आर्ति प्रबंधं – ४६

री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

पिछले पासुरम में मामुनि ,आचार्य के महत्त्व कि श्रेय जो गाते हुए उन्हीं के कृपा को अपनी उन्नति की कारण बतातें हैं।  इसी विषय कि इस पासुरम में और विवरण देतें हैं।

पासुरम ४६

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै तीविनैयोंदम्मै

गुरुवागि वंदु उय्यक्कोंडु – पोरुविल

मदि तान अळित्तरूळुम वाळवंरो नेंजे

एतिरासरक्कु आळानोम याम

 

शब्दार्थ:

नेंजे – हे मेरे ह्रदय !

याम – हम

आळानोम  – सेवक बने

एतिरासरक्कु –  एम्पेरुमानार के

(इसका कारण है )

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै – तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै (मामुनि के आचार्य )

गुरुवागि  – आचार्य के रूप में अवतार किये

वंदु –   और हमारे जगह को पधारें

तीविनैयोंदम्मै – हम, जो क्रूर पापों के घने बादल हैं

उय्यक्कोंडु  –  उन्के कृपा से स्वीकृत किये गए और उन्नति के योग्य माने गए

अळित्तरूळुम  – हमें आशीर्वाद किये , (यह देकर )

मदि तान  – तिरुमंत्र की ज्ञान

पोरुविल – जो अद्वितीय ( शास्त्र की भी किसी और से तुलना की जा सकती हैं, पर इसकी नहीं )

वाळवंरो – (हे मेरे ह्रदय!) यह इसी आचार्य के कृपा से ही हैं न ? ( इन्हीं के कारण हम एम्पेरुमानार के सेवक बने)

 

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मामुनि अपने आचार्य के श्रेय की वर्णन करतें हैं।  वें कहतें कि आचार्य के कृपा से पाए गए तिरुमंत्र से ही वें श्रीमन नारायण के सेवक के सेवक बन सकें।  

 

सपष्टीकरण

यहाँ पहले तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै की श्रेयस कि प्रशंसा की गयी हैं। श्रीमन नारायण के सारे भक्त जो श्री वैष्णव और इस साँसारिक लोक के दिव्य जीव याने  भूसुरर कहलातें हैं, इन सारें लोगों से तिरुवाय्मोळि दिव्य प्रबंध और अमृत मानी जातीं हैं। नम्माळ्वार खुद कहतें हैं, “तोंडरक्कमुदु उण्ण चोल मालैगळ सोन्नेन” (तिरुवाय्मोळि ९.४.९). तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै एक ऐसे आचार्य हैं जो तिरुवाय्मोळि को स्वास में लेकर उसी में जीतें थे। उसमें से तरह तरह के मकरंद कि आनंद उठाते हैं, जैसे शब्दों कि सजावट कि मकरंद , अर्थों की मकरंद और उन पासुरमो के मनोभाव कि मकरंद। वे केवल तिरुवाय्मोळि को धर्म मानकर जियें और अन्य शास्त्रों को घास समान मानें। वें नम्माळ्वार के चरण कमलों में शरणागति कर, उन्के प्रति सारें कैंकर्य किये।  तिरुवाय्मोळि के संबंध के कारण वें तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै कहलायें गए। मामुनि अपने ह्रदय को कहतें हैं , “हे मेरे प्रिय ह्रदय! हमें देखो। “अोप्पिल्ला तीविनैयेनै उय्यक्कोंडु (तिरुवाय्मोळि ७.९.४)” के वचनानुसार हम क्रूर पापों के प्रतिनिधि हैं। और तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै आचार्य के रूप में अवतार किये और हमें विमुक्त किये।” इसी को वें अपने उपदेश रत्न मालै में, “तेनार कमल तिरुमामगळ कोळूनन ताने गुरुवागि (उपदेश रत्न मालै ६१) कहतें हैं। आगे मामुनि कहतें हैं , “ वें (तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै) हमारें जगह पधारें और तिरुमंत्र से जनित यह दिव्य ज्ञान दिए। यह अन्य शास्त्रोँ से जनित ज्ञान से अलग हैं। हे मेरे ह्रदय!  उनके इस कृपा के कारण ही हमें एम्पेरुमानार के प्रति कैंकर्यं करने का भाग्य मिला। तिरुमंत्र में यहि उत्तम अर्थ प्रकट किया गया हैं कि, भगवान श्रीमन नारायण के सेवकों के सेवक रहना सर्व श्रेष्ट स्थिति हैं। और इस अर्थ को महसूस करने के कारण ही हम एम्पेरुमानार के नित्य सेवक बनते हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

आधार :  http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2017/03/arththi-prabandham-46/

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