Daily Archives: June 27, 2022

periya thirumozhi – 3.3.2 – pEymagaL kongai

Published by:

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

periya thirumozhi >> Third centum >> Third decad

<< Previous

Highlights from avathArikai (Introduction)

No specific introduction.

pAsuram

pEymagaL kongai nanjuNda piLLai parisu idhuvenRAl
mAnila mAmagaL mAdhar kELvan ivan enRum vaNduN
pUmagaL nAyagan enRum pulangezhu kOviyar pAdi
thEmalar thUva varuvAn chiththira kUdaththu uLLAnE

Word-by-Word meanings

pEy magaL – pUthanA, who is a demon
kongai – on bosom
nanju – poison
uNda – mercifully consumed
idhu – this amazing act
piLLai parisu enRAl – hearing that it is the nature of this child
ivan – this krishNa (is not a young child)
mA – 50 crore yOjanA vast
nila mA magaL mAdhar – for SrI bhUmip pirAtti who has earth as her body
kELvan enRu – as dear husband
vaNdu – beetles
uN – entering to drink the honey
pU magaL – periya pirAttiyAr who is having lotus flower as birth place
nAyagan enRum – as the lord
pulan kezhu – having form which attracts the heart of those who saw
kOviyar – cowherd girls
pAdi – praising and singing
thEn malar – fresh flower
thUva – as they serve
varuvAn – one who comes
chiththirakUdaththu – in thillaith thiruchchiththirakUdam
uLLAn – is eternally residing.

Simple translation

The cowherd girls who are having form which attracts the heart of those who saw, heard the amazing act of krishNa mercifully consuming poison from the bosom of pUthanA, the demon, understood the nature of this child praised and sang saying “He is not a small child but he is the dear husband of SrI bhUmip pirAtti who has earth, which is 50 crore yOjanA vast, as her body and is the lord of periya pirAttiyAr who is having lotus flower where the beetles are entering to drink the honey, as birth place”, served him with fresh flowers; one who comes, being served in this manner, is eternally residing in thillaith thiruchchiththirakUdam.

Highlights from vyAkyAnam (Commentary)

pEy magaL … – Same as in the simple translation.

pulan kezhu is also recited as,

polan kezhu kOviyar – gOpikAs who are wearing golden ornaments.

In the next article we will enjoy the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
SrIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

तिरुवाय्मोळि – सरल व्याख्या – १.२ – वीडुमिन

Published by:

श्री: श्रीमते शटकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत् वरवरमुनये नम:

कोयिल तिरुवाय्मोळि

<< १.१

sriman narayanan-nanmazhwar

भगवान के परत्व का परिपूर्ण अनुभव करने के बाद, इस दशक में आळ्वार, ऐसे भगवान को प्राप्त करने के उपाय का इन दस पासुरमों में समझा रहे हैं।

इस बात के महत्व को समझते हुये, आळ्वार अपने दिव्य अनुभवों को, सभी के साथ साझा करने का विचार कर इस जगत के संसारियों की तरफ देख रहे है।

सभी जन साँसारिकता के मोहमाया में डूबे हुये है। अत्यंत कृपालु होने के कारण आळ्वार उनकी सहायता करने की इच्छा से, उन्हे साँसारिक मोहबंधनों को छोड भगवान के प्रति भक्ति बढ़ाने का उपदेश दे रहे है।  

पहला पासुरम: इस पासुरम में नम्माळ्वार सभी को सांसारिक और अन्य मोहबंधनों का त्याग कर, स्वयं को भगवान के प्रति समर्पण करने की आज्ञा दे रहे हैं।  

वीडुमिन् मुऱ्ऱवुम् वीडु सेय्दु उम्मुयिर्
वीडु उडैयान् इडै वीडु सेय्म्मिने

एम्पेरुमान की आराधना में बाधा बन रहे, निज स्वार्थ पुरक उपायों, विचारों को त्याग करना।

इसके पश्चात, उन स्वामी के, जो मोक्ष के नियंता हैं, उनके श्रीचरणकमलों में स्वयं को समर्पित करना।  

दूसरा पासुरम : परित्याग को सरल बनाने के लिये, उन वस्तुओं के क्षणीक गुणों को समझा रहे हैं।  

मिन्निन् निलैयिल मन्नुयिर् आक्कैगळ्
एन्नुम् इडत्तु इऱै उन्नुमिन् नीरे

आळ्वार कह रहे है, जीवात्मा अनादि काल से अनेक शरीर प्राप्त करता हैं, जिसे वह चाहने भी लगता है, पर ये शरीर क्षण में प्रत्यक्ष और क्षण में अप्रत्यक्ष हो जाता हैं | शरीर के इस अनित्य स्वभाव को समझ कर, तुम सर्वेश्वर परमात्मा का ध्यान करो।  

तीसरा पासुरम : नम्माळ्वार अत्यंत कृपा से परित्याग को समझाते हैं।  

नीर् नुमदु एन्ऱु इवै वेर् मुदल् माय्त्तु इऱै
सेर्मिन् उयिर्क्कु अदन् नेर् निऱै इल्ले

अहंकार ममकार का त्याग कर आचार्य के श्रीचरणकमलों में आश्रय लें। जीवात्मा के लीये इससे ज्यादा उचित और संतोष प्रदायक और कुछ नही हैं।  

चौथा पासुरम: इस प्रकार, मोहबंधनों से मुक्त जीवात्मा से पूजीत एम्पेरुमान के गुणों का, आळ्वार वर्णन कर रहे हैं।  

इल्लदुम् उळ्ळदुम् अल्लदु अवन् उरु
एल्लैयिल् अन्नलम् पुल्गु पऱ्ऱु अऱ्ऱे

भगवान स्थिर चित् व अस्थिर अचित् दोनों से भिन्न हैं. तथा, मोहबंधनों से विमुक्त हो कर, भक्ति भाव के साथ आनंदप्रदायक भगवान का आश्रय लें।

पाँचवा पासुरम: इस पासुरम में नम्माळ्वार समझाते हैं कि एम्पेरुमान को प्राप्त करना ही उचीत लक्ष्य होना हैं।  

अऱ्ऱदु पऱ्ऱु एनिल् उऱ्ऱदु वीडु उयिर्
सेऱ्ऱदु मन्नुऱिल् अऱ्ऱु इऱै पऱ्ऱे

भगवत विषय को छोड अन्य विषयों का मोहबंधनों को परित्याग करने के बाद, आत्मा कैवल्य मोक्ष (संसारं से विमुक्त खुद के आनंद में मग्न रहना) का अधीकारी हो जाता हैं। कैवल्य मोक्ष की इच्छा रहित, अन्य बंधनों से विमुक्त, एम्पेरुमान के साथ निश्चल दृढ़ संबंध बनाये रखने के लिये उनके प्रति शरणागति करें।  

छठवाँ पासुरम : सभी के प्रति एम्पेरुमान के सम भाव का नम्माळ्वार विवरण कर रहे हैं।  

पऱ्ऱु इलन् ईसनुम् मुऱ्ऱवुम् निन्ऱनन्
पऱ्ऱु इलै आय् अवन् मुऱ्ऱिल् अडन्गे

सर्वेश्वर होते हुये भी, वे अपनी दिव्य महिषियों के प्रति मोह छोड़, उनसे जुड़े हुये नित्यसूरियो से भी मोह छोड़, अभी नये आये हम लोगों के संग अटल रहते हैं | हमें अपना पालक पोषक मानते है | हमें देख उन्हे आनन्द होता है | आप भी साँसारिक बंधनों से, मोह से विमुक्त हो, सर्वेश्वरको अपना धारक, पोषक और स्वयं को उन्ही का भोग्य समझ उनमें ही मगन हो जाओ।  

सातवाँ पासुरम: नम्माळ्वार कहते हैं की भगवान के वैैभव (उभय विभूति) से घबराये बगैर, हमें हमारे, भगवान और उभय विभूति के सम्बंंध ध्यान रखते हुये यह समझना चाहीये की हम भी उन्ही की सम्पत्तियों में से एक हैं।  

अडन्गु एळिल् सम्बत्तु अडन्गक् कण्डु ईसन्
अडन्गु एळिल् अह्देन्ऱु अडन्गुग उळ्ळे

भगवान् के अति सुंदर दिव्य वैभव का, इस ज्ञान के संग ध्यान करें कि सर्वस्व उन्हीके अधीन हैं, और इस संबंध ज्ञान के संग उनकी संपत्ति का अंश बने।  भगवान और स्वयं के बीच के सम्बंध का ज्ञान होने पर, हम उनकी दिव्य संपत्ति के अंश बन सकतें हैं।  

आठवाँपासुरम: नम्माळ्वार भगवान की पूजा करने, और सेवा करने की विधी बतला रहे हैं।  

उळ्ळम् उरै सेयल् उळ्ळ इम् मून्ऱैयुम्
उळ्ळिक् केडुत्तु इऱै उळ्ळिल् ओडुन्गे

जन्म से ही हमें प्राप्त बुुद्धी वाक्और तन के प्रयोजन को समझ कर साँसारिक सुख के मोहबंधनों से विमुक्त होकर, हमारें लिए उचित यही है कि, स्वामि के प्रति सम्पूर्ण तरह से शरणागत बनें।  

नौवां पासुरम: नम्माळ्वार बतला रहे हैं कि भगवान की आराधना से भव बाधायें मिट जाती हैं।

ओडुन्ग अवन् कण् ओडुन्गलुम् एल्लाम्
विडुम् पिन्नुम् आक्कै विडुम् पोळुदु एण्णे

सर्वस्व भगवान को समर्पण करने से अविद्या मिट जाती है, और आत्म ज्ञान असीम हो जाता हैं।  इसके पश्चात भगवान की शरणागति कर इस जीवन के अंत में ही उनके कैंकर्य की प्रार्थना कर सकतें हैं।  

दसवाँ पासुरम : नम्माळ्वार भगवान के गुण स्वभाव बतला रहे है, भगवान को प्राप्त करना ही परम ध्येय होना चाहीये।

एण् पेरुक्कु अन्नलत्तु ओण् पोरुळ् ईऱिल
वण् पुगळ् नारणन् तिण् कळल् सेरे

इस संसार की अनन्त कोटि जीवात्माओं के र्सवस्व स्वामी नारायण ही है।
अनन्त गुणों से सम्पन्न आनन्द प्रदायक भगवान नारायण के श्रीचरणकमलों में शरणागती करें।

ग्यारहवाँ पासुरम : इस दशक की फलश्रुति करते हुये नम्माळ्वार कहते हैं कि इस तिरुवाय्मोळि के हज़ार पासुरमो में वीशेष इन दस पासुरमो के अद्भुत ज्ञान को समझना ही फल हैं।  

सेर्त् तडत् तेन् कुरुकूर्च् चटकोपन् सोल्
सीर्त् तोडै आयिरत्तु ओर्त्त इप् पत्ते

अति सुन्दर उपवन और तालाबों से घिरे सुन्दर आळ्वारतिरुनगरी के सेत नम्माळ्वार, कृपा कर , १००० पासुरम के भावपुर्ण अर्थो को  सुन्दर छंद  रुप  में प्रसादित कीये है। 

अडियेन प्रीती रामानुज दासी 

आधार: http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/thiruvaimozhi-1-2-tamil-simple/

archived in http://divyaprabandham.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org