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स्तोत्र रत्नम – श्लोक 11 – 20 – सरल व्याख्या

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमत् वरवरमुनये नमः

पूरी श्रृंखला

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श्लोक 11 –

इस पासूर में परत्व लक्षण (सर्वोच्चता की पहचान) की व्याख्या की गई है।

स्वाभाविकानवधिकातिषयेशितृत्वम
नारायण त्वयि न मृष्यति वैदिक: क: |

ब्रह्मा शिवश्शतमख परम: स्वराडिति
एते’पि यस्य महिमार्णवविप्रुशस्थे ||

हे नारायण! ब्रह्मा, शिव, इंद्र और मुक्तात्मा, जो कर्म से बंधे नहीं हैं और उन सभी दूसरे देवताओं से बड़े हैं – ये सभी व्यक्ति आपकी महानता के सागर में एक बूंद के समान हैं; कौन सा वैदिक (वेद का अभ्यास करने वाला) आपके ऐश्वर्य (नियंत्रण करने की क्षमता) को वहन नहीं करेगा जो स्वाभाविक है और जिसमें असीम महानता है?

श्लोक 12 –

इस पासूर में, भगवान की पहचान के बारे में संदेह उत्पन्न करने वाले (सामान्य और विशिष्ट) नामों के अपेक्षा, श्रीआळवन्दार स्वामीजी दयापूर्वक उन नामों की व्याख्या कर रहे हैं जो व्यक्तिगत रूप से पूर्ण हैं और स्पष्ट रूप से भगवान की सर्वोच्चता की पहचान कराने में सक्षम हैं।

कश्श्री : श्रिय: परमसत्वसमाश्रय: क:
क: पुंडरिकनयन: पुरुषोत्तम: क: |

कस्यायुतायुतशतैककलांशकांशै विश्वं
विचित्रचिदचित्प्रविभागवृत्तम ||

श्रीजी (श्री महालक्ष्मी) का धन कौन है? शुद्ध सत्वता किसके पास है? कमल नयन कौन हैं? पुरुषोत्तम के नाम से किन्हें जाना जाता है? किसके संकल्प/ व्रत का एक छोटा सा अंश (कई करोड़ आकार के हजारवें हिस्से का) इस संसार जिसमें चेतन और अचेतन की विविध श्रेणियां हैं, को संभालता और बनाए रखता है?

श्लोक 13 –

श्रीआळवन्दार स्वामीजी इतिहास और पुराणों की घटनाओं के माध्यम से ब्रह्मा, रुद्र, आदि के क्षेत्रज्ञत्व (जीवात्मा होने) और भगवान के परत्व (सर्वोच्चता) होने की व्याख्या करते हैं।

वेदापहार गुरुपातक दैत्यपीडादि
आपात विमोचनमहिष्टफलप्रदानै: |

कोन्य: प्रजापशुपती परिपाति कस्य:
पादोदकेन स शिवस्स्वशिरोधृतेन ||

(भगवान के अलावा) और किसने, ब्रह्मा जो प्रजापति हैं और शिव जो पशुपति हैं, उनके अनेकों संकटों को दूर करके उनकी रक्षा की है, जैसे वेदों की चोरी [ब्रह्मा द्वारा वेदों को खोना], अपने पिता के सिर को तोड़ने के कारण प्राप्त पाप [रुद्र द्वारा ब्रह्मा का सिर तोड़ना] और असुरों द्वारा दिया गया दुःख [इंद्र और अन्य देवताओं के लिए] आदि? किसके श्रीपाद तीर्थ (गंगाजी का पवित्र जल, जो भगवान के चरण कमल से निकली है) को अपने शीश पर धारण करने से शिव शुद्ध हो गए थे?

श्लोक 14 –

श्री आळवन्दार स्वामीजी यहाँ (इन पांच पासूरों की श्रृंखला के निष्कर्ष स्वरूप) भगवान की सर्वोच्चता की व्याख्या करते है, जो ऐसे न्याय-संगत तर्क और बुद्धि विवेक पर आधारित है, जो प्रमाणों (अर्थात शास्त्र, प्रामाणिक शास्त्र) के अनुकूल हैं।

कस्योदरे हरविरिञ्चमुख: प्रपंच:
को रक्षतीममजनिष्ट च कस्य नाभे: |

क्रान्त्वा निगीर्य पुनरद्गिरति त्वदन्य:
क: केन वैष परवानिति शक्यशङ्क: ||

किसके उदर में शिव, ब्रह्मा आदि और संसार वशीभूत थे? इस दुनिया की रक्षा कौन कर रहा है? किसकी नाभिकमल से (यह संसार) उत्पन्न हुआ? आपके अलावा और किस ने इस दुनिया को नाप कर, निगल कर, फिर से उगल दिया? क्या इस संसार की प्रभुता पर तनिक भी संदेह हो सकता है?

श्लोक 15 –

इस श्लोक में जो बताया गया है, जबकि वह स्पष्ट रूप से प्रामाणिक ग्रंथों के माध्यम से भी स्थापित किया गया है, जैसा कि श्री भगवत गीता 16.20 में कहा गया है “आसुरीं योनिमापन्ना” (असुर के रूप में जन्म लेना), यह सोचते हुए कि “हाय! ये आसुरी लोग आपको जानने का सुअवसर खो रहे हैं!” श्रीआळवन्दार स्वामीजी को ऐसे लोगों कि क्षति का दुख होता है। वैकल्पिक व्याख्या – इन विशिष्ट भगवान को आसुरी लोगों द्वारा नहीं देखा जाना चाहिए जैसा कि तिरुवाइमोळि 1.3.4 में कहा गया है “यारुमोर निलैमैयन् एन अरिवरीय एम्पेरुमान”, अर्थात भगवान ऐसे है कि उन्हें [ईर्ष्यालु] लोग नहीं समझ सकते क्योन्की उनके “ऐसे गुण है”)।

त्वां शीलरूपचरितै: परमप्रकृष्ट:
सत्वेन सात्विकतया प्रबलैश शास्त्रै: |

प्रख्यातदैवपरमार्थविदां  मतैश्च
नैवासुरप्रकृतय: प्रभवन्ति बोध्दुम् ||

[शोक!] आसुरी लोग, आपको जानने में असमर्थ हैं (अर्थात भगवान को, जो सर्वश्रेष्ठ है), जिनके विषय में हम इस प्रकार से जानते है-

• आपका शील गुण (सरलता का गुण), रूप (जिसे वेद द्वारा महिमामंडित किया जाता है) और (दिव्य) गतिविधियाँ,

• आपका निवास/ संपत्ति जो शुद्ध सत्व से परिपूर्ण है,

• शास्त्र जो अपनी अच्छाई की प्रकृति के कारण दृढ़ हैं और

• उन लोगों की सम्मति के माध्यम से जो आपके विषय में सच्चाई जानते हैं।

श्लोक 16 

श्रीआळवन्दार स्वामीजी महान आत्माओं द्वारा भगवान तक पहुँचने के बारे में विचार करते हैं जो कि भगवान की सादगी के कारण ही संभव है और इसे [उनके द्वारा भगवान को जानने/प्राप्त करने] वह (श्रीआळवन्दार स्वामीजी) अपना लाभ मानते हैं।

उल्लङ्घित  त्रिविध सीमसमातिशायी
संभावनं तव परिब्रढिमस्वभावं |

मायाबलेन भवता’पी निगुह्यमानं
पश्यन्ती केचिदनिशं  त्वदनन्यभावा: ||

वे (कुछ) महान आत्माएं, जो विशेष रूप से सिर्फ आपके विषय में ही विचार करते हुए आपके प्रभुत्व को देखते हैं, जो तीन प्रकार की सीमाओं (काल (समय), देश (स्थान) और वस्तु (इकाई)) से परे है और “क्या कोई आपके बराबर या उच्चतर है?” इस प्रकार के संदेह से भी परे है। वह भी तब जब आपके ऐसे स्वामित्व/ आधिपत्य को आपने अपनी अद्भुत क्षमता से छुपाया हुआ है।

श्लोक 17 –

यहाँ श्रीआळवन्दार स्वामीजी विभिन्न प्रकार की संस्थाओं की व्याख्या करते हैं, जो भगवान द्वारा नियंत्रित होती हैं और जो उनके सर्वेश्वरत्व (सभी पर प्रभुत्व) को सिद्ध करता है, जिसे पहले समझाया गया है।

यदण्डं अण्डान्तर गोचरं च यत्
दशोत्तराण्यावरणानि यानि च |

गुणाः प्रधानं पुरुशः परं पदं
परात्परं ब्रह्म च ते विभूतयः||

(1) ब्रह्माण्ड [ब्रह्मा के नियंत्रण में 14 परतों वाला अंडाकार आकार का ब्रह्मांड], (2) जो कुछ भी अंड के अंदर है, (3) वे [सात] आवरण (बाढ़ा) [जो अंड को आच्छादित करते हैं] जिनमें से प्रत्येक अपने पिछले के 10 गुना है और उन सभी की तुलना में आकार में बड़ा, (4) गुण जैसे सत्व (अच्छाई), रजस (राग) और तमस (अज्ञान), (5) मूल प्रकृति (प्राथमिक पदार्थ), (6) जीवात्माओं का संग्रह (चेतन संस्थाएं), (7) श्रीवैकुंठम (आध्यात्मिक क्षेत्र), (8) नित्यसूरियों का समूह जो मुक्तात्माओं से श्रेष्ठ हैं (जो ब्रह्मा और अन्य से शुरू होने वाले देवताओं से श्रेष्ठ हैं), और (9) दिव्य शुभ रूप हैं, ये सभी आपके शरीर/रूप है।

श्लोक 18 –

श्रीआळवन्दार स्वामीजी ने पहले “शरण्य” (शरण – भगवान) की महानता के बारे में बात की थी और इस श्लोक में, हममें जो झिझक है कि “मैं ऐसे उभय विभूति नाथ (दोनों दुनिया के स्वामी) तक कैसे पहुँच सकता हूं?”, उसको समाप्त करने के लिए भगवान के ऐसे बारह गुणों की व्याख्या करते है जो भक्तों को भगवान में लगाती हैं। वैकल्पिक रूप से – पहले भगवान के सर्वेश्वरत्वम (सर्वोच्चता) की व्याख्या की गई है और अब वे भगवान के उन गुणों के बारे में बोलते हैं जिनके बारे में बात करना उपयुक्त है।

वशी वदान्यो गुणवान् रुजुश्शुचिर्
मृदुर्दयालुर् मधुरस्थिरस् सम: |

कृती कृतज्ञस्त्वमसी स्वभावत:
समस्तकल्याणगुणामृतोदधि: ||

आप स्वाभाविक रूप से शुभ गुणों के अमृत सागर हैं जैसे (1) नियंत्रित होना (अपने भक्तों द्वारा), (2) उदार होना (अपने आप को अपने भक्तों के सामने प्रस्तुत करना), (3) सौशील्य (स्वभाव में उत्कृष्टता), (4) स्वयं को बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए प्रस्तुत करना, (5) ईमानदार होना (मन, वचन और कर्म में), (6) पवित्रता (निर्हेतुक अपनी दया प्रदान करना), (7) अपने भक्तों से वियोग को सहन करने में असमर्थ होना, (8) दयालु होना (अपने भक्तों का दुःख सहन नहीं कर सकना), (9) मधुर होना, रक्षा में दृढ़ होना (अपने भक्त की), (10) एक समान होना (उन सभी के लिए जो आपके प्रति समर्पण करते हैं), (11) कर्मों में संलग्न होना (अपने भक्तों के लिए, उन्हें अपना समझकर) और (12) अपने भक्तों के प्रति उनके छोटे से छोटे कृत्य के लिए भी आभारी होना।

श्लोक 19 –

श्रीआळवन्दार स्वामीजी कहते हैं कि जिस प्रकार भगवान के शुभ गुण असंख्य हैं, उसी प्रकार प्रत्येक गुण भी अपने आप में असीम है।

उपर्युपर्युब्जभुवो’पी पूरुषान्
प्रकलप्य ते ये शतमित्यनुक्रमात् |

गिरस् त्वदेकैकगुणावधीप्सया
सदा स्थिता नोद्यमतो’तिशेरते ||

अधिक से अधिक ब्रह्मा के लिए “ते ये शतं” (ऐसे सौ) का बार-बार पाठ करके, वेद वाक्य (पवित्र ध्वनियाँ / भजन) हमेशा नए ब्रह्मा की कल्पना करने पर केंद्रित होते हैं, जो आपके प्रत्येक गुण की सीमा को देखने की इच्छा रखते हैं, और जो अभी तक प्रारंभिक चरण से आगे नहीं बढ़े सके हैं।

श्लोक 20 –

श्रीआळवन्दार स्वामीजी अब उन भक्तों की महानता की व्याख्या करते हैं जो पहले बताए गए भगवान के गुणों के भोक्ता हैं। वैकल्पिक व्याख्या – यदि उन भक्तों के लिए इतनी महानता है जिन्होंने भगवान से इतनी महानता प्राप्त की है जैसा कि ब्रह्म सूत्र 1.1.20 में कहा गया है “अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ” (श्रुति ब्रह्म के साथ जीवात्मा की आनंदमय एकता की व्याख्या करती है, जो आनंदमय है), यह स्पष्ट है कि भगवान की महानता को मापा नहीं जा सकता।

त्वदाश्रितानां जगदुद्भवस्थिति
प्रणाशसंसारविमोचनादया: |

भवन्ति लीला विदयश्च वैदिका:
त्वदीय गंभीर मनोनुसारिण: ||

आपके भक्तों के लिए (जैसे ब्रह्मा आदि) संसार की रचना करना, रक्षा करना, संहार करना, संसार (भौतिक क्षेत्र) को पार करने में सहायता करना आदि, सभी आपके लिए क्रीड़ा के समान हैं; वेद के नियम भी आपके भक्तों के गहन दिव्य हृदयों का पालन करते हैं।

– अडियेन भगवती रामानुजदासी

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