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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ७                                                                 ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ९

पाशूर ८

vishnu

मुऱ्ऱप् बुवनम् एल्लाम् उण्ड मुगिल् वण्णन्
कऱ्ऱैत् तुळाय् सेर् कळल् अन्ऱि – मऱ्ऱोन्ऱै
इच्चिया अन्बर् तनक्कु एन्ग्न्गने सेय्दिडिनुम्
उच्चियाल् एऱ्कुम् उगन्दु

शब्दार्थ

मुऱ्ऱप् बुवनम् एल्लाम् उण्ड = वो जिसने संपूर्ण जगत को बिना कोई चिन्ह छोडे निगलकर अपने उदर में रख लिया ; मुगिल् वण्णन् = वो जो जल से भरे हुये घने काले मेघ के समान रंग धारण किए हुये हैं ; कऱ्ऱैत् तुळाय् सेर् = और सुंदर तुलसी का समुच्चय ; ल् अन्ऱि – मऱ्ऱोन्ऱै इच्चिया अन्बर्  = भगवान के शरणागत जिन्हे भगवान के चरणारविंद के सिवा और कुछ नहीं अच्छा लगता और भगवान के चरणारविंद के सिवा और कोई भी फल की इच्छा नहीं रखते। ; तनक्कु एन्ग्न्गने सेय्दिडिनुम् = तथापि भगवान के प्रति किए हुये कैंकर्य ; उच्चियाल् ऱ्कुम् उगन्दु = बड़े आनन्द से स्वीकार किए जाएँगे और वो भी उन भगवान के मस्तक से।

भूमिका

जिन लोगोंकों भगवान के चरणारविंद के अतिरिक्त और कोई भी चीज में रुचि नहीं है वे सदा सर्वदा भगवान का ही सेवा कैंकर्य करते रहते हैं। उनके किए हुये कैंकर्य में हुये किसी भी गलती, आपत्ति, क्रमभंग की तरफ भगवान श्रीमन्नारायण कभी ध्यान नहीं देते। वे बड़े आनन्द से किसी आशंका के रहित सेवा स्वीकार करते हैं और शरणागत को अपना कैंकर्य करते देख प्रसन्न होते हैं। वे उनके इस कैंकर्य को स्मरण में रखते हैं। भगवान कृष्ण भगवद्गीता में अर्जुन से कहते हैं, “हे अर्जुन मेरे भक्त मुझे शुद्ध प्रेम भक्ति से जो भी पत्र, पुष्प, फल, तोय अर्पण करते हैं वो मुझे अत्यंत प्रिय है और में उसका तुरंत पान करता हूँ। क्या अर्पण किया है इससे किस प्रकार किस भाव से अर्पण किया है यह महत्त्वपूर्ण है भगवान की प्रसन्नता के लिए। यह इस गाथा का भाव है।

विवरण:

मुऱ्ऱप् बुवनम् एल्लाम् उण्ड मुगिल् वण्णन्:  प्रलय के समयमें भगवान श्रीमन्नारायण ने सभी चराचर सृष्टि को निगलकर अपने उदर में संरक्षण दिया। इस प्रकार यह विनाश नहीं है रक्षण ही है। बहोत बार हम उसे विनाश कहते हैं परन्तु वास्तवमें, वह विनाश नहीं है कारण भगवान चराचर सृष्टि को सुरक्षित जगह रखता हैं जहांसे उनका जन्म हुआ था। वे अपना कर्तव्य समझ कर यह करते हैं और बदले में कुछ नहीं चाहतें और ना ही वे यह और कुछ फायदे के लिए करते हैं। भगवान का स्वभाव घने काले मेघ के जैसा है जो सबके समृद्धि के लिए बरसते हैं। मेघ का कर्तव्य है बरसना और वे बदले में कुछ नहीं चाहते हैं। जितने काले मेघ उतना वे ज्यादा बरसते हैं। भगवान भी काले मेघ के वर्ण के हैं यह साम्य है परंतु हमे यह भी ध्यान रखना चाहिए की जब मेघ का काला रंग समाप्त हो जाएगा तब मेघ बरसना बंद कर देंगे परंतु भगवान ऐसा कभी नहीं कर सकते यह अंतर भी ध्यान रखना चाहिए। आल्वार कहते हैं, “ताइ इरुक्कुम् वण्णमे उम्मै तन् वयिट्रु इरुति उय्य कोन्डान्, अर्थात् भगवान संरक्षण करनेमें एक माँ के जैसे हैं। जैसे एक माँ अपने पुत्रका रक्षण करती हैं वैसेही भगवान समस्त विश्व का रक्षण करते हैं जो की उनकी ही रचना है। विश्व को रक्षण के बारेमें पता भी नहीं होते हुये भी भगवान उसका रक्षण करते हैं कारण उनका इस विश्व के साथ माता पुत्र का संबंध है। उनको और क्या कारण चाहिए रक्षण करनेके लिए? अगर बेटा कुएं के नजदीक जाता है तो उसकी माँ तुरंत उसे खींचलेती है क्योंकि वो बेटा उससे निर्मित है और उसका रक्षण करना उसका सर्वतोपरी कर्तव्य है। ठीक उसी तरह, हम सभी उस भगवान के बेटे हैं और यह संबंध पर्याप्त है तथा प्रलय कालमें रक्षण करने के लिए और किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। जब सब चराचर सृष्टि को वे अपने उदर में ले लेते हैं तो उन्हे सभी का रक्षण होने के कारण अत्यंत आनंद होता है। ऐसा करनेमें उनको और कोई फायदा नहीं है। ठीक उसी तरह, जब शरणागत कैंकर्य करता है तो भगवान उसका कैंकर्य देखकार आनंदित होते हैं और कैंकर्य करते हुये होनेवाले सभी अपराधोंकों क्षमा कर देते हैं।

कऱ्ऱैत् तुळाय् सेर् ल् अन्ऱि: भगवान के चरणरविंदोंकी मधुरता का वर्णन यहाँ हो रहा है। “तुळाय्” अर्थात् तुलसी. जमिन मैं उगनेवाली तुलसी और भगवान को सुशोभित करनेवाली तुलसी में अंतर है। भगवान को सुशोभित करनेवाली तुलसी उसके भगवान के विग्रह साथ संस्पर्श के कारण जमिन पर उगनेवाली तुलसी से कई ज्यादा सुगंधित होती है। चुंकी उसे अपना अंतिम गंतव्य स्थान मिल गया उसके लिए अब और कुछ करनेको बाकी नहीं रहा। वो भगवान की सेवा में स्थानापन्न हो गईं और इसी कारण उसके आनंद की सर्वोच्चता उसके सुगंधी में प्रतीत होती है। अत: प्रपन्न जो तुलसी से सुशोभित भगवान के चरणारविन्दोंमें शरणागति करते हैं वे प्रथम उनकी सुंदरता में आकर्षित होंगे भगवान के कल्याण गुण (सौलभ्य और सौशील्य) तो अभी आगे हैं। प्रथम तो सुंदरता तो स्पष्ट रूप से दिखती है और भगवान हमारे हृदय चुरानेका कोई अवसर गवांते नहीं हैं। वे अपने आप को सुंदर और सुंगंधित तुलसी से सजाते हैं। वे अपना सांवला रंग प्रदर्शित करते हैं जो उनकी उदारता दिखाता है। वे अपने साथ अम्माजी को भी धारण करते हैं। श्री मधुरकवी स्वामीजी श्री कणिणुन् सिरुताम्बु में इसका “करिय कोल तिरु उरु काण्बन् नान्” ऐसा वर्णन करते हैं। “कट्रै तुज़्हाइ सेर् कल् अन्ड्ऱि” से मुख्य रूप से भगवान के चरणारविन्दोंका आनन्द प्रतीत होता है।

 

मऱ्ऱोन्ऱै इच्चिया अन्बर्: यहाँ प्रपन्न जो भगवान श्रीमन्नारायण के अतिरिक्त और किसी वस्तु की चाहना नहीं करते उनका वर्णन है। आजके अधिकांश लोग भगवान से लौकिक तथा सांसारिक वस्तुएं, सुख की याचना करते हैं। इसके लिए वे भगवान को प्रसन्न करनेके लिए अपने मन से कुछ करेंगे (जिससे वे सोचते हैं की भगवान प्रसन्न होंगे)। वे तो एक व्यवसाय भी शुरू कर देंगे जहां वे भगवान से सौदा करेंगे और भगवान जो भी देंगे उसका हिस्सा भगवान को देंगे। यह विचित्र तो लगता है परंतु यही आज की परिस्थिति है। तथापि यह पूर्णत: अनुचित है। हमे यह स्मरण करना आवश्यक हो जाता है की श्री गोदाम्बाजी ने भगवान से कहा था, “मेरे प्यारे भगवान, मैंने आपके लिए क्षीरान्न बनाया है। अगर आप आकार इसे पाते हैं तो आपको एक भेंट दूँगी। भेंट और कुछ नहीं मगर और १०० घड़े क्षीरान्न है। मैं यह भेंट दे रही हूँ क्यूंकी आप आए और आप क्षीरान्न पानेकी मेरी इच्छा को आपने पूर्ण कीया है।” आल्वार और आचार्य भगवान का मंगल मनाते हैं; इसलिए नहीं की उन्होने राक्षसोंका और क्रूर राजाओंका अंत किया परंतु इसलिए गाते हैं की वे भगवान को युद्ध में कुछ हो न जाए ऐसा उनको डर लगता है और इसलिए की वे विजयी होगए और अपने आप का रक्षण किया।

तनक्कु एन्ग्न्गने सेय्दिडिनुम्: ऐसे कोटि के प्रपन्न शरणागतोंपर भगवान कृपा बरसाते हैं। उनके कैंकर्य की त्रुटीयोंकि तरफ भी भगवान अनदेखा कर देते हैं। वे केवल हृदय के भाव छोडकर और किसी चीज को नहीं देखते।

उच्चियाल् ऱ्कुम् उगन्दु:  ऐसे प्रपन्न शरणागतोंका कैंकर्य भगवान बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार करते हैं। श्री गोदाम्बाजी भगवान के लिए बनाई माला को खुद पहले धारण करती थीं। वे अपने आप को सुशोभित करनेके लिए नहीं बल्कि भगवान कृष्ण को यह माला अच्छी लगेगी की नहीं यह देखने के लिए माला प्रथम स्वयं धारण करती थीं। वें एकबार मा धारण करके दर्पण में देख रही थी की अचानक उनके पिता श्री विष्णुचित्त स्वामीजी आए और वें पकड़ी गईं। श्री विष्णुचित्त स्वामीजी गोदा की यह हरकत देखकर हताश हुये और तो और उस माला में गोदा का केश भी अटक गया था। उन्होने उस माला को दूर रखकर नई माला बनाई। वे नई माला श्री वटपत्रशायी भगवान को धारण करानेके लिए गए। नई माला देखकर भगवान नाराज होगए। उन्होने श्री विष्णुचित्त स्वामीजी को गोदा की प्रसादी माला लाने के लिए आज्ञा प्रदान की क्योंकि उस माला में गोदा के केश थे और भगवान को उसका आनंद लेना था। श्री विष्णुचित्त स्वामीजी को आश्चर्य हुआ परंतु वे अपनी बेटी गोदा के लिए बड़े प्रसन्न हुये। उन्होने जाकर सारा वृत्तांत श्री गोदाम्बाजी को सुनाया। वो सुनकर श्री गोदाम्बाजी हर्षित हो गई। इस प्रकार हम देख सकते हैं की भगवान भी भागवत संबंध की इच्छा रखते हैं। उनको केवल प्रपन्नोंकी ही आवश्यकता है। वे प्रपन्नोंका आनंद लेते हैं और उनके दोषोंकी तरफ ध्यान नहीं देतें।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-8-murrap-buvanam/

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ७

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

 ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ६                                                              ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ८

पासुर ७

sri-parkadal-nathar

तोळार् सुडर्त् तिगिरि सन्ग्कुडैय सुन्दरनुक्कु
आळानार् मऱ्ऱोन्ऱिल् अन्बु सेय्यार् – मीळाप्
पोरुवरिय विण्णाट्टिल् बोगम् नुगर्वार्क्कु
नरगन्रो इन्दिरन् तन् नाडु?

आळानार् = वो जो दास बन गए हैं, तोळार् = विशालबाहु वाले, सुडर्त् तिगिरि = दैदीप्यमान सुदर्शन चक्र, सन्ग्कुडैय सुन्दरनुक्कु = और अति सुंदर पांचजन्य शंख, मऱ्ऱोन्ऱिल् = वे रुचि नहीं रखते, अन्बु सेय्या = अथवा कोई भगवान से अतिरिक्त और किसी में आसक्ति, विण्णाट्टिल् = श्री वैकुंठ धाम (में ही आनंदित रहेंगे), मीळाप् = जहांसे वापिस नहीं आना होता है, पोरुवरिय = और एकमेव स्थान है, बोगम् = जहां परम आनंद है, नुगर्वार्क्कु = अनुभव करनेके लिए, इन्दिरन् तन् नाडु = इन्द्र का स्थान स्वर्ग, नरगन्रो = नर्क होगा

प्रस्तावना

पिछले पाशूर में श्री देवराजमुनी स्वामीजी उन शरणागतोंकी परिस्थिति का वर्णन किया जिन्हे भगवान के दासत्त्व का महत्त्व पता है। वो कभी भी सांसारिक संपत्ति का सहारा नहीं लेंगे, भलेही वो संसार की सबसे बड़ी संपत्ति जैसे ब्रह्माजी का ब्रह्मलोक भी क्यों न हो। इस पाशूर में स्वामीजी और आगे बढ़कर वर्णन करते हैं की जो भगवान की सुंदरता में डूबे हुये हैं, वो इतर तथाकथित सुंदर या सुख देनेवाली चीजोंकी ओर देखेंगे भी नहीं। यही इस पशूर का भाव है।

विश्लेषण

तोळार् सुडर्त् तिगिरि सन्ग्कुडैय सुन्दरनुक्कु: श्री भगवान अपने दाहिने हस्तमें दिव्य सुदर्शन चक्र को धारण करते हैं और अपने बाएँ हस्तमें पांचजन्य शंख धारण करते हैं। श्री भगवान शंख चक्र के साथ अति सुंदर दर्शन देते हैं। यह दो भगवान के आयुध हैं जो शत्रु को भयभीत और विचलित कर देते हैं। परंतु, भगवान के भक्तोंके लिए तो यह दो आयुध तो भगवान का शृंगार हैं। इसी कारण भगवान को “अलगन” कहा गया है। श्री भूतयोगी स्वामीजी अपने  इरन्डाम् तिरुवन्डादि में कहते हैं, “मनैपार् पिरन्दार् पिरन्देय्दुम् पेरिन्बमेल्लाम् तुरन्दार् तोज़्हुदारत् तोल्”. अर्थात, जो भगवान के विशाल बाहु देखकर उनकी सुंदरता में खो जाते हैं वो अबतक जिन भी भोग विलास के साधन में लिप्त थे वो छोडदेंगे। श्री रामायण में जिन्होने भगवान के बाहु का दर्शन किया वे और कुछ देखना नहीं चाहते थे। कंब रामायण में कहा गया है की “तोल् कन्डार् तोले कन्डार्”. इसी कम्बरामायण में श्री विश्वामित्र के शब्दोंमें श्री राम भगवान का वर्णन है की “आडवर् पेन्मययि अववुम् तोलिनाइ”. अर्थात, जिन्होने श्री राम भगवान के सुंदर बाहु का दर्शन किया वो स्त्री का जन्म लेने के लिए तरसेंगे। शी शठकोप स्वामीजी कहते हैं, “तोलुमोर् नान्गुडै कालमेगतै अन्ड्रि मट्रोन्ड्रु इलम्” यह बताने के लिए की थिरुम्Oघूर् के काअलमेघ भगवान अपने सुंदर बाहू का दर्शन देते हैं उससे कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है। हमे उन भगवान के दर्शन लेने चाहिए जो विशेष रूप से अपने शंख चक्र के साथ अतिसुंदर दर्शन देते हैं। जिन्होने भगवान के इस अति सुंदर रूप का दर्शन किया है व कभी भी इतर तथाकथिक सुंदर चीज/व्यक्ति/वस्तु का सहारा नहीं लेंगे। भगवान के केवल सुंदर बाहु के दर्शन से ही लोगोंका लौकिक भोग और सुन्दरता का अभिमान छिन्न-भिन्न हो जाता है। श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं “अनियार् आज़्हियुम् सन्गमुम् यॅदुम् अवर् कान्मिन्”. जब भगवान ऐसे सुंदर सुदर्शन चक्र और पांचजन्य शंख अपने बाहु पर धारण करते हैं तो उनकी सुंदरता अपने आप द्विगुणित हो जाती है। ऐसी यह बाहू की सुन्दरता है। श्री विष्णुचित्त स्वामीजी भगवान की सुन्दरता का वर्णन एक एक करके करते हैं। पहले, वो भगवान का वैभव गाते हैं, फिर श्री भगवान और श्री अम्माजी का वैभव गाते हैं जो भगवान के वक्षस्थल में बिराजमान हैं। फिर वे दिव्य दंपती की सुन्दरता का वर्णन करते हैं जब भगवान सुदर्शन चक्र धारण करते हैं। यह सब श्री विष्णुचित्त स्वामीजी ने तिरुपल्लाण्डु के द्वितीय पाशूर के प्रथम ३ वाक्योमें कहा है। यह प्रथम ३ वाक्य साक्षात भगवान के सामने गाये गए हैं “भगवान आपका मंगल हो, भगवान और अम्माजी आपका मांगा हो, भगवान आपका और आपके दैदीप्यमान सुदर्शन चक्र का मंगल हो।” यहाँ श्री शंख भी पधार गए और भगवान ने वक्षस्थल में अम्माजी, दाहिने हाथ में श्री सुदर्शन चक्र और बाएँ हाथ में श्री पांचजन्य शंख के साथ दर्शन दिया। वह दर्शन अत्यंत सुंदर था। श्री विष्णुचित्त स्वामीजी भावविभोर हो गए और भगवान की इस सुंदरता को भावविभोर होने के कारण देख नहीं पाये। वह मुड़कर दूसरी तरफ देखते हुये बोले “अप्पान्ज सन्नियमुम् पल्लाण्डे” अर्थात “शंख जो युद्ध में दिव्य ध्वनि करता है उसका भी मंगल हो।” उन्होने भगवान की तरफ मुख करके नहीं बोला मुड़कर बोला, “श्री शंख का भी मंगल हो”. वे भगवान की इस सुन्दरता को भावविभोर होने के कारण नहीं सहन कर पाये। भगवान की ऐसी सुन्दरता है। जिसने भी दर्शन अनुभव किया है, क्या वे इतर लौकिक सुखोंका सहारा ले सकते हैं?

आळानार्:  यह उन लोगोंके लिए है जो भगवान की मात्र सुन्दरता से ही भावविभोर हो गए। दो प्रकार से भगवान हमें आकर्षित करते हैं। प्रथमत: वो अपने आप को रक्षक, पोषणकर्ता के रूप में प्रदर्शित करते हैं, अपने शौर्य आदि गुण प्रदर्शित करते हैं, और हम जीवात्माओंकों अपने चरण में लेते हैं। और भी वो अपनी सुन्दरता, सौलभ्य, सौशील्य आदि गुणोंसे आकर्षित करते हैं। पिछले पाशूर में “पुण्डरीगै केळ्वन् अडियार्” प्रथम प्रकार को दर्शाता है जहाँ भगवान का वर्णन श्रिय:पति (श्री अम्माजी के पति) ऐसे किया है। “सुन्डरनुकु आलनार्” में द्वितीय प्रकार से भगवान हमें आकर्षित करते हैं जहाँ वो अपने दिव्य सुंदरता और गुण प्रकट करते हैं। सुंदरता ऐसा गुण है जो सुलभता से हम जैसे जीव भी समझ सकते हैं। भगवान हमे हमारा दासत्त्व स्वरूप स्मरण करनेके लिए इन दो पद्धतियोंकों उपयोग करते हैं। श्री देवराजमुनी स्वामीजी उन आश्रितोंकी बढाई करते हैं जो भगवान की सुन्दरता से आकर्षित हो गए हैं और भगवान को अपना सनातन स्वामी मान लिया है।

मऱ्ऱोन्ऱिल् अन्बु सेय्यार्:  जिनको जीवात्मा का सच्चा स्वरूप और भगवान के दिव्य गुण समझ गया है, कभी भी किसी लौकिक वस्तु के लिए आसक्त नहीं हो सकते। श्री वैकुंठ धाम ऐसा शुद्ध सत्त्वमय स्थान है, अप्राकृत है। और हम जिस संसार में रहते हैं वो प्राकृत है। इस संसार में सभी वस्तुयें स्थान और काल से सिमीत हैं, बदलते हैं। पर श्री वैकुंठ धाम में काल है ही नहीं। और तो और, वहाँ के वस्तु, व्यक्ति हमारा मन सुलभता से आकर्षित कर सकते हैं। अत: वो लोग जिनहे इस संसार के वस्तुओंकी निकृष्टता और श्री वैकुंठ के वस्तुओंकी उत्कृष्टता समझ गई है, उनको इस संसार की कोई भी चीज विचलित नहीं कर सकती है। उन्हे कभी सांसारिक सुख भोगनेकी इच्छा होगी? निश्चित रूप से नहीं। और इसका कारण है की संसार की वस्तुएं ऊपर से अच्छी दिखती हैं पर अंदर से अच्छी नहीं होती। काल इस संसार की सभी वस्तुओंका, सुन्दरता का विनाश कर देता है, पर वैकुंठ में ऐसा नहीं है, वहाँ समय का प्रभाव नहीं है। सांसारिक वस्तुएं केवल समय के साथ नष्ट ही नहीं होती बल्कि उनके लिए हमे नीचे भी गिरना पड़ता है। को ऐसी शंका करेगा की श्री वैकुंठ की संसार से तुलना करते हैं इसलिए श्री वैकुंठ श्रेष्ठ लगता है। अगर स्वर्ग से तुलना करो तो भी क्या श्री वैकुंठ श्रेष्ठ है? शरणागत लोग स्वर्ग इस आकर्षित नहीं होंगे? वहाँ का सुख, अप्सराएँ इत्यादि? इसका उत्तर आगे बता रहे हैं:

मीळाप् पोरुवरिय विण्णाट्टिल् बोगम् नुगर्वार्क्कु: जैसे पूर्व में वर्णित है, श्री वैकुंठ फिरसे लौट के आने का स्थान नहीं है। एक ऐसा दैदीप्यमान स्थान है, जहाँ समय का प्रभाव नहीं है और जहाँ शाश्वत आनन्द है, एक ऐसा अतुलनीय स्थान जहाँ कुछ निर्माण करना नहीं है और विनाश भी करना नहीं है, एक ऐसा स्थान जहाँ संसार का कोई भी कायदा कानून लागू नहीं है, ऐसा एक अक्षरश: अद्वितीय स्थान। यह ऐसा स्थान है जहाँ जाने के लिए शरणागत तरसते हैं और वहाँ अपने स्वामी भगवान श्रीमन्नारायण के और उनके आश्रितोंके दासत्त्व का आनन्द प्राप्त करते हैं।

नरगन्रो इन्दिरन् तन् नाडु? स्वर्ग ऐसी जगह है जहाँ जीवात्मा अपने पुण्य कर्मोंके कारण जाता है। वहाँ वो अपने कर्म के हिसाब से ही सुख प्राप्त कर सकता है। जब सभी पुण्य कर्म का सुख स्वर्ग में भोग लिया जाता है, उसे ऊपर से नीचे मृत्युलोक में फिर से फेंकदीया जाएगा। वैसेही नरक के लिए भी है। जब सभी पाप कर्मोंका कष्ट भोग लिया जाता है तो उसे फिर से इस मृत्युलोक में जन्म दिया जाता है जन्म मरण के चक्र में भटकने के लिए। इन्द्र स्वर्ग स्वर्गादी देव लोकोंके के मुख्य हैं, जहाँपर देवता लोग, जो कर्म बंधन में फंसे हुये हैं, सुख प्राप्त करते हैं, हम सामान्य जीवोंसे बहोत ज्यादा जीवन उनको मिलता है। एक दिन उनको भी मरना पड़ेगा, परंतु जबतक वे वहाँ हैं, तबतक वहांके सभी सुख प्राप्त करेंगे। यह सुख भी शाश्वत नहीं है और वह सुख भगवान के सेवा का नहीं है। वहाँ वो देव लोग अपना खुद का सुख प्राप्त करते हैं, जो जीवात्मा के स्वरूप के विरुद्ध है, जिनको भगवान का भगवान के आनन्द के लिए कैंकर्य ही जीवन का उद्देश्य है। इसी कारण एक शरणागत के लिए स्वर्ग और नरक दोनों एक समान हैं और दोनों दु:खदायी हैं। द्वितीय पाशूर में बताए अनुसार, जब शरणागत भगवान और अम्माजी से विलग होता है, वो उनके लिए नर्क है। उनको स्वर्ग और उसके सुख की भी इच्छा नहीं होती। वो स्वर्ग की घृणा करते हैं कारण वें सर्वश्रेष्ठ श्रीमन्नायण का आनन्द लेनेमें रुचि रखते हैं।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/02/gyana-saram-7-tholar-sudarth/

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ६

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

 ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ५                                                                   ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ७

पासुर ६

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पुण्डरीगै केळ्वन् अडियार् अपूमिसैयोन्
अण्डम् ओरु पोरुळा आदरियार् – मण्डि
मलन्ग ओरु मीन् पुरण्ड मातिरताल् आर्तु
कलन्गिडुओ मुनीर् कडल्

शब्दार्थ :

अडियार् = भक्त, पुण्डरीगै = कमलपुष्प में अवतार लेने वाली श्रीलक्ष्मीअम्माजी, केळ्वन्  = श्रिय:पति भगवान, आदरियार् = की तरफ ध्यान नहीं देंगे, अण्डम् = ब्रह्माण्ड, अपूमिसैयोन् = श्री विष्णु भगवान के नाभी कमल में जन्म लेनेवाले ब्रह्माजी, ओरु पोरुळा = जैसे कीमती, ओरु मीन् = मछली जैसे, मण्डि = पूर्ण शक्ति के साथ, पुरण्ड मातिरताल् = दायें बाएँ हिलाने-डुलानेसे (नही), मलन्ग = बदलाव करेगा, आर्तु = विनाश करेगा, कलन्गिडुओ = अथवा सर्प मुनीर् कडल् = तीन प्रकार के जल से युक्त सागर (अ) आट्रू नीर – नदी का जल (ब) उट्रू नीर – भूमिजल और (क) वेट्रू नीर – वर्षा का जल

प्रस्तावना

भगवत्प्राप्ति के अनेक मार्ग हैं। इनमें कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग हैं। यह मार्ग हमारे उपयोग के नहीं और दुष्कर भी हैं। मुख्यत: उनका जीवात्मा के मूल स्वरूप (भगवान तो दास का स्वरूप) से विरोधाभास है। इन उपयोंमें अनेक कष्ट होने के कारण, उनका जड़ मूल से त्याग करना अत्यंत आवश्यक है। यह उपाय कष्टमय होने के कारण और परिपूर्ण नहीं होने के कारण, इनका अवलंब करके जीव कभी भी परमात्मा की प्राप्ति नहीं कर सकता। इसी कारण भगवान के श्री चरणारविंदोंमें शरणागति करना एकमेव उपाय ही नहीं बल्कि अंतिम लक्ष्य भी है। परंतु यह जीवात्मा जो अनंत युगोंसे ५ इंद्रियोंके अधीन रहता आया है और अभी शरणागति किया है, क्या वो सांसारिक सुख भोगोंसे (जिनका हमारे शास्त्रोंने निषेध किया है) आकर्षित होगा? क्या वो लौकिक धन संपत्ति उसे लुभाएगी नहीं? अगर किसिकों यह प्रश्न है तो उसका उत्तर इस पाशूरमें है।  इसमे मुख्य संदेश यही है की जिन्होंने भगवान का कैंकर्य किया है और जिनको इस कैंकर्य का महत्त्व पता है, वो ईतर सभी लौकिक धन संपत्ति का त्याग करेंगे, भलेही वो विश्व की सबसे बड़ी संपत्ति ब्रह्मलोक ही क्यों ना हो। उनके लिए ब्रह्मलोक भी संपूर्णत: गौण होगा यही श्री देवराजमुनी स्वामीजी यहाँ बता रहे हैं। उदाहरण के लिए यहाँ पर श्री रामायण की सरभंग मुनी की कथा का दृष्टांत दिया गया है।

भगवान श्री राम दण्डकारण्य में श्री सरभंग मुनी के आश्रम में पधारें। उस समय श्री सरभंग मुनी से बात करके इन्द्र निकले और श्री राम भगवान ने श्री लक्ष्मण जी के साथ आश्रम में प्रवेश कर रहे थे। भगवान श्री राम पधारने से पूर्व ही श्री शरभंग मुनी को उनके दिव्य दृष्टि से भगवान के आगमन का पता चल गया था। जब मुनी ने भगवान को प्रत्यक्ष अपने सामने देखा तो अति प्रसन्नता पूर्वक निवेदन किया, “इन्दिरन् अरुळिनान् इरुदि सेइ पगल वन्दनन्, मरुवुदि मलर् अयन् उलगम् तन्दनन्”, एन्, उरवोय्! अन्दमिल् उयर्पदम् अडैदलै मुयल्वेन्”। अर्थात, ओ सुंदर नेत्र वाले श्री रामजी, ब्रह्माजी ने ब्रह्मलोक का सुख उपभोगने के लिए वहाँ बुलानेके लिए इन्द्र को भेजा था। मैंने कहा मैं नहीं आऊंगा। मुनी आगे कहते हैं, “नी इवन् वरुद” एनुम् निनैवु उडैयॅ, इनि ओरु विनै इलै, विरलोय्”. अर्थात “मैं बहोत समय से इस आश्रम में श्री राम भगवान के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मैं श्री भगवान के चरणारविंद रूपी इस यह संपत्ति के लिए तरसता हूँ। ओ श्री राम, ऐसी संपत्ति की चाहना करनेवाले मुझे संसार की कोई भी संपत्ति, भले ही वो चक्रवर्ती राजा की संपत्ति हो अथवा ब्रह्मलोक हो, मुझे आपके चरणरविंद रूपी मेरे लक्ष्य से विचलित करेगी? मैंने इन्द्र से कहा, नहीं, मुझे ऐसे तथाकथिक सुख संपत्ति भोग नहीं चाहिए। मुझे तो सभी संपत्तियोंसे भी श्रेष्ठ संपत्ति चाहिए, जो और कोई नहीं बल्कि भगवान श्री राम का दासत्त्व है।” इस प्रकार, शरणागत के लिए कोई भी भगवान को प्राप्त होने की प्रबल इच्छा को नहीं बदल सकता।यही इस पाशूर का भाव है।

स्पष्टीकरण

श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं, “पन्डै नाळले निन्ड्रिरुवरुळुम् पन्कयताळ् तिरुवरुळुम् कोन्डु” (सहस्रगिती ९,२,१). जीवात्मा ने श्री अम्माजी और श्री भगवान की निर्हेतुक कृपा होने से पूर्वमें अनेक पाप संचित किए हैं. कृपा होनेपर, उसके सभी पाप अग्नि में कपास जैसे जल गए हैं। श्री शठकोप स्वामीजी गाते हैं, “याने एन्नै अरियगिलादे, याने एन्देनदे एन्ड्रिरुन्दॅ, याने नी एन् उडैमयुम् नीये”. अर्थात, “मैं” (अहंकार) और “मेरा” (ममकार) ही जीव के लिए दिव्य दंपति की कृपा होने से पूर्व सबकुछ था। परंतु कृपा होने पर जीव को सच्चा स्वरूप समझ आता है और जच जाता है की वो खुद और उसका तथाकथित जो कुछ भी है, वो यथार्थ में उसका नहीं है अपितु, दिव्य दंपति का ही है। इस प्रकार, शरणागत कैंकर्य की संपत्ति को ही सच्ची संपत्ति समझ कर उसकी संसार के और किसी भी वस्तु से ज्यादा कीमत करेंगे और दासत्त्व के अभिमान सहित एवं अति आनंद से नित्य के लिए कैंकर्य करेगा। इसआनंद से कभी भी कोई भी कीमत पर बाहर नहीं आएंगे।

अपूमिसैयोन् अण्डम् ओरु पोरुळा आदरियार्: हमे यह समझना जरूरी है की किस प्रकार की संपत्तिका यह शरणागत लोग तुच्छ समझकर त्याग कर रहे हैं। यह वह स्थान है जिसे शास्त्रोंमें सर्वोच्च स्थान बताया गया है जहां चतुर्मुख बब्रह्माजी बिराजमान हैं, और जिसे ब्रह्मलोक नाम से जाना जाता है। ब्रह्माजी का जन्म श्री विष्णु भगवान के नाभिकमल में हुआ। यह संपत्ति में सम्पूर्ण १४ लोक सहित ब्रह्माण्ड है। यह विशाल संपत्ति ब्रह्माजी के लिए सुख का स्रोत है। अब अगर कोई ब्रह्माजी के यह विशाल संपत्ति लेकर किसी शरणागत को देता है, जैसे शरभंग मुनी को दी थी, वो इस तुच्छ समझकर अस्वीकार कर देगा। कारण यह है की उसे जो शरणागति करके जो मिलनेवाला है असिमीत है और ब्रह्मलोक के यह सब सुख सिमीत हैं। परंतु श्री भगवान का, श्री अम्माजी का, उनके आश्रितोंका कैंकर्य की कोई गिनती कर सकता है? और तो और, ब्रह्मलोक आदि स्थान काल के प्रभाव में हैं, अपितु कैंकर्य पर नहीं। कैंकर्य को कोई समय सीमा नहीं। श्री वैकुंठ धाम पर काल का प्रभाव नहीं।

सामन्यत: आज लोग समझते हैं को जीवात्मा और शरीर में कोई अंतर नहीं है। उनके लिए शरीर ही सबकुछ है और वो जो कुछ करते हैं उनको जो ठीक लगता है उस आधार पर करते हैं। अगर उनको शरीर और जीवात्मा का अंतर नहीं समझमें आया तो वे कभी भी “में भगवान का दास हूँ” ऐसा सोचने के स्तर तक ऊपर उठ नहीं सकते। वो केवल “मैं” और “मेरा” इन दो पहलू से विचार करते हैं और सोचते हैं की वो स्वतंत्र हैं और अपनी गतिविधियोंपर उनका अपना नियंत्रण है। ऐसे मूर्ख लोगोंको ब्रह्मलोक जैसी संपत्ति अवश्य ही लुभाएगी और वो उसे ही अपना अंतिम लक्ष्य मान लेंगे क्योंकि उन्हे भगवान का दास बनकर रहनेका जो उपहार है उसकी कीमत पता नहीं। शरणागत, जीन्हे जीवात्मा का सच्चा स्वरूप पता नहीं है, वे इस संपत्ति को अस्वीकार तो करेंगे ही और इसका तिरस्कार भी करेंगे। वो कभी भी इस संपत्ति से लुभाए नहीं जा सकतें। यह समझाने के लिए श्री देवराजमुनी स्वामीजी एक मछली की उपमा देते हैं। एक मछली विशाल महासागर में रहती है और वो कितनी भी हिले डुले तो भी उस महासागर को हिला नहीं सकती अथवा बदल नहीं सकती। कितने भी प्रयत्न से वो महासागर को बदल नहीं सकती। मछली के यह प्रयत्न ब्रह्मलोक के सुख के समान हैं और महासागर भगवत-अम्माजी-भागवतोंके कैंकर्य के समान है।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ५

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

 ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४                                                                             ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ६

पासुर ५

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तीर्थ मुयन्ड्ऱाडुवदुम् सेइ तवन्गळ् सेइवनवुम्
पार्त्तनै मुन् कात्त पिरान् पार्प्पदन् मुन् – सीर्तुवरै
मन्नन् अडिययोम् एन्नुम् वाल्वु नम्कीन्ददर्पिन्
एन्न कुऱै वेण्डुमिनि

 

प्रस्तावना:

श्री द्वय महामंत्र के प्रथम खण्ड का महत्त्वपूर्ण संदेश है की भगवान के चरणारविन्द में शरणागति करना। यह “सिद्धोपाय वरण” है। “सिद्धोपाय” का अर्थ है उपाय (भगवान) जो हमेशा उपाय बननेके लिए तैय्यार होते हैं। भगवान हरक्षण हमारी शरणागति स्वीकार करनेके लिए तैय्यार होते हैं। वही “सिद्धोपाय” हैं।जब हम ऐसे सिद्धोपाय भगवान की शरणागति करके यह कहते हैं, “आप ही मेरे उपाय हो”, उस समय हम और किसी भी उपाय (उपायान्तर) का अवलंब नहीं करना चाहिए। केवल सम्पूर्ण रूप से उपायान्तर त्याग करनेके बाद ही भगवान के चरणारविन्द की शरणगति करनी चाहिये। यह उपायान्तर का त्याग अनिवार्य है। तो उपायान्तर त्याग करना यह शरणागति करनेका एक भाग है।यह श्रीमद्भगवत् गीता चरम श्लोक में स्पष्ट रूप से वर्णित है।जब कोई चरम श्लोक को गहराई से समझ लेता है उसे उपायान्तर में कोई रुचि ही नहीं रहेगी। वो अपने शेषत्व स्वरूप के अनुसार रहेंगे, और अपना सभी भार भगवान पर छोड़कर खुद सभी समय शांति में रहेंगे।” हमारे योगक्षेम की पूरी ज़िम्मेदारी भगवान की है, हमे उससे कोई मतलब नहीं” यह भाव मन में अति शांति उत्पन्न कर देता है। श्री देवराज मुनी स्वामीजी कहते हैं की वो भी ऐसे ही एक शरणागत हैं और इस पाशूर में वो ऐसे जीव के मन की परिस्थिति का वर्णन करते हैं।

 अर्थ
तीर्थ मुयन्ड्ऱाडुवदुम्: गंगा, कावेरी, ई. नदीयोंमें हम महात्प्रयास से स्नान करके अपने आप को पापोंसे मुक्त करनेका प्रयत्न कराते हैं। (हम ऐसा शरणागत होने से पहले करते थे), सेइ तवन्गळ्: अपने शरीर को अति कष्ट देकर विविध प्रयश्चित्त करना, सेइवनवुम्: पुण्य कमाने के लिए पुण्य कर्म करना, पार्प्पदन् मुन्: भगवान की कृपा को हम समझने से पहले (अथवा भगवान की कृपा दृष्टी हमपर पड़ने से पहले) (हममें उपरोक्त बाते थी), पार्त्तनै मुन् कात्त पिरान्: पहले भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को भगवत् गीता देकर उसकी और हमारी रक्षा की, सीर्तुवरै मन्नन्: बादमें द्वारकानाथ श्री कृष्ण भगवान ने, नमक्कु: हम जैसे आश्रितोंकों दीया है, अडिययोम् एन्नुम् वाल्वु: भगवान के नित्य किंकरोंके लिए सबसे बड़ा उपहार, नम्कीन्ददर्पिन्: ऐसा श्रीवैष्णव जन्म मिलने के बाद, एन्न कुऱै वेण्डुमिनि: हमे भगवान उपाय रूप में मिलने और उनका नित्य केंकर्य उपेय/फल के रूप में मिलने के बाद हमे किस बात की चिंता करनी चाहिए?(इसका अर्थ हैं हमे कोई चिंता करनेकी जरूरत नहीं।)

विवरण

तीर्थ मुयन्ड्ऱाडुवदुम्: लोग अपने पाप कर्मोंसे मुक्त होने के लिए महत्प्रयत्न से गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी आदि पुण्य नदियोंमें अच्छी तरह से डुबकी लगाते हैं।

सेइ तवन्गळ् सेइवनवुम्: लोग अपने शरीर को अत्यंत कष्ट देकर दुष्कर प्रायश्चित्त करते हैं। आल्वारोनें ऐसे दुष्कर प्रायश्चित्त से अपने पापोंको धोने का प्रयत्न करनेवाले लोगोंका खूब वर्णन किया है। श्री देवराज मुनी स्वामीजी ने “तवन्गळ् सेइवनवुम्:” यह अनेक वचन से दान, यज्ञ इत्यादी पुण्य कर्मोंकों संबोधित किया है जो उपाय के स्वरूप में किए जाते हैं।

पार्त्तनै मुन् कात्त पिरान् पार्प्पदन् मुन्: भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म, ज्ञान, भक्ति जैसे इतर उपाय/मार्ग बताएं जो उसे उन श्रीकृष्ण भगवान तक पहुंचा सकते हैं।उन सब का श्रवण करनेके बाद अर्जुन को उनकी दुष्करता का पता चला की यह सभी उपाय से भगवान को प्राप्त करने के लिए कितने प्रयत्न करने पड़ेंगे, और यह स्वप्रयत्न करना शेषत्व स्वरूप के विरोधी भी हैं।अर्जुन को ऐसे उलझे हुये और दु:खी अवस्था में देखकर भगवान श्री कृष्ण बोले, “हे अर्जुन!, मेंने पहले बताए कर्म, ज्ञान, भक्ति इन उपायोंकों तुम्हें करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है।जो मेंने पूर्व में बताया उन सभी बातोंकों पूर्ण रूप से भूल जाओ, लवलेश भी याद नहीं रखना। में सभी कल्याण गुणोंसे युक्त महासागर हूँ और साथ में जो मुझपर और केवल मुझपर ही विश्वास करते हैं उनके लिए सुलभ भी हूँ। में मेरे आश्रितोंके पापोंका दण्ड उन्हें नहीं दूँगा। में खुशी से मेरे आश्रितोंके पापोंको भूल जाऊंगा। में सर्वज्ञ भी हूँ और सर्व समर्थ भी हूँ। तो सभी गुणोंके भंडार ऐसे मुझ को शरण आजा। ऐसा करते समय यह सोचना की,”कृष्ण को मुझसे कुछ नहीं चाहिए, हमारे पास उसे देने के लिए कुछ है भी नहीं।” और मुझको सभी कल्याण गुणोंसे पूर्ण जानकार मेरे चरणोंमें शरण हो जा। अगर तुम ऐसा कर सकते हो तो में जो बल, सामर्थ्य, वीर्य, सौलभ्य, सौशील्य आदि दिव्य गुणोंसे परिपूर्ण हूँ तुम्हारे अज्ञान, दुर्बलता, असामर्थ्य, ई ऐसा तुम्हारे बारेमें विचार करूंगा। मैं तुम्हारी असहाय परिस्थिति जिसमे तुमने मुझे सब कुछ समर्पित कर दिया है उसका भी विचार करूंगा। तुम्हारी इस असहाय परिस्थिति में मैं तुम्हें कभी भी नही छोडुंगा और सदैव तुम्हारे साथ तुम्हारी रक्षा करता रहूँगा।मेरी शरणागति करने के मार्ग में तुम्हारे बहोत पाप तुम्हारा रास्ता रोकते हैं।में तुम्हें आश्वासन देता हूँ की वो सभी पाप दूर हो जाएँगे और मेरे शरणागति का मार्ग तुम्हारे लिए साफ होजाय। तो तू चिंता मत कर।”इस तरह भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य वाणी से अर्जुन का उलझन और दु:ख दूर किया।श्री देवराजमुनी स्वामीजी कहते हैं “पार्प्पदन् मुन्” याने, भगवान ने हमे कृपा करके यह ज्ञान देने से पहले और हम इस बात को समझने से पहले के समय का संदर्भ देते हैं। (जब हम उपायान्तर में पड़े हुये थे)

सीर्तुवरै मन्नन्: आल्वार कहते हैं, “भगवान श्री कृष्ण केवल द्वारका के राजा नहीं थे बल्कि अपने पत्नियोंके राजा भी थे जिन्हे कृष्ण छोडकर और कुछ नही चाहिए था।

अडिययोम् एन्नुम् वाल्वु: जीवात्मा को यह अहसाह होना चाहिये की वो भगवान का नित्य किंकर है। यह अहसास होने के बाद उसने अपनी रक्षा/उद्धार के सभी उपायोंकों त्याग देना चाहिए और भगवान एकही मेरे रक्षक/उद्धारक हैं यह विश्वास करना चाहिए।जब जीवात्मा को यह ज्ञान हो जाता है, तब ही उसे सच्चा धन प्राप्त हो जाएगा।जब भगवान के जीवात्मा को ऐसा धन प्रदान कर दिया तो फिर जीवात्मा को चिंता करनेका कोई कारण ही नहीं।एक जीवात्मा आनंद, ज्ञान, शेषत्व आदि अनेक गुणोंसे सम्पन्न होता है। इनमेसे उसे शेषत्व का विशेष रूप से स्मरण होना चाहिए, जो उसकी पहचान है और जिस के लिए उसे अभिमान होना चाहिए। जब उसे अपने नीत्य किंकरत्व (शेषत्व) का स्मरण हो जाता है तो वो फिर अपने आप को बचाने के लिए कोई भी प्रयत्न नही करता और अपने वैयक्तिक सुख/संतुष्टि के लिए भी वो कुछ नहीं करता।जब ऐसी उस जीवात्मा के परिस्थिति होजाती है तभी वो जीवित माना जा सकता है।

नम्कीन्ददर्पिन्: अपने स्वामी का दास बनाना यह कोई नई बनाई हुयी बात नहीं है।भगवान के साथ सभी ९ अलग अलग संबंध सनातन हैं। जीवात्मा सभी संबंध भूल गया था। जब जीवात्मा समझता है और यह संबंध स्वीकार करता है उस समय का संदर्भ इस पाशूर में है। यह भी समझना जरूरी है की इस ज्ञान प्राप्त होने का कारण भी भगवान की निर्हेतुक कृपा ही है। संक्षेप में, “भगवान ने जीवात्मा को, “जीवात्मा भगवान का नित्य दास है” यह ज्ञान प्रदान करने का समय निश्चित किया है।

एन्न कुऱै वेण्डुमिनि: जब उन्होने आप ही यह ज्ञान हमे प्रदान किया है तो फिर और कोई उपायान्तरोंकी चिंता हमे करनेकी क्या आवश्यकता है? जब भगवान ने अर्जुन को “मा शुच:” कहा है, तो हमे किसी भी बात की चिंता करने के आवश्यकता नही। इसलिए शांति से भगवान को प्राप्त करनेका कोई भी प्रयत्न करनेकी अथवा ज़िम्मेदारी लेनेकी किसी भी चिंता से दूर रहो।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

 ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३                                                                ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ५

पासुर ४

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मट्रोन्ड्ऱै एण्णादे मादवनुक्कु आट्चेयले
उट्रदु इदुवेन्ड्रु उळम् तेळिन्दु – पेट्र
पेरुम् पेट्रीन् मेल् उळदो पेरु एन्ड्रु इरुप्पार्
अरुम् पेरु वानत्तवर्क्कु

शब्दार्थ:
एण्णादे: वह जो ध्यान नहीं देता अथवा गौर नहीं करता, मट्रोन्ड्ऱै = सांसारिक/भौतिक ईच्छा, एन्ड्रु उळम् तेळिन्दु = स्पष्ट रूप से सोचते हैं, एन्ड्रु इरुप्पार् = निर्धारपूर्वक रहता है, आट्चेयले = सेवा करने के लिए, मादवनुक्कु: श्री लक्ष्मी अम्माजी सहित भगवान माधव, इदु उट्रदु = उपयुक्त बात है, पेरु मेल् उळदो: और इससे और उत्तम कोई फल नहीं, पेट्र पेरुम् पेट्रीन् = भगवान की सेवा करनेका आभ मिल गया हो, अरुम् पेरु = ऐसे महात्मा अतिशय कीमती और दुर्लभ दासानुदास माने जाते हैं, वानत्तवर्क्कु = नित्यसूरियोंद्वारा

प्रस्तावना:

प्रथम तीन पाशुरोंका संक्षेपमें भाव: प्रथम पाशूर में (ऊन उड़ल), द्वय महामंत्र के प्रथम खण्ड में वर्णित शरणागति का हत्त्व प्रतिपादित किया है।’ जीव के शरणागति करनेका कारण है संसार बंधन से होनेवाले अपार दु:ख। ऐसे दु:ख का वर्णन परभक्ति के आधार पर द्वितीय पाशूर (नरागमुम सुवरगमुम) में किया गया है।तृतीय पाशूरमें “परम-भक्ति” की अवस्था बताई गई है जिसमें भगवान से विलग होनेपर प्राण निकलनेकी अवस्था हो जाती है (अनै इडर कड़िन्द) (गजेंद्र)। अब इस चतुर्थ पाशूर में श्री देवराजमुनी स्वामीजी उनका वैभव गाते हैं जिनको अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य भगवान, श्री लक्ष्मी अम्माजी और उनके आश्रितोंका केंकर्य है ऐसा जंच गया है जो श्री द्वया महामंत्र के द्वितीय खण्ड में वर्णित है। जिन्होनें इतर फल से अपना संबंध नष्ट कर दिया है, और जिन्होंने परम निर्धार पूर्वक जीवात्मा के स्वरूपनुरूप केंकर्यमें अपने आप को लगा दिया है।

स्पष्टीकरण:

मट्रोन्ड्ऱै एण्णादे: इसका अर्थ है (अपने सांसारिक भौतिक इच्छाओंकी ओर गौर ना करते हुये) भगवान को आनंद मिले ऐसा कार्य कैंकर्य कहलाता है। यही हमारे जीवन का एकमात्र परम उद्देश्य है। इस से बढ़कर नहीं है| ऐसे कैंकर्य छोडकर इतर विषय पर ध्यान नहीं देना यही इस पद का अर्थ है।वो इतर विषय हैं: संसार, स्वर्ग आदि में रुचि होना, कैवल्य (आत्मानुभव) में रुचि होना; यह कैंकर्य से संबन्धित नहीं हैं। कोई कैवल्य को ही मोक्ष समझते हैं। परंतु, यह हमें भगवत भागवत आचार्य कैंकर्य में कोई सहायता नहीं करता इसलिए श्री देवराज मुनी स्वामीजी ने इसे “इतर विषय” ऐसे संबोधित किया है।कैंकर्य में बाधक इन विषयोंका विचार भी श्री स्वामीजी नहीं करना चाहते हैं, इसलिए उन्होनें इसे “इतर” कहकर छोडदिया है। और तो और, वो “इतर विषयोंकि इच्छा नहीं करना” इससे भी बढ़कर कहते हैं, “इतर विषयोंके संदर्भ में विचार भी नहीं करना”।इसका कारण है, ऐसा व्यक्ति इन विषयोंका विचार भी नहीं करेगा, इच्छा करनेकी तो बात ही दूर है। अत: उन विषयोंकि कोई पात्रता ना समझते हुये वो व्यक्ति उन विषयोंका विचार भी नहीं करता है।जिन्हे भगवत भागवत आचार्य केंकर्य करनेकी मिठास नहीं मालूम हैं, वो सर्वदा उपरोक्त वर्णित इतर विषयोंमें और उनमें सुख ढूंड़नेमें लगे हुये रहते हैं।जिनको सच्चे कैंकर्य की कीमत पता है, वो इतर विषयोंकों लवण युक्त जल के समान त्याज्य समझेंगे अथवा अपने जीवन में कोई स्थान भी नहीं देंगे।

मादवनुक्कु आट्चेयले: श्री लक्ष्मी अम्माजी सहित भगवान की सेवा करना यही हमारा उद्देश्य है। श्री द्वय महामन्त्र के उत्तर खंड के प्रथम पद “श्रीमते” में यह वर्णित है। श्री मूलमंत्र (ॐ नमो नारायणाय) में भी तृतीय पद “नारायणाय” से युगल जोड़ी का कैंकर्य करनेका ही भाव है। श्री मूलमंत्र में जो भाव है, वही श्री द्वय मंत्र में वर्णित है।  श्री स्वामीजी पिल्लै लोकचार्य ने मुमुक्षुपड़ी ग्रंथ में द्वय प्रकरण में १६८ क्रमाक चूर्णिका में यह विस्तार से समझाया है।इस प्रकार, श्री मूलमंत्र और श्री द्वय महामन्त्र दोनोंमें जीव का एकमात्र उद्देश्य कैंकर्य है यही भाव है। श्री शठकोप स्वामीजी ने भी यह श्री सहस्रगिती (३,१,१) में प्रतिपादित किया है।

इदु उट्रदुवेंड्रू: यह पद का भाव है, “यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।” “उट्रदु” का अर्थ है वह जो जीवात्मा के लिये सर्वोच्च रूप से उपयुक्त है।इसका अर्थ है, इतर चीजें जीवात्मा के शेषत्व का वर्णन करनेके लिए उपयुक्त/योग्य नहीं हैं।इसलिए वो आत्मा के लिए उचित नहीं हैं।अत: “मादवनुक्कु” और “आट्चेयले” से हम समझते हैं वेदान्त का निर्णय यही है की जीवात्मा श्री लक्ष्मी अम्माजी और श्री भगवान दोनोंका दास है और इन दिव्य दंपति का कैंकर्य करना यही इसका अन्तिम लक्ष्य है और अन्तिम फल भी।इसका दिव्य प्रबंधोमें अनेक जगह पर संदर्भ मिलता है।चूंकि यह जीवात्मा का स्वरूप कैंकर्य बताते हैं, यह जीवात्मा का बड़प्पन भी बताता है। जीवात्मा की सेवा करनेकी क्षमता यही उसका बड़प्पन है।

उळम् तेळिन्दु: “तेळिन्दु” का अर्थ है, संशय भ्रम से रहित होकर कोई एक चीज पर दृढ परिस्थिति करना। यहाँ श्री स्वामीजी का कहना है की जैसे पहले देख चुके हैं, कैंकर्य ही हमारा अन्तिम लक्ष्य है इस बात पर हमारी संशय भ्रम रहित दृढ़ परिस्थिति होनी चाहिये।”में” और “मेरे लिए” यह भाव हमे छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि यह भाव हमे भगवान से अनावश्यक चीजें मांगनेपर मजबूर करता है। कैंकर्य उनकी खुशी के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार मन में स्पष्ट रूप से परिस्थिति करके अन्तिम लक्ष्य समझके कैंकर्य करना चाहिए। इसका संदर्भ द्वय महामंत्र के द्वितीय खंड के “नम:” पद में है। “श्रीमते नारायणाय नम:” का भाव है, जीवात्मा दिव्य दंपति का नित्य कैंकर्य उनके आनंद के लिए ही करेगा, ना की अपनी संतुष्टी के लिए। जब श्री अम्माजी समेत श्री भगवान आनंदित होते हैं, तब उनके मुखारविन्द पर आनंद देखकर जीवात्मा को आनंद होता है।

पेट्र पेरुम् पेट्रीन् मेल् उळदो पेरु एन्ड्रु इरुप्पार्: यह उन लोगोंके लिए है, जिनको कैंकर्य करनेका सुअवसर प्राप्त होता है तो उनको पता चलता अधहै की इस से बढ़कर और कुछ नहीं है।परमपद यह एक शाश्वत धाम है, जो कभी नहीं बदलता, और सदैव शुद्ध सत्त्व में रहनेवाला श्रीमान्नारायण भगवान का दिव्य निवास स्थान है। यह दिव्य ज्ञान और आनन्द का उगमस्थान है।इसलिए, हम यहांपर कोई रुकावट के बिना कैंकर्य कर सकते हैं।ऐसे दिव्य ज्ञान युक्त जीव ऐसे कैंकर्य की इच्छा रखते हैं।तो यह है कि वे इस कैंकर्य से अधिक कुछ नहीं कहना है कि वहाँ कोई आश्चर्य नहीं है. इसका अर्थ है की वो ऐसे उच्च स्तर के कैंकर्य के मिलने के लिए दृढ़ हैं।

अरुम् पेरु वानत्तवर्क्कु: ऐसे जीव अपने आप को स्वरूपत: भगवान के परिचारक मानते हैं।वे सदैव भगवत कैंकर्य में निरत रहते हैं। वो भगवान को ही परम आनंद मानते हैं।ऐसे लोग इस जगत में दुर्लभ हैं। जब वे परमपद में प्रवेश करते हैं, तो वहाँके नित्य, मुक्त जीव ऐसे दुर्लभता से प्राप्त जीव के आगमन का उत्सव मनाते हैं।श्री देवराज मुनी स्वामीजी कहते हैं, उन नित्य मूक्त गण भी (जिनको परमपद का नित्य दिव्य आनंद प्राप्त है) ऐसे कैंकर्यनिष्ठ महात्माओंकी दर्शन, सेवा को भगवान की सेवा से भी उच्च मानते हैं।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

 ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २                                                ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ४

पाशूर ३

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आनै इदर कड़िन्द अलियाङ्कै अंबुयथ्थाल
कोने विदिल नीरिल कुतिथेलुन्द मीन एनवे
अक्कै मुदियूम पड़ी पिरतल अन्नवन थाल
नीक्कमिला अन्बर निलै

अर्थ

विदिल: अगर कोई उनसे अलग हो जाता है,  अंबुयथ्थाल कोनै: कमल पर बिराजमान श्री लक्ष्मीजी के पति श्री भगवान , आनै इदर कड़िन्द: गजेंद्र का दु:ख दूर करनेवाले, अलियाङ्कै: जो अपने कर कमलोंमें श्री चक्रराज धारण करते हैं, मीन एनवे: मछली के तरह, कुतिथेलुन्द: जो कूदकर बाहर आगयी, नीरिल: पानी, मुदियूम पड़ी पिरतल: वो मरणासन्न हो जाएँगे , निलै: ऐसी परिस्थिती है, अन्बर: दासजन (आश्रित जन) , अन्नवन थाल: ऐसे श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमल से, नीक्कमिला: जो कभी विलग नहीं होना चाहते |

प्रस्तावना

पिछले पाशूर में श्री देवराजमुनी स्वामीजी भक्ति की एक स्थिती “पराभक्ति” का वर्णन करते हैं, जिसमे जीव को भगवान से विलग होनेके विचार से ही अत्यंत कष्ट होता है और जब वो भगवान के समीप होता है तो निश्चिंत होता है। इस पाशूर में श्री स्वामीजी उससे भी विशेष “परम भक्ति” का वर्णन करते हैं।इसमे, जब कोई भगवान से विलग होता है तो अब कष्ट नहीं होगा, वो सीधे मरण के परिस्थिती में होजायेगा। श्री स्वामीजी इस पाशूर में एक दृष्टांत के साथ यह समझाते हैं।

स्पष्टीकरण:

श्री गजेन्द्र हाथी की कथाका उल्लेख पुराणोंमें और आलवारोंके पाशूरोंमें और आल्वारोंके पशूरोंमें अनेकों बार आता है। श्री गजेन्द्र हाथी भगवान को अर्पण करने हेतु सरोवर से कमल पुष्प लेकर किनारे की तरफ आ रहे थे। एक मगरमच्छ अपने शाप को उतारने के लिये एक हाथी के तलाश में था। उसने गजेन्द्र का पैर पकड़ लिया।गजेन्द्र अपने पैर जमीन की ओर खींचता था तो मगरमच्छ पानी की ओर। यह क्रम देवताओंके १,००० वर्ष (मनुष्य के ३,६०,००० वर्ष) तक चला। मगरमच्छ और भी बलवान हो रहा था क्योंकि पानी उसका अधिकार क्षेत्र था और उसकी इच्छा भी पूर्ण हो रही थी। हाथी की शक्ति क्षीण हो रही थी क्योंकी पानी उसका अधिकार क्षेत्र नहीं था और उसके इच्छा भी पूर्ण नहीं हो रही थी। गजेन्द्र ने अपनी सब आशा छोड़ दी थी क्योंकि केवल उसकी सूँडही पानी के बाहर बची थी। उसको ज्ञात हुवा की इससे बड़ी कोई आपत्ति नहीं हो सकती और सोचा, “जो आश्रितोंके सभी कष्ट दूर करता है वो हमारा रक्षक है” और पुकारा,”नारायणा!!! ओ मणिवण्ण!!! नागणैयाई!!! वारै एन अरिडारै नीक्काई”(श्री परकाल स्वामीजी विरचित सीरिया तिरुमडल से)।श्री भगवान त्वरित पधारे और गजेन्द्र का दु:ख दूर किया। गजेन्द्र को मगरमच्छ के द्वारा अपने शरीर का नाश होने की चिंता नहीं थी। उनको अपने सूंड में जो कमलपुष्प था उसको बिना बिगाड़े भगवान के चरण कमलोंतक पहुंचाना था। भगवन्निष्ठ श्री गजेन्द्र के इस प्रकार के भयको दूर करने के लिए भगवान शीघ्र पधारें।यह इस पाशूर में वर्णित है।

अलियाङ्कै: सुंदर श्रीहस्त जो श्री चक्रराज को धारण किए हैं। यह इस वाक्य का अर्थ है। गजेन्द्र को उसके शत्रु मगरमच्छ से छुड़ाने के लिए भगवान ने श्रीहस्त में श्री चक्र को धारण किया। – यही इस वाक्य का अर्थ है।

श्री शठकोप स्वामीजी अपनी सहस्रगिती ३.१.९ में कहते हैं:

मलुंगाद वैन्नुदीय चक्कर नल वलथैयाय-थ
तोलुम कादल कलिरालिप्पान पुल ऊर्न्दु तोंद्रिनैये

यह बात स्पष्ट है की भगवान हाथी की रक्षा करने के लिए त्वरा किए। श्री पराशर भट्टर स्वामीजी भगवान के इस त्वरा-वेग को प्रणाम करते हैं।भगवान अपने धाम से प्रस्थान किए और उनको यह भी याद नहीं रहा की वो सदैव अपना सुदर्शन चक्र दाहिने हस्त में धारण करते हैं।अगर उनको यह स्मरण होता तो उन्होने वो जहां हैं वहांसे ही वह चलादिया होता और चक्रराज ने अपना कार्य कर दिया होता।अथवा, वो चक्रराज नित्य धारण करते हैं यह स्मरण होकर भी उन्होने हाथी के पास स्वयं जाकर चक्रराज का उपयोग किया।कारण यह है की, श्री शठकोप स्वामीजी के पाशूर अनुसार गजेन्द्र का भगवान के प्रति निष्कलंक प्रेम के कारण “कादल कलिरू” नाम प्रसिद्ध है। गजेन्द्र को सुदर्शन चक्र धारी भगवान के सौन्दर्य का आनन्द प्राप्त करके कमलपपुष्प उनके श्री चरणोंमें समर्पित करनेकी अभिलाषा थी।इस कारण भगवान अपनी जगह से यह कार्य करना छोडकर कमल सरोवर पर गए। इसका भावार्थ है की भगवान अपने आप को अपने आश्रित के मन मुजब अपने आप को भी देते हैं।श्री महाद्योगी स्वामीजी अपने मुंद्राम तिरुवंदादी में ९९वे पाशूर में गान करते हैं, “कुत्तत्तु कॉल मुदलै तुंजा कुरित्तेरिंद चक्करत्तान”.

अंबुयत्ताल कोनै: कमल पुष्प पर बिराजमान श्री लक्ष्मीजी के नायक श्री भगवान के संदर्भ में यह वर्णन है। पुराणोंमें वर्णन है की जब श्री भगवान क्षीरसागर में आदिशेष शैय्या पर लेटे हुये थे, श्री भूदेवी और श्री नीलादेवी चरणसेवा कर रही थी, और श्रीदेवी वक्षस्थल में बिराजमान थीं और उनको गजेन्द्र की पुकार सुनाये दी। श्री भगवान ने अपने चरण कमल हल्के से श्री भूदेवी और श्री नीलादेवी की सेवा से दूर किए, शेष शैय्या पर उठकर बैठगये, पलकें खोलीं, आसपास देखा, और धीरेसे श्रीदेवी के आलिंगन से भी दूर होगये। उसके बादही श्री भगवान तुरंत श्री गरुड वाहन पर बिराजमान होकर गजेन्द्र की ओर तीव्रता से बढ़े और गजेन्द्र का दु:ख दूर किया।जैसे प्रजा के रक्षण करनेवाले राजा को देखकर प्रजा की माँ प्रसन्न होती है, वैसेही श्री लक्ष्मी अम्माजी भी भगवान को अपने भक्तोंका दु:ख दूर करते देख प्रसन्न होती हैं।इसी कारण श्री भगवान श्री लक्ष्मी अम्माजी के संदर्भ से जाने जाते हैं और “अंबुयत्ताल कोनै” नाम से संबोधित होते हैं।यह पाशूर वर्णन करता है की श्री भगवान अपने शरणागत जीव के पास उनका कष्ट दूर करने जाते हैं। वो यह नही सोचते की “मैंने अश्रितोंके लिए यह किया”, बल्कि यह सोचते हैं की, “मेंने यह मेरे अपने लिए किया”) और ऐसे भगवान श्री लक्ष्मीजी के पति हैं।

विदिल: ऐसे परम प्रेम करनेवाले श्री भगवान से कोई जीव अलग हो जानेकी परिस्थिती आजाती है तो

नीरिल कुतिथेलुन्द मीन एनवे: ऐसे होजाएगा जैसे एक मछली कूदकर जल से बाहर आगयी हो;

अक्कै मुदियूम पड़ी पिरतल: ऐसा आश्रित मरणासन्न परिस्थिती में पहुंचजाएगा”पराभक्ति” में रहनेवाले आश्रितोंकी यही परिस्थिती होती है, “भगवान के साथ होते हैं तो आनंद, दूर हैं तो दु:ख”। परमभक्ति का स्तर इससे भी उच्च है जिसमे भगवान से दूर होनेपर आश्रित मरणासन्न परिस्थिति में पहुँच जाता है। ऐसी भक्ति की यह महिमा है यह इस पाशूर में वर्णित है।जल से अलग होने पर एक मछली की परिस्थिती के उदाहरण के साथ यह समझाया गया है।

अन्नवन: का अर्थ है “ऐसे भगवान”। प्रथम भगवान को श्री लक्ष्मीजी के पति ऐसे संबोधित किया गया। यहाँ कहा गया है की “ऐसे भगवान”जो यह दर्शाता है की “ऐसे भगवान जो परमभक्ति वाले आश्रित का जीवन है, जैसे मछली के लिए जल जीवन है।

थाल नीक्कमिला अन्बर निलै: “थाल” का अर्थ है भगवान के चरण कमल, और “नीक्कमिला” का अर्थ है विलग होना। प्रेम जो भगवान के चरण कमल से दूरी नहीं सहन करता, ऐसे प्रेम धारण करनेवाले आश्रित भगवान के चरणकमल से ऐसे आकर्षित होते हैं की अगर उनसे दूर होना पड़ा तो वो एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते, जैसे एक मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती।इस पाशूर में परम भक्ति की ऐसी अवस्था का वर्णन है।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १                                                                  ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) ३

पाशूर २

R

नरगुं सुवरगमुं नाण् मलराल कोनै
पिरुवुं पिर्यामैयुमाय-तुरिसतृ
साधगं पोल नाधन् थनधरुले पार्थिरुथल्
कोधिलदियार गुणं

अर्थ
नरगुं – कष्ट (शब्दश: अर्थ ‘नरक’ है) , सुवर्गमुं– और खुशी (शब्दश: अर्थ स्वर्ग है) , पिरीवुं – से विलग और , पिर्यामैयुमाय – से संयुक्त , नाण् मलराल कोनै – श्रिय:पति , पोल – के सदृश , तुरिसतृ – निर्दोष , साधगं – चातक पक्षी जो स्वाति की बरसात की बूंद सीधे पीता है और कोई भी जल नहीं पीता है। अगर स्वाति की बूंद नहीं मिले तो और कोई जल पिये बिना मर भी जाता है। गुणं – की प्रकृति, कोधिलदियार = निर्दोष आश्रित जन, पार्थिरुथल् = आशा करना , नाधन् थनधरुले – केवल भगवान की करुणा

स्पष्टीकरण

नरगुं सुवरगमुं – नरक और स्वर्ग ये अनुक्रम से कष्ट और खुशी को दर्शाते हैं।सहस्रगिती ३.१०.७ (तुंबमुम इंबमुम) में श्री शठकोप स्वामीजी बताते नरक को तुंबमुम (दु:ख) और स्वर्ग को इंबमुम (सुख) बताते हैं।

इस संदर्भमें जो पराभक्ति में हैं उनके लिए सुख और दु:ख क्या है?यह और ‘पराभक्ति’ का अर्थ आगे समझाया गया है।भगवान जो श्रिय:पति हैं उनका विरह नरक के समान है।और उनका सामीप्य सच्चा सुख है।परभक्ति का सार यह है की जब कोई जीव भगवान से दूर रहता है तो वो जी नहीं सकता।वह जब भगवान के साथ रहता है, तब ही जीवित रह सकता है। ऐसे जीव के इस परिस्थिति को समझाने के लिए एक दृष्टांत दिया जा रहा है।

श्री रामायण में भगवान श्रीराम जब वनवास के लिए प्रस्थान कर रहे थे तो श्री सीता अममाजी उनके साथ चलना चाहती थीं। भगवान ने उनको वनवास के खतरोंका और राजमहल के सुख का वर्णन करके समझाने का प्रयत्न किया। उन्होने श्री अम्माजी को यह समझाने का प्रयत्न किया की उनके साथ वनवास में चलना दु:ख है और राजमहलमें रहना सुख है। सुख दु:ख की ऐसी परिभाषा सुनकर श्री अम्माजी ने भगवान की बात को ठीक किया। श्री अम्माजी ने बताया, “सुख और दु:ख की जो आपने की वो परिभाषा सही नहीं है।इसकी परिभाषा अलग अलग लोगोंके लिए अलग अलग होगी।(दासी लिए) आप के साथ रहना सुख है और आपके बिना इस राजमहल में रहना दु:ख है। अगर श्रीमान को यह परिभाषा विदित नहीं है तो कृपया दासी से सीखलें। अगर हमे कोई बात पता नहीं है तो वो औरोंसे सीखना अनुचित है है। आपका प्रेम मर्यादित और परिमित है, जबकि दासी का आपके लिए असिमीत प्रेम है।” ध्यान से सुनने के पश्चात श्री भगवान ने कहा, ” ठीक है, आपको मेरे प्रति अनंत प्रेम है ऐसा आपने कहा। अब मुझे क्या करना चाहिए?” तत्परता से श्री सीता अम्माजी ने कहा, “मैं नेतृत्व करूंगी। आपको बस मेरा अनुगमन करना है।” यह श्री पेरियावाचान पिल्लै स्वामीजी का व्याख्यान है।

यहाँ एक वेदांतिक प्रश्न उठता है। सीताजी ने कहा की श्रीराम भगवान के साथ सुख है और उनके बिना दु:ख है। इस परिस्थिति के लिए यह ठीक हो सकता है। परंतु क्या अन्य लोगोंका ऐसाही भाव होना चाहिए?इसका उत्तर है, “नहीं”। कारण, श्री अम्माजी और हम सामान्य जीवोंमें अंतर है।जब हम भगवान और अम्माजी की युगल जोड़ी से विलग होते हैं तो वो दु:ख होता है और साथ रहते हैं तो वो सुख होता है। श्री अम्माजी के लिए यह भाव केवल भगवान अकेले के लिए है। अत: श्री अम्माजी को “एकायनै” संबोधित करते हैं, और हम जीव “मिथुनायर” कहके संबोधित होते हैं। एकायनै वो है जिनके लिए केवल भगवान ही निर्वाहक हैं, और मिथुनायर वो हैं जिनके लिए भगवान और अम्माजी की युगल जोड़ी निर्वाहक है। मिथुन का अर्थ है भगवान की और अम्माजी की जोड़ी।

मलराल कोनै पिरुवुं पिर्यामैयुमाय: जब कोई भगवान और श्री अम्माजी से दूर रहता है तो वह दु:ख की स्थिति है और जब वह उनसे दूर नहीं रहता है तो वो सुख है। श्री लक्ष्मणजी भी बताते हैं, “जैसे श्री सीता अम्माजी आपके बिना नहीं रह सकती, वैसेही में भी आपके बिना नहीं रह सकता।” श्री सीता अम्माजी और श्री लक्ष्मणजी दोनोंको भगवान का विरह असह्य है।

यहाँ ऐसा नहीं समझना चाहिए की श्री लक्ष्मण जी का सुख श्री रामजी के साथ में रहनेमें है।बल्कि ऐसे समझना चाहिए की श्री लक्ष्मणजी का सुख श्री रामजी और श्री सीताजी दोनोंके साथमें रहने का है।इसीलिए, वन के लिए प्रस्थान करते समय श्री लक्ष्मणजी कहते हैं, “जब आप और अम्माजी वन में पहाड़ोंमें विचरेंगे, आप के सोते जागते में आप दोनोंकी सभी प्रकार के सेवा करना चाहता हूँ। कृपया मुझे केवल इसी कारण के लिए साथ ले चलिये।”सो, जीवात्मा के लिए भी केवल भगवान और अम्माजी की युगल जोड़ी (दिव्य दंपति) की ही सेवा करना विधान है।

तुरिसतृ – निर्दोष

भक्ति को भगवत्प्राप्ति का साधन मानना ही दोष (गलती) है। यहां भक्ति का अर्थ है की भगवान और अम्माजी से विरह में दु:ख होना और समीप रहनेपर सुख होना। भक्ति को अधिकारी विशेषण समझना चाहिए – भक्ति भगवान के सामीप्य का आनंद प्राप्त करनेके योग्य बनाती है ऐसे मानना चाहिए। जैसे खानेके लिए भूखा होना जरूरी है, वैसेही, भगवान का आनंद प्राप्त करनेके लिए भक्ति होना जरूरी है। यह भक्ति उपाय/साधन नहीं बनेगी। केवल उपासक भक्त हे भक्ति को साधन मानते हैं, शरणागत नहीं।भक्ति को साधन मानना ये गलती/दोष है।तुरिसतृ का अर्थ है, वो जिनमे भक्ति को उपाय माननेका दोष नहीं है।

साधगं पोल नाधन् थनधरुले पार्थिरुथल्: चातक एक ऐसा पक्षी है जो स्वाती के बरसात की बून्दोंके व्यतिरिक्त और कोई भी जल नहीं पीते। भलेही उनका मूंह सूख गया हो, तो भी वो स्वाति के बरसात की प्रतीक्षा ही करेगा। इसी प्रकार शुद्ध (निर्दोष) आश्रितोंका यह स्वभाव है की वो भगवान की प्राप्ति के लिए भगवान की कृपा को ही उपाय मानते हैं। हम श्री परकाल स्वामीजी के “तुणिएन इनी निन अरुल अल्लादु (पेरिया तिरुमोलि ११.८.८)” और श्री विष्णुचित्त स्वामीजी के चेन्नियोंगु पादिगम: “निन अरुले पूरिन्दीरुंदेन (पेरियालवार तिरुमोली ५-४-१) में यही बात अनुभव कर सकते हैं।

कोधिलदियार गुणम्: आश्रित वो हैं जिनमे भगवान व्यतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है और दूसरा कोई फल भी नहीं है।एक सच्चा आश्रित इसी भाव के साथ जीवन व्यतीत करता है की “प्राप्तवुम प्रापकनुम प्राप्तिक्क उगपानुम अवने” (प्राप्त का अर्थ है अंतिम लक्ष्य, साध्य अथवा उपेय। प्रापकन का अर्थ है वह लक्ष्य की प्राप्ति का साधन अथवा उपाय। इस उपाय से इच्छित उपेय की प्राप्ति को प्रपत्ति कहते हैं। श्री वचनभूषण के अनुसार ऐसा आश्रित यह अनुसंधान करता रहता है की “मेरे उपाय और उपेय दोनों एकही भगवान हैं और हमे प्राप्त करनेके बाद वो आनंदित होंगे।” प्रपन्न जीव भगवान की वस्तु होने से जब भगवान की वस्तु शरणगति के माध्यम से भगवान तक पहुंचती है तो भगवान आनंदित होंगे, ना की वह वस्तु।जब जीव भगवान के पास पहुंचता हैं तो सभी जीवोंके मालिक भगवान ही ज्यादा आनंदित होते हैं।भगवान का आनंद देखकर जीव भी आनंदित होता है और जीव के लिए इसके अतिरिक्त कोई आनन्द नहीं है।श्री देवराजमुनी स्वामीजी ने इस पाशूर के प्रथम खण्ड में बताया है की “भगवान छोडकर और कोई फल नहीं है”, और द्वितीय खण्ड में बताया है की भगवान छोडकर इतर कोई उपाय नहीं है। “सियाराम ही उपाय सियाराम ही उपेय”। एक निर्दोष आश्रित का यही स्वरूप है।

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ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

प्रस्तावना                                                                                                                    ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) २

पाशूर १. प्रस्तावना 

एक जीवात्मा को परम आनंद कहीं मिलता है तो वो है मोक्ष धाम । मोक्ष मिलने के लिए हमे अपने आचार्य से मूल मंत्र, द्वय महामंत्र, और चरमश्लोक के रहस्यमय गहरे अर्थोंकों जानना जरूरी है । यह तीन मंत्रों कों रहस्य कहा जाता है ।हमारे शास्त्र यह आज्ञा करते हैं की यह रहस्य केवल उनको बताया जाय जो इनको जाननेकी प्रब इच्छा रखते हैं । और लोगों के साथ नहीं । चुंकी वो अत्यंत सावधानी के साथ सुरकक्षित रक्खे गए हैं, उन्हे रहस्य कहा जाता है । तीनों कों साथमें रहस्यत्रय कहा जाता है, और श्रीवैष्णव संप्रदाय के अनुसार वो वेदान्तों के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग माने जाते हैं । वो भगवान का यथार्थ स्वरूप जैसे के तैसे समझाते हैं । वें परमात्मा भगवान तक पहुँचने के मार्ग पर और वहाँ पहुंचने पर जीवात्मा को होने वाले परम आनंद पर प्रकाश डालते हैं । कभी नहीं रुकने वाले जन्म मरण चक्र से और उससे संबन्धित जीवन के चढ़ाव उतार के कारण अनंत काल से पीड़ित जीवों के लिए ही यह तीनों रहस्य श्री भगवान ने ही निवेदन किए हुये हैं । रहस्यत्रय इस प्रकार प्रतिपादित किया गया था । श्रीमान्नारायण भगवान ने नारायण (आचार्य) का अवतार लिया और प्रथम रहस्य जो मूलमंत्र हैं उसे नर (शिष्य) को बद्रिकाश्रम में विस्तार रूप से समझाया । भगवान ने द्वय महामंत्र का अपने दिव्य सहचारिणी श्री महालक्ष्मीजी को श्रीवैकुंठ में उपदेश दिया । अंतत: भगवान ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर कुरुक्षेत्र के रणभूमी में महाभारत के महायुद्ध में अपने परम मित्र अर्जुन का सारथ्य किया । इसी समय उन्होने भगवद गीता के अंतिम अध्याय में चरम श्लोक को प्रतिपादित किया । येही तीन रहस्य श्रीवैष्णव परंपरा से हमारे तक चले आए हैं । श्री वैष्णव संप्रदाय के पूर्वाचार्य, जिनको परमसत्य का दर्शन हो चुका है तथा जिनहोने भगवान तक पहुँचनेका अचूक और सुलभ मार्ग दर्शाया है, ने इन तीन रहस्योंकों अत्यंत सावधानी के साथ संभाल केरक्खा है । (यह तीन रहस्य कोई लौकिक धन की तरह नहीं हैं, जो किसी तिजोरी में बिना किसी उपयोग किए रक्खा जाता है । यह उतनाही उपयोगी है जितना मूल्यवान।) हमारे पूर्वाचार्यों ने इस धन का नित्य अपने जीवन में उपयोग किया । इन रहस्यों की ये ही महानता है ।

तीनों रहस्यों में प्रथम है “मूलमन्त्र”। यह प्रथम रहस्य कहा जाता है जिसमे ३ विभाग हैं । वो हैं  “ॐ”, “नम:”, और “नारायणाय”। प्रथम विभाग “ॐ” यह “प्रणव” नाम से जाना जाता है । द्वितीय भाग “नम:” और तृतीय भाग “नारायणाय” ये प्रणव का विस्तार हैं । (वो जीवात्मा और परमात्मा के गुणोंकों बताते हैं, परमात्मा और जीवात्मा के शेषी-शेष संबंध को समझाते हैं। यह संबंध अनादि काल से है जिसका कोई प्रारम्भ या अंत नहीं । जीवात्मा का और कोई शेषी नहीं है।)

द्वय महामंत्र, जो “मंत्र रत्न” के रूप में माना जाता है, उसमे २ पंक्तियाँ हैं । प्रथम पंक्ति मूलमंत्र के “नम:” का गूढ़ार्थ बताती है तो द्वितीय पंक्ति मूलमंत्र के “नारायणाय” का विश्लेषण करती है । इसमे २ पंक्तियाँ होने के कारण यह द्वय नाम से जाना जाता है । द्वय मंत्र की प्रथम पंक्तिमें भगवान के दिव्य श्री चरणारविन्दोंमें शरण होना बताया है । जब कोई जीव भगवान के चरणकमलोंको पकड़ लेता है तो उसे इतर सभी उपायोंका त्याग करना चाहिए । यह इस तरह करना चाहिए की उस जीव में पूर्व के इतर उपायोंका लवलेश भी नहीं रहना चाहिए । और तो और, उसको तो यह भी विचार का त्याग करना चाहिए की “मैंने भगवान के चरण पकड़े हैं और यह मेरा कार्य मेरा उद्धारक होगा”। (इसका कारण यह है की अगर जीव नेइस तरह सोचा तो इसका अर्थ यह हुआ की भगवान की छोडकर इतर कोई चीज, जैसे स्वप्रयत्न, मोक्ष को प्राप्त करा सकता है”। परंतु वो भी कभी मोक्ष नहीं दिलवा सकते इसलिए इस विचार से भी हमेपूर्णत: दूर रहना चाहिए) । इसका अर्थ यह हुआ की भगवान केचरण कमल ही शरण जाने योग्य हैं, और कुछ नहीं । और यह मूल सिद्धान्त हमारेमन में दृढ़तापूर्वक ठस जाना चाहिए । भगवान केव्यतिरिक्त स्वप्रयत्न सहित इतर सभी उपायन्तारोंका त्याग करके भगवान के शरण होने के बाद उसका फल क्या होना चाहिए इसका विवरण द्वय महामंत्र की द्वितीय पंक्तिमें किया गया है । श्री अम्माजी सहित श्री भगवान की और उनके सभी शरणागतों की नित्य सेवा की सुवर्णसंधि मिलना येही फल है । इसका आदर्श उदाहरण है श्री रामायण में श्री लक्ष्मण जी को श्री रामचन्द्र भगवान और श्रीसीता अम्माजी की सेवा प्राप्त हुयी थी । परंतु, ऐसा सुनहरा अवसर प्राप्त होने के लिए हमारे पूर्व कर्मों के कारण जो भी सभी पाप संचित हुये हैं उनका विनाश होना आवश्यक है । द्वय मंत्र की विस्तार से व्याख्या तृतीय रहस्य चरमश्लोक में की गयी है । इस प्रकार चरमश्लोक द्वय मंत्र पर आधारित है । द्वय मंत्र मूलमंत्र और चरमश्लोक के मध्यमें विराजमान है ।द्वय मंत्रमें मूलमंत्र के “नम:” और “नारायणाय” का विशेष रूप से विस्तार किया गया है । यह चरमश्लोक के भाव के लिये एक आधार भी बन जाता है । मूलमंत्र और चरमश्लोक में “श्री” का उल्लेख अंतर्निहित है। केवल द्वय में “श्री” का उल्लेख सुस्पष्ट रूप सेकिया गया है । इस प्रकार, इन तीनों रहस्योंमें हमारेपूर्वाचार्योंनेद्वय को अधिकतम महत्त्वपूर्ण बताया है। जैसा की पहले कहा गया है, जीव का सभी उपायोंका त्याग करके श्री भगवान के चरण कमलों को ही उपाय मानना ऐसे द्वय के प्रथम पंक्ति में वर्णित है । इसीको शरणागति कहते हैं । शरणागति (प्रपत्ति) २ प्रकार की होती है।प्रथम प्रकार है जिसमेत्वरा में जीव कहता है “मुझेभगवान का विरह एक क्षण केलिए भी सहा नहीं जाता । मुझेभगवान से मिलने की त्वरा हो रही है और में अभी के अभी किसी विलंब के बिना उनसे मिलना चाहता हूँ । “दूसरेप्रकार में जीव स्वरूपानुरूप अनुष्ठान करता हुआ भगवान का नित्य कैंकर्य करता रहता है और कहता है, “हे ! मेरे भगवान, जब आप उचित समझें, मुझेमोक्ष प्रदान कर देना । “इन दोनों प्रकारों मे से प्रथम प्रकार की प्रपत्ति श्रेष्ठ है । (प्रथम प्रकार की प्रपत्ति को आर्त प्रपत्ति कहते हैं और द्वितीय प्रकार की प्रपत्ति को “दृप्त प्रपत्ति” कहते हैं) । ज्ञानसारम्केप्रथम पाशूरमें “आर्त प्रपत्ति” का वर्णन है ।

पाशूर १

pattabhishekam
ऊन उडल् सिरै नीतु ओण् कमलै केळ्वनडि
तेन नुगरुम् आसै मिगु सिन्दैयराय्
ताने लुत्ताल् विल्लुम् कनि पोल् पट्रट्रु वीलुम्
विलुकाडे तान् अरुळुम् वीडु

अर्थ 
आसै मिगु सिन्दैयराय् = जब लोग अपने हृदय में गहरी इच्छा धारण करते हुये , नीतु = से छुटकारा पाने के लिए , उडल = यह शरीर जो, सिरै = कारागृह, ऊन = हाड़मांस का बना, और नुगरुम् = आनंद प्राप्त करना, अडि तेन = चरण कमल रूपी अमृत की मिठास, केळ्वन् = की पत्नी, ओण् = सुंदर, कमलै = श्री अम्माजी जो सुंदर कमलपुष्प पर बिराजमान हैं, पट्रट्रु = किसी इतर इच्छा से रहित, वीलुम् = शरणागति करना, कनि पोल् = जैसे एक फल पलुत्ताल् = जो अगर पकता है, ताने विल्लुम् = अपने आप गिर जाएगा, विलुकाडे तान् = वही शरणागति, वीडु अरुळुम् = मोक्ष प्रदान करेगा

स्पष्टीकरण

हमारा यह शरीर के हाड़मांस से बना है। यह त्वचा, नसें, मांस, हड्डियाँ, मलमूत्र, आदि सभी अशुद्ध चीजोंसे बना हुआ है।कहीं छोटी सी मधुमक्खी के पंख के आकार की भी त्वचा फट जाती है तो विविध मक्खियाँ, कीडे, चिटियाँ, कौवे आदि मांस खाने के लिए जम जाते हैं। (नालदियार तुरवरवियल – तूय्तन्मै) । अगर शरीर का भीतरी भाग खुलजाता है तो उसे खाने के लिए आए हुये कौवोंकों हटाना दूरपास्त होजाता है।जिनको यह बात समझ जाती है, उसे अपने शरीर के प्रति ग्लानि निर्माण होजाती है और वो सदैव इस शरीर के भीतर के आत्मा का दर्शन करता है, ना की शरीर का । और तो और, इस जीवात्मा का इस शरीर में वास एक कैदी को जेल में बंदी बनाकर रखनेके रूप माना जाता है । जीवात्मा, अपने आप में, ज्ञानप्रकाश से साथ चमकता है, परंतु इस शरीर के भीतर यह जीवात्मा के ऊपर अज्ञान के मेघ छा जाते हैं। एक चमकिले हीरे की चमक को जैसे एक अपारदर्शी आवरण ढक देता है इस उदाहरण से भी हम उपरोक्त बात समझ सकते हैं। जीवात्मा को इस शरीर के भीतर रहनेकी भगवान की तरफ से सबसे बडा दण्ड है । जो लोग यह शरीर एक कारागृह है यह ना समझते हुये सांसार में आनन्द लेने का प्रयत्न करते हैं, वो मानसिक विकलाङ्ग की तरह हैं।जो सच्चे ज्ञानी हैं केवल वो ही इस कारागृह के जंजीरोंकों तोड़कर इससे मुक्त होने की इच्छा करेगा।सच्चे ज्ञानी को यह ज्ञान है की भगवान की शरणागति ही इस कारागृह से निकलनेका एकमात्र उपाय है, और कोई भी हमे इस से नहीं निकाल सकता । भगवान श्रीक़ृष्ण भागवत गीता मैं कहते हैं की केवल वो ही शरीर रूपी कारागृह से जीव को निकाल सकते हैं।जीवात्मा के कर्म ही इस शरीर में बंदी बननेका कारण हैं।शरणागति से अतिरिक्त और कोई उपाय इन कर्म के बंधनोंकों तोड़ नहीं सकता।श्रीक़ृष्ण भगवान बार बार यह कहते हैं “अगर कोई जीव मेरे चरणोंमें शरण लेता है, तो मैं निश्चित उसे इस कारागृह से मुक्त करता हूँ।

एक सामान्य व्यक्ति की शक्ति इतनी भी नहीं है की वोह एक चिड़िया के घौसले के बंध को खोल सके। तो फिर वो भगवान द्वारा संकल्पित कर्म बंधन को कैसे खोल सकता है ? कोई धनवान व्यक्ति को अगर जेल भेजा जाय तो वो पहले जेल से छूटकर उसके बाद बाहर के दुनिया की विलासिता आनन्द लेना चाहेगा। इसी तरह, आत्मा के लिए प्रथम कर्तव्य यह है कि इस “शरीर” कहे जाने वाले कारागृह से छुटकारा हो। इस कारागृह से बाहर निकलनेका एक मात्र उपाय है शरणागति।श्री लक्ष्मी अम्माजी के पुरुषकार से श्रीमन्नारायण भगवान को पूर्णत: समर्पण करना येही द्वय मंत्र द्वारा दिया गया शरणगति का उचित मार्ग है।अपने आप को पूर्ण रूप से भगवान को समर्पित करना और उनके चरणोंका आश्रय लेना यह उतना मीठा है जितना की शहद।जिनको इस शहद का आस्वाद मिल गया है वो निरंतर भगवान और उनकी मिठास का ही चिंतन करेगा।वह हमेशा उस आनंद का अनुभव करना चाहेगा। एक भूखा बालक जैसे अपने माँ के दूध के लिए तरसता है, वाइसेही एक शरणागत भगवान के चरण कमल का मीठा अमृत प्राप्त करनेके लिए तरसता है।जब वो भगवान सम्पूर्ण शरणागति करता है, उसका अर्थ यह है की वो इतर सभी उपाय, साधनोंका त्याग करता है जिन्हे वो शरणागति करनेके पहले साधन मानता था और संसार की लौकिक चीजोंमें रुचि लेता था। एक बार वो शरणागत होने के लिए तैय्यार हो जाता है तो अपने आप वो सब इतर उपाय और इतर विषय हवा में अदृश्य हो जाते हैं।येही इस पाशूर का सार है।

श्री देवराज मुनी स्वामीजी एक सुंदर उदाहरण देते हैं। जैसे एक पूरी तरह से पका हुआ फल अपनेआप पेड़ से गिरता है और उस वृक्ष के साथ के उसके सभी संबंध टूट जाते हैं, वैसेही जब कोई जीव शरणागति करता है, तो यह निश्चित है की उसके पीछले कोई भी संबंध उसके और भगवान के संबंध में कोई बाधा नहीं डाल सकते। यह सबकुछ जीव के शरणागति करनेके बाद अपने आप हो जाता है।कोई भी जीव जब शरणागति करता है और भगवान के श्री चरण कमलोंके मधुर अमृत का अनुभव और आनंद लेने की इच्छा करता है, तो उसी क्षण भगवान अति प्रसन्न होते हैं।भगवान तुरंत उसकी इच्छा पूर्ण करते हैं। दूसरी ओर, जो जीव शरणागति तो करता है परंतु, भगवान की इच्छा अनुसार मोक्ष मिलने के लिए प्रतीक्षा करता है, वो भी मुक्त तो होता है और भगवान के चरण कमलोंका मधुर अमृत का अधिकारी होता है, परंतु यह शरीर के अंत में।

जब जीव समझ लेता है की यह शरीर एक क़ैदख़ाना है और संसार के सभी बंधन तोड़कर भगवान का दिव्य और निरंतर आनंद प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, और श्री अम्माजी का पुरुषकार प्राप्त कर भगवान की शरणागति करता है, तब भगवान अति दया पूर्वक उसे मोक्ष दे देंगे।मोक्ष मिलनेकी त्वरा में की हुयी शरणागति उसे त्वरित मोक्ष प्रदान करेगी। येही इस पाशूर का महत्त्व है। मुक्त होना यह एक सांसरिक कष्टोंसे भरे हुये एक बड़े महासागर को पार करके दूसरे किनारे पर भगवान को मिलना है।श्री विष्णुचित्त स्वामीजी कहते हैं, “अक्करै एन्नुम् अनतक् कडलुळ् अलुन्दि इक्करै येरि इळैतिरुन्देन्” – (पेरियालवार तिरुमोली ५-३-७) यहाँ एक दार्शनिक प्रश्न उठता है।अगर भगवान मोक्ष प्रदान कराते हैं तो फिर शरणगति मोक्ष प्रदान करती है यह विरोधाभास नहीं होगा क्या?शरणागति तो केवल एक कृति है और उसमे चेतना नहीं है।अगर एक अचेतन कृतिमें मोक्ष देनेकी क्षमता है तो फिर “केवल भगवान को परिपूर्ण ज्ञान है और मोक्ष देनेकी क्षमता है” इस बात से असंगति नहीं होगी क्या?यह कुछ प्रश्न यहाँ पर उठते हैं।इनका उत्तर इस प्रकार है।

कोई भी जीव जो भी कृति करेगा जैसे शरणागति, भक्ति, तप, इत्यादि, वो उसे केवल मोक्ष के “योग्य” बनाते हैं।उन कृतियोंमें मोक्ष देने की क्षमता नहीं है परंतु उस जीव को मोक्ष के लिए वो तैय्यार करते हैं।हमारे ग्रंथ इसे “अधिकारी विशेषणम्” कहते हैं। केवल भगवान इस शरणागति तो देखकर दया करके मोक्ष प्रदान कर सकते हैं। इसके लिए एक सुंदर उदाहरण है। जमीन सरोवर बनाने के लिए एक बहोत बड़ा गड्डा खोदकर बरसात का पानी रुकने के लिए जगह बनाई जाती है।उद्देश्य यह है की जब बरसात हो तो बरसात का पानी इस में जमा हो।परंतु, केवल एक बड़ा गड्डा बनाया इससे यह आश्वासन नहीं दे सकते की बरसात होगी।और कभी बरसात हो भी जाये और पानी जमा करनेके लिए गड्डा नहीं है तो पानी जमा नहीं होगा और पानी संचय करनेका उद्देश्य की पूर्ति भी नहीं होगी। वैसेही, एक जीव शरणागति करता है तो उसे अपने आप मोक्ष नहीं मी जाएगा। वो केवल उस जीव को भगवान की कृपा और वात्सल्य से मोक्ष मिलने के योग्य बनाएगी।भगवान की दया स्वतंत्र है। यह किसी पर निर्भर नहीं है।भगवान को हमपर उनका प्रेम का वर्षाव करने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं।तो, जब भगवान की कृपा बहने को तैय्यार हो तो हम उसे प्राप्त करने के लिए योग्य होने चाहिए।यह अपने आप को तैयार करके भगवान की दया को प्राप्त करने के योग्य बनना ही श्रणगति कहलाती है।यह श्री भूतयोगी स्वामीजी द्वारा स्पष्ट किया गया है। “वनतिदरै एरि आम् वण्णम् इयट्रुम् इदुवल्लाल् मारि यार् पेय्गिर्पार्?मद्रु”।तो हम यह सत्य समझ सकते हैं की केवल भगवान ही मोक्ष दे सकते है और हमारी कृतियाँ केवल हमे पात्र बनाती हैं की जब भगवान अपनी निर्हेतुक और स्वतंत्र कृपा का वर्षाव करने लगते हैं तो हमे उस कृपा के पात्र बनाती हैं।हमे समझना चाहिए की यह मांस का बना शरीर एक वास्तविक कारागृह है और इसलिए इससे त्वरित मुक्त होने की इच्छा हममे बननी चाहिए। वो भगवान के श्री चरणोंका मधुर अमृत का अनुभव करनेके लिए उत्सुक होना चाहिए।यह शरणागति कहलाती है जैसे पहले के सभी संबंध सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं और भगवान के श्री चरणोंमें समर्पण करना जैसे एक पका हुआ फल वृक्ष से गिरकर जमीन पर गिरता है। शरीर मोक्ष मिलने के लिए हमारा शत्रु है।इस शत्रु पर विजय प्राप्त करनेके लिए शरणागति नामक शस्त्र हमारे पास है।यह समझने के लिए हम भरतजी और बिभीषणजी की श्री रामचन्द्र भगवान के चरणोंमें की हुयी शरणागति का अवलोकन कर सकते हैं।श्री भरतजी ने अपने माँ के कारण कष्ट सहा, श्री बिभीषणजी ने अपने भ्राता के कारण कष्ट सहा। परंतु शरणागति करने के बाद कोई कष्ट नहीं बचा।

तोलुदु उयर् कैयिनन्, तुवण्ड मेनियन्,
अलुदु अज़्हि कण्णिनन्, “अवलम् ईदु” एन
एलुडीय पडिवम् ओत्तु एइदुवान् ‘भरतनुम्
तोलुदु तोन्ड्रिनान्’ मलर् अडि वन्दु वील्न्दनन्”

     – (कम्ब रामायण, अयोध्या काण्ड, तिरुवड़ी चूट्टू पदलम् – ४९)

यह श्री भरतजी की शरणागति है। यह “अधिकारी विशेषण है” जिनपर भगवान अपनी अथाह कृपा दर्शाते हैं।

अब हम श्री विभीषणजी की स्थिति पर एक नजर डालते हैं:

“करन्गळ् मीच्चुमन्दु सेल्लुम् कदिर् मणि मुडियन्, कल्लुम्
मरन्गळुम् उरुग नोक्कुम् कादलन्, करुणै वळ्ळल्
इरन्गिनन् नोक्कुम् तोलुम्, इरुनिलतु इरैन्जुगिन्ड्रान्
वरन्गळिन् वारि अन्न.ताळ् इणैवन्दु वील्न्दान्”

        – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैकल पडलम – १३७)

उपरोक्त दो श्लोक जीवात्मा को शरीर के अंदर होनेवाली पीड़ा दर्शाते हैं और उस जीवात्माकी भगवान के शरणागर होकर इस शरीर से निकलनेकी त्वरा को दर्शाते हैं।इसीलिए ये दोनों शरणागति हैं। भलेही वो श्री भरतजी का अपने माँ के कारण का कष्ट हो, श्री विभीषणजी का अपने भ्राता के कारण का कष्ट हो, अथवा जीवात्मा का शरीर के कारण का कष्ट हो, कष्ट से मुक्ति का केवल एकही मार्ग श्री भगवान के चरणोंकी शरणागति है। श्री भरतजी और श्री विभीषणजी दोनोंकी आर्त प्रपत्ति थी। उसी तरह आत्मा भी इस शरीर से निकलने के लिए शरणागति करता है।

उण्डु कोल् उयिर्?” एन ओडुन्गिनान् उरुक्कण्डनन्, निन्ड्रनन्
कण्णन् कण् एनुम् पुण्डरीकम् पोलि पुनल्
अवन् सडा मण्डलम् निरैन्दु पोइ वलिन्दु सोर्वे

अब हम श्री राम भगवान के भरतजी पर और विभीषण जी पर के उनके अनुकंपा कैसी है वो देखेंगे। प्रथमत:

श्री भरतजी का उदाहरण लेवें –

अयावुयिर्तु, अलुगणीर् अरुवि मार्बिडै
उयर्वुर, तिरुवुळम् उरुग, पुल्लिनान्
नियायम् अत्तनैक्कुम् ओर् निलै आयिनन्
दया मुदल् अरतिनै तली इयदु एन्नवे

       – (कम्बा रामायण, अयोध्या काण्ड तिरुवड़ी चूट्टू पदलम् – ५५)

अब हम श्री विभीषण पर हुयी अनुकंपा को देखते हैं।

गुगनोडुम् ऐवर् आनोम् मुन्बु पिन् कुन्ड्रु सूज़्ह्वान्
मगनोडुम् अरुवर् आनोम्, एम् मुज़्है अन्बु वन्द
अगन् अमर् कादल् अय्य! निन्नोडुम् एज़्हुवर् आनोम्
पुगल् अरुन्गानम् तन्दु पुदल्वराल् पोलिन्दान् – नुन्दै”

          – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, विडणन आदेक्काला पदलम् – १४३)

तिरुवडि मुडियिन् सूडि, सेन्गदिर् उचि सेर्न्द
अरुवरै एन्न, निन्ड्र अरकर्-तम् अरसै नोक्कि
इरुवरुम् उवगै कूर्न्दार्, यावरुम् इन्बम् उट्रार्
पोरु अरुम् अमरर् वालित, पूमलै पोलिवदानार्

            – (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १४५)

तिरुवडि मुडियिन् सूडि, सेन्गदिर् उचि सेर्न्द
अरुवरै एन्न, निन्ड्र अरकर्-तम् अरसै नोक्कि
इरुवरुम् उवगै कूर्न्दार्, यावरुम् इन्बम् उट्रार्
पोरु अरुम् अमरर् वालित, पूमलै पोलिवदानार्

             — (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १४५ )

तेडुवार् तेडनिन्ड्र सेवडि, तानुम् तेडि
नाडुवान् अन्ड्रु कण्ड नान्मुगन् कली इय नल्नीर्
आडुवार् पावम् ऐन्दुम् नीन्गि, मेल् अमरर् आवार्
चूडुवार् येइदुम् तम्मै सोल्वार् यावर्? सोल्लीर्”

           — (कम्बा रामायण, युद्ध काण्ड, वीडणन् अडैक्कल पडलम् – १५०)

तो, खूब चिंता शोक डर युक्त जीव शरणागति करता है तो भगवान अपनी कृपा से उसे मोक्ष दे देते हैं। (उपाय का अर्थ साधन होता है और उपेय का अर्थ फल होता है।) हमारे पूर्वाचार्य इस “भगवान की कृपा ही उपाय और भगवान की सेवा ही उपेय” ऐसे कहते हैं।  श्री भरत जी की और श्री विभीषण जी की शरणागति में हम देख सकते हैं की श्री विभीषणजी की शरणागति सफा हुयी और श्री भरतजी की नहीं। (श्री भरतजी की शरणागति सफल क्यों नहीं हुयी यह एक अलग विषय है।मुख्य बात यह है की श्री भरतजी को फल देने के लिए श्री रामजी को वो उचित समय नहीं लगा। उनको १४ वर्ष के संकल्पोंकों पूर्ण करना था।उनकी विशेष योजना थी की श्री भरतजी आगये। श्री भरत जी को शरणागति को सफल करनेके लिए १४ वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ी।इससे यह सत्य भी पता चलता है की भगवान स्वतंत्र हैं और वो निर्णय ले सकते हैं की शरणागति का फल कब देना है। हमने पूर्व में जो बरसात का दृष्टांत देखा था उसके अनुसार, भरतजी के संदर्भ में गड्डा खोदा हुआ तैय्यार तो था, पर बरसात का समय नहीं आया था।)

श्री वचनभूषण में श्री पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “भरतनुक्कु नन्मै ताने तीमै आयिट्रु”। इसका अर्थ यह हुआ की शरणागति की कृति केवल योग्य बनाती है (अधिकारी विशेषणम्) परंतु मोक्ष नहीं दे सकती। तो जब यह पाशूर कहता है की शरणागति मोक्ष देती है तो समझना चाहिए की अगर जीव को तुरंत मोक्ष चाहिये तो शरणागति मोक्ष मिलने की रुकावटें दूर करती है। परंतु पाशूर कभी भी यह नहीं कहता की शरणागति खुद मोक्ष देती है।यह ठीक तरह से समझना चाहिए की शरणागति संबन्धित सभी सत्य सिद्धान्त श्री वरवरमुनी स्वामीजी अपने विश्लेषण में प्रकाशित करते हैं।

Source: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2014/11/gyana-saram-1-una-udal/

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ज्ञान सारं – प्रस्तावना

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं

तनियन्                                                                                                   ज्ञान सारं – पासुर (श्लोक) १

 

श्री देवराजमुनी श्री रामानुज स्वामीजी के शिष्य थे और उन्होने अपने आचार्य के दिव्य श्री चरणोंमें शरणगति की। उन्होने समस्त वेद और शास्त्रों कों अपने आचार्य से सीखा और समझा। इसी कारण उन्हे परम तत्त्व भगवान तक पहुँचने का और परम आनंद प्राप्त करने का मूलभूत रहस्य अच्छी तरह से समझ गया था । वो नित्य अपने आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के श्री चरणों के निकट अपने आचार्य के सुख केलिए सभी केंकर्य कराते हुये बिराजे। ऐसी विशेष गुरुनिष्ठा युक्त श्री देवराजमुनी, अपनी विशाल दया के कारण यह चाहते थे उन्होने जो तत्त्व अपने आचार्य से सुने उनका सभी जीवों कों विशेष लाभ मिले। अत: श्री रामानुज स्वामीजी के निर्देशों के आधार पर उन्होने ‘ज्ञानसारम्’ यह सरल स्पष्ट तमिल भाषा में तमिल वेन्पा शैली में और सब कोई समझ सकें ऐसा लिखा और भगवान के यथार्थ स्परूप, भगवान तक पहुँचने का मार्ग, और भगवान से मिलनेपर होने वले परमानंद को हमे प्रदान किया।

ज्ञान सारं – तनियन (ध्यान श्लोक)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमत् वरवरमुनये नम:

ज्ञान सारं                                                                                                                   प्रस्तावना

(तनियन)
(ध्यान श्लोक)
कार्तिकेभरणी जातं यतीन्द्राश्रयमाश्रये।
ज्ञानप्रमेयसारभि: वक्तारं वरदं मुनिम्॥

विश्लेषण: जिनका अवतार कार्तिक मासमें भरणी नक्षत्र में हुआ है, जो श्री रामानुज स्वामीजी जो यतीन्द्र हैं उनके शरणागत हैं, जिन्होने अपने ज्ञानसारम् प्रमेयसारम्ग्रन्थों में आचार्य महिमा का वर्णन किया हैऐसेश्री देवराजमुनी स्वामीजी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

रामानुज सच्छिष्यं वेद शास्त्रार्थ संपतम्।
चतुर्थाश्रम संपन्नं देवराजमुनिं भजे॥

श्री रामानुज स्वामीजी के सत्-शिष्य, जो वेदशास्त्रार्थ में पारंगत हैं, जो सन्यासाश्रम से सम्पन्न हैं ऐसे (रामानुज सच्छिष्यं): अपनेप्राथमिक नाम “यज्ञमूर्ति” से उन्होने श्री रामानुज स्वामीजी के साथ १८ दिनोंतक वेदान्त के विषयपर तर्क-वितर्क केआधारपर वाद विवाद किया। इससेश्री रामानुज स्वामीजी संप्रदाय के रक्षा के विषयमें बहोत चिंतित होगाए। श्री वरदराज भगवान श्री रामानुज स्वामीजी के स्वप्नमें दर्शन देकर कहे की “हेरामानुज, कृपया निराश न होइए। मैं तुम्हे मैंने बनाया हुआ एक प्रतिभावान शिष्य दे रहा हूँ। आप उनपर जरूर विजय प्राप्त करेंगे।”

(वेद शास्त्रार्थ संपतं):
उन्होने१८ दिनोंतक श्री रामानुज स्वामीजी सेशास्त्रार्थ किया इससेहम उनके शास्त्रों के गहरे ज्ञान का अनुमान लगा सकते हैं। उन्होने समस्त शास्त्रोंका सार अपने ज्ञानसारम्प्रमेयसारम् के माध्यम से हमे तमिल वेन्पा शैली के सुंदर पाशूरों द्वारा प्रदान किया है।

(देवराज मुनी)
श्री वरदराज भगवान (श्री देवराज भगवान/श्री अरूलाल भगवान) केकृपा केकारण उनका श्री रामानुज स्वामीजी का शिष्य बनना यह उनकी महानता है। उनकी महानता का कारण और भी है की उनकी ज्ञान, भक्ति, वैराग्य श्री रामानुज स्वामीजी केसमान थी। हम समझ सकतेहैं की इसी कारण वे अरूलालमुनी इस श्रीनाम सेभी जाने जाते हैं।

सुरुळार्करुङ्गकुलल तोगैयर्वेल्विलियिल्तुवळुम्

मरुळाम्विनैकेडुम्मार्क्कम्पेर्रेन्मरैनान्गुम् – सोन्न
पोरुळ्ग्यान सारत्तैप्पुन्दियिल्तन्दवन्पोङ्गोळिसेर्
अरुळाळ ममुनि-अम्पोर्कलल्गल्अडैन्द पिन्ने

भावार्थ: श्री अरूलालमुनी केदिव्य श्री चरणोंका आश्रित होने के बाद दास को अनादि काल से संचित कर्मोंका नाश करने का मार्ग मिल गया है। श्री स्वामीजी नेअपनेज्ञानसारम प्रमेयसारम ग्रंथ से चारो वेदोंकेगूढ़ार्थ का और तिरुमंत्र केयथार्थ भाव का हमेपान कराया है। श्री स्वामीजी ज्ञान के तनियन का अर्थ है: हमारेसंचित कर्मोंकेकारण हमारेसत्य की स्पष्टता घटती है। यह घटनेकेकारण हमारा स्त्रियोंकेओर आकर्षण बढ़ता है। इसी कारण हमारा मन उनकेघुंगरालेकालेकेश और सुरेख नयनोंपर मोहित हो जाता है। मगर श्री देवराजमुनी केदिव्य श्री चरणोंमेंसमर्पण करनेकेबाद मुझेसमझमेंआया की में कैसे इस काम और काम से संबन्धित अपचारों से दूर रह सकता हूँ। मेरे आचार्य श्री देवराजमुनी को शरण होने के बाद, और यह ज्ञानसारम प्रमेयसारम का अध्ययन करने के बाद मेरे मन को यथार्थ बात समझ में आई है। इसी कारण मुझे स्त्रियों के सुंदर केश तथा भाले के नौक के समान सुंदर नेत्र को देखने का कार्य करानेवाए मेरे बुरे कर्मोंका विनाश करनेका मार्ग समझ में आगया है।

स्त्रियोकी केतरफ आकर्षण केसाथ हमारेइतर अपचार जैसेक्रोध, लोभ, अज्ञान, मत्सर, द्वेष, मिथ्या अभिमान इत्यादी भी नष्ट हो जाते हैं। इसीका अर्थ यह भी है की जो अपचार मनुष्य के संस्कृति का नाश करते है, वो आचार्य कृपा कटाक्ष से दूर हो सकते हैं। आचार्य की महानता पे इस तनियन से प्रकाश डाला गया है।