह, जिनका रंगरूप नील लोहित रंग सा है, वह, जो वर्षा काल में अपनी गुफा में सो रहे सिंह की मानिंद,  जागने पर, अपनी पैनी आँखों से चहुँ  ओर देखते हुये, अपने शरीर को ऐसे फैलाता है की, उसकी सुगन्धित अयाल चहुँ  ओर फ़ैल जाती है , जो 

दहाड़ते हुये, अपनी शाही चाल से बहार आता है, आप उसी तरह अपनी निद्रा त्याग, बाहर  आपके महल के इस स्थान तक आइये , अपने प्रतिष्ठित सिंहासन पर बिराज, हम पर कृपा बरसाते हुये हमें हमारे यहाँ आने का उद्देश्य पूछिये ।

चौबीसवाँ पाशुर:

पेरिया आळ्वार की पालित पुत्री है, इस परिवार का ध्येय ही सदा भगवान का मंगलाशासन रहा है ।

भगवान को सिंह सी चाल से चलते हुये अपने सिंहासन पीठ पर विराजमान देख, देवी और उनकी सखियों ने भगवान का  मंगलाशासन किया ।

यहाँ देवी, सीता पिराट्टी, दंडकारण्य के ऋषि मुनि, पेरिया आळ्वार की तरह आत्मग्लानि  भी महसूस करती है कि  , भगवान् के इतने सुकोमल पाँव है, हमारे कारण उन्हें चलकर आना पड़ा ।

अन्ऱु इव्वुलगम् अळन्दाय् अडि पोऱ्ऱि
  सेन्ऱु अन्गुत् तेन्निलन्गै सेऱ्ऱाय् तिऱल् पोऱ्ऱि
पोन्ऱच् चगडम् उदैत्ताय् पुगळ् पोऱ्ऱि
  कन्ऱु कुणिला एऱिन्दाय् कळल् पोऱ्ऱि
कुन्ऱु कुडैया एडुत्ताय् गुणम् पोऱ्ऱि
  वेन्ऱु पगै केडुक्कुम् निन् कैयिल् वेल् पोऱ्ऱि
एन्ऱु एन्ऱु उन् सेवगमे एत्तिप् पऱै कोळ्वान्
  इन्ऱु याम् वन्दोम् इरन्गु एलोर् एम्बावाय्

इस पाशुर के द्रविड़ शब्द पोऱ्ऱि (पोररी) का अर्थ “चिरायु हो” होता है, जो मंगलाशासन में कहते है ।

हे! बहुत पहले देवों के लिये अपने चरणों से तीनों लोकों  को नापने वाले, आप चिरायु हो ।

हे! रावण की स्वर्ण लंका में जाकर उसे नष्ट करने वाले, आपका बल सदा बना रहे ।

हे! शकटासुर को लात मारकर मारने वाले .आपका यश सदा बना रहे । 

हे!  धेनुकासुर को उठाकर जंगली बासों में फेंक उसे और जंगल में रहने वाले राक्षस का संहार करने वाले , आपके  चरण सदा  चिरायु  हो । 

हे ! गिरी गोवेर्धन को छत्र की तरह धारण करने वाले, आपमें  शुभ गुण सदा विराजमान रहे ।

हे !  उस चक्रराज का भी मंगल हो, जो आपके हाथ में शोभित है, जो आपके दुश्मनो का नाश करता है ।

देवी  ने कहा हम यहाँ आपके वीरत्व सौम्यत्व करुणा का गुणानुवाद और मंगलाशासन करने आयी हैं , हम पर कृपा करते हुये, आपके कैंकर्य में रत रहने की शक्ति हमें प्रदान करिये ।

पच्चीसवां पाशुर:

इस पाशुर में भगवान् पूछते हैं  क्या उन्हें व्रत के लिये कोई वस्तु चाहिये?  वह कहती है आपके मंगलाशासन करने से उनके सारे दुःख कष्ट दूर हो गये, बस सिर्फ कैंकर्य की इच्छा बाकि है ।

ओरुत्ति मगनाय्प् पिऱन्दु ओर् इरविल्
  ओरुत्ति मगनाय् ओळित्तु वळरत्
तरिक्किलानागित् तान् तीन्गु निनैन्द
  करुत्तैप् पिळैप्पित्तुक् कन्जन् वयिऱ्ऱिल्
नेरुप्पेन्न निन्ऱ नेडुमाले उन्नै
  अरुत्तित्तु वन्दोम् पऱै तरुदि आगिल्
तिरुत्तक्क सेल्वमुम् सेवगमुम् याम् पाडि
  वरुत्तमुम् तीर्न्दु मगिळ्न्दु एलोर् एम्बावाय्

घनघोर अँधेरी रात में देवकी के यहाँ अवतार लेकर, यशोदा के पुत्र बन पलते रहे, पर कंस यह बर्दाश्त न कर ,अपनी दुर्बुद्धि लगाकर आपको मारने के कई यत्न किये । आप उसकी पेट की अग्नि बन, उसके विचार और उसको ही नष्ट कर दिये । हम यहाँ आपके पास अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करने आयी हैं  ।

आप हमारी  प्रार्थना सुन उसे पूर्ण करोगे तब हम आपके लिये, ऐसा मंगलाशासन करेंगी कि , पिराट्टी भी उसे पसंद करेंगी, हम भी आपसे बिछडाव के दुःख से दूर हो जायेंगी ।

छब्बीसवाँ पाशुर :

पहले पाशुर में भगवान् के पूछने पर कुछ नहीं होना कहती है, पर इस पाशुर में देवी उन सभी वस्तुओं की मांग करती है, जो उन्हें उनके व्रत में चाहिये थी ।

जैसे भगवान की सेवा में रत पाञ्चजन्य जैसा शंख, जिससे मंगलाशासन का नाद कर सके ।

एक दीपक जिससे भगवान का मुख निहार सके ।

एक ध्वजा जो भगवान की उपस्तिथिति निश्चित करता है ।

एक छत्र जिससे भगवान को धुप, हवा पानी में, इसकी ओट में रह सके ।

हमारे पूर्वाचार्यों ने इन पाशुरों का अनुभव करते कहते है की, देवी ने कृष्णानुभव करने इन सब चीजों की मांग रखी थी ।

माले मणिवण्णा मार्गळि नीर् आडुवान्
  मेलैयार् सेय्वनगळ् वेण्डुवन केट्टियेल्
ग्यालत्तै एल्लाम् नडुन्ग मुरल्वन
  पाल् अन्न वण्णत्तु उन् पान्चसन्नियमे
पोल्वन सन्गन्गळ् पोय्प्पाडु उडैयनवे
  सालप् पेरुम् पऱैये पल्लाण्डु इसैप्पारे
कोल विळक्के कोडिये विदानमे
  आलिन् इलैयाय् अरुळ् एलोर् एम्बावाय्

हे ! भक्तों के प्रति स्नेह रखने वाले ।

हे ! नील रत्न के समान रंगवाले ।

हे ! प्रलयकाल में वटपत्र पर वटपत्रशायि बन शयन करने वाले ।

अगर आप पूछ रहे है, हमें मार्गशीर्ष माह में व्रत के लिये क्या क्या चाहिये , तो हमें पूर्वजो ने जैसे किये वैसे ही हम करना चाहती है ।

हमें वैसे ही दूधिया श्वेत पाञ्चजन्य जैसे, नाद करनेवाले शंख चाहिये, जिसके नाद से संसार कम्पित हो जाये ।  हमें ऐसे बजाने वाले यन्त्र चाहिये जो बड़े और विशाल हो ।

हमें ऐसे परिकर चाहिये जो तिरुप्पल्लाण्डु गाये ।

हमें दीपक, ध्वजा और छत्र चाहिये ।

सत्ताइसवें और अट्ठाईसवें पाशुर में देवी यह प्रमाणित करती है की, स्वयं एम्पेरुमान (भगवान) ही एक मात्र उपेय और उपाय है । भगवद कैंकर्य कर उन्हें प्राप्त करना ही एक मात्र लक्ष्य है ।

सत्ताईसवाँ पाशुर :

आण्डाळ्  इस पाशुर में  एम्पेरुमान (भगवान) के, अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही प्रकार के जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने के विशिष्ट गुण बतलाती है ।

कहती है की परम पुरुषार्थ सायुज्य मोक्ष (बिना बिछुड़े सदा भगवान की नित्य सनिद्धि में, उनके कैंकर्य में रहना) की प्राप्ति है ।

कूडारै वेल्लुम् सीर्क् गोविन्दा उन्दन्नैप्
  पाडिप् पऱै कोण्डु याम् पेऱु सम्मानम्
नाडु पुगळुम् परिसिनाल् नन्ऱाग
  सूडगमे तोळ् वळैये तोडे सेविप्पूवे
पाडगमे एन्ऱु अनैय पल् कलनुम् याम् अणिवोम्
  आडै उडुप्पोम् अदन् पिन्ने पाल् सोऱु
मूड नेय् पेउदु मुळन्गै वळिवार
  कूडि इरुन्दु कुळिर्न्दु एलोर् एम्बावाय्

हे गोविन्द ! न मानने वालों के भी मन को जीत  लेने का आपका यह गुण, आपके ऐसे गुणों के गुणानुवाद से हमें सम्मान मिलता है ।

आपके कैंकर्य से हमें भांति भांति के आभूषण धारण को मिलते है, जैसे कंगन, बाजूबन्द, कुण्डल, कान में ऊपर की तरफ पहना जाने वाला आभूषण , पायल और भी अन्य, जो नप्पिन्नै  पिराट्टी और आप हमें प्रसादित करते है ।

हम सब आप द्वारा प्रसादित वस्त्र धारण कर, हम सभी घी से तर अक्कारवड़ीसल (एक मीठा अन्न जो चांवल, दूध, गुड़ और घी के मिश्रण से बनता है) पायेंगे, जिसे पाते समय घी, हथेलियों से निकल कोहनियों से बहा रहा होता है ।

अट्ठाईसवाँ पाशुर:

इस पाशुर में देवी आण्डाळ् अकारणकरुणावरुणालय का जीवात्मा से सम्बन्ध समझा रही है ।

देवी का अन्य उपाय से परे होकर, भगवान् की वृन्दावन की गायों की तरह बिना किसी द्वेष के, सब के उत्त्थान के गुण बतला रही है ।

कऱवैगळ् पिन् सेन्ऱु कानम् सेर्न्दु उण्बोम्
  अऱिवु ओन्ऱुम् इल्लाद आय्क्कुलत्तु उन्दन्नैप्
पिऱवि पेऱुन्दनैप् पुण्णियम् याम् उडैयोम्
  कुऱै ओन्ऱुम् इल्लाद गोविन्दा उन् तन्नोडु
उऱव्Eल् नमक्कु इन्गु ओळिक्क ओळियादु
  अऱियाद पिळ्ळगळोम् अन्बिनाल् उन्दन्नैच्
चिऱु पेर् अळैत्तनवुम् सीऱि अरुळादे
  इऱैवा नी ताराय् पऱै एलोर् एम्बावाय्

हे सर्व मंगलकारी गोविन्द ! हम गायों के पीछे पीछे वन में जायेंगे,वहाँ उन्हें चराकर, संग संग भोजन पायेंगे ।

हे! भगवान, इस ज्ञान  हीन् गो-कुल में आपका जन्म हमारा सौभाग्य है ।

हमारा आपसे जो रिश्ता है, उसे न तो तुम तोड़ सकते है और न हम।

हमसे नाराज़ मत होना क्योंकि, हमने अपने स्नेह के वश आपको तुच्छ नामों से पुकारा है।

जो हम चाहते हैं हमें प्रसादित कर, हमें अनुग्रहित करें।  

उन्तीसवाँ पाशुर:

इस पाशुर में देवी यह कहती है की कैंकर्य वह अपनी ख़ुशी के लिये नहीं बल्कि एम्पेरुमान की ख़ुशी के लिये करना चाहती है।

बतलाती है, कृष्णानुभव की तीव्र इच्छा के चलते ही, बहाने से  इस व्रत को धारण किया है।

सिऱ्ऱम् सिऱु काले वन्दु उन्नैच् चेवित्तु उन्
  पोऱ्ऱामरै अडिये पोऱ्ऱुम् पोरुळ् केळाय्
पेऱ्ऱम् मेय्त्तु उण्णुम् कुलत्तिल् पिऱन्दु नी
  कुऱ्ऱेवल् एन्गळैक् कोळ्ळामल् पोगादु
इऱ्ऱैप् पऱै कोळ्वान् अन्ऱु काण् गोविन्दा
  एऱ्ऱैक्कुम् एळेळ् पिऱविक्कुम् उन्दन्नोडु
उऱ्ऱोमे आवोम् उनक्के नाम् आट् सेय्वोम्
  मऱ्ऱै नम् कामन्गळ् माऱ्ऱु एलोर् एम्बावाय्

हे गोविन्द ! आप सुनिये, हम सब प्रातः ही, यहाँ आकर आपके वांछनीय स्वर्ण कमल जैसे दिव्य चरणों को नमन कर मंगलाशासन करती हैं । 

गो-कुल में जन्म लेने वाले हे गोविन्द, हमारी गायों को चराकर प्रसाद पाते हो आपको हमारी सेवायें प्राप्त करनी चाहिये।

हम यहाँ वाद्य यंत्र, और ढोल लेने नहीं आयी हैं । 

चाहे कोई भी  जन्म रहा हो, आपका हमारा अनादिकाल से सम्बन्ध है।

हम सिर्फ आपका ही कैंकर्य चाहती  हैं ।

आप यह कदापि न सोंचे, यह सब कुछ हमारी ख़ुशी के लिये कर रही  हैं । 

आप हम पर ऐसी कृपा करें, यह  कैंकर्य केवल आपको प्रसन्न करने के लिये ही है।

तीसवाँ पाशुर:

भगवान के इच्छापूर्ति का वचन देने के बाद, देवी गोदा गोकुल की गोपिका का भाव छोड़  स्वयं के लिये यह पाशुर गाती है।

यहाँ देवी आण्डाळ्  कहती है कि जो कोई भी इन पाशुरों का गायन, भाव या अ-भाव में भी करेगा वह, गोदा की तरह भगवान का कैंकर्य प्राप्त करेगा, बिलकुल उसी तरह जैसे गोप बालिकाएं वृन्दावन में कृष्ण के साथ रहती थी।

देवी आण्डाळ् ने श्रीविल्लिपुत्तूर को ही गोकुल/वृन्दावन मान गोपिका भाव से रह रही थी।

पराशर भट्टर (कुरेश स्वामीजी, भगवत रामानुज स्वामीजी के प्रमुख शिष्य के पुत्र)  ने कहा जैसे गाय भूसा भरे अपने मृत बछड़े को देख कर भी दूध दे देती है, वैसे ही यह तीस पाशुर भगवान् को अति प्रिय है इस कारण इन्हे गाने वाले को वही फल प्राप्त होगा जो फल भगवान के प्रिय जनों   को मिलता है। 

देवी आण्डाळ् प्रबंध को समुद्र मंथन की एक घटना का जिक्र करते हुये संपन्न करती है।

ग्वाल बालिकाओं ने भगवान को प्राप्त करना चाहा, भगवत प्राप्ति के लिये पिराट्टी का पुरुषकार अनिवार्य है। भगवान ने समुद्र मंथन, माता महालक्ष्मीजी को समुद्र से बाहर लाकर उन्हें वरने के लिये किये थे।

इस तरह इस घटना को कहते हुये देवी आण्डाळ् अपना प्रबंध सम्पूर्ण करती है।

देवी आण्डाळ् आचार्याभिमान को जतलाते स्वयं को भट्टरपिरान् की पुत्री कह बतलाती है।

वन्गक् कडल् कडैन्द मादवनै केसवनै
  तिन्गळ् तिरु मुगत्तुच् चेळियार् सेन्ऱिऱैन्जि
अन्गप् पऱै कोण्ड आऱ्ऱै अणि पुदुवैप्
  पैन्गमलत् तण् तेरियल् भट्टर्पिरान् कोदै सोन्न
सन्गत् तमिळ्मालै मुप्पदुम् तप्पामे 
  इन्गु इप्परिसु उरैप्पार् ईरिरण्डु माल् वरैत् तोळ्
सेन्गण् तिरुमुगत्तुच् चेल्वत् तिरुमालाल्
  एन्गुम् तिरुवरुळ् पेऱ्ऱु इन्बुऱुवर् एम्बावाय्

सागर मंथन करवाने वाले भगवान् केशवन (एम्पेरुमान) जो इस ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्ति है।

चंद्रमुखी सी ग्वालबालायें, विशिष्ट आभूषण धारण कर उन भगवान की पूजा कर , उसका फल  गोकुल में पाती है।

देवी आण्डाळ्,  पेरियाळ्वार की पुत्री, जिनके पास कमल पुष्पों की माला है। श्रीविल्लिपुत्तूर में अवतरित हो, कृपा करते हुये भगवान कृष्ण का अनुभव प्राप्त करती गोपबालिकाओं की कथा कही है।

इन पाशुरों को संगोष्ठियों में, इस तरह गायन से उन भगवान् जिनके विशाल पर्वतों की तरह दिव्य कंधे हैं, लालिमा लिये दिव्य नेत्रों वाला एक दिव्य चेहरा है (आँखों की लालिमा भक्तों के प्रति स्नेह को दर्शाती हैं)  ऐसे लोग हर जगह आनंदित रहेंगे।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/thiruppavai-pasurams-21-30-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org