Daily Archives: December 6, 2016

thiruvAimozhi – 4.2.7 – madandhaiyai

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Full series >> Fourth Centum >> Second decad

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kurmavatar

Introduction for this pAsuram

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s introduction

No specific introduction.

Highlights from nanjIyar‘s introduction

In seventh pAsuram – Mother says “My daughter desires for the thiruththuzhAy (thuLasi) from the divine feet of emperumAn who placed periya pirAtti (Sri mahAlakshmi) on his divine chest during the churning of the ocean to get nectar”.

Highlights from vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s introduction

See nanjIyar‘s introduction.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s introduction

See nanjIyar‘s introduction.

Highlights from nampiLLai‘s introduction as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

See nanjIyar‘s introduction.

pAsuram

madandhaiyai vaN kamalath thirumAdhinaith
thadam koL thAr mArbinil vaiththavar thALin mEl
vadam koL pUnthaNNanthuzhAy malarkkE ivaL
madangumAl vANudhaleer! en madak kombE

Listen

Word-by-Word meanings (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

madandhaiyai – one who is having (eternally enjoyable) stage of womanhood [girl between 14 and 19 years of age]
vaN – attractive
kamalam – having the lotus flower as her seat
thiru – (as said in “SrIdhEvi”) having the divine name of “thiru”
mAdhinai – having saundharyam (beauty) etc as a result of [perfect] femininity
thadam koL – huge
thAr – having garland (which reveals his supremacy)
mArbinil – in the divine chest
vaiththavar – mercifully keeping it ready (for her to climb and be seated there)
thALin mEl – on the divine feet (offered by the dhEvas of that time)
vadam – strung
koL – having
pU – attractive
thaN – cool
am – fresh
thuzhAy malarkku – for the thiruththuzhAy (thuLasi) garland
vAL nudhaleer – Oh girls who are having radiant forehead!
en – my
madam – humble
kombu – attractive like a slender twig
ivaL – my daughter
madangum – withers (being distressed)

Simple translation (based on vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s 12000 padi)

emperumAn is having huge garland in his divine chest, keeping it ready for the attractive Sri mahAlakshmi who is having the divine name of “thiru” (SrI), who is having eternally enjoyable stage of womanhood, who is having saundharyam (beauty) etc as a result of [perfect] femininity and is having the lotus flower as her seat; Oh girls who are having radiant forehead! my humble daughter who is attractive like a slender twig is desiring for the strung attractive cool fresh thiruththuzhAy (thuLasi) garland which is on the divine feet of such emperumAn and withers (being distressed).

Implies that, mother wants to see her daughter to be radiant like them.

vyAkyAnams (commentaries)

Highlights from thirukkurukaippirAn piLLAn‘s vyAkyAnam

See vAdhi kEsari azhagiya maNavALa jIyar‘s translation.

Highlights from nanjIyar‘s vyAkyAnam

See nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from periyavAchchAn piLLai‘s vyAkyAnam

See nampiLLai‘s vyAkyAnam.

Highlights from nampiLLai‘s vyAkyAnam as documented by vadakkuth thiruvIdhip piLLai

  • madandhaiyai – being in the stage of womanhood which is always enjoyable.
  • vaN kamalath thirumAdhinaiSri mahAlakshmi who is having beautiful lotus flower as her residence.
  • thadam koL … – emperumAn who placed SrI mahAlakshmi in his chest which is spacious to be the private quarters for her, and is having garland which is indicative of his control/wealth. As said in SrIvishNu purANam 1.9.105 “paSyathAm sarvadhEvAnAm yayau vakshasthalam harE:” (Amidst all the dhEvas (celestial beings) who were watching, SrI mahAlakshmi ascended the divine chest of SrI hari), during the churning of ocean to get nectar, that mahAlakshmi desires to climb his divine chest, emperumAn accepts her. My daughter [says AzhwAr’s mother] desired for the richly strung attractive cool fresh thuLasi flower from the divine feet of such emperumAn, and due to not getting it, she fell down and remained in a withered posture.
  • vAL nudhaleer – Oh girls who have forehead which has radiance! when will I see her in your splendour?
  • en madak kombE – Without separating from me, she remains steadfast in her goal and suffering as a result of that.

In the next article we will enjoy the next pAsuram.

adiyen sarathy ramanuja dasan

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शरणागति गद्य – चूर्णिका 5 – भाग 2

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श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नम:

शरणागति गद्य

<< चूर्णिका 5 – भाग 1

अब हम उनके स्वरुप के गुणों के विषय में जानेंगे। जिस प्रकार उनके रूप (विग्रह) के गुण, रूप के सुंदर आभूषणों के समान है, उसी प्रकार उनके स्वरुप के गुण भी उनके स्वरुप के आभूषणों के समान है।

 vishnu-weapons-ornaments

स्वाभाविक – प्राकृतिक; जिस प्रकार जल का निमित्त स्वभाव ठंडा है, उसी प्रकार भगवान के विषय में भी उनके स्वरुप के सभी गुण प्राकृतिक, नैसर्गिक है।

अनवधिकातिशय – उनके गुण अपरिमित है, जिनकी कोई सीमा नहीं है और अद्भुत है। प्रारम्भ में श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के 6 मूलभूत गुणों के विषय में चर्चा करते है – ज्ञान, बल….

ज्ञान– भूत, भविष्य और वर्तमान के सभी घटनाक्रमों को एक ही समय देखने का सामर्थ्य, जैसे वे अभी उनके नेत्रों के सामने ही घटित हो रहे हो।

बल– अपने संकल्प मात्र से सभी प्राणियों का संधारण करना (प्रलय के पश्चाद)

ऐश्वर्य – सभी प्राणियों का अनुरक्षण करना, उन्हें नियंत्रित कर उनका मार्गदर्शन करना

वीर्य – यद्यपि प्रलय के समय सभी प्राणियों का संधारण करने में अथवा नए युग के आरंभ में समस्त सृष्टि की रचना करते हुए, वे कभी भी थकते नहीं, न ही उनके विग्रह से स्वेदजल प्रवाह होता है। उनकी मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता।

शक्ति – यह उनकी शक्ति है, जो जीवात्माओं से उनके कर्मों के अनुसार कार्य करवाती है। जिन्हें एक साथ बांधा नहीं जा सकता ऐसी वस्तुओं को जोड़ना भी शक्ति कहलाता है। वे इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना का मूल तत्व भी है और इसे भी शक्ति के रूप में संबोधित किया जाता है।

तेज – उनमें सभी को जीतने का सामर्थ्य है। इस गुण को तेज कहा जाता है।

अपने आश्रितों के हेतु (जो उनके चरणों में शरण लेते है) वे अनेकों गुणों का दर्शन प्रदान करते है। उनमें से कुछ श्रीरामानुज स्वामीजी ने यहाँ दर्शाये है।

सौशील्य – ऊँच- नीच का भेदभाव न देखना ही सौशील्य है। भगवान के संदर्भ में सौशील्य यह है कि वे कभी अपनी श्रेष्ठता के विषय में नहीं सोचते। जिस सुगमता के साथ वे निषादराज, केवट, वानरराज सुग्रीव अथवा राक्षस विभीषण आदि के साथ मित्रता किये (मात्र मित्रता नहीं, अपितु उन्हें भ्राता का पद भी प्रदान किया) या ग्वालों से घनिष्ट मित्रता किये, यह सभी उनके सौशील्य के उदहारण है।

वात्सल्य – वह स्नेह, जो एक गैय्या (गाय) अपने अभी जन्मे बछड़े को करती है और उसके शरीर की गंदगी को अपनी जीभ से चाट कर साफ़ करती है। भगवान के संदर्भ में वात्सल्य यह है कि वे अपने आश्रितों के दोषों को भी उनके सद्गुण समझ कर क्षमा करते है।

मार्दव – ह्रदय से अत्यंत कोमल। विग्रह की कोमलता को सौकुमार्य  कहते है जैसा की हमने पहले अंक में देखा । मार्दव अर्थात ह्रदय की कोमलता/ सरसता । उनके लिए अपने आश्रितों से एक क्षण का वियोग भी असहनीय है।

आर्जव – जब भगवान अपने आश्रितों के साथ होते है, उनके मन, वचन और कर्म एक समान हो जाते है और वह पुर्णतः स्वयं को आश्रितों को सौंप देते है। इस गुण का वर्णन करने लिए अन्य शब्द सत्यता है।

सौहार्द्र – ह्रदय से उत्तम/ श्रेष्ठ। वे सदा सभी की भलाई का सोचते है (शुभचिन्तक)।

साम्यजीवात्मा के जन्म या उसके गुणों से परे, सभी जीवात्माओं के समान होकर रहते है। उन्होंने केवट और शबरीजी से सदा समानता का व्यवहार किया, बिना किसी भेदभाव के।

कारुण्य – किसी को विपत्ति में देखकर, उसकी सहायता करना, स्वयं के लाभ का न सोचते हुए, यह कारुण्य है।

माधुर्य – यद्यपि कोई शस्त्र से भगवान को हानि पहुंचाने की सोचे, वह उनके नेत्रों के स्नेह और प्रेम को देखकर शस्त्र त्याग देगा।

गांभीर्य – अत्यंत गहरा; भगवान आश्रितों के लिए सदैव हितकारी करते है, परंतु आश्रितों को यह ज्ञात नहीं कि भगवान क्या करेंगे, कैसे करेंगे और कितना करेंगे। वे अपने देने के सामर्थ्य और प्राप्त करने वाले की दीनता का कभी विचार नहीं करते।

औदार्य – प्रदान करने का गुण, अत्यंत उदारता। वे अपने आश्रितों को बिना मांगे ही प्रदान करते है। और वे कभी विचार नहीं करते कि किसे कितना दिया। उनके इस गुण और उपरोक्त वर्णित गुण, गांभीर्य में एक सूक्ष्म अंतर है। औदार्य वह गुण है जिसमें उनके प्रदान करने के गुण को दर्शाया गया है और गांभीर्य  वह गुण है जिसमें यह बताया गया है कि प्राप्त करने वाले को यह ज्ञात नहीं होता कि भगवान उसे कितना, कब और कैसे प्रदान करेंगे।

चातुर्य – ऐसी चतुराई जिसके फलस्वरूप श्रीजी भी उनके आश्रितों के दोषों को नहीं जान पाती। वे आश्रितों के मानस से उनकी रक्षा की शंका को दूर कर, उनकी रक्षा करते है। उदाहरण के लिए, जब सुग्रीव को श्रीराम के बाली से युद्ध करने के सामर्थ्य पर संदेह हुआ, तब उसने अपनी संतुष्टि के लिए भगवान से शौर्य सिद्ध करने के लिए कहा, और भगवान ने उसका रक्षण किया।

स्थैर्य – एक बार अपने आश्रित के रक्षण का निर्णय लेने पर भगवान फिर कभी अपने वचनों से पीछे नहीं हटते, फिर चाहे लाखों शत्रु उस आश्रित से एक साथ युद्ध के लिए आ जाये। वे अपने निर्णय पर दृढ़ता से स्थिर रहते है।

धैर्य– अपने उपरोक्त वर्णित गुण के समर्थन हेतु ह्रदय का साहस।

शौर्य – अपने आश्रितों के सभी शत्रुओं का विनाश करने का सामर्थ्य।

पराक्रम – लाखों शत्रुओं का एकसाथ सामना करने पर भी किंचित थकान नहीं होना।

सत्यकाम – उन गुणों को धारण करना, जो उनके आश्रितजन उनमें देखना चाहते है। यह सब उनके दिव्य गुण है और असीमित संपत्ति है।

सत्यसंकल्प – अपने संकल्प के द्वारा ऐसी रचना करना, जो व्यर्थ न जाये। यह दोनों गुण, उनके रक्षत्व गुण है (वे रचयिता है, रक्षक है और संहारक है)।

कृतित्व – जब आश्रित अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करते है, तब भगवान को ऐसा अनुभव होता है जैसे वह उन्हें ही प्राप्त हुआ है। वह इतना प्रसन्न होते है।

कृतज्ञता – एक बार आश्रित द्वारा शरण में आने पर, वे उस आश्रित के सभी दोषों और अपराधों का विचार न करके, मात्र उसके द्वारा की गयी शरणागति के विषय में ही विचार करते है। यद्यपि आश्रितों को सभी कुछ प्रदान करने के पश्चाद भी, वे सदा उनके सत्कर्मों की और ही देखते है और यह विचार करते है कि उस आश्रित को और अधिक कैसे दिया जा सकता है। और कभी जब वे आश्रितों को इच्छित प्रदान नहीं कर पाते, तो वे सदैव इसी विषय में ही विचार किया करते है (जैसे रामावतार में उन्होंने वन से राज्य में वापस लौटने की भरत की प्रार्थना अस्वीकार की)।

आदि – उपरोक्त वर्णित गुणों के अतिरिक्त भी और अधिक गुण उनमें निहित है।

असंख्येय – ऐसे सभी गुण भगवान में अगणित/ असंख्य है।

कल्याण – उनमें निहित सभी गुण अत्यंत दिव्य/ मंगलकारी है।

गुण गणौघ – यह सभी गुण अनेकों है और विशाल समूहों में है। हमारे संदर्भ में क्रोध एक बुरा गुण है। परंतु भगवान के संदर्भ में जब वे अपने आश्रितों से क्रोधित होते है, उसे भी सद्गुण कहा जाता है क्यूंकि वह आश्रित के हित में है, उसके लिए उचित है।

महार्णव – यह सभी गुण विशाल साग़र के सिन्धु है। यद्यपि हमें ब्रह्मा के चार मुख भी प्राप्त हो जाये तब भी हम उनके अनंत दिव्य गुणों का सम्पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी उनके आभूषणों और उनके शस्त्रों के बारे में चर्चा करते है।

स्वोचित – उनके अनुरूप। जिनमें उपरोक्त सभी गुण विद्यमान है अर्थात भगवान। श्रीरामानुज स्वामीजी अब उनके आभूषणों का वर्णन करते है। जैसे ज्ञान, बल, ऐश्वर्य आदि गुण उनके स्वरुप की सुंदरता को बढाते है, उसी प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी उन आभूषणों के गुणों का वर्णन करते है, जो भगवान के दिव्य विग्रह की सुंदरता को बढाते है।

विविध – यह आभूषण विभिन्न प्रकार के है। मोती अथवा मूंगा अथवा अन्य रत्नों से निर्मित।

विचित्र – यह आभूषण अनेकों प्रकार के है, किरीट (मुकुट) से प्रारंभ होकर नुपुर (पायल) तक

अनंत आश्चर्य – जो हमें अनंत आश्चर्य में डाल दे। यद्यपि वे विभिन्न रत्नों से सुसज्जित आभूषणों को धारण करते है, परंतु हम उनमें से किसी की भी शोभा/ सुंदरता को पूर्णतः आत्मसात नहीं कर सकते। वे सभी अत्यंत अद्भुत है। यदि हम उनकी हीरे की माला को देखें, हमारे नेत्र उसे त्यागकर उनके कर्ण आभूषण की और देखने में समर्थ नहीं है। यद्यपि हम उनके कर्ण आभूषण की और देखे, हम माला या कर्णफूल दोनों में से किसी की भी शोभा को पुर्णतः आत्मसात नहीं कर पायेंगे।

नित्यय निर्वद्य – इन अभूषणों में कोई दोष नहीं है, ये न बढ़ते है न ही क्षीण होते है। यह आभूषण सदा निरंतर कांतिमय रहते है। और, क्यूंकि यह आभूषण स्वभाव/ प्रकृति से चित्त है (हमारे द्वारा पहने जाने वाले आभूषणों के विपरीत), वे स्वयं के लिए न होकर भगवान की सेवा और कैंकर्य के लिए है।

निरतिशय सुगंध – उनके आभूषण भी मधुर सुंगंध युक्त है। हमें यह अद्भुत प्रतीत हो सकता है कि आभूषणों किस प्रकार से सुगंध प्रदान करते है। क्यूंकि भगवान का दिव्य विग्रह स्वयं ही अति दिव्य मधुर सुगन्धित है, तो उनके आभूषण से भी उसी प्रकार मधुर सुगंध प्रवाहित होती है। पुष्पों द्वारा भगवान का श्रृंगार मधुर सुगंध हेतु नहीं अपितु उनके दिव्य स्वरुप की शोभा बढाने हेतु है।

निरतिशय सुकस्पर्श – यह आभूषण भगवान को कोई कष्ट नहीं देते अपितु यह आभूषण उनके दिव्य विग्रह पर अत्यंत कोमल है। शयन अवस्था में भी उन्हें आभूषण निकालने की आवश्यकता नहीं है।

निरतिशय औज्ज्वल्य – उनके दिव्य विग्रह से स्वतः ही कांति का प्रवाह होता है। इन आभूषणों से उनके दिव्य विग्रह की कांति को आवरण प्रदान करते है, ऐसी उनकी महिमा है।

अब तक श्रीरामानुज स्वामीजी आभूषणों के गुणों का वर्णन कर रहे थे। अब वे शीष पर धारण करने वाले किरीट से प्रारम्भ कर पैरों की नुपुर तक, इन आभूषणों की सूचि का वर्णन करते है।

किरीटकिरीट. वह आभूषण है जिसे शीष पर धारण किया जाता है, कपाल के थोडा उपर।

मकुट – मकुट, ताज है जिसे किरीट के उपर धारण किया जाता है।

चुडाचुडा, वह आभूषण है जिसे कपाल से लेकर केशों के मध्य भाग तक धारण किया जाता है।

अवतंस – वह आभूषण जिसे कानों के उपर, सम्पूर्ण कानों को आवरित करते हुए पहना जाता है।

मकर कुंडल – मत्स्य की आकृति वाले कर्ण आभूषण।

ग्रैवेयक – कंठ के चरों और पहना जाने वाला वृत्तिय आभूषण।

हार– वक्ष स्थल में धारण की गयी माला।

केयूर – कंधे पर धारण किया जाने वाला आभूषण।

कटक – भुजा पर धारण किया जाने वाला कंकण।

श्रीवत्स – यह विशेषतः कोई आभूषण नहीं नहीं, अपितु विग्रह के तिल पर केशों का समूह है। जब श्रीजी, भगवान के वक्ष स्थल में विराजती है. तब यह श्रीवत्स उनके आसन को भी संबोधित करता है। अन्य आभूषणों से विपरीत जिन्हें विग्रह से प्रथक किया जा सकता है, श्रीवत्स उनके दिव्य विग्रह का ऐसा भाग है जो विग्रह से अविभाज्य है।

कौस्तुभ – वक्ष स्थल के मध्य में धारण किया गया एक हार, जो पञ्च रत्न जडित है। यह सभी जीवात्माओं का प्रतीकात्मक है।

मुक्ताधाम – मोती की माला, तीन अथवा पांच तार वाली।

उदर बंधन – कमर और उदार के मध्य पहना जाने वाला आभूषण। प्रलय के समय भगवान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रक्षा हेतु उन्हें अपने उदार में स्थान प्रदान करते है। यह आभूषण उनके इस महान कार्य के लिए पुरस्कार स्वरुप है। यह पडोसी से माखन और दही चुराने के कृत्य का उपहार है। एक ही आभूषण उनके स्वामित्व (जगत के स्वामी) और उनके सौलाभ्यता (सुगमता से प्राप्त होने वाले) दोनों को प्रदर्शित करता है।

पीताम्बर – पीले रंग का वस्त्र, जिसे धारण करना उनके सर्वेश्वर (सभी चित और अचित प्राणियों के स्वामी) स्वरुप को प्रदर्शित करता है, और जो उनकी कमर की शोभा को बढाता है।

काञ्चीगुण – पीताम्बर को यथा स्थान रखने के लिए पर कमर में पहने जाने वाला सूत्र।

नुपुर – पायल। भगवान के दिव्य चरण कमलों में विभूषित जो उनके आश्रितों/ शरणागतों के लिए एकमात्र आश्रय है।

आदि – उपरोक्त वर्णित आभूषणों के समान ही और बहुत से आभूषण। श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान द्वारा धारण किये गए सभी आभूषणों का वर्णन करने में असमर्थ है इसलिए “आदि” कहते है।

अपरिमित – अगणित। उनके द्वारा धारण किये हुए आभूषणों की कोई गिनती नहीं है।

दिव्य भूषण – दिव्य आभूषण। उनके दिव्य अंगों और उन अंगों में धारण किये जाने वाले उनके आभूषणों के मध्य एक अनुरूपता है।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के दिव्य आयुधों का वर्णन करते है।

स्वानुरूप – उनके रूप (दिव्य विग्रह) के अनुरूप। उनके आयुध उनके आश्रितों को आभूषणों के समान प्रतीत होते है और उनके शत्रुओं को वह शस्त्रों के समान प्रतीत होते है।

अचिंत्य शक्ति – उनके आयुधो की शक्ति हमारी कल्पना के परे है।

शंख चक्र गदा सारंग – यह उनके पांच मुख्य आयुध है। शंख, चक्र, गदा और सारंग (धनुष)। यह उनके कृपाण का भी वर्णन करता है, जिसे असी  कहा जाता है।

आदि– और भी अनेकों इसी प्रकार के आयुध।

असंख्येय – अगणित। जिस प्रकार उनके आभूषण अगणित है, उसी प्रकार उनके आयुध भी। श्रीवेदान्ताचार्य स्वामीजी ने उनके 16 आयुधों पर एक श्लोक की रचना की है।

नित्य – स्थायी, जिसमें बढ़ने या क्षीण होने के लक्षण न हो।

निरवद्य – जिसमें कोई दोष न हो। आयुधों में किस प्रकार का दोष हो सकता है? सामान्य शस्त्रों के विपरीत यह दिव्य आयुध भगवान के दिव्य विग्रह में शोभायमान होते है जैसे ही भगवान उनका स्मरण करते है। जब यह आयुध किसी शत्रु का वध करते है, वे ऐसा विचार नहीं करते कि उन्होंने शत्रु का संहार किया, अपितु इस भाव से कार्य करते है कि वे भगवान का अंग है और भगवान की इच्छानुरूप उन्होंने अपना कर्तव्य निवाह किया। नित्य निरवद्य का एक अर्थ यह भी है कि समय के साथ कुंद न होकर, वे शत्रुओं के विनाश के लिए और प्रखर होते है।

निरतिशय कल्याण – भगवान के साथ रहते हुए यह आयुध स्वभाव से मंगलकारी हो जाते है। वे अद्भुत भी है क्यूंकि भगवान द्वारा आदेश देने के पहले ही वे शत्रुओं के संहार का अपना कार्य पूर्ण करते है। भगवान के संकल्प/ विचार मात्र से वे अपना कार्य पूर्ण करते है।

दिव्यायुध – वे उन पञ्च तत्वों से निर्मित नहीं है, जिनके विषय में हम जानते है, अपितु स्वभाव से अप्राकृत (प्राकृत वस्तुओं से निर्मित नहीं) है।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी उनकी महिषियों के विषय में वर्णन करते है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बताते है भगवान की अनंत लावण्य और सुंदरता के साथ उनके अनंत गुणों, आभूषणों और आयुधों के सौंदर्य का आनंद लेने के लिए किसी की आवश्यकता है। वे आगे बताते है कि यह उनकी दिव्य महिषियों है, जो नित्य निरंतर भगवान के सौंदर्य का आनंद प्राप्त करती है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीजी के गुणों का वर्णन प्रथम चुर्णिका में किया है। फिर वे उन्हीं गुणों का संबोधन दोबारा यहाँ क्यूँ कर रहे है? श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा ऐसा कहने से तात्पर्य मात्र हमें निर्देश देना नहीं है अपितु डंका घोष से यह प्रकट करना है कि वे भगवान और श्रीजी के स्वरुप (विशेषताएं) और रूप (दिव्य विग्रह) में क्या आनंद अनुभूति प्राप्त करते है। क्यूंकि उनके शब्द भगवान और श्रीजी के प्रति उनके प्रगाढ़ प्रेम के सूचक है, हमारा द्वारा इसे पुनरावृत्ति समझना उचित नहीं है। और, पहले (प्रथम चूर्णिका में), उन्होंने अपने द्वारा श्रीजी के चरणकमलों में की गयी शरणागति की भूमिका के रूप में श्रीजी के इन गुणों का वर्णन किया था और यहाँ वे यह देखकर आनंदित प्रसन्नचित हो रहे है कि भगवान और श्रीजी एक दुसरे के साथ किस प्रकार अति उत्तम दिखाई देते है। हम उन शब्दों के अर्थों को संक्षेप में देखेंगे जिन्हें हमने चूर्णिका 1 में देखा था:

स्वाभिमत – भगवान द्वारा पसंद किया जाना

नित्य निरवद्य – कसी भी समय, बिना किसी दोष के

अनुरूप – रूप सौंदर्य में भगवान के ही समान

स्वरुप–भगवान के समान ही विशेषताएं

गुण – अनेकों सदगुणों के साथ

विभव – अकल्पनीय धन संपत्ति के स्वामी

ऐश्वर्य – सभी चित और अचित जीवों को नियंत्रित और निर्देशित करने का सामर्थ्य

शील – अवर प्राणियों से भी समान व्यवहार करना

आदि– और बहुत से गुण

अनवधिक अतिशय – कभी न क्षीण होने वाला और अद्भुत

असंख्येय – अगणित

कल्याण – मंगलकारी

गुणगण – ऐसे कल्याण गुणों का समूह।

अब हम विस्तार से इस चूर्णिका के उन शब्दों का अर्थ जानेंगे जिनका उल्लेख पहले नहीं हुआ है।

श्रीवल्लभा – श्री देवी (श्रीमहालक्ष्मीजी) के प्रति प्रेम। श्रीजी से अत्यंत प्रगाढ़ प्रेमावास्था। श्रीजी के स्वामी जिनके ऐसे महान उच्च दिव्य गुणों का वर्णन उपर किया गया है। जिसप्रकार एक लम्बे समय से भूखा व्यक्ति तीव्र इच्छा से भोजन की और देखता है, उसी प्रकार भगवान भी श्रीजी के स्वरुप को प्रेम से निहारते है।

एवं भूता – उपरोक्त वर्णित श्रेष्ठ गुणों को समान रूप से धारण करनेवाली।

भूमि नीला नायक – भूमि देवी और नीला देवी; यद्यपि यहाँ उनका उल्लेख भिन्न किया गया है, परंतु स्वरुप और रूप के संदर्भ में वे श्रीमहालक्ष्मीजी के समरूप ही है। यहाँ, भगवान को नायक संबोधन किया गया है और श्रीजी को वल्लभानायक वह है जिसके अधिकार का मान हो और जो आचार और नियमों के अनुसार व्यवहार करता है, यद्यपि वल्लभा वह है जिनके सभी कार्य प्रेम और स्नेह जनित है। ऐसा कहा गया है कि भूमि देवी और नीला देवीजी ने भगवान और श्रीजी के दासत्व को स्वीकार किया है और वे उनके प्रति इस कैंकर्य से अत्यंत संतुष्ट और प्रसन्न है।

अगले श्रीरामानुज स्वामीजी आगे बढ़ते हुए श्रीवैकुंठ में नित्य सूरियों का वर्णन करते है। नित्यसूरी, वे है जो सदा श्रीवैकुण्ठ में निवास करते है और जिन्होंने कभी लीला विभूति में जन्म नहीं लिया। आदि शेषजी, विष्वक्सेनजी, गरुडजी, नित्यसूरियों के समूह के अंग है। पंचम चूर्णिका के अगले भाग में हम इसे देखेंगे।

हिंदी अनुवाद- अडियेन भगवती रामानुजदासी

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