उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ७                                                                                                                   श्लोक ९

श्लोक ८

अग्रे पश्चादुपरि परितो भूतलं पार्श्च्वतो मे
मौलौ वक्त्रे वपुषि सकले मानसाम्भोरूहे च ।
दर्शंदर्शं वरवरमुने दिव्यमङ्गिद्वयं ते
नित्यं मज्जन्नमृतजलधौ निस्तरेयं भवाब्धिं || ८ ||

शब्दश: अर्थ 

हे वरवरमुने!               : ओ श्रीवरवर मुनि स्वामीजी!
ते                              : आपके
दिव्यं                         : भव्य
अङ्गि द्वयं               : चरणों कि जोड़ी
अग्रे                           : (मैं देखना चाहता हूँ) मेरे सामने
पश्चात                      : मेरे पिछे
भू तलं परितो:            : भूमी के चारों दिशा में
मे पार्श्च्वतो:              : मेरे दोनों तरफ
मौलौ                        : मेरे मस्तक पर
वक्त्रे                         : मेरे मुख पर
वपुषि                        : मेरे शरीर के सभी अंगो में
मानसा म्भोरूहे च      : मेरे हृदय में
पस्यं पस्यं (दर्शं दर्शं)  : हमेशा देखना
अमृत जलधौ             : मरते हुए व्यक्ति को जीवन देनेवाला अमृत का समुंदर देना
मज्जन्न                   : डुबता हुआ
भवाब्धिं निस्तरेयं      : मैं इस जन्म रूपी समुंदर को पार करना चाहता हूँ।

अर्थ

गुरु पादाम्बुयं ध्यायेत गुरोरण्यम न भवयेत ….(प्रपंचसाराम)

यह प्रमाण बताता है कि हमे गुरु चरणों के मार्ग पर चलना चाहिये और कुछ भी विचार नहीं करना चाहिये। यह विस्मय है कि एक समुंदर से तैर कर दूसरे से निकलना। परन्तु आचार्य के भव्य चरण इसे होने योग्य बनाते है।

श्री रामानुज स्वामीजी श्री वैकुण्ठ गध्य में कहते है “भगवता आत्मीयं श्रीमद पादारविन्द युगलम शिरसि कृतं ध्यात्वा अमृत सागरान्तर र्निमग्न सर्वावयव: सुखमासीत” अर्थात भगवान के बारें में जो कहा गया है यहाँ वें अपने आचार्य के बारें में कहते है।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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