Author Archives: narasimhantsl

उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ४-५

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ३                                                                                                                               श्लोक ६

श्लोक ४-५

तत: कनकपर्यङके तरुणाध्युमणिध्युतौ |
विशालविमलश्र्लक्षणतुंगतूलासनोज्ज्वले ||  

समग्रसौरभोदारनिरंतरदिगंतरे |
सोपधाने सुखासीनं सुकुमारे वरासने ||        

शब्दश: अर्थ

तत:                                                      : उसके पश्चात
तरुणाध्युमणिध्युतौ                               : चमक के साथ जैसे सूर्य कि सुबह कि किरणे
विशालविमलश्र्लक्षणतुंगतूलासनोज्ज्वले  : चौड़ा, दागरहित, चिकना और रुई के गद्दे के जैसे मोटा समग्रसौरभोदारनिरंतरदिगंतरे                 : भगवान को बहुत पुष्प अर्पण करना और उसकी सुगंध चारों दिशावों में                                                                          फैलाना
सोपधाने                                                : उस पर सोने के लिये तकिये
कनकपर्यङके                                          : सुवर्ण गद्दा
सुकुमारे                                                 : बहुत चिकना
वरासने                                                  : शुद्ध घास, हिरण के चमड़े और कपड़ो से बना आसन
सुखासीनं                                               : आराम से विराजमान होना
तम                                                       : उन् मणवाल मामुनि को
चिंतयामि                                              : मे हमेशा ध्यान करता हूँ।

व्याख्या

इस श्लोक में अप्पा श्रीवरवर मुनि स्वामीजी कि प्रशंसा करते है जो बड़े लालित्य होकर सुवर्ण पलंग पर श्रीरामानुज स्वामीजी का ध्यान करते बैठे है जो पञ्चोमपाय निष्ठा के लक्ष है और जो सभी विषयों के उनके सरल, पाडित्यपूर्ण वार्ता से उनके शिष्यों को आनंदित करता है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी जो इधर विराजमान है उनकी सुंदरता और लालित्य को दर्शाता है। हालाकि सन्यासियों को सुवर्ण पलंग पर बैठना निषेध है परन्तु शिष्यों के अनुरोध करने से उन्हें मना भी नहीं किया जा सकता। सन्त सोने, चांदी, ताम्बे, bell metal, पाषाण आदि से बने हुए पात्र में प्रसाद लेना पाप मानते है। मेधति कहते अगर सन्त अपने शिष्य से ऐसी वस्तुए मांगते भी हैं तो उन्हें दु:ख होता है और यहाँ यह कहा गया है कि स्वयं अपने उपयोग के लिये पलंग नहीं मांगना परन्तु शिष्य के आग्रह करने पर उपयोग करना गलत नहीं है। कोई अपने लिये सोने चांदी कि चाह ठुकरा सकता है परन्तु अगर शिष्य कि इच्छा हो तो उपयोग करने से इनकार नहीं कर सकता है। इसलिये श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के लिये सोने कि पलंग का उपयोग करना गलत नहीं है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ३

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २                                                                                                                                 श्लोक ४-५

श्लोक  ३

सायन्तनम तत: क्र्त्वा सम्यगरधनम हरे:
स्वैरालापै: सुभै स्रोत्रुन नन्दयन्तम न्मा मि तम ||  ()

शब्दश: अर्थ

तत:                 : सायंकाल में संध्या वन्दन करने के पश्चात
सायन्तनम       : सायंकाल के अनुकूल
हरे: आराधनम  : अरंगनगर अप्पन कि तिरुआराधनम में उनके व्यक्तिगत अर्चा भगवान
सम्यग            : पूरे विवरण और गहरी भक्ति के साथ
क्र्त्वा               : पालन करते है
सुभै                : शुभ
स्वैरालापै:       : उनका खुदका साधा मधुर इच्छित उच्चारण
स्रोत्रुन             : दर्शक, सुननेवाले
नन्दयन्तम     : रमणीय
तम                : जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी
न्मा मि          : मैं  पूजा करता हूँ

व्याख्या

उपदेश रत्नमाला के ५५ छन्द के अनुसार “आर वचनभूषणत्ति नाल पोरुलेल्लामरिवार? आरदु शोन्नेरिलनुष्ठिप्पार?”…श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने शिष्य को कितनी भी सरल भाषा में तत्त्वों को समझाये लेकिन श्रीवचन भूषण के विचार को निभाना कठिन है और उससे ज्यादा कठिन उसे पालन करना है; क्योंकि अर्थों में उलझन होने के कारण शिष्यों को शिक्षा देना भी उतना ही कठिन दिखायी पड़ता है। स्वामीजी उपदेश के पश्चात सायंकाल संध्यावंधन और आरती को सरल भाषा में कहते है। यह वह स्वैरालापै: है जिसके उपदेश में सब शास्त्र है और वह स्वैरालापै: सरल तरिके में है । श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने शिष्यों को बहुत स्पष्ट और सरल उपदेशों से प्रसन्न करते है। यहाँ हरी अरंगनगराप्पन जो पूर्व दिनचर्या का १७वां श्लोक “रंगनिधि” है उसको दर्शाता है । ‘हरी’ यानि वह जो भक्तों के बाधाओं को मिटाता है और वह जो दूसरे सभी देवताओ को नियुक्त और नियंत्रण करता है । पूर्व दिनचर्या के १७वें श्लोक में ‘अथ रंगनिधि’ सुबह कि आराधना, २९वें श्लोक में ‘आराध्य श्रीनिधीम’ भगवद आराधना और इस श्लोक में सायंकाल आराधना बताया गया है इससे हमें यह समझना चाहिये कि यह बताता हैं कि स्वामीजी भगवान की तीनों तिरु आराधना करते थे।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – २

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १                                                                                                                                 श्लोक ३

श्लोक 

अथ गोष्ठिम्  गरिष्ठानाम् अधिष्ठाय सुमे धसाम् |
वाक्यालङ्क्रुति वाक्यानि व्याख्यातारम  नमामि म्  ||

शब्दश: अर्थ

अथ                                : यतिराज विंशति को रचने के पश्चात
गरिष्ठानाम्                    : एक जो अपनी रचनायें तैयार करने मे और आचार्य के दर्जे को संभालने के लिए सक्षम है
सुमेध्साम्                       : वास्तव में बुद्धिमान और धार्मिक
गोष्ठिम्                         : सभा
अधिष्ठाय                      : यह प्राप्त करना
वाक्यलङ्क्रुति वाक्यानि   : श्रीवचन भूषण के वाक्यों में
व्याख्यातारम                 : समझता हूँ
तम                               : उन श्रीवरवर मुनि स्वामीजी कि
नमामि                          : आराधना करता हूँ

व्याख्या

ग्रन्थ कि रचना के लिए अब तक स्वाध्याय विस्तृत तरिके से किया गया इसलिये अब वें आचार्य के महान कार्य की व्याख्या को समझाने के लिए दूसरे स्वाध्याय को पहिले के जैसे विस्तृत कर रहे है। करिश्थ = अध्यंतम कुरवक करिश्थ = श्रेष्ठ आचार्य।“सुमेधस:” उनके लिये पदवी है। अर्थो को एक ही बार सुनकर पहचानना, सिखे हुए विचारों को याद करने को मेधा कहते है। सुमेधस: जिसके पार अत्युतम मेधा है। इधर सुमेधा कौन है? कोइल कांतादै अन्नन, वानमामलाई जीयर और अन्य अष्ठ दिग्गज। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी जो अब तक योगा में स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी कि पूजा करते थे अब सब कुछ त्याग कर शिष्यों के साथ बैठकर श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र को समझा रहे है। श्री देवराज स्वामीजी कहते है मैं ऐसे संत कि पूजा करत हूँ। श्रीवचन भूषण = एक आभूषण जो मणि और हीरा से बना है वह है रत्न भूषण। श्रीपिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित जिसमे उनके स्वयं के थोड़े ही शब्द है परन्तु दूसरे आचार्य की उच्च शब्द रचना है जो पाठक को प्रकाश दिखाता है वह है श्रीवचन भूषण। क्योंकि यह ग्रन्थ बहुत व्यवस्थित है उसके विषय सूची और शैली में श्रीवरवर मुनि स्वामीजी उसे बहुत सम्मानित तरिके से समझाते है उसके अर्थ को समझे जैसे बनाते है। वह जिनका अर्थ मालूम न था ऐसे शब्दों और पंक्तियों को तोड़कर समझाते है, ताकि वह विषय आसानी से समझ सके और जहाँ शंका हो वहाँ प्रश्न उठाकर उसका उत्तर दे सके। सुमेधस: करिश्था…..ऐसा कहकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी जो बड़े ज्ञानि जैसे कोइल अन्नन को भी जानना मुश्किल हैं ऐसे श्रीवचन भूषण के कठिन विचार समझाते है और यह कार्य का विचार बहुत गहरा है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कि मेधा हमें उसे पालन करने में आसान करती है।

क्योंकि श्रीवचन भूषण में वेद, स्मृति, इतिहास, पुराण, दिव्य प्रबन्ध आदि का सारा सार है इस एक ग्रन्थ को समझाना बाकी सब पुराने ग्रन्थ को समझाने के बराबर है और इसलिये श्रीवरवर मुनि स्वामीजी ने इस अनोखी ग्रन्थ को समझाते हुए स्वाध्याय का हीं पालन किया।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय                                                                                                                                   श्लोक २

श्लोक १

इति यति कुल धुर्य मेध मानै श्रुति मधुरैउदितै प्रहर्षयन्तं |
वरवर मुनिमेव चिन्ययन्ति मतिरियमेति निरत्ययम प्रसादं ||

शब्दार्थ:

इति                  : “श्रीमाधवांघ्रि” से “विज्ञापनम” तक व्यक्त किये अनुसार
मेध मानै           : नित्य अधिक विकसित होना
श्रुति मधुरै         : सुनने के लिये सुहावना
उदितै                : अभिव्यक्ति
यतिकुल धुर्य     : सन्यासियों में श्रेष्ठ श्रीरामानुज स्वामीजी
प्रहर्शयन्तम      : उनको सुखद करने के समय
वरवर मुनिमेव  : श्रीवरवर मुनि स्वामीजी मे स्थिर करते समय
मतिरियमेति    : मेरा मन चित
निरत्ययम       : स्थायी रूप से
प्रसादम यति    : स्पष्टता प्राप्त करता है

व्याख्या

श्री देवराज स्वामीजी (श्री एरुम्बियप्पा) दिलासा दिये और आनंदित हुए कि उनका मन प्राप्त हो और जो न प्राप्त हो ऐसे विषयों में अभी तक कष्ट में डुबा हुआ था वह अब केवल श्री वरवर मुनि स्वामीजी के बारें में हीं सोचता है जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी में खुशी से गोता लगाया और श्री यतिराज विंशति भेंट दि और उनके अशांति से मुक्त हुए और शांति प्राप्त कि। “वरवरमुनि एव” वर्णन करके वह यह कहते हैं यह खुशी उन्हें यतिराज के बारें में विचार करके नहीं बल्कि श्री वरवरमुनि स्वामीजी के बारें में सोचकर हुई है जिन्होंने श्रीयतिराज को अपने स्तोत्र सुनाकर आनंदित किया। भगवान या भागवतों या आचार्यों के विचारों से उपर उठकर श्री वरवरमुनि स्वामीजी जो आचार्य के प्रति भक्ति रखते है की जो श्रेष्ठ और स्थिर है उनके बारे मे सोचकर मानसिक स्पष्टता प्राप्त कर सकते है। हालाकि यह पद्य छोटा हैं केवल २० पदों के साथ यह संपूर्णता “मेध मानै” शब्द से दर्शाया गया है जो अधिक जैसे लगता है परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा से जो यह श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के हरेक पद को हजार पध्य के समान समझते है।

महात्मा जन हमारा छोटे चीज के लिये भी उनके प्रति प्यार बहुत बड़ा और अमूल्य समझते है।  “प्रहर्शयन्तम” शब्द में हर्ष प्रगट होता है, “हर्ष” शब्द के पिछे “प्र” लगाया गया है जो श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के प्रति प्रसन्नता को दर्शाता हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी की  प्रसन्नता श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के प्रति केवल श्रद्धा है और श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने आचार्य के प्रसन्नता से कोई सांसारिक लाभ लेनेका सोच भी नहीं सकते। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी “चिन्ययन्ति” शब्द से हमेशा श्रीरामानुज स्वामीजी के बारें में विचार करते है और अनूठे रूप से चिन्ययन्ति जो गोपी है उनके साथ तुलना करते है जो हमेशा भगवान श्रीकृष्ण या श्रीशठकोप स्वामीजी के बारें में सोचती रहती है ज्यो की उनके भगवान के प्रति अगाध प्रेम के कारण दीर्घ चिन्ययन्ति से जाना जाता है । यहाँ शब्दों को तीन भागों में बाँटा गया है… स्रुति मधुरै उदितै। यह स्रुतिमधुरै और उदितै ऐसा भी बाँटा जा सकता हैं जब की रुदीतै का अर्थ रोना है। “अल्पापी मे” छन्द से श्रीवरवर मुनि स्वामीजी ज्यादातर अपनी अज्ञानता, निष्ठा में कमी के बारे में बात कर रहे है और “हा हंत हंत” कहकर रोते है अपना दर्द समझाते है और जैसे रोना हमेशा स्वदीप्तिमान कि तरफ ले जाता है हम “रुदितै” शब्द का इस्तेमाल कर सकते है। मोक्ष के लिये रोना सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी प्रसन्न होंगे यह कहना क्या अवश्यक है? इसलिये श्रीवरवर मुनि स्वामीजी “रुदितै” शब्द का उपयोग करते है। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी संस्कृत में जो कहे है उसे यतिराज विंशति और तमिल में आर्ति प्रबन्ध कहते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ३२

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ३१

श्लोक ३२

ततश्शुभाश्रये तस्मिन्निमग्मं निभृतं मनः
यतीन्द्रप्रणवं कर्तुम् यतमानम् नमामि तं ३२॥

शब्दार्थ

ततः               – योग का अभ्यास के बाद अन्यथा जिसे भगवान का ध्यान कहते है,
तस्मिन्          – पूर्व मे जिस प्रकार कहा गया,
सुभाश्रये         – वो परमपुरुष भगवान जिनका ध्यान योगी करते है,
निमग्नम्        – पूर्णरूप से निमग्न,
निभृतम्          – निष्ठा से,
मनः               – अपने मन को,
यतीन्द्रप्रणवम् – श्री यतिराज (यतीन्द्र) पर अत्यन्त अनुरक्त होकर,
यतमानम्       – कोशिश करते हुए,
तम्                – ऐसे श्री वरवरमुनि ,
नमामि           – मै भजता हूँ ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

यहाँ यतीन्द्रप्रणवंकर्तुम् अर्थात यतीन्द्रप्रवणमेवकर्तुम् । माने श्री वरवरमुनि ने सारे नित्यकर्मानुष्ठान जैसे भगवदभिगमन और अन्य विधियाँ को श्री यतिराज के दिव्यचरणकमलों का ध्यान करते हुए सम्पूर्ण किया जो सौलह्वे श्लोक मे पूर्व ही प्रतिपादित है – “यतीन्द्रच्चरणात् द्वन्त प्रवणेनैव चेतसा” । अतः आप श्रीमन ने अपने प्रिय श्री-भविष्यदाचार्य-श्रीरामानुजाचार्य की प्रतिमा का ध्यान किया ।  भगवान का वह दिव्यमंगलस्वरूप जिसका केवल स्मरण मात्र से सर्वदुःखों का नाश होता है, जो ध्यान के योग्य है और ध्यानावस्था को प्रभावित करता है, ऐसा स्वरूप हमारे श्री वरवरमुनि को अपनी ओर आकर्शित कर रहा है । केवल चरमपर्व (आचार्याभिमान – पंञ्चमोपाय) के उपाय के आधारपर अगर श्री एरुम्बियप्पा श्री वरवरमुनि को भजते है , तो वह आसानी से चरमपर्व को सिद्ध करते है और इसी कारण उन्होने “यतीन्द्र प्रवणम् कर्तुम् यतमानम् नमामि तम्” का प्रयोग किया है ।

जीयर तिरुवडिगले शरणम
पूर्व दिनचर्या सम्पन्न

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ३१

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ३०                                                                                                 श्लोक ३२

श्लोक ३१

अब्जासनस्थमवदातसुजातमूर्तिं   आमीलितक्षमनुसंहितमन्त्ररत्नम्
आनम्रमौलिभिरुपासितमन्तरंगैः  नित्यम् मुनिम् वरवरम् निभृतो भजामि ३१॥

शब्दार्थ

अब्जासनस्थम्             – (वह) जो भगवान का ध्यान करने हेतु पद्मासन मे बैठे हुए है,
अवदात सुजात मूर्तिम्   – (वह) जिसका शरीर अत्यन्त सुन्दर और रमणीय है और जिसका रंग गाढे दूध के समान है,
आमीलित लक्षम्           – जिनके नेत्र थोडे थोडे बन्द है (जो भगवान का दिव्यमंगलस्वरूप के ध्यान करने के कारण अपने                                       नेत्रों को थोडा सा बन्द किया है और यही उनके नेत्रों को शामक दे रहा है),
अनुसम्हित मन्त्ररत्नम्  – ध्यानावस्था मे धीरे और गुप्त रूप से मन्त्ररत्न (द्व्यमहामन्त्र) का जप कर रहे है,
आनम्रमौलिभिः             – (जिसने) पूजा करते समय पूर्ण रूप से अपने मस्तिष्क को झुका दिया है,
अन्तरंगैः                      – अपने आन्तरिक भगवद्बन्धुवों (जैसे कोइल् अण्णन्, प्रतिवादिभयन्करम् अण्ण और अन्य                                           शिष्यों) के साथ,
उपसितम्                     – (जो) हर वक्त पूजा कर रहे है, वरवरम् मुनि – मणवाळमहामुनि,
निभृतस्सन्                  – गंभीरता/दृढता से,
नित्यम् भजामि            – नित्य भजता हूँ

भावार्थ (टिप्पणि) –

यहा ज्ञात किया जा रहा है की विश्वामित्रजी ने योग के विषय मे इस प्रकार कहा है – कि एक योगी को ऐसी जगह मे योगसिद्ध करना चाहिये जहाँ ज़्यादा तेज़ हवा ना चलती हो, जहाँ उतार चढाव ना हो, और वह जगह सुन्दर सुशील हो । वहाँ लकडी के आसन को रखकर अपने सर्वांगों को नियन्त्रित कर आसन पर स्वच्छ कपडे, मृगचर्म और घास को फैलाकर उसपर बैठकर भगवद्ध्यान करना चाहिये । धर्मशास्त्र के अनुसार एक योगी को अपने दोनो नेत्रों को अपने नाक के अग्रभाग मे केन्द्रित कर ध्यान करना चाहिये । श्री विष्णु तत्व मे कहा गया है – (ऐसे) योगी (जो) परमात्मा रूपी भगवान के दिव्य गुणों से संबन्धित मन्त्रों के ध्यान से मन्त्रमुग्ध होकर जिसके नेत्र अश्रु से भर गये हो और अश्रु की धारा बह रही हो, (जो) भगवान के अधीन हो, और ऐसी अनुभूति का रसास्वादन कर रहा हो वह सदैव हर किसी से देखने योग्य है ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – ३०

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २९                                                                                                   श्लोक ३१

श्लोक ३०

ततश्चेतस्समधाय पुरुषे पुष्करेक्षणे
उत्तंसितकरद्वन्द्वमुपविष्टमुपह्वरे ३०॥

शब्दार्थ

ततः               – प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात,
पुष्करे एक्षणे   – परमपुरुष कमलनयन श्री कृष्ण भगवान को,
चेतः समाधाय – एक चित्त/ दृध होकर,
उत्तम्सित करद्वन्दम् यदा तदा – अपने दोने हाथों को सर के उपर रखकर नमस्कार करते हुए,
उपह्वरे           – एकान्त जगह मे,
उपविष्टम्       – (पूजा करते हुए) मणवाळमहामुनि जो पद्मासन जैसे योगासन मे बैठे है ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

अनुयाग (भोजन) के पश्चात, शास्त्र कहता है – परमात्मा का ध्यान करना चाहिये । इस श्लोक मे यही बताया जा रहा है । जैसे भगवदाराधन तीन बार किया जाता है उसी प्रकार योगाभ्यास भी तीन बार किया जाता है और आगे इसी को बताया गया है । योग माने एक चित्त होकर, बिना हस्तक्षेप के, अपने हृदय मे परमात्मा के दिव्यमंगलस्वरूप का ध्यान करना । भगवान परमात्मा के रूप मे सर्व योनियों जैसे मनुष्य, स्वर्ग के देवगण, पशु, पक्षि इत्यादि मे व्याप्त है । इसी को हम श्री भगवान विष्णु की प्रत्येक विषयवस्तु मे सर्वव्यापकता कहते है । इसी विषय मे श्री पराशरमुनि कहते है – योगाभ्यास करने वालों को अपने हृदय मे परमात्मास्वरूपी अर्चाभगवान का ध्यान करना चाहिये । तैत्त्रियोपनिषद कहता है – ये वही भगवान है जिनका दिव्यमंगल-परमात्मा-स्वरूप हृदय के बींच मे विराजमान है और वही सूर्यग्रहमण्डल के मध्यस्थ भाग मे विराजमान है । छान्दोग्य उपनिषद कहता है – (वह) जो सूर्यमण्डल मे निवास करता है वह कमलनयन है । अतः “पुरुषे पुष्करेक्षणे” शब्द का अर्थ है – वही कमलनयन भगवान जो श्रीमणवाळमहामुनि जैसे योगियों के हृदय मे निवास कर रहे है । “पुरिचेते” शब्द की व्युत्पत्ति का अर्थ यह है – (वह) दिव्यमंगल आनन्दमय अर्चारूपी भगवान जो योगियों के हृदय मे बसे है । “पुरुष” माने भगवान विष्णु जो परमपुरुष है । योग का मूल शब्द है – “युजि समाधौ” माने समाधि – “एक चित्त होकर भगवान का ध्यान करना” ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २९

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २८                                                                                                     श्लोक ३०

श्लोक २९

आराध्य श्रीनिधिम् पश्चादानुयागम् विधाय
प्रसादपात्रं माम् कृत्वा पश्यन्तं भावयामि तं २९॥

शब्दार्थ

पश्चात्                – तत्पश्चात माध्याह्निक नित्यकर्मानुष्ठानों को सम्पूर्ण कर,
श्रीनिधिम्            – अपने आराध्य अर्चारूपि अरंगनगरप्पन् भगवान,
आराध्य               – की आराधना (अत्यन्त विद्धि-श्रद्धा पूर्वक किये),
अनुयागम् विधाय – भगवान को समर्पित प्रसाद को ग्रहण (किये),
माम्                    – मुझे (जबकी मै अप्रवृत होकर प्रसाद की ओर नही देख रहा था),
प्रसादपात्रम् कृत्वा – (ऐसे मुझको) उन्होने शेष प्रसाद का पात्र दिया और उनके दिव्य शेष प्रसाद को ग्रहण करने के                                          तत्पश्चात,
पश्यन्ताम्           – जो मुझको कृपापूर्वक देख रहे है,
तम्                     – ऐसे श्री वरवरमुनि,
भावयामि            – का मै ध्यान सदा करूंगा ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

इस श्लोक मे आराध्य का अर्थ है परीपूर्णरूप से खुद की संतुष्टि से की गई भगवान की पूजा । शान्डिल्य स्मृति कहता है – जिस प्रकार एक राजा या राजकुमार को, अपने सुशील अतिथियों को, और मदमस्त हाथी को खुश करते है उसी प्रकार भगवान की पूजा प्रेम-भक्ति और भय से करना चाहिये । आगे, जिस प्रकार एक पतिव्रता स्त्री (पत्नी) अपने पती की सेवा करती है, एक माँ अपने शिशु की सेवा करती है, एक शिष्य अपने गुरु की सेवा करता है, और वह जिसने मन्त्रोपदेश पाकर मन्त्र की उपासना जिस प्रकार करता है, थीक उसी प्रकार भगवान की सेवा करनी चाहिये । इसी कथानुसार श्री वरवरमुनि अपने आराध्य भगवान की पूजा करते थे । अनुयागम् का अर्थ है – भगवान की विधि अनुसार पूजा करना जिसके बाद भगवान के प्रसाद को ग्रहण करना । श्री भारद्वाज मुनि कहते है कि सबों को परिषेचन (पीने का पानि को छिडककर) करने के तत्पश्चात आहार ग्रहण करना चाहिये और भगवान जो प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान है उनकी ओर से अन्न को इन उपरोक्त पांच रूपों मे ग्रहण करना चाहिये । श्री शाण्डिल्य ऋषि कहते है – सबों को भगवान की पूजा करनी चाहिये जो सबों के हृदय मे परमात्मा के रूप मे विराजमान है और तीर्थ ग्रहण करते वक्त “ओम् प्राणाय स्वाहा” मन्त्र से अपने मुह मे ग्रहण करना चाहिये और इस प्रकार अपने मुह मे यज्ञ करना चाहिये । तत्पश्चात बिना भागते हुए भगवान का ध्यान करते हुए, और बिना किसी शिकायत के (जैसे नमक कम, मिर्ची ज़्यादा, ज़्यादा इमली इत्यादि विचारों को त्यागकर) भगवद्-प्रसाद को  ग्रहण करण चाहिये । इसके अतिरिक्त श्री शान्डिल्य के अनुसार भगवत्-प्रसाद के निम्नलिमित विशेषताये जैसे स्वच्छता, सीमित मात्रा मे उपलब्ध, स्वाद, दिल से स्वीकृत, शुद्ध देसी घी का चिपचिपाहट, देखने मे रमणीय, और कम गर्म इत्यादि का रसास्वादन करना चाहिये । अनुयागम् विधय च शब्द मे ‘च’ माने श्री वरवरमुनि खुद प्रसाद ग्रहण करने से पहले उपस्थित सभी श्रीवैष्णवों के लिये प्रसाद का प्रबन्ध करते थे और फिर प्रसाद खाते थे । यहाँ विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये की एरुम्बियप्पा के वरवरमुनि-काव्य के अनुसार पहले वह श्री वैष्णवों को स्वच्छ, शुद्ध, रमणीय, अत्यन्त रुचीदायक, मनमोहक, अत्यन्त मधुर, महकीला, कोमल, मुँह मे पानि लाने वाला, और अत्यन्त शुद्ध मनस से भगवान् को समर्पित प्रसाद को खिलाकार तत्पश्चात स्वयम् खाते थे । अतः प्रसाद का वितरण केवल उपस्थित श्रीवैष्णवों के लिये इति भावना से करके, और इससे अपने आप को सन्तुष्ट कर वरवरमुनि प्रसाद ग्रहण करते थे । कहा जाता है कि पूर्व घटना मे एरुम्बियप्पा ने श्री वरवरमुनि के शेषप्रसाद का तिरसकार किया क्योंकि यह प्रथा है कि किसी को भी एक संयासि का शेष ग्रहण नही करना चाहिये और संयासि के प्रात्र मे प्रसाद ग्रहण करना भी अनुचित है । एरुम्बियप्पा ने अपने अनैतिक व्यवहार से यह किया और इस घटना मे उन्होने अपने आप को सही किया । पश्यन्ताम् भावयामि शब्द का अर्थ है – मै ऐसे श्री वरवरमुनि को भजता हूँ जो मेरी ओर देख रहे है । इसके साथ साथ यह भी अर्थ दर्शाता है कि श्री वरवरमुनि को एरुम्बियप्पा के व्यवहार ने आश्चर्यचकित और मन्त्रमुग्ध कर दिया और सोच रहे है यह कैसा परिवर्तन है कि जिसने पूर्व मेरे शेष का तिरस्कार किया और अभी अत्यन्तानन्द भाव से खा रहे है । अतः श्रीमान् एरुम्बियप्पा जी कहते है मै ऐसे औदार्य और उदार स्वभाव के श्री वरवरमुनि को भजता हूँ जिन्होने मुझे सही किया और मेरी गलतियों को सुधारा । अन्त मे, शास्त्रानुसार संयासि के शेष का तिरसकार की क्रिया केवल अवैष्णव संयासि पर लागू होती है परन्तु श्रीवैष्णव संयासि पर नही ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २७                                                                                                       श्लोक २९

श्लोक २८

ततः स्वचरणाम्भोजस्पर्शसंपन्नसौरभैः
पावनेर्थिनस्तीर्थैभावयन्तम् भजामि तं २८॥

शब्दार्थ

ततः              – इस प्रकार से दिव्यप्रबन्ध के सारांश को समझाकर,
स्वचरणाम्भोजस्पर्शसम्पन्नसौरभैः – उनके सुगन्धित चरणों के सत्संग मे,
पावनैः          – शुद्ध (पवित्र),
तीर्थैः           – उपभोग हेतु दिया जाने वाला श्रीपादतीर्थ,
अर्थिनः        – शिष्यों ने श्रीपादतीर्थ देने की प्रार्थना किये,
भावयन्तम्   – (जो) सुधारती है या जिससे उत्थान होता है,
तम्             – ऐसे श्री वरवरमुनि,
भजामि       – का नमन करता हूँ ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

इस श्लोक मे, श्री वरवरमुनि, श्री दिव्यप्रबन्धों का सारांश समझाकर, अपने अर्थी शिष्यों द्वारा प्रार्थना किये जाने पर, तत्पश्चात उन्होने उपभोग हेतु अपने श्रीपादतीर्थ का वितरन किया । क्योंकि उस समय मे श्रीरामानुजाचार्य तो स्वयम् तो जीवित नही थे परन्तु वरवरमुनि (जो उनके पुनरावतार है) को लगा – की अगर मै अपने शिष्यों के उत्थापन हेतु अपना श्रीपादतीर्थ का वितरन करूँ तो यह गलत नही होगा । शिष्यों ने भी यही अर्थी की थी याने उनसे प्रार्थना किये कि वो अपने श्रीपादतीर्थ का वितरन करे । यहाँ गौर देने वालि बात यह है की उनके चरणकमल कमल के फूल जैसे है और इन्ही चरणकमलों के सत्संग से तीर्थ अत्यन्त परिमलता और शुद्धता को ग्रहण करता है माने अत्यन्त परिमल और शुद्धता प्राप्त करता है । तीर्थैः शब्द का बहुवचन मे प्रयोग यह निर्दिष्ट करता है की श्रीपादतीर्थ तीन बार दिया गया था । स्मृति कहता है – त्रीः पिबेत् । जिसका अर्थ है श्रीपादतीर्थ तीन बार ग्रहण करना चाहिये । कही कही लिखा है श्रीपादतीर्थ केवल दो बार दिया जाता है और इसका प्रमाण ऊशन स्मृति मे है । कहा जाता है की भागवतों का श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करने से शुद्धता और पवित्रता प्राप्त होती है । और यह सोम रस के पीने के बराबर है । शास्त्र दोनों प्रकार के श्रीपादतीर्थ (दो या तीन बार ग्रहण करने) के प्रमाणों को स्वीकार करता है और हमे अपने सांप्रदाय के अनुसार इसका अनुष्ठान करना चाहिये । भारद्वाज संहिता मे कहा गया है – एक आचार्य से उपदेश प्राप्त करने हेतु एक शिष्य को अपने आचार्य का श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये और यही सांप्रदाय की रीती है जो उपदेश पाने के नियम के अन्तर्गत है । अतः आखरी श्लोक मे, सर्वप्रथम दिव्यप्रबन्धों के सारतम रहस्यों का प्रचार-प्रसार का उल्लेखन है और तत्पश्चात क्रमानुसार श्रीपादतीर्थ शब्द का प्रयोग किया गया है । पूर्णतः उपदेश के आन्तरिक अर्थों मे निमग्न एरुम्बियप्पा ने अन्ततः “नमामि” शब्द का प्रयोग किया है । अब अपने आचार्य के श्रीपादतीर्थ को ग्रहण कर पूर्ण रूप से अनुकूलित भक्ति भाव से उन्होने “भजामि” शब्द का उपयोग किया है । यहा विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये कि श्री वरवरमुनि (जो वासनारहित अभिलाषारहित है)  ने कभी भी किसी से भी उम्मीद नही रखा और उनके प्रति किसी को कुछ करने की भी ज़रूरत नही थी ।

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पूर्वदिनचर्या – श्लोक – २७

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक २६                                                                                                         श्लोक २८

श्लोक २७

तत्वम् दिव्यप्रबन्धानाम् सारम् संसारवैरिणाम्
सरसं सरहस्यानां व्याचक्षाणं नमामि तं २७॥

शब्दार्थ

संसारवैरिणाम्      – जन्म-जन्मान्तर का निर्मूलन (इस भवसागर का वैरी),
सरहस्यानाम्        – मन्त्रत्रय सहित याने तिरुमन्त्र-द्वयमहामन्त्र-चरमश्लोक,
दिव्यप्रबन्धनाम्   – श्री आळ्वारों के दिव्यप्रबन्धों,
सारम्                  – (का) सार,
तत्वम्                 – आचार्य तत्व (याने प्रधान पुरुष आचार्य ही उपाय और उपेय है जो एक जीव का आधारभूत तत्व है                                   और यही पंञ्चोपाय है,
रसं                 – और यही अत्यधिक आस्वादनीय रस (मे),
व्याचक्षाणम्        – बिना किसी संदेह के समझाना,
तम्                    – ऐसे वरवरमुनि की,
नमामि               – (मै) पूजा करता हूँ ।

भावार्थ (टिप्पणि) –

आळ्वार के दिव्यप्रबन्ध जन्म-मृत्यु के कालचक्र का निर्मूलन करते है । दिव्यप्रबन्ध जैसे तिरुविरट्टम् (100), तिरुवाय्मोळि (4.8.11) इत्यादियों के अन्त पासुर स्पष्ठ रूप से यही बात को प्रतिपादित करते है । सरसरी नज़र से अगर उपरोक्त रहस्यों को देखा जाये तो यह पता चलता है कि – भगवान ही मुख्य है और वे ही उपाय और उपेय है । अगर कोई भी प्रपन्न इस विषय की गहराई को समझता है, तो इससे यही प्रतिपादित होता है कि भगवान के भक्त ही मुख्य है, और वे उपाय और उपेय भी है । अगर इस विषय की गहराई को और गहरेपन से समझता है, तो (एक) प्रपन्न भक्त यही पाता है कि आचार्य ही मुख्य है, साथ मे उपाय और उपेय भी वही है । अतः इस प्रकार से हमारे रहस्य इस तीसरे अर्थ को विषेशतः महत्त्व देते है कि आचार्य ही सब कुछ है । जिस प्रकार से आचार्य मधुरकवि जैसों ने आचार्य-भक्ति आचार्य-निष्ठा का पालन किया था । यहा मणवाळमामुनि, अन्यथा यतीन्द्रप्रणवर के नाम से जाने जाते है, पूर्णरूप से श्री रामानुजाचार्य मे आत्मसात थे । वे केवल श्री रामानुजाचार्य को ही मुख्य, उपाय और उपेय मानते थे । जो दिव्यप्रबन्ध का सारांश है और इसी का उपदेश उन्होने अपने शिष्यों को दिया । जिस प्रकार पहले बताया गया है कि श्री रामानुजाचार्य सर्वश्रेष्ठ है । शेषी – मुख्य, प्राप्य – शरणागत, उपाय –  मुख्य को प्राप्त करना जो कि उपाय है । आचार्य ही मुख्य है जिनकी सेवा करनी चाहिये । हमे किसी और उपाय को खोजने की ज़रूरत नही है और आचार्य ही सब कुछ है इस प्रकार से उनके शरणागत होना चाहिये । और यही रहस्यत्रय का सारांश है । अतः श्री वरवरमुनि ने अपने शिष्यों को यही बताया, इसी का उपदेश दिया, और इसी कारण प्रत्येक को सिर के बल पर गिर कर दण्डवत करना चाहिये ।  अतः “तम् नमामि” शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है एरुम्बियप्पा उनका नमन कर रहे है ।

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