आर्ति प्रबंधं – अवतारिका (उपक्षेप)

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नम:  श्रीमते रामानुजाय नम:  श्रीमद्वरवरमुनये नम:

आर्ति प्रबंध

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उनके भक्त उन तक पहुँचे, यह श्री:पति श्रीमन नारायण निश्चित करते हैं। यह सफल होने केलिए वे अपने भक्तों में अपने तक पहुँचने कि इच्छा जागृत करते हैं। यह इच्छा क्रमशः परभक्ति, परज्ञान , परम भक्ति के रूप में खिल्ती हैं। नम्माळ्वार में श्रीमन नारायण ने ऐसी सुसंस्कृत भक्ति कि रचना की और उनके प्राकृतिक शरीर के साथ स्वीकार की। नम्माळ्वार स्वयं इसके बारे में, “मयर्वर मदिनलम अरुळिनन” (तिरुवाय्मोळि १.१.१) और “अवावट्रु वीडु पेट्र” (तिरुवाय्मोळि १०.१०.११ ) में कहते हैं। नम्माळ्वार के संबंध मात्र कारण से, हम सभी क्रमागत इच्छा (कामना) को परभक्ति ,परज्ञान, परमभक्ति के रूप में अनुभव करते हैं। इसी कारण नम्माळ्वार के प्रति श्रीमन नारायण द्वारा प्रदत्त (अनुगृहीत) इस भक्ति के लिए हमारे पूर्वज तरसते हैं। इस विषय में , ये वचन , “भगवान भक्तिमपि प्रयच्छमे” अथवा “परभक्तियुत्थम माम् कुरुष्व” . ऐसे अनेक पूर्वज हैं, जो इस भक्ति केलिए तरस कर, इस भौतिकवादी संसार को पारकर , श्रीमन नारायण के नित्य निवास जो श्री वैकुंठ, परमपद हैं, वहां पहुँचे।

उन पूर्वजों को श्रीमन नारायण के निर्हेतुक कृपा कटाक्ष से यह संसार पार परमपद प्राप्त हुआ । इस दल के प्रतिनिधि हैं परांकुश (नम्माळ्वार) , परकाल सूरी (तिरुमंगै आळ्वार)। परमपद में श्री रामानुज ऐसे विशिष्ट संघठन में हैं। सिर्फ़ यह ही नहीं, वास्तव में श्री रामानुज का श्रेय अनंत हैं। वे परमपद प्राप्ति की इच्छा करने वालों कि एकमात्र आश्रय हैं। वे अपने अर्चा (मूर्ती) रूप में दिव्यदेशों के अलावा गृहों में भी प्रकाशित हैं। परमपद पहुँचने में अपनी अयोग्यता एवं अवगुण को एहसास कर, तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै , ऐसे श्री रामानुज की शरण लेते हैं । अंत में श्री रामानुज की कृपा तिरुवैमोळिपिळ्ळै को परमपद ले गयी । मणवाळमामुनि भी अपने आचार्य तिरुवाय्मोळिपिळ्ळै के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं। वे भी अपने आचार्य के जैसे ही श्री रामानुज के प्रति अत्यंत मोहित हुए । नम्माळ्वार हैं, “कृष्ण तृष्ण तत्व” अर्थात “वह तत्त्व जो कृष्ण के प्रति प्रेम को दर्शाता है” | वैसे श्री रामानुज के प्रति प्रेम को मणवाळ मामुनि कहा जा सकता हैं। इस कारण “यतीन्द्र प्रवण” उन्का व्यक्तित्व हैं।

“पालेपोल सीरिल पळुतोळिन्देन” (पेरिय तिरुवन्दादि ५८ ) और “नैय्युम मनं उन गुणंगळै उन्नी” (रामानुस नूट्रन्दादि १०२) के विवरण के जैसे मणवाळ मामुनि ने ख़ुद को एम्बेरुमानार (श्री रामानुज ) के दिव्य गुणों में डुबो दिया । श्री रामानुज के आश्चर्य पूर्वक कल्याण गुणों में मग्न होना मणवाळ मामुनि के स्वभाव में था । एम्बेरुमानार के कल्याण गुणों के प्रति निरंतर अनुभव के कारण वे एम्बेरुमानार के प्रति मोहित हुए और उनके चरण कमलों तक पहुँचना चाहते थे । तुरंत एम्बेरुमानार के चरण कमल न पहुँच पाने के कारण उनका शरीर सफ़ेद एवं पांडु (निर्बल) हुआ । वे एम्बेरुमानार को पहुँचने के लिए तरसे और उनसे अलग रहना सह न पाये। अंत में एम्बेरुमानार के कृपा के कारण उनके प्रति मणवाळ मामुनि को परम भक्ति प्राप्त हुई। एम्बेरुमानार की अत्यंत कृपा जिसके कारण मणवाळ मामुनि को एम्बेरुमानार के प्रति भक्ति खिली और उनके चरण कमल तक पहुँचाया, उसकी मामुनि कीर्तिगान करते हैं। चरम पर्व निष्ठा (एक भक्त को अपनी एक मात्र आश्रय समझना) में स्तिथ लोगों के लिए , उदाहरण के रूप में मणवाळ मामुनि “आर्ति प्रबंध” नामक इस ग्रंथ में उनको आशीर्वाद करने वाले श्री रामानुज कि कृपा के गुणगान करते हैं।

“पत्ति एल्लाम तंगियदेन्न” (रामानुस नूटट्रन्दादि १०८), में उल्लेखित परम भक्ति मणवाळ मामुनि ने श्री रामानुज के चरण कमलों के प्रति बढ़ाया। “परम भक्ति” वह स्तिथि हैं , जब चाहने वाला वस्तु की ना मिलने पर अस्तित्व असंभव बन जाता हैं। यही स्तिथि मणवाळ मामुनि की श्री रामानुज के चरण कमल की प्राप्ति न होने पर हैं। इस अवस्था में वे श्री रामानुज के चरण कमल प्राप्त होने की अतृप्य इच्छा प्रकट करते हैं। श्री रामानुज के चरण कमलों के छाव में होने कि अगाध इच्छा प्रकट करने कि कारण, इस ग्रंथ को आर्ति यानि इच्छा या प्रेम कहा जाता हैं। उनके चरण कमल पहुँचने कि इच्छा एक तो संसार के प्रति द्वेष, या श्रीमन नारायण के कल्याण गुणों के प्रति प्रेम (यहाँ श्री रामानुज के कल्याण गुण ) हो सकती हैं। “संसार सागर” के प्रति द्वेष को तिरुवाय्मोळि में “मुन्नीर ज्ञालं” दशक में नम्माळ्वार ने विचार किये हैं। उसी तिरुवाय्मोळि में, श्रीमन नारायण के प्रति प्रेम को “अरुक्कुम विनै” दशक में विचार किये हैं। इसी प्रकार आगे प्रस्तूत तनियन “वम्बविळ तार” और “तेन पयिलुम तारान” संसार के प्रति द्वेष एवं श्री रामानुज के चरण कमल के प्रति प्रेम कि विवरण करते हैं। मणवाळ मामुनि के “आर्ति” के यही दो कारण होते हुए, अत्यंत पासुरों में झलकती हुई, श्री रामानुज के चरण कमलों के प्रति प्रेम, मूल प्रेरणा स्थापित होती है।
मणवाळ मामुनि और श्री रामानुज समकालीन नहीं थे। श्री कूरत्ताळ्वान जैसे महान आचार्यो को प्राप्त अनुभव तथा कैंकर्य, मणवाळ मामुनि को, चाहने पर भी न मिली। किन्तु इस बात पर संतुष्ट हुए कि श्री रामानुज के निवास श्री रंगम में वे भी रह पाए , और (तिरुवाय्मोळि ३.१.१) “ वळुविला अडिमै”, यानि नित्य कैंकर्य कि प्रार्थना किये।
इसी कारण (आर्ति प्रबंध ११ ) “वडुग नम्बि तन निलयै एन तनक्कु तंदु एतिरासा एन्नाळुम उन्तनक्के आट्कोळ उगन्दु”, वचन से वे श्री रामानुज से वडुग नम्बि कि मानसिक अवस्था कि प्रार्थना करते हैं। श्री रामायण में लक्ष्मण कहते हैं ,“अहं सर्वंमं करिष्यामि”(हे राम! तुम्हारी सारी सेवा मैं करूंगा। ) श्री रामानुज की तुलना श्री लक्ष्मण से की जाती हैं। भरताळ्वान श्री राम को अपना सारा मानते हैं और वैसे ही शत्रुग्नाळ्वान भरत को। शत्रुघ्न पर श्री राम कि कल्याण गुण या सौन्दर्यता कि प्रभाव नहीं थीं। “राम भक्ति” नामक दुश्मन को शत्रुघ्न ने जीत लिया था, क्योंकि राम भक्ति, भरत के प्रति कैंकर्य कि हानि होगी। श्री रामायण में शत्रुघ्न को “शत्रुघ्नो नित्य शत्रुघ्न:” बताया गया हैं। जैसे श्री रामानुज श्री लक्ष्मण के पद में मानें जाते हैं, वैसे मणवाळ मामुनि शत्रुघ्न के पद में माने जाते हैं।

नम्माळ्वार, श्री रामानुज और मणवाळ मामुनि के बीच गहरी संबंध हैं। “मुगिल वण्णन अडियै अडैन्दु उइन्दवन” (तिरुवाय्मोळि 7. २. ११ ) के अनुसार, बादल रंगीन परमात्मा के चरण कमल जा पहुंचे। श्रीमन नारायण के कृपा से उनके चरण कमल प्राप्त हुए नम्माळ्वार के चरण कमलों में श्री रामानुज आश्रय लिए। श्री रामानुज से अन्य आश्रित रक्षक को न जान्ने वाले मणवाळ मामुनि, श्री रामानुज के चरण कमलों में शरणागति किये तथा उनके प्रति कैंकर्य किए। यह हैं आळ्वार (नम्माळ्वार ), एम्बेरुमानार (श्री रामानुज ) जीयर (श्री मणवाळ मामुनि) के मध्य गहरी संबंध।

नम्माळ्वार और श्री रामानुज के विशिष्ट वर्ग में माने जाने वाले मणवाळ मामुनि, इन महानों की श्रेय, अपनि “यतिराज विम्सती”, “उपदेस रत्नमाला” एवं “तिरुवाइमोळी नूट्रन्दादि” नामक ग्रंथो में विवरित किये। इन ग्रंथों में, वे इन पूर्वजों और उन्के सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों के प्रति अपनी अतृप्य प्रेम प्रकट करते है। “परांकुश पाद भक्तं” (यतिराज विमसति १ ), “षटकोपन तेमलर्थाटके इनिय पादुकमाम एन्दै इरामानुसन” (आर्ति प्रबंध १० ), जैसे वचन यह परिपुष्ट करती हैं। इस सोच को प्रचलित करते , उनके इस आखरी ग्रंथ (आर्ति प्रबंध ) से वे सीमांत पूर्ति करते हैं , “चरम पर्व” चरम याने , आख़री, इससे बडकर कुछ नहीं। मणवाळ मामुनि यह निश्चित स्थापित करते हैं कि सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य, प्राप्य श्रीमन नारायण के भक्तों के चरण कमल ही हैं। इस संसार में अपने चरम काल में, मणवाळ मामुनि इस दर्शन शास्त्र को अपनि चरम ग्रंथ में प्रकट किये। मणवाळ मामुनि अपने यतिराज विम्शति को “रामानुजं यतिपतिं प्रणमामि मूर्ध्ना”(श्लोक १ ) वाख्य से प्रारंभ करते हैं और “तस्माद अनन्य शरणौ भवतीति मत्वा” (श्लोक २०)से समाप्त करते हैं। इससे वे प्रापकं(पथ ) की प्रस्ताव करते हैं , जो साक्षात श्री रामानुज कि चरण कमल हैं। “आर्ति प्रबंध” को “वाळि एतिरासन” (१)से प्रारंभ कर, “इन्दवरंगथ्थु इनिदुरुनी” (६० ) से समाप्त करते हैं। इसमें प्रस्ताव हैं प्राप्य (उद्देश्य या लक्ष्य ) कि: श्री रामानुज के चरण कमल में कैंकर्य करना। अतः यतिराज विम्शति है , “प्रापक परं”, अर्थात पथ या मार्ग का विवरण और आर्ति प्रबंध हैं “प्राप्य परं,” अर्थात लक्ष्य या उद्देश्य की विवरण। इस संयोजन में दो वाख्य वाले द्वय मंत्र कि अनुसंधान करना उचित हैं। द्वय महामंत्र का दूसरा पद, दिव्य दम्पति के प्रति कैंकर्य करने कि आर्ति कि प्रस्तावना करती हैं। “आर्ती प्रबंध” यह सूचित करति हैं कि प्राप्य और कैंकर्य दोनों के ही पात्र श्री रामानुज के चरण कमल ही हैं। श्रीमन नारायण के भक्तों की सेवा, “तधीय कैंकर्य” ही सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य हैं। मणवाळ मामुनि कि यह ज्ञान उनके पासुरों में प्रकट होता हैं। “तधीय कैंकर्य” हि आर्ति प्रबंध कि अन्तर्निहित धारा हैं और इसको श्री मणवाळ मामुनि अनेक नाप छंद में प्रकट करते हैं।

आर्ति प्रबंध के पहले पासुर में मणवाळ मामुनि श्री रामानुज की मंगळासासनं करते हैं। श्री रामायण में इसकि एक सुन्दर दृष्टान्त हैं। दंडकारण्य वन में रावण और अन्य राक्षसों से पीड़ित अनेक ऋषि थे जो “एहि पश्य शरीराणि”,( हे राम ,ये हमारी क्षत शरीरों को देखो) बोल अपनी निर्बलता प्रकट करने केलिए आये। पर श्री राम की अत्यंत दिव्य सौंदर्यता में, अपने कष्ट भूल गए, और श्री राम की मंगळासासन (दुष्ट दृष्टि निकाल, रक्षा करने वाली), “मँगलानी प्रयुग्जान” , वचन से करने लगे। वैसे हि पेरिय उडयार (जटायु ) भी, रावण से युद्ध के पश्चात, अपने अंतिम दशा में श्री राम को देख कर, “आयुष्मान” कहा। उसी तरह मणवाळ मामुनि भी श्री रामानुज के चरण कमलों में आश्रय लेते समय, श्री रामानुज कि अप्राकृत शरीर (पञ्च तत्वों से न बना हुआ ) मंगळासासनं किये।
ऎसे मंगळासासनं करने वाले को परमपद में, नित्यसूरिया (श्री वैकुंठ में श्रीमन नारायण के संग नित्य वास करने वाले )बहुत मानते हैं। “अन्बाल मयल कोंडु वाळ्तुम इरामानुसन” (रामानुस नूट्रन्दादि ६ ) में जैसे तिरुवरंगत्तु अमुदनार ने गाया हैं, वैसे स्वयं श्री रामानुज ने भि मंगळासासनं किया हैं। परमपद प्राप्त हुए ,भक्तों की मंगळासासनं करने वालों कि नित्यसूरियों कि स्वागत कि विवरण , नम्माळ्वार अपने “सूळ विसुमबनिमुगिल” १०.९ तिरुवाय्मोळि में गाते हैं। ऐसा जन और उनके वंशज भी नित्यसूरियों के मंगळासासनं के पात्र बन जाते हैं। पहले पासुरम का यहि सारार्थ हैं। “पल्लाण्डु पल्लाण्डु “( तिरुपल्लाण्डु १ ) और “अप्पाञ्च्जन्नियमुम पल्लानंढे” (तिरुपल्लाण्डु २ ) पासुरों से पेरियाळ्वार श्रीमन नारायण के संग, उन्के शंक, धनुष जैसे उन्के भक्तों कि भी मंगळासासनं किए। श्री रामायण में इसी प्रकार , “जयतिभलो रामो लक्ष्मणश्च महाभल: राजाजयति सुग्रीवो राघवेणापिपालिता:” श्लोक से श्री राम, श्री लक्ष्मण तथा श्री सुग्रीव की मंगळासासनं की गयी हैं।

अडियेन प्रीती रामानुज दासी

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