आर्ति प्रबंधं – २३

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंधं

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उपक्षेप

पिछले दो पासुरों में, मणवाळ मामुनि, अपने आचार्य तिरुवाइमोळिप्पिळ्ळै और परमाचार्य एम्बेरुमानार के आशीर्वाद के विवरण किये। मणवाळ मामुनि के अभिप्राय हैं कि इन्के आशीर्वाद के बल पर वे निश्चित परमपद प्राप्त करेंगें और भगवान की अनुभव करेंगें।  शीघ्र “दिव्यस्थान मण्डप” में निवासित “दिव्य सिंहासन” पर विराजित भगवान की अनुभव  पाने केलिए मणवाळ मामुनि अपनी इच्छा प्रकट करते हैं।  

पासुरम

अडियारगळ कुळाङ्गळ अळगोलक्कम इरुक्क
अनंतमयमान मामणि मण्डपत्तु
पड़ियादूमिल पडुक्कयाय इरुक्कुम अनन्तन
पणमामणिगळ तम्मिन ओळी मंडलत्तिल इडैयिल
वडिवारुम मामलराळ वलवरुगु मट्रै
मण्मगळुम आय्मगळुम इडवरुगुम इरुक्क
नडुवाग वीट्रीरुक्कुम नारणनै कडुग
नान अनुभविक्कुम वगै नल्गु एन एतिरासा

शब्दार्थ 

एन एतिरासा – हे! यतिराजा ! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता!
कडुग – निश्चित ही आप शीघ्र
नल्गु – आशीर्वाद करें
नान – मैं
अनुभविक्कुम वगै – भोग  करें
नारणनै – श्रीवैकुंठनाथ
नडुवाग वीट्रीरुक्कुम – मध्य में विराजित, बिजली के बीच कमल की तरह, वर्षा की मेघ जैसे साँवले रंग के, दिव्य महिषियों के मध्य विराजित जो जग की राज करतें हैं।
वडिवारुम मामलराळ – प्रस्तावित दिव्य महिषियाँ हैं, दायें भाग में “ वडिवाय निन वलमारबिनिल वाळ्गिन्र मंगै” में प्रकटित  (तिरुपल्लाण्डु २)  अद्वितीय सौंदर्य और कोमल गुण संपन्न  पेरिय पिराट्टियार,
वलवरुगु – दायें भाग में
मट्रै मण्मगळुम आय्मगळुम – और भूमि पिराट्टि और नीळा देवी जो हैं
इडवरुगुम इरुक्क – बायें भाग में
अडियारगळ कुळाङ्गळ – इन्के संग, नित्यसुरियाँ (अनंत, गरुड़ विश्वक्सेन इत्यादि ) और मुक्तात्मायें (परांकुश और परकाल के जैसे ), यह मोतियों और रत्नों की सुन्दर संग्रहण की तरह दिखता हैं
अळगोलक्कम इरुक्क – सुंदर पंक्ति में
आनन्दमयमान मामणि मंडपत्तु – अत्यंत आनंदमय वेदी में , जो “तिरुमामणि मंडपम” जाना जाता हैं
पणमामणिगळ तम्मिन ओळी मंडलत्तिल इडैयिल – के सिरों से उत्पन्न प्रकाश के मध्य
पडियादुमिल – तुलना से पार
पडुक्कैयाय इरुक्कुम – अनंतन, जो दिव्य शय्या (श्रीमन नारायण के ) के रूप में सेवा करते हैं
अनंतन – “अनन्ताळ्वान” नाम से जाने जाते हैं

सरल अनुवाद

इस पासुरम में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज से, कोई विलंब के बिना शीघ्र श्रीवैकुंठनाथ की भोग करने के हेतु, आशीर्वाद करने को प्रार्थना करते हैं। मणवाळ मामुनि श्री वैकुंठनाथ की विवरण करते हैं कि वे अपने दिव्य महिषियाँ :पेरिय पिराट्टि, भूमि देवी तथा नीळा देवी के मध्य, अनन्त , गरुड़  विश्वक्सेन जैसे नित्यसुरियाँ एवं आळ्वारों और आचार्यो जैसे मुक्तात्माओं के श्रेयसी पंक्ति के मध्य, तिरुमामणि मण्डप में  विराजमान हैं।

स्पष्टीकरण

मणवाळ मामुनि कहते हैं , “हे! मेरे स्वामी ! यतियों के नेता! “अडियारगळ कुळाङ्गळ (तिरुवाय्मोळि २. ३. १० ) और “मामणि मण्टपत्तु अंतमिल पेरिन्बत्तडियार(तिरुवाय्मोळि १०. ९. ११ )” के जैसे सुंदर पंक्ति में हैं।  नित्यसूरियों में अनंत,गरुड़ ,विश्वक्सेन इत्यादि एवं मुक्तों में परांकुश, परकाल तथा यतिवरादि हैं। यें मोतियों और रत्नों के सुंदर संग्रहण की तरह दिखतीं हैं।  यह पंक्ति, “आनंदमयाय मंडप रत्नाय नमः” के अनुसार तेजोमय , अत्यंत आनंद से प्रकाशित “तिरुमामणि मंडप” के आगे हैं। अत्यंत कोमल तथा शीतल  “अनंतन” नामक सर्प  शैय्या, जो भगवान के नित्य कैंकर्य केलिए प्रसिद्द हैं, इस मंडप में हैं।  “आयिरम पैन्तलै अनंतन” (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४. ३. १० ), “सिरप्पुडैय पणनगळ मिसैचेळुमणिगळ विट्टेरिक्कुम (पेरियाळ्वार तिरुमोळि ४. ९. ७ ) तथा “दैवछुडर नडुवुळ (पेरिय तिरूमडल १) जैसे वचनों में अनंतन की वर्णन की गयी हैं। “वडिवाय निन वलमारबिनिल वाळ्गिन्र मंगै (तिरुप्पल्लाण्डु २ )” और “वडिक्कोल वाळ नेडुनकण (इरणडाम तिरुवन्दादि ८२ )” में जैसे वर्णन किया गया है, पेरिय पिराट्टि अपने सौंदर्य और कोमल गुण के  स्वरूप से पहचानी जातीं हैं। वें श्रीमन नारायण के दायें पक्ष में दर्शित हैं।  श्रीमन नारायण के बायें पक्ष में पेरिय पिराट्टि के छाया भूमि पिराट्टि एवं नीळा देवी हैं।  एक कमल तथा तीन बिजलियों के मध्य साँवले वर्षा के मेघ के समान दृश्य हैं, इन तीनों पिराट्टियों के मध्य, श्रीमन नारायण।  ये श्रीवैकुंठनाथ हैं जो (तिरुवाय्मोळि १०. ९. १ ) में “वाळपुगळ नारणन” से वर्णित हैं, जो वहाँ “वीट्रीरुंदु येळुलगम तनिक्कोल सेल्ल” (तिरुवाय्मोळि ४.५. १ ) के अनुसार लोकपरिपालन करने केलिए विराजित हैं। “ हे ! मेरे स्वामी एतिरासा ! कृपया मुझे आशीर्वाद कीजिये, जिससे मैं तुरंत इस श्रीवैकुंठनाथ को भोग कर सकूँ”

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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