Daily Archives: August 26, 2021

periya thirumozhi – 2.3.7 – baradhanum thambi

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

periya thirumozhi >> Second centum >> Third decad

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Highlights from avathArikai (Introduction)

No specific introduction.

pAsuram

baradhanum thambi saththurukkananum ilakkumanOdu maidhiliyum
iravum nanpagalum thudhi seyya ninRa irAvaNAndhaganai emmAnai
kuravamE kamazhum kuLir pozhilUdu kuyilodu mayilgaL ninRAla
iraviyin kadhirgaL nuzhaidhal seydhaRiyAth thiruvallikkENik kaNdEnE

Word-by-Word meanings

baradhanum – SrI bharathAzhwAn
thambi – his younger brother
saththurukkananum – SrI SathrugnAzhwAn
ilakkumanOdu – with iLaiyaperumAL (lakshmaNa)
maidhiliyum – sIthAp pirAtti
iravum – in night
nal – distinguished (due to showing the entities)
pagalum – in day
thudhi seyya – to praise
ninRa – one who is mercifully present
emmAn – my lord
irAvaNAndhaganai – chakravarthith thirumagan who killed rAvaNan
kuravam – kurA flowers
kamazhum – spreading fragrance
kuLir – cool
pozhilUdu – in the garden
kuyilodu – with cuckoos (which are singing)
mayilgaL – peacocks
ninRu – standing along firmly
Ala – dancing
iraviyin kadhirgaL – sun’s rays (due to the density of the garden)
nuzhaidhal seydhaRiyA – not knowing to enter
thiruvallikkENik kaNdEnE – I saw in thiruvallikkENi

Simple translation

In thiruvallikkENi, in the cool garden where kurA flowers are spreading fragrance, cuckoos are singing and peacocks are dancing along, standing firm, where the sun’s rays are unable to penetrate inside due to the density of the garden, I saw my lord chakravarthith thirumagan, who killed rAvaNan, and is mercifully present, to be praised by SrI bharathAzhwAn, younger brother SrI SathrugnAzhwAn, iLaiya perumAL and sIthAp pirAtti in the night and distinguished day.

Highlights from vyAkyAnam (Commentary)

baradhanum thambi saththurukkananum – SrI bharathAzhwAn, and SrI SathrugnAzhwAn who is totally surrendered to him.

ilakkumanOdu maidhiliyum – This is a nice combination [as both are totally surrendered to SrI rAma].

iravu nal pagalum – Everyone will praise emperumAn. That is – those who witnessed his valour during the war and those who heard about his valour from others. The leaders will gather in groups and praise him.

iravu nal pagalum … – We are used to praising him when we have free time. Unlike that, emperumAn is of the nature that those who approach him will engage with him in day and night fully.

irAvaNAndhaganai … – They will praise the killing of rAvaNa only; one who made me to praise him like them.

kuravam … – In the invigorating garden where kuravA flowers are spreading fragrance. Along with the cuckoos, the peacocks are also dancing joyfully.

iraviyin … – The abode where ISvara’s orders are not respected [i.e. sun cannot enter]. Where it is said in thaiththirIya upanishath “bhIshOdhEthi sUrya:” (Sun fears bhagavAn and does his work), this abode is excluded from that.

In the next article we will enjoy the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

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तिरुप्पावै – सरल व्यख्या

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श्रीः  श्रीमते शठकोपाय  नमः   श्रीमते रामानुजाय  नमः   श्रीमत् वरवरमुनये नमः

मुदलायिरम्

श्री मणवाळ मामुनिगळ् अपने उपदेश रत्त्नमालैः के २२ वे पाशुर में, बहुत ही सुन्दर ढंग से  देवी आण्डाळ् की महानता का वर्णन करते है।

इन्ऱो तिरुवाडिप्पूरम् एमक्काग
अन्ऱो इन्गु आण्डाळ् अवदरित्ताळ् – कुन्ऱाद
वाळ्वान वैगुन्द वान् बोगम् तन्नै इगळ्न्दु
आळ्वार् तिरुमगळाराय् ।

क्या आज तिरुवाडिप्पूरम् (द्रविड़ आदि माह (उत्तर भारतीय आषाढ़ माह ) का पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र है ?

जैसे एक माता कुएं में गिरे अपने बच्चे को बचाने के लिये, कुएं में कूद जाती है, वैसे ही

श्री भूदेवी, श्री वैकुण्ठ के असीमित,आनंदमय अनुभव को छोड़कर

पेरियाळ्वार की पुत्री के रूप में श्रीविल्लिपुत्तूर में अवतरित हुयी ।

भगवान वराह अवतार में श्री भूदेवी के उद्धार के समय देवीसे  कहा था, “जीवात्मा मन से मेरा ध्यान करते हुये, पुष्पों से पूजा, आरधना करते, मनसे प्रार्थना करे, तो मुझे प्राप्त कर सकता है । ” कितनी कृपा और आश्चर्य की बात है।

आण्डाळ् ने स्वयं को ग्वालिन, श्रीविल्लिपुत्तूर को श्री गोकुल, उसकी सहेलियोंको ग्वालिनें, श्रीविल्लिपुत्तूर के वटपत्रशायि मन्दिर में विराजित भगवान वटपत्रशायि को कृष्ण (कान्हा ), और मन्दिर को नन्दगोप का घर माना।

अपनी अपार करुणा से आण्डाळ् ने भगवान को पाने के उपाय में, तमिल भाषा में,  सरलता से समझ में आने वाली पाशुर रचे, जिसे तिरुप्पावै कहते है।

यह भी बतलाया की एम्पेरुमान को पाने के लिये, एम्पेरुमान ही उपेय (साधन् है। एम्पेरुमान की प्रसन्नता के लिये उनका कैंकर्य ही काफी है। भागवतों के माध्यम से  और  नैप्पीनै पिराट्टि के पुरुषकार (सिफारिश्) से ही  एम्पेरुमान की प्राप्त्ति  हो सकती है.| यह हर जीवात्माका स्वरुप ( मूल गुण ) है 

सम्प्रदाय में आचार्यो पूर्वाचार्यों ने तिरुप्पावै को वेदों का सार माना है।

इसमें भगवद प्राप्ति का रहस्योद्घाटन भी है।

वेद यह कहते है की वेदज्ञ की सहायता से भगवान के, दिव्य श्रीचरणों की प्राप्ति हो सकती है। 

ऐसे ही तिरुप्पावै  कहता है कि  भगवद प्राप्त्ति के लिये, भागवतों के साथ भगवान की सेवा करना, केवल भगवानकी प्रसन्नता के लिये, सेवा जरुरी है।

इस रहस्य को हम तिरुप्पावै में पूरी तरह जान उसका आनन्दानुभव कर सकते है।

भगवद रामानुज स्वामीजी के अनेक नामों में एक नाम तिरुप्पावै जीयर भी था, यह उनके सदा तिरुप्पावै के अनुसन्धान के कारण पड़ा।  

इस प्रबंध की एक और विशेषता है कि, सिर्फ यही एक ऐसा प्रबंध है, जिसे बच्चो से लेकर बड़ों तक बहुत ही आनंद और उत्साह से गायन कर सकते है।

इस तिरुप्पावै का यह सरल भावार्थ पूर्वाचार्यों (उपदेशक) के व्याख्यानों पर आधारित है।

अडियेन श्याम सुन्दर रामानुज दास

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