उत्तरदिनचर्या – श्लोक – ६

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक ४-५                                                                                                                         श्लोक ७

श्लोक ६

उन्मॆल्य पद्मगर्भ ध्युतित्लमुपरि क्शॆर सङ्घात गौरम
रा का चन्द्र प्र्काश प्र्चुर नखमनि ध्योत विध्योत मा नम
अङ्गुल्यग्रेशु किचिन्नतमति म्र्दुलम रम्य जामात्रुयोगि
दिव्यम ततपादयुग्मम दिशतु शिरसि मे देशिकेन्द्रो दयालु:   

शब्दश: अर्थ

दयालु:                                : वह जो दया का पहलू है
देशिकेन्द्रो                           : आचार्य मे सर्वश्रेष्ठ है
रम्य जामात्रुयोगि                : श्रीवरवरमुनि स्वामीजी
उन्मॆल्य पद्मगर्भ ध्युतित्लम : तेजस्वी श्रीचरण जैसे कमल पुष्प के अन्दर कि पुष्प कि पंखुड़ी
उपरी                                  : उपरी भाग में
क्शॆर सङ्घात गौरम             : सफेद जैसे मिठा दूध
रा का चन्द्र प्र्काश प्र्चुर नखमनि ध्योत विध्योत मा नम : चमकिले नाख़ुन जैसे पूर्ण चन्द्रमा कि सफेदी
अङ्गुल्यग्रेशु                       : नाखूनों का अन्तिम भाग
किचिन्नत                          : थोड़ा सा झुकता हुआ
मति म्र्दुलम                        : बहुत कोमल
दिव्यम                               : इस संसार का नहीं
तत                                    : अत्यंत महान
पादयुग्मम                         : उनके दो श्रीचरण
मे शिरसि                           : मेरे मस्तक पर कृपा करना

व्याख्या

इस गाथा से अगले ६ श्लोक उनके शिष्यों से लिखित स्तोत्र के रूप में है। पहिले श्लोक में एक शिष्य श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से उनके श्रीचरण को उनके मस्तक पर भूषण के जैसे रखने कि प्रार्थना करते है। दयालु = वह एक जिसमे दया प्रकृतिक रूप से है। श्रीरामानुज स्वामीजी के जैसे श्रीवरवर मुनि स्वामीजी भी अपने शिष्यों के प्रति दयालु है परंतु दूसरे आचार्य कि तरह सेवा किये नहीं बल्कि उनके स्वभाव से। दिशति उपदिशति इति देशिक: = वह जो शास्त्र का अर्थ सिखाते है वह देशिक है। देशिकानाम इंद्र:= देशिकेन्द्र; आचार्य के प्रधान जो देशिक है। आचार्य के प्रधान यानि ज्ञान को प्राप्त करना, ज्ञान के समनुरूप अभ्यास करना, सभी के ऊपर अनुकम्पा रखना। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी के श्रीचरण कमल कि तरह गुलाबी, श्रीनाखून चंद्रमा कि तरह सफेद और सामान्यत: पूर्ण श्रीचरण सुन्दर, चिकना और कोमल है। क्योंकि श्रीवरवर मुनि स्वामीजी श्री आदिशेष के अवतार है उनके श्रीचरण को आप्राकृत है ऐसा समझाया गया है यानि इस दुनिया की नहीं परन्तु परमपद कि कोई श्रेष्ठ वस्तु है। वह इस संसार के ससारियों के जैसे नीचा और सस्ता नहीं है। पहिले का वर्णन “उन्मॆल्य पद्मगर्भ” यह सभी सुन्दरता के पहलु है जो एक व्यक्ति को उत्तम पुरुष के योग्य करता है। यह शिष्य श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से यह निवेदन करता है कि उस पर उन चरण कमलों कि कृपा करें जिसके लिये वह प्राकृतिक रूप से शिष्य के रूप में योग्य है। जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में प्रार्थना करते है “निन सें मा पाड़ा पर्पु (पद्मम) थलै सेर्त्तु” यहाँ एक शिष्य श्रीवरवर मुनि स्वामीजी से प्रार्थना करता है उसे उनके चरण कमलों से कृपा करें क्यों कि वह ही उनके आचार्य है “पाड़ा युग्म शिरसी दिशतु मे” हालाकि यह तीसरे व्यक्ति के लिये कुछ पंक्ति जैसे दिखता है, यह सम्भव है की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी मुझ पर कृपा करे, परंतु एक शिष्य की व्यक्तिगत प्रार्थना से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से यही सच्चा इरादा है। यह अगले श्लोक में स्पष्ट हो जायेगा।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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