उत्तरदिनचर्या – श्लोक – १४

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः

परिचय

श्लोक १३                                                                                                                                   निष्कर्ष

श्लोक १४

दिनचर्याम इमाम दिव्यां रम्य जामातृ योगिन:
भक्त्या नित्यमनुध्यायन प्राप्नोति परमम् पदम

शब्द से शब्द

इमाम                                                  : “पटेर्त्यु पश्चिमे यामे” (पूर्व दिनचर्या १४) से “सयानम संस्मरामी तम” तक के                                                                 श्लोक।
दिव्याम् रम्यजामातृ योगिन: दिनचर्याम : अलगियामणवाळमामुनि के नित्य अनुष्ठान के विवरण
नित्यं : प्रति दिन (दिन और रात)            : जब एक व्यक्ति भक्ति संग दोहराता हैं
प्राप्नोति परमम् पदम                           : वह सर्वश्रेष्ठ निवासस्थान, परमपद सिद्द करता हैं जो जिसके आगे कुछ भी                                                                 नहीं।

अर्थ

अंत में यह दिनचर्या  ग्रन्थ अनुसंधान करने कि फल प्रकट करते हैं।
हमने देखा के पूर्वदिनचर्या के १३वे श्लोक तक प्रस्तावना; उपोध्गात हैं।

वहाँ के १४वे श्लोक से उत्तरदिनचर्या के १३वे श्लोक तक ही वरवरमुनि दिनचर्या हैं।

दिव्याम् को सर्वश्रेस्ट पांचरात्र के तरह शास्त्र सिद्धीय अनुष्ठानों को प्रकट करने वाली ग्रन्थ तथा दिव्यां -परमपदीय , इस संसार में असंभव, केवल परमपद में संभवित पञ्चकालिका (पांच कालों में करने वाले) अनुष्ठानों को प्रकट करने वालि ग्रन्थ भी मान सकते हैं।

भरद्वाजपरिसिष्ट कहति हैं कि अभ्यास में दुर्लभ ये अनुष्ठान कृतयुग में परमाइकान्तियो के द्वारा पूर्ण रूप से, त्रेतद्वापर युगो में घटते, कलियुग में अधिकतर अप्रचलित ही हो जाएगी।

विविध इच्छाओं और अनेक गौण देवताओं को पूजने वाले व्यक्ति , केवल श्रीमन नारायण को मानने वाले इस धर्म को नहीं अपनाएंगे।

कलि के क्रूरता से अल्प विषयों में मोहित रहते हैं और उनसे छुटकारा पाने कि बुद्धि भी उनमें कलि के पीड़ा के कारण सिद्ध नहीं होती हैं। और अगर उनमें कोई भगवान को पूजते भी हैं , तो परमतीय दुरशक्ति उनको अपने ओर मोह कर लेंगीं।

हिंदी अनुवाद – केशव रान्दाद रामानुजदास

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