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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 61 से 70

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 51 से 60 

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पाशुर ६१: जब श्रीरामानुज स्वामीजी के महानता के विषय में पूछताछ किया गया तो श्रीरंगामृत स्वामीजी ने बड़ी दया से उन्हें समझाया। 

कोळुन्दु विट्टु ओडिप् पडरुम् वेम् कोळ् विनैयाल् निरयत्तु
अळुन्दियिट्टेनै वन्दु आट्कोण्ड पिन्नुम् अरु मुनिवर्
तोळुम् तवत्तोन् एम् इरामानुसन् तोल् पुगळ् सुडर् मिक्कु
एळुन्ददु अत्ताल् नल् अदिसयम् कण्डदु इरुनिलमे

ऐसे संत आचार्य हैं, जो निरन्तर भगवान का स्मरण करते हैं और भगवान के लिए भी उनको पाना मुश्किल हैं। हमारे स्वामीजी श्रीरामानुजाचार्य में यह महानता हैं की ऐसे आचार्य उनके दिव्य चरणकमलों में नतमस्तक होते हैं और उन्होंने इस तपस्या को भगवान के शरण किया। मैं मेरे अनगिनत पापों के दु:ख से इस नरक रूपी संसार में डूबा हूँ। श्रीरामानुज स्वामीजी मुझे स्वीकार करके भी उनके दिव्य गुण चमक रही थी, शीघ्रता से सब स्थानों में फैल रही थी और कई अन्य जनों को भी डूबने से उठा रहे थे। यह देख कर यह विशाल भूमंडल आश्चर्यमग्न हुआ।

पाशुर ६२: वें बड़ी दया से अपनी संतुष्टी को प्रगट करते हैं कि उनके पापों से संपर्क को हटाया गया। 

इरुन्देन् इरुविनैप् पासम् कळऱ्ऱि इन्ऱु यान् इऱैयुम्
वरुन्देन् इनि एम् इरामानुसन् मन्नु मा मलर्त्ताळ्
पोरुन्दा निलै उडैप् पुन्मैयिनोर्क्कु ओन्ऱुम् नन्मै सेय्याप्
पेरुम् देवरैप् परवुम् पेरियोर् तम् कळल् पिडित्ते

हमारे नाथ श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रेष्ठ पादारविन्दों का आश्रयण नहीं करनेवाले नीचों के प्रति कभी किसी प्रकार का उपकार नहीं करनेवाले श्रीरंगनाथ भगवान की स्तुति करनेवाले महात्मा श्रीकूरेश स्वामीजी के पादारविन्दों की सेवा कर पाने के बाद,अब मैं पुण्यपापरूप कर्मबन्धन से मुक्त हुआ; अब से मैं सांसारिक क्लेशों से सर्वथा दूर हो गया। इस गाथा में यह सुंदर अर्थ बताया गया है कि श्रीरामानुज स्वामीजी के पादारविन्दों के आश्रित भाग्यवान ही भगवत्कृपा के पात्र होते हैं। और इस भाग्य से वंचित लोग तो ज्ञानभक्त्यादि- विभूषित होने पर भी भगवत्कृपा नहीं पा सकते। 

पाशुर ६३: श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी से उनके चरण कमलों की  सेवा कैंकर्य करने हेतु इच्छा का निवेदन करते हैं, क्योंकि अब वें अनावश्यक अस्तित्व से छुटकारा पाये हैं। 

पिडियैत् तोडरुम् कळिऱेन्न यान् उन् पिऱन्गिय सीर्
अडियैत् तोडरुम्पडि नल्ग वेण्डुम् अऱु समयच्
चेडियैत् तोडरुम् मरुळ् सेऱिन्दोर् सिदैन्दु ओड वन्दु इप्
पडियैत् तोडरुम् इरामानुस मिक्क पण्डिदने

बाह्य व कुदृष्टियों के षड्दर्शन रूप क्षुद्रगुल्मों में प्रवेश करनेवाले अविवेकी लोगों को पराजित व पलायमान बनाने के लिए इस भूतल पर अवतीर्ण, एवं (जनता का उद्धार करने के लिए) उसके पीछे पड़नेवाले हे श्रीरामानुज स्वामिन्! अपनी स्त्रीके पीछे पीछे ही चलनेवाले हाथी की भांति मैं भी आपकी कृपा से, सौन्दर्यादि शुभगुणविभूषित आपके पादारविन्दों का ही अनुसरण करूं। श्रेष्ठ उपवन में प्रवेश कर आनंद पानेवालों की भांति श्रेष्ठ श्रीवैष्णव मत के अनुयायी बन कर आनंदित होने के बदले में, कई लोग इस कारण से बाह्य व कुदृष्टि मतरूप क्षुद्र कंटकवाले गुल्मों में प्रवेश कर दुख भोग रहे हैं कि उनका पाप उन्हें ऐसी प्रेरणा दे रहा है। श्री रामानुज स्वामीजी का अवतार होने के बाद, ये सभी पापी जन वाद में पराजित होकर पलायमान हो गये।

पाशुर ६४: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि ,बाह्य (जो वेदों का पालन नहीं करते हैं) एवं कुदृष्टि (जो वेदों को गलत तरीके से पेश करते हैं) तत्ववाले जो तर्क वितर्क में शामिल होना चाहते हैं, इस संसार में उनका विरोध करने हेतु श्रीरामानुज स्वामीजी जो गजराज समान हैं, अवतार लिये हैं और उन जनों का बहुत शीघ्र अन्त भी होगा। 

पण् तरु माऱन् पसुम् तमिळ् आनन्दम् पाय् मदमाय्
विण्डिड एन्गळ् इरामानुस मुनि वेळम् मेय्म्मै
कोण्ड नल् वेदक् कोळुम् दण्डम् एन्दि कुवलयत्ते
मण्डि वन्दु एन्ऱदु वादियर्गाळ् उन्गळ् वाळ्वु अऱ्ऱदे

हमारे श्रीरामानुजमुनि मत्तगज श्रीशठकोपसूरी के अनुगृहीत मधुररागयुत सहस्रगीति के अनुभव से समुत्पन्न आनंदरूपी मदजलवाला होकर, सत्यार्थ प्रकाशक वेदरूपी डंडा लेकर इस भूमंडल पर संचार कर रहे है; अतः हे दुर्वादियों! तुम्हारा आयुष्य समाप्त हो गया। जब श्रीरामानुज स्वामीजी दिव्यप्रबंधों का ठीक अध्ययन का सत्य (नतु दूसरों की भांति मिथ्या) भूत वेदों के यथावस्थित अर्थों का वर्णन करने लगेंगे तब दुर्वादियों को इस भूतल पर रहने का स्थान कैसे मिलेगा ?

पाशुर ६५: श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा ज्ञान प्रदान  करने से श्रीरंगामृत स्वामीजी आनंदित होते हैं ताकि अब वे बाह्य और कुदृष्टि तत्ववालों पर विजय प्राप्त कर सके। 

वाळ्वु अऱ्ऱदु तोल्लै वादियऱ्कु एन्ऱुम् मऱैयवर् तम्
ताळ्वु अऱ्ऱदु तवम् तारणि पेऱ्ऱदु तत्तुव नूल्
कूळ् अऱ्ऱदु कुऱ्ऱमेल्लाम् पदित्त गुणत्तिनर्क्कु अन्
नाळ् अऱ्ऱदु नम् इरामानुसन् तन्द ग्यानत्तिले

हमारे श्रीरामानुज स्वामीजी से अनुगृहीत उपदेश से, इतने प्रकार के कल्याण हुए कि दुर्वादि नष्ट हो गये; वैदिकों का संकट परिहृत हुआ; भूतल भी भाग्यवान बना; तत्वशास्त्रों में सब की शंकाएं एवं भ्रम दूर हो गये; उनका निश्चित व वास्तविक अर्थ समझने में आया; और लोगों का पाप भी विनष्ट हो गया। कितने महान  बुद्धिमत्ता !!

पाशुर ६६: श्रीरंगामृत स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी का मोक्ष प्रदान करने के गुण का आनन्द लेते हैं। 

ज्ञानम् कनिन्द नलम् कोण्डु नाळ् तोरुम् नैबवर्क्कु
वानम् कोडुप्पदु मादवन् वल्विनैयेन् मनत्तिल्
ईनम् कडिन्द इरामानुसन् तन्नै एय्दिनर्क्कु अत्
तानम् कोडुप्पदु तन् तगवु एन्नुम् सरण् कोडुत्ते

साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान भी भक्तिरूप से परिणत ज्ञान से नित्य अपनी उपासना करने वालों को ही मोक्ष देते हैं। मुझ महापापी के हृद्गत समस्त कालुष्य मिटानेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी तो अपने आश्रितों को स्वयं अपनी कृपा रूप साधन देकर उस मोक्ष को प्रदान करते हैं। मोक्षप्रदान भगवान का प्रसिद्ध व मुख्य काम है। परंतु उनसे मोक्ष लेना बहुत कठीन हैं; क्योंकि अपने पास किसी साधन के विना खाली हाथ रहनेवालों को वे मोक्ष नहीं देंगे। वह साधन भी बहुत दुर्लभ है। तथाहि जिसे पहले ज्ञान उत्पन्न हो, और बाद में वह धीरे धीरे बढ़कर परभक्ति परज्ञान इत्यादि परमभक्ति तक की अवस्थाएं प्राप्त करें, और उसके फलतया निरंतर भजन भी सिद्ध हो, ऐसे भाग्यवान ही भगवान के श्रीहस्त से मोक्ष पा सकेगा। श्रीरामानुजस्वामीजी भी मोक्षप्रदान करते हैं; परंतु वे ऐसे साधन की प्रतीक्षा नहीं करते; किंतु अपने पादाश्रितों को अपनी कृपा ही साधन बनाकर, उनमें और किसी प्रकार की योग्यता के विना ही उन्हें मोक्ष देते हैं। अतः भगवतसन्निधि जाने की अपेक्षा श्रीस्वामीजी का आश्रयण करना ही मुमुक्षुओं के लिए श्रेयस्कर है।

पाशुर ६७: श्रीरंगामृत स्वामीजी यह स्मरण कर आनंदित होते हैं की कैसे श्रीरामानुज स्वामीजी ने उनकी रक्षा की यह निर्देश देते हुए कि  भगवान द्वारा उनके पूजा हेतु दिये हुए इंद्रियाँ का प्रयोग सांसारिक विषयोंमें न करें और यह कहते हैं की अगर श्रीरामानुज स्वामीजी ने यह नहीं किया होता तो, और कोई भी उनकी रक्षा नहीं करता। 

सरणम् अडैन्द दरुमनुक्काप् पण्डु नूऱ्ऱुवरै
मरणम् अडैवित्त मायवन् तन्नै वणन्ग वैत्त
करणम् इवै उमक्कु अन्ऱु एन्ऱु इरामानुसन् उयिर्गट्कु
अरण् अन्गु अमैत्तिलनेल् अरणार् मऱ्ऱु इव्वारुयिर्क्के

“अपनी शरण में आये हुए युधिष्ठिर के लिए पूर्वकाल में दुर्योधनादि एक सौ कौरवों का विनाश करनेवाले भगवान ने अपनी सेवा करने के साधनताया ही तुम्हें ये इन्द्रियाँ दी हैं; अतः ये तुम्हारे अपने भोगके लिए नहीं।” यदि श्रीरामानुज स्वामीजी यह उपदेश देते हुए आत्माओं की रक्षा नहीं करते; तो दूसरा कौन इनका रक्षक होता? (कोई नहीं ।) श्रीरामानुज स्वामीजी ने सबको यह उपदेश दिया की यह अत्यद्भूत मानवशरीर भगवान की सेवा करने के लिए ही मिला है, न तु भोग भोगने के लिए। भगवत्सेवा करने से ही आत्मा का उद्धार होगा; विषयोपभोग करने से अधोगति मिलेगी।

पाशुर ६८: इस संसार में रहते हुए मेरा मन और आत्मा श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्यों के गुणों में निरत रहता हैं। इसके पश्चात मेरे समान और कोई नहीं हैं। 

आर् एनक्कु इन्ऱु निगर् सोल्लिल् मायन् अन्ऱु ऐवर् देय्वत्
तेरिनिल् सेप्पिय गीतैयिन् सेम्मैप् पोरुळ् तेरिय
पारिनिल् सोन्न इरामानुसनैप् पणियुम् नल्लोर्
सीरिनिल् सेन्ऱु पणिन्ददु एन् आवियुम् सिन्दैयुमे

पूर्वकाल में पांडवों के दिव्य रथ पर (अर्जुन के सारथि के रूप में) विराजमान अत्याश्चर्यमय दिव्यचेष्ठितवाले श्रीकृष्णभगवान से अनुगृहीत भगवद्गीता के असली अर्थों को सबको सरलता से समझाते हुए गीताभाष्य रचनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी का भजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषों के कल्याणगुणों में मेरी आत्मा और मन मग्न हो गये। अब मेरे सदृश धन्य दूसरा कौन होगा? श्री रामानुज-भाष्य पढ़कर ही हम सरलता से भगवद्गीता के सच्चे अर्थ जान सकते हैं।

पाशुर ६९: भगवान से भी अधीक श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीरंगामृत स्वामीजी के उपर अनेक महान लाभार्थ को स्मरण करते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी बहुत आनंदित होते हैं।  

सिन्दैयिनोडु करणन्गळ् यावुम् सिदैन्दु मुन्नाळ्
अन्दम् उऱ्ऱु आळ्न्ददु कण्डु अवै एन् तनक्कु अन्ऱु अरुळाल्
तन्द अरन्गनुम् तन् चरण् तन्दिलन् तान् अदु तन्दु
एन्दै इरामानुसन् वन्दु एडुत्तनन् इन्ऱु एन्नैये

सृष्टि से पहले (अर्थात् प्रलयकाल में) जब मन और दूसरा इंद्रियां (और शरीर) स्थूल रूप छोड़कर उपसंहृत हुए थे और आत्मा अचेतन-सा रह गया, तब (ऐसे अचेतनप्राय प्राणियों में एक) मुझको अपनी कृपा से फिर शरीर व इंद्रियों का प्रदान करनेवाले श्रीरंगनाथ भगवान ने अपने पादारविन्द नहीं दिखाये( माने पादारविन्दों के दर्शन देकर मेरे उज्जीवित होने का मार्ग नहीं बताया )। हमारे नाथ श्री रामानुज स्वामीजी ने तो अपने आप ही उसे दिखाकर अब मेरा उद्धार किया ।

पाशुर ७०: श्रीरामानुज स्वामीजी को देखते हुए जिन्होंने इतना महान लाभ प्रदान किया हैं श्रीरंगामृत स्वामीजी पूछते हैं अब उनको और क्या प्रदान करेंगे जब कि  इतना कुछ अभी तक दे चुके हैं। 

एन्नैयुम् पार्त्तु एन् इयल्वैयुम् पार्त्तु एण्णिल् पल् गुणत्त
उन्नैयुम् पार्क्किल् अरुळ् सेय्वदे नलम् अन्ऱि एन् पाल्
पिन्नैयुम् पार्क्किल् नलम् उळद्E उन् पेरुम् करुणै
तन्नै एन् पार्प्पर् इरामानुसा उन्नैच् चार्न्दवरे

हे रामानुज स्वामिन्। (गुणलेश से भी दरिद्र और अनवधिक दोषों से पूर्ण) मुझको देखकर, आकिंचन्य व अनन्यगतित्वरूप मेरा स्वभाव देखकर और असंख्येय कल्याणगुणभरित अपने को भी देखने पर, मुझ पर कृपा करना ही आपके लिए उचित होगा। यह छोडकर, फिर भी यदि आप मुझमें किंचित् गुण ढूंढने का ही प्रयत्न करेंगे, (और यह निश्चय कर डालेंगे कि विना किंचितमात्र गुण के, इसका स्वीकार नहीं करना चाहिए) तो आपके आश्रित भक्त जन आपकी महती कृपा के बारे में क्या सोचेंगे? (उसे बहुत अल्प ही मानेंगे; अतः इस अपयश का अवकाश मत दीजिए ।) यह तो साधारण शास्त्र की मर्यादा है कि पुण्यवान मानव ही गुरुकृपा का पात्र होगा। परंतु जरा विचार करने पर कहना पड़ता है कि पुण्यवान के प्रति की जानेवाली कृपा अत्यल्प कृपा है, अथवा कृपा कहलाने योग्य ही नहीं। श्रेष्ठ, अथवा सच्ची कृपा तो वही होगी, जो कि सर्वथा गुणशून्य व पापपूर्ण व्यक्ति पर की जायगी। अतः आप मेरे पाप देखकर दया करने में प्रोत्साहित हो जाइए; इसके बदले में यदि आप संकोच पायेंगे, तो आपके पादाश्रित महात्मालोग आपकी कृपा को अत्यल्प समझ लेंगे। 

आधार : http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2020/05/ramanusa-nurrandhadhi-pasurams-61-70-simple/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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ರಾಮಾನುಜ ನೂಱ್ಱಂದಾದಿ – ಸರಳ ವಿವರಣೆ – 101 ರಿಂದ 108ನೆ ಪಾಸುರಗಳು

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ಶ್ರೀಃ ಶ್ರೀಮತೆ ಶಠಗೋಪಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತೆ ರಾಮಾನುಜಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತ್ ವರವರಮುನಯೆ ನಮಃ

ಪೂರ್ಣ ಸರಣಿ

ಹಿಂದಿನ ಶೀರ್ಷಿಕೆ << 91-100 ಪಾಸುರಗಳು

ನೂರ ಒಂದನೆಯ ಪಾಸುರಂ: ಎಂಪೆರುಮಾನಾರರ ಮಾಧುರ್ಯವು ಅವರ ಪವಿತ್ರತೆಗಿಂತ ಶ್ರೇಷ್ಠವಾದುದು ಎಂದು ಅಮುದನಾರರು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಮಯಕ್ಕುಂ ಇರು ವಿನೈ ವಲ್ಲಿಯಿಲ್ ಪೂಣ್ಡು ಮದಿ ಮಯಂಗಿತ್

ತುಯಕ್ಕುಂ ಪಿಱವಿಯಿಲ್ ತೋನ್ಱಿಯ ಎನ್ನೈ ತುಯರ್  ಅಗಱ್ಱಿ

ಉಯಕ್ಕೊಣ್ಡು ನಲ್ಗುಂ ಇರಾಮಾನುಶ ಎನ್ಱದು ಉನ್ನೈ ಉನ್ನಿ

ನಯಕ್ಕುಂ ಅವರ್ಕ್ಕು ಇದು ಇೞುಕ್ಕು ಎನ್ಬರ್ ನಲ್ಲವರ್ ಎನ್ಱು ನೈನ್ದೇ

ಅಜ್ಞಾನವನ್ನು ಉಂಟುಮಾಡುವ ಪಾಪ  ಮತ್ತು ಪುಣ್ಯ  ಎಂಬ ಎರಡು ವಿಧದ ಕರ್ಮಗಳ ಸರಪಳಿಯಿಂದ ಬಂಧಿತವಾಗಿರುವ, ಮನಸ್ಸನ್ನು ಗೊಂದಲಗೊಳಿಸುವ, ಜ್ಞಾನವನ್ನು ವಿಸ್ಮಯಗೊಳಿಸುವ ಜನ್ಮದಲ್ಲಿ ನಾನು ಹುಟ್ಟಿದ್ದೇನೆ. ಆ ಕರ್ಮಗಳ ಫಲವಾದ ಆಳವಾದ ದುಃಖಗಳನ್ನು ತೊಡೆದುಹಾಕುವಂತೆ ಮಾಡಿ, ರಾಮಾನುಜರು ನನ್ನನ್ನು ಉನ್ನತೀಕರಿಸಲು ನನ್ನನ್ನು ಸ್ವೀಕರಿಸಿದರು.  “ಓ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನನ್ನ ಕಡೆಗೆ ವಾತ್ಸಲ್ಯವನ್ನು ತೋರಿದವರು!” ಎಂಬ ನನ್ನ ಮಾತುಗಳನ್ನು ಮಹಾನ್ ವ್ಯಕ್ತಿಗಳು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. [ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನನ್ನನ್ನು ಮೇಲೆ ಎತ್ತಿದ್ದರಿಂದ] ನಿರಂತರವಾಗಿ ನಿಮ್ಮ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸುವ ಮತ್ತು ಕರಗುವವರಿಗೆ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಸಮಯದಲ್ಲೂ ನಿಮ್ಮ ಬಗ್ಗೆ ಪ್ರೀತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿರುವವರಿಗೆ ಅವಮಾನವಾಗುತ್ತದೆ.  ಮಾಧುರ್ಯವನ್ನು ಅನುಭವಿಸಿದವರಿಗೆ ಅವರ ಮನಸ್ಸು ಪರಿಶುದ್ಧತೆಯ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸುವುದಿಲ್ಲ ಎಂಬುದು ಇಲ್ಲಿನ ತಾತ್ಪರ್ಯವಾಗಿದೆ [ಇದುವರೆಗೂ , ಅಮುದನಾರ್ ಅವರು ವಿನಾಕಾರಣವಾಗಿ (ಅವರ ಶುದ್ಧತೆಯ ಪರಿಣಾಮ) ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ಚಟುವಟಿಕೆಗಳನ್ನು ವಿವರಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಆದರೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಿಗೆ ದಾಸ್ಯವನ್ನು ಮಾಡುವ ಆನಂದಕ್ಕೆ ಯಾವುದೇ ಸಾಟಿಯಿಲ್ಲ. ಆದ್ದರಿಂದ ಅಮುದನಾರರು ಈ ಮಾತುಗಳನ್ನು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ].

ನೂರ ಎರಡನೇ ಪಾಸುರಂ. ಈ ವಿಸ್ತಾರವಾದ ಪ್ರಪಂಚದಲ್ಲಿ ನಿಮ್ಮ ಉದಾತ್ತತೆಯ ಗುಣವು ತನ್ನ ಕಡೆಗೆ ಹೆಚ್ಚಲು ಕಾರಣವೇನು ಎಂದು ಅಮುಧನಾರ್  ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನೇ ಕೇಳುತ್ತಾರೆ.

ನೈಯುಂ ಮನಂ ಉನ್ ಗುಣಂಗಳೈ ಉನ್ನಿ ಎನ್ ನಾ ಇರುಂದು ಎಮ್

ಐಯನ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಎನ್ಱು ಅೞೈಕ್ಕುಂ ಅರು ವಿನೈಯೇನ್

ಕೈಯುಂ ತೊೞುಂ ಕಣ್ ಕರುದಿಡುಂ ಕಣಕ್ ಕಡಲ್ ಪುಡೈ ಸೂೞ್

ವೈಯಂ ಇದನಿಲ್ ಉನ್ ವಣ್ಮೈ  ಎನ್ ಪಾಲ್ ಎನ್ ವಳರ್ನ್ದದುವೇ  

ನಿನ್ನ ಶುಭ ಗುಣಗಳ ಕುರಿತು ಯೋಚಿಸುತ್ತಾ ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ದುರ್ಬಲವಾಗುತ್ತದೆ. ನನ್ನ ನಾಲಿಗೆ, ನನ್ನ ಪಕ್ಕದಲ್ಲಿ ದೃಢವಾಗಿ ಉಳಿದಿದೆ, ನಿಮ್ಮ ದೈವಿಕ ನಾಮಗಳನ್ನು ಮತ್ತು ನಿಮ್ಮ ನೈಸರ್ಗಿಕ ಸಂಬಂಧವನ್ನು [ನನ್ನೊಂದಿಗೆ] ಪಠಿಸುತ್ತದೆ. ಅನಾದಿಕಾಲದಿಂದಲೂ ಲೌಕಿಕ ಸಾಧನೆಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿದ್ದ ನನ್ನ ಪಾಪಿಷ್ಠ ಕೈಗಳೂ ನಿನಗೆ ನಮಸ್ಕಾರ ಮಾಡುತ್ತವೆ. ನನ್ನ ಕಣ್ಣುಗಳು ಯಾವಾಗಲೂ ನಿನ್ನನ್ನು ನೋಡಲು ಬಯಸುತ್ತವೆ. ಸಾಗರಗಳಿಂದ ಸುತ್ತುವರಿದಿರುವ ಈ ಭೂಮಿಯ ಮೇಲೆ ಯಾವ ಕಾರಣಕ್ಕಾಗಿ ನಿನ್ನ ಮಹಾನುಭಾವತೆ  ನನ್ನೆಡೆಗೆ ಬೆಳೆಯಿತು?

ನೂರ ಮೂರನೇ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರು ತನ್ನ ಕರ್ಮಗಳನ್ನು ಕರುಣೆಯಿಂದ ತೊಡೆದುಹಾಕಲು ಮತ್ತು ತನಗೆ ವಿಸ್ತಾರವಾದ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ನೀಡಿದ್ದರಿಂದ ತನ್ನ ಇಂದ್ರಿಯಗಳು ಅವರ ಕಡೆಗೆ ತೊಡಗಿಕೊಂಡವು ಎಂದು ಅಮುಧನಾರರು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ವಳರ್ ನ್ ದ ವೆಂ ಕೋಬಮ್  ಮಡಂಗಲ್  ಒನ್ಱಾಯ್ ಅನ್ಱು ವಾಳ್ ಅವುಣನ್

ಕಿಳರ್ನ್ದಪೊನ್  ಆಗಮ್ ಕಿೞಿತ್ತವನ್ ಕೀರ್ತಿಪ್ ಪಯಿರ್ ಎೞುಂದು

ವಿಳೈನ್ದಿಡುಂ ಸಿಂದೈ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಎಂದನ್ ಮೆಯ್ ವಿನೈ ನೋಯ್

ಕಳೈನ್ದು ನಲ್ ಜ್ಞಾನಮ್ ಅಳಿತ್ತನನ್ ಕೈಯಿಲ್ ಕನಿ ಎನ್ನವೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ತನ್ನ ಮಗನಾದ ಪ್ರಹ್ಲಾದಾಳ್ವಾನ್‌ಗೆ ದುಃಖವನ್ನುಂಟುಮಾಡಿದಾಗ ಕತ್ತಿಯನ್ನು ಹಿಡಿದು ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ನ ಬಳಿಗೆ ಬಂದ ಹಿರಣ್ಯ ಕಶ್ಯಪ ಎಂಬ ರಾಕ್ಷಸ , ಬೆಳೆಯುತ್ತಿರುವ ಮತ್ತು ವಿಶಿಷ್ಟವಾದ ಕ್ರೂರ ಕೋಪದಿಂದ, ದುರಭಿಮಾನದಿಂದ ಉಬ್ಬಿಕೊಂಡಿದ್ದ, ಚೆನ್ನಾಗಿ ಬೆಳೆದ, ಚಿನ್ನದ ಎದೆಯನ್ನು ಹರಿದು ಹಾಕಿದನು. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರವರು ಆ ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ ಸೃಷ್ಟಿಸಿದ ಬೆಳೆಗಳ ದಿವ್ಯ ಕೀರ್ತಿಯಿಂದ ಬೆಳೆದ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸಿನವರು. ಅಂತಹ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನನ್ನ ದೇಹದಿಂದ ನನ್ನನ್ನು ಬಂಧಿಸಿದ ಕರ್ಮಗಳ ಫಲವಾದ ದುಃಖವನ್ನು ಕರುಣೆಯಿಂದ ನನಗೆ ಕರುಣೆಯಿಂದ ಅಂಗೈಯಲ್ಲಿ ನೆಲ್ಲಿಕಾಯಿಯಂತೆ ಸ್ಪಷ್ಟವಾದ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ನೀಡಿದರು [ಅಂಗೈಯಲ್ಲಿ ನೆಲ್ಲಿಕಾಯಿ ಎಂಬುದು ಒಂದು ತಮಿಳು ಗಾದೆ, ಅದು ಯಾವುದೋ ಬಹಳ ಸ್ಪಷ್ಟವಾಗಿದೆ ಎಂದು ಸೂಚಿಸುತ್ತದೆ. ಮತ್ತು ತಪ್ಪಾಗಲಾರದು].

ನೂರ ನಾಲ್ಕನೇ ಪಾಸುರಂ. ಸ್ವತಃ ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ರವರೇ ಕೇಳಿದ ಕಾಲ್ಪನಿಕ ಪ್ರಶ್ನೆಗೆ ಉತ್ತರಿಸುತ್ತಾ “ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ನನ್ನು ಕಂಡರೆ ಏನು ಮಾಡುತ್ತೀರಿ?” ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ತನಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ವಿಷಯಗಳನ್ನು ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸಿದರೂ, ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಅವರ ದೈವಿಕ ರೂಪದಲ್ಲಿ ಪ್ರಕಾಶಿಸುವ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳನ್ನು ಹೊರತುಪಡಿಸಿ ಬೇರೇನನ್ನೂ ಕೇಳುವುದಿಲ್ಲ ಎಂದು ಅಮುದನಾರ್ ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. 

ಕೈ ಯಿಲ್ ಕನಿ ಅನ್ನ ಕಣ್ಣನೈಕ್ ಕಾಟ್ಟಿತ್ ತರಿಲುಮ್ ಉಂದನ್

ಮೆಯ್ಯಿಲ್ ಪಿಱಂಗಿಯ ಶೀರ್ ಅನ್ಱಿ ವೇಣ್ಡಿಲನ್ ಯಾನ್ ನಿರಯತ್

ತೊಯ್ಯಿಲ್ ಕಿಡಕ್ಕಿಲುಮ್ ಸೋದಿ ವಿಣ್ ಸೇರಿಲುಮ್ ಇವ್ವರುಳ್ ನೀ

ಸೆಯ್ಯಿಲ್ ದರಿಪ್ಪನ್ ಇರಾಮಾನುಶ ಎನ್ ಶೆೞುಂ ಕೊಣ್ಡಲೇ

ಮೇಘದಂತಹ ಮಹಾನುಭಾವನಾದ ಮತ್ತು ಆ ಮಹಾನತೆಯನ್ನು ನಮಗೆ ತೋರಿದ ರಾಮಾನುಜ! ಅಂಗೈಯ ಮೇಲಿರುವ ನೆಲ್ಲಿಕಾಯಿಯಂತೆ ನೀನು ನಮಗೆ ಕಣ್ಣನ್‌(ಕೃಷ್ಣ) ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ ಅನ್ನು ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸಿದರೂ, ನಿನ್ನ ದಿವ್ಯರೂಪದ ಮೇಲೆ ಅಮೋಘವಾಗಿರುವ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳನ್ನು ಬಿಟ್ಟು ಬೇರೇನನ್ನೂ ನಾನು ಪ್ರಾರ್ಥಿಸುವುದಿಲ್ಲ. ನಾನು ಅತ್ಯಂತ ಪ್ರಕಾಶಮಾನವಾಗಿರುವ ಪರಮಪದವನ್ನು ಪಡೆಯಬಹುದು ಅಥವಾ ನಾನು ಸಂಸಾರದಲ್ಲಿ ಸಿಕ್ಕಿಹಾಕಿಕೊಳ್ಳಬಹುದು. ನಿನ್ನ ಕೃಪೆಯಿಂದ ಎರಡರಲ್ಲಿ ಯಾವುದನ್ನಾದರೂ ದಯೆಯಿಂದ ನನಗೆ ದಯಪಾಲಿಸಿದರೆ, ನಾನು ಅದರಲ್ಲಿ ನನ್ನನ್ನು ಉಳಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತೇನೆ.

ನೂರ ಐದನೇ ಪಾಸುರಂ. ಸಂಸಾರವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸಬೇಕು ಮತ್ತು ಪರಮಪದವನ್ನು ಪಡೆಯಬೇಕು ಎಂದು ಎಲ್ಲರೂ ಹೇಳುತ್ತಿರುವಾಗ ಮತ್ತು ಆ ಪರಮಪದವನ್ನು ಪಡೆಯಲು ಬಯಸುತ್ತಿರುವಾಗ, ನೀವು ಎರಡನ್ನೂ ಸಮಾನವೆಂದು ಪರಿಗಣಿಸುತ್ತೀರಿ. ನೀವು ಬಯಸಿದ ಸ್ಥಳ ಯಾವುದು? ಅವರು ಈ ಪಾಸುರಂ ಮೂಲಕ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯಿಸುತ್ತಾರೆ.

 ಶೆೞುಂ ತಿರೈಪ್ ಪಾಱ್ಕಡಲ್ ಕಣ್ ತುಯಿಲ್ ಮಾಯನ್ ತಿರುವಡಿಕ್ಕೀೞ್

ವಿೞುನ್ದಿರುಪ್ಪಾರ್ ನೆಂಜಿಲ್ ಮೇವು ನಲ್ ಜ್ಞಾನಿ ನಲ್ ವೇದಿಯರ್ಗಳ್

ತೊೞುಂ ತಿರುಪ್ ಪಾದನ್ ಇರಾಮಾನುಶನೈತ್ ತೊೞುಂ ಪೆರಿಯೋರ್

ಎೞುಂದು ಇರೈತ್ತು ಆಡುಂ ಇಡಂ ಅಡಿಯೇನುಕ್ಕು ಇರುಪ್ಪಿಡಮೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಸುಂದರ ಅಲೆಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ತಿರುಪ್ಪಾರ್ಕಡಲ್ ಮೇಲೆ ಒರಗಿಕೊಂಡು ಮಲಗಿರುವಂತೆ ನಟಿಸುತ್ತಾ ಧ್ಯಾನಿಸುತ್ತಿದ್ದಾರೆ. ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಮಹಾನ್ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ, ಪ್ರಖ್ಯಾತ ವೈಧಿಕರಿಂದ (ವೇದಗಳನ್ನು ಅನುಸರಿಸುವವರು) ಪೂಜಿಸಲ್ಪಡುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರರ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳೊಂದಿಗೆ ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಂಡಿರುವ ಮತ್ತು ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಲ್ಲಿ ಬಿದ್ದವರ ಹೃದಯದಲ್ಲಿ ಸೂಕ್ತವಾಗಿ ಹೊಂದಿಕೊಳ್ಳುತ್ತವೆ. ಆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ನಿರಂತರವಾಗಿ ಆನಂದಿಸುವ ಮತ್ತು ಕೋಲಾಹಲದ ಸಾಗರದಂತೆ ನರ್ತಿಸುವ ಮಹಾನ್ ವ್ಯಕ್ತಿಗಳು ಅಂತಹ ಜನರ ಸೇವಕನಾದ ನಾನು ವಾಸಿಸಲು ಬಯಸುವ ಸ್ಥಳವಾಗಿದೆ.

ನೂರ ಆರನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್, ಅಮುದನಾರ್ ಅವರ ಬಗ್ಗೆ ಹೊಂದಿರುವ ಅಪಾರ ಪ್ರೀತಿಯನ್ನು ನೋಡುತ್ತಾ, ಕರುಣೆಯಿಂದ ಅಮುದನಾರರ ಮನಸ್ಸನ್ನು ಬಯಸುತ್ತಾರೆ. ಇದನ್ನು ನೋಡಿದ ಅಮುದನಾರರು ಸಂತೋಷದಿಂದ ಮತ್ತು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಈ ಪಾಸುರಂ ಪಠಿಸುತ್ತಾರೆ.

ಇರುಪ್ಪಿಡಮ್ ವೈಗುಂಡಂ ವೇಂಗಡಂ ಮಾಳಿರುಂಜೋಲೈ ಎನ್ನುಂ

ಪೊರುಪ್ಪಿಡಮ್ ಮಾಯನುಕ್ಕು ಎನ್ಬರ್ ನಲ್ಲೋರ್ ಅವೈ ತಮ್ಮೊಡುಂ ವಂದು

ಇರುಪ್ಪಿಡಮ್ ಮಾಯನ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಮನತ್ತು ಇನ್ಱು ಅವನ್ ವಂದು

 ಇರುಪ್ಪಿಡಮ್ ಎಂದನ್ ಇದಯತ್ತುಳ್ಳೇ ತನಕ್ಕು ಇನ್ಬುರವೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ನನ್ನು ಸತ್ಯವಾಗಿ ತಿಳಿದಿರುವ ಮಹಾನ್ ವ್ಯಕ್ತಿಗಳು, ಅವರ ಸ್ವರೂಪ (ಮೂಲ ಸ್ವಭಾವ), ರೂಪ (ಭೌತಿಕ ರೂಪಗಳು), ಗುಣಗಳು (ಶುಭಕರ ಗುಣಗಳು) ಮತ್ತು ವಿಭೂತಿ (ಸಂಪತ್ತು) ಗಳಲ್ಲಿ ಅದ್ಭುತವಾದ ಚಟುವಟಿಕೆಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಸರ್ವೇಶ್ವರನಿಗೆ ವಾಸಸ್ಥಾನಗಳು ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. ಇದನ್ನು ತಿರುಮಲೈ ಎಂದೂ ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ತಿರುಮಲಿರುಂಜೋಲೈನ ಪ್ರಸಿದ್ಧ ದೈವಿಕ ಪರ್ವತ. ಆ ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಕರುಣಾಪೂರ್ವಕವಾಗಿ ಆ ಎಲ್ಲಾ ದಿವ್ಯ ನಿವಾಸಗಳೊಂದಿಗೆ [ಮೇಲೆ ಉಲ್ಲೇಖಿಸಿರುವ] ಪ್ರವೇಶಿಸಿದ ಸ್ಥಳವು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸು. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಕರುಣಾಮಯಿಯಾಗಿ ಪ್ರವೇಶಿಸಿದ ಸ್ಥಳವನ್ನು ಶ್ರೇಷ್ಠ ಸ್ಥಳವೆಂದು ಪರಿಗಣಿಸಿದ್ದು , ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು.  

ನೂರ ಏಳನೇ ಪಾಸುರಂ. ತನ್ನ ಕಡೆಗೆ ವಾತ್ಸಲ್ಯವನ್ನು ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸಿದ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ದಿವ್ಯ ಮುಖವನ್ನು ನೋಡುತ್ತಾ, ಅಮುದನಾರ್ ಅವರು ಅವರಿಗೆ ಸಲ್ಲಿಸಲು ಬಯಸುತ್ತಿರುವ ಏನಾದರೂ ಇದೆಯೆ ಎಂದು ಕೇಳಿದರು ಮತ್ತು ಅವರ ಬಯಕೆಯನ್ನು ವ್ಯಕ್ತಪಡಿಸುತ್ತಾರೆ.

ಇನ್ಬುಱ್ಱ ಶೀಲತ್ತು ಇರಾಮಾನುಶ ಎನ್ಱುಂ ಎವ್ವಿಡತ್ತುಂ

ಎನ್ಬುಱ್ಱ ನೋಯ್ ಉಡಲ್ ತೋರುಮ್ ಪಿಱನ್ದು ಇಱಂದು ಎನ್ ಅರಿಯ

ತುಂಬುಱ್ಱು ವೀಯಿನುಂ ಸೊಲ್ಲುವದು ಒನ್ಱು ಉಂಡು ಉನ್ ತೊಂಡರ್ಗಟ್ಕೇ  

ಅಂಬುಱ್ಱು ಇರುಕ್ಕುಂಬಡಿ ಎನ್ನೈ ಆಕ್ಕಿ ಅಂಗು ಆಟ್ಪಡುತ್ತೇ

ಸರಳತೆಯ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಗುಣವನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಮತ್ತು ಕರುಣಾಮಯವಾಗಿ ಅತ್ಯಂತ ಸಂತೋಷದಿಂದ ಬಂದಿರುವ ಓ ರಾಮಾನುಜಾ! ನಾನು ನಿಮಗೆ ಮಾಡಲು ಬಯಸುವ ಒಂದು ಸಲ್ಲಿಕೆ ಇದೆ. ಮೂಳೆಗಳಿಗೆ ರೋಗಗಳು ಹರಡುವ ದೇಹಗಳಲ್ಲಿ ನಾನು ಪುನರಾವರ್ತಿತ ಜನನ-ಮರಣಗಳನ್ನು ಮಾಡುವುದನ್ನು ಮುಂದುವರೆಸಿದರೂ ಮತ್ತು ನಾನು ಅಸಂಖ್ಯಾತ ದುಃಖಗಳನ್ನು ಅನುಭವಿಸಿದರೂ, ನಿನಗಾಗಿಯೇ, ಎಲ್ಲಾ ಸಮಯದಲ್ಲೂ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಸ್ಥಳಗಳಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ನಿನಗಾಗಿಯೇ ಇರುವವರ ಬಗ್ಗೆ ಆಳವಾದ ಪ್ರೀತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಲು ನೀವು ನನ್ನನ್ನು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಸಕ್ರಿಯಗೊಳಿಸಬೇಕು. ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಿಗೆ ಸೇವಕರಾಗಿರಬೇಕು. ಇದೊಂದೇ ನಿಮ್ಮಲ್ಲಿ ನನ್ನ ಕೋರಿಕೆ.  

ನೂರ ಎಂಟನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಈ ಪ್ರಬಂಧದ ಆರಂಭದಲ್ಲಿ, ಅಮುದನಾರ್ ಅವರು “ಇರಾಮಾನುಸನ್ ಚರಣಾರವಿಂಧಂ ನಾಮ್ ಮನ್ನಿ ವಾೞ” (ನಾವು ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಅವರ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳಲ್ಲಿ ಯೋಗ್ಯವಾಗಿ ಬದುಕಬೇಕು) ಪ್ರಯೋಜನಕ್ಕಾಗಿ ಪ್ರಾರ್ಥಿಸಿದರು, ಅವರ ಸಂಪೂರ್ಣ ಭಕ್ತಿಯ ಬಯಕೆಯನ್ನು ಪೂರೈಸಲು ಪೆರಿಯ ಪಿರಾಟ್ಟಿಯಾರ್ ಅವರ ಶಿಫಾರಸು ಪಾತ್ರವನ್ನು ಕೋರಿದರು. ಈ ಕೊನೆಯ ಪಾಸುರಂನಲ್ಲಿಯೂ ನಮಗೆ ಕೈಂಕರ್ಯ ಸಂಪತ್ತನ್ನು ದಯಪಾಲಿಸಬಲ್ಲ ಪೆರಿಯ ಪಿರಾಟ್ಟಿಯಾರನ್ನು ಪಡೆಯಬೇಕೆಂದು ಕೇಳಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾನೆ.

ಅಂ ಕಯಲ್ ಪಾಯ್ ವಯಲ್ ತೆನ್ನರಂಗನ್ ಅಣಿ ಆಗಮ್ ಮನ್ನುಂ

ಪಂಗಯ ಮಾಮಲರ್ಪ್ ಪಾವಯೈಪ್ ಪೋಱ್ಱುದುಂ ಪತ್ತಿ ಎಲ್ಲಾಮ್

ತಂಗಿಯದು ಎನ್ನತ್ ತೞೈತ್ತು ನೆಂಜೇ ನಂ ತಲೈ ಮಿಶೈಯೇ

ಪೊಂಗಿಯ ಕೀರ್ತಿ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಅಡಿಪ್ ಪೂ ಮನ್ನವೇ

ಓ ಮನಸೇ ! ರಾಮಾನುಜರು ವ್ಯಾಪಕವಾದ ಖ್ಯಾತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ. ತಾಜಾ ಹೂವುಗಳಂತಿರುವ ಅಂತಹ ರಾಮಾನುಜರ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳು ನಮ್ಮ ತಲೆಯ ಮೇಲೆ ಸರಿಯಾಗಿ ಹೊಂದಿಕೊಳ್ಳಬೇಕು, ಇದರಿಂದ ಭಕ್ತಿಯ ಅಸ್ತಿತ್ವವು ಯಾವುದೇ ಕೊರತೆಯಿಲ್ಲದೆ ನಮ್ಮೊಳಗೆ ಬರುತ್ತದೆ ಎಂದು ನಾವು ಭಾವಿಸುತ್ತೇವೆ. ಅದು ಆಗಬೇಕಾದರೆ,ಅವನ ಗುರುತಾಗಿ, ತಾವರೆ ಹೂವಿನ ಮೇಲೆ ಹುಟ್ಟಿ, ಪೆರಿಯ ಪೆರುಮಾಳ್‌ನ ಸುಂದರ ದಿವ್ಯವಾದ ಎದೆಯ ಮೇಲೆ ಶಾಶ್ವತವಾಗಿ ನೆಲೆಸಿರುವ, ಸ್ವಾಭಾವಿಕ ಸ್ತ್ರೀತ್ವವನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ, ಮೀನುಗಳು ತಮಾಷೆಯಾಗಿ ಜಿಗಿಯುವ ಗದ್ದೆಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ತಿರುವರಂಗಂನಲ್ಲಿ ದೇವಾಲಯವನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಶ್ರೀರಂಗ ನಾಚ್ಚಿಯಾರ್ ಅವರನ್ನು ಪಡೆಯೋಣ. .     

ಅನುವಾದ : ಅಡಿಯೇನ್ ರಂಗನಾಯಕಿ ರಾಮಾನುಜ ದಾಸಿ

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रामानुस नूट्रन्ददि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या – पाशुर 51 से 60

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमत्  वरवरमुनये नम:

रामानुस नूट्रन्दादि (रामानुज नूत्तन्दादि) – सरल व्याख्या

<< पाशुर 41 से 50 

पाशूर ५१: श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी का इस संसार में अवतार लेने का एक मात्र उद्देश उन्हें (श्रीरंगामृत स्वामीजी) श्रीरामानुज स्वामीजी का दास बनाना हैं।

अडियैत् तोडर्न्दु एळुम् ऐवर्गट्काय् अन्ऱु बारतप् पोर्
मुडियप् परि नेडुम् तेर् विडुम् कोनै मुळुदुणर्न्द
अडियर्क्कु अमुदम् इरामानुसन् एन्नै आळ वन्दु इप्
पडियिल् पिऱन्ददु मऱ्ऱिल्लै कारणम् पार्त्तिडिले

पूर्वकाल में अपने पादारविन्दों का आश्रयण कर धन्य बनने वाले पंचपांडवों के लिए (अर्जुन का सारथी बनकर) घोड़े जुड़ा हुआ बडा रथ हांक कर दुर्योधनादियों का संहार करनेवाले, भगवान को (अर्थात् भगवान के स्वरूप रूप गुण विभूति इत्यादियों, अथवा सौशिल्य आश्रित पारतंत्र्य इत्यादि शुभगुणों को) पूर्णरूप से समझनेवाले भक्तों के अमृतवत् परमभोग्य रहनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझ पर अनुग्रह करने के लिए ही इस भूतल पर अवतार लिया; विचार करने पर दूसरा कोई कारण नहीं दिखता।

पाशूर ५२: जब पूछा गया कि क्या श्रीरामानुज स्वामीजी में उन्हें नियंत्रण करने में क्षमता हैं तब वें श्रीरामानुज स्वामीजी के अनगिनत क्षमताओं को समझाते हैं।

पार्त्तान् अऱु समयन्गळ् पदैप्प इप्पार् मुळुदुम्
पोर्त्तान् पुगळ्कोण्डु पुन्मैयिनेन् इडैत् तान् पुगुन्दु
तीर्त्तान् इरु विनै तीर्त्तु अरन्गन् सेय्य ताळ् इणैयोडु
आर्त्तण् इवै एम् इरामानुसन् सेय्युम् अऱ्पुदमे

हमारे गुरु श्री रामानुज स्वामीजी के ये सभी अद्भुत चेष्टित हैं कि उन्होंने अपनी दृष्टि डालने मात्र से (दुष्ट) षड्दर्शनों को शिथिल बना दिया; अपने यश से समग्र भूमंडल ढांक दिया; अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ नीच के हृदय में प्रवेश कर मेरे प्रबल पाप मिटा दिये; और मिटाने के बाद मेरे सिर को श्रीरंगनाथ भगवान के सुंदर पादारविन्दों के साथ मिला दिया ।

पाशूर ५३:  जब पूछा गया कि अन्य तत्वों का नाश कर श्रीरामानुज स्वामीजी ने क्या स्थापित किया तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने कहा कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने महान सत्य को स्थापित किया कि सभी चेतन और अचेतन भगवान पर हीं निर्भर हैं।  

अऱ्पुदन् सेम्मै इरामानुसन् एन्नै आळ वन्द
कऱ्पगम् कऱ्ऱवर् कामुऱु सीलन् करुदरिय
पऱ्पल्लुयिर्गळुम् पल्लुलगु यावुम् परनदु एन्नुम्
नऱ्पोरुळ् तन्नै इन्नानिलत्ते वन्दु नाट्टिनने

श्रीरामानुज स्वामीजी अपने शरण में मुझे लेने के लिये अवतार लिए , वें बहुत उदार हैं, उनमें बहुत साधारण गुण हैं जो ज्ञानियों को अभिलषित हैं, |उनके अद्भुत कार्य, उनमें सच्चाई हैं  अपने शिष्यों के लिये स्वयं को उचित बताने के लिये। मेरे उज्जीवन के लिए ही अवतीर्ण, परमोदार, ज्ञानियों के वांछनीयशीलगुणवाले, अत्याश्चर्य मय दिव्य चेष्टितवाले और आर्जव (सीधापन) गुणवाले श्री रामानुज स्वामीजी ने इस भूतल पर अवतार लेकर इस महार्थ की स्थापना की कि ये असंख्य आत्मवर्ग और (इनके निवासस्थान) ये सभी लोक भगवान की मिल्कियत हैं। (इससे अद्वैत मत का निरास सूचित किया जाता है।)

पाशूर ५४:  श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के श्रेष्ठता को स्थापित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप आगे श्रीरंगामृत स्वामीजी भाह्य तत्त्वों, वेदों और श्रीसहस्त्रगीति के स्थान को बताते हैं।

नाट्टिय नीसच् चमयन्गळ् माण्डन नारणनैक्
काट्टिय वेदम् कळिप्पुऱ्ऱदु तेन् कुरुगै वळ्ळल्
वाट्टमिला वण्डमिज़्ह् मऱै वाळ्न्ददु मण्णुलगिल्
ईट्टिय सीलत्तु इरामानुसन् तन् इयल्वु कण्डे

श्रीरामानुज स्वामीजी के स्वभाव को देखते हुए जो इस संसार में अपने गुणों को और  आगे बढ़ाते हैं, भाह्य अधम तत्त्व, जो अधम जनों द्वारा उनके स्वयं के परिश्रम से स्थापित किया गया हैं, ऐसे देह को त्याग दिया जैसे अंधेरा सूर्य के उगम से लुप्त हो जाता हैं। श्रीमन्नारायण का प्रतिपादन करनेवाले वेद आनंदित हुए; और सुंदर कुरुकापुरी में अवतीर्ण परमोदार श्रीशठकोपसूरी से अनुगृहीत, दोषरहित, द्राविड़वेद संजीवित हुआ । श्री रामानुज स्वामीजी ने श्रेष्ठ प्रमाण व युक्तियों के आधार से संस्कृत व द्राविड वेदों के सदर्थों का वर्णन किया; इससे उन वेदोंका दुःख दूर हुआ और दूसरे कुमत नष्ट हो गये ।

 पाशूर ५५:  वेदों को लाभ देनेवाले श्रीरामानुज स्वामीजी के गुणोंको  स्मरण कराते हुए श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, वह कुल जो श्रीरामानुज स्वामीजी के उदारता में निरत हैं और उनके शरण हुए हैं, वें उन पर शासन करना उचित हैं।

कण्डवर् सिन्दै कवरुम् कडि पोळिल् तेन्नरन्गन्
तोण्डर् कुलावुम् इरामानुसनै तोगै इऱन्द
पण् तरु वेदन्गळ् पार् मेल् निलविडप् पार्त्तरुळुम्
कोण्डलै मेवित् तोळुम् कुडियाम् एन्गळ् कोक्कुडिये

स्वरप्रधान अनंत वेदों को इस धरातल पर सुप्रतिष्ठित कराने वाले, परमोदार और सर्वजनमनोहर सुगंधि उपवनों से परिवृत एवं दक्षिणदिशा के अलंकारभूत श्रीरंगम दिव्यधाम के स्वामी श्रीरंगनाथ भगवान के परमभक्तों की प्रशंसा के पात्र श्री रामानुज स्वामीजी का सादर आश्रयण करनेवालों का कुल ही हमारे प्रणाम करने योग्य महात्माओं का कुल है। अर्थात् श्रीरामानुजभक्तों का कुल ही सत्कुल कहलाता है और उस कुलमें अवतीर्ण महात्माओं को हम अपने स्वामी मानते हैं।

पाशूर ५६:  जब श्रीरंगामृत स्वामीजी को यह स्मरण कराया गया कि वों यही वे सांसारिक विषयोंमें कहते थे, तब श्रीरंगामृत स्वामीजी कहते हैं कि, श्रीरामानुज स्वामीजी के शरण होने के पश्चात उनके शब्द और मन और किसी को पहचान नहीं सकते हैं।

 कोक्कुल मन्नरै मूवेळुगाल् ओरु कूर् मळुवाल्
पोक्किय द्Eवनैप् पोऱ्ऱुम् पुनिदन् बुवनमेन्गुम्
आक्किय कीर्त्ति इरामानुसनै अडैन्दपिन् एन्
वाक्कुरैयादु एन् मनम् निनैयादु इनि मऱ्ऱोन्ऱैये

क्षत्रियकुलोत्पन्न दुष्टराजाओं का तीक्ष्णकुठार से इक्कीस वार विनाश करनेवाले परशुराम भगवान की स्तुति करनेवाले, परमपवित्र एवं भूतलव्यापी यशवाले श्री रामानुजस्वामीजी का आश्रय लेनेपर, अब से मेरी वाणी दूसरे किसीका नाम नहीं लेगी; मेरा मन चिंतन नहीं करेगा। आचार्यों का सिद्धांत है कि परशुराम हमें उपासना करने योग्य नहीं; क्योंकि वह तो दुष्टक्षत्रिय निरासरूप विशेष कार्य सिद्धि के लिए अहंकारयुत किसी जीव में भगवान की शक्ति का आवेशमात्र है। अत एव उसे आवेशावतार कहते हैं; नतु श्रीरामकृष्णादिवत् पूर्णावतार। प्रकृतगाथा में इतना ही कहा गया है कि श्री रामानुजस्वामीजी उनकी स्तुति करते हैं, नतु उपासना। विरोधिनिरासरूप महोपकार का स्मरण करते हुए उनकी स्तुति करने में कोई आपत्ति नहीं हैं; क्योंकि यह उपासना नहीं हो सकती।

पाशूर ५७:  श्रीरंगामृत स्वामीजी से पूछा गया कि “आप कैसे कह सकते हैं कि आपके शब्द गुण नहीं गायेंगे और आपका मन किसी के बारें सोचेगा नहीं क्योंकि यह संसार हैं?” वें कहते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी को प्राप्त करने के पश्चात उनमे कोई नादानी नहीं हैं कुछ प्राप्त करने कि, सही और गलत में भेद करने की।  

 मऱ्ऱु ओरु पेऱु मदियादु अरन्गन् मलर् अडिक्कु आळ्
उऱ्ऱवरे तनक्कु उऱ्ऱवराय्क् कोळ्ळुम् उत्तमनै
नल् तवर् पोऱ्ऱुम् इरामानुसनै इन् नानिलत्ते
पेऱ्ऱनन् पेऱ्ऱपिन् मऱ्ऱु अऱियेन् ओरु पेदमैये

प्रयोजनान्तरों से विमुख होकर, श्रीरंगनाथ भगवान के पादारविन्दों में प्रवण महात्माओं को ही अपने आत्मबन्धु मानने वाले, अत्युत्तम कल्याण गुणवाले, और महातपस्वियों से संस्तुत श्रीरामानुजस्वामीजी को मैंने इस भूतल पर ही पाया; ऐसे पाने के बाद मैं विषयान्तर की इच्छा इत्यादि के हेतु किसी प्रकार का अज्ञान नहीं पाऊंगा।

 पाशूर ५८:  श्रीरंगामृत स्वामीजी प्रसन्न होते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने ऐसे जनों के तत्त्वों को नष्ट किया जिन्होने वेदों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया हैं।

पेदैयर् वेदप् पोरुळ् इदु एन्ऱु उन्नि पिरमम् नन्ऱु एन्ऱु
ओदि मऱ्ऱु एल्ला उयिरुम् अह्दु एन्ऱु उयिर्गळ् मेय् विट्टु
आदिप् परनोडु ओन्ऱु आम् एन्ऱु सोल्लुम् अव्वल्लल् एल्लाम्
वादिल् वेन्ऱान् एम् इरामानुसन् मेय्म् मदिक् कडले

कितने अविवेकी जन यों कहते थे कि, ” ब्रह्म एक ही सत्य है; दूसरे सभी जीव उससे अभिन्न हैं, और शरीर छूटने के बाद ब्रह्म के साथ उनका ऐक्य पाना ही मोक्ष है; यही सकल वेदों का तात्पर्य है।” यथार्थज्ञाननिधि हमारे आचार्य श्रीरामानुजस्वामीजी ने इन सभी कोलाहलों को वाद में जीत लिया।

पाशूर ५९:  उनमें प्रसन्नता देखकर कुछ लोगों नें कहा कि आत्मा को शास्त्र के जरिये जाना जा सकता हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं श्रेष्ठ हैं। वें उत्तर देते हैं कि अगर श्रीरामानुज स्वामीजी कलियुग का अज्ञानता को नष्ट नहीं करते तो किसी को भी यह ज्ञान नहीं प्राप्त होता कि आत्मा के भगवान श्रीमन्नारायण हैं।

कडल् अळवाय तिसै एट्टिनुळ्ळुम् कलि इरुळे
मिडै तरु कालत्तु इरामानुसन् मिक्क नान्मऱैयिन्
सुडर् ओळियाल् अव्विरुळैत् तुरन्दिलनेल् उयिरै
उडैयवन् नारणन् एन्ऱु अऱीवार् इल्लै उऱ्ऱु उणर्न्दे

चतुस्सागर्पर्यंत आठों दिशाओं में जब कलि-अंधकार ही व्याप्त हुआ था, तब श्रीरामानुज स्वामीजी ने अवतार लेकर,चारों वेदों के उज्वल ज्योति से उस अंधकार को यदि नहीं मिटा दिया होता, तो कोई भी मानव यह अर्थ नहीं समझ सकता कि श्रीमन्नारायण समस्त जीवों के प्रभु हैं।

 पाशूर ६०: जब उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी के भक्ति के विषय में पूछा गया तो उन्होंने इसमे समझाया।

उणर्न्द मेइग्यानिअर् योगम् तोऱुम् तिरुवाइमोळियिन्
मणम् तरुम् इन्निसै मन्नुम् इडम् तोऱुम् मामलराळ्
पुणर्न्द पोन् मार्बन् पोरुन्दुम् पदि तोऱुम् पुक्कु निऱ्कुम्
गुणम् तिगळ् कोण्डल् इरामानुसन् एम् कुलक् कोळुन्दे

आत्मगुणों से परिपूर्ण व उज्वल, कालमेघ के समान परमोदार, हमारे कुलकूटस्थ श्रीरामानुज स्वामीजी तत्वज्ञानियों की प्रत्येक गोष्ठी में, सहस्रगीति (प्रभुति दिव्यप्रबंधों) की दिव्य सूक्ति की सुगंध से वासित प्रत्येक स्थल में एवं लक्ष्मीजी से आलिंगित श्रीवक्षवाले भगवान के एकैक दिव्यदेशमें विराजते हैं।

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अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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ರಾಮಾನುಜ ನೂಱ್ಱಂದಾದಿ – ಸರಳ ವಿವರಣೆ – 91 ರಿಂದ 100ನೆ ಪಾಸುರಗಳು

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ಶ್ರೀಃ ಶ್ರೀಮತೆ ಶಠಗೋಪಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತೆ ರಾಮಾನುಜಾಯ ನಮಃ ಶ್ರೀಮತ್ ವರವರಮುನಯೆ ನಮಃ

ಪೂರ್ಣ ಸರಣಿ

ಹಿಂದಿನ ಶೀರ್ಷಿಕೆ << 81-90 ಪಾಸುರಗಳು

ತೊಂಬತ್ತೊಂದನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಸಂಸಾರಿಗಳು ಯಾವುದೇ ವಿಷಯಗಳಲ್ಲಿ ಒಳಗೊಳ್ಳದಿದ್ದರೂ ಸಹ, ಅಮುದನಾರರು ಅವರನ್ನು  ಉನ್ನತಿಗೆ ತರಲು ರಾಮಾನುಜರು ಮಾಡಿದ ಪ್ರಯತ್ನಗಳನ್ನು ನೆನಪಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರನ್ನು ಶ್ಲಾಘಿಸುತ್ತಾರೆ.

ಮರುಳ್ ಸುರಂದು ಆಗಮ ವಾದಿಯರ್ ಕೂಱುಂ ಅವಪ್ ಪೊರುಳಾಮ್

ಇರುಳ್ ಸುರಂದು ಎಯ್ತ ಉಲಗು ಇರುಳ್ ನೀಂಗತ್ ತನ್ ಈಣ್ಡಿಯ ಶೀರ್

ಅರುಳ್ ಸುರಂದು ಎಲ್ಲಾ ಉಯಿರ್ಗಟ್ಕುಂ ನಾದನಂ ಅರಂಗನ್ ಎನ್ನುಂ

ಪೊರುಳ್ ಸುರಂದಾನ್ ಎನ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಮಿಕ್ಕ ಪುಣ್ಣಿಯನೇ

ಸಂಪೂರ್ಣ ಅಜ್ಞಾನದಿಂದ ಶೈವ ಆಗಮವನ್ನು (ಶಿವನಿಂದ ನೀಡಿದ ಗ್ರಂಥ) ಆಧರಿಸಿ ತಮ್ಮ ವಾದವನ್ನು ಮಂಡಿಸುವವರು ಪಾಸುಪಥರು. ಅವರ ಕೀಳು ಅರ್ಥಗಳಿಂದ ಜಗತ್ತು ಕತ್ತಲೆಯಲ್ಲಿ ಮುಳುಗಿತು. ಲೌಕಿಕ ಜನರ ಅಂಧಕಾರದ ಅಜ್ಞಾನವನ್ನು ಹೋಗಲಾಡಿಸಲು, ರಾಮಾನುಜರು ತಮ್ಮ ವಿಶಿಷ್ಟವಾದ ಕರುಣೆಯನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸಿದರು ಮತ್ತು ಶ್ರೀರಂಗನಾಥರು ಎಲ್ಲಾ ಆತ್ಮಗಳಿಗೆ ಅಧಿಪತಿ ಎಂದು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸಿದರು. ಅವರು ಮಹಾನ್, ಧರ್ಮನಿಷ್ಠ ವ್ಯಕ್ತಿ

ತೊಂಬತ್ತೆರಡನೇ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಯಾವುದೇ ಕಾರಣವಿಲ್ಲದೆ ಸ್ವೀಕರಿಸಿದ್ದಾರೆ ಮತ್ತು ಅವರು ಕರುಣೆಯಿಂದ ತನ್ನ ಆಂತರಿಕ ಮತ್ತು ಬಾಹ್ಯ ಇಂದ್ರಿಯಗಳೆರಡಕ್ಕೂ ವಿಷಯವಾಗಿ ನಿಂತಿದ್ದಾರೆ ಎಂದು ಅರಿತುಕೊಂಡು, ಅವರು ಸಂತೋಷವನ್ನು ಅನುಭವಿಸುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಇದಕ್ಕೆ ಕಾರಣವೇನು ಎಂದು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರನ್ನು ಕೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಪುಣ್ಣಿಯನೋನ್ಬು ಪುರಿಂದುಂ ಇಲೇನ್ ಅಡಿ ಪೋಱ್ಱಿ ಶೆಯ್ಯುಂ

ನುಣ್ ಅರುಮ್ ಕೇಳ್ವಿ ನುವನ್ಱುಂ ಇಲೇನ್ ಸೆಮ್ಮೈ ನೂಲ್ ಪುಲವರ್ಕ್ಕು

ಎನ್ ಅರುಮ್ ಕೀರ್ತಿ ಇರಾಮಾನುಶ ಇನ್ಱು ನೀ ಪುಗುಂದು ಎನ್

ಕಣ್ಣುಳ್ಳುಂ  ನೆಂಜುಳ್ಳುಂ ನಿನ್ಱ ಇಕ್ಕಾರಣಂ ಕಟ್ಟುರಯೇ

 ಈ ಪ್ರಯೋಜನವನ್ನು ಪಡೆಯಲು ನಾನು ಯಾವುದೇ ಪುಣ್ಯ ಕಾರ್ಯವನ್ನು ಮಾಡಿಲ್ಲ. ನಿನ್ನ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳನ್ನು ಪಡೆಯಲು ನಾನು ಯಾವುದೇ ತಪಸ್ಸನ್ನು [ಶಾಸ್ತ್ರಗಳನ್ನು ಕೇಳಲು] ಮಾಡಲು ಬಯಸಲಿಲ್ಲ. ಯಾವುದೇ ನಿರೀಕ್ಷೆಗಳಿಲ್ಲದ ಮತ್ತು ಶಾಸ್ತ್ರಗಳಿಗೆ ಸಮಾನವಾದ ಕವಿತೆಗಳನ್ನು ಹಾಡುವ ಪರಿಣಿತರೂ ಗ್ರಹಿಸಲು ಕಷ್ಟಕರವಾದ ಖ್ಯಾತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ರಾಮಾನುಜ! ನನ್ನ ಬಾಹ್ಯ ಕಣ್ಣು ಮತ್ತು ಆಂತರಿಕ ಕಣ್ಣಿಗೆ (ಮನಸ್ಸಿಗೆ) ನೀವು ವಸ್ತುವಾಗಿರುವ ಕಾರಣವನ್ನು ನೀವು ಮಾತ್ರ ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸಬೇಕು.

ತೊಂಬತ್ತಮೂರನೇ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ತನ್ನ ಸಲ್ಲಿಕೆಗೆ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯಿಸದ ಕಾರಣ, ರಾಮಾನುಜನು ಯಾರೂ ಕೇಳದೆ ಕುದ್ರುಷ್ಟಿ ತತ್ತ್ವಗಳನ್ನು ನಾಶಪಡಿಸಿದಂತೆಯೇ, ಅಮುಧನಾರರು ಕೇಳದೆಯೇ ಅವರು ತಮ್ಮ ಬಲವಾದ ಕರ್ಮಗಳನ್ನು (ಹಿಂದಿನ ಕರ್ಮಗಳನ್ನು) ಕಡಿದುಹಾಕಿದ್ದಾರೆ ಎಂದು ಸ್ವತಃ ಸ್ಪಷ್ಟೀಕರಣವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾರೆ.  ಮತ್ತು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರು ಏನೂ ಕಾರಣವಿಲ್ಲದೆ ಈ ಮೇಲಿನ ಕೆಲಸಗಳನ್ನು ಮಾಡುವವರು ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಕಟ್ಟಪ್ ಪೊರುಳೈ ಮಱೈಪ್ಪೊರುಳ್ ಎನ್ಱು ಕಯವರ್ ಸೊಲ್ಲುಮ್

ಪೆಟ್ಟೈಕ್ ಕೆಡುಕ್ಕುಂ ಪಿರಾನ್ ಅಲ್ಲನೇ ಎನ್ ಪೆರು ವಿನೈಯಕ್

ಕಿಟ್ಟಿಕ್ ಕಿೞನ್ಗೋಡು ತನ್ ಅರುಳ್ ಎನ್ನುಂ ಒಳ್ ವಾಳ್ ಉರುವಿ

ವೆಟ್ಟಿಕ್ ಕಳೈಂದ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ಎನ್ನುಂ ಮೆಯ್ತ್ ತವನೇ

ಶರಣಾದವರಲ್ಲಿ ನಾಯಕನಾದ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನನ್ನ ಬಳಿಗೆ ಬಂದು ನಾಶವಾಗದ ನನ್ನ ದೊಡ್ಡ ಪಾಪಗಳನ್ನು ಕಿತ್ತುಹಾಕಿದನು. ವೇಧಗಳ ಕೀಳು [ತಪ್ಪಾದ] ಅರ್ಥಗಳನ್ನು ನಿಜವಾದ ಅರ್ಥಗಳೆಂದು   ಬಹಿರಂಗಪಡಿಸಿದಾಗ ಕುದ್ರುಷ್ಟಿಗಳ ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳಿಸುವ ಹೇಳಿಕೆಗಳನ್ನು ನಿರ್ಣಾಮ  ಮಾಡಿದ ಮಹಾನ್ ದಾನವನು ಅಲ್ಲವೇ!     

ತೊಂಬತ್ತನಾಲ್ಕನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್  ಕರುಣೆಯಿಂದ ಶರಣಾಗತಿಯಲ್ಲಿ ದೃಢವಾದ ಲಂಗರು ಹಾಕುವಿಕೆಯಿಂದ ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿ ಮತ್ತು ಶ್ರೀವೈಕುಂಠದೊದಿಗೆ ಕೊನೆಗೊಳ್ಳುವ ಮೂಲಕ ತನ್ನನ್ನು ಸಾಧಿಸುವ ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಕರುಣೆಯಿಂದ ಪ್ರಯೋಜನಗಳನ್ನು ನೀಡಿದರೂ, ಅಮುಧಾನಾರ್ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್  ಅವರ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳನ್ನು ಹೊರತುಪಡಿಸಿ ಬೇರೇನನ್ನೂ ಅಪೇಕ್ಷಿಸುವುದಿಲ್ಲ ಎಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ತವಮ್ ತರುಂ ಸೆಲ್ವಂ ತಗವುಂ ತರುಂ ಸಲಿಯಾಪ್ ಪಿಱವಿಪ್

ಪವಂ ತರುಂ ತೀವಿನೈ ಪಾಱ್ಱಿತ್ ತರುಂ ಪರಂದಾಮಂ ಎನ್ನುಂ

ತಿವಮ್  ತರುಂ ತೀದಿಲ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ತನ್ನೈಚ್ ಚಾರ್ನ್ದವರ್ಗಟ್ಕು

ಉವಂದು ಅರುಂದೇನ್ ಅವನ್ ಶೀರ್ ಅನ್ಱಿ ಯಾನ್ ಒನ್ಱುಂ ಉಳ್ ಮಗಿೞ್ನ್ದೇ

  ತನ್ನನ್ನು ಸಾಧಿಸುವವರಿಗೆ ಪ್ರಯೋಜನವನ್ನು ನೀಡದಿರುವ ಕೊರತೆಯನ್ನು ಹೊಂದಿರದ ಎಂಪೆರುಮಾನರ್, ತನ್ನನ್ನು ಸಾಧಿಸುವವರಿಗೆ ಶರಣಾಗುವ ಕ್ರಿಯೆಯಲ್ಲಿ ದೃಢವಾದ ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ನೀಡುತ್ತಾನೆ. ಅವನು ಭಕ್ತಿಯ ಸಂಪತ್ತನ್ನು ನೀಡುತ್ತಾನೆ, ಅದು ಪ್ರಾಪ್ತ್ಯಂ (ಪ್ರಯೋಜನ) ಅದರ ಅಂತಿಮ ಫಲಿತಾಂಶಕ್ಕೆ ಸೂಕ್ತವಾಗಿದೆ. ಅವರು ಸಂಸಾರದಲ್ಲಿ ಜನ್ಮಗಳನ್ನು ಸೃಷ್ಟಿಸುವ ಕೆಟ್ಟ ಕಾರ್ಯಗಳನ್ನು ಹೊಡೆದುರುಳಿಸುತ್ತಾರೆ, ಇದು ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಹೊರತುಪಡಿಸಿ ಬೇರೆ ಯಾರಿಂದಲೂ ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ. ಅವರು ಪರಂಧಾಮಂ ಎಂದೂ ಕರೆಯಲ್ಪಡುವ ಶ್ರೀವೈಕುಂಠವನ್ನು ಕೊಡುತ್ತಾರೆ. ಇವನ್ನೆಲ್ಲ ಕೊಟ್ಟರೂ ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು  ಅವನ ಮಂಗಳಕರ ಗುಣಗಳನ್ನು ಬಿಟ್ಟು ಬೇರೇನನ್ನೂ ಆನಂದಿಸುವುದಿಲ್ಲ.

ತೊಂಬತ್ತೈದನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ಜ್ಞಾನ, ಶಕ್ತಿ ಇತ್ಯಾದಿಗಳ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸಿ ಅವರು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಈ ಪ್ರಪಂಚದವರಲ್ಲ ಮತ್ತು ಸಂಸಾರದೊಂದಿಗೆ ಯಾವುದೇ ಸಂಬಂಧವನ್ನು ಹೊಂದಿರದ ನಿತ್ಯಸೂರಿಗಳಲ್ಲಿ ಒಬ್ಬರು ಈ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಅವತರಿಸಿದ್ದಾರೆ ಎಂದು ಅವರು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ಉಳ್ ನಿನ್ಱು ಉಯಿರ್ಗಳುಕ್ಕು ಉಱ್ಱವನೇ ಸೆಯ್ದು ಅವರ್ಕ್ಕು ಉಯವೇ

ಪಣ್ಣುಂ ಪರನುಮ್ ಪರಿವಿಲನಾಮ್ಬಡಿ ಪಲ್ ಉಯಿರ್ಕ್ಕುಂ   

ವಿಣ್ಣಿನ್ ತಲೈ ನಿನ್ಱು ವೀಡು ಅಳಿಪ್ಪಾನ್ ಎಮ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್

ಮಣ್ಣಿನ್ ತಲತ್ತು ಉದಿತ್ತು ಉಯ್ಮಱೈ ನಾಲುಮ್ ವಳರ್ತ್ತನನೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಆತ್ಮಗಳನ್ನು ಪ್ರವೇಶಿಸುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ಅವುಗಳನ್ನು ಮೇಲಕ್ಕೆತ್ತಲು ಕ್ರಮಗಳನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುತ್ತಾನೆ. ಆದರೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರನ್ನು  ನೋಡಿದರೆ ಎಂಪೆರುಮಾನರಿಗೂ ಸಹ ಆತ್ಮಾಭಿಮಾನದ ಬಗ್ಗೆ ಅಷ್ಟೊಂದು ಪ್ರೀತಿ ಇಲ್ಲ ಎಂದು ಹೇಳಬಹುದು. ಏಕೆಂದರೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ , ನಮ್ಮ ನಾಥನ್ (ಪ್ರಭು) ಅಲೌಕಿಕ ಪ್ರದೇಶದಲ್ಲಿ ಶ್ರೀವೈಕುಂಠಂನ ಶ್ರೇಷ್ಠ ನಿವಾಸದಿಂದ, ಎಲ್ಲಾ ಆತ್ಮಗಳನ್ನು ಉದ್ಧರಿಸಲು ಮತ್ತು ಮೋಕ್ಷವನ್ನು ನೀಡುವುದಕ್ಕಾಗಿ ಬಂದವರು. ಇಲ್ಲಿರುವ ಯಾವ ದೋಷವೂ ತಟ್ಟದೆ ಭೂಮಿಯ ಮೇಲೆ ಅವತರಿಸಿದನು. ಎಲ್ಲರನ್ನು ಉದ್ಧಾರ ಮಾಡುವ ನಾಲ್ಕು ವೇದಗಳನ್ನು ಯಾವುದೇ ಕೊರತೆಯಿಲ್ಲದೆ ಎಲ್ಲರೂ ಉನ್ನತಿ ಹೊಂದುವಂತೆ ಪೋಷಿಸಿದರು.

ತೊಂಬತ್ತಾರನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್  ಕರುಣೆಯಿಂದ ವೇದಾಂತಗಳಿಗೆ (ಉಪನಿಷತ್‌ಗಳಿಗೆ) ಅನುಗುಣವಾಗಿ ಎರಡು ಮಾರ್ಗಗಳನ್ನು ತೋರಿಸಿದ್ದಾರೆ, ಅವುಗಳೆಂದರೆ ಭಕ್ತಿ  ಮತ್ತು ಪ್ರಪತ್ತಿ (ಶರಣಾಗತಿಯ ಕ್ರಿಯೆ). ಈ ಎರಡರಲ್ಲಿ, ನಿಮ್ಮ ಮಾರ್ಗವು ಸುಲಭವಾಗಿ ಸಾಗಿಸುವ ಪ್ರಪತ್ತಿಯೇ? ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ವಾತ್ಸಲ್ಯದಲ್ಲಿ ಆಶ್ರಯ ಪಡೆದಿದ್ದೇನೆ ಎಂದು ಅಮುದನಾರ್  ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ವಳರುಂ ಪಿಣಿ ಕೊಣ್ಡ ವಲ್ವಿನೈಯಾಲ್ ಮಿಕ್ಕ ನಲ್ವಿನೈಯಿಲ್

ಕಿಳರುಂ ತುಣಿವು ಕಿಡೈತ್ತಱಿಯಾದು ಮುಡೈತ್ತಲೈ ಊನ್

ತಳರುಂ ಅಳವುಂ ದರಿತ್ತುಂ ವಿೞುಂದುಂ ತನಿ ತಿರಿವೇಱ್ಕು

ಉಳರ್ ಎಮ್ ಇರೈಯವರ್ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ತನ್ನೈ ಉಱ್ಱವರೇ

  ಅನಿಯಮಿತ ದುಃಖಗಳನ್ನು ನೀಡುವ ಎದ್ದುಕಾಣುವ ಕರ್ಮಗಳಿಂದ (ಹಿಂದಿನ ಕರ್ಮಗಳು) ಶರಣಾಗತಿಯ ಅತ್ಯಂತ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಮಾರ್ಗದಲ್ಲಿ ಒಬ್ಬರು ಸುಲಭವಾಗಿ ಸಂಪೂರ್ಣ ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುವುದಿಲ್ಲ. ದುರ್ಗಂಧದ ಭಂಡಾರವಾಗಿರುವ ಮತ್ತು ಮಾಂಸ ಇತ್ಯಾದಿಗಳಿಂದ ಕೂಡಿದ ಈ ದೇಹವು ಸನ್ನಿಹಿತವಾದ ಛಿದ್ರವಾಗುವ  ಮರಣದ ಸಮಯದಲ್ಲಿ , ಉತ್ತಮ ಸೂಚನೆಗಳ ಮೂಲಕ, ಪ್ರಾಪಂಚಿಕ ಅನ್ವೇಷಣೆಗಳಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಂಡಿದ್ದ ಮತ್ತು ಯಾವುದೇ ಆಧಾರವಿಲ್ಲದೆ ತಿರುಗಾಡುತ್ತಿದ್ದ ನನಗೆ , ಯಾರಿಗೆ ನಮ್ಮ ಸ್ವಾಮಿ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಆಶ್ರಯವಾಗಿದ್ದಾರೋ  ಅವರೇ  ನನಗೆ  ಬೆಂಬಲ.

ತೊಂಬತ್ತೇಳನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್‌ಗೆ ಮಾತ್ರವಲ್ಲದೆ ಅವರ ಅನುಯಾಯಿಗಳಿಗೂ ಅಪೇಕ್ಷಿಸಲು ಕಾರಣವೇನು? ಅದೂ ಕೂಡ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರ ಕರುಣೆಯಿಂದ ಬಂದಿದೆ ಎಂದು ಅಮುದನಾರ್  ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ತನ್ನೈ ಉಱ್ಱು ಆಟ್ಚೆಯ್ಯುಂ ತನ್ಮೈಯಿನೋರ್  ಮನ್ನು ತಾಮರೈತ್ತಾಳ್

ತನ್ನೈ   ಉಱ್ಱು ಆಟ್ಚೆಯ್ಯ ಎನ್ನೈ ಉಱ್ಱಾನ್ ಇನ್ಱು ತನ್ ತಗವಲ್

ತನ್ನೈ ಉಱ್ಱಾರ್ ಅನ್ಱಿತ್ ತನ್ಮೈ ಉಱ್ಱಾರ್ ಇಲ್ಲೈ ಎನ್ಱು ಅರಿಂದು

ತನ್ನೈ ಉಱ್ಱಾರೈ ಇರಾಮುನಸನ್ ಗುಣಂ ಸಾಱ್ಱಿಡುಮೇ

ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಅವರು ತಮ್ಮ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಯೋಚಿಸಿದರು, ಬಂದು ತನ್ನನ್ನು ಸಾಧಿಸುವ ಜನರಿದ್ದರೂ, ತನ್ನನ್ನು ಪಡೆದವರನ್ನು ಸಾಧಿಸುವ ಮತ್ತು ಹೊಗಳುವವರು ಯಾರೂ ಇಲ್ಲ. ಹೀಗಾಗಿ, ಅವನು ನನ್ನನ್ನು ಅವನೊಂದಿಗೆ ಮಾತ್ರ ತೊಡಗಿಸಿಕೊಳ್ಳುವಂತೆ ಮಾಡಿದನು ಮತ್ತು ಇತರ ಎಲ್ಲ ಲೌಕಿಕ ಅನ್ವೇಷಣೆಗಳನ್ನು ಮರೆತುಬಿಡುತ್ತಾನೆ; ಆತನು ತನ್ನ ಸೇವಕರಾದವರ ಮಧುರವಾದ, ಪೂರಕವಾದ ದೈವಿಕ ಪಾದಗಳ ಹೊರತಾಗಿ ನನಗೆ ಬೇರೇನೂ ತಿಳಿಯದಂತೆ ಮಾಡಿದನು. ಅವರ ಕರುಣೆಯಿಂದಾಗಿ, ಅವರು ಇಂದು ನನ್ನನ್ನು ತಮ್ಮ  ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ಸ್ವೀಕರಿಸಿದರು.

ತೊಂಬತ್ತೆಂಟನೆಯ ಪಾಸುರಂ. ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ತನ್ನ ಕರ್ಮಗಳ ಆಧಾರದ ಮೇಲೆ ತನ್ನನ್ನು ಸ್ವರ್ಗ ಅಥವಾ ನರಕಕ್ಕೆ ಕಳುಹಿಸಬಹುದೆಂದು ಅಮುಧನಾರನು ತನ್ನ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಭಾವಿಸಿದನು ಮತ್ತು ಅದರ ಬಗ್ಗೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರನ್ನು   ಕೇಳಿದನು. ತನಗೆ ಶರಣಾದವರಿಗೆ ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ಹಾಗೆ ಮಾಡುವುದಿಲ್ಲ ಎಂದು ರಾಮಾನುಜರು ಭರವಸೆ ನೀಡುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಕಾತುರ ಬಿಡಲು  ಕೇಳಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ.

ಇಡುಮೇ ಇನಿಯ ಶುವರ್ಕ್ಕತ್ತಿಲ್ ಇನ್ನಂ ನರಗಲಿತ್ತುಚ್

ಚುಡುಮೇ ಅವಱ್ಱೈತ್ ತೊಡರ್ ತರು ತೊಲ್ಲೈ ಶುೞಲ್ ಪಿಱಪ್ಪಿಲ್

ನಡುಮೇ ಇನಿ ನ್ಂ ಇರಾಮಾನುಶನ್ ನಮ್ಮೈ  ನಮ್  ವಶತ್ತೇ

ವಿಡುಮೇ ಶರಣಂ  ಎನ್ಱಾಲ್ ಮನಮೇ ನೈಯಲ್ ಮೇವುದರ್ಕೇ

  ನಮ್ಮನ್ನು ಉದ್ಧಾರ ಮಾಡಲು ಬಂದಿರುವ ಎಂಪೆರುಮಾನ್‌ಗೆ “ನೀನು ನಮ್ಮ ಆಶ್ರಯ” ಎಂದು ಹೇಳಿದಾಗ, ಅವನು ನಮ್ಮನ್ನು ಲೌಕಿಕ ಅನ್ವೇಷಣೆಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿರುವವರಿಗೆ ಮಧುರವಾಗಿ ತೋರುವ ಸ್ವರ್ಗದಲ್ಲಿ ಬಿಡುವನೇ? ಅವನ ಪಾದಗಳನ್ನು ಪಡೆದ ನಂತರವೂ ನರಕದಲ್ಲಿ ಹಿಂಸಿಸಲ್ಪಡಲು ನಮಗೆ ಅವಕಾಶ ನೀಡಬಹುದೇ? ಸ್ವರ್ಗ ಮತ್ತು ನರಕವನ್ನು ಅನುಸರಿಸುವ ಜನನ ಮತ್ತು ಮರಣಗಳ ಪುನರಾವರ್ತಿತ ಚಕ್ರದಲ್ಲಿ ಸಿಕ್ಕಿಹಾಕಿಕೊಳ್ಳುವಂತೆ ಅವನು ನಮ್ಮನ್ನು ಬಿಡುತ್ತಾನೆಯೇ? ಅಥವಾ, ನಮ್ಮ ಇಚ್ಛೆಯಂತೆ ಬದುಕಲು ಆತನು ಅನುಮತಿಸುವನೇ? ಓ ಮನಸೇ! ನಾವು ಪಡೆಯುವ ಅಂತಿಮ ಪ್ರಯೋಜನದ ಬಗ್ಗೆ ದುಃಖಿಸಬೇಡಿ.

ತೊಂಬತ್ತೊಂಬತ್ತನೇ ಪಾಸುರಂ. ನಾವು ಬಾಹ್ಯರು (ವೇದಗಳನ್ನು ನಂಬದವರು) ಮತ್ತು ಕುದ್ರುಷ್ಟಿಗಳು (ವೇದಗಳನ್ನು ತಪ್ಪಾಗಿ ಅರ್ಥೈಸುವವರು) ಹೇರಳವಾಗಿ ಕಂಡುಬರುವ ಸ್ಥಳದಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುವುದರಿಂದ, ನಾವು ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳ್ಳುವ ಸಾಧ್ಯತೆ ಹೆಚ್ಚು ಇಲ್ಲವೇ? ರಾಮಾನುಜ ಬಂದ ನಂತರ ಈ ಜನರು ತಮ್ಮ ಜೀವನೋಪಾಯವನ್ನು ಕಳೆದುಕೊಂಡರು ಎಂದು ಅಮುಧನಾರ್  ಹೇಳುತ್ತಾರೆ.

ತರ್ಕಚ್ ಚಮಣರುಂ ಸಾಕ್ಕಿಯಪ್ ಪೇಯ್ಗಳುಂ ತಾೞ್ ಸಡೈಯೋನ್

ಸೊಲ್ ಕಱ್ಱ ಸೋಂಬರುಂ ಸೂನಿಯ ವಾದರುಂ ನಾನ್ಮರೈಯುಂ

ನಿಱ್ಕಕ್ ಕುಱುಂಬು ಸೆಯ್ ನೀಶರುಂ ಮಾಣ್ದನರ್ ನೀಳ್ ನಿಲತ್ತೇ

ಪೊಱ್ಕಱ್ಪಗಂ ಎಮ್ ಇರಾಮಾನುಶ ಮುನಿ ಪೋಂದ  ಪಿನ್ನೇ

ವಾಗ್ವಾದಗಳ ಮೂಲಕ ತಮ್ಮ ತತ್ತ್ವಜ್ಞಾನವನ್ನು ಜಾಣ್ಮೆಯಿಂದ ನಡೆಸುವ ಶಮಣರು, ತಮ್ಮ ತತ್ತ್ವವನ್ನು ನೆಪಮಾತ್ರದಂತೆ ಹಿಡಿದಿಟ್ಟುಕೊಳ್ಳುವ ಬೌದ್ಧರು, ಜಟಾಧಾರಿ ರುದ್ರರು ಹೇಳಿದ ಶೈವಾಗಮವನ್ನು ಕಲಿತು ತಪಸ್ಸು ಮಾಡುವ ಕೀಳು ತಾಮಸ (ಅಜ್ಞಾನ ಮತ್ತು ಸೋಮಾರಿತನ) ಹೊಂದಿರುವ ಶೈವರು.   ಮತ್ತು ಎಂಪೆರುಮಾನ್ ಅವರ ಅನುಮತಿಯೊಂದಿಗೆ, ಮೋಹಶಾಸ್ತ್ರಗಳನ್ನು (ಇತರರನ್ನು ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳಿಸುವ ಕೀಳು ಗ್ರಂಥ), ಮಾಧ್ಯಮಿಕರು (ಬೌದ್ಧಗಳ ಒಂದು ಉಪಪಂಗಡ) ಶೂನ್ಯಮ್ (ಶೂನ್ಯತೆಯ) ಸಿದ್ಧಾಂತವನ್ನು ಪ್ರತಿಪಾದಿಸುತ್ತಾರೆ, ಕುದೃಷ್ಟಿಗಳು, ಮೇಲಿನವುಗಳಿಗಿಂತ ಭಿನ್ನವಾಗಿ, ಆದರೆ ವೇದಗಳನ್ನು ಸ್ವೀಕರಿಸುತ್ತಾರೆ. ವೇದಗಳ ಅರ್ಥಗಳಿಗೆ ತಪ್ಪಾದ ವ್ಯಾಖ್ಯಾನ, ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್ ನಂತರ ನಾಶವಾಯಿತು, ಅವರು ಕಲ್ಪ  ವೃಕ್ಷದಂತಹ (ಇಷ್ಟವನ್ನು ಪೂರೈಸುವ ವೃಕ್ಷ) ಮತ್ತು ಈ ಜನರನ್ನು ನಮಗೆ ತೋರಿಸಿಕೊಟ್ಟವರು, ಈ ವಿಸ್ತಾರವಾದ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಅವತರಿಸಿದ್ದಾರೆ.

ನೂರನೇ ಪಾಸುರಂ. ಅವರ ದಿವ್ಯ ಮನಸ್ಸು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್  ಅವರ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳ ಮಧುರವಾದ ಅನುಭವಕ್ಕೆ ಅಪೇಕ್ಷೆಯಿಂದ ತೊಡಗಿರುವುದನ್ನು ನೋಡಿದ ಅಮುದನಾರರು ಎಂಪೆರುಮಾನಾರ್‌ ತನಗೆ ಬೇರೆ ಯಾವುದನ್ನಾದರೂ ತೋರಿಸಿ ತನ್ನನ್ನು ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳಿಸಬೇಡಿ ಎಂದು ಕೇಳಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ.

ಪೋಂದದು ಎನ ನೆಂಜು ಎನ್ನುಂ ಪೊನ್ವಂದು ಉನದು ಅಡಿಪ್ ಪೋದಿಲ್ ಒಣ್ ಶೀರ್       

ಆಂ ತೆಳಿ ತೇನ್ ಉಂಡು ಅಮರ್ನ್ದಿಡ ವೇಣ್ಡಿಲ್ ನಿಂ ಪಾಲ್ ಅದುವೇ

ಇಂದಿಡ ವೇಣ್ಡುಂ ಇರಾಮಾನುಶ ಇದು ಅನ್ಱಿ ಒನ್ಱುಂ

ಮಾನ್ದ ಕಿಲ್ಲಾದು ಇನಿ ಮಱ್ಱು ಒನ್ಱು ಕಾಟ್ಟಿ ಮಯಕ್ಕಿಡಲೇ

  ಸುಂದರವಾದ ಜೀರುಂಡೆಯಂತಿರುವ ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು, ಹೂವಿನಂತಿರುವ ನಿನ್ನ ದಿವ್ಯ ಪಾದಗಳ ತಂಪು ಮತ್ತು ಮೃದುತ್ವದ ದೋಷರಹಿತ ಮಧುವನ್ನು ಕುಡಿದು ಅಲ್ಲಿಯೇ ಶಾಶ್ವತವಾಗಿ ವಾಸಿಸಲು ನಿನ್ನ ಬಳಿಗೆ ಬಂದಿತು. ನೀವು ಅದನ್ನು ಕರುಣೆಯಿಂದ ಕೊಡಬೇಕು. ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು ಬೇರೆ ಯಾವುದನ್ನೂ ಆನಂದಿಸುವುದಿಲ್ಲ. ನೀನು ನನಗೆ ಬೇರೇನನ್ನೂ ತೋರಿಸಿ ನನ್ನನ್ನು ದಿಗ್ಭ್ರಮೆಗೊಳಿಸಬೇಡ.

ಅನುವಾದ : ಅಡಿಯೇನ್ ರಂಗನಾಯಕಿ ರಾಮಾನುಜ ದಾಸಿ

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